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एक ज़मीन का टुकड़ा क्या होता है? पहली नज़र में यह सिर्फ़ मिट्टी, पत्थर और घास का एक हिस्सा है। लेकिन जैसे ही हम उसे नापना शुरू करते हैं, वह एक संपत्ति बन जाता है। कागज़ के एक टुकड़े पर लिखे कुछ आँकड़े, जैसे लम्बाई और चौड़ाई, उस ज़मीन को एक पहचान दे देते हैं। यह माप या 'मेज़रमेंट' (measurement) एक बहुत ही साधारण सी प्रक्रिया लगती है, लेकिन यह इतनी शक्तिशाली है कि इसी के आधार पर इंसानी रिश्ते, समाज और यहाँ तक कि सरकारें भी चलती हैं।
यह कहानी ज़मीन को नापने की इसी अवधारणा की है। यह कहानी उन पैमानों की है जो अँगुली और हाथ से शुरू होकर 'नाली' और 'मुट्ठी' तक पहुँचे और आज भी पिथौरागढ़ में ज़िंदा हैं। और यह कहानी हमें यह भी बताती है कि जब कागज़ पर लिखे ये आँकड़े किसी की ज़िंदगी और रोजी-रोटी से जुड़ जाते हैं, तो वे सिर्फ़ आँकड़े नहीं रह जाते, बल्कि न्याय और संघर्ष का प्रतीक बन जाते हैं।
आज हमारे पास फ़ीता, मीटर (metre) और एकड़ (acre) जैसे मानक पैमाने हैं। लेकिन एक समय था जब इंसान का अपना शरीर ही सबसे बड़ा पैमाना हुआ करता था। भारत के प्राचीन माप प्रणालियों के इतिहास को देखें तो हमें 'अंगुल' (उंगली की चौड़ाई) और 'हस्त' (कोहनी से उंगली के सिरे तक की लंबाई) जैसे पैमानों का ज़िक्र मिलता है। यह एक बहुत ही व्यक्तिगत और सहज तरीका था। आपके क़दमों की गिनती से खेत का आकार तय हो जाता था और आपके हाथ की लंबाई से कपड़े की।
समय के साथ, जैसे-जैसे व्यापार और शासन व्यवस्था जटिल होती गई, इन पैमानों को मानकीकृत करने की ज़रूरत पड़ी। आज भारत में मीट्रिक प्रणाली (Metric System)(मीटर, हेक्टेयर (metre,hectare)) आधिकारिक तौर पर लागू है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों में पारंपरिक पैमाने ज़िंदा हैं और उनका जमकर इस्तेमाल होता है।
अगर आप उत्तर भारत के मैदानी इलाक़ों में ज़मीन की ख़रीद-फ़रोख़्त की बात करें, तो आपको 'बीघा', 'बिस्वा' और 'गज' जैसे शब्द सुनने को मिलेंगे। 'बीघा' एक बहुत ही प्रचलित इकाई है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अलग-अलग राज्यों में इसका आकार अलग-अलग होता है। कहीं एक बीघा छोटा होता है तो कहीं बहुत बड़ा।

इसीलिए, जब हम पहाड़ की ओर आते हैं, तो यहाँ की भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के हिसाब से एक अलग ही माप प्रणाली विकसित हुई। उत्तराखंड, ख़ासकर कुमाऊँ और पिथौरागढ़ में, ज़मीन को नापने का अपना एक अनूठा और गहरा पैमाना है, जिसे हम 'नाली' और 'मुट्ठी' के नाम से जानते हैं।
क्या है 'नाली' और 'मुट्ठी' का मतलब?
पिथौरागढ़ में आज भी अगर आप किसी से ज़मीन की बात करेंगे, तो वह आपसे स्क्वायर फ़ीट (Square feet) या मीटर (metre) में नहीं, बल्कि 'नाली' में बात करेगा। यह सिर्फ़ एक शब्द नहीं, बल्कि हमारी कृषि संस्कृति का सार है।
नाली (Nali): इस पैमाने का मूल बहुत ही ख़ूबसूरत और तार्किक है। 'नाली' असल में अनाज मापने का एक पारंपरिक बर्तन (एक तरह का पैमाना) हुआ करता था। तो एक 'नाली' ज़मीन का मतलब हुआ ज़मीन का वो टुकड़ा, जिस पर एक 'नाली' बीज बोया जा सके। यह तरीक़ा ज़मीन को सीधे-सीधे उसकी उत्पादन क्षमता से जोड़ता है। यह बताता है कि हमारे पूर्वज कितने व्यावहारिक थे। आज के आधुनिक पैमानों के हिसाब से, 1 नाली = 2160 स्क्वायर फ़ीट या 240 स्क्वायर गज के बराबर होती है।
मुट्ठी (Mutthi): यह 'नाली' से भी छोटी इकाई है। जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, इसका संबंध 'मुट्ठी' से है। माना जाता है कि एक मुट्ठी बीज बोने के लिए जितनी ज़मीन चाहिए, उसे ही 'मुट्ठी' कहा गया। 'नाली' और 'मुट्ठी' का गणित भी सीधा है: 1 नाली = 16 मुट्ठी।
ये पैमाने आज भी पिथौरागढ़ के राजस्व दस्तावेज़ों, ज़मीन की रजिस्ट्री और यहाँ तक कि ऑनलाइन प्रॉपर्टी पोर्टलों पर भी ज़िंदा हैं। यह दिखाता है कि आधुनिकता के बावजूद, हमारी सांस्कृतिक जड़ें कितनी मज़बूत हैं।

अभी तक हम माप के इतिहास और गणित की बात कर रहे थे। लेकिन ज़मीन का एक टुकड़ा, चाहे वो एक 'नाली' हो या एक 'मुट्ठी', किसी इंसान के लिए क्या मायने रखता है? इसका सबसे बड़ा और मार्मिक उदाहरण हमें पिथौरागढ़ में ही देखने को मिलता है।
यह कहानी उन गाँव वालों की है जिनकी ज़मीन नैनी-सैनी हवाई अड्डे के निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई थी। उनसे वादा किया गया था कि ज़मीन के बदले उनके परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी। गाँव वालों ने अपनी ज़मीन दे दी, जो सिर्फ़ ज़मीन नहीं थी, बल्कि उनकी पीढ़ियों की रोजी-रोटी का एकमात्र ज़रिया थी। लेकिन यह वादा कागज़ों में ही दफ़न होकर रह गया।
इसके बाद शुरू हुआ न्याय के लिए एक लंबा और थका देने वाला संघर्ष। यह लड़ाई एक-दो साल नहीं, बल्कि पूरे 19 साल तक चली। गाँव वाले अपने हक़ के लिए लड़ते रहे, और आख़िरकार देश की सर्वोच्च अदालत ने उनके पक्ष में फ़ैसला सुनाया।
यह घटना हमें सिखाती है कि ज़मीन के आँकड़े सिर्फ़ नंबर नहीं होते। उन गाँव वालों के लिए, उनकी 'नाली' में नापी गई ज़मीन उनका पूरा जीवन थी। जब वो ज़मीन उनसे छिनी, तो वे सिर्फ़ आँकड़े नहीं खो रहे थे, वे अपनी आजीविका, अपना भविष्य और अपनी पहचान खो रहे थे। उनकी 19 साल की लड़ाई इस बात का सबूत है कि कागज़ पर लिखा एक माप किसी इंसान की ज़िंदगी और मौत का सवाल बन सकता है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/242vhxyg
https://tinyurl.com/yv52zukh
https://tinyurl.com/2yl3y93y
https://tinyurl.com/2ygnyyr2
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