वैनिला: दुनिया का दूसरा सबसे महंगा मसाला और इसकी खेती व वैश्विक यात्रा
कश्मीर की शान माने जाने वाले केसर को दुनिया का सबसे महंगा मसाला माना जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि दुनिया का दूसरा सबसे महंगा मसाला “वैनिला” (Vanilla) है। सौंदर्य प्रसाधनों, आइक्रीम (Ice Cream), परफ्यूम (Perfume) और कई प्रकार के पेय पदार्थों में इसका प्रयोग कई दशकों से होता आ रहा है। अपनी मनमोहक सुगंध और अत्यधिक कीमत के लिए जाने जाने वाले मसाले वैनिला का इतिहास भी कई उतार चढ़ावों से भरा पड़ा है।वैनिला एक सुगंधित और अत्यधिक मूल्यवान मसाला है, जिसका समृद्ध इतिहास रहा है। वैनिला की खेती सबसे पहले मेक्सिको (Mexico) के पूर्वी तट पर तत्कालीन देशज ‘टोटोनैक’ (Totonac) द्वारा की गई थी। बाद में एज़्टेक साम्राज्य (Aztec Empire) ने टोटोनैक पर विजय प्राप्त कर ली, जिससे वैनिला एज़्टेक लोगों के पास पहुंच गया। एज़्टेक ने चॉकलेट (Chocolate) का स्वाद बढ़ाने के लिए वैनिला का उपयोग किया। वहीं जब स्पेन (Spain ) ने एज़्टेक पर विजय प्राप्त की, तो स्पेन के लोग वैनिला को यूरोप (Europe) ले गए।17 वीं शताब्दी की शुरुआत तक वेनिला को मात्र चॉकलेट के सहायक के रूप में उपयोग किया जाता था, किंतु जब क्वीन एलिजाबेथ प्रथम (Queen Elizabeth I) के एक पेशेवर चिकित्सक ह्यू मॉर्गन (Hugh Morgan) ने वैनिला के स्वाद वाली मिठाई का आविष्कार किया,तो रानी को यह मिठाई बेहद पसंद आई थी। बाद में 1780 के दशक में फ्रांस (France) में अमेरिकी मंत्री के रूप में काम करने वाले व्यक्ति थॉमस जेफरसन (Thomas Jefferson) ने वैनिला का प्रयोग आइसक्रीम में किया। 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी की शुरुआत में वैनिला की पाक विधि (Recipe) पाक कला किताबों में दिखाई देने लगी थी। खाद्य इतिहासकार वेवरली रूट (Waverly Root) के अनुसार, पहली ज्ञात वैनिला पाक विधि हन्ना ग्लासि (Hannah Glasse) की पाक पुस्तक ‘द आर्ट ऑफ़ कुकरी’ (The Art of Cookery) के 1805 के संस्करण में दिखाई देती है। यह किताब चॉकलेट के साथ वैनिला के उपयोग का सुझाव देती है। वहीं वैनिला आइसक्रीम के लिए पहली पाक विधि मैरी रैंडोल्फ (Mary Randolph) की पुस्तक ‘द वर्जीनिया हाउसवाइफ’ (The Virginia Housewife (1824) में पाई जाती है। 19वीं सदी के उत्तरार्ध तक, वैनिला की मांग आसमान छू गई थी। आज वैनिला का उपयोग आइसक्रीम, शीतल पेय और अन्य खाद्य पदार्थों के स्वाद के रूप में किया जाता है। वैनिला, केसर के बाद दुनिया का दूसरा सबसे महंगा मसाला है। इसके उत्पादन में बहुत मेहनत और लंबा समय लगता है, इसलिए वैनिला इतना महँगा होता है। वैनिला का पौधा एक लता के रूप में उगता है, जिसकी लंबाई लगभग 300 फीट तक होती है, जिसमें से लगभग चार इंच व्यास वाले हल्के हरे-पीले फूल निकलते हैं । ये फूल आमतौर पर सुबह जल्दी खुलते हैं और लगभग 6 घंटे तक परागण के लिए ग्रहणशील अर्थात पूरी तरह से तैयार होते हैं। प्रत्येक फूल सिर्फ 24 घंटों के लिए खुला रहता है, जिसके बाद परागण न होने पर यह मुरझाकर मर जाता है और जमीन पर गिर जाता है। वैनिला की फली फूल के परागण से उत्पन्न होती है। वैनिला के पौधे का फल एक फली होती है जिसमें हजारों बीज होते हैं। इन्हीं बीजों से वैनिला को निकाला जाता है। इसका परागण मेलिपोना मधुमक्खियों (Melipona Bees) और हमिंग बर्ड्स (Hummingbirds) द्वारा किया जाता है। वैनिला की प्राथमिक प्राकृतिक परागणकर्ता, मेलिपोना मधुमक्खी, केवल मेक्सिको (Mexico) में पाई जाती है, किंतु अब वह भी लगभग विलुप्त हो चुकी हैं। इसलिए आज वैनिला को हाथ से परागित करना पड़ता है। वैनिला को हाथ से परागित करने का अभ्यास, 1841 में हिंद महासागर में रियूनियन द्वीप समूह पर एडमंड एल्बियस (Edmund Albius) नाम के एक 12 वर्षीय अफ्रीकी दास द्वारा विकसित किया गया था। वैनिला की कीमत चांदी से भी अधिक होने का एक और कारण दुनिया भर में प्राकृतिक वैनिला की कमी भी है। हिंद महासागर में स्थित एक द्वीप देश मेडागास्कर (Madagascar), कुल वैनिला आपूर्ति का 75% से अधिक का उत्पादन करता है। लेकिन हाल के चक्रवातों ने इसके उत्पादन को बहुत प्रभावित किया है, जिसकी वजह से कीमतें भी काफी बढ़ गई हैं। इसके साथ ही वैनिला की प्राथमिक परागणकर्ता, मेलिपोना मधुमक्खी, भी लगभग विलुप्त हो चुकी है। प्राकृतिक वैनिला की फलियों के पकने के साथ-साथ देखभाल की प्रक्रिया भी बेहद जटिल होती है। इन सभी चुनौतियों के कारण वैनिला बाज़ार में इतना महंगा है। वैनिला पौधों के आर्किड (Orchid) परिवार का एकमात्र फल देने वाला सदस्य है। हालांकि, वैनिला मूल रूप से दक्षिण और मध्य अमेरिका में उगाया जाता है, किंतु जलवायु और अन्य स्थितियों में समानता के कारण वैनिला, भारत में भी अच्छी तरह से बढ़ता है। आज वैनिला, मेडागास्कर से लेकर भारत, ताहिती (Tahiti) और इंडोनेशिया (Indonesia) तक, दुनिया भर के बागानों में फ़ैल गया है। दुनिया का 75% वैनिला मेडागास्कर और रीयूनियन (Reunion) से आता है। आज वैनिला का दुनिया भर में कुल उत्पादन लगभग 2000 मीट्रिक टन है। इसके बावजूद मांग की तुलना में इसका उत्पादन काफी कम है। भारत में वैनिला ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (British East India Company) द्वारा पहली बार साल 1835 में पेश किया गया था। हालांकि शुरुआत में पौधा फूलने के तुरंत बाद मुरझा गया था। कंपनी ने केरल, असम, बिहार, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भी वैनिला उगाने की कोशिश की, लेकिन सारे प्रयास विफल रहे। भारत में 1945 में नीलगिरी के ‘कल्लार फल अनुसंधान केंद्र’ और 1960 के दशक में केरल के वायनाड जिले के ‘बागवानी अनुसंधान केंद्र’ में इसकी खेती और अनुसंधान किये गए। किंतु 1990 के दशक तक इस फसल का कोई नियमित खरीदार नहीं था। लेकिन भारत में वैनिला के विकास एवं प्रसार की असली कहानी सन 1996 के आसपास पोलाची में शुरू हुई। दरसल, इस दौरान रबर, नारियल और कॉफी की गिरती कीमतों ने दक्षिण भारत के हताश किसानों को अन्य लाभदायक फसलों की ओर रुख करने को मजबूर किया। इसी दौरान पोलाची के एक मेहनती किसान डॉ. महेंद्रन (Dr. Mahendran) ने वैनिला की खेती करने का फैसला किया। उन्होंने यह विकल्प इसलिए चुना क्योंकि इससे पहले किसी ने भी वैनिला की व्यावसायिक रूप से या सफलतापूर्वक खेती नहीं की थी। उनके द्वारा की गई ऑर्किड वैनिला की खेती को भारत की पहली वेनिला पहल कहा जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि महज एक साल के भीतर अर्थात सन 1998 तक, डॉ. महेंद्रन तकरीबन पांच टन वैनिला का निर्यात भी करने में सफल रहे । 2003 तक, यह निर्यात 30 टन तक बढ़ गया था। वर्तमान में, डॉ. महेंद्रन दुनिया के कुछ सबसे बड़े स्वाद निर्माताओं के लिए वैनिला का उत्पादन कर रहे है। महेंद्रन के समान ही अब अन्य किसान भी वैनिला की खेती से लाभ कमा रहे हैं । उदाहरण के लिए, दक्षिण केरल के कोलेनचेरी के एक किसान थम्पी थॉमस ने भी जहां सन 1999 में कच्ची वैनिला फलियों को 500 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर बेचा था,लेकिन अब मौजूदा समय में उनके द्वारा उगाई गई वैनिला 3,750 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकती है। इनके अलावा भी जिन-जिन लोगों ने वैनिला प्रसंस्करण में परिश्रम किया है, उनमें से अधिकांश लोग शानदार रकम कमा रहे हैं। 1998 में प्रसंस्कृत वैनिला बीन्स का अंतर्राष्ट्रीय मूल्य केवल $19 था वहीं 2002 में यह बढ़कर $200 हो गया और आज की तारीख में इसकी कीमत बढ़कर तकरीबन $350-400 हो गई है।