ताजमहल के ऐतिहासिक परिवेश और शहर की भागदौड़ से क़रीब 20 किलोमीटर दूर, राष्ट्रीय राजमार्ग-19 पर दिल्ली की ओर बढ़ते हुए रुनकता के निकट एक शांत प्राकृतिक संसार आबाद है। सूर सरोवर पक्षी अभयारण्य के अर्ध-शुष्क वनों के बीच कीठम (Keetham) झील का किनारा न केवल 165 से अधिक देशी और प्रवासी पक्षियों का बसेरा है, बल्कि यह धरती के सबसे विलक्षण स्तनधारी जीवों में शुमार स्लॉथ भालू (Melursus ursinus) का सुरक्षित घर भी है। यहाँ विश्व का सबसे बड़ा भालू संरक्षण और पुनर्वास केंद्र स्थापित है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1999 में वाइल्डलाइफ़ एसओएस (Wildlife SOS) और उत्तर प्रदेश वन विभाग के संयुक्त प्रयासों से हुई थी। यह केंद्र कभी सड़क पर तमाशा दिखाने वाले 'नाचते भालुओं' को केवल नया जीवन ही नहीं दे रहा, बल्कि क़रीब चार मिलियन वर्षों के विकासक्रम से उपजे इनके अनूठे व्यवहार को समझने का सबसे बड़ा वैज्ञानिक मंच भी बन चुका है। आज की इस विशेष पड़ताल में हम विस्तार से जानेंगे कि यह जीव कैसे चट्टान जैसी सख़्त बांबियों को चीरकर वैक्यूम क्लीनर की तरह दीमकों को खींचता है, कैसे इसकी मादा अपने बच्चों को पीठ पर लादकर शिकारियों से बचाती है, और दशकों के मानसिक आघात को भुलाकर ये भालू यहाँ दोबारा कुदरती तौर-तरीक़े कैसे सीख रहे हैं।
कीट-पतंगों पर जीवित रहने वाले इस जीव की शारीरिक बनावट इतनी अनोखी क्यों है?
भालू परिवार के अधिकांश सदस्य जहाँ फल, मछलियाँ, छोटे कशेरुकी जीव या हरी वनस्पतियाँ खाकर निर्वाह करते हैं, वहीं स्लॉथ भालू ने प्रकृति में एक अत्यंत विशिष्ट विधा विकसित की है जिसे विज्ञान में माइरमेकोफेगी (Myrmecophagy) यानी चींटियों और दीमकों का विशेष भक्षण कहा जाता है। इस भालू की शारीरिक संरचना किसी अत्याधुनिक यांत्रिक औज़ार की तरह काम करती है। जंगल में विचरण करते समय इसकी सूंघने की तीव्र क्षमता मिट्टी और कंक्रीट के नीचे छिपी दीमकों की गंध को भी आसानी से पकड़ लेती है। इसके पंजों में लगभग 4 इंच लंबे, बेहद मज़बूत और हंसिए के आकार के नाखून होते हैं। बिल्ली या अन्य हिंसक जानवरों के विपरीत इसके पंजे अंदर की ओर नहीं सिकुड़ते, बल्कि हमेशा बाहर निकले रहते हैं। यह बनावट एक कुदाल की तरह काम करती है, जिसकी मदद से यह भालू मिट्टी की सख़्त से सख़्त बांबी को चंद सेकंडों में खोदकर खोल देता है। बांबी के भीतर पहुँचते ही इस शिकारी के चेहरे का वह हिस्सा सक्रिय होता है, जो पूरी दुनिया के मांसाहारी जीवों में सबसे अनूठा माना जाता है।
क्या बिना अगले दाँतों वाला जबड़ा किसी शिकारी की सबसे बड़ी ताक़त बन सकता है?
आम तौर पर वन्यजीवों के संसार में लंबे और पैने दाँतों को ही ताक़त का पैमाना माना जाता है, लेकिन स्लॉथ भालू के विकासक्रम ने बिल्कुल विपरीत रास्ता चुना। इसके ऊपरी जबड़े के बीच वाले कृंतक (इंसाइज़र) दाँत पूरी तरह अनुपस्थित होते हैं। पहली नज़र में यह दाँतों के बीच का खाली फासला लगता है, लेकिन असल में यह एक स्वाभाविक सक्शन नोज़ल की भूमिका निभाता है। बांबी में सुराख़ करने के बाद भालू सबसे पहले ज़ोरदार साँस बाहर छोड़कर धूल और कंकर-पत्थर उड़ा देता है। इसके बाद उसके अत्यधिक लचीले होंठ बांबी के मुहाने पर एक वायुरोधी सील बना लेते हैं, और वह मुँह के रास्ते हवा को प्रचंड गति से भीतर खींचना शुरू करता है। इस तीव्र खिंचाव से एक शक्तिशाली वैक्यूम (Vacuum) उत्पन्न होता है, जिससे पलक झपकतें हज़ारों दीमक सीधे उसके मुँह में खिंचती चली जाती हैं। इस दौरान नथुनों में कीड़ों और मिट्टी के कणों को जाने से रोकने के लिए स्लॉथ भालू अपनी इच्छा से अपनी नाक के छिद्रों को पूरी तरह बंद कर सकता है। भोजन खींचते समय हवा के दबाव से एक ज़ोरदार खर्राटेदार सुड़कने की आवाज़ पैदा होती है, जिसे शांत जंगल में 100 मीटर से भी अधिक दूरी से साफ़ सुना जा सकता है।

पूरी दुनिया के भालुओं में अपने बच्चों को पीठ पर लादकर चलने का हुनर सिर्फ़ इसी प्रजाति के पास क्यों है?
