समय - सीमा 0
मानव और उनकी इंद्रियाँ 6
मानव और उनके आविष्कार 0
भूगोल 8
जीव-जंतु 0
धार वासियों हम आज आपको बता रहे हैं कि, जलीय पारिस्थितिकी तंत्र, वे जलवैज्ञानिक वातावरण (hydrological environments) हैं, जहाँ पौधे, जानवर और सूक्ष्मजीव अजैविक कारकों (abiotic factors) जैसे लवणता (salinity), पीएच (pH), घुलित ऑक्सीजन (oxygen), तापमान, प्रकाश और पोषक तत्वों के साथ परस्पर क्रिया करते हैं। इनमें मीठे पानी के तंत्र (freshwater systems) और समुद्री तंत्र (marine systems) शामिल हैं। प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र अपने भौतिक-रासायनिक परिस्थितियों से आकार लेता है, और उन वातावरणों के अनुकूल जैविक समुदायों का समर्थन करता है।ये पारिस्थितिकी तंत्र महत्वपूर्ण कार्य करते हैं, जिनमें पोषक तत्वों का चक्रण, जल शोधन, कार्बन प्रच्छादन (carbon sequestration) और विविध प्रजातियों के लिए आवास प्रदान करना शामिल है। जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के उदाहरणों में, मीठे पानी के तंत्र में झीलें और नदियाँ, तथा समुद्री तंत्र में मूंगा चट्टानें (coral reefs), समुद्री घास के तल (seagrass beds), और महासागर शामिल हैं।
स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्रों की तरह, जलीय पारिस्थितिकी तंत्र भी संतुलन बनाए रखने के लिए जैविक (जीवित) और अजैविक (निर्जीव) घटकों की घनिष्ठ अंतर्निर्भरता पर निर्भर करते हैं। जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के प्रकारों को मोटे तौर पर लवणता और स्थान के आधार पर मीठे पानी, समुद्री, और खारे पानी (brackish water) के पारिस्थितिकी तंत्र में वर्गीकृत किया जाता है।
मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र
मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र कम नमक सामग्री वाले जल-आधारित तंत्र हैं, जिनमें झीलें, तालाब, नदियाँ, धाराएँ, आर्द्रभूमि, नदी तटीय क्षेत्र, जलीय गुफाएँ और भूजल तंत्र शामिल हैं। ये तंत्र हमें पीने योग्य पानी प्रदान करते हैं, विविध पौधों और जानवरों के जीवन को बनाए रखते हैं, बाढ़ को नियंत्रित करते हैं, मत्स्य पालन का समर्थन करते हैं, और मनोरंजन, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक सेवाएँ प्रदान करते हैं, जो मनुष्यों और प्रकृति के लिए आवश्यक हैं।
समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र
समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र वैश्विक जलवायु को विनियमित करने, समृद्ध जैव विविधता का समर्थन करने और मानव आजीविका को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन पारिस्थितिकी तंत्रों को गहराई, लवणता, आवास प्रकार और पारिस्थितिक विशेषताओं के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।
खारे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र
खारे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र वे तंत्र हैं, जहाँ मीठा पानी खारे पानी से मिलता है। यहाँ के जीव बदलती लवणता के लिए विशेष रूप से अनुकूलित होते हैं।
समुद्री संसाधन
ऐसी सामग्री और विशेषताएँ, जो महासागर में पाई जाती हैं, और जिनका कुछ मूल्य माना जाता है, समुद्री संसाधन कहलाती हैं। वह मूल्य आंतरिक (intrinsic) या मौद्रिक (monetary) हो सकता है। इनमें बड़ी संख्या में चीजें शामिल हैं, जैसे कि - जैविक विविधता, मछली और समुद्री भोजन, तेल और गैस, खनिज, रेत और बजरी, नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन, पर्यटन क्षमता, और मूंगा चट्टानें जैसे अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र।
इन संसाधनों का महान मौद्रिक मूल्य हो सकता है, और अगर भले ही वह न हो, उनकी अद्वितीयता और शिक्षा तथा मानव संवर्धन के अवसर को पैसों में मापा नहीं जा सकता है। इसलिए, हम इन संसाधनों का प्रबंधन और उपयोग कैसे करते हैं, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।
समुद्री संसाधनों का निर्माण
