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राजस्थान के मानचित्र पर जब हम चूरू जिले की ओर देखते हैं, तो एक आम धारणा यह बनती है कि यह एक ऐसा शुष्क क्षेत्र है जहाँ दूर-दूर तक कोई नदी नहीं बहती। सामान्य ज्ञान की किताबों में भी अक्सर पढ़ने को मिलता है कि "चूरू और बीकानेर ऐसे जिले हैं जहाँ कोई भी बारहमासी नदी नहीं है।" लेकिन क्या यह पूर्ण सत्य है? भूवैज्ञानिक शोध और जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। आज हम चूरू की उस 'प्यास' और 'पानी' की कहानी को खंगालेंगे जो सतह के ऊपर कम, पर जमीन के भीतर ज्यादा बहती है।
चूरू जिले की भौगोलिक स्थिति थार मरुस्थल के पूर्वी किनारे पर है। ऊपर से देखने पर यहाँ केवल रेत के टीले और शुष्क मैदान दिखाई देते हैं। लेकिन, केंद्रीय भूमि जल बोर्ड (CGWB) और विभिन्न भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणों की रिपोर्ट यह बताती है कि यह 'नदी-विहीन' जिला वास्तव में दबी हुई और मौसमी नदियों के एक 'फॉसिल नेटवर्क' (Fossil Network - जीवाश्म नेटवर्क) पर टिका हुआ है। जिसे हम आज महज एक सूखा रेगिस्तान मानते हैं, उसके नीचे प्राचीन काल में बहने वाली नदियों के रास्ते (Palaeo-channels) दबे हुए हैं।
जिले की हाइड्रो-जियोलॉजी (Hydro-geology - जल-भूविज्ञान) का अध्ययन करने पर पता चलता है कि यहाँ की जमीन के नीचे की संरचना उन रास्तों से बनी है जहाँ कभी पानी का तेज बहाव हुआ करता था। ये पुराने प्रवाह मार्ग आज भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि जिले का भूजल इन्ही रास्तों के आसपास संचित होता है। यानी, भले ही आज सतह पर नदी न दिखे, लेकिन पाताल में उन प्राचीन धाराओं के निशान आज भी मौजूद हैं जो यहाँ की जल-व्यवस्था का आधार हैं।
इतिहास के पन्नों और रिमोट सेंसिंग (Remote sensing - उपग्रह से प्राप्त तस्वीरें) के जरिए जब हम झुंझुनूं, सीकर और चूरू के इलाके को देखते हैं, तो एक दिलचस्प तस्वीर उभरती है। यह क्षेत्र प्राचीन सरस्वती और उसकी सहायक नदियों के प्रवाह तंत्र का हिस्सा माना जाता रहा है। शोध बताते हैं कि प्राचीन समय में वैदिक सरस्वती नदी या उसकी सहायक धाराएं, जिन्हें आज हम घग्घर-हकरा सिस्टम के नाम से जानते हैं, इस क्षेत्र को प्रभावित करती थीं। रिमोट सेंसिंग डेटा के माध्यम से वैज्ञानिकों ने जमीन के नीचे दबे उन रास्तों को पहचाना है जो झुंझुनूं और सीकर से होते हुए चूरू की सीमा तक आते हैं। ये महज वैज्ञानिक लकीरें नहीं हैं, बल्कि ये वो रास्ते हैं जहाँ हजारों साल पहले जीवन पनपता था। आज भी इन 'पैलियो-चैनलों' (लुप्त रास्तों) में अन्य जगहों की तुलना में मीठा पानी मिलने की संभावना अधिक होती है, जो इस रेगिस्तानी जिले के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।
राजस्थान की नदियाँ 'अंतर्देशीय प्रवाह' (Inland Drainage) का सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं। इसका अर्थ है कि ये नदियाँ समुद्र तक नहीं पहुंच पातीं, बल्कि रेगिस्तान की रेत में ही समा जाती हैं। चूरू के संदर्भ में दो प्रमुख नदियों - घग्घर और कांतली - का जिक्र करना बेहद जरूरी है। कांतली नदी, जो सीकर की खंडेला पहाड़ियों से निकलती है, उत्तर की ओर बहती हुई झुंझुनूं को दो भागों में बांटती है और अंत में चूरू जिले की सीमा के पास राजगढ़ (सादुलपुर) के रेतीले धोरों में विलीन हो जाती है। भले ही आज कांतली एक मौसमी नदी है और इसमें पानी तभी आता है जब बारिश बहुत अच्छी हो, लेकिन ऐतिहासिक रूप से इसका बहाव क्षेत्र चूरू के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecology) को प्रभावित करता रहा है। इसी तरह, उत्तर दिशा में घग्घर नदी (जिसे प्राचीन सरस्वती का अवशेष माना जाता है) का प्रवाह भी चूरू के उत्तरी छोर के भूजल स्तर और मिट्टी की प्रकृति को प्रभावित करता है। ये नदियाँ भले ही आज चूरू के बीचों-बीच न बहती हों, लेकिन इनके द्वारा छोड़ी गई जलोढ़ मिट्टी और इनके पुराने रास्ते आज भी यह तय करते हैं कि जिले में बस्तियां कहाँ बसेंगी।

क्या आपने कभी सोचा है कि चूरू के पुराने गांव और कस्बे उन्ही जगहों पर क्यों बसे हैं जहाँ वे आज हैं?
