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पिथौरागढ़ की गोद में बसी हिमालय की ऊँची, बर्फीली ढलानें एक अनोखे और लचकदार जीव का घर है। यह जीव है हिमालयन मारमोट (Himalayan marmot), जिसका वैज्ञानिक नाम मारमोटा हिमालयाना (Marmota himalayana) है। यह महज़ एक बड़ी पहाड़ी गिलहरी नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की अल्पाइन (alpine) पारिस्थितिकी का एक अनिवार्य स्तंभ है। इसका जीवन, इसका समाज और इसका संघर्ष, सब कुछ इन पहाड़ों की लय से जुड़ा हुआ है। जब हम 3,500 से 5,200 मीटर की ऊँचाई पर स्थित इन घास के मैदानों को देखते हैं, तो हम अनजाने में ही मारमोट की दुनिया में प्रवेश कर जाते हैं, एक ऐसी दुनिया जो कठोर मौसम और निरंतर चुनौतियों के बीच भी फलती-फूलती है। इस जीव की कहानी को समझना, असल में हिमालय के उस नाजुक संतुलन को समझना है, जो जीवन को सबसे कठिन परिस्थितियों में भी पनपने का अवसर देता है।
हिमालयन मारमोट का अस्तित्व उसके शारीरिक अनुकूलन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका मज़बूत और गठीला शरीर गिलहरी परिवार में इसे एक विशालकाय सदस्य बनाता है, जिसका वज़न गर्मियों के अंत तक नौ किलोग्राम या उससे भी अधिक हो सकता है। यह अतिरिक्त वज़न महज़ चर्बी नहीं, बल्कि सर्दियों के लंबे और कठिन महीनों के लिए ऊर्जा का भंडार है। प्रकृति ने इसे यहाँ की जमा देने वाली ठंड से बचाने के लिए एक असाधारण तोहफ़ा दिया है, जो है इसका घना, मोटा और ऊनी कोट। यह दोहरी परत वाली खाल हवा की एक परत को अपने भीतर कैद कर लेती है, जो एक प्राकृतिक इन्सुलेटर (insulator) का काम करती है और शरीर की गर्मी को बाहर जाने से रोकती है।
इसका रंग रेतीला-भूरा होता है, जो इसे सूखी घास और चट्टानों के बीच घुल-मिल जाने में मदद करता है, यह एक क़ीमती छलावा है जो इसे हिम तेंदुए और अन्य शिकारियों की नज़रों से बचाता है। इसके मज़बूत और थोड़े मुड़े हुए पंजे सिर्फ़ चलने के लिए नहीं, बल्कि एक कुशल इंजीनियर (engineer) के औज़ार हैं। इन्हीं पंजों से यह कठोर और पथरीली ज़मीन को खोदकर ज़मीन के नीचे मीलों लंबी सुरंगों और रहने के लिए सुरक्षित कक्षों का निर्माण करता है।
मारमोट का जीवन गहरी सामाजिकता पर आधारित है। यह एकांत में नहीं, बल्कि बड़ी-बड़ी कॉलोनियों में रहता है, जहाँ कई परिवार एक साथ मिलकर एक अनुशासित जीवन जीते हैं। ये कॉलोनियाँ (colony) ज़मीन के नीचे खुदे हुए बिलों के एक जटिल नेटवर्क (networke) से जुड़ी होती हैं। यह महज़ एक बिल नहीं, बल्कि एक पूरा भूमिगत शहर होता है, जिसमें सोने के लिए अलग कक्ष, बच्चों को पालने के लिए नर्सरी और आपातकालीन स्थिति में बाहर निकलने के लिए कई गुप्त रास्ते होते हैं। यही इनका किला है, इनकी सुरक्षित पनाहगाह।
इनकी दिनचर्या मौसम के अनुसार चलती है। गर्मियों में, वे सुबह सूरज की पहली किरण के साथ अपने बिलों से बाहर आते हैं और पत्थरों पर बैठकर धूप सेंकते हैं, ताकि उनके शरीर का तापमान सामान्य हो सके। दिन का ज़्यादातर समय वे घास और जड़ी-बूटियाँ खाने और आपस में खेलने में बिताते हैं। लेकिन इस दौरान भी वे हमेशा चौकन्ने रहते हैं। कॉलोनी का कोई न कोई सदस्य हमेशा एक ऊँची चट्टान पर पहरेदारी करता है। खतरा चाहे ज़मीन से आ रहा हो या आसमान से, पहरेदार एक ख़ास तरह की तेज़ सीटी बजाकर पूरी कॉलोनी को सावधान कर देता है। यह सीटी इनकी भाषा है, एक जीवन रक्षक प्रणाली जो पीढ़ियों से चली आ रही है।