हालांकि, विशेषज्ञों का अनुमान है कि वैनिला के अधिक उत्पादन से इसकी कीमतों में गिरावट आ सकती है। साथ ही कई मृदा जनित कवक रोगजनकों और विषाणुओं के उद्भव के कारण भी वैनिला उगाना एक जोखिम भरा उद्योग भी बन सकता है। इसके अलवा फफूंद संक्रमण भी वैनिला प्रसंस्करण को भी प्रभावित कर सकता है। वैनिला का बाज़ार भी अत्यधिक अस्थिर और अनियमित माना जाता हैं। ऊपर से प्रसंस्कृत वैनिला फलियों की खरीद में केवल 10 निगमित दिग्गजों का ही दबदबा है। हालांकि, वर्तमान में प्राकृतिक वैनिला की कुल वैश्विक मांग लगभग 4,000-5,000 टन प्रति वर्ष है। साथ ही कृत्रिम उत्पादों के प्रति उपभोक्ताओं की बढ़ती अरुचि के साथ इसके और बढ़ने की उम्मीद है। हाल ही में, देश में वैनिला की खेती का तेजी से विस्तार भी हुआ है। केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के दक्षिणी राज्यों के साथ-साथ वैनिला की खेती, उड़ीसा और पूर्वोत्तर राज्यों में भी जोर पकड़ रही है। मसाला उद्योग के पर्यवेक्षकों के अनुसार, केरल में इसी वर्ष वैनिला की खेती में 25 फीसदी की वृद्धि देखी गई है,जिसका प्रमुख कारण मसाले की उपज अवधि का कम होना और खेती की लागत कम होना है। साथ ही इसे अन्य फसलों के साथ मिश्रित खेती के तौर पर भी उगाया जा सकता है। इसलिए वैनिला की खेती भी कॉफी, काली मिर्च, नारियल और सुपारी जैसी पारंपरिक फसलों के बीच अपनी पहचान स्थापित करने में सफल रही है। इन सभी कारणों से वैनिला की फसल को छोटे किसानों के द्वारा भी बड़े पैमाने पर अपनाया जा रहा है। संदर्भ https://bit.ly/3DZo1kx https://bit.ly/3JZJCxi
तितलियाँ और कीट
तितलियां: पर्यावरण संतुलन और हमारी खाद्य सुरक्षा की अनमोल कड़ी
‘तितली’, यह शब्द सुनकर ही मन प्रसन्न हो जाता है। यह एक खूबसूरत जीव है। बचपन में, आपने तितलियों का पीछा अवश्य किया होगा, सोचिए अगर तितलियां न होती तो क्या होता ? आपको बता दें कि स्वस्थ तितलियों की आबादी बेहतर पर्यावरणीय परिस्थितियों का संकेतक है। तितलियां परागण, खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हालांकि, प्रदूषण रोकने हेतु कीटनाशकों का उपयोग, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन तितलियों के अस्तित्व के लिए खतरा साबित हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के खाद्य एवं कृषि संगठन (Food and Agriculture Organization) का कहना है कि दुनिया की 75% कृषि के लिए परागण आवश्यक है, जो तितलियों से संभव है। आपको बता दें कि फूलों के परागण में तितलियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है कुछ फूल तो विशेष रूप से तितलियों द्वारा ही परागित होते हैं। तितलियां लंबी दूरी तय करने में सक्षम होती है और फूलों के पौधों में पराग को समान मात्रा में फैला देती है। भोजन की खोज करते समय तितलियां बड़े फूलों के मकरंद का सेवन करती है और तभी उनके पैरों और शरीर पर पराग इकट्ठा हो जाता है, तब वही पराग वह दूसरे फूलों में ले जाती है, जिससे अन्य फूल परागित हो जाते हैं। कई पौधों की प्रजातियां, जिनमें सेब से लेकर कॉफी तक शामिल है, परागण के लिए तितलियों पर निर्भर करती हैं। यदि धरती से तितलियां गायब हो जाती हैं, तो इसके परिणाम इनकी कृषि के प्रतिकूल होंगे, औरये प्रजातियां पुनरुत्पादन करने में असमर्थ हो जाएंगी। ‘प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ’ (International Union for Conservation of Nature (IUCN) द्वारा भारत में किए गए एक प्राणी सर्वेक्षण के अनुसार, अनुसार, देश में तितलियों की 1,318 प्रजातियाँ हैं, जिनमें से 35 प्रजातियाँ गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं। जैसा कि ऊपर बताया गया है कि तितलियों की आबादी पर मानव गतिविधि और जलवायु परिवर्तन का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है, लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है? क्या आप जानते हैं ? मानव निरंतर अपनी दिनचर्या में ऐसी गतिविधि कर रहे हैं जिससे तितलियों को क्षति पहुंच रही है। फसलों एवं फूलों की सुरक्षा के नाम पर कीटनाशक का प्रयोग, बढ़ता प्रदूषण एवं तस्करी इनके वजूद को खत्म कर रहा है। आए दिन हमें यह खबर सुनने को मिल ही जाती है कि देश-विदेश में तितलियों की तस्करी कर भारी दामों में बेचा जा रहा है। तितलियों को गहनों एवं सजावट के सामान के तौर पर, फोटो फ्रेम में बंद कर दीवारों पर सजाने के लिए एवं कानों में गहने की तरह इस्तेमाल करने के लिए पकड़ कर या मार कर तस्करी किया जाता है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) के अंतर्गत तितलियों को पकड़ना, मारना एवं इसकी तस्करी करना कानूनन जुर्म है। मानव गतिविधियों के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन भी तितलियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है एवं उनके आकार को कम करता है। शोधकर्ताओं ने एक लैब अध्ययन में ग्लोबल वॉर्मिंग जैसी परिस्थितियां उत्पन्न करके पता लगाया गया कि ग्लोबल वार्मिंग की अधिक या कम स्थिति में , प्रत्येक परिदृश्य के लिए तितलियां स्वयं को कैसे अनुकूलित करेंगी? दुर्भाग्य से, शोधकर्ताओं ने पाया कि वार्मिंग के कारण वातावरण जितना अधिक गर्महोगा , तितलियों का आकार उतना ही कम होता जाएगा ।इसका मतलब यह है कि उनके पंख भी छोटे हो जाएंगे और छोटे पंख होने की वजह से ये तितलियां बड़ी दूरी तक उड़ान भरने में असमर्थ हो जाएंगी । यदि तितलियां आकार में छोटी हो जाएंगी, तो वे पर्याप्त मात्रा में फूलों के बीच पराग को फैलाने में असमर्थ हो जाएंगी, नतीजतन, भोजन की पैदावार कम होगी, और अंततः वैश्विक भोजन की कमी हो जाएगी । यह हमारे पारिस्थितिकी संतुलन के लिए खेद की बात है। बाग- बगीचे, खेत -खलिहान व घर- आंगन के पास लगे फूलों पर मंडराने वाली तितलियां अगर विलुप्त हो गई तो पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ जाएगा, साथ ही हम अपनी तितली जैसी विरासत को खो देंगे। तितलियां खास तरह के पौधों पर ही अंडे देती है इन कारणों से ही अगर तितलियों के वास स्थल समाप्त हो गए तो अंडे देने की प्रक्रिया बाधित हो जाएगी और इनका वजूद भी धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा।संदर्भ https://bit.ly/3IMFNea https://bit.ly/3ZGSMUM https://bit.ly/3QL6lyh
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
हाइफ़ा की लड़ाई में भारतीय सैनिकों की वीरता और ऐतिहासिक योगदान
आज की तारीख में हम सभी भारत और इजरायल की गहरी मित्रता से परिचित हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस मित्रता की नीवं आज से कई दशक पूर्व पड़ चुकी थी? साल 1918 में भारतीय सैनिकों ने ओटोमन शासन (Ottoman Rule) से हाइफ़ा (इज़राइल का तीसरा सबसे बड़े शहर) की मुक्ति में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। हाइफ़ा, तेल अवीव (Tel Aviv) से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थित है। ईसाइयों और यहूदियों जैसे अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा हाइफ़ा पर किये गए कब्जे ने तुर्की सुल्तानों के उत्पीड़न से मुक्ति का बिगुल फूंक दिया था। ब्रिटिश शासन के तहत, दोनों समुदायों (ईसाइयों और यहूदियों) के समग्र विकास में बड़ी कामयाबी हासिल हुई। भारतीयों द्वारा हाइफ़ा की फ़तेह का एक और फायदा “बहाई धर्म के आध्यात्मिक नेता अब्दुल बहा की मुक्ति” के रूप में भी मिला। दरअसल 1892 में बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह की मृत्यु के बाद, उनके बेटे, अब्दुल बहा ने नवोदित समुदाय का नेतृत्व संभाला। ईरान में स्थापित होने के बावजूद, बहाई धर्म का प्रशासनिक और आध्यात्मिक केंद्र, इजराइल के हाइफ़ा में माउंट कार्मेल (Mount Carmel In Haifa) पर स्थित है। अब्दुल बहा ने अपना अधिकांश जीवन हाइफ़ा में एक कैदी के रूप में ही बिताया। जैसे-जैसे प्रथम विश्व युद्ध निकट आया, वैसे-वैसे साठ साल के अब्दुल बहा को हाइफ़ा के तुर्क गवर्नर से धमकियाँ मिलने लगी। स्थिति इस हद तक बिगड़ गई कि अधिकारियों ने अब्दुल बहा को फाँसी देने और माउंट कार्मेल पर बहाई धर्मस्थलों को नष्ट करने की योजना बना दी। ये जगह बहाई आस्था के सबसे पवित्र स्थल मानी जाती है। सौभाग्य से, जनरल एलनबी (General Allenby) के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना, जिसमें दो भारतीय घुड़सवार ब्रिगेड भी शामिल थीं, को फिलिस्तीन में तुर्की और जर्मन सेना को हराने का काम सौंपा गया था। सितंबर 1918 में, जोधपुर लांसर्स (Jodhpur Lancers) और मैसूर लांसर्स (Mysore Lancers), शेरवुड फॉरेस्टर येओमेनरी (Sherwood Forester Yeomanry) समर्थित टुकड़ियाँ, हाइफ़ा और अब्दुल बहा के बचाव के लिए आगे आई। इसके बाद हुए एक साहसी युद्ध के दौरान जोधपुर लांसर्स ने माउंट कार्मेल की ढलानों पर हमला कर दिया, जबकि मैसूर लांसर्स के एक स्क्वाड्रन ने दक्षिण से हमला किया। 23 सितंबर, 1918 के दिन 15वीं (इंपीरियल सर्विस) कैवलरी ब्रिगेड, 5वीं कैवलरी डिवीजन और डेजर्ट माउंटेन कोर के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने हाइफ़ा के पास ओटोमन रियर गार्ड बलों (Ottoman rear guard) पर हमला किया। यह हमला शेरोन की लड़ाई के अंत में हुआ। ब्रिटिश साम्राज्य की पैदल सेना ने पहले ही ओटोमन मुख्यालय पर कब्जा कर लिया था, जिससे घुड़सवार सेना को उत्तर की ओर बढ़ने तथा ओटोमन पैदल सेना को घेरना आसान हो गया। 25 सितंबर तक, तुर्क सेना दमिश्क की ओर पीछे हट गई थी। लड़ाई की शुरुआत में ही कमांडिंग ऑफिसरों में से एक, कर्नल ठाकुर दलपत सिंह मारे गए। लेकिन इस झटके के बावजूद, लांसर्स अपने डिप्टी बहादुर अमन सिंह जोधा की कमान के तहत एकजुट हुए। भारी तोपखाने और मशीन-गन की आग का सामना करते हुए भी भारतीय घुड़सवार सेना आगे बढ़ी और उन्होंने हाइफ़ा के लिए जाने वाला मार्ग खोल दिया। मैसूर लांसर्स की एक टुकड़ी ने तुरंत अब्दुल बहा के घर को सुरक्षित कर लिया और बहाई तीर्थस्थलों को विनाश से बचा लिया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हाइफा की लड़ाई में भारतीय सैनिकों का प्रदर्शन असाधारण था जो कि भारतीयों के लिए भी लाभदायक साबित हुआ था। क्यूंकि इसके बाद ही ब्रिटिश शासित भारत में भी भारतीयों को अधिकारी बनने की अनुमति मिल गई। इससे पहले शाही अधिकारी यह मानते थे, कि “भारतीयों में कमीशन पदों के लिए आवश्यक नेतृत्व गुणों का अभाव होता है।” लेकिन इस युद्ध के तुरंत बाद, भारतीयों को सैंडहर्स्ट रॉयल मिलिट्री अकादमी (Sandhurst Royal Military Academy) में प्रवेश की अनुमति दी गई। इसके साथ ही संभावित सैंडहर्स्ट कैडेटों (Sandhurst Cadets) को प्रशिक्षित करने के लिए 1922 में प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल इंडियन मिलिट्री कॉलेज “Prince of Wales Royal Indian Military College” (अब देहरादून में राष्ट्रीय भारतीय मिलिट्री कॉलेज) की स्थापना की गई। इजरायल में, भारतीय सैनिकों के स्मारक हाइफ़ा, येरुशलम (Monument Haifa, Jerusalem) और रामले में मौजूद हैं। इजराइल के इन शहरों के कब्रिस्तानों में करीब 900 भारतीय सैनिकों को दफनाया गया है। हाइफ़ा की मुक्ति में भारतीय सैनिकों की बहादुरी और भूमिका के बारे में आज भी इज़रायली स्कूलों में इतिहास पाठ्यक्रम में इस बारे में पढ़ाया जाता है। हालांकि हमारा दुर्भाग्य है कि इस बारे में भारतीय इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में कहीं भी चर्चा नहीं की गई है। बड़े ही दुःख की बात है कि प्रथम विश्व युद्ध के मध्य पूर्वी क्षेत्र में भारतीय सैनिकों की वीरता और बलिदान के किस्से धीरे-धीरे लोगों के दिमाग से ही लुप्त हो रहे हैं। क्या आप जानते हैं कि, प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश भारतीय सेना,अपने लगभग दो मिलियन सैनिकों के साथ, इतिहास की सबसे बड़ी स्वयंसेवी सेना थी। लेकिन इतने बलिदानों के बावजूद, इन सैनिकों को अफ्रीकी और कैरेबियाई सैनिकों की "अदृश्य सेना" के हिस्से के रूप में संदर्भित किया जाता है। हाइफा की लड़ाई न केवल बहाई समुदाय के लिए बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए एक महत्वपूर्ण जीत मानी जा रही थी। इसने भारतीय सैनिकों के साहस और बलिदान को प्रदर्शित किया, जिन्होंने चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में बहादुरी से लड़ाई लड़ी। उनकी विरासत दुनिया भर के लोगों को प्रेरित करती रहती है। भारत और इजराइल के बीच संबंध इजरायल की आजादी के शुरुआती दिनों से ही मजबूत हैं। दोनों देशों ने रक्षा, आतंकवाद विरोधी और व्यापार सहित कई मुद्दों पर सहयोग किया है। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच रिश्ते और गहरे हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार इजराइल का दौरा कर चुके हैं और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) कई बार भारत का दौरा कर चुके हैं। दोनों देशों ने कई समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें एक रक्षा समझौता और कृषि में सहयोग पर एक समझौता शामिल है। वर्तमान में भारत में बहाई समुदाय के दो मिलियन से अधिक सदस्य रहते हैं। नई दिल्ली में स्थित “लोटस टेम्पल (Lotus Temple)” एक महत्वपूर्ण बहाई उपासना गृह है। इसे दिसंबर 1986 में समर्पित किया गया था, और यह अपनी सुंदर कमल जैसी आकृति के लिए जाना जाता है। लोटस टेम्पल सभी धर्मों के लोगों के लिए खुला है।संदर्भ https://tinyurl.com/3kemcsdp https://tinyurl.com/mwy7tu75 https://tinyurl.com/3rbwmwae https://tinyurl.com/42vx4e8k https://tinyurl.com/4ftn2d5j
ध्वनि II - भाषाएँ
हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि: उत्पत्ति, विकास और विशेषताएं
हम जानते ही हैं कि, हमारे शहर जौनपुर की अधिकांश आबादी, हिंदी भाषा बोलती है। अपने प्रारंभिक रूप में, हिंदी भाषा, 7वीं शताब्दी में देखी जा सकती थी । यह संस्कृत और प्राकृत के क्रमिक रूप से, उत्पन्न हुई थी। कई सदियों पश्चात, उर्दू, फ़ारसी, अवधी आदि भाषाओं को मानकीकृत करने के बाद, हिंदी का झुकाव संस्कृत की ओर हुआ। इस प्रकार, हिंदी ने देवनागरी लिपि अपना ली। तो आइए, आज, हिंदी की उत्पत्ति के इतिहास के बारे में जानते हैं। फिर, हम, देवनागरी लिपि के बारे में, विस्तार से बात करेंगे। आगे, हम कुछ उदाहरणों की मदद से, यह समझने की कोशिश करेंगे कि, देवनागरी वर्णमाला कैसे काम करती है। अंत में, हम देवनागरी लिपि की कुछ विशिष्ट विशेषताओं पर भी चर्चा करेंगे।हिंदी भाषा, संस्कृत की प्रत्यक्ष वंशज है, और इसकी उत्पत्ति 769 ईसा पूर्व की है। समय के साथ, इस भाषा को प्रमुखता मिली, जिसे, शुरू में, पुरानी हिंदी के रूप में जाना जाता था। तब यह दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में, बोली जाती थी। यह दिल्ली की बोली का प्रारंभिक चरण था, जो आधुनिक हिंदी, और उर्दू दोनों के मूल रूप के तौर पर, कार्य करता था । भाषा का यह पहला संस्करण, देवनागरी लिपि में लिखा गया था। 8वीं और 10वीं शताब्दी के बीच(इस्लामी आक्रमणों और उत्तरी भारत में मुस्लिम नियंत्रण के गठन के दौरान), अफ़गानों, फ़ारसियों और तुर्कों ने, दिल्ली के आसपास की स्थानीय आबादी के साथ, बातचीत की साझा भाषा के रूप में, पुरानी हिंदी को अपनाया। समय के साथ, यह भाषा विकसित हुई, और इसमें अरबी और फ़ारसी के शब्दों को अपनाया गया। इस प्रकार, आज, वे हिंदी शब्दावली का लगभग 25% हिस्सा बनाते हैं!