महावीर जयंती का महत्व और हस्तिनापुर के श्री दिगंबर जैन मंदिर की धार्मिक विरासत
महावीर जयंती को जैन धर्म में सबसे प्रमुख पर्व माना जाता है। पूरे जैन समुदाय द्वारा चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर (सर्वोच्च उपदेशक) भगवान महावीर के जन्मदिन को महावीर जयंती के रूप में बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस उत्सव की भव्यता को देखने और दार्शनिक महत्वों को समझने के लिए आप हमारे मेरठ जिले के हस्तिनापुर शहर में स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर के दर्शन भी कर सकते हैं।मेरठ जिले के हस्तिनापुर शहर में स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर, भारत में स्थित एक प्राचीन जैन तीर्थ परिसर है। इस मंदिर को हस्तिनापुर का सबसे पुराना जैन मंदिर माना जाता है। यह मंदिर 16वें जैन तीर्थंकर श्री शांतिनाथ को समर्पित है। हस्तिनापुर तीर्थ क्षेत्र को क्रमशः 16वें, 17वें और 18वें तीन जैन तीर्थंकरों (शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरनाथ) का जन्मस्थान माना जाता है। जैनियों का यह भी मानना था कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ ने राजा श्रेयांस से गन्ने का रस (इक्षु-रस) प्राप्त करने के बाद यहीं हस्तिनापुर में 13 महीने की अपनी लंबी तपस्या समाप्त की थी।हस्तिनापुर के श्री दिगंबर जैन मंदिर के केंद्रीय मुख्य शिखर मंदिर को राजा हरसुख राय द्वारा 1801 में बनवाया गया था। राजा हरसुख राय, बादशाह शाह आलम द्वितीय के शाही खजांची थे। यह मंदिर परिसर 40 एकड़ के क्षेत्रफल में फैला हुआ है, जहां केंद्रीय मुख्य शिखर मंदिर विभिन्न तीर्थंकरों को समर्पित कई छोटे मंदिरों से घिरा हुआ है, जिनमें से अधिकांश मंदिर 20 वीं शताब्दी के अंत में बनाए गए थे। मुख्य मंदिर परिसर में एक वेदी पर प्रमुख देवता के रूप में 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ पद्मासन मुद्रा में विराजमान हैं।वेदी पर भगवान शांतिनाथ की मूर्ति के दोनों तरफ 17वें और 18वें तीर्थंकरों श्री कुंथुनाथ और श्री अरनाथ की मूर्तियां भी विद्यमान हैं। मंदिर परिसर में कुछ उल्लेखनीय स्मारक जैसे मानस्तंभ, त्रिमूर्ति मंदिर, नंदीश्वर द्वीप, समवसरण रचना और अंबिका देवी मंदिर भी मौजूद हैं। श्री बाहुबली मंदिर, श्री पार्श्वनाथ मंदिर, जल मंदिर, कीर्ति स्तंभ और पांडुकशिला आदि परिसर में स्थित अन्य प्रमुख स्मारक हैं।इस परिसर में तीर्थयात्रियों के लिए धर्मशाला, भोजनालय, जैन पुस्तकालय, आचार्य विद्यानंद संग्रहालय और कई अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। क्षेत्र परिसर में एक डाकघर, पुलिस सब-स्टेशन, जैन गुरुकुल और एक उदासीन आश्रम (एक सेवानिवृत्ति गृह या वृद्धाश्रम) भी है। कुल मिलाकर, श्री दिगंबर जैन प्राचीन बड़ा मंदिर हस्तिनापुर में एक महत्वपूर्ण जैन मंदिर परिसर है, जिसका समृद्ध इतिहास और जटिल वास्तुकला कई भक्तों और आगंतुकों को आकर्षित करती है। महावीर जयंती के अवसर पर तो इस मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है।महावीर जयंती, जिसे महावीर जन्म कल्याणक के नाम से भी जाना है, जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक त्यौहार है जो भगवान महावीर के जन्म को संदर्भित करता है। भगवान महावीर चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर थे। ग्रेगोरियन कैलेंडर (Gregorian Calendar) के अनुसार यह त्यौहार मार्च या अप्रैल माह में पड़ता है।जैन ग्रंथों के अनुसार, महावीर का जन्म 599 ईसा पूर्व में चैत्र के महीने में तेरहवें दिन हुआ था। अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का कुंडलपुर उनका जन्म स्थान है। महावीर का जन्म वज्जि नामक एक लोकतांत्रिक राज्य में हुआ था, और इस राज्य की राजधानी वैशाली थी। महावीर का प्रारंभिक नाम ‘वर्धमान' था, जिसका अर्थ ‘जो बढ़ता है’ होता है।मान्यता है कि अपनी गर्भावस्था के दौरान, महावीर की माता रानी त्रिशला ने कई शुभ सपने देखे, जो सभी एक महान आत्मा के जन्म लेने का संकेत दे रहे थे। ऐसा कहा जाता है कि जब उन्होंने महावीर को जन्म दिया, तो स्वर्गीय देवताओं के प्रमुख इंद्र ने सुमेरु पर्वत पर अभिषेक नामक एक अनुष्ठान किया, जिसे सभी तीर्थंकरों के जीवन में होने वाली पांच शुभ घटनाओं में से दूसरी घटना माना जाता है।महावीर जन्म कल्याणक के अवसर पर मनाये जाने वाले प्रमुख उत्सवों में भगवान महावीर की मूर्ति को रथ यात्रा नामक जुलूस में रथ पर ले जाना, स्तवन कहे जाने वाले धार्मिक छंदों का पाठ करना, और महावीर की मूर्तियों का अभिषेक करना शामिल है। इस अवसर पर जैन समुदाय के लोग धर्मार्थ कार्यों, प्रार्थनाओं, पूजा और व्रतों में संलग्न होते हैं। साथ ही कई भक्त इस अवसर पर ध्यान करने और प्रार्थना करने के लिए महावीर को समर्पित मंदिरों में जाते हैं। जयंती के दिन गायों को वध से बचाने या गरीब लोगों को खाना खिलाने जैसे धर्मार्थ मिशनों के लिए दान एकत्र किया जाता है। इस दिन भगवान महावीर के अहिंसा के संदेश का प्रचार करने वाली अहिंसा दौड़ और रैलियां भी निकाली जाती हैं।हमारे शहर मेरठ में भी तीर्थंकर भगवान महावीर की जयंती को प्रतिवर्ष बेहद हर्ष और उल्लास के साथ धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर तीरगरान स्थित जैन मंदिर से श्री जी की पालकी बैंड बाजों के साथ निकाली जाती है, जिससे पहले जैन मंदिर परिसर में श्री जी का मंगल अभिषेक धार्मिक विधि विधान से किया जाता है। शोभायात्रा में श्री जी की पालकी एवं भगवान महावीर की प्रेरणादायी झांकियों को भी शामिल किया जाता है।संदर्भ https://bit.ly/3lSGp98 https://bit.ly/40rRv3M https://bit.ly/3lYDRWW
समुद्री संसाधन
भारत में झींगा हैचरी तकनीक का विकास और जलीय कृषि के नए अवसर
भारत में झींगा पालन उद्योग अभी भी क्रस्टेशियंस (crustaceans) के वाइल्ड कैचिंग (wild catching) पर निर्भर हैं। भारत में हैचरी (hatchery) उद्योगों के विकास की आवश्यकता है। बीओबीपी (Bay of Bengal Programme BOBP) ने छोटे पैमाने की हैचरी प्रौद्योगिकी को यथासंभव सीधे इस क्षेत्र में स्थानांतरित करने के लिए गतिविधियां शुरू की हैं‚ क्योंकि इस विकास को आगे बढ़ाने में निजी क्षेत्र की बड़ी भूमिका हो सकती है। भारत में इसने छोटे पैमाने के उद्यमियों को टाइगर श्रिम्प हैचरी तकनीक (tiger shrimp hatchery technology) का प्रशिक्षण दिया और एक प्रदर्शन हैचरी के निर्माण के लिए पश्चिम बंगाल सरकार को वित्तीय सहायता प्रदान की। भारत के आठ प्रशिक्षुओं में से एक ने श्रिम्प हैचरी (shrimp hatchery) स्थापित की। पश्चिम बंगाल में श्रिम्प/प्रौन हैचरी का काम पूरा हो गया था‚ लेकिन उसे उत्पादन में नहीं लाया गया था। भारत के निजी क्षेत्र में झींगा हैचरी प्रौद्योगिकी विकास धीमा रहा है। ऐसा माना गया है कि हैचरी बीज की आपूर्ति उद्योग में निजी निवेश की मात्रा के अनुपात में ही बढ़ेगी‚ इसलिए बीओबीपी (BOBP) के प्रशिक्षण कार्यक्रम ने छोटे पैमाने के उद्यमी समुदायों को लक्षित किया। नवंबर 1991 में स्थानीय और क्षेत्रीय समाचार पत्रों में दिए गए विज्ञापनों ने श्रिम्प और प्रौन हैचरी प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षण की पेशकश की‚ जिसमें 300 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए थे। इनमें से 22 का साक्षात्कार लिया गया और दस का चयन किया गया था। इन आवेदकों में से आठ श्रिम्प हैचरी प्रशिक्षण के लिए और दो फ्रेशवाटर प्रौन हैचरी प्रशिक्षण के लिए थे। चयनित आवेदकों में से दो को झींगा पालन का थोड़ा अनुभव था तथा एक महिला सहित अन्य आवेदक छोटे व्यवसायी थे। “नेशनल प्रॉन फ्राई प्रोडक्शन एंड रिसर्च सेंटर” (एनएपीएफआरई) (National Prawn Fry Production and Research Center NAPFRE)‚ पुलाऊ सयाक‚ मलेशिया (Pulau Sayak‚ Malaysia) को आठ झींगा हैचरी प्रतिभागियों के लिए प्रशिक्षण स्थल के रूप में चुना गया था। एनएपीएफआरई (NAPFRE) नियमित रूप से अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित करता है‚ जिसमें अच्छी तरह से प्रशिक्षित और अनुभवी कर्मचारी तथा अच्छी आवास सुविधाएं भी हैं।कुछ वर्षों में तट से दूर के क्षेत्रों में समुद्री श्रिम्प की अंतर्देशीय खेती में काफी वृद्धि हुई है। इस उद्योग के शुरुआत में यह विभिन्न एशियाई (Asian) देशों में ब्लैक टाइगर श्रिम्प (black tiger shrimp) के साथ काफी आम हो गया था। बाद में‚ पेसिफिक वाइट श्रिम्प (Pacific White Shrimp) की शुरुआत के साथ एशिया में इसका काफी विस्तार हुआ। उत्तरी अमेरिका (North America) और यूरोप (Europe) में हाल के वर्षों में टैंक आधारित झींगा उत्पादन प्रणालियों (tank- based shrimp production systems) में रुचि बढ़ रही है और यह धीरे-धीरे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी कर्षण प्राप्त कर रहा है।इस प्रणाली को चलाने वाले कारकों में मुख्य रूप से बाजारों से निकटता और उपभोक्ताओं को ताजा उत्पाद देने की क्षमता शामिल है। भूमि और पानी जैसे संसाधनों की उपलब्धता की आवश्यकता ने भी उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में टैंक आधारित झींगा खेती की ओर रुचि जगाई है। कई देशों में जहां परिस्थितियाँ झींगा पालन के लिए उपयुक्त हैं‚ तालाब आधारित उत्पादन के लिए भूमि तक पहुंचने का अभाव एक वास्तविक मुद्दा है। टैंक प्रणालियों में झींगा उत्पादन पर विचार करते समय‚ तकनीकी और आर्थिक दोनों कारकों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। उपकरण विकल्प और संचालन निपुणता तकनीकी और आर्थिक साध्यता दोनों को प्रभावित करती है। इसमें कई क्रियाशील विन्यास भी मौजूद हैं लेकिन लाभप्रदता पूंजी लागत‚ परिचालन लागत‚ उत्तरजीविता और वृद्धि दर तथा बाजार की स्थितियों पर निर्भर करती है। दुनिया भर में लोगों के लिए जलीय कृषि सुरक्षित‚ पौष्टिक तथा टिकाऊ समुद्री भोजन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। मांग के साथ तालमेल रखने के लिए‚ वैश्विक स्तर पर जलीय कृषि उत्पादन को 2030 तक दोगुना होने की आवश्यकता है। जलीय कृषि उत्पादों की मांग में वृद्धि‚ खाद्य सुरक्षा विचार और रोज़गार निर्माण ने कुशल श्रमिकों की बढ़ती आवश्यकता भी उत्पन्न की है।बांग्लादेश के चटगांव जिले में फ्रेशवाटर की प्रौन मछली पालने की एक छोटी-सीअभिव्यक्ति की गई। ये एक नई हैचरी तकनीक थी‚ जिसमें खारे पानी और एक साधारण रीसर्क्युलेटिंग बायोफिल्टर (recirculating biofilter) का उपयोग किया गया था। इस हैचरी में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों के प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया गया था तथा चार निजी समूहों को प्रशिक्षण और उपकरण के रूप में प्रत्यक्ष सहायता भी दी गई थी। इनमें से तीन प्रतिभागियों ने 1993 के अंत तक प्रॉन हैचरी का निर्माण पूरा कर लिया था और उनमें से एक का उत्पादन शुरू हो गया था। बीओबीपी (BOBP) एक बहु-एजेंसी क्षेत्रीय मत्स्य पालन कार्यक्रम है‚ जिसमें बंगाल की खाड़ी के आसपास के सात देश - बांग्लादेश‚ भारत‚ इंडोनेशिया‚ मलेशिया‚ मालदीव‚ श्रीलंका और थाईलैंड शामिल हैं।आरएएस मॉडलयह कार्यक्रम एक उत्प्रेरक के रूप में सलाहकार की भूमिका निभाता है‚ यह अपने सदस्य देशों में छोटे पैमाने के मछुआरे समुदायों की स्थितियों में सुधार लाने के लिए नई प्रौद्योगिकियों तथा पद्धतियों को विकसित तथा प्रदर्शित करता है तथा विचारों को बढ़ावा देता है। बांग्लादेश में विभिन्न परिचालन स्थितियों के तहत मॉडल की आंतरिक दर का मूल्यांकन करके एक छोटे पैमाने की हैचरी की वित्तीय व्यवहार्यता की जांच की गई थी‚ जिसकी निर्माण लागत स्थानीय ठेकेदारों के अनुमानों तथा संचालन लागत और उत्पादन पोटिया हैचरी (Potiya hatchery) के अनुभव पर आधारित थी। इस मॉडल में पोटिया हैचरी के विपरीत चार की जगह छह 5 टी रियरिंग टैंक (5 t rearing tanks) हैं। ऐसा माना जाता है कि पहले वर्ष के दौरान लक्ष्य उत्पादन का केवल 50 प्रतिशत ही प्राप्त होगा तथा दूसरे वर्ष में बढ़कर 75 प्रतिशत और तीसरे वर्ष में पूर्ण उत्पादन तक पहुंच जाएगा।संदर्भ:https://bit.ly/3iYZnFO https://bit.ly/3J6S7SW https://bit.ly/3wZpiFF
दृष्टि II - अभिनय कला
सिंड्रेला की कहानी और फिल्मों में उसके बदलते और रोचक रूप
हमारे पास ऐसी अनेकों लोक कथाएं और परी कथाएं मौजूद हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती आ रही हैं।“सिंड्रेला” (Cinderella) ऐसी ही एक प्रसिद्ध परी कथाहै जिसके दुनिया भर में हजारों संस्करण मौजूद हैं। इस कहानी पर वर्षों से अनेकों फिल्में बनाई जाती रही हैं तथा उन फिल्मों में समय के साथ कई तरह के नवाचार हुए हैं। यह कहानी एक युवती की है, जिसका जीवन बहुत कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा होता है, किंतु अचानक उसका भाग्य बदलता है,और वह शादी के बाद एक राजकुमारी बन जाती है।“रोडोपिस”(Rhodopis), जो इस कहानी का सबसे पहला ज्ञात संस्करण माना जाता है, के अनुसार यूनान में एक दास युवती हुआ करती थी, जिसकी शादी मिस्र के राजा से होती है। इस कहानी का पहला साहित्यिक यूरोपीय संस्करण 1634 में इटली मेंगिआम्बतिस्ता बेसिल (Giambattista Basile) द्वारा अपने “पेंटामेरोन”(Pentamerone) में प्रकाशित किया गया था।अंग्रेजी भाषी दुनिया में सिंड्रेला का जो संस्करण सबसे व्यापक रूप से जाना जाता है, वह फ्रांसीसी भाषा में 1697 में चार्ल्स पेरौल्ट (Charles Perrault) द्वारा “हिस्टॉयर्स यू कॉन्टेस डू टेम्प्स पासे”(Histoiresou contes du temps passé) में प्रकाशित किया गया था। इस कहानी का एक अन्य संस्करण 1812 मेंब्रदर्स ग्रिम (Brothers Grimm) द्वारा अपने लोक कथा संग्रह “ग्रिम’स फेयरी टेल्स”(Grimms' Fairy Tales) में “एशेनपुटेल”(Aschenputtel) के रूप में प्रकाशित किया गया।तो आइए आज इन चलचित्रों के जरिए सिंड्रेला की कहानी को करीब से जानें तथा देंखे कि 1899 से 2015 तक इस कहानी पर बनाई गई फिल्मों में किस तरह से नवाचार किए गए है।संदर्भ:https://tinyurl.com/2evkmrkz https://tinyurl.com/3r7zeyyt https://tinyurl.com/2p8jtkm6 https://tinyurl.com/56ehaz4m
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
रामायण के कांड, संरचना और श्लोकों में छिपा साहित्यिक व आध्यात्मिक महत्व
रामायण और महाभारत दो ऐसे महाकाव्य हैं, जिन्हें सनातन धर्म का आधार स्तंभ माना जाता है! रामायण हमें आदर्श सेवक, आदर्श भाई, आदर्श पत्नी और आदर्श राजा जैसे आदर्श चरित्रों का चित्रण करते हुए संबंधों के कर्तव्यों का पालन करना सिखाती है। किंतु रामायण में दिए गए श्लोकों को सही अर्थों में समझने के लिए यह बेहद जरूरी है कि, हम इस महाकाव्य की मूलभूत बारीकियों को क्रमानुसार समझें। रामायण एक प्राचीन भारतीय महाकाव्य है जो संस्कृत साहित्य की श्रेणी से संबंधित है। इसे हिंदू ऋषि वाल्मीकि द्वारा लिखा गया था। रामायण नाम, राम और अयन ("जाना, आगे बढ़ना") का एक तत्पुरुष यौगिक है, जिसका अनुवाद "राम की यात्रा" होता है। रामायण में सात पुस्तकों (कांडों) और 500 सर्गों में 24,000 छंद हैं। रामायण भगवान विष्णु के अवतार प्रभु श्री राम की कहानी बताती है, जिनकी पत्नी सीता का लंका के राक्षस राजा रावण द्वारा अपहरण कर लिया जाता है। यह महाकाव्य मानव अस्तित्व के सिद्धांतों और धर्म की अवधारणा की खोज करता है। रामायण को 32-शब्दांश मीटर में लिखा गया है जिसे “अनुष्टुभ्” कहा जाता है और इसमें दार्शनिक तथा भक्ति तत्वों के साथ प्रस्तुत प्राचीन हिंदू संतों की शिक्षाएँ शामिल हैं। अनुष्टुभ् संस्कृत काव्य में प्रयुक्त एक प्रकार का छंद है। मूल रूप से, एक अनुष्टुभ छंद चार पंक्तियों की एक चौपाई है। प्रत्येक पंक्ति, जिसे पद (अक्षर "फुट") कहा जाता है, में आठ शब्दांश होते हैं।अनुष्टुप छन्द, संस्कृत काव्य में सर्वाधिक प्रयुक्त छन्द है, इसका प्रयोग वेदों में भी किया गया है। गीता के श्लोक भी अनुष्टुप छन्द में हैं। आदि कवि वाल्मिकी द्वारा उच्चारित प्रथम श्लोक (मा निषाद प्रतिष्ठा) भी अनुष्टुप छन्द में है। रामायण, महाभारत तथा गीता के अधिकांश “श्लोक” अनुष्टुप छन्द में ही लिखे गए हैं। भारतीय साहित्य में, “श्लोक” कविता के एक विशिष्ट रूप को संदर्भित करता है। श्लोक शब्द संस्कृत मूल श्रु से आया है, जिसका अर्थ "सुनना।" होता है। एक व्यापक अर्थ में, यह किसी कहावत या कहावत सहित किसी भी छंद को संदर्भित करता है। एक श्लोक आमतौर पर एक 32-पंक्ति का छंद होता है। इसमें चार चौथाई छंद होते हैं, जिनमें से प्रत्येक में आठ शब्दांश होते हैं, या दो अर्ध-छंद होते हैं जिनमें से प्रत्येक में 16 शब्दांश होते हैं। श्लोक 'अनुष्टुप छ्न्द' का पुराना नाम भी है। श्लोक को भारतीय महाकाव्य का आधार और भारतीय पद्य का उत्कृष्ट रूप माना जाता है। इसका उपयोग महाभारत, रामायण, पुराणों, स्मृतियों और हिंदू धर्म के वैज्ञानिक ग्रंथों जैसे सुश्रुत संहिता और चरक संहिता जैसे कार्यों में किया जाता है। संस्कृत वाल्मीकि रामायण के पाठ में लगभग 24,000 श्लोक हैं।महाकाव्य रामायण पारंपरिक रूप से सात कांडों (पुस्तकों) में विभाजित है, जिनकी सूची निम्नवत दी गई हैं: 1. बालकाण्ड- इस भाग में भगवान राम और उनके भाई-बहनों, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की उत्पत्ति और उनके बचपन के दिनों का वर्णन किया गया है। इस काण्ड में माता सीता से प्रभु श्री राम के विवाह की कहानी और उन राक्षसों के विनाश की कहानी भी शामिल है जो विश्वामित्र को यज्ञ करने से रोक रहे थे। 2.अयोध्याकाण्ड- इस काण्ड की कहानी प्रभु श्री राम के चौदह वर्ष के वनवास की ओर ले जाती हैं। इसमें दर्शाया गया है कि किस प्रकार प्रभु श्री राम पूर्ण शांति और संयम के साथ वनवास स्वीकार करते हैं। 3.अरण्यकाण्ड- इस कांड में अपने चौदह वर्ष के वनवास के दौरान अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ प्रभु श्री राम के जीवन की कहानी को दर्शाया गया। इसमें राक्षस राजा रावण द्वारा सीता का अपहरण भी शामिल है। ४.किष्किन्धाकाण्ड- इस भाग में वानर योद्धा महाबली हनुमान से प्रभु श्री राम की मुलाकात और राक्षस राजा रावण से सीता को छुड़ाने की उनकी यात्रा की कहानी दर्शायी गई है। 4.सुन्दरकाण्ड - इस काण्ड में माता सीता को खोजने के लिए हनुमान की लंका यात्रा और राक्षस राजा रावण के साथ उनकी मुठभेड़ की कहानी दर्शायी गई है। इस कांड को रामायण का सबसे सुंदर और काव्यात्मक खंड माना जाता है। 5.लंकाकाण्ड - इस काण्ड में माता सीता को बचाने के लिए प्रभु श्री राम और रावण के बीच हुए महायुद्ध की कहानी वर्णित है। साथ ही इसमें रावण पर राम की जीत और सीता के साथ उनका पुनर्मिलन भी शामिल है। 6.उत्तरकाण्ड- उत्तरकाण्ड राम कथा का उपसंहार है। इसमें प्रभु श्री राम के अयोध्या लौटने, राजा के रूप में उनके राज्याभिषेक (राम राज्य की परिभाषा व् उल्लेख), और उनके भाइयों और पत्नी सीता के साथ उनके पुनर्मिलन की कहानी वर्णित है। साथ ही इसमें राम के दो पुत्र लव और कुश का जन्म भी शामिल है।संदर्भ https://bit.ly/3zeNrb0 https://bit.ly/3M1aaPG https://bit.ly/3JUtXh5
