क्या सहारनपुर की असली पहचान, हमारी कौरवी बोली, हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी?

ध्वनि II - भाषाएँ
21-08-2026 10:36 AM
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क्या सहारनपुर की असली पहचान, हमारी कौरवी बोली, हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी?

सहारनपुर, मेरठ और मुज़फ्फ़रनगर जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों में बोली जाने वाली 'खड़ी बोली' को आज एक अजीब सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ रहा है। 
अपनी मातृभाषा से अलगाव अचानक नहीं हुआ है, बल्कि यह धीरे-धीरे युवाओं के मन में बैठाया गया है। एक मूल वक्ता के प्रत्यक्ष अनुभवों के अनुसार, इन शहरों के युवा जब कॉलेज या शहरी परिवेश में कदम रखते हैं, तो वे अपनी मातृभाषा बोलने से बचते हैं ताकि उन्हें 'गंवार' न कहा जाए।

सामाजिक दबाव के कारण, युवा अपनी बोली को बदलकर एक अलग उच्चारण अपनाने की कोशिश करते हैं, जिसे वे अधिक "सभ्य" मानते हैं। इस बोली में कुछ विशिष्ट ध्वन्यात्मक पहचान हैं, जो इसे मानक हिंदी से अलग करते हैं।

  • उदाहरण के लिए, इस क्षेत्र के लोग 'पानी' को 'पाणी' बोलते हैं।
  • इसी तरह, ‘चाचा’ का उच्चारण ‘चाच्चा’ किया जाता है।

विद्वानों और भाषाविदों का मानना है कि भाषा कभी भी अपने आप में अभद्र या असभ्य नहीं होती है। अपमान या सम्मान भाषा से नहीं, बल्कि वक्ता के इरादे और लहजे से तय होता है, लेकिन रूढ़िवादी सोच के कारण आज खड़ी बोली बोलने वालों को अनपढ़ या असभ्य मान लिया जाता है।

कौरवी बोली का ऐतिहासिक महत्व क्या है और राहुल सांकृत्यायन का इससे क्या नाता है?
खड़ी बोली का इतिहास बेहद समृद्ध है। ऐतिहासिक रूप से, यह शौरसेनी प्राकृत से विकसित हुई है। प्रसिद्ध भारतीय विद्वान राहुल सांकृत्यायन ने सहारनपुर से लेकर आगरा तक फैली इस भाषाई बेल्ट के लिए 'कौरवी'  शब्द गढ़ा था। प्राचीन भारत के कुरु साम्राज्य के नाम पर इसे यह नाम दिया गया था, और सांकृत्यायन का मानना था कि यही कौरवी बोली पुरानी दिल्ली की विशिष्ट खड़ी बोली की जननी है।

कौरवी या खड़ी बोली का सबसे बड़ा योगदान यह है कि यह आधुनिक मानक हिंदी और उर्दू दोनों की पुश्तैनी नींव है।

  • शुरुआती दौर में, 13वीं सदी के महान कवि अमीर खुसरो ने इसका इस्तेमाल किया था।
  • बाद में, ब्रज भाषा की मिठास और प्रवाह की तुलना में, खड़ी बोली को इसकी कठोरता के कारण 'खड़ी' या 'कर्कश' माना जाने लगा।
  • औपनिवेशिक काल के दौरान, कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज (Fort William College) में जॉन बोर्थविक गिलक्रिस्ट (John Borthwick Gilchrist) के नेतृत्व में लल्लू लाल जैसे लेखकों ने 'प्रेमसागर' जैसी रचनाएं लिखकर इस बोली को साहित्यिक पहचान दिलाई।


सहारनपुर के शिवालिक जंगलों में वन गुर्जर समुदाय का इतिहास क्या है?
सहारनपुर की दूसरी भाषाई कहानी शिवालिक के जंगलों में बसती है, जहाँ वन गुर्जर समुदाय रहता है। यह एक खानाबदोश और पशुपालक मुस्लिम समुदाय है, जो 19वीं सदी में जम्मू और पंजाब के क्षेत्रों से पलायन करके शिवालिक की पहाड़ियों में आ बसा था।

यह समुदाय मुख्य रूप से 'गोजरी' भाषा बोलता है, जो कि पंजाबी और डोगरी भाषाओं का एक अनूठा मिश्रण है। वन गुर्जरों का जीवन चक्र पूरी तरह से प्रकृति और उनके पशुओं पर निर्भर है। वे मौसमी प्रवास (Transhumance) की प्रथा का पालन करते हैं।