पहली भाषा के रूप में, हिंदी बोलना और सीखना 13वीं और 15वीं शताब्दी में लोकप्रिय था। लगभग, उसी समय, साहित्य में प्रारंभिक हिंदी लेखन सामने आया। हिंदी भाषा में लिखे गए, प्रसिद्ध साहित्य के उदाहरणों में, पृथ्वीराज रासो और अमीर खुसरो की रचनाएं शामिल हैं। भाषा के इस संस्करण को, पिछले कुछ वर्षों में, कई अलग-अलग नामों से जाना गया है, जिनमें हिंदी, हिंदुस्तानी, दहलवी और हिंदवी, या अधिक सरल रूप से – ‘भारत की भाषा’ शामिल हैं।इसके अलावा, देवनागरी लिपि, संस्कृत, प्राकृत, हिंदी, मराठी, कोंकणी और नेपाली भाषाओं को लिखने के लिए, इस्तेमाल की जाती है । यह, उत्तर भारतीय स्मारकीय लिपि – गुप्त और अंततः ब्राह्मी वर्णमाला से विकसित हुई है। यह लिपि, 7वीं शताब्दी ईस्वी से उपयोग में है, और 11वीं शताब्दी के बाद से, यह पूरी तरह विकसित हुई। देवनागरी लिपि में, अक्षरों के शीर्ष पर, लंबे क्षैतिज आघात की विशेषता है। साथ ही, देवनागरी लेखन प्रणाली, शब्दांश और वर्णमाला का एक संयोजन है।देवनागरी, स्वरों और व्यंजनों को, एक क्रम में व्यवस्थित करती है, जो मौखिक गुहिका के पीछे उच्चारित, ध्वनियों से शुरू होती है, और मुंह के सामने उत्पन्न होने वाली ध्वनियों तक जाती है।देवनागरी बाएं से दाएं लिखी जाती है, और संस्कृत के उच्चारण का बारीकी से अनुसरण करती है। लैटिन लिपि में, एक अक्षर, दूसरे अक्षर के ठीक बाद, बाएं से दाएं आता है। लेकिन, देवनागरी लिपि में, आमतौर पर, प्रतीकों को शब्दांशों में, वर्गीकृत किया जाता है।इस प्रकार, दे व ना ग री अक्षर, देवनागरी शब्द बनाता है ।ऐसे प्रत्येक अक्षर में, अधिकतम एक स्वर होता है। और जहां संभव हो, अक्षरों का अंत, व्यंजन के साथ नहीं होना चाहिए। साधारणतः, व्यंजन के प्रतीकों में, उनके बाद, स्वर ध्वनि का उच्चारण होता है। जैसे कि –द व न ग रइसलिए, हमें आवश्यक, विशिष्ट ध्वनियों को व्यक्त करने के लिए, इन व्यंजनों में अतिरिक्त अंक जोड़ने होंगे:द → देन→ नर → री, इत्यादि।अंत में, संस्कृत पाठ लिखते समय, पारंपरिक अभ्यास शब्दों को लगातार लिखना है, खासकर यदि शब्द व्यंजन के साथ समाप्त होते हैं:फलम् इच्छामि → फलमिच्छामि•स्वर: हम संस्कृत में, दीर्घ स्वर – ॡ को शामिल करते हैं, लेकिन, वास्तविक संस्कृत में, इसका कभी भी उपयोग नहीं किया जाता है। सामान्य तौर पर, लघु और दीर्घ स्वर, एक समान तरीके से लिखे जाते हैं: अ और ए, इ और ई, उ और ऊ, ऋ और ॠ, और ऌ और ॡ। ध्यान दें कि, प्रत्येक जोड़ी में, दूसरा प्रतीक, पहले प्रतीक में, कुछ चिह्न या अतिरिक्त विशेषता जोड़ता है।•व्यंजन: जब, हम संस्कृत को देवनागरी में लिखते हैं, तो सभी व्यंजन, स्वर, ‘अ’ के साथ उच्चारित होते हैं। इसलिए, प्रतीक – क, का उच्चारण हमेशा ही, ‘का’ के रूप में किया जाता है। इनमें से कुछ व्यंजनों को, पहली बार में, अलग पहचानना मुश्किल है। यहां, वे व्यंजन हैं, जिनके कारण आप आसानी से भ्रमित होते हैं:ख रवघ धङ डदेवनागरी लिपि की अनूठी विशेषताएं निम्नलिखित हैं:1.) वर्णमाला संरचना: देवनागरी एक अबुगिडा लिपि है। इसका अर्थ है कि, यह एक ऐसी लेखन प्रणाली है, जहां व्यंजन, एक अंतर्निहित स्वर ध्वनि रखते हैं, और, स्वर ध्वनि को संशोधित करने के लिए, अतिरिक्त विशेषक चिह्नों का उपयोग किया जाता है। इस लिपि में, व्यंजन का प्रतिनिधित्व करने वाले मूल वर्णों का एक संघ और स्वर के विशेषक चिह्नों का एक अलग संघ होता है।2.) स्वर: देवनागरी में छोटे स्वरों का प्रतिनिधित्व करने वाले मूल स्वर वर्णों का एक समूह है। दीर्घ स्वरों को, अक्सर ही, मूल स्वर वर्ण और विशेषक चिह्न के संयोजन का उपयोग करके दर्शाया जाता है। अनुनासिक स्वरों के लिए भी, विशेष वर्ण हैं, जो देवनागरी लिपि की एक अनूठी विशेषता है।3.) व्यंजन: मूल व्यंजन वर्णों को, उनके उच्चारण के तरीके के आधार पर, समूहों में व्यवस्थित किया जाता है: आवाज रहित, ध्वनिहीन, अनुनासिक, आदि । प्रत्येक व्यंजन वर्ण, एक अंतर्निहित स्वर के साथ, एक व्यंजन ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है।4.) विराम (हलंत): देवनागरी, एक व्यंजन में अंतर्निहित स्वर के दमन को इंगित करने के लिए, विराम का उपयोग करती है, जो एक क्षैतिज रेखा जैसा विशेषक चिह्न है। इसे “हलंत” कहा जाता है। हलंत का उपयोग, संयुक्त व्यंजन बनाने या अंतर्निहित स्वर ध्वनि के बिना व्यंजन का प्रतिनिधित्व करने के लिए किया जाता है।5.) मात्रा (स्वर चिह्न): विशेषक चिह्न, जिन्हें ‘मंत्र’ कहा जाता है, का उपयोग, अंतर्निहित “ए” ध्वनि के अलावा, अन्य स्वर ध्वनियों को दर्शाने के लिए, किया जाता है। उन्हें व्यंजन वर्णों के ऊपर, नीचे, पहले या बाद में रखा जा सकता है।6.) शीर्ष पर क्षैतिज रेखा (शिरोरेखा): देवनागरी की सबसे पहचानने योग्य विशेषताओं में से एक, अक्षरों के शीर्ष पर क्षैतिज रेखा है। इस पंक्ति को ‘शिरोरेखा’ के नाम से जाना जाता है, और यह लिपि की एक अनूठी विशेषता है।7.) बाएं से दाएं दिशा: देवनागरी, अंग्रेज़ी और अधिकांश अन्य आधुनिक लिपियों की तरह, बाएं से दाएं लिखी जाती है।संदर्भ https://tinyurl.com/mvw4x9xf https://tinyurl.com/yc33vyy6 https://tinyurl.com/mr32e8k5 https://tinyurl.com/3yyvwrb7
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
संघर्ष से शिखर तक: श्रेया घोषाल की अद्भुत संगीत यात्रा
श्रेया घोषाल (जन्म 12 मार्च 1984) भारतीय संगीत की सबसे प्रमुख और प्रतिष्ठित पार्श्व गायिकाओं में से एक हैं, जिनका सफर बेहद प्रेरणादायक रहा है। उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा मात्र चार साल की उम्र में ही शुरू कर दी थी और छह वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पहली स्टेज प्रस्तुति दी थी। अपनी प्रतिभा का पहला बड़ा मान्यता उन्होंने “सा रे गा मा पा” (Sa Re Ga Ma Pa) जैसे प्रतिष्ठित संगीत प्रतियोगिता के माध्यम से पाया, जिससे उन्हें प्रसिद्ध निर्देशक संजय लीला भंसाली और संगीतकार इस्माइल दरबार ने 2002 की फिल्म देवदास में मौका दिया। इसी फिल्म के लिए गाए गए गीतों — जैसे “बैरी पिया” और “डोला रे डोला” — ने न सिर्फ उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई, बल्कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ प्लेबैक सिंगर के राष्ट्रीय और फिल्मफेयर जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार भी दिलाए। आज तक उन्होंने 400 से अधिक फिल्मों और कई भाषाओं में गीत रिकॉर्ड किए हैं, जिससे उनकी आवाज़ भारत की सांस्कृतिक विविधता और संगीत की व्यापकता दोनों का प्रतिनिधित्व करती है।उनकी संगीत यात्रा सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रही; श्रेया घोषाल ने पार्श्व गायन के क्षेत्र में स्पॉटिफाई इक्वल ग्लोबल एंबेसडर (Spotify EQUAL Global Ambassador) जैसे वैश्विक मान्यता प्राप्त की है, और उनका संगीत विश्व भर के श्रोताओं तक पहुंचा है। उन्होंने सिडनी ओपेरा हाउस, रॉयल अल्बर्ट हॉल जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुति दी है और अमेरिका के डॉल्बी थिएटर में प्रदर्शन करने वाली पहली भारतीय कलाकार के रूप में भी अपना स्थान बनाया है। उल्लेखित वीडियो प्रस्तुतियों में उनकी आवाज़ की मधुरता, तकनीकी दक्षता और भावपूर्ण अभिव्यक्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जो आधुनिक भारत की भावनात्मक और सांस्कृतिक पहचान को परिभाषित करती है और दर्शाती है कि उनकी आवाज़ सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि लाखों लोगों की यादें और भावनाएं भी है।संदर्भ:https://tinyurl.com/4w4fb3wt https://tinyurl.com/yc6wr2vb https://tinyurl.com/3x7r54hz
