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जब हम 'घर' शब्द के बारे में सोचते हैं, तो हमारे मन में एक आरामदायक सोफे, दीवारों पर लगे सुंदर रंगों और आधुनिक सजावट की तस्वीर उभरती है। आज के दौर में, खासकर पिथौरागढ़ जैसे शहर में, हम अपने घरों को नए ज़माने के हिसाब से सजाने पर बहुत ध्यान देते हैं। लेकिन क्या घर का मतलब सिर्फ़ उसका बाहरी ढाँचा या महंगा इंटीरियर (interior) ही है? या घर की एक आत्मा भी होती है? यह आत्मा उन चीज़ों में बसती है जो पीढ़ियों से हमारे साथ रही हैं, जिन्होंने हमारे पूर्वजों के जीवन को आसान बनाया और जो हमारी संस्कृति की पहचान हैं। ऐसी ही एक पहचान है 'ओखली', जो कभी पिथौरागढ़ के हर आंगन की शान और जीवन का ज़रूरी हिस्सा हुआ करती थी, लेकिन आज गुमनामी के अँधेरे में खो गई है।
क्या थी ओखली और क्यों थी इतनी ख़ास?
आज की पीढ़ी के लिए, ओखली शायद बस एक भारी-भरकम पत्थर है। लेकिन असल में यह एक बहुत ही सरल और प्रभावशाली तकनीक थी। इसमें मुख्य रूप से दो भाग होते थे - ओखली, जो पत्थर का एक गहरा कटोरा होता था, और मूसल, जो लकड़ी या पत्थर का एक लंबा और भारी डंडा होता था। इसका काम था कूटना, पीसना और मिलाना। इसका इस्तेमाल दुनिया भर की सभ्यताओं में हज़ारों सालों से होता आया है, लेकिन पहाड़ के जीवन में इसकी भूमिका कहीं ज़्यादा गहरी थी।
यह सिर्फ़ एक रसोई का उपकरण नहीं था। यह घर की आत्मनिर्भरता का प्रतीक थी। जिस घर में ओखली होती थी, वहाँ अनाज को साफ़ करने से लेकर मसाले तैयार करने तक का काम घर पर ही हो जाता था। इससे न सिर्फ़ पैसे की बचत होती थी, बल्कि खाने की शुद्धता की भी गारंटी रहती थी।
एक समय था जब पिथौरागढ़ के घरों में सुबह की शुरुआत किसी मशीन के शोर से नहीं, बल्कि एक मीठी और लयबद्ध 'धप-धप' की आवाज़ से होती थी। यह आवाज़ ओखली की होती थी, जो बताती थी कि घर जाग गया है और दिन की शुरुआत हो चुकी है। घर की महिलाएं इसी में धान कूटकर चावल निकालतीं, मंडुवे (रागी) जैसे मोटे अनाज को साफ़ करतीं और रोज़ के खाने के लिए ताज़े मसाले पीसती थीं।
स्वाद का रहस्य: पहाड़ का मशहूर 'पिस्यूं लूण' यानी पिसा हुआ नमक, इसी ओखली की देन है। इसमें सादे नमक के साथ हरी मिर्च, लहसुन, हरिया धनिया और कई पहाड़ी जड़ी-बूटियों को मिलाकर मूसल से धीरे-धीरे कूटा जाता था। इस धीमी प्रक्रिया से मसालों का असली तेल और उनकी ख़ुशबू निकलती थी, जो खाने के स्वाद को लाजवाब बना देती थी। आज भी लोग यह नमक बनाते हैं, लेकिन मिक्सी में पिसे नमक में वो बात नहीं आती जो ओखली में कूटे गए नमक में होती थी।
सामाजिक जुड़ाव का केंद्र: ओखली वाला आंगन सिर्फ़ काम करने की जगह नहीं, बल्कि एक सामाजिक केंद्र था। सुबह के समय, आस-पड़ोस की महिलाएं वहाँ इकट्ठा हो जाती थीं। एक साथ काम करते हुए वे अपने सुख-दुःख बांटतीं, गाँव-घर की बातें करतीं और साथ में पहाड़ी लोकगीत या मंगल गीत गुनगुनाती थीं। यह आपसी मेलजोल और भाईचारे को मज़बूत करता था। यह महिलाओं के लिए एक ऐसा कोना था जहाँ वे बिना किसी रोक-टोक के अपनी बातें कह सकती थीं।
पहाड़ी संस्कृति में ओखली को कभी सिर्फ़ एक पत्थर नहीं माना गया; इसे एक पवित्र दर्जा हासिल था। यह घर की समृद्धि, संपन्नता और सौभाग्य का प्रतीक थी।
अनुष्ठानों का अहम हिस्सा: कोई भी शुभ काम, ख़ासकर शादी-ब्याह, ओखली की पूजा के बिना अधूरा था। विवाह के दौरान एक रस्म होती थी जिसमें धान से भरी ओखली की पूजा की जाती थी। इसे 'धन्यवाद' कहा जाता था। इसके पीछे की भावना यह थी कि जैसे यह ओखली अनाज से भरी है, वैसे ही नए विवाहित जोड़े का जीवन भी हमेशा धन-धान्य और खुशियों से भरा रहे।
