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उत्तर प्रदेश का सहारनपुर ज़िला, जो आज पूरी दुनिया में अपनी शीशम की लकड़ी पर की गई बारीक नक्काशी के लिए जाना जाता है, अपने भीतर एक और खामोश लेकिन बेहद रंगीन इतिहास समेटे हुए है। 1340 के आसपास सूफी संत शाह हारून चिश्ती के नाम पर बसाया गया यह शहर, ऊपरी गंगा-यमुना दोआब के उपजाऊ मैदानी इलाके में स्थित है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि सहारनपुर में लकड़ी के काम, कागज़ बनाने और रेलवे वर्कशॉप के साथ-साथ सूती कपड़ों का व्यापार और रंगाई का काम हमेशा से अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है। आज जब हम सहारनपुर के वस्त्र उद्योग को देखते हैं, तो यह अचानक से रातों-रात खड़ा हुआ ढांचा नहीं लगता, बल्कि यह सदियों पुरानी उस विरासत का हिस्सा है, जिसे यहाँ के स्थानीय कारीगरों ने अपने हाथों से सींचा है। सूती कपड़ों को तैयार करना, उन्हें बुनना और उन पर प्राकृतिक रंग चढ़ाना इस क्षेत्र के प्रमुख व्यवसायों में से एक रहा है।
चाह रंगरेज़ और नीलगर मस्जिद की गलियों में आज भी कौन सी विरासत ज़िंदा है?
सहारनपुर के पुराने शहर में आज भी कुछ ऐसे मोहल्ले और गलियां हैं, जिनके नाम चीख-चीख कर उनके सुनहरे अतीत की गवाही देते हैं। 'चाह रंगरेज़' और 'चाह नीलग्रान' जैसी गलियां, जो आज भी हलवाई हट्टा और नीलगर मस्जिद के पास व्यावसायिक पतों के रूप में दर्ज हैं, सीधे तौर पर उन रंगरेज़ और नीलगर समुदायों से अपना नाम पाती हैं जो कभी इन गलियों में कपड़ों को भिगोने और रंगने का काम करते थे। इंडियामार्ट (IndiaMART) जैसी वेबसाइटों पर रेडीमेड कपड़ों के व्यापार के लिए आज भी इन पतों का उपयोग किया जाता है, जो यह साबित करता है कि रंगरेज़ समुदाय के नाम पर रखी गई इन गलियों ने अपनी पहचान को आधुनिक युग में भी जीवित रखा है।

रंगाई की यह कला कोई सामान्य काम नहीं था, बल्कि यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होने वाला एक पुश्तैनी कौशल था। साल 1863 में शेफर्ड (Shepherd) और रॉबर्टसन (Robertson) द्वारा ली गई दिल्ली के रंगरेज़ों की एक तस्वीर और जॉन फोर्ब्स वॉटसन (John Forbes Watson) के दस्तावेजों से पता चलता है कि रंगरेज़ों के पास रंगों को मिलाने, निकालने और फिक्स करने के अपने गुप्त तरीके थे। कपड़ों को रंगने के लिए बड़े बर्तन, कपड़े को छानने के लिए लकड़ी के ढांचे और रंगाई के बाद कपड़े को दबाने के लिए साधारण प्रेसों का इस्तेमाल होता था। हल्दी, मजीठ, कुसुम और नील जैसे प्राकृतिक उत्पादों से तैयार किए गए लाल, गुलाबी, बैंगनी, पीले और हरे रंग इतने पक्के होते थे कि वे भारत की चिलचिलाती धूप और रोज़मर्रा की धुलाई के बाद भी फीके नहीं पड़ते थे।

