मेरठवासियों, जानिए कैसे सॉ-स्केल्ड वाइपर छोटा होते हुए भी बड़ा ख़तरा बन जाता है

सरीसृप
29-11-2025 09:18 AM
मेरठवासियों, जानिए कैसे सॉ-स्केल्ड वाइपर छोटा होते हुए भी बड़ा ख़तरा बन जाता है

मेरठ जैसे उत्तर भारत के मैदानी और अर्ध-शुष्क क्षेत्र, जहाँ खेत, घास के मैदान और झाड़ियों के झुरमुट जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, वहाँ साँपों की उपस्थिति कोई असामान्य बात नहीं है। इन प्राकृतिक परिवेशों में अक्सर कुछ प्रजातियाँ ऐसी भी होती हैं जो देखने में साधारण लगती हैं, लेकिन उनका महत्व और खतरा दोनों ही विशेष होते हैं। इन्हीं में से एक है सॉ-स्केल्ड वाइपर (Indian Saw-scaled Viper) - एक छोटा पर अत्यंत विषैला साँप, जिसने भारत के "बिग फोर" (Big Four) यानी चार सबसे घातक साँपों में अपनी जगह बनाई है। मेरठ और इसके आसपास के गाँवों में, जहाँ लोग अक्सर खेतों और झाड़ियों में काम करते हैं, वहाँ इस वाइपर की मौजूदगी चिंता का विषय बन जाती है। इसका शरीर छोटा होता है, लेकिन इसकी त्वचा पर मौजूद आरी जैसी खुरदरी शल्क जब एक-दूसरे से रगड़ती हैं, तो एक डरावनी “सी-सी” जैसी आवाज़ उत्पन्न होती है - यही इसकी पहचान का प्रमुख संकेत है। यह आवाज़ केवल चेतावनी नहीं, बल्कि प्रकृति की ओर से दिया गया एक सन्देश है कि दूरी बनाए रखी जाए। इसलिए, मेरठवासियों के लिए सॉ-स्केल्ड वाइपर को केवल “खतरा” नहीं, बल्कि “सावधानी की आवश्यकता” के रूप में देखना ज़रूरी है। इसकी पारिस्थितिक भूमिका भी महत्वपूर्ण है - यह खेतों में मौजूद कीटों और छोटे कृंतकों की संख्या नियंत्रित करता है, जिससे फसलों को नुकसान से बचाया जा सकता है। मगर इसके साथ सह-अस्तित्व के लिए ज्ञान, सतर्कता और समय पर पहचान बेहद आवश्यक है।
इस लेख में हम सॉ-स्केल्ड वाइपर की पहचान, शारीरिक बनावट, प्राकृतिक आवास, भोजन, व्यवहार, विष की घातकता, और भारत में इसके पारिस्थितिक एवं सामाजिक प्रभावों पर चर्चा करेंगे। साथ ही, यह भी समझेंगे कि इसे “बिग फोर” में क्यों शामिल किया गया है और मनुष्यों को इससे बचाव के लिए किन सावधानियों की आवश्यकता है।

सॉ-स्केल्ड वाइपर की पहचान और विशिष्ट शारीरिक संरचना
सॉ-स्केल्ड वाइपर का वैज्ञानिक नाम इचिस कैरिनेटस (Echis carinatus) है, और यह भारत के सबसे घातक साँपों में गिना जाता है। इसका नाम इसकी अनोखी त्वचा की बनावट से लिया गया है - इसके शल्क (scales) बेहद खुरदरे और दाँतेदार होते हैं। जब यह साँप खतरे में होता है या किसी का सामना करता है, तो अपने शरीर को “S” आकार में मोड़कर तेज़ी से सरकने लगता है। इस दौरान इसके शल्क एक-दूसरे से रगड़ते हैं और आरी (saw) जैसी आवाज़ निकालते हैं - यहीं से इसे “सॉ-स्केल्ड” यानी आरी-जैसे शल्कों वाला नाम मिला है। यह वाइपर आकार में अपेक्षाकृत छोटा होता है - इसकी लंबाई सामान्यतः 1 से 3 फीट तक होती है, लेकिन इसके छोटे आकार में एक जानलेवा ताक़त छिपी होती है। इसका सिर शरीर से स्पष्ट रूप से अलग और त्रिकोणीय होता है, जिससे इसकी पहचान आसान होती है। इसके रंग भूरा, पीला, लाल, ज़ैतूनी या हल्का स्लेटी हो सकते हैं, जिन पर गहरे धब्बे और सफ़ेद मेहराब जैसे पैटर्न बने रहते हैं। सिर के ऊपर सफेद क्रॉस जैसा निशान और आँख से जबड़े तक जाने वाली पतली सफेद पट्टी इसकी एक और प्रमुख विशेषता है। इसकी आँखें बड़ी और सुनहरी होती हैं, जिनकी पुतलियाँ बिल्ली की तरह लंबवत होती हैं - यह उसकी रात्रिचर जीवनशैली का प्रतीक है।