वास्तुकला II - कार्यालय/कार्य उपकरण
हथकड़ी का इतिहास, आविष्कार और भारत में इसके उपयोग से जुड़े कानून और विवाद
यदि आप कभी भी जौनपुर की जिला कारागार (District Jail) के बाहर गए हों, तो जेल के बाहर कोर्ट में पेशी के लिए जाते कैदियों को आपने जरूर देखा होगा। इन कैदियों के जुर्म भले ही अलग-अलग हो लेकिन इनमें से सभी कैदियों या यूँ कहें कि पूरे देश के कैदियों में एक समानता दूर से ही नजर आ जाती है, और वह समानता है, “उनकी हथकड़ी"! आज हम पुलिसवालों और कैदियों को आपस में जोड़े रखने वाले इसी बंधन के रोमांचक और ऐतिहासिक सफर और भारत में इसे लगाने से जुड़े नियमों पर एक नजर डालेंगे।हथकड़ी (Handcuffs), खतरनाक या अनियंत्रित कैदियों को नियंत्रित करने के लिए, कानून प्रवर्तन और सुरक्षा कर्मियों द्वारा उपयोग किए जाने वाले सामान्य उपकरण होते हैं। पुलिस अधिकारी अपने काम में नियमित रूप से हथकड़ी का उपयोग करते हैं। दुनियाभर के देशों में हथकड़ी उपयोग सदियों से किया जा रहा है। लोग इनका उपयोग धातु के प्रयोग होने से भी पहले से करते आ रहे हैं। प्राचीन समय में लोग कभी-कभी रस्सी या जानवरों की खाल या किसी अन्य चीज़ का हथकड़ी के रूप उपयोग करते थे जो काफी मजबूत होती थी। हथकड़ी के बारे में पहली बार एक ग्रीक देवता प्रोटियस (Proteus) से जुड़े एक पुराने ग्रीक मिथक में सुनने को मिलता है। कहा जाता है कि वह बहुत सी गुप्त बातें जानता था, जिस कारण लोग उसका यह गुण उससे सीखना चाहते थे। लेकिन उसे अपने रहस्य साझा करना पसंद नहीं था, इसलिए जब भी कोई उससे पूछता तो वह अपना रूप बदल लेता और भाग जाता। एक दिन, अरिस्टियस (Aristius) नामक देवता प्रोटियस से यह जानना चाहता था कि उसकी मधुमक्खियां क्यों मर रही हैं? लेकिन चूंकि प्रोटियस बार-बार भाग जाता था इसलिए अरिस्टियस ने उसे पकड़ने के लिए मानव इतिहास में पहली बार हथकड़ी का उपयोग किया। उसने प्रोटियस को हथकड़ी लगा दी और इस प्रकार उसे अपना आकार बदलने और भागने से रोक दिया।माना जाता है कि आधुनिक हथकड़ी जैसी दिखने वाली, विश्व में पहली धातु की हथकड़ी, लोगों द्वारा कांस्य और लोहे का उपयोग करना सीखने के बाद बनाई गई थी। लेकिन इसे समायोजित करना बहुत मुश्किल काम साबित होता था, क्यों कि ये हथकड़ी अपराधियों की कलाइयों में या तो बहुत तंग या बहुत ढीली हो जाती थी, जिस कारण इसका इस्तेमाल करने में काफी परेशानी होती थी। इस समस्या का समाधान साल 1862 में जब डब्ल्यू.वी. एडम्स (W.V. Adams) ने खोज लिया, जिन्होंने विश्व की पहली ऐसी हथकड़ी बनाई जिसे विभिन्न कलाई के आकार में फिट करने के लिए समायोजित किया जा सकता था। इसके लिए उन्होंने हथकड़ी में रैचेट्स (Ratchets) जोड़ दिए, जो ऐसे हिस्से हैं जो एक दिशा में तो चल सकते हैं लेकिन दूसरी दिशा में नहीं। इसके कुछ साल बाद ऑरसन सी. फेल्प्स (Orson C. Phelps) नामक एक अन्य वैज्ञानिक ने, रैचेट के आकार को बदलकर इस डिजाइन में सुधार किया। साल 1865 में एक अमेरिकी व्यापारी जॉन टावर (John Tower) ने एक कंपनी शुरू की, जो एडम्स और फेल्प्स के डिजाइन का उपयोग करके हथकड़ी बनाती थी। उन्होंने दो प्रकार (एक जंजीर वाली और दूसरी उनके बीच छल्ले वाली) की हथकड़ियां बनाईं। उन्होंने हथकड़ी खोलने के लिए चाबी लगाने का स्थान भी बगल से नीचे की तरफ कर दिया। साथ ही उन्होंने कलाई के चारों ओर जाने वाले हिस्से को चौकोर के बजाय गोल बना दिया। 1874 में उन्हें अपने इस गोल डिजाइन के लिए पेटेंट (Patent) भी प्राप्त हो गया। दरअसल “पेटेंट एक तरह का विशेष अधिकार होता, जो किसी नए उत्पाद या प्रक्रिया की खोज करने वाले आविष्कारक या खोजकर्ता को दिया जाता है। इस अधिकार के तहत केवल उस आविष्कारक को आम तौर पर 20 साल की अवधि के लिए उसके द्वारा खोजे गए उत्पाद को बनाने, उपयोग करने और बेचने की विशेष अनुमति दी जाती है।” दूसरे शब्दों में “पेटेंट ऐसा कानूनी अधिकार होता है, जो आविष्कारों को उनके उत्पादों को बिना उनकी अनुमति के दूसरों द्वारा चुराने, कॉपी (Copy) किए जाने या उपयोग किए जाने से बचाते हैं।” पेटेंट प्राप्त करने के लिए, आविष्कार के बारे में तकनीकी जानकारी को पेटेंट आवेदन में जनता के सामने प्रकट किया जाना चाहिए। पेटेंट हमारे रोजमर्रा के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। टॉवर ने 1879 में हथकड़ियों में एक और सुधार किया। उन्होंने उन्हें डबल-लॉकिंग (Double-Locking) बना दिया, यानी उनमें हथकड़ी को लॉक करने के एक के बजाय दो तरीके थे। इससे लोगों के लिए इन हथकड़ियों को स्वयं या किसी अन्य चीज़ से खोलना कठिन हो गया। डबल-लॉकिंग हथकड़ी में दो मोड (सिंगल-लॉक और डबल-लॉक (Single-Lock And Double-Lock) थे। आप चाबी को एक या दूसरे तरफ घुमाकर उनके बीच स्विच कर सकते हैं।1912 में हथकड़ी और भी बेहतर हो गई, जब जॉर्ज कार्नी (George Carney) ने पहली स्विंग कफ (Swing Cuff) का आविष्कार किया। यह एक नया डिज़ाइन था जिसने कानून प्रवर्तन अधिकारियों के लिए केवल एक हाथ से लोगों को हथकड़ी लगाना आसान बना दिया। आज पीयरलेस हैंडकफ (Peerless Handcuffs) नामक एक कंपनी को हथकड़ी बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी माना जाता है। इसी कंपनी ने पहली बार स्विंग कफ को बेचना शुरू किया। तब से लेकर आज तक हथकड़ी की कार्यशैली और इसके रूप में कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा गया है। हालाँकि, आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत में, हथकड़ी लगाना एक विवादास्पद मुद्दा रहा है, कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रथा किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। कानूनी ढांचा, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। इस अधिकार में आंदोलन की स्वतंत्रता और मनमानी हिरासत से सुरक्षा का अधिकार शामिल है। हालाँकि, दंड प्रक्रिया संहिता (Code Of Criminal Procedure) की धारा 46 किसी आरोपी व्यक्ति की गिरफ्तारी या उसके भागने को रोकने के लिए उचित बल के उपयोग की अनुमति देती है। हथकड़ी का उपयोग भी इस प्रावधान के अंतर्गत आता है, और यदि पुलिस आवश्यक समझे तो उनका उपयोग कर सकती है।हालांकि, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी हथकड़ी के उपयोग पर कुछ प्रतिबंध लगाए हैं। सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1978) के मामले में, अदालत ने कहा कि हथकड़ी के इस्तेमाल को पुलिस द्वारा उचित ठहराया जाना चाहिए और इसे सजा के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि अहिंसक अपराधों, महिलाओं और किशोरों में हथकड़ी का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। अदालत ने आगे कहा कि हथकड़ी का इस्तेमाल अंतिम उपाय होना चाहिए । अदालत ने अपने फैसले को मानवीय गरिमा के सिद्धांत पर आधारित किया, जो अनुच्छेद 21 में निहित है। अदालत ने कहा कि हथकड़ी लगाना एक "बर्बर प्रथा" है जो किसी व्यक्ति को "अपमानित” करती है। अदालत ने यह भी कहा कि हथकड़ी लगाना अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों, जैसे मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा और नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध के विपरीत है।हालांकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद, भारत में हथकड़ी लगाने की प्रथा व्यापक रूप से बनी हुई है। 