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आज के दौर में हम अपने मोबाइल फोन से एक दिन में सैकड़ों तस्वीरें खींच लेते हैं। एक क्लिक में कोई भी पल हमेशा के लिए कैद हो जाता है। यह इतना आसान है कि हम इसके पीछे की ताकत को अक्सर भूल जाते हैं। लेकिन कल्पना कीजिए उस ज़माने की, जब एक तस्वीर खींचना किसी वैज्ञानिक प्रयोग और एक कलात्मक साधना से कम नहीं था। एक ऐसा दौर, जब फोटोग्राफी (photography) एक नया-नया आविष्कार थी और हर तस्वीर एक चमत्कार मानी जाती थी।
यह कहानी उसी दौर के एक जादूगर, डॉ. जॉन मरे (Dr. John Murray) की है, जो पेशे से तो एक चिकित्सक थे, लेकिन जिनके जुनून ने उन्हें भारत के शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण फोटोग्राफरों में से एक बना दिया। यह कहानी उनके कैमरे (camera) की है, और कैसे उनके लेंस ने पहली बार कुमाऊँ की अनछुई सुंदरता को देखा, जिससे हमें अपनी ही विरासत को देखने के लिए एक अनमोल खिड़की मिली।
फोटोग्राफी के शुरुआती दिनों को समझना यह जानने के लिए महत्वपूर्ण है कि डॉ. मरे का काम कितना असाधारण था। आज की डिजिटल फोटोग्राफी के विपरीत, 19वीं सदी के मध्य में तस्वीर खींचना एक बेहद जटिल, श्रमसाध्य और अनिश्चित प्रक्रिया थी। डॉ. मरे "केलोटाइप प्रक्रिया" (Calotype Process) के माहिर थे, जिसे कागज़ पर नेगेटिव बनाकर तस्वीरें खींचने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
इस प्रक्रिया में फोटोग्राफर को खुद ही कागज़ पर रसायनों का लेप लगाकर उसे प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनाना पड़ता था। इसके लिए भारी-भरकम कैमरे, लकड़ी के ट्राइपॉड और रसायनों से भरी पेटियों को साथ लेकर चलना पड़ता था। किसी भी दृश्य को कैमरे में कैद करने के लिए मिनटों, और कभी-कभी घंटों तक का 'एक्सपोज़र टाइम' लगता था, जिसमें ज़रा सी भी हरकत तस्वीर को बर्बाद कर सकती थी। इसके बाद, उस कागज़ के नेगेटिव को अंधेरे में फिर से रासायनिक प्रक्रियाओं से गुज़ारकर तस्वीर तैयार की जाती थी। हर कदम पर गलती की गुंजाइश थी, और हर सफल तस्वीर धैर्य, कौशल और थोड़े भाग्य का परिणाम होती थी। डॉ. मरे ने इसी चुनौतीपूर्ण तकनीक का उपयोग करके भारत के कुछ सबसे स्थायी और प्रतिष्ठित चित्र बनाए।
डॉ. जॉन मरे का नाम भारतीय फोटोग्राफी के इतिहास में सबसे ज़्यादा आगरा के ताजमहल की उनकी तस्वीरों के लिए जाना जाता है। वे ईस्ट इंडिया कंपनी में एक डॉक्टर के रूप में आगरा में तैनात थे, और इसी दौरान उन्होंने दुनिया के इस अजूबे की सबसे पहली और विस्तृत फोटोग्राफिक श्रृंखलाओं में से एक तैयार की। उन्होंने ताजमहल को विभिन्न कोणों से, अलग-अलग रोशनी में और अभूतपूर्व विस्तार के साथ कैमरे में कैद किया। उस समय के लिए, यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। उनकी तस्वीरों ने दुनिया को पहली बार ताजमहल की भव्यता का एक यथार्थवादी दृश्य प्रदान किया और आज भी ये तस्वीरें फोटोग्राफी और वास्तुकला के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जाती हैं।