आवास और भौगोलिक वितरण: यह विषैला सरीसर्प कहाँ पाया जाता है?
सॉ-स्केल्ड वाइपर भारत के उन क्षेत्रों में पाया जाता है जहाँ शुष्कता और झाड़ियाँ प्रचुर मात्रा में होती हैं। यह राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु के शुष्क इलाकों में आमतौर पर देखा जाता है। यह ओड़िशा और पश्चिम बंगाल जैसे आर्द्र पूर्वी राज्यों में दुर्लभ है। इसका प्राकृतिक आवास झाड़ीदार मैदान, बंजर पहाड़ियाँ, और पत्थरीले क्षेत्र होते हैं। यह वाइपर मिट्टी के रंग में खुद को छिपाने में माहिर होता है, जिससे यह अपने शिकार या संभावित खतरे से अदृश्य हो जाता है। दिन के समय यह चट्टानों के नीचे, पेड़ों की जड़ों के बीच या सूखे पत्तों के ढेर में छिपा रहता है। रात ढलते ही यह सक्रिय हो जाता है और शिकार की खोज में निकलता है। यह बहुत अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में भी जीवित रह सकता है, लेकिन ठंडे महीनों में यह “हाइबरनेशन” (Hibernation) में चला जाता है - यानी शीतनिद्रा, जहाँ यह ऊर्जा बचाने के लिए लगभग निष्क्रिय हो जाता है।

आहार और व्यवहार: वाइपर का जीवन चक्र और रात्रिकालीन गतिविधियाँ
सॉ-स्केल्ड वाइपर एक अत्यंत चालाक और धैर्यशील शिकारी है। यह रात्रिचर (Nocturnal) प्राणी है, जो अंधेरे में अपने शिकार का पीछा करता है। इसका आहार मुख्यतः छोटे कृंतक (जैसे चूहे), छिपकलियाँ, मेंढक, छोटे पक्षी, और कभी-कभी कीड़े-मकोड़े व बिच्छू होते हैं। यह ज़मीन पर घात लगाकर शिकार पकड़ता है और तेज़ी से हमला करके विष इंजेक्ट (inject) करता है, जिससे शिकार तुरंत निष्क्रिय हो जाता है। इसकी चाल “साइडवाइंडिंग” (Sidewinding) कहलाती है - यह एक विशेष गति तकनीक है, जिसमें साँप अपने शरीर को तिरछे ढंग से मोड़ते हुए सरकता है। यह तरीका विशेष रूप से रेतीले इलाकों में प्रभावी है, क्योंकि इससे घर्षण कम होता है और यह तेज़ी से आगे बढ़ सकता है। जब इसे खतरा महसूस होता है, तो यह अपने शरीर को कुंडल की तरह लपेटता है, सिर को ऊँचा उठाता है, और शल्कों को रगड़कर तेज़ “सी-सी” जैसी चेतावनी ध्वनि निकालता है। इस व्यवहार का उद्देश्य लड़ाई से पहले दुश्मन को डराकर दूर भगाना होता है।

