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जब हम पिथौरागढ़ या उत्तराखंड के पहाड़ों के बारे में सोचते हैं, तो हमारी आँखों के सामने घने जंगलों, लाल-लाल बुरांश (Rhododendron) के फूलों से लदे पेड़ों और सेब के बगीचों की तस्वीरें आ जाती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन जंगलों को हरा-भरा, फूलों को खिला हुआ और हमारी सेब की पेटियों को भरा हुआ रखने के पीछे किसका हाथ है? हम शायद बागबान या किसान को श्रेय देंगे, लेकिन एक गुमनाम हीरो, एक नन्हा सा दोस्त है जो चुपचाप यह सारा काम करता है। यह दोस्त है हिमालय का खास भौंरा, जिसे हम कभी-कभी भुनभुना भी कहते हैं।
यह कोई साधारण मक्खी या कीड़ा नहीं है। यह पहाड़ों की अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की एक मुख्य कड़ी है। आज हम इसी मेहनती दोस्त, यानी हिमालयन बम्बलबी (Himalayan Bumblebee) की कहानी जानेंगे, जो खतरे में है और हमसे मदद की गुहार लगा रहा है।
कौन है यह हिमालयन भौंरा?
अक्सर लोग इसे शहद वाली मधुमक्खी समझ लेते हैं, लेकिन यह उससे काफी अलग है। यह आकार में थोड़ा बड़ा, ज़्यादा बालों वाला (furry) और गोल-मटोल सा होता है। इसके शरीर पर पीले, काले या कभी-कभी नारंगी रंग की धारियाँ होती हैं, जो इसे एक छोटे, उड़ने वाले मुलायम खिलौने जैसा बनाती हैं। इसका भुनभुनाने का अंदाज़ भी सबसे जुदा है। भारत के हिमालयी क्षेत्र में इन भौंरों की 40 से भी ज़्यादा प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से बॉम्बस हीमोरॉयडेलिस (Bombus haemorrhoidalis) सबसे आम है।
इनकी सबसे बड़ी खासियत ठंडे मौसम में काम करने की इनकी क्षमता है। जहाँ ज़्यादातर मधुमक्खियाँ ठंड में काम नहीं कर पातीं, वहीं यह बालों वाला मोटा कोट पहने हमारा भौंरा कम तापमान में भी फूलों का रस चूसने निकल पड़ता है। यही वजह है कि यह ऊँचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों के लिए एक विशेषज्ञ परागणक (specialist pollinator) है।
इसकी एक और अनोखी शक्ति है "बज़ पॉलिनेशन" (Buzz Pollination)। कुछ पौधों के फूल, जैसे टमाटर और बुरांश (Rhododendron), अपना पराग (pollen) आसानी से नहीं छोड़ते। यह भौंरा फूल पर बैठकर अपने पंखों को नहीं, बल्कि अपनी छाती की मांसपेशियों को बहुत तेज़ी से कंपकंपाता (vibrate) है, जिससे एक खास तरह की भुनभुनाहट पैदा होती है। इस कंपन से फूल का पराग कण झर जाता है और भौंरे के रोयेंदार शरीर पर चिपक जाता है। यह एक ऐसी कला है जो बहुत कम कीड़ों के पास है, और यही कला इसे हिमालय का सबसे महत्वपूर्ण परागणक बनाती है।
पहाड़ों का 'साइलेंट फार्मर': क्यों ज़रूरी है भौंरा?