महासागर
ग्लास बीच की अनोखी कहानी और समुद्र तट पर बने कांच के प्राकृतिक रत्न
समुद्र तट या बीच (Beaches) हमारी प्रकृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यहां हमें कई चीजें दिखाई दे सकती हैं, लेकिन टूटे हुए कांच के समूह का यहां मौजूद होना किसी आश्चर्य से कम नहीं है।कैलिफोर्निया (California, USA) के फोर्ट ब्रैग (Fort Bragg) में ग्लास बीच (Glass Beach) लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है, जिसके समुद्र तट में पॉलिश (polish) किए गए कांच के चमकदार छोटे टुकड़े पाए जाते हैं। दशकों से स्थानीय समुदायों ने अपने अवांछित सामान, यहां तक कि कारों को समुद्र के किनारे फेंक दिया था। यहां मौजूद कार्बनिक चीजें समय के साथ सड़ गईं, तथा धातु की वस्तुओं में या तो जंग लग गया, या उन्हें कहीं और ले जाया गया। लेकिन टूटे हुए कांच वहीं मौजूद रहे तथा समुद्र की लहरों के टकराव के कारण मुलायम टुकड़ों में परिवर्तित हो गए। यह समुद्र तट अब कानून द्वारा संरक्षित है, और यहां मौजूद प्रतिष्ठित कांच को आगंतुकों द्वारा हटाया नहीं जा सकता है। दुनिया भर के अन्य स्थानों में भी समुद्री कांच की उच्च सांद्रता है, जिसके लिए उन लोगों को धन्यवाद देना चाहिए, जिन्होंने कांच इन स्थानों में फेंका है। साइबेरिया (Siberia) में उससुरी (Ussuri) खाड़ी कांच बनाने वाली फैक्ट्रियों का केंद्र है, जो कांच अपशिष्ट को समुद्र में फेंक देते हैं। यहां अब समुद्र तट पत्थरों और समुद्री कांच का एक रंगीन मिश्रण बन गया है। संदर्भ:https://bit.ly/3VeCKPy https://bit.ly/3rD71Ko
मानव : 40000 ई.पू. से 10000 ई.पू.
मैमथ के रहस्य जीवाश्म और प्राचीन मानव इतिहास की रोचक कहानी
मैमथ (Mammoth), आधुनिक हाथियों के प्राचीन रिश्तेदार हुआ करते थे जो, लगभग 50,000 ईसा पूर्व से 10,000 ईसा पूर्व के दौरान हमारी पृथ्वी पर घूमा करते थे। ये काफी हद तक हाथियों जैसे दिखते थे, लेकिन वास्तव में हाथियों से बहुत बड़े होते थे। मैमथ का वैज्ञानिक नाम 'मैमुथस प्राइमिजीनियस' है, और अब यह पूरी तरह से विलुप्त हो चुके हैं। सालों पहले भारतीय वैज्ञानिकों को कॉर्बेट नेशनल पार्क (Corbett National Park) में इन्हीं का एक विशाल जीवाश्म मिला था। यद्यपि, भारत में अभी तक मनुष्यों द्वारा तराशे कोई भी मैमथ हाथी दांत नहीं मिले हैं। लेकिन जर्मनी (Germany) की वोगेलहर्ड नामक एक गुफा (Vogelherd Cave) में शोधकर्ताओं को अलग-अलग जानवरों के आकार की, बारीकी से शानदार नक्काशी किये हुए विशाल मैमथ के दांत मिले हैं । वोगेलहर्ड गुफा, दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी में पूर्वी स्वाबियन जुरा (Eastern Swabian Jura) नामक स्थान में मौजूद है। यह गुफा चूना पत्थर की चट्टान से बनी है। शोधकर्ताओं की इस गुफा पर नजर 1931 में पड़ी जब उन्हें इसके अंदर कुछ छोटी-छोटी मूर्तियां मिलीं। दरअसल 23 मई, 1931 में, हरमन मोन (Hermann Mohn) नामक एक व्यक्ति को यहां पर फ्लिंटस्टोन (Flintstones) के कुछ टुकड़े मिले। इसके बाद उन्होंने ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय (University Of Tübingen) को अपनी खोज के बारे में बताया। उसी वर्ष, ट्यूबिंगन के गुस्ताव रीक (Gustav Rieck) नामक एक वैज्ञानिक ने 15 जुलाई से 1 अक्टूबर 1931 तक तीन महीने तक इस गुफा में खुदाई की। इसके बाद जाकर उन्हें इस बात के प्रमाण मिले कि, “इस स्थान पर मनुष्य रहते थे, क्योंकि यहाँ पर उन्हें पुराने पाषाण युग से लेकर कांस्य युग तक, विभिन्न समय अवधि के औजार और अन्य वस्तुएँ मिलीं।” यहाँ उन्हें ऑरिग्नेशियाई काल (Aurignacian Period) की मिट्टी की एक परत में विशाल हाथी दांत से बनी कई छोटी-छोटी आकृतियाँ भी मिलीं। इन आकृतियों में बिंदु, रेखाएं और एक्स-आकार के निशान जैसी सजावट भी की गई थी। ये निशान यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि उनका उपयोग धार्मिक या अनुष्ठानिक उद्देश्यों के लिए किया गया होगा। साथ ही यहाँ पर उन्हें गहने और हाथी दांत से बनी बांसुरी के टुकड़े भी मिले। ये सभी कलाकृतियाँ ऊपरी पुरापाषाण काल (Upper Paleolithic) के दौरान ऑरिग्नेशियाई संस्कृति (Aurignacian Culture) के प्रारंभिक मनुष्यों द्वारा विशाल ऊनी मैमथ हाथी दांत से बनाई गई थीं। इन्हें दुनिया की सबसे पुरानी ज्ञात कला कृतियों में से एक माना जाता है। 2017 में इन्हें यूनेस्को (UNESCO) द्वारा, विश्व धरोहर स्थलों की सूची में भी शामिल कर लिया गया था। इन मूर्तियों में शामिल है: जंगली घोड़ा: यह एक घोड़े की मूर्ति है, जो लगभग 30,000 - 29,000 वर्ष पुरानी है। यह मूर्ति बहुत सटीक आकार की है। जानकार मानते हैं कि यह एक आक्रामक या प्रभावशाली घोड़े का प्रतिनिधित्व करती है। इसका केवल सिर ही पूरी तरह सुरक्षित है। शेर का सिर: यह मूर्ति लगभग 40,000 वर्ष पुरानी है। इसे 1931 में अधूरे सिर के साथ खोजा गया था। इसका एक अन्य खोया हुआ टुकड़ा 2005 और 2012 के बीच खुदाई के दौरान खोजा गया था और इसके बाद दोनों को सफलतापूर्वक पुनः जोड़ा गया था, जिससे यह पुष्टि हुई कि मूर्ति वास्तव में एक त्रि-आयामी मूर्तिकला है। इसकी रीढ़ पर लगभग 30 बारीक कटे हुए क्रॉस (Cross) हैं। मैमथ: यह लगभग 35,000 वर्ष पुरानी ऊनी मैमथ (Wooly Mammoth) की मूर्ति है। यह पूरी मूर्ति पूरी तरह से अक्षुण्ण (Intact) है, और इसमें विस्तृत नक्काशी की गई है। यह अपने पतले आकार, नुकीली पूंछ, मजबूत पैरों और गतिशील रूप से घुमावदार धड़ के कारण इन सभी में सबसे अलग दिखती है। वोगेलहर्ड गुफा में खोजी गई ऊनी मैमथ की यह नक्काशी बहुत छोटी (केवल 3.7 सेमी लंबी और वजन केवल 7.5 ग्राम) है। इसके अलावा शोधकर्ताओं को यहां पर 200,000 से अधिक पत्थर के औजार, हड्डी और हाथी दांत से बने औजार, पक्षियों की हड्डियों सहित अन्य जानवरों की लगभग 500 किलोग्राम हड्डियां और 28 किलोग्राम विशाल हाथी दांत मिले।यदि हम भारत में मैमथ की उपस्थिति पर नजर डालें तो ओडीशा राज्य के जाजपुर ज़िले सहित 2019 में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (Corbett Tiger Reserve) के बिजरानी क्षेत्र में भी एक 'विशाल मैमथ” का जीवाश्म खोजा गया। इस खोज ने वन्य जीवन रूचि रखने वाले लोगों और वैज्ञानिकों के बीच उत्सुकता बड़ा दी है। एमपीएस बिष्ट (MPS Bisht) नामक एक भूविज्ञानी, जो उत्तराखंड अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के निदेशक भी हैं और इस जीवाश्म की खोज करने वाली टीम का हिस्सा थे, के अनुसार यह विशाल मैमथ का एक का जबड़ा है और लगभग 1.2 मिलियन वर्ष पुराना हो सकता है। लेकिन इसकी पुष्टि के लिए उन्हें और परीक्षण करने की जरूरत है। हालांकि कश्मीर में गैलेंडर पंपोर नामक एक जगह में भी इसी तरह के एक मैमथ के जीवाश्म मिलने का दावा किया गया था। लेकिन अब शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि, गैलेंडर पंपोर में पाए गए जीवाश्म वास्तव में मैमथ के नहीं, बल्कि किसी अन्य प्राचीन हाथी के हैं। हाथी की खोपड़ी से पता चलता है कि वह पेलियोलोक्सोडोन प्रजाति (Palaeoloxodon Species) का था और लगभग 50 वर्ष का था।जीवाश्मों के साथ-साथ यहां पर प्रारंभिक मध्य पुरापाषाण युग के पत्थर के औजार भी खोजे गये हैं। ये सभी जीवाश्म और पत्थर के औजार अब जम्मू विश्वविद्यालय के प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय में रखे गए हैं। हालांकि इस जीवाश्म के कुछ हिस्से 2004 के बाद चोरी हो गए या नष्ट हो गए थे।मैमथ (Mammoth), आधुनिक हाथियों के प्राचीन रिश्तेदार हुआ करते थे जो, लगभग 50,000 ईसा पूर्व से 10,000 ईसा पूर्व के दौरान हमारी पृथ्वी पर घूमा करते थे। ये काफी हद तक हाथियों जैसे दिखते थे, लेकिन वास्तव में हाथियों से बहुत बड़े होते थे। यद्यपि, भारत में अभी तक मनुष्यों द्वारा तराशे कोई भी मैमथ हाथीदांत नहीं मिले हैं। लेकिन जर्मनी की वोगेलहर्ड नामक एक गुफा में, शोधकर्ताओं को शानदार नक्काशी के साथ विशाल मैमथ के दांत मिले हैं, जिन्हें मनुष्यों द्वारा अलग-अलग जानवरों के आकार में उकेरा गया है। संदर्भ https://tinyurl.com/2u577jzr https://tinyurl.com/4afjx5bb https://tinyurl.com/mrsphhw4 https://tinyurl.com/24u6ub24 https://tinyurl.com/345s5aay
फल और सब्जियाँ
काली मिर्च: स्वाद, खेती और वैश्विक व्यापार की एक रोचक यात्रा
भारत को “मसालों का देश” कहा जाता है। देश में ढेरों मसालों के बीच काली मिर्च का तड़का हमारे स्वादिष्ट व्यंजनों में जान फूंक देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मिर्च की भांति बिल्कुल भी नहीं दिखाई देने वाली, “काली मिर्च” भारत के मसाला व्यापार में भी जान फूंक देती है। चलिए जानते हैं कैसे?काली मिर्च ‘पाइपर नाइग्रम’ (Piper Nigrum) नामक पौधे में उगने वाला सूखा कच्चा फल होती है। अपनी तेज़ गंध, स्वाद और औषधीय गुणों के कारण काली मिर्च, दुनियाभर के सबसे लोकप्रिय मसालों में से एक मानी जाती है। भारत दुनिया में काली मिर्च के सबसे प्रमुख उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक देशों में से एक है। भारत में काली मिर्च की खेती मुख्य रूप से केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु तथा सीमित मात्रा में महाराष्ट्र, उत्तर पूर्वी राज्यों और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में की जाती है। देश में काली मिर्च का सर्वाधिक उत्पादन केरल और कर्नाटक राज्य में होता है। काली मिर्च 10 मीटर ऊंचाई तक फूलों वाली लताओं (Vine) पर उगती है। यह लताएँ सिल्वर ओक (Silver Oak) जैसे ऊंचे पेड़ों के सहारे बढ़ती हैं। लतायें पहली बार चौथे या पाँचवें वर्ष के बाद फल देना शुरू करती हैं और उसके बाद सात वर्षों तक फल देती रहती हैं। 7वीं शताब्दी से पहले, काली मिर्च की लतायें केवल जंगलों में उगती थीं। काली मिर्च नम उष्णकटिबंधीय पौधा है, जिसके लिए उच्च वर्षा और आर्द्रता की आवश्यकता होती है। भारत में पश्चिमी घाट के उपपर्वतीय इलाकों की गर्म और आर्द्र जलवायु, काली मिर्च की खेती लिए आदर्श मानी जाती है। यह फसल 20° उत्तर और दक्षिण अक्षांश के बीच तथा समुद्र तल से 1500 मीटर की ऊंचाई तक सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। यह फसल 10° से 40°C के बीच का तापमान सह सकती है। लेकिन बेहतर उत्पादन के लिए आदर्श तापमान 28°C के औसत के साथ 23 -32°C के बीच माना जाता है।जड़ की वृद्धि के लिए मिट्टी का इष्टतम तापमान 26° से 28°C होना चाहिए। काली मिर्च की बेहतर पैदावार के लिए तकरीबन 125-200 से.मी (cm) की अच्छी तरह से वितरित वार्षिक वर्षा को आदर्श माना जाता है। काली मिर्च को 5.5 से 6.5 हाइड्रोजन क्षमता (Potential of Hydrogen(P.H) value) के साथ विविध प्रकार की मिट्टी में उगाया जाता है, हालांकि, प्राकृतिक तौर पर यह लाल लैटेराइट मिट्टी में अच्छी तरह से उगती है। भारत में काली मिर्च की 75 से अधिक किस्मों की खेती की जाती है। केरल में उगाई जाने वाली ‘करीमुंडा’ (Karimunda) काली मिर्च की सबसे लोकप्रिय किस्म है। काली मिर्च की अन्य महत्वपूर्ण किस्मों में ‘कोट्टनादन’ (Kottanadan) (दक्षिण केरल), ‘नारायणकोडी’ (Narayankodi) (मध्य केरल), ‘एम्पिरियन’ (Empirian) (वायनाड), ‘नीलामुंडी’ (Neelamundi) (इडुक्की), ‘कुथिरावली’ (Kuthiravalli) (कोझिकोड और इडुक्की), ‘कल्लुवली’ (Kalluvalli) (उत्तरी केरल), ‘मल्लिगेसरा’ और ‘उद्दगरे’ (Malligesara and Uddagare) (कर्नाटक) शामिल हैं। क्या आप जानते है कि काली मिर्च दुनिया के उन सबसे शुरुआती मसालों में से एक थी, जिनका व्यापार किया गया था। व्यापारिक दुनिया में काली मिर्च कई ऐतिहासिक घटनाओं की गवाह भी रही है। माना जाता है कि काली मिर्च के व्यापार के परिणामस्वरूप ही प्रसिद्ध मसाला मार्गों (Spice Routes) की खोज हुई थी। साथ ही मसाला मार्गों की बदौलत ही वैश्वीकरण की शुरुआत हुई थी। 30 ईसा पूर्व में प्रारंभिक रोमन साम्राज्य (Roman Empire) ने मिस्र पर विजय प्राप्त करने के बाद भारत में मालाबार तट से विदेशी मसालों की श्रृंखला तक सीधी पहुंच हासिल की थी। उस समय काली मिर्च की कीमत का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उस दौरान हूणों (Huns) द्वारा घिरे रोम को मुक्त करने के लिए फिरौती के रूप में सोने, चांदी और रेशमी अंगरखे के साथ-साथ 3,000 पाउंड काली मिर्च की मांग की गई थी। काली मिर्च, को आज भी काला सोना कहा जाता है। मध्य युग में इसका प्रयोग मुद्रा के रूप में भी किया जाता था। इसके अलावा किसी भी महंगी चीज के लिए “काली मिर्च के बराबर प्रिय” शब्द का प्रयोग किया जाता था। मध्य युग के दौरान काली मिर्च की कीमतें बहुत अधिक थीं। इस दौरान काली मिर्च का व्यापार पूरी तरह से रोमनों के अधीन था। 15वीं शताब्दी के मध्य में, पुर्तगाल पूरे यूरोप (Europe) में अग्रणी समुद्री राष्ट्र था। इसी समयान्तराल में नाविक प्रिंस हेनरी (Prince Henry) के नेतृत्व में, रोमनों के एकाधिकार को तोड़ने तथा पूर्व से विदेशी मसालों पर पकड़ बनाने के लिए भारत तक एक समुद्री मार्ग खोजने के प्रयास भी चल रहे थे। इसके परिणाम स्वरूप पुर्तगाली खोजकर्ता ‘वास्को डी गामा’ (Vasco Da Gama) को भारत आने के लिए नियुक्त किया गया। वह मध्य पूर्व और मध्य एशिया के माध्यम से ‘रेशम मार्ग’ (Silk Road) से बचते हुए, अफ्रीका के चारों ओर घुमावदार मार्ग लेते हुए यूरोप से भारत जाने वाले पहले व्यक्ति बने। वास्को डी गामा की सफल यात्रा, भारत पर पुर्तगाली उपनिवेशवाद के 450 वर्षों की शुरुआत मानी जाती है। दरसल, इस दौरान मसाले औषधीय रूप से महत्वपूर्ण माने जाते थे। किंतु वे केवल पूर्व के उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ही उगते थे, जिससे पश्चिम में उनकी बहुत मांग थी। इन मसालों का खाद्य-सुगंधित स्वादों के साथ-साथ औषधि, जहर के लिए मारक, मलहम और कुछ का तो अगरबत्ती के रूप में भी उपयोग किया जाता था। लगभग एक सदी तक मसालों के व्यापार पर पुर्तगालियों का वर्चस्व रहा। हालांकि, इस वर्चस्व को डचों (Dutch) द्वारा समाप्त कर दिया गया और 1635 की शुरुआत में अंग्रेजों ने काली मिर्च के बागान स्थापित किए। वर्तमान में, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु भारत के शीर्ष तीन काली मिर्च उत्पादक राज्य हैं। 