शिकार के अनूठे तरीक़ों के अलावा स्लॉथ भालू का पारिवारिक संरक्षण तंत्र भी प्रकृति का एक दुर्लभ चमत्कार है। मादा स्लॉथ भालू सामान्यतः दो से तीन बच्चों को जन्म देती है, और वह पूरे विश्व में भालुओं की इकलौती ऐसी प्रजाति है जो अपने नन्हें शावकों को अपनी पीठ पर बैठाकर (पिगीबैक) घुमाती है। जन्म के पहले 6 से 9 महीनों तक शावक अपनी माँ के लंबे और घने बालों को कसकर पकड़े रहते हैं। माँ चाहे ज़मीन पर भोजन की तलाश में मीलों चल रही हो, सख़्त ज़मीन खोद रही हो या पेड़ों की डालियों पर चढ़ रही हो, बच्चे उसकी पीठ पर सुरक्षित टिके रहते हैं। ध्रुवीय या भूरे भालुओं के बच्चे ज़मीन पर माँ के पीछे चलते हैं, जिससे उन पर ज़मीनी शिकारियों का ख़तरा बना रहता है। भारतीय जंगलों में बाघ और तेंदुए जैसे परभक्षियों की मौजूदगी को देखते हुए यह व्यवहार शावकों की सुरक्षा के लिए एक अचूक ढाल साबित होता है। कई बार दर्ज किए गए अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि पीठ पर बच्चे सवार होने के बावजूद मादा भालू ने अपनी भीषण गर्जना से बाघों तक को खदेड़ दिया। यह आदत स्लॉथ भालू की उच्च सतर्कता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और असाधारण ममता को दर्शाती है।
सड़क के तमाशे से सूर सरोवर तक पहुँचने वाले भालुओं के दर्द का इतिहास क्या है? कुदरत के इस अद्भुत जीव को सदियों तक इंसान की क्रूरता का सामना करना पड़ा। भारत में लगभग 400 वर्षों से कलंदर समुदाय द्वारा इन भालुओं को जंगलों से पकड़कर 'नाचते भालू' के रूप में प्रताड़ित करने की एक अमानवीय परंपरा चल रही थी। शिकारियों द्वारा दूधमुंहे शावकों को उनकी माँ से छीन लिया जाता था, उनकी थूथन को गर्म सलाखों से छेदकर मोटी रस्सियाँ पिरोई जाती थीं, और बचाव के डर से उनके दाँतों को बेरहमी से तोड़ दिया जाता था। इस क्रूर शोषण को पूरी तरह समाप्त करने के उद्देश्य से वर्ष 1999 में कीठम के सूर सरोवर में आगरा भालू संरक्षण केंद्र स्थापित किया गया। रेस्क्यू कर लाए गए भालुओं के जिस्म पर गहरे घाव तो थे ही, लेकिन उससे भी भयंकर उनका मानसिक आघात था। लंबे समय तक संकरे बंधनों में रहने के कारण इन भालुओं में लगातार सिर हिलाने या अपने पंजों को अत्यधिक चाटने जैसी गंभीर मनोवैज्ञानिक विकृतियाँ घर कर चुकी थीं, जिसे पशु व्यवहार विज्ञान में स्टीरियोटाइपिक बिहेवियर (Stereotypic Behaviour) कहा जाता है।
चारदीवारी के भीतर भालुओं के खोए हुए कुदरती मिज़ाज को कैसे लौटाया जाता है?
