विश्व धरोहर ताज महल और मुग़ल वास्तुकला के बेजोड़ प्रतीकों को सहेजे ऐतिहासिक शहर आगरा में जब आधुनिक भूमिगत रेल चलाने की परिकल्पना की गई, तब इसे देश के सबसे पेचीदा बुनियादी ढांचा अभियानों में गिना जा रहा था। एक तरफ़ सदियों पुरानी इमारतों की ऐतिहासिक नींव थी, तो दूसरी तरफ़ सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी वाले ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन (Taj Trapezium Zone) के कड़े पर्यावरणीय नियम। उत्तर प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (Uttar Pradesh Metro Rail Corporation) द्वारा विकसित आगरा मेट्रो ने न केवल इन संवेदनशील चुनौतियों को पार किया, बल्कि शहर के 26 लाख स्थानीय नागरिकों और प्रतिवर्ष आने वाले 60 लाख पर्यटकों के रोज़ाना आवागमन को एक नई दिशा दी है। इस विस्तृत विश्लेषण से पाठक यह जान सकेंगे कि कैसे अत्याधुनिक इंजीनियरिंग, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय साझेदारी और कड़े अदालती दिशा-निर्देशों के समन्वय ने आगरा के सार्वजनिक परिवहन को जीवाश्म ईंधन के प्रदूषण से मुक्त कर हरित भविष्य की पटरी पर खड़ा किया है।
ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में शून्य-उत्सर्जन परिवहन प्रणाली की आवश्यकता क्यों पड़ी?
ऐतिहासिक रूप से आगरा की संकरी सड़कों पर अनियंत्रित रूप से बढ़ते डीज़ल और पेट्रोल वाहनों के धुएँ ने संगमरमरी धरोहरों के अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन के अंतर्गत औद्योगिक उत्सर्जन और भारी वाहनों की आवाजाही पर पहले से ही कड़े प्रतिबंध लागू थे, लेकिन शहर के 26 लाख बाशिंदों और 60 लाख सैलानियों के लिए कोई तेज़, विश्वसनीय और प्रदूषण-मुक्त मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (Mass Rapid Transit System) उपलब्ध नहीं था। इस गतिरोध को तोड़ने के लिए 8,379.62 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली आगरा मेट्रो रेल परियोजना की विस्तृत कार्ययोजना तैयार की गई। इससे पूर्व 8 मार्च 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस परियोजना का प्रारंभिक शिलान्यास किया था, जिसके बाद 7 दिसंबर 2020 को 15वीं बटालियन पीएसी परेड ग्राउंड में आयोजित कार्यक्रम के माध्यम से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री हरदीप सिंह पुरी की उपस्थिति में इसके निर्माण कार्य का आधिकारिक शुभारंभ किया गया। इस परियोजना का प्राथमिक उद्देश्य अनियंत्रित सड़क परिवहन के स्थान पर बिजली से चलने वाली तीव्र रेल प्रणाली स्थापित करना था, लेकिन सबसे बड़ा पेंच कानूनी और पर्यावरणीय अनुमतियों का था।
सुप्रीम कोर्ट और सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी की पर्यावरण संबंधी शर्तें क्या थीं?
ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में किसी भी बड़े निर्माण कार्य के लिए देश की शीर्ष अदालत की अनुमति अनिवार्य थी। दिसंबर 2019 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति सूर्य कांत की पीठ के समक्ष जब मेट्रो प्रशासन की ओर से अधिवक्ता ऐश्वर्या भाटी ने निर्माण की अनुमति माँगी, तब अदालत ने पूरे मामले को अपनी सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (Central Empowered Committee) को सौंप दिया। इस विशेष समिति को यह ज़िम्मेदारी दी गई कि वह परियोजना से हवा, हरियाली और भूजल पर पड़ने वाले प्रभावों का चार सप्ताह में आकलन करे। समिति ने अपनी विस्तृत पड़ताल के बाद पेड़ों की सुरक्षा, प्रतिपूरक वनीकरण और जल-संरक्षण की कड़ी शर्तों के साथ परियोजना की संस्तुति की, जिसके आधार पर जुलाई 2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने आगरा मेट्रो के निर्माण को अंतिम हरी झंडी प्रदान की। इस न्यायिक परीक्षण ने सुनिश्चित किया कि आधुनिक विकास किसी भी स्थिति में पर्यावरणीय संतुलन की क़ीमत पर न हो।
मुग़लकालीन स्मारकों की सुरक्षा के लिए कौन सी उन्नत इंजीनियरिंग तकनीक अपनाई गई?