2008 से 2012 के बीच कर्नाटक में इसका उत्पादन दोगुने से अधिक हो गया है। लेकिन इसी अवधि के दौरान केरल में यह उत्पादन आधे से भी कम हो गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि धीरे-धीरे किसान बहु-फसल और इलायची जैसी जल्दी उगने और महंगी बिकने वाली फसलों की ओर बढ़ रहे हैं।काली मिर्च के वैश्विक व्यापार में भारत, वियतनाम (Vietnam) और ब्राजील (Brazil) का दबदबा है। भारत काली मिर्च के दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक एवं निर्यातक देशों में से एक है, जो दुनिया की 34% काली मिर्च का उत्पादन करता है। सूखी और पकी हुई काली मिर्च का उपयोग प्राचीन काल से ही स्वाद और पारंपरिक औषधि दोनों के लिए किया जाता रहा है। काली मिर्च दुनिया में सबसे अधिक कारोबार किया जाने वाला मसाला है। काली मिर्च के वैश्विक बाजार को एशिया-प्रशांत (Asia-Pacific), यूरोप, उत्तरी अमेरिका (North America), दक्षिण अमेरिका (South America) और मध्य पूर्व और अफ्रीका (Africa) में विभाजित किया गया है। उत्पादन और निर्यात के मामले में एशिया-प्रशांत वैश्विक काली मिर्च बाजार पर हावी माना जाता है। वियतनाम (Vietnam) दुनिया भर में काली मिर्च का सबसे बड़ा निर्यातक है, क्योंकि काली मिर्च के पौधे उगाने के लिए वहां की जलवायु और परिस्थितियां अनुकूल मानी जाती हैं। ‘वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय’ के मसाला बोर्ड (Spices Board) द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में कोविड-19 (COVID-19) महामारी की संकटग्रस्त स्थिति के बावजूद भी भारत से काली मिर्च के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। काली मिर्च जैसे भारतीय मसाले दुनिया के सबसे लोकप्रिय मसालों में से एक हैं। जब काली मिर्च की मांग बढ़ने की बात आती है तो भारत स्वयं भी हमेशा से ही अग्रणी राष्ट्र रहा है। हमारा देश इस लोकप्रिय मसाले का एक प्रमुख निर्यातक भी रहा है। आंकड़ों के अनुसार 2020-2021 के दौरान भारत से काली मिर्च का निर्यात काफी बढ़ा है। संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) काली मिर्च का दुनिया में सबसे बड़ा आयातक (कुल आयात का 16.2% हिस्सा) है। अमेरिका के बाद नीदरलैंड (Netherlands), जर्मनी (Germany), यूके (UK) और जापान (Japan) हैं। यह देश दुनिया भर में आयात की जाने वाली कुल काली मिर्च का 50% से अधिक हिस्सा आयात करते हैं। वियतनाम अभी भी दुनिया का सबसे बड़ा काली मिर्च उत्पादक और निर्यातक देश है। 2022 में, वियतनाम का निर्यात 220,000 टन होने का अनुमान था, जो दुनिया भर में कुल काली मिर्च उत्पादन का 55% है। काली मिर्च को एक बुनियादी खाद्य मसाला माना जाता है, और संभवतः खाने की मेज पर नमक के साथ रखा जाने वाला एक मसाला है। किसने सोचा होगा कि खाने की मेज पर छोटी सी शीशी में रखी जाने वाली काली मिर्ची का दुनिया के व्यापार इतिहास पर इतना प्रभाव रहा होगा? संदर्भhttps://bit.ly/3HXz3Iu https://bit.ly/3HSsFCc https://bit.ly/3XnsmFd
स्वाद - भोजन का इतिहास
मेरठ के प्रसिद्ध व्यंजन: हलवा-पराठा और शहर की स्वादिष्ट खान-पान परंपरा
हम जानते हैं कि हमारे मेरठ शहर को खेल नगरी कहा जाता है। हालांकि मेरठ कैंची, खेल के सामान और गजक पट्टी के लिए भी विशेष रूप से प्रसिद्ध है। लेकिन इन सभी चीजों के अलावा एक अन्य ऐसी चीज है, जो इसे स्वर्ग बनाती है और वह है यहां का स्वादिष्ट व्यंजन। हमारा शहर अपने खान-पान के लिए भी बहुत मशहूर है। समृद्ध व्यंजनों के प्रति मेरठ के लोगों का प्रेम किसी से छिपा नहीं है। यहां का अनोखा स्थानीय भोजन पूरे देश में लोकप्रिय है। यहां के हलवा-पराठे की रेसिपी और इसका स्वाद सौ साल पुराना है। हलवा पराठा का नाम सुनते ही नौचंदी मेले की याद ताजा हो जाती है। तो आइए आज हम यहां के कुछ मशहूर स्थानीय व्यंजनों को देखते हैं और उनका मजा लेते हैं।संदर्भ:https://tinyurl.com/3zhv76b5https://tinyurl.com/3ntdsmnw
तितलियाँ और कीट
ब्लैक सोल्जर फ्लाई से पशुधन चारे के संकट का उभरता समाधान
एक या अधिक पशुओं के समूह को, जिन्हें कृषि सम्बन्धी परिवेश में भोजन, रेशे तथा श्रम आदि सामग्रियां प्राप्त करने के लिए पालतू बनाया जाता है, पशुधन के नाम से जाने जाते हैं। आपको बता दें कि उत्तर भारतीय राज्यों के किसानों को गेहूं उत्पादन के अभाव के कारण सूखे चारे की कमी का सामना करना पड़ रहा है। गेहूं की उपज में कमी के कारण कई उत्तरी राज्यों में पशुओं के चारे को लेकर संकट पैदा हो गया है, जो एक चिंतनीय विषय है। इस संकट से हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड जैसे कई उत्तरी राज्य ग्रसित है । परिणाम स्वरूप इन राज्यों ने अन्य राज्यों में पुआल (गेहूं या धान आदि के सूखे डंठल जिन में से दाने निकाल लिए गए हो) भेजने पर पूर्ण रूप से या अनिश्चितकालीन प्रतिबंध लगा दिया है। दुनिया की कुल कृषि में पशुधन का 70 से 80% हिस्सा है और फिर भी पशुधन द्वारा मनुष्यों द्वारा खपत की जाने वाली कैलोरी और प्रोटीन का क्रमशः केवल 18% और 25% ही उत्पन्न किया जाता है । पशुओं के लिए भोजन उगाने के लिए दुनिया की 33% फसल भूमि का उपयोग किया जाता है, फिर भी पशुओं के लिए चारे का संकट सदैव बना रहता है। इस समस्या के समाधान के लिए, पशुओं के चारे के रूप में, कीटों को चारे के मौजूदा स्रोतों, जिनमें ज्यादातर मछली और सोयाबीन शामिल हैं, का पूरक बनाया जा सकता है । पशुधन चारे के रूप में कीटों का उपयोग भोजन की स्थिरता में सुधार कर सकता है क्योंकि कीट कम मूल्य वाले जैविक कचरे (जैसे, फल, सब्जियां और यहां तक कि खाद) को उच्च गुणवत्ता वाले चारे में बदल सकते हैं। मवेशियों की आबादी को बनाए रखने में कीटों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ब्लैक सोल्जर फ्लाई लार्वा (Black Soldier Fly larvae ), जिसे हर्मेशिया इल्यूसेंस (Hermetia illucens) भी कहा जाता है , एक ऐसा सबसे आम कीट है, जिसका उपयोग पशु आहार के लिए कीट आहार के रूप में किया जाता है। ब्लैक सोल्जर फ्लाई लार्वा (BSFL) के सूखे वजन में 50% तक क्रूड प्रोटीन (Crude Protein (CP) तक, 35% तक लिपिड (Lipids) होते हैं और इसमें एक अमीनो एसिड (Amino Acid) होता है जो मछली के भोजन के समान होता है। इन कीटों को पोल्ट्री (Poultry), सूअर, मछली और झींगा की कई प्रजातियों के लिए प्रोटीन के वैकल्पिक स्रोतों के रूप में पहचाना और उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त इन कीटों द्वारा कृत्रिम वातावरण में भी कचरे को मूल्यवान प्रोटीन में कुशलता से परिवर्तित किया जा सकता है । जानवरों के चारे के रूप में इन कीटों का उपयोग करने से न केवल पोषण के मामले में बल्कि पशु स्वास्थ्य के मामले में भी अतिरिक्त लाभ होते हैं। कीटों की खेती, हालांकि अभी कम ज्ञात और कम चर्चित है, परंतु भारत और दुनिया भर में निरंतर एक फलता-फूलता उद्योग बन रहा है, जिसमें खपत और अन्य उपयोग-मामलों के लिए विभिन्न प्रकार के कीटों का प्रजनन, पालन और कटाई शामिल है। कीटों की खेती का चलन युगों पहले से चला आ रहा है। प्राचीन यूनानियों और रोमियों द्वारा उस समय के अभिजात वर्ग के लिएएक स्वादिष्ट भोजन बनाने के लिए आटे और शराब से बनने वाले आहार पर बीटल लार्वा का इस्तेमाल किया गया था। तब से लेकर अब तक, सभ्यताओं और संस्कृतियों के पार, कीट खेती बहुत विकसित हुई है। वर्षों से हमारे द्वारा प्रचुर मात्रा में खेती किए जाने वाले कुछ कीटों में, रेशम के कीड़े, मधुमक्खियाँ, टिड्डे, घर की मक्खियाँ, ततैया, टिड्डियाँ, खाने के कीड़े, केंचुए, इत्यादि शामिल हैं । आज, संभवतः खेती द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले कीटों का सबसे प्रमुख उपयोग पशुओं के लिए भोजन और चारा पैदा करने के लिए किया जाता है । जबकि कीट पालन के एक अन्य प्रमुख अनुप्रयोग में मानव उपभोग के लिए खाद्य कीटों जैसे झींगुर आदि का पालन शामिल है ।हालांकि, पोषण के दृष्टिकोण से कीट, प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्वों का एक बड़ा स्रोत हैं, फिर भी आज की तारीख में, शायद ही कभी मानव उपभोग के लिए इनका उपयोग किया जाता है । मोटे तौर पर, हमारे देश में समग्र जनमत कीटों को खाने की अवधारणा के खिलाफ है। हालांकि, भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र में, कीटाहारिता (Entomophagy), जो कीड़ों को खाने की प्रथा को संदर्भित करता है, क्षेत्र के स्थानीय-आदिवासी समुदायों द्वारा बड़े पैमाने पर कई वर्षों से अभ्यास किया गया है और साथ ही यह उनकी आजीविका में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। जबकि भारत के कई अन्य राज्यों में, अंत-उपभोक्ताओं की अस्वीकृति खाद्य कीटों से बने आहार को अपनाने की दिशा में एक प्रमुख बाधा के रूप में बनी हुई है, अक्सर यह घृणा की भावना के साथ-साथ कई बार अनिश्चित, आदिम जीवन शैली से जुड़ा हुआ माना जाता है। भारत में कीट पालन से जुड़े अन्य प्रमुख मुद्दों में पशुओं को कीट खिलाने से जुड़ी अन्य चिंताएं भी शामिल हैं, जैसे कि पशुओं में संभावित एलर्जी प्रतिक्रियाएं और संक्रामक रोगों के प्रति भेद्यता। इसी समय, भारत में कीट पालन से जुड़े नियामक कानून पूरी तरह से पूर्ण और अच्छी तरह से परिभाषित नहीं हैं, इसको बढ़ावा देने के विपरीत यह कीट कृषि क्षेत्र में कई स्टार्टअप/कंपनियों को उत्पादन (कीट-आधारित उत्पादों के) को औद्योगिक स्तर तक बढ़ाने और साथ ही वैश्विक बाजारों तक पहुंच स्थापित करने से रोक रहे है।संदर्भ: https://bit.ly/3w9KiI3 https://bit.ly/3w9KmaL https://bit.ly/3QM0ski
स्पर्श - बनावट/वस्त्र
पैनटोन सिस्टम: कैसे तय होता है दुनिया भर में रंगों का एक समान मानक
क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब हम चित्रकारी के लिए रंगों का चयन करते है, तब मानक रंगों की एक सूची के आधार पर हम किसी रंग का चयन करते हैं। वैसे ही, जब हम दुनिया में कहीं भी किसी वस्त्र या कपड़े के रंग का चयन करते हैं, तो हमें उस विशिष्ट रंग के चयन के लिए एक “कलर स्पेस” (Colour space) सिस्टम या ‘कलर शेड कार्ड’ (Colour Shade Card) दिखाया जाता है। यह प्रणाली “पैनटोन” (Pantone) नामक एक अमेरिकी कंपनी का एकाधिकार है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया भर में छोटी या बड़ी सभी कपड़ा बिक्री कंपनियां तथा दुकानें भी मानक रंगों की इस सूची को ही उनके कपड़ों का रंग चुनने हेतु उपयोग में लाती हैं?पैनटोन कंपनी रंग संचार और प्रेरणा सेवाओं की प्रदाता कंपनी है। पैनटोन कंपनी का मुख्यालय अमेरिकी राज्य न्यू जर्सी (New Jersey) के कार्लस्टेड (Carlstadt) शहर में स्थित है। यह कंपनी अपने ‘पैनटोन मैचिंग सिस्टम’ (पीएमएस) [Pantone Matching System, PMS] के लिए जानी जाती है। पीएमएस का उपयोग विभिन्न प्रकार के उद्योगों में, विशेष रूप से ग्राफिक डिजाइन (Graphic design), फैशन डिजाइन (Fashion design), उत्पाद डिजाइन (Product design), छपाई और निर्माण आदि में किया जाता है। पीएमएस द्वारा बनाया गया कलर स्पेस कार्ड, डिजाइन से लेकर उत्पादन तक किसी भी रंग के प्रबंधन का समर्थन करने के लिए, भौतिक या फिर डिजिटल (Digital) स्वरूपों में इस्तेमाल किया जाता है। एक कलर स्पेस या कलर शेड कार्ड में रंगों की एक विशिष्ट मानक व्यवस्था होती है। इस कलर स्पेस से संदर्भ लेकर हम किसी भी रंग को पहचान सकते है। पैनटोन मैचिंग सिस्टम या पीएमएस, जो कि एक मानकीकृत रंग प्रतिकृति प्रणाली है, पूरे विश्व में प्रयुक्त रंगों के लिए एक मानक रंग व्यवस्था के रूप में कार्य करती है, इस प्रणाली का उपयोग विश्व भर में कोई भी किसी विशिष्ट रंग की पहचान करने के लिए कर सकता है। कलर स्पेस, रंगों की एक ऐसी विशिष्ट व्यवस्था है, जो विभिन्न भौतिक उपकरणों द्वारा बनाए जाने वाले रंगों के संयोजन में, रंग के पुनरुत्पादित प्रतिनिधित्व का समर्थन करता है। इस तरह के प्रतिनिधित्व में सादृश्य या डिजिटल प्रतिनिधित्व भी शामिल हो सकता है। किसी विशेष उपकरण या डिजिटल फ़ाइल की रंग क्षमताओं को समझने के लिए “कलर स्पेस” एक उपयोगी वैचारिक उपकरण है। अतः एक कलर स्पेस की मदद से हम किसी भी रंग की सही पहचान कर सकते हैं और बता सकते हैं कि, हमारे कपड़े का मानक रंग कौन सा है।पीएमएस का उपयोग डिजाइनरों को, जब कोई डिजाइन उत्पादन चरण में प्रवेश करता है, तब विशिष्ट रंगों के लिए “रंग मिलान” की अनुमति देना है। फिर चाहे रंग का उत्पादन करने के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले उपकरण कैसे भी हो। इस प्रणाली को ग्राफिक डिजाइनरों एवं पुनरुत्पादन और मुद्रण गृहों द्वारा व्यापक रूप से अपनाया जाता है। हालांकि पीएमएस कलर गाइड्स (Colour Guides) को सालाना खरीदा एवं बदला जाता है, क्योंकि समय के साथ उनकी स्याही थोड़ी फीकी पड़ जाती है। पैनटोन कलर मैचिंग सिस्टम, काफी हद तक एक मानकीकृत रंग प्रतिकृति प्रणाली है। वर्ष 2019 तक इसमें कुल 2161 रंग थे। रंगों को मानकीकृत करके, विश्व के अलग-अलग स्थानों में विभिन्न निर्माता पैनटोन प्रणाली का उपयोग कर यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि रंग एक दूसरे के साथ सीधे संपर्क के बिना मेल खाएं ।ऐसा ही एक प्रयोग सीएमवाईके (CMYK) प्रक्रिया में रंगों का मानकीकरण करना है। सीएमवाईके प्रक्रिया स्याही के चार रंगों, सियान (Cyan), मैजेंटा ( Magenta), पीले (Yellow) और काले (Black) रंग का उपयोग करके प्रिंट करने की एक विधि है। दुनिया की अधिकांश मुद्रित सामग्री इसी प्रक्रिया का उपयोग करके निर्मित की जाती है। सीएमवाईके का उपयोग करके पैनटोन रंगों के एक विशेष उपसमूह को पुन: प्रस्तुत किया जा सकता है। वर्ष 2000 से, पैनटोन कलर संस्था द्वारा एक विशेष रंग को “कलर ऑफ द ईयर (Colour of the year)” भी घोषित किया जाता है। ‘कलर ऑफ द ईयर’ का मतलब एक पूरे वर्ष के लिए किसी विशिष्ट रंग को चुनना है। यह कंपनी एक वर्ष में दो बार विभिन्न देशों के रंग मानक समूहों के प्रतिनिधियों की एक गुप्त बैठक आयोजित करती है। दो दिनों की प्रस्तुतियों और बहस के बाद, इन प्रतिनिधियों द्वारा अगले वर्ष के लिए एक रंग को चुना जाता है ; उदाहरण के लिए, इस साल 2023 की गर्मियों के लिए 2022 में न्यूयॉर्क (New York) में विशेष रंग वीवा मैजेंटा (Viva Magenta) चुना गया था। पैनटोन के साथ–साथ इसकी कुछ प्रतिस्पर्धी कंपनियां भी विश्व में है, जिनका कार्य पैनटोन से थोड़ा बहुत मिलता जुलता है। परंतु आज भी, रंगों के मानकीकरण के लिए दुनिया में पैनटोन का ही बोलबाला है। पैनटोन की प्रतिस्पर्धी कंपनियां निम्न उल्लेखित हैं- डाटाकलर (Datacolor)-अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से रंग मापन, प्रबंधन, संचार और अंशशोधन के लिए समाधान प्रदान करता है। साइनआर्ट (Signart)- वाणिज्यिक, विद्युत, वास्तुकला, वित्तीय, स्वास्थ्य देखभाल, आतिथ्य क्षेत्रों आदि के लिए चिह्नों का निर्माता है। बिनयान स्टूडियोज (Binyan Studios)- एक वास्तुकला से संबंधित और डिज़ाइन कंपनी है।जैम फिल्ड (Jam Filled)- एक डिजिटल एनिमेशन (Animation) स्टूडियो है। इस तरह से हम पैनटोन मैचिंग सिस्टम या कलर स्पेस के आधार पर रंग चुनते हैं। इन प्रणालियों की मदद से हम अपने कपड़ों का रंग भी निर्धारित कर सकते हैं। चूंकि दुनिया के हर एक हिस्से में विभिन्न रंगों के नाम अलग-अलग होते हैं, इसलिए एक विशिष्ट रंग तय करने के लिए इस मानकीकृत प्रणाली को देखा जाना चाहिए।संदर्भhttps://bit.ly/3FHuOjI https://bit.ly/3Tzc4si https://bit.ly/3nenshq https://bit.ly/3M0dt9V
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
दांडी मार्च: नमक सत्याग्रह जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी
महात्मा गांधी, जिन्हें राष्ट्रपिता और बापू के नाम से भी जाना जाता है, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे महान नेताओं में से एक थे। उनका व्यक्तित्व और उनके विचार आज भी हर बच्चे, युवा और वृद्ध के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उन्होंने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए न केवल भारत को स्वतंत्रता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि पूरी दुनिया को शांतिपूर्ण संघर्ष की शक्ति का संदेश भी दिया। उनके नेतृत्व में चलाए गए कई आंदोलनों ने भारतीयों को एकजुट किया और उन्हें अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस दिया।स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए महात्मा गांधी ने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया और देश को आज़ाद कराने के लिए अनेक महत्वपूर्ण आंदोलन चलाए। इन्हीं आंदोलनों में से एक था नमक आंदोलन, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला कर रख दिया। इस आंदोलन को नमक सत्याग्रह या दांडी आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है। इस सत्याग्रह का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों द्वारा नमक पर लगाए गए करों और कठोर नियमों का विरोध करना था, ताकि भारतीय स्वयं नमक बना सकें और उन्हें यह आवश्यक वस्तु उचित मूल्य पर उपलब्ध हो सके। नमक के महत्व को समझते हुए महात्मा गांधी ने इस अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ आवाज उठाई और 12 मार्च 1930 को नमक सत्याग्रह की शुरुआत की, जो 6 अप्रैल 1930 तक चला।इस ऐतिहासिक सत्याग्रह की शुरुआत महात्मा गांधी ने अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से की, जिसका गंतव्य स्थान गुजरात का तटीय गांव दांडी था। दांडी अरब सागर के किनारे स्थित एक ऐसा स्थान था, जहां नमक आसानी से बनाया जा सकता था। इस यात्रा में गांधी जी के साथ 80 सत्याग्रहियों का एक समूह शामिल था, और दांडी पहुंचने में उन्हें 24 दिन का समय लगा। यह सत्याग्रह इतना प्रभावशाली था कि रास्ते में हर आयु वर्ग के लोग इस आंदोलन से जुड़ते चले गए। इस समूह में सबसे कम उम्र के सत्याग्रही 16 वर्षीय विट्ठल लीलाधर ठक्कर थे। गांधी जी ने इस मार्च की जानकारी पहले ही ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड इरविन को एक पत्र के माध्यम से दे दी थी और उनसे अन्यायपूर्ण नमक कानून पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था, लेकिन जब उनकी बात नहीं मानी गई, तब उन्होंने इस सत्याग्रह को शुरू करने का निर्णय लिया।इस सत्याग्रह में भारतीय दुग्ध विभाग के डिप्लोमा धारक और गौ सेवा संघ के एक कार्यकर्ता, 25 वर्षीय थेवरथुंडियिल टाइटस भी शामिल थे। सत्याग्रहियों ने अपनी यात्रा के दौरान अधिकांश समय गांवों में बिताया और अत्यंत साधारण भोजन ग्रहण किया, जिससे यह आंदोलन सादगी और आत्मसंयम का प्रतीक बन गया। इस दौरान कलकत्ता की लिली बिस्किट कंपनी ने सत्याग्रहियों को बिस्कुट देने की पेशकश की, लेकिन महात्मा गांधी ने इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वे इस आंदोलन को पूरी तरह सादगी और आत्मनिर्भरता के सिद्धांतों पर आधारित रखना चाहते थे।इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। गृहिणियों के एक समूह का नेतृत्व कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने किया, जिन्होंने पुलिस के लाठीचार्ज के बावजूद अपना विरोध जारी रखा और पीछे हटने से इनकार कर दिया। जब नमक बनाना शुरू हुआ, तो कमलादेवी द्वारा तैयार किया गया पहला नमक का पैकेट 501 रुपये में नीलाम हुआ, जो इस आंदोलन के प्रति लोगों के समर्थन और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक था।सत्याग्रह की एक महत्वपूर्ण शाम को महात्मा गांधी ने एक विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि यह संभवतः उनका अंतिम भाषण हो सकता है। उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि यदि उन्हें और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया जाए, तब भी आंदोलन को जारी रखा जाना चाहिए। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए इस संघर्ष को आगे बढ़ाएं और स्वतंत्रता की इस लड़ाई में अपने संकल्प को मजबूत बनाए रखें।अपने संबोधन में महात्मा गांधी ने स्पष्ट किया कि आंदोलन की आगामी योजनाओं को उसी प्रकार जारी रखा जाना चाहिए, जैसा पहले निर्धारित किया गया था। उन्होंने स्वयंसेवकों से अनुशासन बनाए रखने और आंदोलन की मर्यादा का पालन करने का आग्रह किया। उनका विश्वास था कि नमक कानून के विरुद्ध शुरू हुआ यह सत्याग्रह जल्द ही पूरे देश में नागरिक प्रतिरोध की एक अखंड धारा बन जाएगा।उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि यह संघर्ष पूरी तरह शांतिपूर्ण और अहिंसक होना चाहिए। उन्होंने लोगों को अपने क्रोध पर नियंत्रण रखने और सत्य तथा अहिंसा के सिद्धांतों को अपनाते हुए आगे बढ़ने की सलाह दी, ताकि आंदोलन की नैतिक शक्ति बनी रहे।अपने भाषण में उन्होंने यह आशा भी व्यक्त की कि यदि उन्हें और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया जाए या वे स्वयं इस संघर्ष को आगे न बढ़ा सकें, तब भी यह आंदोलन रुकना नहीं चाहिए। उन्होंने स्वयंसेवकों और देशवासियों से आह्वान किया कि वे साहस, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प के साथ सविनय अवज्ञा को जारी रखें और स्वराज की प्राप्ति के लिए इस संघर्ष को आगे बढ़ाएं।स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किए गए अपने अथक प्रयासों के दौरान महात्मा गांधी ने कई महत्वपूर्ण आंदोलन चलाए, जिनमें से नमक आंदोलन एक ऐतिहासिक आंदोलन था। ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला देने वाले इस आंदोलन को नमक सत्याग्रह या दांडी आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है। इस सत्याग्रह का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों द्वारा नमक पर लगाए गए करों और प्रतिबंधों को समाप्त करना था, ताकि भारतीय स्वयं नमक बना सकें और इसे सस्ती कीमत पर प्राप्त कर सकें। नमक की उपयोगिता और आवश्यकता को देखते हुए गांधी जी ने इस अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ आवाज उठाई और 12 मार्च 1930 को नमक सत्याग्रह की शुरुआत की, जो 6 अप्रैल 1930 तक चला।इस सत्याग्रह की शुरुआत महात्मा गांधी ने अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से की, जिसका गंतव्य दांडी था। दांडी, गुजरात का एक छोटा तटीय गांव है, जहां नमक बनाना संभव था। इस ऐतिहासिक यात्रा में उनके साथ 80 सत्याग्रही शामिल थे और दांडी पहुंचने में उन्हें 24 दिन लगे। यह आंदोलन इतना प्रभावशाली था कि जैसे-जैसे यह आगे बढ़ा, विभिन्न आयु वर्ग के लोग इसमें शामिल होते गए। इस समूह में सबसे कम उम्र के सत्याग्रही 16 वर्षीय विट्ठल लीलाधर ठक्कर थे। गांधी जी ने इस मार्च से पहले ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड इरविन को एक पत्र लिखकर औपनिवेशिक नीतियों पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था, लेकिन जब कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो उन्होंने सत्याग्रह शुरू कर दिया।संदर्भ: 1. https://tinyurl.com/5n7btcp2 2. https://tinyurl.com/2uf62y9u 3. https://tinyurl.com/4stddkk9
ध्वनि II - भाषाएँ
ब्राह्मी से देवनागरी तक: एक लिपि की ऐतिहासिक यात्रा
देवनागरी, उत्तरी भारत में उपयोग की जाने वाली सर्वाधिक लोकप्रिय लेखन प्रणाली या लिपि है। इसे भारत और नेपाल की आधिकारिक लिपियों में से एक माना जाता है। इसका उपयोग 120 से अधिक भाषाओं को लिखने में किया जाता है। लैटिन वर्णमाला, चीनी लिपि और अरबी लिपि के बाद यह दुनिया में चौथी सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली लेखन प्रणाली बन चुकी है। भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत को लिखने के लिए भी देवनागरी का ही उपयोग किया जाता है। देवनागरी लिपि का विकास 7वीं शताब्दी ई. में शुरू हुआ। यह गुप्त लिपि से बाद के वर्षों में विकसित हुई। 13वीं शताब्दी ई. के आसपास यह लिपि पूर्णतः विकसित हो चुकी थी। देवनागरी में 14 स्वर और 34 व्यंजन सहित कुल 48 मुख्य अक्षर होते हैं। देवनागरी बाएं से दाएं लिखी जाती है और इसमें अक्षरों के शीर्ष पर एक क्षैतिज रेखा होती है। इस रेखा को “शिरोरेखा” कहा जाता है। इसमें विशेषक यानी विशेष चिह्न भी होते हैं, जो अक्षरों की ध्वनि बदलने के लिए उनसे जुड़े रहते हैं। 'देवनागरी' शब्द दो शब्दों 'देव+नागरी' से मिलकर बना है। जहां देव का अर्थ "स्वर्गीय" या "दिव्य", और 'नागरी' का अर्थ "नगर" या "शहर" होता है। इस प्रकार 'देवनागरी' का अनुवाद "देवताओं के शहर" के रूप में किया जा सकता है। प्राचीन समय में इस लिपि का उपयोग मुख्य रूप से धार्मिक ग्रंथों और शिलालेखों में संस्कृत लिखने के लिए किया जाता था, लेकिन साथ ही इसका उपयोग उत्तरी और पश्चिमी भारत में स्थानीय भाषाओं को लिखने के लिए भी किया जाता था। दक्षिण भारत में इसे नंदिनागरी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ "नंदी की लेखनी" होता है। देवनागरी एक बहुत ही बहुमुखी लेखन प्रणाली है, जिस कारण यह सीखने के परिपेक्ष्य में भी बहुत आसान लिपि हो जाती है। अच्छी बात यह है कि “यह लिपि जैसी दिखाई देती है, वैसा ही इसका उच्चारण भी होता है।” पहली नज़र में, देवनागरी अन्य भारतीय लिपियों जैसे बंगाली-असमिया या गुरुमुखी से भिन्न नजर आ सकती है। लेकिन अगर आप करीब से देखेंगे, तो पाएंगे कि कुछ कोणों और जोर को छोड़कर इन सभी में काफी समानताएं हैं। देवनागरी का सबसे पुराना उदाहरण समनगढ़ नामक स्थान में खोजे गए एक अभिलेख में देखने को मिलता है। यह दंतिदुर्ग नामक राजा के समय में लिखा गया था, जो राष्ट्रकूट नामक एक बड़े क्षेत्र पर शासन करता था। इसे वर्ष 754 ई. में लिखा गया था। राष्ट्रकूट साम्राज्य के अन्य राजाओं और पश्चिमी चालुक्यों, यादवों और विजयनगर जैसे अन्य स्थानों / साम्राज्य में भी देवनागरी के प्रारंभिक प्रयोग के उदाहरण देखने को मिलते हैं। देवनागरी की उत्पत्ति “ब्राह्मी” नामक एक अन्य प्राचीन लिपि से हुई है, जिसका उपयोग पूरे भारत में किया जाता था। ब्राह्मी लिपि को वाणी और साहित्य के देवता “ब्रह्मा” द्वारा प्रदत्त माना जाता है। सम्राट अशोक के काल के बाद ब्राह्मी के विकास में तेज गति देखी गई। अशोक ने विभिन्न चट्टानों और स्तंभों पर अपने संदेश ब्राह्मी लिपि में ही लिखे थे। अशोक के बाद ब्राह्मी के विभिन्न प्रकार (सुंगन ब्राह्मी, कुषाण ब्राह्मी और गुप्त लिपि इत्यादि) विकसित हुए।। गुप्त लिपि का प्रयोग उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य के शासनकाल में किया जाता था। गुप्त लिपि, दक्कन और दक्षिण भारत जैसे अन्य स्थानों पर भी देखी गई है, जहाँ यह थोड़ी अलग दिखती है। छठी और सातवीं शताब्दी में गुप्त लिपि से एक अन्य प्रकार की लिपि प्रचलित हुई। इसे “सिद्धमातृका या सिद्धम लिपि” कहा जाता था। इसका उपयोग भारत और मध्य एशिया तथा जापान जैसे अन्य देशों में धार्मिक ग्रंथ लिखने के लिए किया जाता था। सिद्धम लिपि का सबसे पुराना उदाहरण जापान के एक मंदिर में एक पत्ते पर लिखे हुए लेख को माना जाता है। माना जाता है कि देवनागरी सिद्धम लिपि से प्रेरित एक नई तरह की लिपि का नाम है। हालांकि देवनागरी में कुछ ऐसी भी विशेषताएं (जैसे प्रतीकों के शीर्ष पर रेखाएं, तिरछे स्ट्रोक, छोटे कोण या नाखून की तरह दिखने वाले बिंदु आदि।) हैं, जो इसे सिद्धम लिपि से अलग बनाती हैं। ये विशेषताएं नागरी लिपि में भी देखी जाती हैं। 8वीं शताब्दी से देवनागरी का उपयोग राजाओं के नाम और उनके हस्ताक्षर लिखने के लिए किया जाता था। उदाहरण के लिए, गुजरात में जय भट्ट नाम के एक राजा ने देवनागरी लिपि का उपयोग कर संस्कृत भाषा में अपना नाम "स्व हस्तो मम जयभट्टस्य" लिखा था, जिसका अनुवाद व् अर्थ है: "यह मेरे हस्ताक्षर हैं, जय भट्ट" । कई भाषाओं में देवनागरी का उपयोग मुख्य या माध्यमिक लिपि के रूप में किया जाता है। इन भाषाओं में मराठी, पाली, संस्कृत, हिंदी, बोरो, नेपाली, शेरपा, प्राकृत, अपभ्रंश, अवधी, भोजपुरी, ब्रज भाषा, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, मगही, नागपुरी, राजस्थानी, खानदेशी, भीली, डोगरी, कश्मीरी, मैथिली, कोंकणी, सिंधी, मुंडारी, अंगिका, बज्जिका और संथाली शामिल हैं। भारत में पुराने समय में लोग अलग-अलग लिपियों का उपयोग, अलग-अलग उद्देश्यों के लिए करते थे। उदाहरण के लिए, मोदी लिपि, (जिसे तेजी से लिखना आसान होता है), का उपयोग मराठी में रोजमर्रा के लेखन के लिए किया जाता था, जबकि देवनागरी का उपयोग औपचारिक मराठी शिलालेखों के लिए किया जाता था। मुद्रण के आविष्कार से पहले, देवनागरी का उपयोग ज्यादातर पेशेवर लेखकों द्वारा लिखे गए औपचारिक ग्रंथों के लिए किया जाता था। ये ग्रंथ आमतौर पर पांडुलिपियों पर लिखे गए थे। ब्राह्मी से गुप्त और देवनागरी तक के विकास को निम्नलिखित तालिका में दर्शाया गया है। देवनागरी लिपि के अंक निम्नवत दर्शाए गए हैं: आज, देवनागरी का उपयोग तीन प्रमुख भाषाओं (हिंदी (520 मिलियन से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली), मराठी (83 मिलियन से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली), और नेपाली (14 मिलियन से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली) को लिखने के लिए किया जाता है। इस प्रकार यह आधुनिक दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली लिपि है, जिस प्रकार प्राचीन काल में भूतपूर्व ब्राह्मी लिपि थी । साथ ही हिंदी, भारत सरकार की आधिकारिक भाषाओं में से एक है (अंग्रेजी के साथ), जबकि नेपाली, नेपाल की आधिकारिक भाषा है। मराठी, महाराष्ट्र की आधिकारिक भाषा है और इसे गोवा में भी आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। हिंदी का उपयोग पूरे भारत में केंद्र सरकार के संस्थानों द्वारा भी किया जाता है और हिंदी भाषी राज्यों के बाहर दूसरी भाषा के रूप में इसे व्यापक रूप से पढ़ाया और बोला जाता है। देवनागरी का उपयोग भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त कई अन्य भाषाओं (बोडो, मैथिली, कश्मीरी, सिंधी, डोगरी और कोंकणी) को लिखने के लिए भी किया जाता है।प्राचीन भारत में लेखन एक जटिल प्रक्रिया हुआ करती थी। लेखक, श्रोता, संदर्भ और उद्देश्य के आधार पर लोग, एक ही भाषा लिखने के लिए विभिन्न लिपियों का उपयोग करते थे। इसके अलावा विभिन्न सामाजिक वर्गों और धार्मिक समूहों के लोग अलग-अलग लिपियों का उपयोग करते थे। उदाहरण के लिए, ब्राह्मण (पुजारी) अक्सर देवनागरी लिपि का इस्तेमाल करते थे, जबकि मुसलमान अक्सर फारसी-अरबी लिपि का इस्तेमाल करते थे। हालांकि, 19वीं शताब्दी में मुद्रण की शुरुआत ने सब कुछ बदल दिया। मुद्रण तकनीक के आगमन के बाद बड़ी मात्रा में पुस्तकें और अन्य पाठ्य सामग्री तैयार करना संभव हो गया। इससे हस्तलिखित पांडुलिपियों के उपयोग में गिरावट आई और मुद्रित ग्रंथों के उपयोग में वृद्धि हुई। मुद्रित ग्रंथ प्रायः देवनागरी लिपि में लिखे जाते थे। यही कारण है कि देवनागरी अब भारत में सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली लिपि बन गई है। देवनागरी का प्रयोग भारत के बाहर भी किया जाता रहा है। उदाहरण के लिए, सिद्ध मातृका लिपि, जिसका देवनागरी से गहरा संबंध है, पूर्वी एशिया में बौद्धों द्वारा उपयोग की जाती थी। आज भारत में देवनागरी एक अत्यंत महत्वपूर्ण लिपि बन चुकी है और इसका प्रयोग प्रतिदिन लाखों लोग करते हैं। संदर्भ https://tinyurl.com/bdfvwume https://tinyurl.com/2spsrfrr https://tinyurl.com/57mf96ux
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
31-03-2026 09:25 AM • Meerut-Hindi
महावीर जयंती का महत्व और हस्तिनापुर के श्री दिगंबर जैन मंदिर की धार्मिक विरासत
महावीर जयंती को जैन धर्म में सबसे प्रमुख पर्व माना जाता है। पूरे जैन समुदाय द्वारा चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर (सर्वोच्च उपदेशक) भगवान महावीर के जन्मदिन को महावीर जयंती के रूप में बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस उत्सव की भव्यता को देखने और दार्शनिक महत्वों को समझने के लिए आप हमारे मेरठ जिले के हस्तिनापुर शहर में स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर के दर्शन भी कर सकते हैं। मेरठ जिले के हस्तिनापुर शहर में स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर, भारत में स्थित एक प्राचीन जैन तीर्थ परिसर है। इस मंदिर को हस्तिनापुर का सबसे पुराना जैन मंदिर माना जाता है। यह मंदिर 16वें जैन तीर्थंकर श्री शांतिनाथ को समर्पित है। हस्तिनापुर तीर्थ क्षेत्र को क्रमशः 16वें, 17वें और 18वें तीन जैन तीर्थंकरों (शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरनाथ) का जन्मस्थान माना जाता है। जैनियों का यह भी मानना था कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ ने राजा श्रेयांस से गन्ने का रस (इक्षु-रस) प्राप्त करने के बाद यहीं हस्तिनापुर में 13 महीने की अपनी लंबी तपस्या समाप्त की थी।
हस्तिनापुर के श्री दिगंबर जैन मंदिर के केंद्रीय मुख्य शिखर मंदिर को राजा हरसुख राय द्वारा 1801 में बनवाया गया था। राजा हरसुख राय, बादशाह शाह आलम द्वितीय के शाही खजांची थे। यह मंदिर परिसर 40 एकड़ के क्षेत्रफल में फैला हुआ है, जहां केंद्रीय मुख्य शिखर मंदिर विभिन्न तीर्थंकरों को समर्पित कई छोटे मंदिरों से घिरा हुआ है, जिनमें से अधिकांश मंदिर 20 वीं शताब्दी के अंत में बनाए गए थे। मुख्य मंदिर परिसर में एक वेदी पर प्रमुख देवता के रूप में 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ पद्मासन मुद्रा में विराजमान हैं। वेदी पर भगवान शांतिनाथ की मूर्ति के दोनों तरफ 17वें और 18वें तीर्थंकरों श्री कुंथुनाथ और श्री अरनाथ की मूर्तियां भी विद्यमान हैं। मंदिर परिसर में कुछ उल्लेखनीय स्मारक जैसे मानस्तंभ, त्रिमूर्ति मंदिर, नंदीश्वर द्वीप, समवसरण रचना और अंबिका देवी मंदिर भी मौजूद हैं। श्री बाहुबली मंदिर, श्री पार्श्वनाथ मंदिर, जल मंदिर, कीर्ति स्तंभ और पांडुकशिला आदि परिसर में स्थित अन्य प्रमुख स्मारक हैं।
