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पश्चिम दिशा से निरंतर दस्तक देती थार रेगिस्तान की शुष्क गर्म हवाएँ और दूसरी ओर तेज़ी से फैलता अनियंत्रित शहरीकरण, इन दोनों के बीच ऐतिहासिक शहर आगरा एक संवेदनशील भौगोलिक मुहाने पर खड़ा है। अक्सर दुनिया की नज़र केवल संगमरमरी इमारतों पर टिकती है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि इस प्राचीन नगरी को पर्यावरणीय विनाश से बचाने का दारोमदार उसके 262 वर्ग किलोमीटर में सिमटा सीमित वन क्षेत्र पर टिका है। यह हरित दायरा ज़िले के समूचे भूभाग का महज़ साढ़े छह प्रतिशत बैठता है। पहली नज़र में यह आँकड़ा बेहद मामूली लग सकता है, लेकिन इसका पारिस्थितिक प्रभाव इसके आकार से कहीं अधिक व्यापक और जीवनदायी है। इस विस्तृत पड़ताल में हम समझेंगे कि यह वन आवरण किस तरह बीहड़ों को बाँधता है, चिलचिलाती गर्मी की मार सहता है, यमुना की मिट्टी को कटने से रोकता है और विश्व धरोहर स्मारकों के ऊपर मंडराते धूल के कणों को साफ़ करने में एक प्राकृतिक फ़िल्टर की तरह चौबीसों घंटे मुस्तैद रहता है।
आगरा के सीमित वन क्षेत्र का वास्तविक भौगोलिक स्वरूप क्या है?
भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन कार्यरत संस्थान फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (Forest Survey of India) की 2019 की आधिकारिक रिपोर्ट इस क्षेत्र की ज़मीनी हक़ीक़त को साफ़ तौर पर रेखांकित करती है। आँकड़ों के मुताबिक, 4,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल वाले आगरा ज़िले में केवल 262 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ही वनाच्छादित है, जो कुल ज़मीन का लगभग 6.5 फ़ीसदी है। यह इलाक़ा सघन सदाबहार वनों जैसा नहीं है, बल्कि यहाँ का परिदृश्य मुख्य रूप से खुले जंगलों और बीहड़ की कँटीली झाड़ियों से निर्मित है। वैज्ञानिक वर्गीकरण के तहत यहाँ कैनोपी डेंसिटी (Canopy Density) यानी छत्र घनत्व अपेक्षाकृत कम पाया जाता है। अर्ध-शुष्क जलवायु की मार झेलने वाले ये खुले जंगल और चंबल व यमुना की खाइयों में उगी वनस्पतियाँ कम पानी और प्रचंड तापमान में भी जीवित रहने के लिए पूरी तरह अनुकूलित हैं। प्रकृति ने इस भूभाग को जो स्वरूप दिया है, वह रेत के टीलों को शहर की सीमा में घुसने से रोकने वाली पहली रक्षा पंक्ति साबित होता है।
सूर सरोवर और कीठम झील का पारिस्थितिक तंत्र क्यों विशिष्ट माना जाता है?
जब हम आगरा के वनों की गहराई में उतरते हैं, तो सबसे जीवंत और महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में सूर सरोवर पक्षी अभयारण्य सामने आता है। आगरा-दिल्ली राजमार्ग यानी नेशनल हाईवे-19 (National Highway-19), जिसे पूर्व में एनएच-2 (NH-2) के नाम से जाना जाता था, के किनारे स्थित यह अभयारण्य महाकवि सूरदास की पावन तपोस्थली रुनकता के बिल्कुल समीप विकसित है। उत्तर प्रदेश वन विभाग ने वर्ष 1991 में इस क्षेत्र को राष्ट्रीय पक्षी अभयारण्य घोषित किया था। लगभग 7.13 वर्ग किलोमीटर के जलग्रहण क्षेत्र में फैला यह पंचकोणीय सरोवर लगभग 43 हेक्टेयर के विशाल जलस्रोतों और दलदली विस्तार को अपने भीतर समेटे हुए है। इस जलाशय की वैश्विक अहमियत तब और पुख्ता हो गई जब नवंबर 2020 में इसे अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में 1971 के समझौते के तहत रामसर (Ramsar) स्थल का दर्जा दिया गया। यह उत्तर प्रदेश का आठवाँ घोषित रामसर स्थल बना, जिसने ताजनगरी को ऐतिहासिक धरोहरों के साथ-साथ वैश्विक पर्यावरण संरक्षण के मानचित्र पर भी एक विशिष्ट पहचान दिला दी।

इन जंगलों और खाइयों में किस प्रकार की देशज जैव विविधता फल-फूल रही है?
