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लखनऊवासियो, आपने इतिहास, तहज़ीब और नैसर्गिक विविधता से भरे अपने इस शहर में अनेक जीव-जंतुओं के बारे में सुना और देखा होगा। इन्हीं में से एक नाम है भारतीय कोबरा, जिसे आम भाषा में बस "कोबरा" कहा जाता है। चाहे पुराने मोहल्लों की गलियाँ हों, गोमती नदी के किनारे के क्षेत्र हों, या फिर शहर से लगे ग्रामीण इलाक़े - बरसात के मौसम में या खेतों के आसपास इस साँप की उपस्थिति और इसके बारे में सुनाई जाने वाली कहानियाँ हमारे लोक-जीवन और परंपराओं में गहरी जगह बनाए हुए हैं। लखनऊ की गलियों, चौपालों और दादी-नानी की कहानियों में कोबरा अक्सर रहस्य, शक्ति और सतर्कता का प्रतीक बनकर आता है। लेकिन यह जानना ज़रूरी है कि भारतीय कोबरा की पहचान केवल एक विषैले साँप होने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे वैज्ञानिक महत्व, विशिष्ट व्यवहार, और भारत की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं में गहराई से जुड़ी पहचान है। कोबरा का “फन फैलाना” और “फुफकारना” केवल डराने के लिए नहीं, बल्कि आत्मरक्षा का एक सहज स्वभाव है। वहीं, भारतीय धर्म और परंपराओं में कोबरा को शक्ति, संतुलन और दिव्यता का प्रतीक माना जाता है, जहां भगवान शिव और शेषनाग से इसका सीधा जुड़ाव है।
इस लेख में हम भारतीय कोबरा को सरल और चरणबद्ध तरीके से समझेंगे। सबसे पहले, जानेंगे कि यह साँप कौन है और उसकी वैज्ञानिक पहचान क्या है। फिर, समझेंगे कि यह किन क्षेत्रों में रहता है और किस तरह का वातावरण पसंद करता है। इसके बाद, इसके भोजन और शिकार करने की प्रक्रिया पर नज़र डालेंगे। आगे, हम इसके व्यवहार और आत्मरक्षा के तरीकों को जानेंगे। साथ ही, सपेरों और कोबरा के संबंध की सच्चाई को भी समझेंगे। अंत में, देखेंगे कि भारतीय संस्कृति और धर्म में कोबरा इतना पूजनीय और महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है।
भारतीय कोबरा का परिचय और वैज्ञानिक पहचान
भारतीय कोबरा, जिसे वैज्ञानिक नाम नाजा नाजा (Naja naja) से जाना जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप का एक अत्यंत प्रसिद्ध और पहचानने योग्य विषैला साँप है। यह एलापिडे (Elapidae) परिवार से संबंधित है, जिसमें अधिकतर तेज़-प्रभावी न्यूरोटॉक्सिक (neurotoxic) ज़हर वाले साँप पाए जाते हैं। भारतीय कोबरा को आमतौर पर “बिग फोर” में गिना जाता है - वे चार साँप जिनके कारण भारत में अधिकांश सर्पदंश के मामले दर्ज होते हैं। इस श्रेणी में भारतीय कोबरा के साथ रसेल वाइपर (Russell's Viper), कॉमन क्रेट (Common Krait) और सॉ-स्केल्ड वाइपर (Saw-Scaled Viper) शामिल हैं। कोबरा की सबसे विशेष पहचान उसका फ़न (Hood) है, जिसे यह खतरे की स्थिति में फैलाकर अपने आकार को बड़ा दिखाता है। कई भारतीय कोबरा के फ़न पर दो छल्लों जैसे चिन्ह होते हैं, जो चश्मे की आकृति की तरह दिखते हैं - इसी से इसे अंग्रेज़ी में स्पेक्टैकल्ड कोबरा (Spectacled Cobra) कहा जाता है। धार्मिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक कहानियों में कोबरा का मान-सम्मान उसे भारत की लोक-स्मृति में और भी विशेष स्थान देता है।

