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देवभूमि उत्तराखंड, सिर्फ़ बर्फ़ से ढकी चोटियों, पवित्र नदियों और हरे-भरे जंगलों की धरती ही नहीं है। यह धरती सैकड़ों तरह के पंछियों का भी घर है। एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड के 13 ज़िलों में पंछियों की 729 से भी ज़्यादा प्रजातियाँ पाई जाती हैं। सुबह होते ही इन पंछियों का संगीत वादियों में गूँजने लगता है। नीले आसमान में उड़ते बड़े-बड़े बाज़ से लेकर, पेड़ों पर फुदकती नन्ही-नन्ही चिड़ियाँ तक, हर किसी की अपनी एक अलग पहचान और आवाज़ है। यह जैव-विविधता (biodiversity) उत्तराखंड की असली दौलत है।
लेकिन इन सैकड़ों रंग-बिरंगी और अनोखी चिड़ियों के बीच, एक पक्षी ऐसा है जिसकी जगह कोई नहीं ले सकता। वो न तो मोर की तरह रंगीन है और न ही कोयल की तरह कोई खास गायक। वो एक बहुत ही सीधा-सादा, आम सा दिखने वाला पक्षी है, लेकिन उसकी आवाज़ में पहाड़ों का दर्द, उसकी यादें, उसका अकेलापन और उसका दुलार छिपा है। हम बात कर रहे हैं सबकी प्यारी 'घुघूती' की।
कौन है घुघूती?
दुनिया भर के पक्षी विज्ञानी इसे 'स्पॉटेड डव' (Spotted Dove) के नाम से जानते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम 'स्पिलोपेलिया चिनेंसिस' (Spilopelia chinensis) है। यह एक मध्यम आकार का, पतला सा पक्षी है, जो दिखने में कबूतर जैसा लगता है, लेकिन उससे थोड़ा छोटा होता है। इसका रंग हल्का गुलाबी-भूरा होता है और इसकी सबसे बड़ी पहचान इसकी गर्दन के पिछले हिस्से पर बना काले और सफ़ेद धब्बों का एक चौखाना (checkerboard) जैसा पैटर्न है। यह देखने में ऐसा लगता है मानो इसने कोई डिज़ाइनर (designer) गुलूबंद पहना हो। इसकी आँखें और पैर हल्के लाल या गुलाबी रंग के होते हैं, जो इसे और भी सौम्य बनाते हैं।
इसका स्वभाव भी इसके रूप जैसा ही शांत और सीधा है। यह ज़्यादातर ज़मीन पर ही घूमते-फिरते, जोड़े में या छोटे-छोटे झुंडों में दाना चुगता हुआ मिल जाएगा। इसे इंसानों की बस्ती के आस-पास, खेतों में, बगीचों में और हल्के-फुल्के जंगलों में रहना पसंद है। इसका भोजन भी बहुत सादा है - अनाज के दाने, घास के बीज और ज़मीन पर गिरे हुए दूसरे छोटे-छोटे फल। जब इसे कोई ख़तरा महसूस होता है, तो यह ज़ोर से अपने पंख फड़फड़ाता हुआ सीधी उड़ान भरता है।
लेकिन घुघूती की असली पहचान है उसकी आवाज़। एक धीमी, गहरी और थोड़ी उदास सी 'घुर-घुर-घूर' या 'कू-क्रू-कू' की ध्वनि। यह आवाज़ जब शांत दोपहर में किसी गाँव के ऊपर गूँजती है, तो वक़्त मानो ठहर सा जाता है। यह आवाज़ सिर्फ़ एक पक्षी की बोली नहीं, यह पहाड़ों के जीवन का एक अभिन्न अंग है।
घुघूती की यह 'घुर-घुर' की आवाज़ पहाड़ों में रहने वाले लोगों के लिए एक सामान्य, रोज़मर्रा की ध्वनि है। लेकिन यही आवाज़ जब किसी 'प्रवासी' के कानों में पड़ती है, तो इसका मतलब पूरी तरह से बदल जाता है। उत्तराखंड के हज़ारों नौजवान आज रोज़गार और बेहतर भविष्य के लिए अपने गाँव, अपने घर-परिवार को छोड़कर दिल्ली, मुंबई, देहरादून या विदेश के किसी बड़े शहर में रह रहे हैं। वहाँ की भागदौड़ भरी, मशीनी ज़िंदगी में जब कभी अचानक उन्हें किसी पार्क में या किसी तार पर बैठी घुघूती की वही जानी-पहचानी आवाज़ सुनाई देती है, तो एक पल में पूरा पहाड़ उनकी आँखों के सामने आ जाता है।
