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जब हम पिथौरागढ़ में पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करते हैं, तो हमारे मन में अक्सर नई और आधुनिक सुविधाओं का ख़याल आता है। हाल ही में, 'ऑपरेशन सद्भावना' के तहत एक टेंट-आधारित होमस्टे (homestay) की शुरुआत की ख़बर आई, जो पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए एक सराहनीय कदम है। लेकिन जब हम बाहर से आने वालों के लिए अस्थायी टेंट लगा रहे हैं, तो क्या हम एक पल रुककर उन स्थायी और मज़बूत घरों के बारे में सोचते हैं जो सदियों से हमारी पहचान रहे हैं? वो घर, जो सिर्फ़ पत्थर और लकड़ी के ढांचे नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, कला और विज्ञान का जीता-जागता सबूत हैं।
यह कहानी है कुमाऊँ की पारंपरिक वास्तुकला की, उन घरों की जिन्हें 'बाखली' के नाम से जाना जाता है। यह कहानी उस विरासत की है जो एक तरफ़ पलायन के कारण 'भुतहा गांवों' में ख़ामोशी से दम तोड़ रही है, तो दूसरी तरफ़ कुछ लोगों की कोशिशों से एक नई सुबह की उम्मीद भी जगा रही है।
आज के सीमेंट (cement) और कंक्रीट (concrete) के दौर में, हमारे पुराने घर विज्ञान और प्रकृति के साथ तालमेल का एक बेहतरीन उदाहरण थे। इन घरों को 'बाखली' कहा जाता था, जिसका मतलब है एक ऐसा आँगन जिसके चारों तरफ़ दो या दो से ज़्यादा परिवार एक साथ रहते हों। यह डिज़ाइन (design) सिर्फ़ रहने के लिए नहीं, बल्कि एक मज़बूत सामाजिक ताने-बाने को भी दर्शाता था।
कुमाऊँ के ये पुराने घर सिर्फ़ रहने की जगह नहीं थे, बल्कि एक कला दीर्घा की तरह थे। इन घरों की सबसे आकर्षक चीज़ थी लकड़ी पर की गई नक्काशी, जिसे 'लिखाई' कहा जाता है।
दरवाज़ों की चौखट, खिड़कियों के पैनल (panel) और छज्जों पर कारीगर अपने हाथों से फूल-पत्तियों, देवी-देवताओं, मोर और अन्य ज्यामितीय आकृतियों को उकेरते थे। यह सिर्फ़ सजावट नहीं थी। यह घर के मालिक की समृद्धि, उसकी सामाजिक हैसियत और उसकी धार्मिक आस्था का प्रतीक थी। माना जाता था कि दरवाज़े पर उकेरे गए देवी-देवताओं के चित्र घर को बुरी नज़र से बचाते हैं। हर घर की लिखाई अलग होती थी, जो उसे अपनी एक ख़ास पहचान देती थी। आज जब ये घर ढह रहे हैं, तो हम सिर्फ़ एक ढाँचा नहीं, बल्कि इस अनमोल कला को भी खो रहे हैं।

इतनी ख़ूबियों के बावजूद, आज यह विरासत ख़तरे में है। इसका सबसे बड़ा कारण है पलायन। बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और रोज़गार की तलाश में पिथौरागढ़ और बागेश्वर जैसे ज़िलों के हज़ारों परिवार अपने गाँव छोड़कर शहरों की ओर चले गए हैं।
'ट्रैवल इन देवभूमि' (Travel in Devbhoomi) जैसे स्रोत इस दर्दनाक सच्चाई को सामने लाते हैं, जिससे कई आबाद बस्तियाँ आज 'भुतहा गाँव' (Ghost Villages) में तब्दील हो चुकी हैं। इन गाँवों में अब सिर्फ़ ख़ामोशी है। वो घर जो कभी हँसी-ठहाकों और बच्चों की किलकारियों से गूँजते थे, आज चुपचाप ढह रहे हैं। उनकी पताल की छतें टूट चुकी हैं, दीवारों से पत्थर निकल रहे हैं, आँगनों में जंगली घास उग आई है, और कला से सजे दरवाज़े अपनी चौखट पर आख़िरी साँसें गिन रहे हैं। यह सिर्फ़ इमारतों का क्षय नहीं है, यह हमारी संस्कृति और पहचान का क्षय है।
लेकिन इस निराशा के बीच उम्मीद की कुछ किरणें भी हैं, जो पिथौरागढ़ के लोगों को एक नई राह दिखा रही हैं।
कुमाऊँ की यह पारंपरिक वास्तुकला विज्ञान, कला और संस्कृति का एक अनूठा संगम है। यह हमें सिखाती है कि कैसे प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर एक टिकाऊ जीवन जिया जा सकता है। आज जब पूरी दुनिया 'सस्टेनेबल लिविंग' (Sustainable leveling) की बात कर रही है, तो उसका जीता-जागता मॉडल (model) हमारे अपने घरों में मौजूद है।
पिथौरागढ़ के निवासी होने के नाते यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम अपनी इस पहचान को समझें और इसे बचाने का प्रयास करें। सरमोली जैसे सामुदायिक प्रयासों का समर्थन करके, और नए घर बनवाते समय कुछ पारंपरिक तत्वों को अपनाकर, हम इस दम तोड़ती विरासत में एक नई जान फूँक सकते हैं। क्योंकि इन इमारतों को बचाना सिर्फ़ पत्थर और लकड़ी को बचाना नहीं है, यह पिथौरागढ़ की आत्मा को बचाना है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/292f5ajb
https://tinyurl.com/25jf7jt9
https://tinyurl.com/24fhr2lh
https://tinyurl.com/263xlnzx
https://tinyurl.com/2cwh9j4a
https://tinyurl.com/23l2hevf
https://tinyurl.com/2bltrgvw