सहारनपुर के हाजी इमदादुल्लाह, जिन्होंने 1857 में अंग्रेजों को घुटनों पर ला दिया था

औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
15-08-2026 09:16 AM
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सहारनपुर के हाजी इमदादुल्लाह, जिन्होंने 1857 में अंग्रेजों को घुटनों पर ला दिया था

अंग्रेजों के बीच एक पुरानी कहावत थी कि "इतिहास हमेशा विजेताओं द्वारा लिखा जाता है" ("History is written by the victors") यह कथन ब्रिटिश मानसिकता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। यही कारण है कि जब भी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का ज़िक्र ब्रिटिश दस्तावेज़ों में आता है, तो इसे केवल एक 'गदर' या 'विद्रोह' (Mutiny) और भारतीय क्रांतिकारियों को 'गद्दार' कहा जाता है। पूर्वी सभ्यताओं और विशेषकर भारत में, हम उन वीरों को भी याद रखते हैं जो भले ही युद्ध हार गए, लेकिन जिन्होंने सत्य और न्याय के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। युद्ध हारने के बाद अंग्रेजों ने भारतीयों से हिंसक और क्रूर बदला लिया। उन्होंने गांव के गांव जला दिए, घर ढहा दिए और विद्रोहियों से जुड़ी हर निशानी को मिटाने का प्रयास किया। ऐसी स्थिति में ऐतिहासिक साक्ष्य खोजना एक बड़ी चुनौती है, लेकिन सच्चाई को मारा नहीं जा सकता। भारतीय क्रांतिकारियों की वीरता की कहानियां मौखिक परंपराओं और साहसी लेखकों के माध्यम से आज भी जीवित हैं। सहारनपुर के हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की ऐसे ही एक महान योद्धा थे, जिनका नाम औपनिवेशिक रिकॉर्ड से इसलिए मिटा दिया गया ताकि भारतीयों में राष्ट्रवादी भावनाएं न भड़क सकें।

हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की का प्रारंभिक जीवन और व्यक्तित्व कैसा था? 
हाजी इमदादुल्लाह का जन्म 31 दिसंबर, 1817 (कुछ स्रोतों के अनुसार 1818) को उत्तर प्रदेश में सहारनपुर ज़िले के एक छोटे से कस्बे नानौता में हुआ था। उनके पिता का नाम हाफिज मुहम्मद अमीन और माता का नाम बीबी हसीनी था। जब वे केवल सात वर्ष के थे, तब उनकी माता का देहांत हो गया था। नौ साल की उम्र में वे मौलाना ममलुक अली के साथ दिल्ली चले गए, जहां उन्होंने अरबी और फारसी के व्याकरण का गहन अध्ययन किया। 18 वर्ष की आयु में नसीरुद्दीन नक़्शबंदी ने उनकी 'बयअत' (निष्ठा) स्वीकार की।

हाजी साहब का शारीरिक गठन बहुत ही अनूठा था। वे मध्यम से लंबे कद के थे, उनका शरीर नाजुक था, त्वचा का रंग सांवला और सिर बड़ा था। वे बेहद मिलनसार और मीठा बोलने वाले व्यक्ति थे। उनके चेहरे पर हमेशा एक मुस्कान रहती थी। वे भोजन कम करते थे और सोते भी कम थे। अल्लाह के प्रेम, आध्यात्मिक अभ्यास और साधना ने उन्हें शारीरिक रूप से दुबला बना दिया था, लेकिन उनके भीतर एक विशाल हृदय और अपार धैर्य निवास करता था। समाजशास्त्र और धर्मशास्त्र में उनकी गहरी रुचि थी। वर्ष 1845 में वे हज यात्रा के लिए सऊदी अरब (Saudi Arabia) गए और इस्लाम के अध्ययन के लिए वहीं रुक गए।

स्वतंत्रता संग्राम की वैचारिक नींव और क्रांति की शुरुआत कैसे हुई? 
मक्का (Makkah) प्रवास के दौरान हाजी इमदादुल्लाह की मुलाकात शाह मुहम्मद इशाक से हुई, जो पहले से ही वहां रह रहे थे। उन्होंने इमदादुल्लाह को वापस भारत लौटने और शाह वलीउल्लाह तथा शाह अब्दुल अजीज द्वारा शुरू किए गए मिशन को आगे बढ़ाने की सलाह दी। शाह वलीउल्लाह ने ब्रिटिश सत्ता की बढ़ती राजनीतिक शक्ति को भांप लिया था और एक सर्वव्यापी क्रांति की कल्पना की थी। उन्होंने लिखा था कि भारत की स्थिति उनसे छिपी नहीं है क्योंकि भारत उनकी मातृभूमि है।

