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क्या आपने कभी किसी ऐसे जीव के बारे में सुना है, जो एक ही डंस में इंसान की जान ले सकता है, लेकिन उसी के ज़हर से ज़िंदगी भी बचाई जा सकती है? यह किसी रहस्यमय कथा का हिस्सा नहीं, बल्कि भारत की सच्चाई है - रसेल वाइपर (Russell's Viper), जिसे देश के सबसे भयावह और घातक ज़हरीले साँपों में गिना जाता है। इसकी फुफकार इतनी तीखी होती है कि दूर से ही लोगों को खतरे का एहसास हो जाता है। यह वही साँप है, जो हर साल हज़ारों लोगों की जान ले लेता है, फिर भी प्रकृति में इसका अपना एक अहम संतुलनकारी किरदार है। रसेल वाइपर का नाम स्कॉटिश (Scottish) वैज्ञानिक पैट्रिक रसेल (Patrick Russell) के नाम पर रखा गया था, जिन्होंने भारत में साँपों की कई प्रजातियों का अध्ययन किया। यह साँप “बिग फोर” (Big 4) - यानी भारत के चार सबसे ज़हरीले साँपों (इंडियन कोबरा, कॉमन क्रेट [Common Krait], सॉ-स्केल्ड वाइपर [Saw-Scaled Viper] और रसेल वाइपर) - में शामिल है। इसकी लंबाई लगभग डेढ़ मीटर तक होती है और इसके नुकीले दाँत आधे इंच से भी ज़्यादा बढ़ सकते हैं। यह न सिर्फ़ जंगलों में बल्कि हमारे खेतों और बाग़ों के पास भी दिखाई दे सकता है, जिससे यह इंसानों और प्रकृति के बीच की उस पतली सीमा को छूता है, जहाँ डर और जीवन दोनों साथ रहते हैं।
आज हम इस लेख में रसेल वाइपर के रहस्यमय संसार को करीब से समझने की कोशिश करेंगे। सबसे पहले, हम जानेंगे कि रसेल वाइपर कौन है और क्यों इसे भारत का सबसे भयावह और घातक ज़हरीला साँप कहा जाता है। इसके बाद, हम देखेंगे कि आकार, रंग और व्यवहार से इस साँप की पहचान कैसे की जा सकती है। फिर हम विस्तार से समझेंगे कि इसके डंस का इंसानी शरीर पर क्या असर पड़ता है और इसका ज़हर कितना घातक होता है। आगे, हम यह भी जानेंगे कि भारत और दक्षिण एशिया के किन-किन इलाकों में यह साँप पाया जाता है, और अंत में, हम समझेंगे कि कैसे यही ज़हर आधुनिक चिकित्सा में जीवन बचाने वाली दवाओं के निर्माण में काम आता है।
रसेल वाइपर: भारत का सबसे भयावह और घातक ज़हरीला साँप
रसेल वाइपर दक्षिण एशिया का एक अत्यंत घातक और भयावह साँप है, जो अपने शक्तिशाली ज़हर और आक्रामक स्वभाव के कारण “बिग फोर” साँपों की श्रेणी में शामिल है - यानी भारत के चार सबसे ख़तरनाक साँप: इंडियन कोबरा, कॉमन क्रेट, सॉ-स्केल्ड वाइपर और रसेल वाइपर। इसका वैज्ञानिक नाम डाबोइया रसेली (Daboia russelii) है, और इसका नाम स्कॉटिश सरीसृप वैज्ञानिक पैट्रिक रसेल के सम्मान में रखा गया। यह साँप आम तौर पर 1.2 से 1.5 मीटर तक लंबा होता है, लेकिन कुछ वयस्क रसेल वाइपर 1.8 मीटर तक भी बढ़ सकते हैं। इसकी दाँतों की लंबाई आधे इंच से भी अधिक होती है, जिससे यह अपने शिकार के शरीर में गहराई तक ज़हर पहुँचा सकता है। इस साँप का शरीर मजबूत, ठोस और भारी होता है, जो इसे एक बेहद खतरनाक शिकारी बनाता है। रसेल वाइपर अपनी आक्रामकता, तीव्र फुफकार और तेज़ प्रतिक्रिया के कारण ग्रामीण इलाकों में लोगों के बीच भय का पर्याय बन चुका है।

पहचान के संकेत: आकार, रंग और व्यवहार से कैसे पहचानें रसेल वाइपर?
