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पिथौरागढ़ की बात जब भी होती है, तो हमारे ज़हन में ऊँचे पहाड़, घने जंगल और खूबसूरत वादियाँ आती हैं। लेकिन इस खूबसूरती के बीच एक और दुनिया बसती है, जो अक्सर हमारी नज़रों से छिपी रहती है या जिसे देखकर हम डर जाते हैं। यह दुनिया है सरीसृपों (Reptiles) की, यानी रेंगने वाले जीवों की। हाल ही में जब गंगोलीहाट इलाके में लगभग 9 फुट लंबे किंग कोबरा के दिखने की खबर आई, तो ज़ाहिर है कि लोगों में एक डर और कौतूहल का माहौल बन गया। किंग कोबरा जैसे विशाल और ज़हरीले साँप बेशक ध्यान खींचते हैं, लेकिन क्या साँपों और सरीसृपों की दुनिया सिर्फ़ यहीं तक सीमित है?
जवाब है, नहीं। हमारे ही पैरों के नीचे, पत्तों के ढेर में और पत्थरों के दरारों में एक ऐसी रहस्यमयी दुनिया है, जिसमें कई छोटे, शर्मीले और बेहद ज़रूरी जीव रहते हैं। आज हम डर से परे जाकर इसी छिपी हुई दुनिया को जानेंगे और पिथौरागढ़ के एक ऐसे ही गुमनाम निवासी से मिलेंगे, जो हमारा दुश्मन नहीं, बल्कि दोस्त है।
कौन होते हैं सरीसृप?
इससे पहले कि हम अपने खास दोस्त से मिलें, यह जानना ज़रूरी है कि सरीसृप आखिर होते क्या हैं। ये धरती के सबसे पुराने जीव समूहों में से एक हैं। डायनासोर के ज़माने से ये जीव धरती पर मौजूद हैं और खुद को हर माहौल में ढालने में माहिर हैं।
इनकी सबसे बड़ी पहचान है इनकी त्वचा, जिस पर शल्क (Scales) होते हैं। यह सूखी और खुरदरी त्वचा इन्हें पानी के नुकसान से बचाती है। दूसरी खास बात यह है कि ये 'शीतरक्ती' (Cold-blooded) होते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि इनका खून ठंडा होता है, बल्कि यह कि इनके शरीर में अपना तापमान नियंत्रित करने की क्षमता नहीं होती। ये अपनी ऊर्जा और गर्मी के लिए बाहरी स्रोतों, जैसे सूरज की रोशनी पर निर्भर रहते हैं। यही वजह है कि आपने अक्सर साँपों और छिपकलियों को धूप सेंकते हुए देखा होगा। ये जीव आमतौर पर ज़मीन पर अंडे देते हैं और इनकी कई प्रजातियाँ आज भी धरती के हर कोने में मौजूद हैं।
अब बात करते हैं उस साँप की, जो शायद आपके खेतों या बगीचे में रहता हो, लेकिन आपने उस पर कभी ध्यान न दिया हो। इसका नाम है 'ओलिव ओरिएंटल स्लेंडर स्नेक' (Olive Oriental Slender Snake)। इसका वैज्ञानिक नाम है 'ट्रैकिशियम लेव' (Trachischium laeve)। यह हमारे विशाल किंग कोबरा से बिल्कुल उलट है।
1. कैसा दिखता है?: यह एक बहुत ही छोटा और पतला-दुबला साँप है, जिसकी लंबाई अक्सर एक फुट से भी कम होती है। इसका शरीर जैतूनी-भूरे (Olive-brown) या काले रंग का होता है और इस पर कोई खास डिज़ाइन नहीं होता। लेकिन इसकी पहचान है इसका निचला हिस्सा, यानी इसका पेट, जो चमकीले पीले या जैतूनी-पीले रंग का होता है। इसकी त्वचा चिकनी और चमकदार होती है। सबसे ज़रूरी बात, यह साँप पूरी तरह से गैर-विषैला (Non-venomous) होता है। इससे इंसानों को कोई खतरा नहीं है।
2. कहाँ रहता है और क्या खाता है?: यह एक बेहद शर्मीला साँप है। यह खुले में घूमना पसंद नहीं करता। इसका पसंदीदा ठिकाना है नम मिट्टी, पत्थरों के नीचे, गिरे हुए सड़े-गले पेड़ों के लट्ठों में या पत्तों के ढेर के अंदर। यह वहीं रहता है जहाँ इसे अपना पसंदीदा भोजन मिलता है। इसका भोजन हैं केंचुए (Earthworms), घोंघे (Slugs) और दूसरे छोटे, नरम कीड़े। इस लिहाज़ से यह किसानों का दोस्त है, जो ज़मीन को नुकसान पहुँचाने वाले कुछ कीड़ों को खाकर मिट्टी को स्वस्थ रखने में मदद करता है।
जब हम किसी जीव के बारे में सुनते हैं, तो यह सवाल ज़रूर उठता है कि क्या उसकी आबादी सुरक्षित है। दुनिया भर में जीवों की संरक्षण स्थिति का आकलन करने वाली सबसे बड़ी संस्था IUCN (International Union for Conservation of Nature) है। IUCN की रेड लिस्ट (red list) के अनुसार, 'ओलिव ओरिएंटल स्लेंडर स्नेक' (Olive Oriental Cylinder Snake) को "लीस्ट कंसर्न" (Least Concern) यानी "कम चिंताजनक" श्रेणी में रखा गया है।
यह एक अच्छी खबर है। इसका कारण यह है कि यह साँप हिमालय के एक बहुत बड़े इलाके में पाया जाता है, भारत से लेकर नेपाल और भूटान तक। माना जाता है कि इसकी आबादी काफी स्थिर है और फिलहाल इस पर कोई बहुत बड़ा, व्यापक खतरा नहीं है। हालांकि, यह याद रखना ज़रूरी है कि स्थानीय स्तर पर जंगलों की कटाई और इसके प्राकृतिक आवास (Habitat) का विनाश इसे नुकसान पहुँचा सकता है।
भले ही हमारा यह छोटा दोस्त खतरे से बाहर हो, लेकिन उत्तराखंड के सरीसृपों की दुनिया रहस्यों का एक खज़ाना है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हाल ही में देखने को मिला, जब शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड में एक दुर्लभ साँप, 'हिमालयन वर्म स्नेक' (Himalayan Worm Snake)(Trachischium apteii) को कई दशकों बाद फिर से खोज निकाला। इस साँप को बहुत लंबे समय से देखा नहीं गया था और इसके बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध थी।
इस तरह की खोजें हमें बताती हैं कि हिमालय की गोद में आज भी न जाने कितने ऐसे जीव छिपे हुए हैं, जिनके बारे में विज्ञान को भी पूरी जानकारी नहीं है। यह दिखाता है कि पिथौरागढ़ और पूरा उत्तराखंड सरीसृप विज्ञान (Herpetology) के लिए कितना महत्वपूर्ण है। वन विभाग और शोधकर्ताओं के प्रयास हमें इन छिपे हुए रत्नों को जानने का मौका देते हैं।
संदर्भ
https://tinyurl.com/28czrgrr
https://tinyurl.com/25nbylax
https://tinyurl.com/2bnnzrlc
https://tinyurl.com/279xlb8f
https://tinyurl.com/27hvvs2j
https://tinyurl.com/26ltrraf
https://tinyurl.com/pzrhqfu