इस परिसर में तीर्थयात्रियों के लिए धर्मशाला, भोजनालय, जैन पुस्तकालय, आचार्य विद्यानंद संग्रहालय और कई अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। क्षेत्र परिसर में एक डाकघर, पुलिस सब-स्टेशन, जैन गुरुकुल और एक उदासीन आश्रम (एक सेवानिवृत्ति गृह या वृद्धाश्रम) भी है। कुल मिलाकर, श्री दिगंबर जैन प्राचीन बड़ा मंदिर हस्तिनापुर में एक महत्वपूर्ण जैन मंदिर परिसर है, जिसका समृद्ध इतिहास और जटिल वास्तुकला कई भक्तों और आगंतुकों को आकर्षित करती है। महावीर जयंती के अवसर पर तो इस मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। महावीर जयंती, जिसे महावीर जन्म कल्याणक के नाम से भी जाना है, जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक त्यौहार है जो भगवान महावीर के जन्म को संदर्भित करता है। भगवान महावीर चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर थे। ग्रेगोरियन कैलेंडर (Gregorian Calendar) के अनुसार यह त्यौहार मार्च या अप्रैल माह में पड़ता है।
जैन ग्रंथों के अनुसार, महावीर का जन्म 599 ईसा पूर्व में चैत्र के महीने में तेरहवें दिन हुआ था। अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का कुंडलपुर उनका जन्म स्थान है। महावीर का जन्म वज्जि नामक एक लोकतांत्रिक राज्य में हुआ था, और इस राज्य की राजधानी वैशाली थी। महावीर का प्रारंभिक नाम ‘वर्धमान' था, जिसका अर्थ ‘जो बढ़ता है’ होता है। मान्यता है कि अपनी गर्भावस्था के दौरान, महावीर की माता रानी त्रिशला ने कई शुभ सपने देखे, जो सभी एक महान आत्मा के जन्म लेने का संकेत दे रहे थे। ऐसा कहा जाता है कि जब उन्होंने महावीर को जन्म दिया, तो स्वर्गीय देवताओं के प्रमुख इंद्र ने सुमेरु पर्वत पर अभिषेक नामक एक अनुष्ठान किया, जिसे सभी तीर्थंकरों के जीवन में होने वाली पांच शुभ घटनाओं में से दूसरी घटना माना जाता है। महावीर जन्म कल्याणक के अवसर पर मनाये जाने वाले प्रमुख उत्सवों में भगवान महावीर की मूर्ति को रथ यात्रा नामक जुलूस में रथ पर ले जाना, स्तवन कहे जाने वाले धार्मिक छंदों का पाठ करना, और महावीर की मूर्तियों का अभिषेक करना शामिल है। इस अवसर पर जैन समुदाय के लोग धर्मार्थ कार्यों, प्रार्थनाओं, पूजा और व्रतों में संलग्न होते हैं। साथ ही कई भक्त इस अवसर पर ध्यान करने और प्रार्थना करने के लिए महावीर को समर्पित मंदिरों में जाते हैं। जयंती के दिन गायों को वध से बचाने या गरीब लोगों को खाना खिलाने जैसे धर्मार्थ मिशनों के लिए दान एकत्र किया जाता है। इस दिन भगवान महावीर के अहिंसा के संदेश का प्रचार करने वाली अहिंसा दौड़ और रैलियां भी निकाली जाती हैं। हमारे शहर मेरठ में भी तीर्थंकर भगवान महावीर की जयंती को प्रतिवर्ष बेहद हर्ष और उल्लास के साथ धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर तीरगरान स्थित जैन मंदिर से श्री जी की पालकी बैंड बाजों के साथ निकाली जाती है, जिससे पहले जैन मंदिर परिसर में श्री जी का मंगल अभिषेक धार्मिक विधि विधान से किया जाता है। शोभायात्रा में श्री जी की पालकी एवं भगवान महावीर की प्रेरणादायी झांकियों को भी शामिल किया जाता है।
भारत में झींगा हैचरी तकनीक का विकास और जलीय कृषि के नए अवसर
भारत में झींगा पालन उद्योग अभी भी क्रस्टेशियंस (crustaceans) के वाइल्ड कैचिंग (wild catching) पर निर्भर हैं। भारत में हैचरी (hatchery) उद्योगों के विकास की आवश्यकता है। बीओबीपी (Bay of Bengal Programme BOBP) ने छोटे पैमाने की हैचरी प्रौद्योगिकी को यथासंभव सीधे इस क्षेत्र में स्थानांतरित करने के लिए गतिविधियां शुरू की हैं‚ क्योंकि इस विकास को आगे बढ़ाने में निजी क्षेत्र की बड़ी भूमिका हो सकती है। भारत में इसने छोटे पैमाने के उद्यमियों को टाइगर श्रिम्प हैचरी तकनीक (tiger shrimp hatchery technology) का प्रशिक्षण दिया और एक प्रदर्शन हैचरी के निर्माण के लिए पश्चिम बंगाल सरकार को वित्तीय सहायता प्रदान की। भारत के आठ प्रशिक्षुओं में से एक ने श्रिम्प हैचरी (shrimp hatchery) स्थापित की। पश्चिम बंगाल में श्रिम्प/प्रौन हैचरी का काम पूरा हो गया था‚ लेकिन उसे उत्पादन में नहीं लाया गया था। भारत के निजी क्षेत्र में झींगा हैचरी प्रौद्योगिकी विकास धीमा रहा है। ऐसा माना गया है कि हैचरी बीज की आपूर्ति उद्योग में निजी निवेश की मात्रा के अनुपात में ही बढ़ेगी‚ इसलिए बीओबीपी (BOBP) के प्रशिक्षण कार्यक्रम ने छोटे पैमाने के उद्यमी समुदायों को लक्षित किया। नवंबर 1991 में स्थानीय और क्षेत्रीय समाचार पत्रों में दिए गए विज्ञापनों ने श्रिम्प और प्रौन हैचरी प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षण की पेशकश की‚ जिसमें 300 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए थे। इनमें से 22 का साक्षात्कार लिया गया और दस का चयन किया गया था। इन आवेदकों में से आठ श्रिम्प हैचरी प्रशिक्षण के लिए और दो फ्रेशवाटर प्रौन हैचरी प्रशिक्षण के लिए थे। चयनित आवेदकों में से दो को झींगा पालन का थोड़ा अनुभव था तथा एक महिला सहित अन्य आवेदक छोटे व्यवसायी थे। “नेशनल प्रॉन फ्राई प्रोडक्शन एंड रिसर्च सेंटर” (एनएपीएफआरई) (National Prawn Fry Production and Research Center NAPFRE)‚ पुलाऊ सयाक‚ मलेशिया (Pulau Sayak‚ Malaysia) को आठ झींगा हैचरी प्रतिभागियों के लिए प्रशिक्षण स्थल के रूप में चुना गया था। एनएपीएफआरई (NAPFRE) नियमित रूप से अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित करता है‚ जिसमें अच्छी तरह से प्रशिक्षित और अनुभवी कर्मचारी तथा अच्छी आवास सुविधाएं भी हैं। कुछ वर्षों में तट से दूर के क्षेत्रों में समुद्री श्रिम्प की अंतर्देशीय खेती में काफी वृद्धि हुई है। इस उद्योग के शुरुआत में यह विभिन्न एशियाई (Asian) देशों में ब्लैक टाइगर श्रिम्प (black tiger shrimp) के साथ काफी आम हो गया था। बाद में‚ पेसिफिक वाइट श्रिम्प (Pacific White Shrimp) की शुरुआत के साथ एशिया में इसका काफी विस्तार हुआ। उत्तरी अमेरिका (North America) और यूरोप (Europe) में हाल के वर्षों में टैंक आधारित झींगा उत्पादन प्रणालियों (tank- based shrimp production systems) में रुचि बढ़ रही है और यह धीरे-धीरे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी कर्षण प्राप्त कर रहा है।
इस प्रणाली को चलाने वाले कारकों में मुख्य रूप से बाजारों से निकटता और उपभोक्ताओं को ताजा उत्पाद देने की क्षमता शामिल है। भूमि और पानी जैसे संसाधनों की उपलब्धता की आवश्यकता ने भी उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में टैंक आधारित झींगा खेती की ओर रुचि जगाई है। कई देशों में जहां परिस्थितियाँ झींगा पालन के लिए उपयुक्त हैं‚ तालाब आधारित उत्पादन के लिए भूमि तक पहुंचने का अभाव एक वास्तविक मुद्दा है। टैंक प्रणालियों में झींगा उत्पादन पर विचार करते समय‚ तकनीकी और आर्थिक दोनों कारकों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। उपकरण विकल्प और संचालन निपुणता तकनीकी और आर्थिक साध्यता दोनों को प्रभावित करती है। इसमें कई क्रियाशील विन्यास भी मौजूद हैं लेकिन लाभप्रदता पूंजी लागत‚ परिचालन लागत‚ उत्तरजीविता और वृद्धि दर तथा बाजार की स्थितियों पर निर्भर करती है। दुनिया भर में लोगों के लिए जलीय कृषि सुरक्षित‚ पौष्टिक तथा टिकाऊ समुद्री भोजन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। मांग के साथ तालमेल रखने के लिए‚ वैश्विक स्तर पर जलीय कृषि उत्पादन को 2030 तक दोगुना होने की आवश्यकता है। जलीय कृषि उत्पादों की मांग में वृद्धि‚ खाद्य सुरक्षा विचार और रोज़गार निर्माण ने कुशल श्रमिकों की बढ़ती आवश्यकता भी उत्पन्न की है। बांग्लादेश के चटगांव जिले में फ्रेशवाटर की प्रौन मछली पालने की एक छोटी-सीअभिव्यक्ति की गई। ये एक नई हैचरी तकनीक थी‚ जिसमें खारे पानी और एक साधारण रीसर्क्युलेटिंग बायोफिल्टर (recirculating biofilter) का उपयोग किया गया था। इस हैचरी में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों के प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया गया था तथा चार निजी समूहों को प्रशिक्षण और उपकरण के रूप में प्रत्यक्ष सहायता भी दी गई थी। इनमें से तीन प्रतिभागियों ने 1993 के अंत तक प्रॉन हैचरी का निर्माण पूरा कर लिया था और उनमें से एक का उत्पादन शुरू हो गया था। बीओबीपी (BOBP) एक बहु-एजेंसी क्षेत्रीय मत्स्य पालन कार्यक्रम है‚ जिसमें बंगाल की खाड़ी के आसपास के सात देश - बांग्लादेश‚ भारत‚ इंडोनेशिया‚ मलेशिया‚ मालदीव‚ श्रीलंका और थाईलैंड शामिल हैं।
आरएएस मॉडल
यह कार्यक्रम एक उत्प्रेरक के रूप में सलाहकार की भूमिका निभाता है‚ यह अपने सदस्य देशों में छोटे पैमाने के मछुआरे समुदायों की स्थितियों में सुधार लाने के लिए नई प्रौद्योगिकियों तथा पद्धतियों को विकसित तथा प्रदर्शित करता है तथा विचारों को बढ़ावा देता है। बांग्लादेश में विभिन्न परिचालन स्थितियों के तहत मॉडल की आंतरिक दर का मूल्यांकन करके एक छोटे पैमाने की हैचरी की वित्तीय व्यवहार्यता की जांच की गई थी‚ जिसकी निर्माण लागत स्थानीय ठेकेदारों के अनुमानों तथा संचालन लागत और उत्पादन पोटिया हैचरी (Potiya hatchery) के अनुभव पर आधारित थी। इस मॉडल में पोटिया हैचरी के विपरीत चार की जगह छह 5 टी रियरिंग टैंक (5 t rearing tanks) हैं। ऐसा माना जाता है कि पहले वर्ष के दौरान लक्ष्य उत्पादन का केवल 50 प्रतिशत ही प्राप्त होगा तथा दूसरे वर्ष में बढ़कर 75 प्रतिशत और तीसरे वर्ष में पूर्ण उत्पादन तक पहुंच जाएगा।
सिंड्रेला की कहानी और फिल्मों में उसके बदलते और रोचक रूप
हमारे पास ऐसी अनेकों लोक कथाएं और परी कथाएं मौजूद हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती आ रही हैं।“सिंड्रेला” (Cinderella) ऐसी ही एक प्रसिद्ध परी कथाहै जिसके दुनिया भर में हजारों संस्करण मौजूद हैं। इस कहानी पर वर्षों से अनेकों फिल्में बनाई जाती रही हैं तथा उन फिल्मों में समय के साथ कई तरह के नवाचार हुए हैं। यह कहानी एक युवती की है, जिसका जीवन बहुत कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा होता है, किंतु अचानक उसका भाग्य बदलता है,और वह शादी के बाद एक राजकुमारी बन जाती है।
“रोडोपिस”(Rhodopis), जो इस कहानी का सबसे पहला ज्ञात संस्करण माना जाता है, के अनुसार यूनान में एक दास युवती हुआ करती थी, जिसकी शादी मिस्र के राजा से होती है। इस कहानी का पहला साहित्यिक यूरोपीय संस्करण 1634 में इटली मेंगिआम्बतिस्ता बेसिल (Giambattista Basile) द्वारा अपने “पेंटामेरोन”(Pentamerone) में प्रकाशित किया गया था।अंग्रेजी भाषी दुनिया में सिंड्रेला का जो संस्करण सबसे व्यापक रूप से जाना जाता है, वह फ्रांसीसी भाषा में 1697 में चार्ल्स पेरौल्ट (Charles Perrault) द्वारा “हिस्टॉयर्स यू कॉन्टेस डू टेम्प्स पासे”(Histoiresou contes du temps passé) में प्रकाशित किया गया था। इस कहानी का एक अन्य संस्करण 1812 मेंब्रदर्स ग्रिम (Brothers Grimm) द्वारा अपने लोक कथा संग्रह “ग्रिम’स फेयरी टेल्स”(Grimms' Fairy Tales) में “एशेनपुटेल”(Aschenputtel) के रूप में प्रकाशित किया गया।
तो आइए आज इन चलचित्रों के जरिए सिंड्रेला की कहानी को करीब से जानें तथा देंखे कि 1899 से 2015 तक इस कहानी पर बनाई गई फिल्मों में किस तरह से नवाचार किए गए है।
रामायण के कांड, संरचना और श्लोकों में छिपा साहित्यिक व आध्यात्मिक महत्व
रामायण और महाभारत दो ऐसे महाकाव्य हैं, जिन्हें सनातन धर्म का आधार स्तंभ माना जाता है! रामायण हमें आदर्श सेवक, आदर्श भाई, आदर्श पत्नी और आदर्श राजा जैसे आदर्श चरित्रों का चित्रण करते हुए संबंधों के कर्तव्यों का पालन करना सिखाती है। किंतु रामायण में दिए गए श्लोकों को सही अर्थों में समझने के लिए यह बेहद जरूरी है कि, हम इस महाकाव्य की मूलभूत बारीकियों को क्रमानुसार समझें। रामायण एक प्राचीन भारतीय महाकाव्य है जो संस्कृत साहित्य की श्रेणी से संबंधित है। इसे हिंदू ऋषि वाल्मीकि द्वारा लिखा गया था। रामायण नाम, राम और अयन ("जाना, आगे बढ़ना") का एक तत्पुरुष यौगिक है, जिसका अनुवाद "राम की यात्रा" होता है। रामायण में सात पुस्तकों (कांडों) और 500 सर्गों में 24,000 छंद हैं। रामायण भगवान विष्णु के अवतार प्रभु श्री राम की कहानी बताती है, जिनकी पत्नी सीता का लंका के राक्षस राजा रावण द्वारा अपहरण कर लिया जाता है। यह महाकाव्य मानव अस्तित्व के सिद्धांतों और धर्म की अवधारणा की खोज करता है। रामायण को 32-शब्दांश मीटर में लिखा गया है जिसे “अनुष्टुभ्” कहा जाता है और इसमें दार्शनिक तथा भक्ति तत्वों के साथ प्रस्तुत प्राचीन हिंदू संतों की शिक्षाएँ शामिल हैं। अनुष्टुभ् संस्कृत काव्य में प्रयुक्त एक प्रकार का छंद है। मूल रूप से, एक अनुष्टुभ छंद चार पंक्तियों की एक चौपाई है। प्रत्येक पंक्ति, जिसे पद (अक्षर "फुट") कहा जाता है, में आठ शब्दांश होते हैं। अनुष्टुप छन्द, संस्कृत काव्य में सर्वाधिक प्रयुक्त छन्द है, इसका प्रयोग वेदों में भी किया गया है। गीता के श्लोक भी अनुष्टुप छन्द में हैं। आदि कवि वाल्मिकी द्वारा उच्चारित प्रथम श्लोक (मा निषाद प्रतिष्ठा) भी अनुष्टुप छन्द में है। रामायण, महाभारत तथा गीता के अधिकांश “श्लोक” अनुष्टुप छन्द में ही लिखे गए हैं। भारतीय साहित्य में, “श्लोक” कविता के एक विशिष्ट रूप को संदर्भित करता है। श्लोक शब्द संस्कृत मूल श्रु से आया है, जिसका अर्थ "सुनना।" होता है। एक व्यापक अर्थ में, यह किसी कहावत या कहावत सहित किसी भी छंद को संदर्भित करता है। एक श्लोक आमतौर पर एक 32-पंक्ति का छंद होता है। इसमें चार चौथाई छंद होते हैं, जिनमें से प्रत्येक में आठ शब्दांश होते हैं, या दो अर्ध-छंद होते हैं जिनमें से प्रत्येक में 16 शब्दांश होते हैं। श्लोक 'अनुष्टुप छ्न्द' का पुराना नाम भी है। श्लोक को भारतीय महाकाव्य का आधार और भारतीय पद्य का उत्कृष्ट रूप माना जाता है। इसका उपयोग महाभारत, रामायण, पुराणों, स्मृतियों और हिंदू धर्म के वैज्ञानिक ग्रंथों जैसे सुश्रुत संहिता और चरक संहिता जैसे कार्यों में किया जाता है। संस्कृत वाल्मीकि रामायण के पाठ में लगभग 24,000 श्लोक हैं। महाकाव्य रामायण पारंपरिक रूप से सात कांडों (पुस्तकों) में विभाजित है, जिनकी सूची निम्नवत दी गई हैं:
1. बालकाण्ड- इस भाग में भगवान राम और उनके भाई-बहनों, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की उत्पत्ति और उनके बचपन के दिनों का वर्णन किया गया है। इस काण्ड में माता सीता से प्रभु श्री राम के विवाह की कहानी और उन राक्षसों के विनाश की कहानी भी शामिल है जो विश्वामित्र को यज्ञ करने से रोक रहे थे। 2.अयोध्याकाण्ड- इस काण्ड की कहानी प्रभु श्री राम के चौदह वर्ष के वनवास की ओर ले जाती हैं। इसमें दर्शाया गया है कि किस प्रकार प्रभु श्री राम पूर्ण शांति और संयम के साथ वनवास स्वीकार करते हैं। 3.अरण्यकाण्ड- इस कांड में अपने चौदह वर्ष के वनवास के दौरान अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ प्रभु श्री राम के जीवन की कहानी को दर्शाया गया। इसमें राक्षस राजा रावण द्वारा सीता का अपहरण भी शामिल है। ४.किष्किन्धाकाण्ड- इस भाग में वानर योद्धा महाबली हनुमान से प्रभु श्री राम की मुलाकात और राक्षस राजा रावण से सीता को छुड़ाने की उनकी यात्रा की कहानी दर्शायी गई है। 4.सुन्दरकाण्ड - इस काण्ड में माता सीता को खोजने के लिए हनुमान की लंका यात्रा और राक्षस राजा रावण के साथ उनकी मुठभेड़ की कहानी दर्शायी गई है। इस कांड को रामायण का सबसे सुंदर और काव्यात्मक खंड माना जाता है। 5.लंकाकाण्ड - इस काण्ड में माता सीता को बचाने के लिए प्रभु श्री राम और रावण के बीच हुए महायुद्ध की कहानी वर्णित है। साथ ही इसमें रावण पर राम की जीत और सीता के साथ उनका पुनर्मिलन भी शामिल है। 6.उत्तरकाण्ड- उत्तरकाण्ड राम कथा का उपसंहार है। इसमें प्रभु श्री राम के अयोध्या लौटने, राजा के रूप में उनके राज्याभिषेक (राम राज्य की परिभाषा व् उल्लेख), और उनके भाइयों और पत्नी सीता के साथ उनके पुनर्मिलन की कहानी वर्णित है। साथ ही इसमें राम के दो पुत्र लव और कुश का जन्म भी शामिल है।
ग्लास बीच की अनोखी कहानी और समुद्र तट पर बने कांच के प्राकृतिक रत्न