ज़हर की रासायनिक शक्ति और मानव के लिए खतरे
सॉ-स्केल्ड वाइपर का विष वैज्ञानिक दृष्टि से “हीमोटॉक्सिक” (Hemotoxic) कहलाता है - यानी यह रक्त और ऊतकों पर सीधा असर डालता है। इसके विष में ऐसे एंज़ाइम (enzymes) होते हैं जो खून को जमने से रोकते हैं और कोशिकाओं को नष्ट कर देते हैं। एक औसत सॉ-स्केल्ड वाइपर लगभग 18 मिलीग्राम सूखा विष उत्पन्न कर सकता है, और एक बार के दंश में 12 मिलीग्राम तक ज़हर इंजेक्ट कर सकता है - जो मनुष्य के लिए पर्याप्त रूप से घातक है। इसके काटने के कुछ ही मिनटों के भीतर काटे गए हिस्से में जलन, सूजन, और तीव्र दर्द महसूस होता है। कई मामलों में यह सूजन 12 से 24 घंटे के भीतर पूरे अंग में फैल जाती है। गंभीर मामलों में त्वचा पर छाले पड़ जाते हैं और आंतरिक रक्तस्राव शुरू हो जाता है। इलाज न मिलने पर यह स्थिति जानलेवा हो सकती है। अनुमानतः, बिना एंटीवेनम (anti-venom) के सॉ-स्केल्ड वाइपर के काटने से मृत्यु दर लगभग 20% तक हो सकती है। सौभाग्य से, भारत में “पॉलीवैलेंट एंटीवेनम” (Polyvalent Antivenom) उपलब्ध है जो “बिग फोर” साँपों के ज़हर को निष्क्रिय कर देता है। फिर भी, ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं की कमी इसे एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनाए हुए है।

“बिग फोर” श्रेणी में सॉ-स्केल्ड वाइपर की जगह
भारत में साँपों के काटने से होने वाली अधिकांश घटनाओं के लिए “बिग फोर” श्रेणी के चार प्रमुख विषधर जिम्मेदार हैं - इंडियन कोबरा (Naja naja), कॉमन करैत (Bungarus caeruleus), रसेल वाइपर (Daboia russelii) और सॉ-स्केल्ड वाइपर (Echis carinatus)। इन चारों में सॉ-स्केल्ड वाइपर सबसे छोटे आकार का है, पर सबसे अधिक आक्रामक माना जाता है। यह खेतों, झाड़ियों और गाँवों के आसपास अधिक पाया जाता है, जहाँ लोग नंगे पैर चलते हैं या रात में रोशनी का अभाव होता है। यही कारण है कि भारत में साँप के काटने से होने वाली मौतों में इसका योगदान अत्यधिक है। इसकी एक और ख़ासियत यह है कि यह किसी भी हलचल या कंपन को तुरंत महसूस कर लेता है और क्षण भर में हमला करता है। इस तेज़ी और अप्रत्याशितता के कारण इसे “साइलेंट किलर” (Silent Killer) भी कहा जाता है।

संरक्षण और जागरूकता: इंसान और वाइपर का सह-अस्तित्व
हालाँकि सॉ-स्केल्ड वाइपर खतरनाक है, फिर भी यह पारिस्थितिक तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह खेतों में रहने वाले चूहों और अन्य छोटे कृंतकों की संख्या नियंत्रित करता है, जिससे फसलों को बचाने में मदद मिलती है। इसे समाप्त कर देना या अंधाधुंध मार देना पारिस्थितिक असंतुलन पैदा कर सकता है। इंसान और वाइपर के बीच सह-अस्तित्व के लिए ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में जागरूकता सबसे ज़रूरी है। खेतों या झाड़ियों में चलते समय जूते पहनना, अंधेरे में टॉर्च का प्रयोग करना, और सांप दिखने पर उसे मारने की बजाय वन विभाग या सांप बचाव दल को सूचना देना उचित है। इसके अतिरिक्त, गाँवों में एंटीवेनम केंद्रों की पहुँच और प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी फैलाना भी जीवनरक्षक साबित हो सकता है। सही जानकारी और सतर्कता अपनाकर हम न केवल अपने जीवन की रक्षा कर सकते हैं, बल्कि इस प्रजाति को भी उसके प्राकृतिक पर्यावरण में सुरक्षित रख सकते हैं। आखिर, प्रकृति के हर जीव - चाहे विषधर ही क्यों न हो - का अपना संतुलन और भूमिका होती है।

संदर्भ- 
https://tinyurl.com/22xs2xwk 
https://tinyurl.com/233lb293 
https://tinyurl.com/28933xhc 
https://tinyurl.com/59r3pefm 



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