इसका जवाब इन्ही लुप्त नदियों में छिपा है। अध्ययन बताते हैं कि रेगिस्तान में बस्तियों का निर्माण, पशुओं के चरने के रास्ते और कुओं की कतारें अक्सर उन्हीं इलाकों में पाई जाती हैं जहाँ जमीन के नीचे ये प्राचीन नदियाँ कभी बहती थीं। क्योंकि इन पुराने रास्तों के नीचे भूजल का स्तर अपेक्षाकृत बेहतर होता है और पानी मीठा होता है, इसलिए सदियों से लोग अनजाने में ही सही, लेकिन इन्हीं 'नेचुरल वाटर कॉरिडोर' (Natural Water Corridor) के ऊपर बसते आए हैं। चूरू में कुओं की खुदाई के दौरान अक्सर अलग-अलग गहराई पर मिलने वाला पानी और मिट्टी की परतें इस बात की गवाह हैं कि यहाँ कभी विशाल जलधाराएं अपना रास्ता बदल-बदल कर बहती थीं और अंततः रेत के टीलों में गुम हो जाती थीं।
20वीं सदी के उत्तरार्ध में चूरू की जल-गाथा में एक नया और क्रांतिकारी अध्याय जुड़ा। यह अध्याय था - इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP)। सदियों से प्यासी इस धरती के लिए यह परियोजना किसी चमत्कार से कम नहीं थी। जब इस परियोजना का दूसरा चरण (Stage II) शुरू हुआ, तो इसका उद्देश्य केवल नहरी पानी को पश्चिमी राजस्थान तक पहुँचाना ही नहीं, बल्कि चूरू जैसे ऊंचे और टीले वाले इलाकों को भी पानी देना था। चूंकि चूरू की भौगोलिक स्थिति मुख्य नहर के स्तर से काफी ऊंचाई पर है, इसलिए यहाँ पानी पहुँचाना एक बड़ी चुनौती थी। इसका समाधान 'लिफ्ट नहरों' के माध्यम से निकाला गया। चौधरी कुंभाराम लिफ्ट नहर और अन्य वितरिकाओं के माध्यम से हिमालय का पानी चूरू के खेतों और घरों तक पहुँचाया गया। इस पानी के आगमन ने चूरू के परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। जहाँ पहले केवल बाजरा और मोठ जैसी वर्षा आधारित फसलें होती थीं, वहाँ नहर कमांड क्षेत्र (Canal Command Area) में अब गेहूं, सरसों और चने जैसी रबी की फसलें लहलहाने लगीं। इतना ही नहीं, नहर के किनारे-किनारे लगाए गए वृक्षों की कतारों (Shelterbelts) ने आंधियों को रोकने और हरियाली बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।
इंदिरा गांधी नहर के पानी ने चूरू के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को मजबूत किया है। सरकारी आंकड़े और केस स्टडीज बताती हैं कि नहर आने के बाद से इस क्षेत्र से होने वाले पलायन में कमी आई है। पहले जहाँ अकाल पड़ने पर लोग अपने पशुओं के साथ मालवा या अन्य राज्यों की ओर निकल जाते थे, अब नहर के पानी ने उन्हें अपने गांव में ही रोजगार और भोजन की सुरक्षा (Food Security) प्रदान की है। सिंचाई की सुविधाओं ने बंजर जमीन को उपजाऊ खेतों में बदल दिया है। हालांकि, यह विकास अपने साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी लाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि रेगिस्तान का नाजुक हाइड्रोस्केप (Hydroscape - जल-परिदृश्य) अधिक पानी के लिए तैयार नहीं था। पिछले कुछ दशकों में, नहरी क्षेत्रों में अत्यधिक सिंचाई और जल रिसाव के कारण 'सेम' (Waterlogging) की समस्या उभर कर आई है।
चूरू के कुछ हिस्सों में जमीन के नीचे जिप्सम (Gypsum) या कठोर चट्टानों की परत होने के कारण पानी नीचे नहीं जा पाता और सतह पर जमा हो जाता है। इससे मिट्टी में लवणीयता (Soil Salinity) बढ़ रही है, जिससे उपजाऊ जमीन धीरे-धीरे बंजर हो रही है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की रिपोर्ट्स के अनुसार, जिले के कुछ ब्लॉक्स में भूजल स्तर में अस्वाभाविक बढ़ोतरी और पानी की गुणवत्ता में गिरावट देखी गई है। यह एक बड़ी विडंबना है कि जिस पानी ने जीवन दिया, वही अब सही प्रबंधन न होने पर जमीन की सेहत बिगाड़ रहा है।
कुल मिलाकर आज चूरू एक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ उसका गौरवशाली भूवैज्ञानिक इतिहास है जो हमें पानी के प्राकृतिक रास्तों का सम्मान करना सिखाता है, और दूसरी तरफ आधुनिक इंजीनियरिंग का करिश्मा है जिसने प्यासी धरती की प्यास बुझाई है। लुप्त नदियों के खोजे गए रास्ते और इंदिरा गांधी नहर का वर्तमान ढांचा, दोनों ही हमें यह समझाते हैं कि पानी का मोल क्या है। आवश्यकता इस बात की है कि हम नहरी पानी का उपयोग वैज्ञानिक तरीके से करें, ताकि 'सेम' जैसी समस्याओं से बचा जा सके और साथ ही उन प्राचीन जल-स्रोतों का संरक्षण करें जो सदियों से इस मरुधरा को जीवित रखे हुए हैं। चूरू की यह जल-गाथा संघर्ष की नहीं, बल्कि समन्वय की कहानी है - रेत और पानी के बीच, परंपरा और आधुनिकता के बीच।
संदर्भ
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