मछली और अन्य समुद्री जीवन लाखों और अरबों वर्षों के विकास (evolution) के माध्यम से बनते हैं। तेल और गैस तब बनते हैं, जब मृत समुद्री पौधे और जानवर समुद्र तल पर रह जाते हैं, और कई वर्षों तक तलछट (sediments) से ढक जाते हैं। जब वे पर्याप्त गहराई तक दब जाते हैं, तो गर्मी और दबाव इतना अधिक हो जाता है कि, वे संपीड़ित हो जाते हैं और तेल तथा कोयला बनाते हैं। उच्च गर्मी और संपीड़न के साथ, वे आगे प्राकृतिक गैस (gas) भी बना सकते हैं। एक तरफ, रेत और बजरी केवल तलछट हैं, जो तेजी से बहने वाली नदियों द्वारा टूट जाती हैं, और फिर समुद्र में बह जाती हैं। खनिज आम तौर पर तब बनते हैं, जब ज्वालामुखियों से निकला लावा जम जाता है। वास्तव में, पानी में भी खनिज होते हैं, और जब ज्वालामुखी फटते हैं, तो लावा जम कर चट्टान बनाता है। इसमें खनिज होते हैं। दूसरी ओर, मूंगा चट्टानें तब बनती हैं, जब मूंगा लार्वा पानी के नीचे की चट्टानों से जुड़ जाते हैं। ये लार्वा बढ़कर चट्टान का निर्माण करते हैं। ऐसी चट्टानें, आमतौर पर तीन मुख्य संरचनाओं में से एक में बनती हैं: बैरियर रीफ (Barrier reefs), एटोल रीफ (atoll reefs), या फ्रिंजिंग रीफ (fringing reefs)।हम जानते ही हैं कि, हमारे भारत देश को भी बड़ी समुद्री तटरेखा प्राप्त हुई है। इस समुद्र के कारण, हमारे देश की सुंदरता एवं अर्थव्यवस्था में वाकई में बढ़ोतरी हुई है।
भारत में मत्स्य उत्पादन
क्या आप जानते हैं कि, 2025 में भारत का मत्स्य उत्पादन 19.5 मिलियन मीट्रिक टन (million metric tons) तक पहुँच गया, जिससे यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश बन गया। आंध्र प्रदेश इसमें 25% से अधिक हिस्सेदारी के साथ सबसे आगे है, उसके बाद पश्चिम बंगाल और कर्नाटक का स्थान हैं। जलीय कृषि के प्रभुत्व, अंतर्देशीय मत्स्य पालन के विकास और बढ़ते निर्यात के साथ, यह क्षेत्र पोषण, रोजगार और आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।भारत महत्वाकांक्षी जलीय कृषि कार्यक्रमों, प्रचुर जल आपूर्ति और सरकार की मत्स्य-समर्थक नीतियों के नेतृत्व में एक विश्व मत्स्य दिग्गज के रूप में उभरा है। अब मत्स्य उद्योग न केवल लाखों लोगों को पोषण प्रदान करता है, बल्कि निर्यात आय में भी योगदान देता है, और आवश्यक आजीविका और रोजगार के अवसर प्रदान करता है।2024–25 में कुल भारतीय मछली उत्पादन 19.5 मिलियन मीट्रिक टन के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया था। इस प्रकार हमारा देश चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक राष्ट्र बन गया। इस प्रकार भारत में शीर्ष 5 मछली उत्पादक राज्य (2025) निम्नलिखित हैं -
1.आंध्र प्रदेश
2.पश्चिम बंगाल
3.कर्नाटक
4.ओडिशा
5.गुजरात
परंतु, भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था के सामने कुछ चुनौतियाँ भी हैं। वे इस प्रकार हैं:
बुनियादी ढांचे की कमी:
संपर्क और दक्षता में सुधार के लिए, भारत को अपने तटीय क्षेत्रों में बंदरगाहों, हवाई अड्डों, सड़कों, रेलवे और अन्य बुनियादी ढांचे में अधिक निवेश करने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (Economic Advisory Council to the Prime Minister (EAC-PM)) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की बंदरगाह क्षमता केवल 1.5 बिलियन टन प्रति वर्ष है, जबकि 2025 तक इसका बंदरगाह यातायात 2.5 बिलियन टन तक पहुँचने की उम्मीद है।
समुद्री प्रदूषण:
भारत के तटीय जल विभिन्न स्रोतों, जैसे औद्योगिक अपशिष्ट, वाहित मल, कृषि अपवाह, प्लास्टिक (plastic) कचरा और तेल रिसाव से प्रदूषित हैं। समुद्री प्रदूषण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता के स्वास्थ्य के साथ-साथ मछली तथा समुद्री भोजन उत्पादों की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (United Nations Environment Programme (UNEP)) के अनुसार, प्रति दिन 60 प्रमुख भारतीय शहरों से उत्पन्न होने वाला 15,000 मीट्रिक टन से अधिक कचरा (जिसमें से अधिकांश प्लास्टिक है) दक्षिण एशियाई समुद्रों में फेंका जाता है।