समुद्र तट या बीच (Beaches) हमारी प्रकृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यहां हमें कई चीजें दिखाई दे सकती हैं, लेकिन टूटे हुए कांच के समूह का यहां मौजूद होना किसी आश्चर्य से कम नहीं है।कैलिफोर्निया (California, USA) के फोर्ट ब्रैग (Fort Bragg) में ग्लास बीच (Glass Beach) लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है, जिसके समुद्र तट में पॉलिश (polish) किए गए कांच के चमकदार छोटे टुकड़े पाए जाते हैं। दशकों से स्थानीय समुदायों ने अपने अवांछित सामान, यहां तक कि कारों को समुद्र के किनारे फेंक दिया था। यहां मौजूद कार्बनिक चीजें समय के साथ सड़ गईं, तथा धातु की वस्तुओं में या तो जंग लग गया, या उन्हें कहीं और ले जाया गया। लेकिन टूटे हुए कांच वहीं मौजूद रहे तथा समुद्र की लहरों के टकराव के कारण मुलायम टुकड़ों में परिवर्तित हो गए। यह समुद्र तट अब कानून द्वारा संरक्षित है, और यहां मौजूद प्रतिष्ठित कांच को आगंतुकों द्वारा हटाया नहीं जा सकता है। दुनिया भर के अन्य स्थानों में भी समुद्री कांच की उच्च सांद्रता है, जिसके लिए उन लोगों को धन्यवाद देना चाहिए, जिन्होंने कांच इन स्थानों में फेंका है। साइबेरिया (Siberia) में उससुरी (Ussuri) खाड़ी कांच बनाने वाली फैक्ट्रियों का केंद्र है, जो कांच अपशिष्ट को समुद्र में फेंक देते हैं। यहां अब समुद्र तट पत्थरों और समुद्री कांच का एक रंगीन मिश्रण बन गया है।
मैमथ के रहस्य जीवाश्म और प्राचीन मानव इतिहास की रोचक कहानी
मैमथ (Mammoth), आधुनिक हाथियों के प्राचीन रिश्तेदार हुआ करते थे जो, लगभग 50,000 ईसा पूर्व से 10,000 ईसा पूर्व के दौरान हमारी पृथ्वी पर घूमा करते थे। ये काफी हद तक हाथियों जैसे दिखते थे, लेकिन वास्तव में हाथियों से बहुत बड़े होते थे। मैमथ का वैज्ञानिक नाम 'मैमुथस प्राइमिजीनियस' है, और अब यह पूरी तरह से विलुप्त हो चुके हैं। सालों पहले भारतीय वैज्ञानिकों को कॉर्बेट नेशनल पार्क (Corbett National Park) में इन्हीं का एक विशाल जीवाश्म मिला था। यद्यपि, भारत में अभी तक मनुष्यों द्वारा तराशे कोई भी मैमथ हाथी दांत नहीं मिले हैं। लेकिन जर्मनी (Germany) की वोगेलहर्ड नामक एक गुफा (Vogelherd Cave) में शोधकर्ताओं को अलग-अलग जानवरों के आकार की, बारीकी से शानदार नक्काशी किये हुए विशाल मैमथ के दांत मिले हैं । वोगेलहर्ड गुफा, दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी में पूर्वी स्वाबियन जुरा (Eastern Swabian Jura) नामक स्थान में मौजूद है। यह गुफा चूना पत्थर की चट्टान से बनी है। शोधकर्ताओं की इस गुफा पर नजर 1931 में पड़ी जब उन्हें इसके अंदर कुछ छोटी-छोटी मूर्तियां मिलीं। दरअसल 23 मई, 1931 में, हरमन मोन (Hermann Mohn) नामक एक व्यक्ति को यहां पर फ्लिंटस्टोन (Flintstones) के कुछ टुकड़े मिले। इसके बाद उन्होंने ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय (University Of Tübingen) को अपनी खोज के बारे में बताया। उसी वर्ष, ट्यूबिंगन के गुस्ताव रीक (Gustav Rieck) नामक एक वैज्ञानिक ने 15 जुलाई से 1 अक्टूबर 1931 तक तीन महीने तक इस गुफा में खुदाई की। इसके बाद जाकर उन्हें इस बात के प्रमाण मिले कि, “इस स्थान पर मनुष्य रहते थे, क्योंकि यहाँ पर उन्हें पुराने पाषाण युग से लेकर कांस्य युग तक, विभिन्न समय अवधि के औजार और अन्य वस्तुएँ मिलीं।” यहाँ उन्हें ऑरिग्नेशियाई काल (Aurignacian Period) की मिट्टी की एक परत में विशाल हाथी दांत से बनी कई छोटी-छोटी आकृतियाँ भी मिलीं। इन आकृतियों में बिंदु, रेखाएं और एक्स-आकार के निशान जैसी सजावट भी की गई थी। ये निशान यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि उनका उपयोग धार्मिक या अनुष्ठानिक उद्देश्यों के लिए किया गया होगा। साथ ही यहाँ पर उन्हें गहने और हाथी दांत से बनी बांसुरी के टुकड़े भी मिले। ये सभी कलाकृतियाँ ऊपरी पुरापाषाण काल (Upper Paleolithic) के दौरान ऑरिग्नेशियाई संस्कृति (Aurignacian Culture) के प्रारंभिक मनुष्यों द्वारा विशाल ऊनी मैमथ हाथी दांत से बनाई गई थीं। इन्हें दुनिया की सबसे पुरानी ज्ञात कला कृतियों में से एक माना जाता है। 2017 में इन्हें यूनेस्को (UNESCO) द्वारा, विश्व धरोहर स्थलों की सूची में भी शामिल कर लिया गया था। इन मूर्तियों में शामिल है: जंगली घोड़ा: यह एक घोड़े की मूर्ति है, जो लगभग 30,000 - 29,000 वर्ष पुरानी है। यह मूर्ति बहुत सटीक आकार की है। जानकार मानते हैं कि यह एक आक्रामक या प्रभावशाली घोड़े का प्रतिनिधित्व करती है। इसका केवल सिर ही पूरी तरह सुरक्षित है।शेर का सिर: यह मूर्ति लगभग 40,000 वर्ष पुरानी है। इसे 1931 में अधूरे सिर के साथ खोजा गया था। इसका एक अन्य खोया हुआ टुकड़ा 2005 और 2012 के बीच खुदाई के दौरान खोजा गया था और इसके बाद दोनों को सफलतापूर्वक पुनः जोड़ा गया था, जिससे यह पुष्टि हुई कि मूर्ति वास्तव में एक त्रि-आयामी मूर्तिकला है। इसकी रीढ़ पर लगभग 30 बारीक कटे हुए क्रॉस (Cross) हैं।मैमथ: यह लगभग 35,000 वर्ष पुरानी ऊनी मैमथ (Wooly Mammoth) की मूर्ति है। यह पूरी मूर्ति पूरी तरह से अक्षुण्ण (Intact) है, और इसमें विस्तृत नक्काशी की गई है। यह अपने पतले आकार, नुकीली पूंछ, मजबूत पैरों और गतिशील रूप से घुमावदार धड़ के कारण इन सभी में सबसे अलग दिखती है। वोगेलहर्ड गुफा में खोजी गई ऊनी मैमथ की यह नक्काशी बहुत छोटी (केवल 3.7 सेमी लंबी और वजन केवल 7.5 ग्राम) है। इसके अलावा शोधकर्ताओं को यहां पर 200,000 से अधिक पत्थर के औजार, हड्डी और हाथी दांत से बने औजार, पक्षियों की हड्डियों सहित अन्य जानवरों की लगभग 500 किलोग्राम हड्डियां और 28 किलोग्राम विशाल हाथी दांत मिले। यदि हम भारत में मैमथ की उपस्थिति पर नजर डालें तो ओडीशा राज्य के जाजपुर ज़िले सहित 2019 में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (Corbett Tiger Reserve) के बिजरानी क्षेत्र में भी एक 'विशाल मैमथ” का जीवाश्म खोजा गया। इस खोज ने वन्य जीवन रूचि रखने वाले लोगों और वैज्ञानिकों के बीच उत्सुकता बड़ा दी है। एमपीएस बिष्ट (MPS Bisht) नामक एक भूविज्ञानी, जो उत्तराखंड अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के निदेशक भी हैं और इस जीवाश्म की खोज करने वाली टीम का हिस्सा थे, के अनुसार यह विशाल मैमथ का एक का जबड़ा है और लगभग 1.2 मिलियन वर्ष पुराना हो सकता है। लेकिन इसकी पुष्टि के लिए उन्हें और परीक्षण करने की जरूरत है। हालांकि कश्मीर में गैलेंडर पंपोर नामक एक जगह में भी इसी तरह के एक मैमथ के जीवाश्म मिलने का दावा किया गया था। लेकिन अब शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि, गैलेंडर पंपोर में पाए गए जीवाश्म वास्तव में मैमथ के नहीं, बल्कि किसी अन्य प्राचीन हाथी के हैं। हाथी की खोपड़ी से पता चलता है कि वह पेलियोलोक्सोडोन प्रजाति (Palaeoloxodon Species) का था और लगभग 50 वर्ष का था। जीवाश्मों के साथ-साथ यहां पर प्रारंभिक मध्य पुरापाषाण युग के पत्थर के औजार भी खोजे गये हैं। ये सभी जीवाश्म और पत्थर के औजार अब जम्मू विश्वविद्यालय के प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय में रखे गए हैं। हालांकि इस जीवाश्म के कुछ हिस्से 2004 के बाद चोरी हो गए या नष्ट हो गए थे। मैमथ (Mammoth), आधुनिक हाथियों के प्राचीन रिश्तेदार हुआ करते थे जो, लगभग 50,000 ईसा पूर्व से 10,000 ईसा पूर्व के दौरान हमारी पृथ्वी पर घूमा करते थे। ये काफी हद तक हाथियों जैसे दिखते थे, लेकिन वास्तव में हाथियों से बहुत बड़े होते थे। यद्यपि, भारत में अभी तक मनुष्यों द्वारा तराशे कोई भी मैमथ हाथीदांत नहीं मिले हैं। लेकिन जर्मनी की वोगेलहर्ड नामक एक गुफा में, शोधकर्ताओं को शानदार नक्काशी के साथ विशाल मैमथ के दांत मिले हैं, जिन्हें मनुष्यों द्वारा अलग-अलग जानवरों के आकार में उकेरा गया है।
काली मिर्च: स्वाद, खेती और वैश्विक व्यापार की एक रोचक यात्रा
भारत को “मसालों का देश” कहा जाता है। देश में ढेरों मसालों के बीच काली मिर्च का तड़का हमारे स्वादिष्ट व्यंजनों में जान फूंक देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मिर्च की भांति बिल्कुल भी नहीं दिखाई देने वाली, “काली मिर्च” भारत के मसाला व्यापार में भी जान फूंक देती है। चलिए जानते हैं कैसे? काली मिर्च ‘पाइपर नाइग्रम’ (Piper Nigrum) नामक पौधे में उगने वाला सूखा कच्चा फल होती है। अपनी तेज़ गंध, स्वाद और औषधीय गुणों के कारण काली मिर्च, दुनियाभर के सबसे लोकप्रिय मसालों में से एक मानी जाती है। भारत दुनिया में काली मिर्च के सबसे प्रमुख उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक देशों में से एक है। भारत में काली मिर्च की खेती मुख्य रूप से केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु तथा सीमित मात्रा में महाराष्ट्र, उत्तर पूर्वी राज्यों और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में की जाती है। देश में काली मिर्च का सर्वाधिक उत्पादन केरल और कर्नाटक राज्य में होता है। काली मिर्च 10 मीटर ऊंचाई तक फूलों वाली लताओं (Vine) पर उगती है। यह लताएँ सिल्वर ओक (Silver Oak) जैसे ऊंचे पेड़ों के सहारे बढ़ती हैं। लतायें पहली बार चौथे या पाँचवें वर्ष के बाद फल देना शुरू करती हैं और उसके बाद सात वर्षों तक फल देती रहती हैं। 7वीं शताब्दी से पहले, काली मिर्च की लतायें केवल जंगलों में उगती थीं। काली मिर्च नम उष्णकटिबंधीय पौधा है, जिसके लिए उच्च वर्षा और आर्द्रता की आवश्यकता होती है। भारत में पश्चिमी घाट के उपपर्वतीय इलाकों की गर्म और आर्द्र जलवायु, काली मिर्च की खेती लिए आदर्श मानी जाती है। यह फसल 20° उत्तर और दक्षिण अक्षांश के बीच तथा समुद्र तल से 1500 मीटर की ऊंचाई तक सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। यह फसल 10° से 40°C के बीच का तापमान सह सकती है। लेकिन बेहतर उत्पादन के लिए आदर्श तापमान 28°C के औसत के साथ 23 -32°C के बीच माना जाता है। जड़ की वृद्धि के लिए मिट्टी का इष्टतम तापमान 26° से 28°C होना चाहिए। काली मिर्च की बेहतर पैदावार के लिए तकरीबन 125-200 से.मी (cm) की अच्छी तरह से वितरित वार्षिक वर्षा को आदर्श माना जाता है। काली मिर्च को 5.5 से 6.5 हाइड्रोजन क्षमता (Potential of Hydrogen(P.H) value) के साथ विविध प्रकार की मिट्टी में उगाया जाता है, हालांकि, प्राकृतिक तौर पर यह लाल लैटेराइट मिट्टी में अच्छी तरह से उगती है। भारत में काली मिर्च की 75 से अधिक किस्मों की खेती की जाती है। केरल में उगाई जाने वाली ‘करीमुंडा’ (Karimunda) काली मिर्च की सबसे लोकप्रिय किस्म है। काली मिर्च की अन्य महत्वपूर्ण किस्मों में ‘कोट्टनादन’ (Kottanadan) (दक्षिण केरल), ‘नारायणकोडी’ (Narayankodi) (मध्य केरल), ‘एम्पिरियन’ (Empirian) (वायनाड), ‘नीलामुंडी’ (Neelamundi) (इडुक्की), ‘कुथिरावली’ (Kuthiravalli) (कोझिकोड और इडुक्की), ‘कल्लुवली’ (Kalluvalli) (उत्तरी केरल), ‘मल्लिगेसरा’ और ‘उद्दगरे’ (Malligesara and Uddagare) (कर्नाटक) शामिल हैं।
क्या आप जानते है कि काली मिर्च दुनिया के उन सबसे शुरुआती मसालों में से एक थी, जिनका व्यापार किया गया था। व्यापारिक दुनिया में काली मिर्च कई ऐतिहासिक घटनाओं की गवाह भी रही है। माना जाता है कि काली मिर्च के व्यापार के परिणामस्वरूप ही प्रसिद्ध मसाला मार्गों (Spice Routes) की खोज हुई थी। साथ ही मसाला मार्गों की बदौलत ही वैश्वीकरण की शुरुआत हुई थी। 30 ईसा पूर्व में प्रारंभिक रोमन साम्राज्य (Roman Empire) ने मिस्र पर विजय प्राप्त करने के बाद भारत में मालाबार तट से विदेशी मसालों की श्रृंखला तक सीधी पहुंच हासिल की थी। उस समय काली मिर्च की कीमत का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उस दौरान हूणों (Huns) द्वारा घिरे रोम को मुक्त करने के लिए फिरौती के रूप में सोने, चांदी और रेशमी अंगरखे के साथ-साथ 3,000 पाउंड काली मिर्च की मांग की गई थी। काली मिर्च, को आज भी काला सोना कहा जाता है। मध्य युग में इसका प्रयोग मुद्रा के रूप में भी किया जाता था। इसके अलावा किसी भी महंगी चीज के लिए “काली मिर्च के बराबर प्रिय” शब्द का प्रयोग किया जाता था। मध्य युग के दौरान काली मिर्च की कीमतें बहुत अधिक थीं। इस दौरान काली मिर्च का व्यापार पूरी तरह से रोमनों के अधीन था। 15वीं शताब्दी के मध्य में, पुर्तगाल पूरे यूरोप (Europe) में अग्रणी समुद्री राष्ट्र था। इसी समयान्तराल में नाविक प्रिंस हेनरी (Prince Henry) के नेतृत्व में, रोमनों के एकाधिकार को तोड़ने तथा पूर्व से विदेशी मसालों पर पकड़ बनाने के लिए भारत तक एक समुद्री मार्ग खोजने के प्रयास भी चल रहे थे। इसके परिणाम स्वरूप पुर्तगाली खोजकर्ता ‘वास्को डी गामा’ (Vasco Da Gama) को भारत आने के लिए नियुक्त किया गया। वह मध्य पूर्व और मध्य एशिया के माध्यम से ‘रेशम मार्ग’ (Silk Road) से बचते हुए, अफ्रीका के चारों ओर घुमावदार मार्ग लेते हुए यूरोप से भारत जाने वाले पहले व्यक्ति बने। वास्को डी गामा की सफल यात्रा, भारत पर पुर्तगाली उपनिवेशवाद के 450 वर्षों की शुरुआत मानी जाती है। दरसल, इस दौरान मसाले औषधीय रूप से महत्वपूर्ण माने जाते थे। किंतु वे केवल पूर्व के उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ही उगते थे, जिससे पश्चिम में उनकी बहुत मांग थी। इन मसालों का खाद्य-सुगंधित स्वादों के साथ-साथ औषधि, जहर के लिए मारक, मलहम और कुछ का तो अगरबत्ती के रूप में भी उपयोग किया जाता था। लगभग एक सदी तक मसालों के व्यापार पर पुर्तगालियों का वर्चस्व रहा। हालांकि, इस वर्चस्व को डचों (Dutch) द्वारा समाप्त कर दिया गया और 1635 की शुरुआत में अंग्रेजों ने काली मिर्च के बागान स्थापित किए।
वर्तमान में, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु भारत के शीर्ष तीन काली मिर्च उत्पादक राज्य हैं। 2008 से 2012 के बीच कर्नाटक में इसका उत्पादन दोगुने से अधिक हो गया है। लेकिन इसी अवधि के दौरान केरल में यह उत्पादन आधे से भी कम हो गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि धीरे-धीरे किसान बहु-फसल और इलायची जैसी जल्दी उगने और महंगी बिकने वाली फसलों की ओर बढ़ रहे हैं। काली मिर्च के वैश्विक व्यापार में भारत, वियतनाम (Vietnam) और ब्राजील (Brazil) का दबदबा है। भारत काली मिर्च के दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक एवं निर्यातक देशों में से एक है, जो दुनिया की 34% काली मिर्च का उत्पादन करता है। सूखी और पकी हुई काली मिर्च का उपयोग प्राचीन काल से ही स्वाद और पारंपरिक औषधि दोनों के लिए किया जाता रहा है। काली मिर्च दुनिया में सबसे अधिक कारोबार किया जाने वाला मसाला है।
काली मिर्च के वैश्विक बाजार को एशिया-प्रशांत (Asia-Pacific), यूरोप, उत्तरी अमेरिका (North America), दक्षिण अमेरिका (South America) और मध्य पूर्व और अफ्रीका (Africa) में विभाजित किया गया है। उत्पादन और निर्यात के मामले में एशिया-प्रशांत वैश्विक काली मिर्च बाजार पर हावी माना जाता है। वियतनाम (Vietnam) दुनिया भर में काली मिर्च का सबसे बड़ा निर्यातक है, क्योंकि काली मिर्च के पौधे उगाने के लिए वहां की जलवायु और परिस्थितियां अनुकूल मानी जाती हैं। ‘वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय’ के मसाला बोर्ड (Spices Board) द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में कोविड-19 (COVID-19) महामारी की संकटग्रस्त स्थिति के बावजूद भी भारत से काली मिर्च के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। काली मिर्च जैसे भारतीय मसाले दुनिया के सबसे लोकप्रिय मसालों में से एक हैं। जब काली मिर्च की मांग बढ़ने की बात आती है तो भारत स्वयं भी हमेशा से ही अग्रणी राष्ट्र रहा है। हमारा देश इस लोकप्रिय मसाले का एक प्रमुख निर्यातक भी रहा है। आंकड़ों के अनुसार 2020-2021 के दौरान भारत से काली मिर्च का निर्यात काफी बढ़ा है। संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) काली मिर्च का दुनिया में सबसे बड़ा आयातक (कुल आयात का 16.2% हिस्सा) है।
अमेरिका के बाद नीदरलैंड (Netherlands), जर्मनी (Germany), यूके (UK) और जापान (Japan) हैं। यह देश दुनिया भर में आयात की जाने वाली कुल काली मिर्च का 50% से अधिक हिस्सा आयात करते हैं। वियतनाम अभी भी दुनिया का सबसे बड़ा काली मिर्च उत्पादक और निर्यातक देश है। 2022 में, वियतनाम का निर्यात 220,000 टन होने का अनुमान था, जो दुनिया भर में कुल काली मिर्च उत्पादन का 55% है। काली मिर्च को एक बुनियादी खाद्य मसाला माना जाता है, और संभवतः खाने की मेज पर नमक के साथ रखा जाने वाला एक मसाला है। किसने सोचा होगा कि खाने की मेज पर छोटी सी शीशी में रखी जाने वाली काली मिर्ची का दुनिया के व्यापार इतिहास पर इतना प्रभाव रहा होगा?