आगरा फ़ोर्ट और ताज महल जैसे प्राचीन स्मारकों के निकट भूमिगत सुरंग खोदना तकनीकी दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील था। मुग़लकालीन इमारतों की नींव सदियों पुरानी चूने और पत्थरों की चिनाई पर टिकी है, जिन्हें रेलगाड़ियों के नियमित संचालन से उत्पन्न होने वाले कंपन से स्थायी नुक़सान पहुँचने का ख़तरा था। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए उत्तर प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने पटरियों के नीचे विशेष वाइब्रेशन डैम्पिंग ट्रैक्स (Vibration-damping tracks) का उपयोग किया। यह उन्नत प्रणाली ट्रेनों के पहियों और पटरियों के बीच पैदा होने वाले कंपन और ध्वनि तरंगों को ज़मीन के भीतर ही सोख लेती है, जिससे सतह पर स्थित ऐतिहासिक प्राचीरों तक कोई यांत्रिक झटका नहीं पहुँचता। इसके अतिरिक्त, घनी आबादी और स्मारकों के नीचे टनलिंग के काम को असाधारण दक्षता के साथ पूरा करते हुए 3 किलोमीटर के भूमिगत हिस्से को महज़ 11 महीने में तैयार कर देश में सबसे तेज़ भूमिगत निर्माण का कीर्तिमान स्थापित किया गया।

29.4 किलोमीटर लंबे नेटवर्क में किन दो रणनीतिक कॉरिडोरों को चुना गया?
आगरा शहर के समग्र भौगोलिक विस्तार को साधने के लिए योजनाकारों ने कुल 29.4 किलोमीटर लंबाई वाले दो रणनीतिक कॉरिडोरों की रूपरेखा तैयार की। पहला कॉरिडोर सिकंदरा से ताज ईस्ट गेट तक 14 किलोमीटर लंबा है, जो ऐतिहासिक सिकंदरा, राजा की मंडी, आगरा फ़ोर्ट और ताज महल को सीधे जोड़ता है। दूसरा कॉरिडोर आगरा कैंट रेलवे स्टेशन से शुरू होकर संजय प्लेस और घनी आबादी वाले कालिंदी विहार तक 15.4 किलोमीटर की दूरी तय करता है। इस दोहरे नेटवर्क का उद्देश्य केवल पर्यटकों को स्मारकों तक पहुँचाना ही नहीं, बल्कि अंतरराज्यीय बस अड्डे, प्रमुख रेलवे स्टेशनों, मेडिकल कॉलेज और सघन उपनगरीय बस्तियों के दैनिक यात्रियों को निर्बाध कनेक्टिविटी प्रदान करना है। इन दोनों मार्गों के पूर्ण संचालन से शहर के प्रमुख चौराहों पर लगने वाले भारी जाम से स्थायी मुक्ति मिलने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक का 450 मिलियन यूरो का वित्तपोषण कैसे तय हुआ?