समृद्धि की निशानी: जिस घर के आँगन में ओखली होती थी, उसे भरा-पूरा घर माना जाता था। यह इस बात का संकेत थी कि परिवार मेहनती है और घर में अन्न का भंडार है। यह महज़ एक औज़ार नहीं, बल्कि घर की इज़्ज़त और सामाजिक स्थिति का भी प्रतीक थी।
अक्सर हम यह सोचते हैं कि यह हमारी दादी-नानी के ज़माने की चीज़ होगी। लेकिन पुरातात्विक खोजें हमें बताती हैं कि इसकी कहानी हमारी सोच से कहीं ज़्यादा पुरानी है।
पाषाण काल से जुड़ाव: अल्मोड़ा ज़िले में पुरातत्वविदों को खुदाई में जो ओखली मिली है, वह पाषाण काल (Stone Age) की है। यह एक चौंकाने वाली जानकारी है। इसका मतलब है कि हमारे पूर्वज हज़ारों साल पहले, जब वे गुफाओं से निकलकर सभ्य जीवन की शुरुआत कर रहे थे, तब भी इसी तरह के उपकरण का इस्तेमाल करते थे।
कत्यूरी काल की गवाह: बागेश्वर में मिली एक विशाल ओखली कत्यूरी राजवंश के समय की हो सकती है। कत्यूरी राजाओं ने 7वीं से 11वीं सदी तक उत्तराखंड पर शासन किया। ये खोजें साबित करती हैं कि ओखली सिर्फ़ एक घरेलू चीज़ नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर है, जो हमें हमारे हज़ारों साल पुराने अतीत से जोड़ती है।
फिर समय बदला। बिजली आई और उसके साथ आई मिक्सी और ग्राइंडर जैसी मशीनें। इन मशीनों ने घंटों का काम मिनटों में समेट दिया और धीरे-धीरे ओखली की 'धप-धप' की आवाज़ को मिक्सी की तेज़ 'घर्रर्र...' ने ख़त्म कर दिया। इस बदलाव ने हमें सुविधा तो दी, लेकिन हमसे बहुत कुछ छीन भी लिया।
स्वाद का ख़त्म होना: विज्ञान की भाषा में समझें तो जब ओखली में मसाले धीरे-धीरे कूटे जाते हैं, तो उन पर दबाव पड़ता है, गर्मी पैदा नहीं होती। इससे मसालों के अंदर का तेल (essential oils) और उनके पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं। वहीं, मिक्सी के तेज़ घूमने वाले ब्लेड गर्मी पैदा करते हैं, जिससे मसालों की ख़ुशबू और उनका असली स्वाद काफ़ी हद तक नष्ट हो जाता है।
सामाजिकता का अंत: मशीन ने हर महिला को उसकी अपनी रसोई तक सीमित कर दिया। वो साथ बैठकर काम करने और बातें करने का सिलसिला ख़त्म हो गया।
स्वास्थ्य पर असर: ओखली चलाना एक अच्छी-ख़ासी शारीरिक कसरत थी, जो महिलाओं को मज़बूत और स्वस्थ रखती थी। मशीनों पर निर्भरता ने उस शारीरिक श्रम को भी ख़त्म कर दिया।
आज पिथौरागढ़ के कई घरों में यह ऐतिहासिक ओखली किसी कोने में धूल खा रही है। कुछ लोगों ने इसे बेकार समझकर फेंक दिया है, तो कुछ ने इसे पानी की बाल्टी रखने का स्टैंड या फिर फूल उगाने का गमला बना लिया है। यह अनजाने में हुआ एक ऐसा अपमान है जो दिखाता है कि हम अपनी ही विरासत के प्रति कितने उदासीन हो गए हैं।
यह सिर्फ़ एक पत्थर के टुकड़े का अंत नहीं है, यह उस जीवन शैली, उस स्वाद और उस संस्कृति के एक अध्याय का अंत है जो हमें अद्वितीय बनाती थी। अगली बार जब आप अपने आस-पास ऐसी कोई ओखली देखें, तो उसे सिर्फ़ एक पुराना पत्थर न समझें। यह हमारे इतिहास की गवाह है, हमारे स्वाद की रक्षक है और हमारे घरों की वो भूली हुई धड़कन है। हमारा कर्तव्य है कि हम इसकी कहानी को जानें और अपनी अगली पीढ़ी को बताएं, ताकि वे यह समझ सकें कि उनका अतीत कितना समृद्ध और वैज्ञानिक था।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2amrobsd
https://tinyurl.com/2y47xfue
https://tinyurl.com/284ufakg
https://tinyurl.com/2y5srhfa
https://tinyurl.com/29ea86ae
https://tinyurl.com/2xzdadc5