पत्थरों और कला की विरासत रही बखलियाँ आज दम क्यों तोड़ रही है?

वास्तुकला I - बाहरी इमारतें
24-10-2025 09:10 AM
पत्थरों और कला की विरासत रही बखलियाँ आज दम क्यों तोड़ रही है?

जब हम पिथौरागढ़ में पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करते हैं, तो हमारे मन में अक्सर नई और आधुनिक सुविधाओं का ख़याल आता है। हाल ही में, 'ऑपरेशन सद्भावना' के तहत एक टेंट-आधारित होमस्टे (homestay) की शुरुआत की ख़बर आई, जो पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए एक सराहनीय कदम है। लेकिन जब हम बाहर से आने वालों के लिए अस्थायी टेंट लगा रहे हैं, तो क्या हम एक पल रुककर उन स्थायी और मज़बूत घरों के बारे में सोचते हैं जो सदियों से हमारी पहचान रहे हैं? वो घर, जो सिर्फ़ पत्थर और लकड़ी के ढांचे नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, कला और विज्ञान का जीता-जागता सबूत हैं।

यह कहानी है कुमाऊँ की पारंपरिक वास्तुकला की, उन घरों की जिन्हें 'बाखली' के नाम से जाना जाता है। यह कहानी उस विरासत की है जो एक तरफ़ पलायन के कारण 'भुतहा गांवों' में ख़ामोशी से दम तोड़ रही है, तो दूसरी तरफ़ कुछ लोगों की कोशिशों से एक नई सुबह की उम्मीद भी जगा रही है।

आज के सीमेंट (cement) और कंक्रीट (concrete) के दौर में, हमारे पुराने घर विज्ञान और प्रकृति के साथ तालमेल का एक बेहतरीन उदाहरण थे। इन घरों को 'बाखली' कहा जाता था, जिसका मतलब है एक ऐसा आँगन जिसके चारों तरफ़ दो या दो से ज़्यादा परिवार एक साथ रहते हों। यह डिज़ाइन (design) सिर्फ़ रहने के लिए नहीं, बल्कि एक मज़बूत सामाजिक ताने-बाने को भी दर्शाता था।

  • स्थानीय सामग्री का अद्भुत उपयोग: इन घरों की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि इन्हें बनाने के लिए हर चीज़ स्थानीय रूप से उपलब्ध होती थी। मज़बूत दीवारों के लिए पहाड़ का पत्थर, ढलान वाली छतों के लिए स्लेट या 'पताल', और ढाँचे, दरवाज़े और खिड़कियों के लिए देवदार या चीड़ की लकड़ी। यह वास्तुकला पूरी तरह से टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल थी।
  • 'गोठ' का वैज्ञानिक डिज़ाइन: इन घरों का डिज़ाइन पहाड़ के कठोर मौसम को ध्यान में रखकर बनाया गया था। घर आमतौर पर दो-मंज़िला होते थे। निचली मंज़िल, जिसे 'गोठ' कहा जाता था, मवेशियों के लिए होती थी। इसके पीछे एक गहरा विज्ञान था। सर्दियों में, जानवरों के शरीर से निकलने वाली गर्मी प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर उठती थी और ऊपरी मंज़िल पर रहने वाले परिवार के कमरों को गर्म रखती थी। यह एक तरह का प्राकृतिक हीटर (heater) था, जो बिना किसी ख़र्च के काम करता था।
  • भूकंपरोधी तकनीक: इन घरों की पत्थर की मोटी दीवारें और लकड़ी के मज़बूत शहतीरों का इंटरलॉकिंग (interlocking) ढाँचा इन्हें भूकंपरोधी बनाता था, जो इस भूकंपीय क्षेत्र के लिए बहुत ज़रूरी था।

कुमाऊँ के ये पुराने घर सिर्फ़ रहने की जगह नहीं थे, बल्कि एक कला दीर्घा की तरह थे। इन घरों की सबसे आकर्षक चीज़ थी लकड़ी पर की गई नक्काशी, जिसे 'लिखाई' कहा जाता है।

दरवाज़ों की चौखट, खिड़कियों के पैनल (panel) और छज्जों पर कारीगर अपने हाथों से फूल-पत्तियों, देवी-देवताओं, मोर और अन्य ज्यामितीय आकृतियों को उकेरते थे। यह सिर्फ़ सजावट नहीं थी। यह घर के मालिक की समृद्धि, उसकी सामाजिक हैसियत और उसकी धार्मिक आस्था का प्रतीक थी। माना जाता था कि दरवाज़े पर उकेरे गए देवी-देवताओं के चित्र घर को बुरी नज़र से बचाते हैं। हर घर की लिखाई अलग होती थी, जो उसे अपनी एक ख़ास पहचान देती थी। आज जब ये घर ढह रहे हैं, तो हम सिर्फ़ एक ढाँचा नहीं, बल्कि इस अनमोल कला को भी खो रहे हैं।