2010 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, हथकड़ी का उपयोग सबसे अधिक उत्तर प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर सहित कई राज्यों में किया जाता है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि पुलिस अक्सर सज़ा के तौर पर हथकड़ी का इस्तेमाल करती है और कुछ मामलों में, बंदियों को लंबे समय तक हथकड़ी में रखा जाता है, जिससे उन्हें शारीरिक और मनोवैज्ञानिक तौर पर आघात पहुचता है। हथकड़ी लगाने के कारण मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़े कई मामले भी हमारे सामने आये हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में, एक महिला को तपेदिक के इलाज के दौरान अस्पताल के बिस्तर पर हथकड़ी लगा दी गई थी। बिहार में साइकिल चुराने के आरोप में एक व्यक्ति को तीन दिनों तक हथकड़ी लगाकर पेड़ से लटकाया गया।हथकड़ियों के दुरुपयोग के लिए कई कारक हैं, जिनमें पुलिस के बीच जागरूकता की कमी, जवाबदेही तंत्र की कमी, न्यायिक निरीक्षण की कमी और संयम के वैकल्पिक तरीकों की कमी भी शामिल है। प्रेम शंकर शुक्ला बनाम दिल्ली प्रशासन (1980) इस मामले में, अदालत ने माना कि हथकड़ी का उपयोग अनिवार्य नहीं है और इसे मामले-दर-मामले के आधार पर तय किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि हथकड़ी के इस्तेमाल को रिकॉर्ड किया जाना चाहिए और मजिस्ट्रेट (Magistrate) को रिपोर्ट किया जाना चाहिए। एक मामले में अदालत ने यह भी कहा कि हथकड़ी का उपयोग एक न्यायिक अधिकारी द्वारा अधिकृत होना चाहिए और न्यायिक समीक्षा के अधीन होना चाहिए।संदर्भ https://tinyurl.com/mr2sjdfb https://tinyurl.com/2s57z572 https://tinyurl.com/mr3ts6e2
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
लठमार होली की अनोखी परंपरा और उससे जुड़ी सांस्कृतिक विरासत
भारत अत्यंत सांस्कृतिक विविधता वाला देश है, और यही कारण है कि देश में विभिन्न धर्मों के विभिन्न त्यौहार देखने को मिलते हैं। प्रत्येक क्षेत्र में इन त्यौहार को मनाने की विधियां और परंपराएं भी अलग-अलग होती हैं। होली भी भारत का एक ऐसा ही अनूठा पर्व है, जिसे अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न परंपराओं के साथ मनाया जाता है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश की ‘लठमार’ होली अर्थात ऐसी होली जिसमें लाठियों का प्रयोग मारने के लिए किया जाता है। पूरे देश में यह एक बहुत दिलचस्प होली है, जिसे मथुरा में बड़े हर्ष-उल्लास के साथ मनाया जाता है। मथुरा और उसके आस-पास के इलाकों जैसे बरसाना और नंदगाँव में होली के कुछ दिन पहले से ही इस परंपरा को निभाया जाता है, जिसमें हर साल हजारों हिंदू और बाह्य पर्यटक भाग लेते हैं। लठमार होली के उत्सव के लिए उत्तर प्रदेश में मथुरा जिले के सभी हिस्सों से हजारों लोग बरसाना नामक गाँव में राधा रानी मंदिर आते हैं। राधा रानी मंदिर को भारत का इकलौता राधा मंदिर माना जाता है, जहां एक छोटे से अनुष्ठान समारोह के बाद, हर कोई मंदिर परिसर में और उसके सामने प्रसिद्ध संकीर्ण गली में इकट्ठा होता है, जिसे 'रंग रंगेली गली' (रंगीन गली) कहा जाता है।यह उत्सव महिलाओं द्वारा पुरुषों पर रंग लगाने के साथ शुरू होता है तथा यह सुनिश्चित किया जाता है कि कोई भी व्यक्ति बाहर न निकले। ग्रामीणों द्वारा लोकगीत गाए जाते हैं तथा महिलाओं द्वारा नृत्य भी किया जाता है। मिठाईयों की विभिन्न दुकानें भांग से बनी ठंडाई से सजी होती हैं, जिसका सेवन उत्सव में भाग लेने वाले अनेक लोगों द्वारा किया जाता है। उत्सव के दूसरे दिन, पुरुष फिर से बरसाना पहुंचते हैं, और इस बार वे गाँव की महिलाओं पर रंग लगाने की कोशिश करते हैं। इसके बाद महिलाएं अपनी-अपनी लाठियां लेती हैं और उन पुरुषों को पीटने की कोशिश करती हैं। अपने बचाव में पुरुष एक ढाल का प्रयोग करते हैं, जो पुरूष ऐसा नहीं कर पाते उन्हें महिलाओं के कपड़े पहनाए जाते हैं तथा सार्वजनिक रूप से नृत्य भी करवाया जाता है। मजेदार बात यह है कि ये सब क्रियाएं एक मजाक या मस्ती के तौर पर आयोजित की जाती हैं, इसका उद्देश्य किसी को हानि या ठेस पहुंचाना नहीं होता है। होली मनाने की इस परंपरा को सदियों से मथुरा में आयोजित किया जा रहा है।इस परंपरा को निभाने के पीछे एक किवदंती छिपी हुई है, जिसके अनुसार इस दिन भगवान कृष्ण ने अपनी प्रिया राधा के गांव जाकर उन्हें व उनकी सहेलियों को चिढाया था। इसको अपमान मानते हुए बरसाना की महिलाओं ने उनका पीछा किया। ठीक इसी प्रकार हर साल उसी रूप से तालमेल बनाते हुए नंदगाँव के पुरुष बरसाना शहर आते हैं, जहां उनका अभिवादन वहां की महिलाओं द्वारा लाठियों से किया जाता है। महिलाएं पुरुषों पर लाठी चलाती हैं, तथा पुरूष ढाल से जितना हो सके बचने की कोशिश करते हैं। यह एक ऐसा अवसर है, जहाँ लंबे समय से चली आ रही परंपरा के रूप में भांग और दूध से बने पेय को परोसना पूरी तरह से स्वीकृत होता है। विभिन्न स्थानों पर होली की शाम को होलिका दहन का आयोजन किया जाता है।संदर्भ:https://tinyurl.com/2nrcs834 https://tinyurl.com/wjw4x8jn
हथियार और खिलौने
पंच डैगर्स और कटार: प्राचीन युद्धकला की एक झलक
"पंच डैगर्स" (Punch daggers) (जिसमें चाकू को पकड़ने की जगह और ब्लेड लंबवत होते हैं) की अवधारणा भारत के लिए अद्वितीय नहीं है, लेकिन कोई भी पंच डैगर अवधारणा या डिजाइन भारतीय कटार की तरह व्यापक और समृद्ध नहीं था। कटार की मुख्य विशेषता एच-आकारकी पकड़ (H-shaped grip) है, जो एक मजबूत पकड़ बनाता है और ब्लेड को उपयोगकर्ता की मुट्ठी के ऊपर रखता है। इस तरह के हथियारों के पहले ज्ञात नमूने विजयनगर साम्राज्य के समय से प्राप्त हुए हैं, हालांकि इस बात के भी कुछ सबूत हैं, कि कटार का इस्तेमाल उससे पहले से किया जा रहा है। अधिक प्राचीन कटारों में ब्लेड के लिए उन डिज़ाइनों को शामिल किया गया था, जो पत्ती के आकार के थे, ताकि ब्लेड की नोक अन्य भागों की तुलना में मोटी हो जाए। इसके पीछे तर्क यह था कि हथियार को और अधिक मजबूत बनाया जाए और इसे चेन या युद्ध में पहने जाने वाले कवचों को तोड़ने में उपयोगी बनाया जाए। युद्ध में इसे एक प्रतिद्वंद्वी के कवच में बड़ी ताकत के साथ डाला जाता, जिससे आसानी से कटार कवच को तोड़ देती।संदर्भ :https://tinyurl.com/583x4x3https://tinyurl.com/4p7hpzfb
फूलदार पौधे (उद्यान)
दुनिया का सबसे महंगा फूल और भारत की गुलाब खेती: खुशबू, विज्ञान और आय का संगम
2006 में चेल्सी फ्लावर शो (Chelsea Flower Show) में प्रदर्शित, जूलियट रोज (Juliet Rose) को 15.8 मिलियन डॉलर की भारी राशि में बेचा गया, जिसके बाद यह सबसे महंगा फूल बन गया, जूलियट रोज को उगाने में डेविस ऑस्टिन (Davis Austin) ने 15 साल निवेश किए। हमारे जौनपुर में इत्र बनाने के लिए बड़े पैमाने पर गुलाब की खेती की जाती है, यहां उत्पादित गुलाब को राज्य के अन्य जिलों और भारत के अन्य राज्यों में भी भेजा जाता है। भारत भर में गुलाब की विभिन्न किस्में उगाई जाती हैं। भारत में वर्गीकृत गुलाब की कुछ सबसे लोकप्रिय प्रजातियों इस प्रकार हैं:1. हाइब्रिड टी गुलाब (Hybrid Tea Rose): यह सबसे लोकप्रिय किस्मों में से एक है, जो एक झाड़ीदार प्रकृति का है। इसके फूलों में लगभग 30-50 पंखुड़ियाँ होती हैं जो इसको एक बड़ा एवं सुंदर आकार देती हैं। यह सदाबहार गुलाब का एक संकर है।2. ग्रैंडिफ्लोरा गुलाब (Grandiflora Rose) यह गुलाब फ्लोरिबुंडा गुलाब (Floribunda roses) और एचटी (HT) के बीच एक संकर है। इसके पौधे में एक ही तने पर फूलों का एक गुच्छा लगता है। इस गुलाब की खास बात इसके आकर्षक रंग पीले, नारंगी, लाल, गुलाबी और बैंगनी रंग हैं।3. फ्लोरिबुंडा गुलाब (Floribunda Rose) यह गुलाब पॉलींथा गुलाब (Polyantha rose) और एचटी के बीच का एक संकर है। पौधे में पीले, सफेद, गुलाबी, बैंगनी और नारंगी रंग के सुंदर रंगों में बड़े फूलों के घने समूह होते हैं। यह गुलाब हेजेज (hedges) के लिए सबसे उपयुक्त है, क्योंकि यह कम उगने वाली झाड़ी है।