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गणेश चतुर्थी का महापर्व समूचे देश में अत्यंत श्रद्धा, सांस्कृतिक उल्लास और सामाजिक एकता के साथ मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीगणेश का प्राकट्य माता पार्वती के शरीर के मैल और मिट्टी से हुआ था, जो इस बात का शाश्वत प्रतीक है कि उनका मूल संबंध इस पावन धरा और प्रकृति से है। परंपरा के अनुसार, भक्तगण दस दिनों तक बप्पा की आराधना करते हैं और अनंत चतुर्दशी पर उन्हें जल में विसर्जित कर देते हैं, जो जीवन और मरण के प्राकृतिक चक्र को दर्शाता है। किंतु आधुनिक समय में एक विडंबना यह उत्पन्न हो गई है कि मिट्टी से उत्पन्न होकर पुनः मिट्टी में समा जाने वाले भगवान की प्रतिमाओं के निर्माण में अब प्लास्टर ऑफ पेरिस (Plaster of Paris) और हानिकारक रासायनिक रंगों का अंधाधुंध उपयोग होने लगा है। इसके कारण हर वर्ष हमारे जलस्रोत, वायुमंडल और संपूर्ण पारिस्थिकी तंत्र गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं।

प्लास्टर ऑफ पेरिस (Plaster of Paris) और रासायनिक रंगों से जलीय जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो प्लास्टर ऑफ पेरिस कोई प्राकृतिक पदार्थ नहीं है। यह जिप्सम (gypsum) को लगभग 150 डिग्री सेल्सियस पर गर्म करके बनाया जाने वाला कैल्शियम सल्फेट हेमीहाइड्रेट है। जब इसे जल में मिलाया जाता है, तो यह तेज़ी से सख्त हो जाता है। जब इस अघुलनशील सामग्री से बनी प्रतिमाओं का विसर्जन नदियों, झीलों और समुद्र में किया जाता है, तो यह पानी में घुलने में कई महीनों से लेकर वर्षों तक का समय लेती हैं। इस प्रक्रिया में यह पदार्थ पुनः जिप्सम में बदलकर पानी के तल में जमा हो जाता है और जल की कठोरता (हार्डनेस) को अत्यधिक बढ़ा देता है।

इसके अतिरिक्त, प्रतिमाओं को आकर्षक बनाने के लिए प्रयुक्त होने वाले सिंथेटिक रंगों में लेड, मर्करी (पारा), कैडमियम, जिंक ऑक्साइड और क्रोमियम जैसी अत्यंत विषैली भारी धातुएँ मौजूद होती हैं। अध्ययनों के अनुसार, लाल, नीले, नारंगी और हरे जैसे चमकीले रंगों में इन विषैले रसायनों की मात्रा सर्वाधिक होती है। विसर्जन के उपरांत ये धातुएँ धीरे-धीरे पानी में रिसती हैं और जलीय खाद्य-श्रृंखला में प्रवेश कर जाती हैं। जब मछलियाँ इन रसायनों को सोखती हैं, तो बायो-अक्युमुलेशन (जैव-संचयन) के माध्यम से यह विष उन्हें खाने वाले पक्षियों, पशुओं और अंततः मनुष्यों के शरीर तक पहुँच जाता है। कार्बनिक पारा जब मानव शरीर में प्रवेश करता है, तो यह मस्तिष्क में एकत्रित होकर केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की कोशिकाओं को नष्ट कर देता है, जिससे गंभीर स्वास्थ्य विकार उत्पन्न होते हैं।
मुंबई की गोरई जेट्टी (Gorai Jetty) के वैज्ञानिक अध्ययन से जल गुणवत्ता के क्या चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए?
महाराष्ट्र के जलस्रोतों पर विसर्जन के वास्तविक प्रभाव को समझने के लिए मुंबई के अंधेरी वेस्ट स्थित भवन्स कॉलेज की सहायक प्राध्यापिका डॉ. प्रज्ञा लोखंडे ने बोरीवली (Borivali) वेस्ट स्थित गोरई क्रीक (Gorai Creek) की गोरई जेट्टी पर एक विस्तृत वैज्ञानिक अन्वेषण किया। विसर्जन से एक सप्ताह पूर्व और विसर्जन की समाप्ति के बाद लिए गए जल के नमूनों के प्रयोगशाला परीक्षण में जल गुणवत्ता के मानकों में अत्यधिक गिरावट दर्ज की गई।
डॉ. लोखंडे के शोध पत्र के अनुसार, गोरई जेट्टी पर दर्ज किए गए प्रमुख भौतिक-रासायनिक परिवर्तन इस प्रकार थे:
इसी प्रकार, परफेक्ट पोल्यूशन सर्विसेज द्वारा मुंबई की पवई झील में किए गए परीक्षणों में विसर्जन के 24 घंटों के भीतर टीडीएस में 200 प्रतिशत की वृद्धि और भारी धातुओं का सुरक्षित सीमा से अधिक रिसाव पाया गया।
क्या गणेशोत्सव के दौरान वायु, ध्वनि और ठोस कचरा प्रदूषण भी खतरनाक स्तर पर पहुँचता है?
गणेशोत्सव के दौरान होने वाला प्रदूषण केवल जलस्रोतों तक सीमित नहीं रहता। परफेक्ट पोल्यूशन सर्विसेज द्वारा मुंबई, पुणे और नागपुर में किए गए अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि विसर्जन जुलूसों में आतिशबाजी और भारी वाहनों के जमावड़े के कारण हवा में पीएम 2.5 और पीएम 10 के स्तर में 60 से 90 प्रतिशत तक की भारी वृद्धि हो जाती है। इसके अतिरिक्त, विसर्जन क्षेत्रों में सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों में 30 से 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई, जिससे वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 150 अंक तक बिगड़कर गंभीर श्रेणी में पहुँच जाता है।