इतनी ख़ूबियों के बावजूद, आज यह विरासत ख़तरे में है। इसका सबसे बड़ा कारण है पलायन। बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और रोज़गार की तलाश में पिथौरागढ़ और बागेश्वर जैसे ज़िलों के हज़ारों परिवार अपने गाँव छोड़कर शहरों की ओर चले गए हैं।

'ट्रैवल इन देवभूमि' (Travel in Devbhoomi) जैसे स्रोत इस दर्दनाक सच्चाई को सामने लाते हैं, जिससे कई आबाद बस्तियाँ आज 'भुतहा गाँव' (Ghost Villages) में तब्दील हो चुकी हैं। इन गाँवों में अब सिर्फ़ ख़ामोशी है। वो घर जो कभी हँसी-ठहाकों और बच्चों की किलकारियों से गूँजते थे, आज चुपचाप ढह रहे हैं। उनकी पताल की छतें टूट चुकी हैं, दीवारों से पत्थर निकल रहे हैं, आँगनों में जंगली घास उग आई है, और कला से सजे दरवाज़े अपनी चौखट पर आख़िरी साँसें गिन रहे हैं। यह सिर्फ़ इमारतों का क्षय नहीं है, यह हमारी संस्कृति और पहचान का क्षय है।

लेकिन इस निराशा के बीच उम्मीद की कुछ किरणें भी हैं, जो पिथौरागढ़ के लोगों को एक नई राह दिखा रही हैं।

  • सरमोली का सामुदायिक मॉडल: पिथौरागढ़ के मुनस्यारी के पास बसा सरमोली गाँव इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है। इस गाँव को भारत का 'सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गाँव' का ख़िताब मिला है। यहाँ की महिलाओं ने मिलकर अपने पारंपरिक घरों को होमस्टे (homestay) में बदल दिया है। उन्होंने अपनी विरासत को संरक्षित करते हुए उसे अपनी आजीविका का साधन बना लिया है। पर्यटक यहाँ आकर न सिर्फ़ हिमालय के नज़ारे देखते हैं, बल्कि कुमाऊँ की असल संस्कृति, खान-पान और वास्तुकला का अनुभव भी करते हैं। सरमोली यह साबित करता है कि विरासत को बचाकर भी विकास किया जा सकता है।
  • 'द नंदा स्टोन' का आधुनिक प्रयोग: दूसरी तरफ़, मुक्तेश्वर 'द नंदा स्टोन' (The Nanda Stone) नामक एक सरहनीय प्रयास किया गया है। यह एक नया निर्माण है, लेकिन इसे पूरी तरह से पारंपरिक कुमाऊँनी शैली में बनाया गया है। इसमें वही पत्थर की दीवारें और स्लेट की छत है, लेकिन अंदर पर्यटकों के लिए सभी आधुनिक सुविधाएँ जैसे बड़े शीशे वाली खिड़कियाँ और अटैच्ड बाथरूम भी हैं। यह इस बात का सबूत है कि हमें अपनी जड़ों को छोड़ने की ज़रूरत नहीं है। हम पारंपरिक तकनीक और आधुनिक ज़रूरतों के बीच एक ख़ूबसूरत संतुलन बना सकते हैं।

कुमाऊँ की यह पारंपरिक वास्तुकला विज्ञान, कला और संस्कृति का एक अनूठा संगम है। यह हमें सिखाती है कि कैसे प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर एक टिकाऊ जीवन जिया जा सकता है। आज जब पूरी दुनिया 'सस्टेनेबल लिविंग' (Sustainable leveling) की बात कर रही है, तो उसका जीता-जागता मॉडल (model) हमारे अपने घरों में मौजूद है।

पिथौरागढ़ के निवासी होने के नाते यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम अपनी इस पहचान को समझें और इसे बचाने का प्रयास करें। सरमोली जैसे सामुदायिक प्रयासों का समर्थन करके, और नए घर बनवाते समय कुछ पारंपरिक तत्वों को अपनाकर, हम इस दम तोड़ती विरासत में एक नई जान फूँक सकते हैं। क्योंकि इन इमारतों को बचाना सिर्फ़ पत्थर और लकड़ी को बचाना नहीं है, यह पिथौरागढ़ की आत्मा को बचाना है।

संदर्भ 

https://tinyurl.com/292f5ajb 
https://tinyurl.com/25jf7jt9 
https://tinyurl.com/24fhr2lh 
https://tinyurl.com/263xlnzx 
https://tinyurl.com/2cwh9j4a 
https://tinyurl.com/23l2hevf 
https://tinyurl.com/2bltrgvw 



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