4.पॉलींथस गुलाब (Polyanthas Rose) इस गुलाब को कम रखरखाव की आवश्यकता होती है और यह रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता प्रदर्शित करता है। जब आप उन्हें हेजेज के साथ या गमलों की एक पंक्ति में उगाते हैं तो यह गुलाब बहुत ही मनोरम दृश्य प्रदान करता है। लाल, गुलाबी और सफेद रंग के शेड्स (shades) आपके बगीचे में एक परीकथा का नजारा बनाते हैं।5.लता और रामबलर गुलाब (Climber and Rambler Rose) यह गुलाब बेल की तरह है, लेकिन वास्तव में बेल नहीं है। इसके लंबे, कड़े तने होते हैं जिन्हें समर्थन देकर आगे बढ़ाया जाता है। क्षैतिज प्रशिक्षण बेहतर तरीके से खिलने को प्रोत्साहित करता है। पौधे अपने बड़े फूलों से सभी को प्रसन्न करता है जो इसके बढ़ते मौसम के दौरान बार-बार आते हैं।6.लैंडस्केप गुलाब (Landscape Rose) इस गुलाब के फूल साल भर खिलते हैं। यह व्यापक रूप से विस्तारित होते हैं। ये कम बढ़ते हैं और इन्हें कम रखरखाव की आवश्यकता होती है। उनके पुष्प पैटर्न दिलचस्प हैं, जो इसकी झाड़ी को एक करिश्माई रूप देते हैं।7.झाड़ी गुलाब (Shrub Rose): यह गुलाब पारंपरिक और आधुनिक गुलाब की विशेषताओं को प्रदर्शित करता है। फूलों में दोहरी पंखुड़ियाँ होती हैं और वे एक-दूसरे से सटे हुए होते हैं, जिससे यह एक छोटी गोभी जैसा दिखता है। हरे और नीले रंग को छोड़कर यह इंद्रधनुष के सभी रंगों में उपलब्ध हैं।8.बोर्बोन गुलाब (Bourbon Rose) यह गुलाब पुराने ब्लश चाइना रोज (old blush China rose) और जामदानी गुलाब (Damask rose) के बीच का संकर है। यह हल्दीघाटी और पुस्कर क्षेत्र में उगाया जाता है। इसकी सुखद सुगंध के कारण इस किस्म का उपयोग गुलाब के तेल के उत्पादन के लिए किया जाता है। फूल स्नो व्हाइट (snow white) या गहरे गुलाबी रंग के हो सकते हैं। यह गुलकंद बनाने के लिए अच्छा होता है।9.जामदानी गुलाब यह गुलाब रोजा मोस्चाटा (Rosa moschata) और रोजा गैलिका (Rosa gallica) के बीच एक संकर है। इस किस्म के फूल गहरे गुलाबी से हल्के गुलाबी रंग के होते हैं। भारत में, इस किस्म का उपयोग "अत्तर" एक प्रकार का गुलाब का तेल, बनाने के लिए किया जाता है। इसकी पंखुड़ियां खाने योग्य होती हैं,इनका उपयोग हर्बल चाय बनाने, व्यंजनों को स्वाद देने या परिरक्षक गुलकंद बनाने के लिए किया जाता है। सीएसआईआर-आईएचबीटी(CSIR-IHBT)ने नई किस्में और तेल निष्कर्षण तकनीक विकसित की है।10.अल्बा रोज़ (Alba Rose) यह गुलाब की सबसे पुरानी किस्मों में से एक है। इसका पौधा छायादार वातावरण का सामना कर सकता है और रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता प्रदर्शित करता है। फूल एक मीठी सुगंध के साथ एक सुंदर गुलाबी एवं सफेद रंग के होते हैं जो इंद्रियों को शांति प्रदान करते हैं।11.कश्मीरी गुलाब: कटे हुए फूलों (सजावटी फूल) के लिए यह गुलाब बहुत अच्छा है। इसमें हल्की सुगंध और मनमोहक चमकीले लाल फूल हैं। विविधता में एचटी जैसा दिखता है। फूलों की पंखुड़ियां स्पर्श करने में मखमली नरम होती हैं और कटे हुए फूल के रूप में एक आदर्श उपहार के रूप में काम कर सकती हैं।12.लघु गुलाब (Miniature Rose): छोटे गुलाबों की खेती इस तरह की जाती है कि वे आकार में छोटे रहते हैं। उनके तने छोटे होते हैं, लेकिन वे कठोर होते हैं और 2-3 सप्ताह तक लगातार खिलते हैं। वे बाड़ लगाने वाले पौधों और लटकते गमलों के लिए सबसे उपयुक्त हैं।गुलाब की खेती के लिए आवश्यक कारक:मिट्टी और जलवायु: इसके लिए अच्छी तरह से सूखी रेतीली दोमट मिट्टी उपयुक्त है, जिसका पीएच 6-7 हो। गुलाब की खेती के लिए कम से कम 6 घंटे तेज धूप की आवश्यकता होती है। दिन का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस और रात का तापमान 15 डिग्री सेल्सियस आदर्श माना जाता है। इसे तमिलनाडु के मैदानी इलाकों में उगाया जा सकता है जहां इसके लिए इष्टतम जलवायु उपलब्ध है।प्रसार और रोपण: इसकी कटिंग को 2-3 कलियों के साथ आईबीए या आईएए (IBA or IAA)@ 500 पीपीएम में डुबोया जाता है। 45 सेमी x 45 सेमी x 45 सेमी के गड्ढे 2.0 x 1.0 मीटर की दूरी पर खोदे जाते हैं और रोपण से पहले प्रत्येक गड्ढे में 10 किग्रा गोबर की खाद डाली जाती है।सिंचाई: गुलाब के पौधे को मार्च से अक्टूबर तक हफ्ते में दो बार सिंचाई की आवश्यकता होती है।वर्षा ऋतु में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है।खेतों में व्यवस्थित जलनिकासी की व्यवस्था होनी चाहिए। ड्रिप सिंचाइ पद्धति इसके लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।खाद डालना: अक्टूबर में और फिर जुलाई में छंटाई के बाद 10 किलो एफवाईएम (FYM) और 6:12:12 ग्राम एनपीके (NPK) प्रति पौधा खाद देने की आवश्यकता होती है।सूक्ष्म पोषक: 20 ग्राम MnSO4 + 15 ग्राम MgSO4 + 10 ग्राम FeSO4 + 5 g B (मिश्रण का 2 ग्राम एक लीटर पानी में घोला जाता है) युक्त 0.2% सूक्ष्म पोषक मिश्रण का अनुप्रयोग चमकीले रंग के फूल पैदा कर सकते हैं। बायो फर्टिलाइजर (Biofertilizers) रोपण के समय प्रति हेक्टेयर 2 किलो एजोस्पिरिलम (azospirillum) और फास्फो बैक्टीरिया (phospho bacteria) को मिट्टी में मिलाएं। इसे 100 किलो गोबर की खाद में मिलाकर गड्ढों में डालें।छंटाई: छंटाई का सबसे अच्छा समय वह अवधि है जब गुलाब के पौधे की गतिविधि कम से कम होती है और पौधा सुप्त अवस्था में होता है। छंटाई के समय विशेष क्षेत्र की जलवायु परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। पिछले सीज़न की लंबी लंबी टहनियों को आधी लंबाई में काट देना चाहिए। सभी कमजोर, रोगग्रस्त, क्रॉस-क्रॉसिंग और अनुत्पादक अंकुर हटा देना चाहिए। कटे हुए सिरों को फाइटोलन पेस्ट (phytolon paste) + कार्बेरिल (carbaryl) 50 WP से सुरक्षित किया जाना चाहिए।फसल की कटाई: गुलाब की खेती में फूलों को तोड़ते वक्त याद रखें कि जब फूल की एक या दो पंखुडियां खिल जाए, तो फूल को पौधे से अलग कर दें। इसके लिए तेज़ धार वाले चाक़ू या ब्लेड का इस्तेमाल करें। फूल को काटने के तुरंत बाद पानी से भरे बर्तन में रख दें। अब उसे कोल्ड स्टोरेज(cold storage) में रख दें। इसका तापमान करीब 2 से 10 डिग्री तक होना चाहिए। इसके बाद फूलों की ग्रेडिंग की जाती है, जिसेकोल्ड स्टोरेज में ही पूर्ण किया जाता है। इसी को फूलों की छटाई भी कहा जाता है। भारत में गुलाब की खेती किसानों के लिए सबसे लाभदायक व्यवसाय है। यहां कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, प।बं, जम्मू कशमीर, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश गुलाब की खेती करने वाले प्रमुख राज्य हैं।प्रति ऐकड़ भूमि पर गुलाब की खेती की लागत एवं लाभ कुछ इस प्रकार है:भूमि का किराया: 2,00,000 वार्षिकभूमि की तैयारी: 20,000फसल उत्पादन सामाग्री: 80,000उर्वरक एवं खाद: 20,000पौधों के रखरखाव: 15,000सिंचाई लागत: 50,000श्रमिक लागत: 60,000अन्य लागत: 20,000पैकेजिंग उत्पाद: 15,000कुल लागत: 3,80,000यदि किसान अपनी फसल को फूलों के एजेंट को बैचता है तो प्रत्येक फूल की कीमत 3 रूपय होगी, जो कि पूर्णत: चुने गए फूल की किस्म पर निर्भर करता है। अत: आय लगभग 1,50,000*3=4,50,000.लाभ=आय-लागत=4,50,000-3,80,000=70,000. प्रति एकड़ में 70 हजार का लाभ होगा। गुलाब की खेती की आय मृदा, मौसम, किस्म, उर्वरक, ऋतु, बाजार की मांग, उत्पादन विधि पर निर्भर करता है। गुलाब की कीमत बाजार क्षेत्र के अनुसार बदलती रहती है।संदर्भ:https://bit.ly/3tL68lk https://bit.ly/33J27TR https://bit.ly/3tSnSv4 https://bit.ly/3rKEsu4
सरीसृप
धरती की रक्षा बिना हथियार: जौनपुर के खेतों में जीव-जगत का गुप्त योगदान