भारतीय कोबरा का आवास और रहने का वातावरण
भारतीय कोबरा एक अत्यंत अनुकूलनशील साँप है, जो भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान सहित पूरे दक्षिण एशिया में पाया जाता है। यह उष्णकटिबंधीय जंगलों, घास के मैदानों, कृषि भूमि, मैंग्रोव (mangrove) क्षेत्रों, गाँवों और यहाँ तक कि शहरी बस्तियों के इर्द-गिर्द भी रह सकता है। इसकी यह अनुकूलन क्षमता इसे मनुष्यों के निकट रहने में सक्षम बनाती है। यह आमतौर पर चूहों के बिलों, दीमक के टीलों, टूटे हुए पेड़ों की खोखली जगहों, पत्थरों के ढेर या पुराने घरों और खलिहानों की दरारों में अपना बसेरा बनाता है। मनुष्य की बस्तियों में इसकी उपस्थिति का मुख्य कारण भोजन की उपलब्धता है - जहाँ लोग रहते हैं, वहाँ अनाज होता है, और जहाँ अनाज होता है, वहाँ चूहे - और चूहे भारतीय कोबरा के मुख्य भोजन का बड़ा हिस्सा हैं। इस प्रकार यह साँप मानव के प्रत्यक्ष सह-अस्तित्व में जीवित रहने वाला प्राणी बन चुका है।
कोबरा का भोजन और शिकार करने की शैली
भारतीय कोबरा पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण संतुलनकारी जीव है, क्योंकि यह चूहों और छोटे जीवों की संख्या नियंत्रित रखता है। इसका भोजन मुख्य रूप से घर और खेतों के चूहे, छछूँदर, मेंढक और टोड (toad), छिपकलियाँ, और कभी-कभी अन्य छोटे साँप होते हैं। कोबरा शिकार को पकड़ने के लिए तेज़ और सटीक प्रहार करता है। इसका विष न्यूरोटॉक्सिक होता है, जो शिकार की मांसपेशियों और तंत्रिका तंत्र को धीमा करके उसे कुछ ही मिनटों में निष्क्रिय कर देता है। यह शिकार को चबाता नहीं बल्कि पूरा निगल जाता है, क्योंकि साँपों के जबड़ों में लचीलेपन की अद्भुत क्षमता होती है, जो उनके सिर से कहीं बड़े शिकार को भी निगलने में सक्षम बनाती है। इस प्रकार कोबरा एक शांत, मगर अत्यंत प्रभावी शिकारी है।

कोबरा का व्यवहार और आत्मरक्षा तंत्र
हालाँकि भारतीय कोबरा को अक्सर खतरनाक और आक्रामक माना जाता है, वास्तविकता यह है कि यह मुख्यतः रक्षात्मक प्रकृति का होता है। यह मनुष्यों पर तब तक आक्रमण नहीं करता जब तक उसे खुद को बचाने या रास्ते से हटाए जाने का दबाव न महसूस हो। खतरे की स्थिति में यह अपने शरीर के ऊपरी हिस्से को उठाकर फ़न फैलाता है, तेज़ फुफकार निकालता है और अपनी आँखों से तीखी निगाह डालता है - यह सब सामने वाले को चेतावनी देने का तरीका है। कई बार कोबरा "सूखा काटा" भी मारता है, जिसमें वह काटता तो है, लेकिन विष नहीं छोड़ता - यह इसलिए ताकि उसका विष व्यर्थ न जाए। यह इस बात का संकेत है कि कोबरा बिना कारण हमला करने वाला जानवर नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया देने वाला सचेत प्राणी है।
सपेरों और कोबरा का संबंध:
सदियों से भारतीय पारंपरिक समाज में सपेरों और साँपों का संबंध रहा है, लेकिन इसका वैज्ञानिक पक्ष समझना महत्वपूर्ण है। बहुत लोग मानते हैं कि कोबरा बीन की आवाज़ सुनकर नाचता है, जबकि वास्तव में साँप सुन नहीं सकते - वे केवल कंपन और हरकतें महसूस करते हैं। सपेरा जब बीन को दाएँ-बाएँ हिलाता है, तो कोबरा उसी गति का अनुसरण करते हुए अपनी फन और गर्दन को हिलाता है। पहले सपेरे अक्सर कोबरा की विष ग्रंथियाँ निकाल देते थे, जिससे वह खतरनाक नहीं रहता, लेकिन यह बहुत अमानवीय, पीड़ादायक और आज पूरी तरह से अवैध है। भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार कोबरा को पकड़ना, बेचना, या तमाशे में दिखाना दंडनीय अपराध है। वर्तमान समय में अनेक वन विभाग और संरक्षण संगठन कोबरा को पकड़कर सुरक्षित स्थानों पर छोड़ने का कार्य कर रहे हैं, ताकि यह प्रजाति पारिस्थितिक संतुलन में अपना योगदान जारी रख सके।

भारतीय संस्कृति और धर्म में कोबरा का महत्व
भारतीय संस्कृति में कोबरा का स्थान केवल एक जीव के रूप में नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में है। हिंदू धर्म में यह शक्ति, संरक्षण और जागरूकता का प्रतिनिधित्व करता है। भगवान शिव के गले में विराजमानवासुकी नाग, जीव और मृत्यु के भय पर नियंत्रण का प्रतीक माने जाते हैं। वहीं, भगवान विष्णु शेषनाग के फन पर विश्राम करते हुए चित्रित होते हैं, जो ब्रह्मांडीय संतुलन का प्रतीक है। नाग पंचमी जैसे त्योहारों में नागों का पूजन किया जाता है। हालांकि लोग कोबरा को दूध अर्पित करते हैं, मगर वैज्ञानिक रूप से साँप दूध पचाने की क्षमता नहीं रखते - वे केवल पानी और अपने प्राकृतिक भोजन से पोषण पाते हैं। लेकिन यह पूजा इस बात का संकेत है कि भारतीय समाज साँप को रक्षक और देवत्व के प्रतीक के रूप में सम्मान देता है। यह सांस्कृतिक जुड़ाव कोबरा को भारतीय मानसिकता में एक विशिष्ट और उच्च स्थान प्रदान करता है।
संदर्भ-
https://tinyurl.com/2cuxc4o2
https://tinyurl.com/yxqpo2l3
https://tinyurl.com/23vhzjk8
https://tinyurl.com/22g6g5kj
https://tinyurl.com/5cpj3cnt
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