मेरठ के प्रसिद्ध व्यंजन: हलवा-पराठा और शहर की स्वादिष्ट खान-पान परंपरा
हम जानते हैं कि हमारे मेरठ शहर को खेल नगरी कहा जाता है। हालांकि मेरठ कैंची, खेल के सामान और गजक पट्टी के लिए भी विशेष रूप से प्रसिद्ध है। लेकिन इन सभी चीजों के अलावा एक अन्य ऐसी चीज है, जो इसे स्वर्ग बनाती है और वह है यहां का स्वादिष्ट व्यंजन। हमारा शहर अपने खान-पान के लिए भी बहुत मशहूर है। समृद्ध व्यंजनों के प्रति मेरठ के लोगों का प्रेम किसी से छिपा नहीं है। यहां का अनोखा स्थानीय भोजन पूरे देश में लोकप्रिय है। यहां के हलवा-पराठे की रेसिपी और इसका स्वाद सौ साल पुराना है। हलवा पराठा का नाम सुनते ही नौचंदी मेले की याद ताजा हो जाती है। तो आइए आज हम यहां के कुछ मशहूर स्थानीय व्यंजनों को देखते हैं और उनका मजा लेते हैं।
ब्लैक सोल्जर फ्लाई से पशुधन चारे के संकट का उभरता समाधान
एक या अधिक पशुओं के समूह को, जिन्हें कृषि सम्बन्धी परिवेश में भोजन, रेशे तथा श्रम आदि सामग्रियां प्राप्त करने के लिए पालतू बनाया जाता है, पशुधन के नाम से जाने जाते हैं। आपको बता दें कि उत्तर भारतीय राज्यों के किसानों को गेहूं उत्पादन के अभाव के कारण सूखे चारे की कमी का सामना करना पड़ रहा है। गेहूं की उपज में कमी के कारण कई उत्तरी राज्यों में पशुओं के चारे को लेकर संकट पैदा हो गया है, जो एक चिंतनीय विषय है। इस संकट से हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड जैसे कई उत्तरी राज्य ग्रसित है । परिणाम स्वरूप इन राज्यों ने अन्य राज्यों में पुआल (गेहूं या धान आदि के सूखे डंठल जिन में से दाने निकाल लिए गए हो) भेजने पर पूर्ण रूप से या अनिश्चितकालीन प्रतिबंध लगा दिया है। दुनिया की कुल कृषि में पशुधन का 70 से 80% हिस्सा है और फिर भी पशुधन द्वारा मनुष्यों द्वारा खपत की जाने वाली कैलोरी और प्रोटीन का क्रमशः केवल 18% और 25% ही उत्पन्न किया जाता है । पशुओं के लिए भोजन उगाने के लिए दुनिया की 33% फसल भूमि का उपयोग किया जाता है, फिर भी पशुओं के लिए चारे का संकट सदैव बना रहता है। इस समस्या के समाधान के लिए, पशुओं के चारे के रूप में, कीटों को चारे के मौजूदा स्रोतों, जिनमें ज्यादातर मछली और सोयाबीन शामिल हैं, का पूरक बनाया जा सकता है । पशुधन चारे के रूप में कीटों का उपयोग भोजन की स्थिरता में सुधार कर सकता है क्योंकि कीट कम मूल्य वाले जैविक कचरे (जैसे, फल, सब्जियां और यहां तक कि खाद) को उच्च गुणवत्ता वाले चारे में बदल सकते हैं। मवेशियों की आबादी को बनाए रखने में कीटों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ब्लैक सोल्जर फ्लाई लार्वा (Black Soldier Fly larvae ), जिसे हर्मेशिया इल्यूसेंस (Hermetia illucens) भी कहा जाता है , एक ऐसा सबसे आम कीट है, जिसका उपयोग पशु आहार के लिए कीट आहार के रूप में किया जाता है। ब्लैक सोल्जर फ्लाई लार्वा (BSFL) के सूखे वजन में 50% तक क्रूड प्रोटीन (Crude Protein (CP) तक, 35% तक लिपिड (Lipids) होते हैं और इसमें एक अमीनो एसिड (Amino Acid) होता है जो मछली के भोजन के समान होता है। इन कीटों को पोल्ट्री (Poultry), सूअर, मछली और झींगा की कई प्रजातियों के लिए प्रोटीन के वैकल्पिक स्रोतों के रूप में पहचाना और उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त इन कीटों द्वारा कृत्रिम वातावरण में भी कचरे को मूल्यवान प्रोटीन में कुशलता से परिवर्तित किया जा सकता है । जानवरों के चारे के रूप में इन कीटों का उपयोग करने से न केवल पोषण के मामले में बल्कि पशु स्वास्थ्य के मामले में भी अतिरिक्त लाभ होते हैं। कीटों की खेती, हालांकि अभी कम ज्ञात और कम चर्चित है, परंतु भारत और दुनिया भर में निरंतर एक फलता-फूलता उद्योग बन रहा है, जिसमें खपत और अन्य उपयोग-मामलों के लिए विभिन्न प्रकार के कीटों का प्रजनन, पालन और कटाई शामिल है।
कीटों की खेती का चलन युगों पहले से चला आ रहा है। प्राचीन यूनानियों और रोमियों द्वारा उस समय के अभिजात वर्ग के लिएएक स्वादिष्ट भोजन बनाने के लिए आटे और शराब से बनने वाले आहार पर बीटल लार्वा का इस्तेमाल किया गया था। तब से लेकर अब तक, सभ्यताओं और संस्कृतियों के पार, कीट खेती बहुत विकसित हुई है। वर्षों से हमारे द्वारा प्रचुर मात्रा में खेती किए जाने वाले कुछ कीटों में, रेशम के कीड़े, मधुमक्खियाँ, टिड्डे, घर की मक्खियाँ, ततैया, टिड्डियाँ, खाने के कीड़े, केंचुए, इत्यादि शामिल हैं । आज, संभवतः खेती द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले कीटों का सबसे प्रमुख उपयोग पशुओं के लिए भोजन और चारा पैदा करने के लिए किया जाता है । जबकि कीट पालन के एक अन्य प्रमुख अनुप्रयोग में मानव उपभोग के लिए खाद्य कीटों जैसे झींगुर आदि का पालन शामिल है । हालांकि, पोषण के दृष्टिकोण से कीट, प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्वों का एक बड़ा स्रोत हैं, फिर भी आज की तारीख में, शायद ही कभी मानव उपभोग के लिए इनका उपयोग किया जाता है । मोटे तौर पर, हमारे देश में समग्र जनमत कीटों को खाने की अवधारणा के खिलाफ है। हालांकि, भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र में, कीटाहारिता (Entomophagy), जो कीड़ों को खाने की प्रथा को संदर्भित करता है, क्षेत्र के स्थानीय-आदिवासी समुदायों द्वारा बड़े पैमाने पर कई वर्षों से अभ्यास किया गया है और साथ ही यह उनकी आजीविका में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। जबकि भारत के कई अन्य राज्यों में, अंत-उपभोक्ताओं की अस्वीकृति खाद्य कीटों से बने आहार को अपनाने की दिशा में एक प्रमुख बाधा के रूप में बनी हुई है, अक्सर यह घृणा की भावना के साथ-साथ कई बार अनिश्चित, आदिम जीवन शैली से जुड़ा हुआ माना जाता है।
भारत में कीट पालन से जुड़े अन्य प्रमुख मुद्दों में पशुओं को कीट खिलाने से जुड़ी अन्य चिंताएं भी शामिल हैं, जैसे कि पशुओं में संभावित एलर्जी प्रतिक्रियाएं और संक्रामक रोगों के प्रति भेद्यता। इसी समय, भारत में कीट पालन से जुड़े नियामक कानून पूरी तरह से पूर्ण और अच्छी तरह से परिभाषित नहीं हैं, इसको बढ़ावा देने के विपरीत यह कीट कृषि क्षेत्र में कई स्टार्टअप/कंपनियों को उत्पादन (कीट-आधारित उत्पादों के) को औद्योगिक स्तर तक बढ़ाने और साथ ही वैश्विक बाजारों तक पहुंच स्थापित करने से रोक रहे है।
पैनटोन सिस्टम: कैसे तय होता है दुनिया भर में रंगों का एक समान मानक
क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब हम चित्रकारी के लिए रंगों का चयन करते है, तब मानक रंगों की एक सूची के आधार पर हम किसी रंग का चयन करते हैं। वैसे ही, जब हम दुनिया में कहीं भी किसी वस्त्र या कपड़े के रंग का चयन करते हैं, तो हमें उस विशिष्ट रंग के चयन के लिए एक “कलर स्पेस” (Colour space) सिस्टम या ‘कलर शेड कार्ड’ (Colour Shade Card) दिखाया जाता है। यह प्रणाली “पैनटोन” (Pantone) नामक एक अमेरिकी कंपनी का एकाधिकार है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया भर में छोटी या बड़ी सभी कपड़ा बिक्री कंपनियां तथा दुकानें भी मानक रंगों की इस सूची को ही उनके कपड़ों का रंग चुनने हेतु उपयोग में लाती हैं? पैनटोन कंपनी रंग संचार और प्रेरणा सेवाओं की प्रदाता कंपनी है। पैनटोन कंपनी का मुख्यालय अमेरिकी राज्य न्यू जर्सी (New Jersey) के कार्लस्टेड (Carlstadt) शहर में स्थित है। यह कंपनी अपने ‘पैनटोन मैचिंग सिस्टम’ (पीएमएस) [Pantone Matching System, PMS] के लिए जानी जाती है। पीएमएस का उपयोग विभिन्न प्रकार के उद्योगों में, विशेष रूप से ग्राफिक डिजाइन (Graphic design), फैशन डिजाइन (Fashion design), उत्पाद डिजाइन (Product design), छपाई और निर्माण आदि में किया जाता है। पीएमएस द्वारा बनाया गया कलर स्पेस कार्ड, डिजाइन से लेकर उत्पादन तक किसी भी रंग के प्रबंधन का समर्थन करने के लिए, भौतिक या फिर डिजिटल (Digital) स्वरूपों में इस्तेमाल किया जाता है। एक कलर स्पेस या कलर शेड कार्ड में रंगों की एक विशिष्ट मानक व्यवस्था होती है। इस कलर स्पेस से संदर्भ लेकर हम किसी भी रंग को पहचान सकते है। पैनटोन मैचिंग सिस्टम या पीएमएस, जो कि एक मानकीकृत रंग प्रतिकृति प्रणाली है, पूरे विश्व में प्रयुक्त रंगों के लिए एक मानक रंग व्यवस्था के रूप में कार्य करती है, इस प्रणाली का उपयोग विश्व भर में कोई भी किसी विशिष्ट रंग की पहचान करने के लिए कर सकता है। कलर स्पेस, रंगों की एक ऐसी विशिष्ट व्यवस्था है, जो विभिन्न भौतिक उपकरणों द्वारा बनाए जाने वाले रंगों के संयोजन में, रंग के पुनरुत्पादित प्रतिनिधित्व का समर्थन करता है। इस तरह के प्रतिनिधित्व में सादृश्य या डिजिटल प्रतिनिधित्व भी शामिल हो सकता है। किसी विशेष उपकरण या डिजिटल फ़ाइल की रंग क्षमताओं को समझने के लिए “कलर स्पेस” एक उपयोगी वैचारिक उपकरण है। अतः एक कलर स्पेस की मदद से हम किसी भी रंग की सही पहचान कर सकते हैं और बता सकते हैं कि, हमारे कपड़े का मानक रंग कौन सा है। पीएमएस का उपयोग डिजाइनरों को, जब कोई डिजाइन उत्पादन चरण में प्रवेश करता है, तब विशिष्ट रंगों के लिए “रंग मिलान” की अनुमति देना है। फिर चाहे रंग का उत्पादन करने के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले उपकरण कैसे भी हो। इस प्रणाली को ग्राफिक डिजाइनरों एवं पुनरुत्पादन और मुद्रण गृहों द्वारा व्यापक रूप से अपनाया जाता है। हालांकि पीएमएस कलर गाइड्स (Colour Guides) को सालाना खरीदा एवं बदला जाता है, क्योंकि समय के साथ उनकी स्याही थोड़ी फीकी पड़ जाती है।
पैनटोन कलर मैचिंग सिस्टम, काफी हद तक एक मानकीकृत रंग प्रतिकृति प्रणाली है। वर्ष 2019 तक इसमें कुल 2161 रंग थे। रंगों को मानकीकृत करके, विश्व के अलग-अलग स्थानों में विभिन्न निर्माता पैनटोन प्रणाली का उपयोग कर यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि रंग एक दूसरे के साथ सीधे संपर्क के बिना मेल खाएं । ऐसा ही एक प्रयोग सीएमवाईके (CMYK) प्रक्रिया में रंगों का मानकीकरण करना है। सीएमवाईके प्रक्रिया स्याही के चार रंगों, सियान (Cyan), मैजेंटा ( Magenta), पीले (Yellow) और काले (Black) रंग का उपयोग करके प्रिंट करने की एक विधि है। दुनिया की अधिकांश मुद्रित सामग्री इसी प्रक्रिया का उपयोग करके निर्मित की जाती है। सीएमवाईके का उपयोग करके पैनटोन रंगों के एक विशेष उपसमूह को पुन: प्रस्तुत किया जा सकता है। वर्ष 2000 से, पैनटोन कलर संस्था द्वारा एक विशेष रंग को “कलर ऑफ द ईयर (Colour of the year)” भी घोषित किया जाता है। ‘कलर ऑफ द ईयर’ का मतलब एक पूरे वर्ष के लिए किसी विशिष्ट रंग को चुनना है। यह कंपनी एक वर्ष में दो बार विभिन्न देशों के रंग मानक समूहों के प्रतिनिधियों की एक गुप्त बैठक आयोजित करती है। दो दिनों की प्रस्तुतियों और बहस के बाद, इन प्रतिनिधियों द्वारा अगले वर्ष के लिए एक रंग को चुना जाता है ; उदाहरण के लिए, इस साल 2023 की गर्मियों के लिए 2022 में न्यूयॉर्क (New York) में विशेष रंग वीवा मैजेंटा (Viva Magenta) चुना गया था। पैनटोन के साथ–साथ इसकी कुछ प्रतिस्पर्धी कंपनियां भी विश्व में है, जिनका कार्य पैनटोन से थोड़ा बहुत मिलता जुलता है। परंतु आज भी, रंगों के मानकीकरण के लिए दुनिया में पैनटोन का ही बोलबाला है। पैनटोन की प्रतिस्पर्धी कंपनियां निम्न उल्लेखित हैं- डाटाकलर (Datacolor)-अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से रंग मापन, प्रबंधन, संचार और अंशशोधन के लिए समाधान प्रदान करता है। साइनआर्ट (Signart)- वाणिज्यिक, विद्युत, वास्तुकला, वित्तीय, स्वास्थ्य देखभाल, आतिथ्य क्षेत्रों आदि के लिए चिह्नों का निर्माता है। बिनयान स्टूडियोज (Binyan Studios)- एक वास्तुकला से संबंधित और डिज़ाइन कंपनी है। जैम फिल्ड (Jam Filled)- एक डिजिटल एनिमेशन (Animation) स्टूडियो है। इस तरह से हम पैनटोन मैचिंग सिस्टम या कलर स्पेस के आधार पर रंग चुनते हैं। इन प्रणालियों की मदद से हम अपने कपड़ों का रंग भी निर्धारित कर सकते हैं। चूंकि दुनिया के हर एक हिस्से में विभिन्न रंगों के नाम अलग-अलग होते हैं, इसलिए एक विशिष्ट रंग तय करने के लिए इस मानकीकृत प्रणाली को देखा जाना चाहिए।
दांडी मार्च: नमक सत्याग्रह जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी
महात्मा गांधी, जिन्हें राष्ट्रपिता और बापू के नाम से भी जाना जाता है, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे महान नेताओं में से एक थे। उनका व्यक्तित्व और उनके विचार आज भी हर बच्चे, युवा और वृद्ध के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उन्होंने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए न केवल भारत को स्वतंत्रता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि पूरी दुनिया को शांतिपूर्ण संघर्ष की शक्ति का संदेश भी दिया। उनके नेतृत्व में चलाए गए कई आंदोलनों ने भारतीयों को एकजुट किया और उन्हें अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस दिया।
स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए महात्मा गांधी ने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया और देश को आज़ाद कराने के लिए अनेक महत्वपूर्ण आंदोलन चलाए। इन्हीं आंदोलनों में से एक था नमक आंदोलन, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला कर रख दिया। इस आंदोलन को नमक सत्याग्रह या दांडी आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है। इस सत्याग्रह का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों द्वारा नमक पर लगाए गए करों और कठोर नियमों का विरोध करना था, ताकि भारतीय स्वयं नमक बना सकें और उन्हें यह आवश्यक वस्तु उचित मूल्य पर उपलब्ध हो सके। नमक के महत्व को समझते हुए महात्मा गांधी ने इस अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ आवाज उठाई और 12 मार्च 1930 को नमक सत्याग्रह की शुरुआत की, जो 6 अप्रैल 1930 तक चला।
इस ऐतिहासिक सत्याग्रह की शुरुआत महात्मा गांधी ने अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से की, जिसका गंतव्य स्थान गुजरात का तटीय गांव दांडी था। दांडी अरब सागर के किनारे स्थित एक ऐसा स्थान था, जहां नमक आसानी से बनाया जा सकता था। इस यात्रा में गांधी जी के साथ 80 सत्याग्रहियों का एक समूह शामिल था, और दांडी पहुंचने में उन्हें 24 दिन का समय लगा। यह सत्याग्रह इतना प्रभावशाली था कि रास्ते में हर आयु वर्ग के लोग इस आंदोलन से जुड़ते चले गए। इस समूह में सबसे कम उम्र के सत्याग्रही 16 वर्षीय विट्ठल लीलाधर ठक्कर थे। गांधी जी ने इस मार्च की जानकारी पहले ही ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड इरविन को एक पत्र के माध्यम से दे दी थी और उनसे अन्यायपूर्ण नमक कानून पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था, लेकिन जब उनकी बात नहीं मानी गई, तब उन्होंने इस सत्याग्रह को शुरू करने का निर्णय लिया।