रसेल वाइपर की पहचान उसके विशिष्ट रंग और पैटर्न से आसानी से की जा सकती है। इसका शरीर आमतौर पर भूरा, लाल-भूरा या पीलेपन लिए होता है, जिस पर तीन लहरदार कतारों में बड़े-बड़े गोल या अंडाकार काले धब्बे बने होते हैं, जिनके चारों ओर सफेद घेरे दिखाई देते हैं। इसका सिर चौड़ा, चपटा और त्रिकोणीय होता है - जो इसे अन्य साँपों से अलग पहचान देता है। इसकी आँखें बड़ी और सुनहरी होती हैं जिनमें ऊर्ध्वाधर पुतलियाँ (vertical pupils) होती हैं, जो बिल्लियों जैसी दिखती हैं। यह साँप अधिकतर रात में सक्रिय रहता है, लेकिन ठंडे या बादलों वाले दिनों में दिन में भी बाहर निकल आता है। ख़तरा महसूस होते ही यह अपने शरीर को “S” आकार में मोड़कर तेज़ फुफकारता है और झटके में हमला करता है। इसके फुफकारने की आवाज़ कई फीट दूर तक सुनी जा सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों, घास वाले मैदानों और चूहों से भरे स्थानों पर इसे देखना आम है।
डंस का डरावना असर: इंसानी शरीर पर ज़हर के घातक प्रभाव
रसेल वाइपर का ज़हर हीमोटॉक्सिक (hemotoxic) होता है, यानी यह सीधे रक्त और ऊतकों पर असर डालता है। डंस लगने के कुछ ही मिनटों में पीड़ित व्यक्ति को जलन, सूजन, तीव्र दर्द और बेहोशी जैसे लक्षण महसूस होने लगते हैं। इसके ज़हर में पाए जाने वाले प्रोटीन रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया को बाधित करते हैं, जिससे आंतरिक रक्तस्राव, पेशाब में खून और किडनी फेलियर जैसी गंभीर स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। कई बार पीड़ित व्यक्ति में ज़हर के कारण रक्तदाब (blood pressure) गिरने लगता है, जिससे हृदय और मस्तिष्क को पर्याप्त रक्त नहीं मिल पाता। भारत में हर साल हज़ारों लोग इसके डंस का शिकार बनते हैं - विशेष रूप से वे किसान जो खेतों में नंगे पैर काम करते हैं। यह सांप ज़्यादातर रात में शिकार करता है, इसलिए अंधेरे में गलती से इसके ऊपर पैर पड़ जाने से डंस की घटनाएँ आम हैं।

कहाँ पाया जाता है रसेल वाइपर? इसके प्राकृतिक आवास और विस्तार की कहानी
रसेल वाइपर का वितरण क्षेत्र बहुत व्यापक है। यह भारत, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, पाकिस्तान और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में पाया जाता है। भारत में यह विशेष रूप से पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और ओडिशा के मैदानी इलाकों में अधिक देखा जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि यह साँप घने जंगलों से बचता है और खुले, शुष्क या कृषि प्रधान क्षेत्रों को पसंद करता है। इसे अक्सर खेतों, चूहों के बिलों, घास के ढेरों और गाँवों के आसपास देखा जा सकता है। रसेल वाइपर समुद्र तल से लेकर 3,000 मीटर की ऊँचाई तक के इलाकों में जीवित रह सकता है। यह अक्सर बारिश के बाद सक्रिय होता है और अपने आवास में छोटी स्तनधारियों, मेंढकों और छिपकलियों का शिकार करता है।
प्रकृति का प्रहरी: पारिस्थितिकी तंत्र में रसेल वाइपर की महत्वपूर्ण भूमिका
भले ही इंसानों के लिए यह साँप डर का प्रतीक हो, लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र में रसेल वाइपर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यह मुख्य रूप से छोटे कृन्तकों (जैसे चूहे, छछूँदर और गिलहरियाँ) को खाता है - ये वही जीव हैं जो फसलों को भारी नुकसान पहुँचाते हैं और कई बीमारियों (जैसे लेप्टोस्पायरोसिस [Leptospirosis], प्लेग [Plague]) के वाहक भी हैं। इस प्रकार रसेल वाइपर अप्रत्यक्ष रूप से किसानों का मित्र है क्योंकि यह चूहों की आबादी नियंत्रित करके खेतों की रक्षा करता है। इसका अस्तित्व जैव विविधता (biodiversity) और पारिस्थितिक संतुलन के लिए अनिवार्य है। यदि इन साँपों की संख्या कम हो जाए, तो खेतों में चूहों की संख्या तेज़ी से बढ़ेगी, जिससे फसल उत्पादन पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। इसलिए रसेल वाइपर का संरक्षण न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि कृषि अर्थव्यवस्था के लिए भी आवश्यक है।
ज़हर से जीवन तक: आधुनिक चिकित्सा में रसेल वाइपर के विष का उपयोग
रसेल वाइपर का विष केवल विनाश का नहीं, बल्कि उपचार का स्रोत भी बन चुका है। वैज्ञानिकों ने इसके ज़हर में 60 से अधिक बायो-एक्टिव प्रोटीन (Bio-Active Protein) और एंज़ाइम (Enzymes) खोजे हैं, जो रक्त जमने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन्हीं तत्वों के आधार पर एंटी-कोएगुलेंट (anti-coagulant) और एंटी-थ्रोम्बोटिक (anti-thrombotic) दवाओं का विकास किया जा रहा है। भारत में एंटी-वेनम (Anti-Venom - साँप के डंस की दवा) का प्रमुख स्रोत भी रसेल वाइपर का विष है। इससे तैयार दवाएँ न केवल रसेल वाइपर बल्कि अन्य ज़हरीले साँपों के डंस के इलाज में भी काम आती हैं। हाल के वर्षों में बायोटेक्नोलॉजी (Biotechnology) और फार्मास्यूटिकल (Pharmaceutical) अनुसंधान में रसेल वाइपर का महत्व और बढ़ गया है। वैज्ञानिक इसके ज़हर से कैंसर कोशिकाओं के विकास को रोकने वाले यौगिकों की भी पहचान कर रहे हैं। इस तरह रसेल वाइपर “मृत्यु का दूत” नहीं, बल्कि “जीवनदाता” के रूप में भी उभर रहा है।
संदर्भ-
https://tinyurl.com/2cbvh4bu
https://tinyurl.com/22g8b8lz
https://tinyurl.com/2d4lewww
https://tinyurl.com/2at8vcus
https://tinyurl.com/yg3hxb58
https://tinyurl.com/538p2ky4
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