आगरा केंद्र में भालुओं के उपचार का आशय केवल भोजन या दवा देना नहीं है, बल्कि उन्हें उनके स्वाभाविक जंगली व्यवहार की ओर लौटाना है। यहाँ प्रत्येक बाड़े को दो भागों में बाँटा गया है—एक विशाल खुला मैदान और दूसरा उनका भीतरी 'डेन', जो जंगल की स्वाभाविक मांद जैसा सुरक्षित वातावरण प्रदान करता है। भालुओं की शारीरिक और मानसिक सक्रियता को फिर से जगाने के लिए बहुस्तरीय एनरिचमेंट (Enrichment) तैयार किए जाते हैं। खुले मैदान में ऊँचे-नीचे मचान, संतुलन बीम, रस्सियों की सीढ़ियाँ और झूलते हुए हैमॉक लगाए गए हैं। बाँस के खोखले पाइपों और बोरियों में शहद, खजूर और नारियल के टुकड़े छिपाकर लटकाए जाते हैं। इन संरचनाओं पर चढ़ने और पंजों से मिट्टी खोदने की प्रक्रिया से भालुओं की सुप्त इंद्रियाँ दोबारा जाग उठती हैं। भालू अब कीचड़ के गड्ढे खोदते हैं, पेड़ों पर चढ़ते हैं और अपने बाड़े के साथियों के साथ स्वाभाविक खेलकूद में समय बिताते हैं, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य में सुधार का सबसे बड़ा प्रमाण है।
बिना किसी ज़बरदस्ती या तनाव के इन विशाल वन्यजीवों का इलाज कैसे संभव होता है?
वर्षों तक इंसानी हिंसा झेल चुके जानवरों के मन में इंसानों को लेकर गहरा अविश्वास होता है। यदि स्वास्थ्य परीक्षण के लिए उन्हें बार-बार बेहोश किया जाए या ज़बरदस्ती पकड़ी जाए, तो उनका मानसिक आघात और गहरा सकता है। इस समस्या के समाधान के लिए कीठम केंद्र पर ऑपरेंट कंडीशनिंग (Operant Conditioning) की अहिंसक वैज्ञानिक पद्धति अपनाई जाती है। भोजन के समय 10 से 15 मिनट के सत्रों में भालुओं को टारगेट ट्रेनिंग (Target Training) दी जाती है। सुरक्षित जाली के पीछे से देखभालकर्ता भालू को छड़ी छूने, पंजा आगे बढ़ाने या मुँह खोलने का इशारा करते हैं। जैसे ही भालू निर्देश का पालन करता है, उसे शहद, गुड़ या खजूर का स्वादिष्ट इनाम दिया जाता है। इस सकारात्मक प्रोत्साहन के चलते भालू बिना किसी भय के अपने दाँतों, पंजों और घावों की नियमित जाँच करवाने में डॉक्टरों का सहयोग करते हैं। यहाँ तक कि बाड़े के फर्श पर विशेष ढलान बनाकर बिना किसी तनाव के मूत्र परीक्षण के नमूने भी जुटाए जाते हैं। वर्तमान में इस केंद्र में कई ऐसे वृद्ध भालू हैं जिनकी आयु 16 वर्ष से अधिक हो चुकी है। जंगलों में भालुओं की औसत आयु 15 से 20 वर्ष होती है, लेकिन यहाँ नियमित देखभाल और सुपाच्य दलिया-शहद के पौष्टिक आहार के कारण 'जलेबी' जैसे उम्रदराज़ भालू 25 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं।
एक ज़िम्मेदार नागरिक और प्रकृति प्रेमी के रूप में हम इस संरक्षण यात्रा का हिस्सा कैसे बन सकते हैं?
सूर सरोवर पक्षी अभयारण्य केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित एक महत्वपूर्ण रामसर आद्रभूमि (वेटलैंड) है। संत सूरदास की ऐतिहासिक स्मृति से जुड़े रुनकता के इस वन क्षेत्र में अक्टूबर से मार्च के दौरान पक्षियों की अद्भुत छटा देखने को मिलती है। यदि आप आगरा भालू संरक्षण केंद्र का दौरा करना चाहते हैं, तो यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वन विभाग के प्रवेश शुल्क के साथ-साथ इस पुनर्वास केंद्र के भ्रमण के लिए वाइल्डलाइफ़ एसओएस की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से पूर्व-बुकिंग अनिवार्य है। यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि इन संवेदनशील भालुओं की शांति में कोई व्यवधान न पड़े। यह केंद्र हमें याद दिलाता है कि सच्चा वन्यजीव संरक्षण जानवरों को महज़ सुरक्षित बाड़ों में रखना नहीं, बल्कि उनके प्राकृतिक व्यवहार और गरिमा की पुनर्स्थापना करना है। अगली बार जब आप दिल्ली-आगरा राजमार्ग से गुज़रें, तो कीठम के इन जंगलों में चल रहे मूक बदलाव का सम्मान करें, स्थानीय वनों की रक्षा का संकल्प लें और अवैध वन्यजीव व्यापार के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद करें।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/24f4l6tp
2. https://tinyurl.com/257k22of
3. https://tinyurl.com/26yauj27
4. https://tinyurl.com/2xszm7ez
5. https://tinyurl.com/27hyuqwq
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