पिथौरागढ़ में हिमालय की धरोहर, हिमालयी तहर को बचाने के लिए क्या प्रयास किए जा सकते हैं?

स्तनधारी
24-10-2025 09:10 AM
पिथौरागढ़ में हिमालय की धरोहर, हिमालयी तहर को बचाने के लिए क्या प्रयास किए जा सकते हैं?

जब हम पिथौरागढ़ की धरती से सिर उठाकर ऊपर देखते हैं, तो हमें पंचाचूली और नंदा देवी जैसी बर्फीली चोटियाँ दिखाई देती हैं। ये पहाड़ सिर्फ पत्थर और बर्फ के ढेर नहीं हैं, बल्कि ये एक पूरी दुनिया को अपनी गोद में समेटे हुए हैं। यहाँ की सर्द हवाओं, सीधी चट्टानों और घने जंगलों के बीच एक ऐसा जीव रहता है जो इन ऊँचाइयों का असली बादशाह है। यह है हिमालयी तहर (himalayan tahr), जिसे हम आम भाषा में पहाड़ी बकरी भी कह देते हैं, लेकिन यह किसी भी आम बकरी से कहीं ज़्यादा मज़बूत, साहसी और ख़ास है। यह हिमालय की आत्मा का एक हिस्सा है, एक ऐसा जीव जो यहाँ की कठोर परिस्थितियों में जीने के लिए ही बना है। लेकिन आज आधुनिक दुनिया की चुनौतियों ने इस पहाड़ी बादशाह के अस्तित्व पर एक सवालिया निशान लगा दिया है। आज इसे 'संकट के करीब' (Near Threatened) प्रजातियों में गिना जाता है, जिसका सीधा सा मतलब है कि अगर हमने ध्यान नहीं दिया, तो वो दिन दूर नहीं जब यह शानदार जीव हमेशा के लिए हमारी नज़रों से ओझल हो जाएगा।

हिमालयी तहर को देखकर ऐसा लगता है मानो कुदरत ने उसे ख़ास तौर पर पहाड़ों पर रहने के लिए ही बनाया है। उसका शरीर भारी और गठीला होता है, जो उसे ताक़त देता है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी ख़ासियत है उसके शरीर पर मौजूद घने बालों का कोट। यह कोई आम कोट नहीं होता, बल्कि इसमें दो परतें होती हैं। अंदर की परत ऊन की तरह मुलायम और बहुत घनी होती है, जो उसे कड़ाके की ठंड में गर्म रखती है। वहीं, बाहर की परत के बाल लंबे और मोटे होते हैं, जो बारिश और बर्फ को शरीर तक पहुँचने से रोकते हैं। मौसम के साथ इस कोट का रंग भी बदलता है, ताकि वह अपने आस-पास के माहौल में आसानी से घुल-मिल सके और शिकारियों की नज़र से बचा रहे।

नर तहर की शान उसके गले और कंधों पर उगने वाली लंबी, घनी अयाल होती है, जो सर्दियों में और भी घनी हो जाती है। यह अयाल न सिर्फ़ उसे ठंड से बचाती है, बल्कि दूसरे नरों के सामने उसकी ताक़त और रुतबे को भी दिखाती है। उसके सिर पर पीछे की ओर मुड़े हुए मज़बूत सींग होते हैं। ये सींग सिर्फ़ आत्मरक्षा के हथियार नहीं हैं, बल्कि ये नर तहर के बीच होने वाली लड़ाइयों में भी काम आते हैं, जहाँ वे अपना दबदबा बनाने के लिए एक-दूसरे से भिड़ते हैं।

लेकिन तहर की सबसे हैरान करने वाली चीज़ हैं उसके पैर और खुर। उसके खुर किसी माहिर पर्वतारोही के सबसे अच्छे जूतों की तरह काम करते हैं। खुर का बाहरी किनारा सख़्त होता है जो चट्टानों पर पकड़ बनाता है, जबकि अंदर का हिस्सा रबर की तरह मुलायम और गद्देदार होता है। यह गद्देदार हिस्सा किसी वैक्यूम कप की तरह चट्टान से चिपक जाता है, जिससे तहर को सीधी से सीधी और चिकनी से चिकनी चट्टानों पर भी दौड़ने और छलाँग लगाने में मदद मिलती है। उसकी नज़रें भी बहुत तेज़ होती हैं, जिससे वह दूर से ही किसी भी ख़तरे को भाँप लेता है।

हिमालयी तहर अकेला रहना पसंद नहीं करता। वह ज़्यादातर झुंड में रहता है, जिसकी मुखिया अक्सर एक अनुभवी मादा होती है। इन झुंडों में मादाएं, उनके बच्चे और जवान नर एक साथ रहते हैं। झुंड में रहकर वे ख़तरों का मिलकर सामना करते हैं और बच्चे अपनी माँ और झुंड के दूसरे सदस्यों से पहाड़ों पर जीने का हुनर सीखते हैं। जो बड़े और ताक़तवर नर होते हैं, वे अक्सर झुंड से अलग, अकेले ही अपनी ज़िंदगी गुज़ारते हैं। ये अकेले घूमने वाले नर अपनी ताक़त और अनुभव से अपना दबदबा बनाते हैं और केवल ख़ास मौसम में ही मादाओं के झुंड के पास आते हैं।