संसाधनों का अत्यधिक दोहन:
भारत के समुद्री संसाधन अत्यधिक मछली पकड़ने, अवैध मछली पकड़ने, और अनियमित जलीय कृषि के दबाव में हैं। अत्यधिक मछली पकड़ने से मछली स्टॉक की कमी, मछुआरों के लिए आय और आजीविका का नुकसान, और लाखों लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा में कमी आ सकती है। अवैध मछली पकड़ना भारत के समुद्री क्षेत्र की संप्रभुता और सुरक्षा को भी कमजोर कर सकता है।
जलवायु परिवर्तन:
जलवायु परिवर्तन भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर खतरा है, क्योंकि यह समुद्र के स्तर में वृद्धि, तटीय कटाव, तूफान वृद्धि, बाढ़, लवणता वृद्धि (salinity increase), मूंगा विरंजन (coral bleaching), महासागर अम्लीकरण (Ocean acidification), और समुद्री धाराओं व तापमान में बदलाव का कारण बन सकता है। जलवायु परिवर्तन समुद्री प्रजातियों के वितरण और प्रचुरता के साथ-साथ, उनके प्रवास पैटर्न और प्रजनन चक्रों को भी प्रभावित कर सकता है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC)) की एक रिपोर्ट के अनुसार, बीसवीं शताब्दी के दौरान वैश्विक औसत समुद्र स्तर लगभग 15 सेंटीमीटर (centimetre) बढ़ा है और 2100 तक इसका 26 से 82 सेंटीमीटर अधिक बढ़ने का अनुमान है।
हालांकि, इन समस्याओं पर कुछ उचित उपायों के साथ मात की जा सकती है। चलिए जानते हैं। भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए, निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
एक राष्ट्रीय लेखांकन ढांचा (National Accounting Framework) विकसित करना:
यह जीडीपी (GDP), रोजगार, व्यापार और अन्य संकेतकों में समुद्री अर्थव्यवस्था के योगदान को मापेगा। इससे समुद्री अर्थव्यवस्था के मूल्य और प्रभाव का आकलन करने, तथा उचित नीतियों और हस्तक्षेपों को डिजाइन (design) करने में मदद मिलेगी।
तटीय और समुद्री स्थानिक योजना (Coastal and Marine Spatial Planning) लागू करना:
यह विभिन्न गतिविधियों और क्षेत्रों के लिए स्थान और संसाधनों को समन्वित तरीके से आवंटित करता है। इससे संघर्षों से बचने, संसाधनों के उपयोग को अनुकूलित करने और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
महासागर शासन के लिए कानूनी और संस्थागत ढाँचे को मजबूत करना:
यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और विनियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करेगा। इससे भारत की संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा करने, अवैध गतिविधियों को रोकने और विवादों को सुलझाने में मदद मिलेगी।
समुद्री अनुसंधान और नवाचार के लिए क्षमता और प्रौद्योगिकी को बढ़ाना:
यह उपाय साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने का समर्थन करेगा, और विकास के लिए नए अवसरों को बढ़ावा देगा। इससे अपतटीय ऊर्जा (offshore energy), गहरे समुद्र में खनन (deep-sea mining), जैव प्रौद्योगिकी, और जलीय कृषि जैसे उभरते क्षेत्रों की क्षमता का पता लगाने में भी मदद मिलेगी।
सहयोग और भागीदारी को बढ़ावा देना:
हिंद महासागर क्षेत्र में समान हितों और चुनौतियों को साझा करने वाले अन्य देशों और क्षेत्रीय संगठनों के साथ सहयोग को बढ़ावा देना, एक अन्य उपाय है। इससे आपसी विश्वास बढ़ाने, सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने, तालमेल का लाभ उठाने और सामान्य खतरों से निपटने में मदद मिलेगी।
ब्लू बॉन्ड (Blue Bonds):
ब्लू बॉन्ड, भारत में टिकाऊ महासागर परियोजनाओं, जैसे कि - स्वच्छ ऊर्जा पहल (clean energy initiative), अपतटीय पवन फार्म (Offshore wind farms), समुद्री संरक्षण प्रयास (marine conservation efforts), और प्रदूषण की रोकथाम व सफाई के लिए धन प्रदान कर सकते हैं। ये परियोजनाएँ रोजगार सृजित कर सकती हैं, अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे सकती हैं और पर्यावरण संरक्षण में योगदान कर सकती हैं।
संदर्भ -
https://tinyurl.com/yjtpduy3
https://tinyurl.com/smpke7m2
https://tinyurl.com/4nf44unt
https://tinyurl.com/3wsx2x2x