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संगीत क्या है? यह महज़ मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि किसी भी समाज की आत्मा की आवाज़ होता है। लोक संगीत वह धागा है जो एक समुदाय के इतिहास, उसकी खुशियों, उसके दुखों, उसके विश्वासों और उसकी पहचान को एक साथ पिरोता है। जब हम पिथौरागढ़ की बात करते हैं, तो यहाँ की हवा में सिर्फ़ देवदार की महक और नदियों का शोर ही नहीं, बल्कि एक गहरा सांस्कृतिक संगीत भी घुला हुआ है, एक ऐसी ध्वनि जो यहाँ के जीवन की धड़कन है। यह कहानी है उस संगीत के सफ़र की, जो एक साधारण से कंपन (Vibration) से शुरू होकर हमारे पहाड़ों में ढोल-दमाऊ की गूंज, हुड़के की थाप और मांगलिक गीतों के पवित्र स्वरों में बदल जाता है। यह कहानी है पिथौरागढ़ के अपने संगीत की।
पिथौरागढ़ और पूरे कुमाऊँ की संगीतमय पहचान को गढ़ने का श्रेय हमारे पारंपरिक वाद्य यंत्रों को जाता है। ये सिर्फ़ लकड़ी और चमड़े से बने उपकरण नहीं हैं, बल्कि ये हमारे समाज के हर सुख-दुःख के साथी हैं। इस संगीत-संसार की नींव रखता है ढोल, जिसकी गहरी और दमदार आवाज़ हर शुभ काम की शुरुआत का ऐलान करती है। यह सिर्फ़ एक ताल वाद्य नहीं, बल्कि एक संदेशवाहक भी है। इसकी गूंज दूर-दूर तक यह संदेश पहुँचाती है कि गाँव में कोई उत्सव या अनुष्ठान हो रहा है।
ढोल का अविभाज्य साथी है दमाऊ, जो कटोरी के आकार का, ढोल से छोटा लेकिन तेज़ आवाज़ वाला वाद्य यंत्र है। जब ढोल की गहरी गूंज उठती है, तो दमाऊ की तीखी और लयबद्ध आवाज़ उसके साथ मिलकर एक ऐसा संगीत रचती है जो सीधे दिल में उतर जाता है। इन्हें बजाने वाले कलाकार, जो अक्सर दास समुदाय से होते हैं, इन दो वाद्य यंत्रों के बीच एक संगीतमय संवाद स्थापित करते हैं, जो कुमाऊँनी संगीत की जान है।
इस जोड़ी के अलावा, हुड़का कुमाऊँ के कथाकारों और गायकों का सबसे प्रिय साथी है। यह डमरू के आकार का एक छोटा, हाथ से बजाया जाने वाला वाद्य यंत्र है। लोक गाथाओं (जागर या गाथा) को गाते समय, या खेतों में काम करते समय गाए जाने वाले गीतों में हुड़के की लयबद्ध थाप कहानी में जान डाल देती है। इनके साथ ही मशकबीन (पहाड़ी बैगपाइप (Pahadi Bagpipe)) और तुरही (एक तरह का बिगुल (Bigul)) जैसे वाद्य यंत्र भी हमारे संगीत को एक अलग रंग देते हैं, खासकर शादी-ब्याह और मेलों के अवसर पर।
कुमाऊँनी संगीत का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण अंग है 'मंगल गीत' (Mangal Geet)। ये मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीत नहीं हैं, ये सीधे तौर पर आस्था और अनुष्ठान से जुड़े हैं। जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, ये 'मंगल' यानी शुभ मौकों पर गाए जाने वाले गीत हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य देवी-देवताओं का आह्वान करना, उनका आशीर्वाद मांगना और यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी शुभ कार्य बिना किसी विघ्न के संपन्न हो। कुमाऊँ में यह मान्यता इतनी गहरी है कि बिना मंगल गीतों के कोई भी शुभ कार्य अधूरा और असफल माना जाता है।