तहर का पूरा दिन एक अनुशासित तरीके से गुज़रता है। वह सुबह-सुबह और शाम के समय ज़्यादा सक्रिय होता है, जब वह ऊँचाई वाले घास के मैदानों, जिन्हें हम 'बुग्याल' कहते हैं, में चरने के लिए निकलता है। दोपहर के समय वह किसी ऊँची चट्टान की छाँव में आराम करता है, ताकि गर्मी और शिकारियों, दोनों से बचा रहे। मौसम के साथ वह अपना घर भी बदलता है। गर्मियों में जब ऊँचाइयों पर बर्फ पिघलती है, तो वह ताज़ी घास चरने के लिए ऊपर चला जाता है, और सर्दियों में जब ऊपर सब कुछ बर्फ से ढक जाता है, तो वह निचले इलाकों की ओर उतर आता है।

जंगल में तहर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। वह सिर्फ़ एक शाकाहारी जानवर नहीं है, बल्कि वह अपने पर्यावरण का एक इंजीनियर है। उसके चरने से घास के मैदान स्वस्थ रहते हैं और किसी एक तरह की घास या पौधे की तादाद बहुत ज़्यादा नहीं बढ़ पाती, जिससे विविधता बनी रहती है। इसके अलावा, वह हिमालय के सबसे बड़े शिकारी, हिम तेंदुए का मुख्य भोजन भी है। अगर तहर की आबादी स्वस्थ है, तो इसका मतलब है कि हिम तेंदुए को भी भोजन मिलेगा और जंगल का पूरा चक्र सही से चलता रहेगा। इस तरह, तहर की सेहत पूरे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की सेहत का पैमाना है।

इतना मज़बूत और महत्वपूर्ण होने के बावजूद, आज तहर का भविष्य कई वजहों से ख़तरे में है। सबसे बड़ा ख़तरा है उसके घर का उजड़ना। ऊँचाई वाले चरागाहों में पालतू भेड़-बकरियों की बढ़ती संख्या ने तहर के लिए भोजन की कमी पैदा कर दी है। पालतू जानवर घास को बहुत ज़्यादा चर लेते हैं, जिससे तहर के लिए कुछ नहीं बचता। सड़कों और बाँधों के बनने से भी उसका घर छोटे-छोटे टुकड़ों में बँट गया है, जिससे उसका घूमना-फिरना मुश्किल हो गया है।

दूसरा बड़ा ख़तरा है अवैध शिकार। आज भी कई इलाकों में इसके मांस के लिए इसका शिकार किया जाता है। चूँकि यह बहुत दूर-दराज़ और मुश्किल इलाकों में रहता है, इसलिए वन विभाग के लिए भी हर जगह नज़र रख पाना बहुत मुश्किल हो जाता है।

इन सबके अलावा, एक नया और बहुत गंभीर ख़तरा है बीमारियों का। जब पालतू जानवर और जंगली जानवर एक ही चरागाह का इस्तेमाल करते हैं, तो पालतू जानवरों की बीमारियाँ जंगली जानवरों तक पहुँच जाती हैं। जंगली जानवरों में इन बीमारियों से लड़ने की क्षमता नहीं होती। हाल ही में, उत्तराखंड वन अनुसंधान संस्थान ने बताया कि नंदा देवी के इलाके में निमोनिया (pneumonia) जैसी एक बीमारी फैलने से एक साथ बहुत सारे तहर मारे गए। यह एक चेतावनी है कि अगर हमने ध्यान नहीं दिया, तो कोई एक बीमारी इनकी पूरी आबादी को तबाह कर सकती है। आख़िर में, जलवायु परिवर्तन भी एक ख़तरा बनकर उभर रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण पहाड़ों पर बर्फ जल्दी पिघल रही है और पेड़-पौधे ज़्यादा ऊँचाई तक उग रहे हैं, जिससे तहर के रहने लायक खुले घास के मैदान सिकुड़ रहे हैं।

इस शानदार जीव को बचाने के लिए हमें एक सोची-समझी रणनीति पर काम करना होगा। सिर्फ़ क़ानून बना देना काफ़ी नहीं है। हमें ज़मीनी स्तर पर काम करने की ज़रूरत है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण हमें पिथौरागढ़ में ही देखने को मिलता है। यहाँ कस्तूरी मृग को बचाने के लिए एक ख़ास प्रजनन केंद्र बनाया गया है। इस केंद्र का मक़सद कस्तूरी मृग की आबादी को बढ़ाना और उनके संरक्षण पर शोध करना है। भले ही यह केंद्र कस्तूरी मृग के लिए है, लेकिन यह हमें एक रास्ता दिखाता है। हमें हिमालयी तहर जैसे दूसरे जीवों के लिए भी इसी तरह के समर्पित संरक्षण कार्यक्रमों की ज़रूरत है, जहाँ वैज्ञानिक उनकी सेहत और आबादी पर नज़र रखें और उनकी संख्या बढ़ाने में मदद करें।

संरक्षण का काम सिर्फ़ वैज्ञानिकों या सरकार का नहीं है। इसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। जो लोग इन पहाड़ों में रहते हैं, वे ही इसके सबसे अच्छे रक्षक बन सकते हैं। अगर स्थानीय लोगों को ईको-टूरिज्म (जैसे तहर देखने के लिए ट्रेकिंग) से जोड़ा जाए, तो उन्हें इसे बचाने के लिए एक आर्थिक प्रोत्साहन मिलेगा।

 

संदर्भ 

https://tinyurl.com/28fxdjnp 
https://tinyurl.com/24ckat3p 
https://tinyurl.com/2b78veww 
https://tinyurl.com/y6few5xh 
https://tinyurl.com/24uwt3jz 



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