  • अप्रैल के महीने में जब मैदानी इलाकों में तापमान 40 डिग्री से ऊपर चला जाता है और नदियां सूखने लगती हैं, तो वे अपने परिवारों और भैंसों के साथ हिमालय के ऊंचे हरे घास के मैदानों (बुग्याल) की ओर निकल पड़ते हैं।
  • सितंबर के अंत में जब पहाड़ों पर कड़ाके की ठंड पड़ने लगती है, तो वे वापस शिवालिक के जंगलों में लौट आते हैं, जो मानसून की बारिश के बाद फिर से हरा-भरा हो चुका होता है।


वन गुर्जरों की गोजरी भाषा और उनका अस्तित्व खतरे में क्यों है?
आज वन गुर्जर समुदाय और उनकी गोजरी भाषा दोनों ही गंभीर संकट से गुज़र रहे हैं। हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में वन गुर्जरों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्राप्त है, लेकिन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में उन्हें यह अधिकार नहीं दिया गया है, जिसके कारण वे राजनीतिक और सामाजिक रूप से हाशिए पर हैं। सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद का भी मानना है कि इस समुदाय को जनजातीय मान्यता मिलनी चाहिए और इनके साथ होने वाला भेदभाव काफी हद तक राजनीतिक पूर्वाग्रहों का परिणाम है।

इस समुदाय के सामने सबसे बड़ा खतरा सेना की आसन फील्ड फायरिंग रेंज (Asan Field Firing Range) है, जो शिवालिक जंगलों के बीच स्थित है। इस फायरिंग रेंज के कारण कई निर्दोष वन गुर्जरों की जान जा चुकी है:

  • 15 मार्च 2018 को, 28 वर्षीय फातिमा, जो आठ महीने की गर्भवती थी, एक सैन्य तोप के गोले के छर्रे लगने से मारी गई।
  • 13 दिसंबर 2023 को, 11 वर्षीय हनीफ ने जंगल में एक बिना फटा हुआ बम खिलौना समझकर उठा लिया था, जिसके फटने से उसके चीथड़े उड़ गए।
  • उसी साल 29 दिसंबर को, 55 वर्षीय गुलाम मुस्तफा ने एक तोप के गोले से अपनी 11 वर्षीय बेटी हलीमा को बचाने के लिए खुद को ढाल बना लिया और अपनी जान गँवा दी।

वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) 2006 के तहत अधिकार होने के बावजूद, उन्हें लगातार जंगलों से बेदखल किया जा रहा है। राजाजी नेशनल पार्क में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के स्टे ऑर्डर (Stay order) के बावजूद वन विभाग द्वारा उनके अस्थायी घरों को अवैध रूप से तोड़ दिया गया, जिससे कई परिवार बेघर हो गए और उनके मवेशी मारे गए। एक स्थानीय आगंतुक, जिसने जंगल में इन पशुपालकों से मुलाकात की, उसने अपनी आँखों से देखा कि कैसे बिना बिजली, सड़क और बुनियादी सुविधाओं के यह समुदाय अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

क्या सहारनपुर अपनी इन अमूल्य भाषाई और सांस्कृतिक विरासतों को बचा पाएगा?
भाषा केवल संवाद का साधन नहीं होती, बल्कि यह किसी समुदाय की पहचान, संस्कृति और इतिहास का जीवित दस्तावेज़ होती है। सहारनपुर की कौरवी बोली, जिसने भारत को हिंदी और उर्दू जैसी समृद्ध भाषाएं दीं, आज अपने ही बोलने वालों के बीच हीन भावना का शिकार है। वहीं दूसरी ओर, गोजरी भाषा बोलने वाले वन गुर्जर विस्थापन, सैन्य गोलों और सरकारी नीतियों के बीच पिस रहे हैं। यदि समय रहते इन भाषाओं और समुदायों के संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो सहारनपुर का यह अमूल्य सांस्कृतिक ताना-बाना हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगा।

संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2xvz7pn3 
2. https://tinyurl.com/23esf456 
3. https://tinyurl.com/2ccqjevp 
4. https://tinyurl.com/265yy2ry 
5. https://tinyurl.com/25kt5yql 
6. https://tinyurl.com/2by79w4b 

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