इन गीतों को पारंपरिक रूप से महिलाएँ गाती हैं। गाँव की अनुभवी महिलाएँ मिलकर एक 'मांगलिक दल' बनाती हैं, जिसका नेतृत्व एक सबसे जानकार महिला करती है। जब ये महिलाएँ एक साथ, धीमी और लयबद्ध धुन में इन गीतों को गाती हैं, तो पूरे घर का माहौल पवित्र और दिव्य हो जाता है। ऐसा लगता है मानो वे अपने स्वरों से घर में एक सुरक्षा कवच बना रही हों। यह परंपरा महिलाओं को हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत की संरक्षक के रूप में एक केंद्रीय भूमिका देती है।
ये गीत अनुष्ठान के हर चरण से जुड़े होते हैं। विवाह में गणेश पूजा से लेकर विदाई तक, या बच्चे के नामकरण संस्कार से लेकर जनेऊ संस्कार तक, हर रस्म के लिए एक अलग मंगल गीत होता है। ये गीत सिर्फ़ एक परंपरा नहीं, बल्कि उस अनुष्ठान का एक अनिवार्य हिस्सा हैं, जो उसे आध्यात्मिक वैधता और पवित्रता प्रदान करते हैं।
पिथौरागढ़ का संगीत सिर्फ़ अनुष्ठानों तक ही सीमित नहीं है, यह यहाँ के सामाजिक जीवन के ताने-बाने में भी बुना हुआ है। यह संगीत सामुदायिक (Communal) है, जो लोगों को एक-दूसरे से जोड़ता है। जब गाँव के लोग मिलकर धान की रोपाई करते हैं या फसल काटते हैं, तो वे अक्सर सामूहिक गीत गाते हैं। इन गीतों की लय उनके काम की गति से जुड़ी होती है। यह न सिर्फ़ मेहनत भरे काम को मनोरंजक बनाता है, बल्कि आपसी सहयोग और एकता की भावना को भी मज़बूत करता है।
इसी तरह, मेलों और त्योहारों के अवसर पर गाए और नाचे जाने वाले झोड़ा (Jhora) और चांचरी (Chanchari) जैसे लोकनृत्य इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। इसमें सभी लोग, बूढ़े और जवान, एक-दूसरे का हाथ पकड़कर एक गोल घेरे में नाचते और गाते हैं। यहाँ कलाकार और दर्शक का कोई भेद नहीं होता; हर कोई उस संगीत और उत्सव का हिस्सा होता है। यह संगीत लोगों को एक साथ लाता है और सामाजिक बंधनों को मजबूत करता है।
आज जब आधुनिक संगीत और मनोरंजन के नए साधन हमारी ज़िंदगी में आ गए हैं, तो यह डर स्वाभाविक है कि कहीं हमारी यह अनमोल लोक संगीत की परंपरा फीकी न पड़ जाए। लेकिन पिथौरागढ़ ने इस चुनौती का सामना करने के लिए एक खूबसूरत और आधुनिक रास्ता खोजा है। हाल ही में, भारतीय सेना की पहल पर, पिथौरागढ़ में जिले के पहले कम्युनिटी रेडियो स्टेशन, "रेडियो पंचशूल पल्स" (Radio Panchshul Pulse) का उद्घाटन किया गया है।
यह सिर्फ़ एक रेडियो स्टेशन नहीं है, यह अतीत और भविष्य को जोड़ने वाला एक पुल है। यह एक नई, आधुनिक 'पल्स' (धड़कन) है, जो हमारे पहाड़ों की सदियों पुरानी धुनों को एक नया मंच दे रही है। अब ढोल-दमाऊ की गूंज, मंगल गीतों के पवित्र स्वर और हमारे लोकगीतों की मिठास इस रेडियो की तरंगों के ज़रिए घाटी के कोने-कोने तक पहुँचेगी। यह पहल यह सुनिश्चित करेगी कि हमारी संगीत की विरासत गुम न हो, बल्कि नई पीढ़ी तक पहुँचे, उन्हें प्रेरित करे और पिथौरागढ़ की सांस्कृतिक धड़कन को हमेशा जीवंत और मजबूत बनाए रखे।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2aeaa26j
https://tinyurl.com/2yjmqrfp
https://tinyurl.com/2xqoubue
https://tinyurl.com/29eualkv
https://tinyurl.com/25b8fvmq
https://tinyurl.com/2y86gd2p