पिथौरागढ़ के प्राकृतिक परिवेश के बारे में बहुत कुछ बताते हैं, एमोलॉप्स जौनसारी जैसे उभयचर

मछलियाँ और उभयचर
24-10-2025 09:10 AM
पिथौरागढ़ के प्राकृतिक परिवेश के बारे में बहुत कुछ बताते हैं, एमोलॉप्स जौनसारी जैसे उभयचर

पिथौरागढ़ की पहचान सिर्फ़ इसके पहाड़ और जंगल ही नहीं, बल्कि यहाँ बहने वाली नदियाँ और कल-कल करते झरने भी हैं। काली, सरयू, रामगंगा और अनगिनत छोटे-बड़े गाड़-गदेरे (स्थानीय जलधाराएं) इस इलाके की जीवनरेखा हैं। ये सिर्फ़ हमें पीने का पानी और खेतों के लिए सिंचाई ही नहीं देते, बल्कि अपने ठंडे, साफ पानी में एक पूरी दुनिया को समेटे हुए हैं। यह दुनिया है मछलियों और उभयचरों (Amphibians) की।

उभयचर यानी ऐसे जीव जो 'दो ज़िंदगियाँ' जीते हैं। इनका जीवन पानी में शुरू होता है और वयस्क होने पर ये ज़मीन पर भी रहने लगते हैं। ये सरीसृपों (Reptiles) से अलग होते हैं क्योंकि इनकी त्वचा सरीसृपों की तरह सूखी और शल्कों वाली नहीं, बल्कि मुलायम और नम होती है। आज हम पिथौरागढ़ की तेज़ बहती धाराओं में रहने वाले एक ऐसे ही माहिर खिलाड़ी से मिलेंगे, जो प्रकृति के इंजीनियरिंग (engineering) का एक अद्भुत नमूना है।

कौन होते हैं उभयचर? 
उभयचरों की दुनिया का सबसे बड़ा जादू है उनका जीवन चक्र, जिसे कायापलट (metamorphose) कहते हैं। मेंढक इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। यह पानी में दिए गए अंडों से अपनी ज़िंदगी की शुरुआत करता है। अंडों से मछली जैसा दिखने वाला लार्वा (larva) निकलता है, जिसे हम टैडपोल (Tadpole) कहते हैं। यह टैडपोल पूरी तरह से पानी में रहता है और गलफड़ों (gills) से साँस लेता है। धीरे-धीरे इसके पैर निकलते हैं, पूँछ गायब हो जाती है और गलफड़ों की जगह फेफड़े विकसित हो जाते हैं। कुछ समय बाद यह एक वयस्क मेंढक बनकर पानी से बाहर, ज़मीन पर आ जाता है।

इनकी मुलायम और नम त्वचा सिर्फ़ दिखावे के लिए नहीं होती, वे इससे साँस भी लेते हैं! यही वजह है कि उभयचर पानी की गुणवत्ता को लेकर बहुत संवेदनशील होते हैं। अगर पानी में ज़रा भी प्रदूषण या ज़हरीले रसायन घुल जाएँ, तो इन पर सबसे पहले और सबसे बुरा असर पड़ता है। इसीलिए इन्हें "पर्यावरण का संकेतक" (Indicator of environmental health) भी कहा जाता है। अगर किसी नदी या झरने में मेंढक और दूसरे उभयचर अच्छी संख्या में मौजूद हैं, तो यह इस बात का संकेत है कि वह जल स्रोत स्वस्थ और साफ है।

अब बात करते हैं पिथौरागढ़ की तेज़ धार वाली नदियों के उस माहिर खिलाड़ी की, जो किसी तूफानी नदी में भी अपनी पकड़ बनाए रखता है। इसका नाम है 'जौनसार स्ट्रीम फ्रॉग' (Jaunsar Stream Frog) और इसका वैज्ञानिक नाम है 'एमोलॉप्स जौनसारी' (Amolops jaunsari)।