ध्वनि प्रदूषण की स्थिति भी अत्यंत चिंताजनक पाई गई। विसर्जन के दौरान बजने वाले लाउडस्पीकरों और ढोल-नगाड़ों के कारण ध्वनि का स्तर 110 डेसिबल तक पहुँच गया। यह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा निर्धारित दिन की 55 डेसिबल और रात की 45 डेसिबल की अनुमेय सीमा से कहीं अधिक है। यह अत्यधिक शोर वरिष्ठ नागरिकों और छोटे बच्चों के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होता है, जिससे तनाव, अनिद्रा और हृदय संबंधी बीमारियों के कारण अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या बढ़ जाती है।
ठोस कचरे की बात करें तो अकेले वर्ष 2023 में मुंबई के नगर निगम ने गणेशोत्सव के दौरान 1,200 टन से अधिक कचरा एकत्र किया। इस कचरे में थर्माकोल (thermocol), प्लास्टिक (plastic) की सजावट, पूजा में प्रयुक्त फूल-मालाएँ (निर्माल्या) और फेंका गया खाद्य कचरा शामिल था, जो जल निकासी और स्वच्छता के लिए भारी चुनौती बन जाता है।
लोग प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमाओं की ओर क्यों आकर्षित होते हैं?
पर्यावरण को होने वाले भारी नुकसान के बावजूद प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमाओं का प्रचलन बाज़ार में बहुत अधिक है। इसका मुख्य कारण इसकी सुगमता और कम लागत है। प्लास्टर ऑफ पेरिस को साँचों में ढालना और तराशना बेहद आसान होता है, जिससे मूर्तिकारों का समय और श्रम दोनों बचते हैं। यह सामग्री हल्की होती है, जिससे बड़ी-बड़ी प्रतिमाओं को आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है।

इसके विपरीत, प्राकृतिक चिकनी मिट्टी यानी शाडू माती से बनी प्रतिमाओं के निर्माण में अधिक समय, अत्यधिक कौशल और शुद्ध कच्ची सामग्री की आवश्यकता होती है। मिट्टी की मूर्तियाँ भारी होती हैं और उनके परिवहन का खर्च भी अधिक आता है, जिससे वे बाज़ार में थोड़ी महंगी मिलती हैं। किंतु सबसे पीड़ादायक पहलू यह है कि जब प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियाँ पानी में महीनों तक नहीं घुलतीं, तो त्योहार बीत जाने के बाद नगर निगम के कर्मचारियों द्वारा समुद्र तटों और नदी किनारों से उनके अवशेषों को बुलडोज़र से समेटा जाता है। यह दृश्य न केवल आस्था को गहरी चोट पहुँचाता है, बल्कि हमारी धार्मिक मर्यादा के भी विरुद्ध है।
पर्यावरण संरक्षण के लिए कौन से पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) विकल्प अपनाए जा सकते हैं?
गणेश चतुर्थी की दिव्यता और आध्यात्मिक चेतना को अक्षुण्ण रखते हुए प्रकृति की रक्षा के लिए अनेक टिकाऊ विकल्प उपलब्ध हैं:

सामुदायिक स्तर पर 'ग्रीन गणेशा' अभियान किस प्रकार बदलाव ला रहे हैं?
देश के कई महानगरों में नागरिकों और गैर-सरकारी संगठनों के सहयोग से सराहनीय पहल की जा रही है। इसका एक प्रमुख उदाहरण बेंगलुरु में बी-पैक (B.PAC) द्वारा चलाया जा रहा 'माने मनेयल्ली मन्निना गणपा' (घर-घर में मिट्टी के गणेश) अभियान है। बी-पैक ने नागरिक नेताओं, बीबीएमपी (BBMP) और कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ मिलकर नागरिकों और विद्यार्थियों के लिए विशेष कार्यशालाओं का आयोजन किया है। इस अभियान के तहत 'ट्रेन द ट्रेनर' कार्यक्रम के माध्यम से लोगों को टेराकोटा (terracotta) मिट्टी से अपने घरों में स्वयं बप्पा की सुंदर प्रतिमा बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
इसी प्रकार, मुंबई और पुणे के नगर निगमों ने विसर्जन स्थलों पर कलश के आकार के विशेष पात्र स्थापित किए हैं, जिनमें फूलों और पत्तियों से बना निर्माल्या अलग से एकत्र किया जाता है। इस कचरे को जलस्रोतों में फेंकने के बजाय उससे जैविक खाद बनाई जाती है और सूखे फूलों से पुनर्चक्रित कागज़ तैयार किया जाता है। साथ ही, उत्सवों में अत्यधिक ध्वनि वाले लाउडस्पीकरों के स्थान पर बैटरी चालित वाद्ययंत्रों और सिंक्रोनाइज़्ड एलईडी (LED) लाइट शो का उपयोग करने का सुझाव दिया जा रहा है। यदि प्रत्येक नागरिक अपनी आस्था के साथ प्रकृति के प्रति अपने दायित्व को समझे, तो हम भगवान गणेश की कृपा और प्रकृति के सौंदर्य दोनों को एक साथ सुरक्षित रख सकते हैं।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2b3gxqg3
2. https://tinyurl.com/2bo22l3c
3. https://tinyurl.com/2755b5jn
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