वर्ष 1846 में भारत लौटने के बाद, हाजी इमदादुल्लाह ने मुज़फ्फरनगर के थाना भवन से अपने क्रांतिकारी विचारों का प्रचार शुरू किया। उनके प्रमुख शिष्यों में हाफिज मुहम्मद ज़ामिन, मौलाना कासिम नानौत्वी, मौलाना रशीद अहमद गंगोही, मौलाना मज़ाहर और मौलाना मुनीर नानौत्वी शामिल थे। 1857 के आंदोलन से ठीक पहले, हाजी इमदादुल्लाह, फैज़ाबाद के मौलवी अहमदुल्लाह शाह और फज़ल-ए-हक खैराबादी जैसे प्रमुख इस्लामी विद्वानों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ और हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्ष में जोरदार प्रचार किया। इन विद्वानों ने न केवल फतवे जारी किए और उपदेश दिए, बल्कि युद्ध के मैदान में अंग्रेजों के खिलाफ हथियार भी उठाए।

थाना भवन और शामली की ऐतिहासिक लड़ाई में क्रांतिकारियों का क्या रुख रहा? 
मई 1857 में, मेरठ छावनी में भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत कर दी और जल्द ही आम जनता भी उनके साथ जुड़ गई। जहां एक तरफ सैनिक दिल्ली की ओर कूच कर रहे थे ताकि बहादुर शाह ज़फ़र को सम्राट घोषित किया जा सके, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली से 70-80 किलोमीटर दूर, थाना भवन में हाजी इमदादुल्लाह ने उलेमाओं, जमींदारों और किसानों का नेतृत्व करते हुए ब्रिटिश राज के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह छेड़ दिया। मुज़फ्फरनगर के तत्कालीन मजिस्ट्रेट आर.एम. एडवर्ड्स (R.M. Edwards) ने मेरठ के कमिश्नर को लिखा था कि थाना भवन और शामली पर विद्रोहियों ने कब्ज़ा कर लिया है। यद्यपि अंग्रेजों की आदत इसे केवल मुसलमानों का विद्रोह बताने की थी, लेकिन उसी मजिस्ट्रेट ने यह भी दर्ज किया कि हिंदू गुर्जर और जाट भी शामली और थाना भवन के आसपास ब्रिटिश सेना पर लगातार हमले कर रहे थे।

1857 का यह स्वतंत्रता संग्राम इस क्षेत्र में मुख्य रूप से दो मोर्चों पर लड़ा गया: अंबाला में मौलाना जाफर थानेसेरी के नेतृत्व में और शामली में हाजी इमदादुल्लाह के नेतृत्व में। सितंबर 1857 में, हाजी इमदादुल्लाह ने अपने सहयोगियों के साथ शामली की तहसील पर जोरदार हमला किया। इस ऐतिहासिक लड़ाई में ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) की सेना को करारी हार का सामना करना पड़ा और तहसील भवन पर हिंदुस्तान का झंडा फहरा दिया गया। थाना भवन और शामली ज़िले में एक स्वतंत्र सरकार की स्थापना की गई। इस नई सरकार में मुहम्मद कासिम नानौत्वी को सेनापति (कमांडर-इन-चीफ - Commander-in-Chief) और रशीद अहमद गंगोही को राज्य का काज़ी नियुक्त किया गया। हाजी इमदादुल्लाह ने कुछ समय तक इस क्षेत्र में अपनी सरकार चलाई और वे दीवानी और फौजदारी मामलों को निपटाने के लिए अपनी अदालत भी लगाते थे। इस युद्ध में हाफिज मुहम्मद ज़ामिन लड़ते हुए शहीद हो गए।