इस सत्याग्रह में भारतीय दुग्ध विभाग के डिप्लोमा धारक और गौ सेवा संघ के एक कार्यकर्ता, 25 वर्षीय थेवरथुंडियिल टाइटस भी शामिल थे। सत्याग्रहियों ने अपनी यात्रा के दौरान अधिकांश समय गांवों में बिताया और अत्यंत साधारण भोजन ग्रहण किया, जिससे यह आंदोलन सादगी और आत्मसंयम का प्रतीक बन गया। इस दौरान कलकत्ता की लिली बिस्किट कंपनी ने सत्याग्रहियों को बिस्कुट देने की पेशकश की, लेकिन महात्मा गांधी ने इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वे इस आंदोलन को पूरी तरह सादगी और आत्मनिर्भरता के सिद्धांतों पर आधारित रखना चाहते थे।इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। गृहिणियों के एक समूह का नेतृत्व कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने किया, जिन्होंने पुलिस के लाठीचार्ज के बावजूद अपना विरोध जारी रखा और पीछे हटने से इनकार कर दिया। जब नमक बनाना शुरू हुआ, तो कमलादेवी द्वारा तैयार किया गया पहला नमक का पैकेट 501 रुपये में नीलाम हुआ, जो इस आंदोलन के प्रति लोगों के समर्थन और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक था।
सत्याग्रह की एक महत्वपूर्ण शाम को महात्मा गांधी ने एक विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि यह संभवतः उनका अंतिम भाषण हो सकता है। उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि यदि उन्हें और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया जाए, तब भी आंदोलन को जारी रखा जाना चाहिए। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए इस संघर्ष को आगे बढ़ाएं और स्वतंत्रता की इस लड़ाई में अपने संकल्प को मजबूत बनाए रखें।
अपने संबोधन में महात्मा गांधी ने स्पष्ट किया कि आंदोलन की आगामी योजनाओं को उसी प्रकार जारी रखा जाना चाहिए, जैसा पहले निर्धारित किया गया था। उन्होंने स्वयंसेवकों से अनुशासन बनाए रखने और आंदोलन की मर्यादा का पालन करने का आग्रह किया। उनका विश्वास था कि नमक कानून के विरुद्ध शुरू हुआ यह सत्याग्रह जल्द ही पूरे देश में नागरिक प्रतिरोध की एक अखंड धारा बन जाएगा।उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि यह संघर्ष पूरी तरह शांतिपूर्ण और अहिंसक होना चाहिए। उन्होंने लोगों को अपने क्रोध पर नियंत्रण रखने और सत्य तथा अहिंसा के सिद्धांतों को अपनाते हुए आगे बढ़ने की सलाह दी, ताकि आंदोलन की नैतिक शक्ति बनी रहे।अपने भाषण में उन्होंने यह आशा भी व्यक्त की कि यदि उन्हें और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया जाए या वे स्वयं इस संघर्ष को आगे न बढ़ा सकें, तब भी यह आंदोलन रुकना नहीं चाहिए। उन्होंने स्वयंसेवकों और देशवासियों से आह्वान किया कि वे साहस, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प के साथ सविनय अवज्ञा को जारी रखें और स्वराज की प्राप्ति के लिए इस संघर्ष को आगे बढ़ाएं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किए गए अपने अथक प्रयासों के दौरान महात्मा गांधी ने कई महत्वपूर्ण आंदोलन चलाए, जिनमें से नमक आंदोलन एक ऐतिहासिक आंदोलन था। ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला देने वाले इस आंदोलन को नमक सत्याग्रह या दांडी आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है। इस सत्याग्रह का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों द्वारा नमक पर लगाए गए करों और प्रतिबंधों को समाप्त करना था, ताकि भारतीय स्वयं नमक बना सकें और इसे सस्ती कीमत पर प्राप्त कर सकें। नमक की उपयोगिता और आवश्यकता को देखते हुए गांधी जी ने इस अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ आवाज उठाई और 12 मार्च 1930 को नमक सत्याग्रह की शुरुआत की, जो 6 अप्रैल 1930 तक चला।
इस सत्याग्रह की शुरुआत महात्मा गांधी ने अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से की, जिसका गंतव्य दांडी था। दांडी, गुजरात का एक छोटा तटीय गांव है, जहां नमक बनाना संभव था। इस ऐतिहासिक यात्रा में उनके साथ 80 सत्याग्रही शामिल थे और दांडी पहुंचने में उन्हें 24 दिन लगे। यह आंदोलन इतना प्रभावशाली था कि जैसे-जैसे यह आगे बढ़ा, विभिन्न आयु वर्ग के लोग इसमें शामिल होते गए। इस समूह में सबसे कम उम्र के सत्याग्रही 16 वर्षीय विट्ठल लीलाधर ठक्कर थे। गांधी जी ने इस मार्च से पहले ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड इरविन को एक पत्र लिखकर औपनिवेशिक नीतियों पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था, लेकिन जब कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो उन्होंने सत्याग्रह शुरू कर दिया।
ब्राह्मी से देवनागरी तक: एक लिपि की ऐतिहासिक यात्रा
देवनागरी, उत्तरी भारत में उपयोग की जाने वाली सर्वाधिक लोकप्रिय लेखन प्रणाली या लिपि है। इसे भारत और नेपाल की आधिकारिक लिपियों में से एक माना जाता है। इसका उपयोग 120 से अधिक भाषाओं को लिखने में किया जाता है। लैटिन वर्णमाला, चीनी लिपि और अरबी लिपि के बाद यह दुनिया में चौथी सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली लेखन प्रणाली बन चुकी है। भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत को लिखने के लिए भी देवनागरी का ही उपयोग किया जाता है। देवनागरी लिपि का विकास 7वीं शताब्दी ई. में शुरू हुआ। यह गुप्त लिपि से बाद के वर्षों में विकसित हुई। 13वीं शताब्दी ई. के आसपास यह लिपि पूर्णतः विकसित हो चुकी थी।
देवनागरी में 14 स्वर और 34 व्यंजन सहित कुल 48 मुख्य अक्षर होते हैं। देवनागरी बाएं से दाएं लिखी जाती है और इसमें अक्षरों के शीर्ष पर एक क्षैतिज रेखा होती है। इस रेखा को “शिरोरेखा” कहा जाता है। इसमें विशेषक यानी विशेष चिह्न भी होते हैं, जो अक्षरों की ध्वनि बदलने के लिए उनसे जुड़े रहते हैं। 'देवनागरी' शब्द दो शब्दों 'देव+नागरी' से मिलकर बना है। जहां देव का अर्थ "स्वर्गीय" या "दिव्य", और 'नागरी' का अर्थ "नगर" या "शहर" होता है। इस प्रकार 'देवनागरी' का अनुवाद "देवताओं के शहर" के रूप में किया जा सकता है। प्राचीन समय में इस लिपि का उपयोग मुख्य रूप से धार्मिक ग्रंथों और शिलालेखों में संस्कृत लिखने के लिए किया जाता था, लेकिन साथ ही इसका उपयोग उत्तरी और पश्चिमी भारत में स्थानीय भाषाओं को लिखने के लिए भी किया जाता था। दक्षिण भारत में इसे नंदिनागरी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ "नंदी की लेखनी" होता है।
देवनागरी एक बहुत ही बहुमुखी लेखन प्रणाली है, जिस कारण यह सीखने के परिपेक्ष्य में भी बहुत आसान लिपि हो जाती है। अच्छी बात यह है कि “यह लिपि जैसी दिखाई देती है, वैसा ही इसका उच्चारण भी होता है।” पहली नज़र में, देवनागरी अन्य भारतीय लिपियों जैसे बंगाली-असमिया या गुरुमुखी से भिन्न नजर आ सकती है। लेकिन अगर आप करीब से देखेंगे, तो पाएंगे कि कुछ कोणों और जोर को छोड़कर इन सभी में काफी समानताएं हैं। देवनागरी का सबसे पुराना उदाहरण समनगढ़ नामक स्थान में खोजे गए एक अभिलेख में देखने को मिलता है। यह दंतिदुर्ग नामक राजा के समय में लिखा गया था, जो राष्ट्रकूट नामक एक बड़े क्षेत्र पर शासन करता था। इसे वर्ष 754 ई. में लिखा गया था। राष्ट्रकूट साम्राज्य के अन्य राजाओं और पश्चिमी चालुक्यों, यादवों और विजयनगर जैसे अन्य स्थानों / साम्राज्य में भी देवनागरी के प्रारंभिक प्रयोग के उदाहरण देखने को मिलते हैं। देवनागरी की उत्पत्ति “ब्राह्मी” नामक एक अन्य प्राचीन लिपि से हुई है, जिसका उपयोग पूरे भारत में किया जाता था। ब्राह्मी लिपि को वाणी और साहित्य के देवता “ब्रह्मा” द्वारा प्रदत्त माना जाता है। सम्राट अशोक के काल के बाद ब्राह्मी के विकास में तेज गति देखी गई। अशोक ने विभिन्न चट्टानों और स्तंभों पर अपने संदेश ब्राह्मी लिपि में ही लिखे थे।
अशोक के बाद ब्राह्मी के विभिन्न प्रकार (सुंगन ब्राह्मी, कुषाण ब्राह्मी और गुप्त लिपि इत्यादि) विकसित हुए।। गुप्त लिपि का प्रयोग उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य के शासनकाल में किया जाता था। गुप्त लिपि, दक्कन और दक्षिण भारत जैसे अन्य स्थानों पर भी देखी गई है, जहाँ यह थोड़ी अलग दिखती है। छठी और सातवीं शताब्दी में गुप्त लिपि से एक अन्य प्रकार की लिपि प्रचलित हुई। इसे “सिद्धमातृका या सिद्धम लिपि” कहा जाता था। इसका उपयोग भारत और मध्य एशिया तथा जापान जैसे अन्य देशों में धार्मिक ग्रंथ लिखने के लिए किया जाता था। सिद्धम लिपि का सबसे पुराना उदाहरण जापान के एक मंदिर में एक पत्ते पर लिखे हुए लेख को माना जाता है। माना जाता है कि देवनागरी सिद्धम लिपि से प्रेरित एक नई तरह की लिपि का नाम है। हालांकि देवनागरी में कुछ ऐसी भी विशेषताएं (जैसे प्रतीकों के शीर्ष पर रेखाएं, तिरछे स्ट्रोक, छोटे कोण या नाखून की तरह दिखने वाले बिंदु आदि।) हैं, जो इसे सिद्धम लिपि से अलग बनाती हैं। ये विशेषताएं नागरी लिपि में भी देखी जाती हैं।
8वीं शताब्दी से देवनागरी का उपयोग राजाओं के नाम और उनके हस्ताक्षर लिखने के लिए किया जाता था। उदाहरण के लिए, गुजरात में जय भट्ट नाम के एक राजा ने देवनागरी लिपि का उपयोग कर संस्कृत भाषा में अपना नाम "स्व हस्तो मम जयभट्टस्य" लिखा था, जिसका अनुवाद व् अर्थ है: "यह मेरे हस्ताक्षर हैं, जय भट्ट" । कई भाषाओं में देवनागरी का उपयोग मुख्य या माध्यमिक लिपि के रूप में किया जाता है। इन भाषाओं में मराठी, पाली, संस्कृत, हिंदी, बोरो, नेपाली, शेरपा, प्राकृत, अपभ्रंश, अवधी, भोजपुरी, ब्रज भाषा, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, मगही, नागपुरी, राजस्थानी, खानदेशी, भीली, डोगरी, कश्मीरी, मैथिली, कोंकणी, सिंधी, मुंडारी, अंगिका, बज्जिका और संथाली शामिल हैं।
भारत में पुराने समय में लोग अलग-अलग लिपियों का उपयोग, अलग-अलग उद्देश्यों के लिए करते थे। उदाहरण के लिए, मोदी लिपि, (जिसे तेजी से लिखना आसान होता है), का उपयोग मराठी में रोजमर्रा के लेखन के लिए किया जाता था, जबकि देवनागरी का उपयोग औपचारिक मराठी शिलालेखों के लिए किया जाता था। मुद्रण के आविष्कार से पहले, देवनागरी का उपयोग ज्यादातर पेशेवर लेखकों द्वारा लिखे गए औपचारिक ग्रंथों के लिए किया जाता था। ये ग्रंथ आमतौर पर पांडुलिपियों पर लिखे गए थे। ब्राह्मी से गुप्त और देवनागरी तक के विकास को निम्नलिखित तालिका में दर्शाया गया है।
देवनागरी लिपि के अंक निम्नवत दर्शाए गए हैं:
आज, देवनागरी का उपयोग तीन प्रमुख भाषाओं (हिंदी (520 मिलियन से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली), मराठी (83 मिलियन से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली), और नेपाली (14 मिलियन से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली) को लिखने के लिए किया जाता है। इस प्रकार यह आधुनिक दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली लिपि है, जिस प्रकार प्राचीन काल में भूतपूर्व ब्राह्मी लिपि थी । साथ ही हिंदी, भारत सरकार की आधिकारिक भाषाओं में से एक है (अंग्रेजी के साथ), जबकि नेपाली, नेपाल की आधिकारिक भाषा है। मराठी, महाराष्ट्र की आधिकारिक भाषा है और इसे गोवा में भी आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। हिंदी का उपयोग पूरे भारत में केंद्र सरकार के संस्थानों द्वारा भी किया जाता है और हिंदी भाषी राज्यों के बाहर दूसरी भाषा के रूप में इसे व्यापक रूप से पढ़ाया और बोला जाता है। देवनागरी का उपयोग भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त कई अन्य भाषाओं (बोडो, मैथिली, कश्मीरी, सिंधी, डोगरी और कोंकणी) को लिखने के लिए भी किया जाता है।
प्राचीन भारत में लेखन एक जटिल प्रक्रिया हुआ करती थी। लेखक, श्रोता, संदर्भ और उद्देश्य के आधार पर लोग, एक ही भाषा लिखने के लिए विभिन्न लिपियों का उपयोग करते थे। इसके अलावा विभिन्न सामाजिक वर्गों और धार्मिक समूहों के लोग अलग-अलग लिपियों का उपयोग करते थे। उदाहरण के लिए, ब्राह्मण (पुजारी) अक्सर देवनागरी लिपि का इस्तेमाल करते थे, जबकि मुसलमान अक्सर फारसी-अरबी लिपि का इस्तेमाल करते थे। हालांकि, 19वीं शताब्दी में मुद्रण की शुरुआत ने सब कुछ बदल दिया। मुद्रण तकनीक के आगमन के बाद बड़ी मात्रा में पुस्तकें और अन्य पाठ्य सामग्री तैयार करना संभव हो गया। इससे हस्तलिखित पांडुलिपियों के उपयोग में गिरावट आई और मुद्रित ग्रंथों के उपयोग में वृद्धि हुई। मुद्रित ग्रंथ प्रायः देवनागरी लिपि में लिखे जाते थे। यही कारण है कि देवनागरी अब भारत में सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली लिपि बन गई है।
देवनागरी का प्रयोग भारत के बाहर भी किया जाता रहा है। उदाहरण के लिए, सिद्ध मातृका लिपि, जिसका देवनागरी से गहरा संबंध है, पूर्वी एशिया में बौद्धों द्वारा उपयोग की जाती थी। आज भारत में देवनागरी एक अत्यंत महत्वपूर्ण लिपि बन चुकी है और इसका प्रयोग प्रतिदिन लाखों लोग करते हैं।
जनसंख्या (2025)Source:
Census 2011; population projections based on 2011 city growth rates.
1,605,532
इंटरनेट उपयोगकर्ता
इंटरनेट उपयोगकर्ताSource:
The number of Internet connections was determined by multiplying the number of urban Internet subscribers with the percentage of the District Headquarters (DHQ) population in relation to the total urban population. The value was allocated to DHQs based on population ratio. Urban population is distributed in a 1.5:1 ratio between DHQ and non-DHQ cities. (TRAI September 2025 Report / Number)
2,040,803
फेसबुक उपयोगकर्ता
फेसबुक उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Facebook Users. (As per Facebook Ad Module, 31 December 2025)
609,950
लिंक्डइन उपयोगकर्ता
लिंक्डइन उपयोगकर्ताSource:
The number of unique member accounts that could be potentially reached in the city. (LinkedIn Ad Module, December 2025)
800,000
ट्विटर उपयोगकर्ता
ट्विटर उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Twitter Users (X Ad Module,December 2025)
421,500
इंस्टाग्राम उपयोगकर्ता
इंस्टाग्राम उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Instagram Users (Instagram Ad Module,December 2025)