इतने विशाल पूंजीगत व्यय वाली परियोजना को ज़मीन पर उतारने के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण था। 8,379.62 करोड़ रुपये की कुल लागत में से 50 प्रतिशत वित्तीय भार यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक (European Investment Bank) द्वारा वहन किया जाना तय हुआ, जबकि शेष 50 प्रतिशत हिस्सेदारी केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच आधी-आधी (25-25 प्रतिशत) बांटी गई। 22 दिसंबर 2021 को भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के आर्थिक कार्य विभाग के अपर सचिव रजत कुमार मिश्रा और यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक के डिवीज़न प्रमुख एडवर्डस बमस्टीनस (Edvardas Bumsteinas) व रॉजर स्टुअर्ट (Roger Stuart) ने नई दिल्ली और ब्रुसेल्स में 250 मिलियन यूरो की पहली ऋण क़िस्त के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए। बैंक ने दोनों कॉरिडोरों के निर्माण के लिए कुल 450 मिलियन यूरो के ऋण को स्वीकृति दी, जिसने समयबद्ध निर्माण और विश्वस्तरीय सुरक्षा उपकरणों की ख़रीद को वित्तीय गति दी।
6 किलोमीटर के प्राथमिकता कॉरिडोर ने गति और पर्यावरण प्रबंधन में क्या कीर्तिमान बनाए?
6 मार्च 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोलकाता से वर्चुअल माध्यम से आगरा मेट्रो के 6 किलोमीटर लंबे प्राथमिकता कॉरिडोर का उद्घाटन किया, जिसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ताज महल स्टेशन से ताज ईस्ट गेट तक पहली आधिकारिक यात्रा की। 2,100 करोड़ रुपये की लागत से बने इस खंड में कुल 6 स्टेशन शामिल हैं, जिनमें ताज ईस्ट गेट, शहीद कैप्टन शुभम गुप्ता और फतेहाबाद रोड एलिवेटेड हैं, जबकि ताज महल, आगरा फ़ोर्ट और मनकामेश्वर भूमिगत स्टेशन हैं। गुजरात के सावली, वडोदरा में मेक इन इंडिया (Make in India) और आत्मनिर्भर भारत (Atmanirbhar Bharat) पहल के तहत 3 कोच वाली कुल 28 आधुनिक ट्रेनों का निर्माण किया गया। निर्माण के दौरान पर्यावरण प्रबंधन के लिए इस परियोजना को आईएसओ 14001 (ISO 14001) और सुरक्षा प्रबंधन के लिए आईएसओ 45001 (ISO 45001) का अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन मिला। पेड़ों को काटने के बजाय उनका सुरक्षित प्रत्यारोपण किया गया और अनिवार्य वनीकरण के तहत 21 हेक्टेयर भूमि पर व्यापक पौधारोपण संपन्न कराया गया।
स्थानीय नागरिकों और वैश्विक पर्यटकों के आवागमन में यह मेट्रो क्या स्थायी बदलाव लाएगी?
7 मार्च 2024 से आम जनता के लिए खोली गई इस सेवा में 1 स्टेशन के लिए 10 रुपये, 2 स्टेशनों के लिए 20 रुपये और 3 से 6 स्टेशनों के लिए महज़ 30 रुपये का किफ़ायती किराया तय किया गया है। इस सुगम यात्रा ने पर्यटकों को मनमाने ऑटो और टैक्सी के किराए से निजात दिलाई है और दशकों से जाम झेल रहे स्थानीय बाज़ार क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन को बड़े पैमाने पर कम किया है। आगरा मेट्रो ने यह सिद्ध कर दिया है कि सदियों पुरानी संवेदनशील धरोहरों के संरक्षण और इक्कीसवीं सदी की तीव्र शहरी गतिशीलता के बीच कोई टकराव नहीं है, बल्कि सटीक योजना से दोनों को एक साथ साधा जा सकता है। शहर की इस ऐतिहासिक यात्रा का सच्चा लाभ तभी संभव है जब प्रत्येक नागरिक और आगंतुक निजी वाहनों का मोह छोड़ इस विश्वस्तरीय, सुरक्षित और हरित मेट्रो को अपनी दैनिक जीवनशैली का हिस्सा बनाएँ।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/294p22r6
2. https://tinyurl.com/29w6fhl7
3. https://tinyurl.com/ylxdwk4f
4. https://tinyurl.com/ylr3ctmn
5. https://tinyurl.com/2bl29e99
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