यह मेंढक आपको शांत तालाबों या रुके हुए पानी में नहीं मिलेगा। इसका घर हैं पहाड़ों के वे झरने और गदेरे, जिनका पानी बहुत तेज़ बहता है और पत्थरों से टकराकर शोर करता है। ऐसी जगह जहाँ ज़रा सी चूक आपको बहा ले जा सकती है, यह मेंढक वहाँ आराम से रहता है। सवाल यह उठता है कि यह तेज़ बहाव और चिकने, काई लगे पत्थरों पर अपनी पकड़ कैसे बनाता है? इसका राज़ छिपा है इसके पंजों में। प्रकृति ने इसे एक अनोखा उपहार दिया है - इसके पंजों की उंगलियों के सिरों पर बड़ी और विकसित गद्दियाँ होती हैं, जिन्हें 'टो पैड' (toe pads) कहते हैं। ये पैड गीले और फिसलन भरे पत्थरों पर 'सक्शन कप' (suction cup) की तरह चिपक जाते हैं। यह पकड़ इतनी मज़बूत होती है कि पानी का तेज़ बहाव भी इसे हिला नहीं पाता। अपनी इसी खूबी के कारण यह किसी जिम्नास्ट की तरह एक पत्थर से दूसरे पत्थर पर आसानी से छलाँग लगा लेता है।

कैसा दिखता है और क्या खाता है?
इसका रंग हरा-भूरा होता है और इस पर धब्बे होते हैं, जो इसे पानी वाले पत्थरों के बीच छिपने (camouflage) में मदद करते हैं। यह धाराओं के पास मिलने वाले कीड़े-मकौड़ों को खाकर अपना जीवन चलाता है। जौनसार स्ट्रीम फ्रॉग जैसे विशेष जीव बहुत नाज़ुक होते हैं। इन पर लगातार खतरा मंडरा रहा है। इनके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं:

प्रदूषण (Pollution): जैसा कि हमने जाना, इनकी त्वचा बहुत संवेदनशील होती है। खेतों से बहकर आने वाले कीटनाशक (pesticides) और घरों से निकलने वाला गंदा पानी जब नदियों में मिलता है, तो इनके लिए जानलेवा साबित होता है।

घर का विनाश (Habitat Degradation): नदियों के किनारे सड़क निर्माण, बांध बनाना या अवैध खनन जैसी गतिविधियों से धाराओं का प्राकृतिक बहाव बदल जाता है। इससे इन मेंढकों का विशेष आवास नष्ट हो जाता है, जिससे इनकी आबादी कम हो रही है।

जलवायु परिवर्तन (Climate Change): बदलता मौसम और अनियमित बारिश भी इन धाराओं के तापमान और पानी के स्तर को प्रभावित करती है, जो इन जैसे जीवों के जीवन चक्र के लिए खतरनाक है।

जौनसार स्ट्रीम फ्रॉग पिथौरागढ़ की जलीय दुनिया का अकेला निवासी नहीं है। आई-नेचुरलिस्ट (iNaturalist) जैसे नागरिक विज्ञान प्लेटफॉर्म पर मौजूद पिथौरागढ़ की चेक-लिस्ट को देखें तो पता चलता है कि यहाँ उभयचरों और मछलियों की कई और प्रजातियाँ भी मौजूद हैं। विभिन्न प्रकार के दूसरे मेंढक, टोड (toad) और सैलामैंडर (salamander) यहाँ के नम जंगलों और धाराओं में रहते हैं।

इसके अलावा, यहाँ की नदियों में असेला जैसी स्थानीय मछलियों के साथ-साथ अन्य कई प्रकार की मछलियाँ भी पाई जाती हैं, जो ठंडे और तेज़ बहते पानी के लिए अनुकूलित हैं। ये सभी जीव मिलकर एक जटिल जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (aquatic ecosystem) बनाते हैं, जहाँ हर जीव की अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। 

 

संदर्भ 

https://tinyurl.com/3b5nnunn
https://tinyurl.com/a8aw2dbj
https://tinyurl.com/5ecmb6sj
https://tinyurl.com/nkc72u67
https://tinyurl.com/2vp9abyn
https://tinyurl.com/yc622n8s



Recent Posts
{}