जब सर्दियाँ दस्तक देती हैं और पहाड़ बर्फ़ की मोटी चादर ओढ़ लेते हैं, तब मारमोट अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी परीक्षा से गुज़रते हैं। वे छह से आठ महीनों के लिए एक गहरी नींद में चले जाते हैं, जिसे शीतनिद्रा या हाइबरनेशन (hibernation) कहते हैं। इस दौरान उनके दिल की धड़कन और साँस लेने की गति काफ़ी कम हो जाती है, और शरीर का तापमान लगभग बाहरी तापमान के बराबर पहुँच जाता है। वे इस लंबी अवधि में बिना कुछ खाए-पिए, सिर्फ़ गर्मियों में जमा की गई चर्बी के सहारे ज़िंदा रहते हैं।
सतह पर, मारमोट एक साधारण शाकाहारी जीव लग सकता है जो घास और जड़ें खाता है, लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र में इसकी भूमिका कहीं ज़्यादा गहरी है। इसे एक "इकोसिस्टम इंजीनियर" (ecosystem engineer) भी कहा जा सकता है। इसके लगातार बिल खोदने की आदत से मिट्टी में हवा का संचार होता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और घास के मैदान स्वस्थ रहते हैं।
इसके अलावा, यह हिमालय की खाद्य श्रृंखला का एक अनिवार्य हिस्सा है। यह हिम तेंदुए, तिब्बती भेड़िये और बड़े शिकारी पक्षियों जैसे कई दुर्लभ और महत्वपूर्ण शिकारियों के लिए भोजन का मुख्य स्रोत है। मारमोट की आबादी का कम या ज़्यादा होना सीधे तौर पर इन शिकारियों की आबादी को प्रभावित करता है। इस तरह, एक स्वस्थ मारमोट कॉलोनी का मतलब है एक स्वस्थ और संतुलित हिमालयी इकोसिस्टम (Balanced Himalayan Ecosystem)।
सदियों से प्रकृति के साथ संतुलन में रहने वाले इस जीव के लिए आज सबसे बड़ा ख़तरा स्वयं मनुष्य बन गया है। मानवीय गतिविधियाँ इसके शांत जीवन और प्राकृतिक आवास पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव डाल रही हैं।
पिथौरागढ़ के आदि कैलाश (Adi Kailash) और ज्योलिंगकॉन्ग (Jonglingkong) जैसे क्षेत्रों में बढ़ता पर्यटन एक दोधारी तलवार साबित हो रहा है। पर्यटकों को आकर्षित करने वाली मारमोट की मासूमियत ही उनके लिए ख़तरा बन रही है। कई पर्यटक स्नेहवश या मनोरंजन के लिए उन्हें बिस्कुट, चिप्स और अन्य मानव-निर्मित खाद्य पदार्थ खिलाते हैं। यह उनके पाचन तंत्र और स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। इससे उनकी प्राकृतिक भोजन खोजने की आदत ख़त्म हो रही है और वे इंसानों पर निर्भर होते जा रहे हैं, जो उनके दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए घातक है।
अवैध शिकार एक और क्रूर सच्चाई है। इसके मांस और कीमती खाल, जिसका इस्तेमाल पारंपरिक चिकित्सा और सजावट के लिए किया जाता है, के लिए इसका बेरहमी से शिकार होता है। यह न सिर्फ़ ग़ैर-क़ानूनी है, बल्कि यह स्थानीय समुदायों की आस्था पर भी सीधा प्रहार है, जिनमें से कई इन वन्यजीवों को पवित्र मानते हैं और उनके संरक्षण की भावना रखते हैं।
हिमालयन मारमोट की कहानी सिर्फ़ एक जानवर की कहानी नहीं है, यह पहाड़ों के उस नाजुक संतुलन की कहानी है जिसे बनाए रखना अब पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो गया है। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति में हर जीव की एक भूमिका है, चाहे वह कितना भी छोटा या बड़ा क्यों न हो। आज जब हम विकास और पर्यटन की बात करते हैं, तो हमें अपनी ज़िम्मेदारियों को भी समझना होगा।
इस पहाड़ी प्रहरी का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम प्रकृति के प्रति कितने संवेदनशील हैं। ज़िम्मेदाराना पर्यटन को बढ़ावा देना, वन्यजीवों को न खिलाने के नियमों का सख़्ती से पालन करना और अवैध शिकार के ख़िलाफ़ शून्य-सहिष्णुता की नीति अपनाना कुछ ऐसे क़दम हैं जो तत्काल उठाए जाने चाहिए। हिमालयन मारमोट की सीटी सिर्फ़ एक चेतावनी नहीं है, यह मदद के लिए एक पुकार भी है। अगर हम इस पुकार को अनसुना करते हैं, तो हम पिथौरागढ़ की आत्मा का एक अनमोल हिस्सा हमेशा के लिए खो देंगे।
संदर्भ
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