परागण (Pollination) वह प्रक्रिया है जिसमें कीड़े-मकौड़े पराग कणों को एक फूल से दूसरे फूल तक पहुँचाते हैं, जिससे फूलों से फल और बीज बनते हैं। अगर यह प्रक्रिया न हो, तो ज़्यादातर पौधे फल और बीज पैदा करना बंद कर देंगे। यह भौंरा हमारे पहाड़ों का एक 'साइलेंट फार्मर' यानी 'मूक किसान' है, जो बिना किसी स्वार्थ के यह काम करता है।
1. हमारी खेती और बागवानी का आधार: पिथौरागढ़ और पूरे उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था काफी हद तक बागवानी पर निर्भर है। सेब, नाशपाती, खुबानी, बादाम, आड़ू और कीवी जैसे बेशकीमती फलों की पैदावार सीधे तौर पर इन भौंरों के परागण पर निर्भर करती है। जब एक भौंरा एक सेब के फूल पर बैठकर उसका रस चूसता है और फिर दूसरे फूल पर जाता है, तो वह अनजाने में ही हमारी फसल की पैदावार सुनिश्चित कर रहा होता है। कम भौंरों का मतलब है कम परागण, और कम परागण का सीधा मतलब है फलों का कम उत्पादन और किसानों की आय में कमी।
2. जंगली फूलों और जंगलों का रक्षक: यह सिर्फ़ हमारी फसलों के लिए ही काम नहीं करता। हिमालय के सुंदर घास के मैदान, जिन्हें 'बुग्याल' कहते हैं, और हमारे जंगल तरह-तरह के जंगली फूलों से भरे हैं। बुरांश, जंगली गुलाब, अफीम और न जाने कितने ही देशी पौधे अपने अस्तित्व के लिए इन्हीं भौंरों पर निर्भर हैं। यह भौंरा इन फूलों में परागण करके यह सुनिश्चित करता है कि जंगल में बीज बनें, नए पौधे उगें और हमारा पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ और संतुलित बना रहे।
यह बहुत ही चिंता की बात है कि जो भौंरा हमारे पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए इतना ज़रूरी है, आज उसका अस्तित्व ही संकट में है। हाल के वैज्ञानिक शोध और अध्ययन एक बहुत ही खतरनाक तस्वीर पेश कर रहे हैं। इसके मुख्य कारण हैं:
1. बदलता मौसम और जलवायु परिवर्तन (Climate Change): नेचर (Nature) मैगज़ीन (megazine) में छपे एक ताज़ा शोध के अनुसार, हिमालय में तापमान बढ़ने की वजह से ये भौंरे ठंडे इलाकों की तरफ, यानी और ज़्यादा ऊँचाई पर खिसक रहे हैं। समस्या यह है कि जिन फूलों पर ये निर्भर हैं, ज़रूरी नहीं कि वो भी उतनी ही तेज़ी से ऊँचाई पर उग पाएँ। इस 'बेमेल' (mismatch) की वजह से भौंरों को न तो सही समय पर खाना मिल पा रहा है और न ही पौधों को परागणक, जिससे दोनों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।
2. खेती में ज़हरीले कीटनाशकों का इस्तेमाल: अच्छी फसल के लालच में हम खेतों में जिन रासायनिक कीटनाशकों (pesticides) का छिड़काव करते हैं, वे इन भौंरों के लिए ज़हर का काम करते हैं। ये रसायन या तो इन्हें सीधे मार देते हैं या फिर इनके दिमाग पर असर करते हैं, जिससे ये रास्ता भटक जाते हैं और अपने छत्ते तक वापस नहीं पहुँच पाते।
3. उजड़ते हुए घर और सिमटते जंगल (Habitat Loss): सड़कों, होटलों और इमारतों के निर्माण के लिए हम लगातार जंगल और घास के मैदानों को काट रहे हैं। यह प्राकृतिक आवास ही इन भौंरों के घर और भोजन का स्रोत हैं। जब फूल ही नहीं बचेंगे, तो यह नन्हा दोस्त कहाँ जाएगा?
4. बाहरी प्रजातियों का हमला: कभी-कभी बाहर से लाई गई आक्रामक (invasive) पौधों की प्रजातियाँ स्थानीय फूलों को खत्म कर देती हैं, जिससे भौंरों का भोजन स्रोत छिन जाता है।
यह सिर्फ एक कीड़े को बचाने की बात नहीं है; यह हमारे अपने भविष्य, हमारी खेती और हिमालय की खूबसूरती को बचाने की लड़ाई है। अगर हमने समय रहते कुछ नहीं किया, तो शायद आने वाले समय में हमारे सेब के बागान बिना फलों के रह जाएँ और बुरांश के जंगल अपनी लालिमा खो दें।
एक आम नागरिक और किसान के तौर पर हम भी मदद कर सकते हैं:
जैविक खेती को अपनाएँ: रासायनिक कीटनाशकों की जगह जैविक तरीकों का इस्तेमाल करें।
देशी फूल लगाएँ: अपने खेतों के किनारों पर और बगीचों में ऐसे स्थानीय फूल लगाएँ जो इन भौंरों को आकर्षित करते हैं।
प्राकृतिक आवास बचाएँ: घास के मैदानों और जंगली इलाकों को नष्ट होने से बचाएँ।
जागरूकता फैलाएँ: अपने आस-पास के लोगों को इन नन्हे दोस्तों के महत्व के बारे में बताएँ।
यह भुनभुनाता हुआ भौंरा हमसे कुछ माँग नहीं रहा, बल्कि अपनी धीमी होती भुनभुनाहट में हमारे ही भविष्य को बचाने की गुहार लगा रहा है। इसकी आवाज़ को अनसुना करना, उस डाल को काटने जैसा होगा जिस पर हम खुद बैठे हैं।
संदर्भ
https://tinyurl.com/28tus3v6
https://tinyurl.com/23hd7zxd
https://tinyurl.com/24cw7277
https://tinyurl.com/22rf8yg3
https://tinyurl.com/28ey2srn