अंग्रेजों की क्रूरता और हाजी इमदादुल्लाह का निष्कासन कैसे हुआ? 
भले ही शामली की लड़ाई जीत ली गई थी, लेकिन पूरा युद्ध हार की ओर बढ़ रहा था। अक्टूबर 1857 में ब्रिटिश अधिकारी मेजर सॉयर (Major Sawyer) के नेतृत्व में भारी सेना ने थाना भवन पर हमला किया और इसे फिर से अपने कब्ज़े में ले लिया। अंग्रेजों का यह हमला इतना क्रूर और बर्बर था कि उन्होंने मेरठ से थाना भवन के रास्ते में पड़ने वाले कई गांवों को जला दिया और बमों से उड़ा दिया, क्योंकि वहां क्रांतिकारियों के परिवार रहते थे। मजिस्ट्रेट ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि कस्बे में कोई भी जीवित नहीं बचा है। इस क्रूरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि थाना भवन के एक अन्य नेता इनायत अली की मां, असगरी बेगम को पकड़कर अंग्रेजों ने जिंदा जला दिया था। 1857 के मुख्य नेताओं में से एक, बहादुर शाह ज़फ़र को गिरफ्तार कर लिया गया और शामली पूरी तरह से अंग्रेजों के हाथों में गिर गया। ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने थाना भवन को काफी हद तक नष्ट कर दिया।

वर्ष 1864 से 1867 के बीच उलेमाओं पर क्रूरता और यातना के दिल दहला देने वाले कृत्य किए गए। मौलाना रशीद अहमद गंगोही को बंदी बना लिया गया, कासिम नानौत्वी वहां से भाग निकले, जबकि हाजी इमदादुल्लाह को कई अलग-अलग जगहों पर शरण लेनी पड़ी। अंततः वे वर्ष 1859 में भारत छोड़कर मक्का चले गए।

हाजी इमदादुल्लाह का अंतिम समय और देवबंद में वैचारिक क्रांति का उदय कैसे हुआ? 
मक्का में निर्वासित जीवन व्यतीत करते हुए हाजी इमदादुल्लाह ने लेखन और अध्यापन का कार्य जारी रखा। उनके शिष्यों ने बाद में महान व्यक्तित्व का रूप लिया। हाजी साहब ने कई साहित्यिक कृतियों की रचना की, जो मुख्य रूप से तसव्वुफ (सूफीवाद), अल्लाह के प्रेम और आध्यात्म पर आधारित थीं। इनमें फारसी में रचित 'ज़िया अल-कुलूब', और उर्दू में रचित 'इरशाद-ए-मुर्शिद', 'गुलज़ार-ए-मारिफा', 'तुहफत अल-उश्शाक', 'जिहाद-ए-अकबर', 'गिज़ा-ए-रूह' और 'दर्दनामा-ए-ग़मनाक' प्रमुख हैं। जीवन के अंतिम वर्षों में उनके स्वास्थ्य में भारी गिरावट आई और 18 अक्टूबर, 1899 को 81 वर्ष की आयु में मक्का में उनका इंतकाल हो गया। उन्हें जन्नत-ए-मुअल्ला (Jannat-e-Mualla) में शेख रहमतुल्लाह अल-किरानवी के बगल में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।

1857 में मिली हार ने सहारनपुर ज़िले की इस पट्टी से उठने वाले प्रतिरोध को खत्म नहीं किया था, बल्कि इसका आकार बदल दिया था। वर्ष 1866-67 में, थाना भवन विद्रोह में जीवित बचे लोगों और हाजी इमदादुल्लाह के शिष्यों—विशेषकर कासिम नानौत्वी और रशीद अहमद गंगोही—ने सहारनपुर ज़िले के ही देवबंद कस्बे में दारुल उलूम देवबंद (Darul Uloom Deoband) मदरसे की नींव रखी। जो संस्था एक धार्मिक स्कूल के रूप में शुरू हुई थी, वह आने वाले दशकों में भारतीय राष्ट्रवाद के सबसे बड़े वैचारिक इंजनों में से एक बन गई। यहां से विद्वान-कार्यकर्ताओं की ऐसी पीढ़ियां निकलीं जिन्होंने धार्मिक शिक्षा और उपनिवेशवाद-विरोधी राजनीति को एक-दूसरे का अटूट हिस्सा माना।

सहारनपुर का यह इतिहास साबित करता है कि बंदूकों से हारी गई लड़ाई को अंततः कलम और विचारों की धार से जीता गया, और हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की द्वारा जलाई गई आज़ादी की वह लौ कभी नहीं बुझी।

संदर्भ
1. https://tinyurl.com/267nezsb 
2. https://tinyurl.com/28t5e478 
3. https://tinyurl.com/2xpln87n 

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