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आज जब हम पिथौरागढ़ में जैविक खेती (Organic Farming) और प्राकृतिक खेती (Natural Farming) की बात करते हैं, तो हमें लगता है कि यह कोई नई तकनीक या सरकारी योजना है। कृषि विज्ञान केंद्र किसानों को नए-नए तरीके सिखा रहे हैं और उत्तराखंड को एक 'ऑर्गेनिक स्टेट' (Organic State) बनाने की कोशिश हो रही है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि यह 'नई' सोच असल में कितनी पुरानी है? क्या यह कोई नया अविष्कार है, या हम बस अपनी उन जड़ों की ओर लौट रहे हैं जिन्हें हम हज़ारों साल पहले पीछे छोड़ आए थे?
यह कहानी है इंसान के उस सबसे बड़े क्रांतिकारी कदम की, जिसने हमें शिकारी से किसान बनाया। यह कहानी है सभ्यता की उस सुबह की, जो आज से लगभग 12,000 साल पहले शुरू हुई थी। और आप पाएँगे कि इस कहानी का एक महत्वपूर्ण अध्याय पिथौरागढ़ और हिमालय की इन वादियों में भी लिखा गया था।
आज से 12,000 साल पहले (लगभग 10,000 ईसा पूर्व) तक, हमारे पूर्वज एक घुमंतू जीवन जीते थे। वे शिकारी-संग्राहक थे, जिनका जीवन पूरी तरह से प्रकृति की दया पर निर्भर था। वे भोजन की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहते, जानवरों का शिकार करते और जंगली फल-फूल इकट्ठा करते। उनका कोई स्थायी घर नहीं होता था, और भविष्य अनिश्चित था।
फिर, इतिहास की सबसे बड़ी क्रांति हुई। इसे हम नवपाषाण क्रांति (Neolithic Revolution) या कृषि का जन्म कहते हैं। मध्य-पूर्व के 'उपजाऊ अर्धचंद्र' (Fertile Crescent) कहे जाने वाले इलाके में, इंसानों ने एक चमत्कारिक खोज की। उन्होंने देखा कि अगर किसी पौधे के बीज को ज़मीन में बोया जाए, तो उससे वैसा ही एक नया पौधा उग जाता है। उन्होंने पहली बार गेहूँ और जौ जैसे अनाज उगाना सीखा। इसी के साथ उन्होंने भेड़ और बकरी जैसे जंगली जानवरों को पालतू बनाना भी शुरू कर दिया।
यह एक छोटी सी खोज नहीं थी; इसने इंसान के जीवन का पूरा तरीका बदल दिया।
यह मानव इतिहास का वह निर्णायक मोड़ था, जिसने शहरों, साम्राज्यों और आज की आधुनिक दुनिया की नींव रखी।
जब दुनिया के दूसरे हिस्सों में इंसान छोटे-छोटे गाँव बसा रहा था, तब भारत की धरती पर एक ऐसी महान सभ्यता जन्म ले रही थी, जो अपने समय से हज़ारों साल आगे थी। यह थी सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) या हड़प्पा सभ्यता (लगभग 3300 ईसा पूर्व से 1300 ईसा पूर्व)।
इस सभ्यता ने जो कर दिखाया, वह आज भी दुनिया भर के इंजीनियरों (engineer) और शहरी योजनाकारों को हैरान कर देता है। उनके शहर, जैसे मोहनजो-दड़ो (Mohanjo Daro) और हड़प्पा (Harappa), किसी अजूबे से कम नहीं थे।
यह सभ्यता दिखाती है कि हमारे पूर्वज विज्ञान, प्रौद्योगिकी और कृषि में कितने माहिर थे।
जिस समय सिंधु घाटी के मैदानों में विशाल शहर बस रहे थे, उस समय हिमालय की इन ऊँची वादियों में एक अलग, लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण कहानी आकार ले रही थी। यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ बड़े शहर बसाने के अनुकूल नहीं थीं, इसलिए यहाँ जीवन का एक अलग मॉडल विकसित हुआ।
इसका सबूत हमें लाखुडियार जैसी प्रागैतिहासिक रॉक आर्ट साइटों (Rock Art site) से मिलता है। हालाँकि ये चित्रकारी पहले शुरू हुई थी, लेकिन यह परंपरा हज़ारों सालों तक चलती रही। इन चित्रों में हम इंसानों को जानवरों के साथ बहुत करीब से जुड़ा हुआ देखते हैं। वे नाच रहे हैं, शिकार कर रहे हैं, और जानवरों के झुंडों को चित्रित कर रहे हैं।
यह चित्रकला हमें एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देती है। यह सिर्फ़ शिकार का चित्रण नहीं है, बल्कि जानवरों के साथ रहने का संकेत है। ऐसा लगता है कि जब मैदानों में कृषि क्रांति हो रही थी, तब पहाड़ों में हमारे पूर्वज पशुचारण (Pastoralism) की ओर बढ़ रहे थे। उन्होंने भेड़, बकरियों और दूसरे मवेशियों को पालतू बनाना और उन्हें चराना सीख लिया था।
अब हम वापस आज के पिथौरागढ़ में लौटते हैं। जब आज उत्तराखंड सरकार और कृषि विज्ञान केंद्र हमें जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करते हैं, तो वे असल में हमें उसी प्राचीन ज्ञान की ओर लौटने के लिए कह रहे हैं। सिंधु घाटी के लोगों ने हमें इंजीनियरिंग सिखाई, लेकिन हिमालय के हमारे गुमनाम पूर्वजों ने हमें प्रकृति के साथ संतुलन में रहना सिखाया।
संदर्भ
https://tinyurl.com/y6uv628s
https://tinyurl.com/28qlpyw9
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https://tinyurl.com/22n7bjva
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