इस अर्ध-शुष्क पर्यावरण में प्रकृति ने ऐसे पेड़-पौधों का चयन किया है जो बंजर और खारी ज़मीन में भी अपनी जड़ें जमाए रखते हैं। यहाँ के जंगलों में देशी बबूल, ढाक जिसे पलाश भी कहा जाता है, और कँटीले बेर के वृक्ष बहुतायत में पाए जाते हैं। ये वृक्ष न केवल ज़मीन में नमी बनाए रखते हैं बल्कि वन्यजीवों को सुरक्षित ठिकाना भी देते हैं। इन जंगलों में विचरण करने वाले जीवों में नीलगाय और सुनहरे सियार मुख्य रूप से शामिल हैं। इसके अलावा, सूर सरोवर और आसपास के बीहड़ों में लगभग 300 अजगरों की मौजूदगी दर्ज है, जो इस नम भूमि को सरीसृपों के लिए एक मुफ़ीद आश्रय स्थल बनाती है। जलाशय के भीतर 60 से अधिक प्रजातियों की मछलियाँ तैरती हैं, जो जलीय खाद्य शृंखला को गतिमान रखती हैं। सर्दियों के महीनों में, यानी अक्टूबर से मार्च के दौरान, यहाँ का नज़ारा अद्भुत होता है। सेंट्रल एशियन फ्लाईवे (Central Asian Flyway) से गुज़रने वाले 30,000 से अधिक प्रवासी जलपक्षी हर साल यहाँ डेरा डालते हैं। इनमें पेलिकन (Pelican), पेंटेड स्टोर्क (Painted Stork) और साइबेरियाई बत्तखों की 165 से अधिक प्रजातियाँ शामिल हैं। इसी वन क्षेत्र की गोद में वाइल्डलाइफ एसओएस (Wildlife SOS) द्वारा संचालित भालू संरक्षण केंद्र भी स्थापित है, जो संकटग्रस्त स्लोथ बियर (Sloth Bear) के बचाव और पुनर्वास के लिए दुनिया भर में ख्याति प्राप्त कर चुका है।
स्थानीय ग्रामीण आजीविका और पशुपालन को इन वनों से क्या सहारा मिलता है?
आगरा के जंगलों का महत्व केवल पशु-पक्षियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सदियों से यह स्थानीय चरवाहा और ग्रामीण समाजों की जीवनरेखा रहा है। यमुना और चंबल की तलहटी में बसे गाँव अपने मवेशियों के लिए चारे और दैनिक आवश्यकताओं के लिए सूखी लकड़ी इन्हीं जंगलों से जुटाते हैं। इसके साथ ही, ढाक और बबूल के वनों से पारंपरिक रूप से शुद्ध जंगली शहद का संकलन कर स्थानीय लोग अपनी आय बढ़ाते हैं। हाल के वर्षों में कीठम झील के आसपास विकसित इकोटूरिज्म (Ecotourism) ने ग्रामीण युवाओं के लिए सम्मानजनक रोज़गार के नए रास्ते खोले हैं। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा तैयार किए गए प्रकृति भ्रमण पथ, नौकायन केंद्र और पक्षी दर्शन के लिए बने निगरानी टावर पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। इससे स्थानीय गाइड, छोटे दुकानदार, टैक्सी चालक और वन संरक्षण से जुड़े स्वयंसेवकों को सीधे तौर पर आर्थिक संबल मिल रहा है, जिससे संरक्षण और आजीविका का एक टिकाऊ ढाँचा ज़मीन पर उतर रहा है।
यमुना के किनारों और ऐतिहासिक इमारतों की सुरक्षा में यह वन कैसे ढाल बनते हैं?
आगरा की भौगोलिक बनावट बेहद संवेदनशील है। यमुना नदी के कछारी क्षेत्र की रेतीली और दोमट मिट्टी बारिश के दिनों में बहुत तेज़ी से कटती है, जिससे गहरे बीहड़ बनने का ख़तरा हमेशा बना रहता है। इन वनों की गहरी जड़ें मिट्टी को कसकर बाँधे रखती हैं, जिससे भूमि का कटाव रुकता है। इसके अतिरिक्त, मई और जून के महीनों में जब पारा 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुँच जाता है, तब ये वन स्थानीय तापमान को नियंत्रित कर लू के थपेड़ों की तीव्रता को कम करते हैं। सबसे बड़ा चमत्कार वायु प्रदूषण की रोकथाम में दिखता है। आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग और औद्योगिक गतिविधियों के चलते वायुजनित धूल और सूक्ष्म प्रदूषक कणों के भारी दबाव में रहता है। वनों की घनी पत्तियाँ इन निलंबित धूलकणों को सोखकर प्राकृतिक छन्नी का कार्य करती हैं। यदि यह 262 वर्ग किलोमीटर का हरित आवरण न हो, तो धूल भरी आँधियाँ सीधे ताजमहल, आगरा क़िला और फ़तेहपुर सीकरी जैसी विश्व धरोहरों की नक्काशीदार सतहों से टकराकर उन्हें अपूरणीय क्षति पहुँचा सकती हैं।
आगरा के ये खुले वन और बीहड़ कोई उपेक्षित बंजर ज़मीन नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण के मूक पहरेदार हैं। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ स्वच्छ हवा में साँस लें, प्रवासी परिंदे हर सर्दी में कीठम के पानी पर उतरें और विश्व धरोहरों की चमक बनी रहे, तो हमें इस सीमित 6.5 फ़ीसदी वन क्षेत्र के एक-एक पेड़ की रक्षा करनी होगी। आज ही संकल्प लें कि अपने आस-पास के प्राकृतिक वनों में गंदगी न फैलाएँ, स्थानीय जैव विविधता का सम्मान करें और इस साझी प्राकृतिक धरोहर को बचाने में अपनी नागरिक ज़िम्मेदारी निभाएँ।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/29tlpbgk
2. https://tinyurl.com/26yauj27
3. https://tinyurl.com/256th486
4. https://tinyurl.com/2d6chsda
5. https://tinyurl.com/22nj9pq3
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