लेकिन जहाँ डॉ. मरे की ताजमहल की तस्वीरें विश्व प्रसिद्ध हैं, वहीं उनका एक और काम है जो शायद कम जाना जाता है, पर पिथौरागढ़ और पूरे कुमाऊँ क्षेत्र के निवासियों के लिए कहीं अधिक व्यक्तिगत और कीमती है। अपनी फोटोग्राफिक (photographic) यात्रा के दौरान, डॉ. मरे ने अपने कैमरे का रुख कुमाऊँ की शांत और निर्मल पहाड़ियों की ओर किया, विशेष रूप से नैनीताल की ओर।
उनके द्वारा 1850 के दशक के अंत में खींची गई नैनीताल की तस्वीरें आज किसी खजाने से कम नहीं हैं। ये तस्वीरें हमें उस नैनीताल को दिखाती हैं जो आज के व्यावसायिक पर्यटन से कोसों दूर था। उनकी तस्वीरों में नैनी झील होटलों और भीड़ से घिरी नहीं, बल्कि घने जंगलों और शांत पहाड़ियों से घिरी एक विशाल, निर्मल जलराशि के रूप में दिखाई देती है। पेड़ों की परछाइयाँ झील के शांत पानी पर पड़ती हैं, और पूरे परिदृश्य में एक ऐसी शांति है जिसकी आज हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं।
डॉ. मरे उस समय शायद यह नहीं जानते होंगे, लेकिन वे सिर्फ खूबसूरत दृश्य नहीं खींच रहे थे। वे अनजाने में इस क्षेत्र के पर्यावरण और भूगोल का एक अमूल्य ऐतिहासिक दस्तावेज़ तैयार कर रहे थे। उनकी तस्वीरें उस समय का एक दृश्य प्रमाण हैं जब आधुनिक विकास ने इस क्षेत्र में अपने कदम नहीं रखे थे। वे हमें दिखाती हैं कि हमारी झीलें, हमारे जंगल और हमारी पहाड़ियाँ अपने मूल, अनछुुए रूप में कैसी दिखती थीं।
तो डॉ. मरे की 160 साल से भी ज़्यादा पुरानी इन तस्वीरों का आज हमारे लिए क्या महत्व है? ये सिर्फ पुरानी, धुंधली तस्वीरें नहीं हैं। ये "टाइमलेस" (timeless) यानी समय से परे हैं। ये हमारे अतीत की एक सीधी खिड़की हैं, एक ऐसा टाइम कैप्सूल जो हमें सीधे उस दौर में ले जाता है। किसी इतिहास की किताब में लिखे सैकड़ों शब्दों से ज़्यादा ताकत एक अकेली तस्वीर में हो सकती है। यह हमें दिखाती है, महसूस कराती है।
पिथौरागढ़ में बैठे किसी व्यक्ति के लिए, नैनीताल की ये तस्वीरें उनके अपने बड़े क्षेत्र, कुमाऊँ की विरासत का हिस्सा हैं। वे उस दुनिया की एक झलक हैं जिसमें उनके पूर्वज रहते थे। ये हमें यह समझने में मदद करती हैं कि समय के साथ कितना कुछ बदल गया है, और हमें यह याद दिलाती हैं कि हमारी प्राकृतिक विरासत कितनी कीमती है। ये तस्वीरें एक आधार रेखा (baseline) की तरह हैं, जिसके सामने हम आज के परिदृश्य को रखकर बदलाव का आकलन कर सकते हैं।
फोटोग्राफी का सबसे बड़ा जादू शायद यही है—समय को रोकने की उसकी क्षमता। डॉ. मरे ने अपने कैमरे से सिर्फ प्रकाश को कागज़ पर कैद नहीं किया; उन्होंने इतिहास के एक पल को हमेशा के लिए जीवित कर दिया। उनकी दृष्टि और उनके लेंस के माध्यम से, आज हम अपने ही अतीत को अपनी आँखों से देख सकते हैं—एक ऐसा उपहार जो हमें अपनी जड़ों को बेहतर ढंग से समझने और अपनी बची हुई विरासत को सहेजने के लिए प्रेरित करता है।
संदर्भ
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