लालगर, नीलगर और छीपी समुदाय ने सहारनपुर के वस्त्र उद्योग को कैसे संवारा?
उत्तर भारत में रंगाई का काम मुख्य रूप से जातियों और उप-जातियों के आधार पर बंटा हुआ था। अगर हम विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और सहारनपुर की बात करें, तो यहाँ का रंगरेज़ समुदाय मुख्य रूप से तीन उप-समूहों में विभाजित था: लालगर, नीलगर और छीपी। इन समूहों का यह विभाजन सीधे तौर पर उनके पेशे और उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले रंगों पर आधारित था।
रंगरेज़, जिन्हें अक्सर मुल्तानी शेख या लिलारी भी कहा जाता था, कपड़े को लगभग हर देशज रंग में रंगने में माहिर थे। दूसरी ओर, 'नीलगर' समुदाय ने खुद को केवल ‘नील’ की रंगाई तक ही सीमित रखा था। वे नीले और ग्रे रंग (Ferrous Sulphate या कसीस का उपयोग करके) के कपड़ों पर काम करते थे। इतिहास के अनुसार, शेख-तुर्क कारीगरों का एक बड़ा समूह पलायन करके सहारनपुर-मुज़फ्फ़रनगर-मेरठ बेल्ट में आकर बस गया था, जिन्होंने इस पूरे क्षेत्र में सूती कपड़ों और रंगाई के उद्योग को एक नई दिशा और पहचान दी।
औपनिवेशिक काल और अमेरिकी गृहयुद्ध ने कपास की खेती को कैसे बदला?
सहारनपुर का सूती और वस्त्र इतिहास केवल स्थानीय कारीगरों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह वैश्विक घटनाओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ था। भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) के शासन के दौरान, इस क्षेत्र में व्यावसायिक कृषि को भारी बढ़ावा दिया गया। 1854 में अपर गंगा कैनाल के निर्माण ने सहारनपुर और आसपास के इलाकों में सिंचाई की समस्या को हल कर दिया, जिससे नकदी फसलों की खेती को बल मिला।

1860 के दशक में जब अमेरिका में अमेरिकी गृहयुद्ध छिड़ गया, तो वैश्विक बाज़ार में कपास की भारी कमी हो गई और इसके दाम आसमान छूने लगे। इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए, ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन ने सहारनपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज़िलों में कपास की खेती का आक्रामक रूप से विस्तार करना शुरू कर दिया। वैश्विक मांग को पूरा करने के लिए नहरों से सिंचित इस उपजाऊ ज़मीन का इस्तेमाल कपास उगाने के लिए किया गया। इसी औपनिवेशिक नीति ने सहारनपुर के पुराने सूती व्यापार को आधुनिक मिलों और टेक्सटाइल पार्कों (Textile Parks) के निर्माण की दिशा में एक नया ऐतिहासिक मोड़ दिया, जो पुराने कपास की खेती से लेकर आज के आधुनिक वस्त्र निर्माण तक एक सीधा पुल बनाता है।
आज के समय में सहारनपुर का होजरी और वस्त्र उद्योग कहाँ खड़ा है?
इतनी सदियों के बाद, सूती कपड़ों और रंगाई का वह पुराना धागा आज भी सहारनपुर में टूटा नहीं है। बल्कि, इसने एक नए और आधुनिक उद्योग का रूप ले लिया है। आज के परिदृश्य में, सहारनपुर का होजरी और वस्त्र क्षेत्र उत्तर प्रदेश में एक महत्वपूर्ण आर्थिक स्तंभ बन चुका है। आइए वर्तमान स्थिति के कुछ प्रमुख आँकड़ों पर नज़र डालें:
आधुनिकता की इस दौड़ में, सहारनपुर मंडल के पड़ोसी ज़िले शामली में 27 एकड़ में फैला नया 'आयोनेक्स टेक्सटाइल पार्क' (Ionex Textile Park) भी स्थापित किया गया है। यह एक एकीकृत निजी टेक्सटाइल हब है जहाँ बुनाई, रंगाई, छपाई और परिधान निर्माण का काम बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि सहारनपुर केवल नक्काशीदार लकड़ियों का शहर नहीं है। 'चाह रंगरेज़' की गलियों से उठने वाली रंगों की महक और 12,000 मज़दूरों के पसीने से सींचा गया आज का 100 करोड़ का होजरी उद्योग यह साबित करता है कि सहारनपुर ने अपने सूती और वस्त्र इतिहास को बहुत ही सलीके से सहेज कर रखा है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/228hmsff
2. https://tinyurl.com/2brytxta
3. https://tinyurl.com/29ly637s
4. https://tinyurl.com/29ff9y8z
5. https://tinyurl.com/2955okeu
6. https://tinyurl.com/2azfkgj9
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