पिथौरागढ़ में स्थित ॐ पर्वत भी जलवायु बदलाव से अछूता नहीं है!

पर्वत, पहाड़ियाँ और पठार
24-10-2025 09:10 AM
पिथौरागढ़ में स्थित ॐ पर्वत भी जलवायु बदलाव से अछूता नहीं है!

पिथौरागढ़ जिले में स्थित ओम पर्वत, जिसे आदि कैलाश या छोटा कैलाश भी कहा जाता है, केवल एक तीर्थ स्थल ही नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक और पर्यावरणीय अध्ययन का केंद्र भी है। इस लेख में हम ओम पर्वत के निर्माण, इसके महत्व और हाल ही में सामने आए पर्यावरणीय संकट का एक तथ्यात्मक विश्लेषण करेंगे। इसमें उन प्रशासनिक कदमों की भी समीक्षा की गई है जो इस क्षेत्र के भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं।

हिमालय पर्वत श्रृंखला, जिसमें ओम पर्वत स्थित है, को भूवैज्ञानिक रूप से 'वलित पर्वत' (Fold Mountains) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इनका निर्माण आज से करोड़ों वर्ष पूर्व भारतीय टेक्टोनिक प्लेट (Tectonic plate) और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट (Eurasian tectonic plate) के बीच हुई विशाल टक्कर के परिणामस्वरूप हुआ। इस प्रक्रिया को 'क्रस्टल कम्प्रेशन' (Crustal Compression) कहा जाता है, जिसमें टक्कर के ज़बरदस्त दबाव के कारण दोनों प्लेटों के बीच स्थित टेथिस सागर की तलछटी चट्टानें (Sedimentary Rocks) मुड़कर और ऊपर उठकर दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला के रूप में विकसित हुईं। ओम पर्वत का निर्माण ज्वालामुखी गतिविधि से नहीं, बल्कि इसी टेक्टोनिक दबाव और उत्थान का परिणाम है, जो इसे भूवैज्ञानिक रूप से एक युवा और सक्रिय पर्वत श्रृंखला का हिस्सा बनाता है।

ओम पर्वत के विशिष्ट तथ्यों का विवरण निम्नलिखित है:

  • स्थान: यह पर्वत भारत के उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले की धारचूला तहसील में स्थित है। यह भारत-नेपाल सीमा के बहुत करीब है और कैलाश-मानसरोवर यात्रा के पारंपरिक मार्ग पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
  • ऊँचाई: समुद्र तल से इसकी ऊँचाई लगभग 5,590 मीटर (18,340 फीट) है।
  • 'ॐ' की आकृति: इसकी सबसे विशिष्ट पहचान पर्वत के मुख पर बर्फ के जमाव का एक विशेष पैटर्न है, जो प्राकृतिक रूप से देवनागरी लिपि के 'ॐ' अक्षर जैसा दिखता है। यह कोई मानव निर्मित संरचना नहीं है, बल्कि बर्फ के मौसमी जमाव का परिणाम है। पिथौरागढ़ जिले की आधिकारिक वेबसाइट भी इस "चमत्कारिक" आकृति को क्षेत्र के मुख्य पर्यटक आकर्षणों में से एक के रूप में सूचीबद्ध करती है।
  • धार्मिक महत्व: इस 'ॐ' आकृति के कारण यह पर्वत हिंदू, जैन और बौद्ध, तीनों धर्मों के अनुयायियों के लिए एक अत्यंत पवित्र स्थल है। इसे भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है।

ओम पर्वत एक अभूतपूर्व पर्यावरणीय घटना का सामना कर रहा है। रिपोर्ट में बताया गया कि इतिहास में पहली बार, पर्वत पर 'ॐ' की आकृति बनाने वाली बर्फ लगभग पूरी तरह से पिघल गई है। इस घटना ने स्थानीय निवासियों, श्रद्धालुओं और पर्यावरणविदों के बीच गंभीर चिंता पैदा कर दी है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस घटना के दो मुख्य कारण बताए गए हैं:

  1. अपर्याप्त हिमपात: पिछली सर्दियों के दौरान क्षेत्र में सामान्य से बहुत कम बर्फबारी हुई, जिससे बर्फ की एक मोटी और स्थायी परत जमा नहीं हो सकी।
  2. बढ़ता तापमान: वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण क्षेत्र के तापमान में वृद्धि दर्ज की जा रही है, जिससे बर्फ पिघलने की दर तेज हो गई है।

यह घटना केवल एक धार्मिक प्रतीक के लुप्त होने का मामला नहीं है, बल्कि यह हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के बिगड़ते स्वास्थ्य का एक प्रत्यक्ष और मापने योग्य संकेतक है।

एक ओर जहाँ क्षेत्र में पर्यावरणीय संकट के संकेत मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक स्तर पर पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। पिथौरागढ़ जिला प्रशासन ने आदि कैलाश और ओम पर्वत की यात्रा के लिए इनर लाइन परमिट (ILP) जारी करने की प्रक्रिया को पूरी तरह से ऑनलाइन कर दिया है। 30 अप्रैल से शुरू हुई इस सुविधा का मुख्य उद्देश्य यात्रा को "परेशानी मुक्त" बनाना और क्षेत्र में पर्यटन को "बढ़ावा" देना है।

उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि ओम पर्वत और इसका निकटवर्ती क्षेत्र एक दोराहे पर खड़ा है। यहाँ दो परस्पर विरोधी स्थितियाँ एक साथ विकसित हो रही हैं:

  • पर्यावरणीय दबाव: जलवायु परिवर्तन के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं, जैसा कि बर्फ के अभूतपूर्व रूप से पिघलने की घटना से प्रमाणित होता है। यह नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है।
  • आर्थिक और विकासात्मक दबाव: पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रशासनिक सुगमता बढ़ाई जा रही है, जिससे इस क्षेत्र में मानवीय गतिविधियों, वाहनों की संख्या और कचरे के उत्पादन में वृद्धि होना निश्चित है।

भविष्य के लिए मुख्य चुनौती इन दोनों परस्पर विरोधी दबावों के बीच संतुलन स्थापित करने की है। नीति निर्माताओं, स्थानीय समुदायों और पर्यटकों के लिए यह विचार करना आवश्यक है कि आर्थिक विकास के लक्ष्यों को पर्यावरण संरक्षण की अनिवार्य आवश्यकता के साथ कैसे जोड़ा जाए। ओम पर्वत पर पिघलती बर्फ एक चेतावनी है कि यदि सतत विकास (Sustainable Development) के मॉडल को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो हम न केवल एक सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत, बल्कि एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को भी स्थायी रूप से खो सकते हैं। इस क्षेत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि पर्यटन का प्रबंधन कितनी जिम्मेदारी से किया जाता है।

 

संदर्भ 

https://tinyurl.com/2xhdpsjy 
https://tinyurl.com/2cnooa82 
https://tinyurl.com/27bjg7kn 
https://tinyurl.com/23h448dm 
https://tinyurl.com/23moylbm 
https://tinyurl.com/2dxgrq82 



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