उन्हें अपना गाँव, अपना कच्चा-पक्का घर, माँ के हाथ का बना खाना, दोस्तों के साथ की गई मस्ती और पहाड़ों की वो ठंडी, ताज़ी हवा, सब कुछ याद आने लगता है। घुघूती की आवाज़ उनके लिए एक 'टाइम मशीन' (time machine) बन जाती है, जो उन्हें उनके बचपन में ले जाती है। शायद इसीलिए उत्तराखंड के लोकगीतों और लोककथाओं में घुघूती को यादों और संदेशों का प्रतीक माना गया है।
"घुघूती बासूती" वाली कहावत इसी भावना से जन्मी है। ऐसा माना जाता है कि जब कोई विवाहित लड़की अपने ससुराल चली जाती है, तो उसकी माँ उसे बहुत याद करती है। वह घुघूती को देखकर कहती है, "हे घुघूती, तू बस सुनती रह, शायद मेरी बेटी को मेरा संदेशा पहुँच जाए।" यह आवाज़ एक माँ की अपनी बेटी के लिए तड़प और एक प्रवासी की अपने घर के लिए कसक का प्रतीक है। यह एक ऐसी पुकार है जो शब्दों में नहीं, बल्कि एक गहरी भावना में लिपटी हुई है।
घुघूती का महत्व सिर्फ़ यादों और गीतों तक ही सीमित नहीं है, यह हमारे सबसे ख़ास त्योहारों में से एक का केंद्र बिंदु भी है। कुमाऊँ क्षेत्र में मकर संक्रांतिके दिन मनाया जाने वाला 'घुघुतिया त्यार' (जिसे 'काले कौवा' त्योहार भी कहते हैं) पूरी तरह से इसी पक्षी को समर्पित है।
यह त्योहार तब मनाया जाता है जब सर्दियों का सबसे कठोर महीना 'पूस' खत्म होता है और सूर्य 'उत्तरायण' में प्रवेश करता है, यानी दिन बड़े और गर्म होने लगते हैं। यह एक तरह से नई शुरुआत का उत्सव है। त्योहार से एक दिन पहले शाम को घरों में तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। गेहूँ के आटे और गुड़ (या चीनी) को मिलाकर एक मीठा आटा गूँथा जाता है। फिर पूरा परिवार, ख़ासकर बच्चे, मिलकर इस आटे से अलग-अलग आकृतियाँ बनाते हैं।
इन आकृतियों का भी अपना मतलब होता है। घुघुत (पक्षी का प्रतीक), डमरू (भगवान शिव का प्रतीक), तलवार और ढाल (वीरता का प्रतीक), दाड़िम का फूल (समृद्धि का प्रतीक) और खजूर जैसे कई आकार बनाए जाते हैं। इन सबको बनाने के बाद इन्हें तेल में तला जाता है। फिर इन्हें एक धागे में पिरोकर एक सुंदर माला तैयार की जाती है, जिसके बीच में अक्सर एक संतरा या बिस्कुट भी लगाया जाता है।
त्योहार की सुबह बच्चे जल्दी उठकर, नहा-धोकर इन मालाओं को बड़े चाव से अपने गले में पहनते हैं। फिर वे अपने घरों की छतों या आँगन में जाकर कौवों और घुघूती को ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगाते हैं। वे एक पारंपरिक गीत गाते हैं, जो कुछ इस तरह है:
"काले कौवा काले, घुघुती माला खाले।" (ऐ काले कौवे, आओ और यह घुघूती की माला खा लो।)
"ले कौवा बड़, मैंके दे सुनक घड़।" (यह 'बड़ा' (एक पकवान) ले लो और मुझे सोने का घड़ा दो।)
"ले कौवा ढाल, मैंके दे सुनक थाल।" (यह ढाल ले लो और मुझे सोने की थाली दो।)
बच्चे अपनी माला से एक-एक घुघुत तोड़कर कौवों के लिए फेंकते हैं। यह सिर्फ़ एक रस्म नहीं है। इसके पीछे एक गहरा संदेश छिपा है। कौवों और दूसरे पक्षियों को बुलाकर भोजन कराना प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व (co-existence) की भावना को दर्शाता है। यह बच्चों को सिखाता है कि ये जीव-जंतु हमारे दुश्मन नहीं, बल्कि हमारे ईको-सिस्टम का एक ज़रूरी हिस्सा हैं और हमें उनके साथ मिल-बाँटकर रहना चाहिए। यह त्योहार इंसानों और प्रकृति के बीच के खूबसूरत रिश्ते का जश्न है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/24ygkb5e
https://tinyurl.com/2yaluugr
https://tinyurl.com/2d2j6gtz
https://tinyurl.com/2yg2hu6v
https://tinyurl.com/24jap9nd
https://tinyurl.com/2ymdcebu