जौनपुरवासियों, हमारे चारों ओर फैले खेत, बाग़-बग़ीचे, नहरें और गाँव केवल मानव जीवन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक ऐसा संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र है, जिसे हम अनेक अन्य जीवों के साथ साझा करते हैं। इन्हीं जीवों में सांप भी शामिल हैं, जिन्हें अक्सर डर, अज्ञान और भ्रांतियों की नज़र से देखा जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि जौनपुर जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में सांप भारतीय कृषि व्यवस्था, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में एक मौन लेकिन बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज के दौर में, जब खेती, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण एक साथ कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, तब सांपों के वास्तविक महत्व को समझना और उन्हें प्रकृति के सहयोगी के रूप में देखना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।आइए समझते हैं कि, सांप कृषि के लिए कैसे फायदेमंद होते हैं। हमारे शहर में, रैट स्नेक, अजगर, कोबरा, स्पेक्टाकल्ड कोबरा और कॉमन क्रेट, जैसे विभिन्न प्रकार के सांप पाए जाते हैं। ये सांप कृषि के लिए उपयोगी हैं, क्योंकि, ये फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले चूहों की आबादी को नियंत्रित करते हैं। सांप कीटों को भी खाते हैं, जिससे, फसलों की रक्षा होती है। हालांकि, कई क्षेत्रों में सांपों को मार दिया जाता है, क्योंकि, लोग सोचते हैं कि वे मनुष्यों के लिए हानिकारक हैं। परंतु, केवल 25% सांप ही जहरीले होते हैं, और मनुष्यों के लिए ख़तरा पैदा कर सकते हैं। सांप हमारे पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, और आर्थिक और चिकित्सीय लाभ प्रदान करते हैं। स्वस्थ समाज बनाने के लिए, जैव विविधता में सांपों के महत्व को जानना अतः आवश्यक है।भारत के अधिकांश क्षेत्रों में, रैट स्नेक (Rat snakes) सबसे आम सांप हैं। एक वयस्क रैट सांप की लंबाई, लगभग तीन मीटर से अधिक होती है। आपको, यह देखकर अक्सर ही आश्चर्य होता होगा कि, किसी सांप ने रेंगते हुए पूरी सड़क की चौड़ाई को नाप लिया हैं। इस सांप की अन्य अनूठी विशेषता, इसकी बड़ी आंखें हैं, जो इसके सिर की चौड़ाई तक फैली हुई होती हैं। उनके भीतर एक अद्भुत चमक के साथ, गोल व काली पुतलियां होती हैं। इसके होठों पर चित्रित ऊबड़-खाबड़ काली रेखाओं पर भी हमारा ध्यान जाता हैं। दरअसल, सांपों को मोटे तौर पर, ‘जहरीले’ और ‘गैर-जहरीले’ श्रेणी में वर्गीकृत किया जा सकता है। हालांकि, कहा जाता है कि, दुनिया भर में सांपों की लगभग 3,500 प्रजातियां पाई जाती हैं। लेकिन, उनमें से बमुश्किल लगभग 25% प्रजातियां ही जहरीली होती हैं।विषैले सांपों में किंग कोबरा (ओफियोफैगस हन्ना – Ophiophagus Hannah) सबसे घातक है। यह अधिकतर पहाड़ी इलाकों तक ही सीमित है। यह एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगा सकता है, और अपना जहर हवा में छोड़ सकता है। अगर किसी व्यक्ति की आंखों में, किंग कोबरा का जहर चला जाए, तो वह अंधा भी हो सकता है। वे आम तौर पर मानव निवास से बचते हैं। परंतु, यह केवल मनुष्य ही हैं, जो शहरों और कस्बों के विस्तार के साथ-साथ सांपों के आवासों पर आक्रमण करते हैं, और सरीसृपों को दोष देते हैं।जबकि, कोबरा (नाजा नाजा – Naja Naja) मानव बस्तियों के पास रहता है। वे धान के खेतों में मौजूद चूहों को खाते हैं, और उनकी फसल बचाते हैं। अन्य जहरीले सांपों में, वाइपर (Viper) शामिल है, जिसके, शरीर पर अंडाकार या हीरे के आकार के धब्बे होते हैं। इसका जहर रक्त के थक्के और मांसपेशियों के क्षय का कारण बन सकता है। एक तरफ़, क्रेट (Krait), क्षैतिज सफेद या पीली धारी वाला एक अन्य जहरीला सांप है। क्रेट कीड़ों को खाते हैं, और कीटों को नियंत्रित करते हैं।वास्तव में, सांप देवता के रूप में भी, विभिन्न संस्कृतियों में पूजनीय हैं। उन्हें प्रजनन क्षमता, पुनर्जन्म, चिकित्सा, उपचार और समृद्धि के प्रतीक के रूप में जाना जाता हैं। विरोधाभासी रूप से, ओफिडियोफोबिया (Ophidiophobia) अर्थात, सांपों का डर, जानवरों के सबसे आम भय में से एक है। यह 2-3% मानव आबादी को प्रभावित करता है। इसलिए, सर्पदंश के डर से अक्सर सांपों को देखते ही मार दिया जाता है।हालांकि, दुनिया भर में सांपों की लगभग 85-90% प्रजातियां गैर-जहरीली हैं। अधिकांश सांप स्वभाव से आक्रामक नहीं होते हैं, और अक्सर खुद के बचाव में या धमकी दिए जाने या उकसाए जाने पर काटते हैं। सांपों को मारना समस्याग्रस्त है। क्योंकि, उनकी घटती आबादी न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि मनुष्यों के लिए भी हानिकारक है।शिकारी के रूप में सांप, मेंढकों, कीड़ों, चूहों और अन्य कृंतकों को खाते हैं, जिससे उनकी आबादी को नियंत्रण में रखने में मदद मिलती है। सांपों को अन्य प्रजातियां भी खाती हैं, इस प्रकार वे शिकार के रूप में खाद्य-श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।‘पारिस्थितिकी तंत्र-अभियंता’ के रूप में, सांप ‘द्वितीयक बीज फैलाव’ की सुविधा प्रदान करते हुए, पौधों के प्रजनन में योगदान देते हैं। जब सांप कृंतकों (जो बीज खाते हैं) को निगलते हैं, तो उनके मल के माध्यम से बीज उत्सर्जन होता हैं। इस प्रकार, बीज पर्यावरण में अक्षुण्ण तरीके से निष्कासित हो जाते हैं।सांप बीमारियों की रोकथाम में भी भूमिका निभाते हैं, और कृषि समुदायों को लाभ पहुंचाते हैं। कृंतक कई पशुजन्य रोगों के वाहक होते हैं, जो मनुष्यों, कुत्तों, मवेशियों, भेड़ और अन्य घरेलू जानवरों को प्रभावित करते हैं। कृंतकों की आबादी में अचानक वृद्धि से, पशुजन्य रोगों का प्रकोप हो सकता है। उनकी अधिक आबादी फसलों को भी प्रभावित कर सकती है। अतः कृंतकों को खाकर, सांप कृंतकों की आबादी को नियंत्रण में रखते हैं, इस प्रकार पशुजन्य रोग के संचरण को रोकते हैं, और खाद्य सुरक्षा में योगदान करते हैं।सांप कई औषधियों का भी स्रोत होते हैं। सर्पदंश के लिए एकमात्र सिद्ध और प्रभावी उपचार - सांप-विरोधी जहर या एंटी वेनम (Anti venom) भी सांपों के जहर से प्राप्त होता है। सांप के जहर का, विरोधी - जहर उत्पादन से परे चिकित्सीय महत्व है। उनसे प्राप्त कई दवाओं का उपयोग नैदानिक अभ्यास में किया जाता है।एक तरफ, हमारे गंगा नदी के क्षेत्र में, निम्नलिखित मुख्य सांप पाए जाते हैं।1.एनहाइड्रिस सीबोल्डी (Enhydris sieboldii)2.ज़ेनोक्रोफ़िस पिस्केटर (Xenochrophis piscator)3.एक्स. पिस्केटर (X. piscator)4.डेंड्रेलाफिस ट्रिस्टिस (Dendrelaphis tristis)5.ओलिगोडोन अर्नेंसिस (Oligodon arnensis)6.सैम्मोफिस कोंडानारस (Psammophis condanarus)7.एम्फिस्मा स्टोलैटम (Amphiesma stolatum)8.लाइकोडोन ऑलिकस (Lycodon aulicus)9.बंगारस कैर्यूलस (Bungarus caeruleus)10.नाजा कौठिया (Naja kaouthia)11.नाजा नाजा (Naja Naja)12.एरिक्स जॉनी (Eryx johnii)13.पायथन मोलुरस (Python molurus) संदर्भ-https://tinyurl.com/47tsjc5bhttps://tinyurl.com/22ykxp4ehttps://tinyurl.com/mvft5fj3https://tinyurl.com/3w6ndu9x
मछलियाँ और उभयचर
सूशी का बढ़ता चलन और समुद्री मछलियों के अस्तित्व पर गहराता संकट
जौनपुरवासियों, आज की तेज़ी से बदलती जीवनशैली में हमारे खान-पान के तरीके भी तेजी से बदल रहे हैं। कभी जो विदेशी व्यंजन केवल बड़े होटलों तक सीमित थे, आज वे ऑनलाइन डिलीवरी ऐप्स और कैफे संस्कृति के ज़रिये जौनपुर जैसे शहरों तक पहुँच चुके हैं। इन्हीं में से एक है जापानी व्यंजन सूशी, जो अब केवल लग्ज़री नहीं बल्कि ट्रेंडिंग फ़ास्ट फ़ूड बन चुका है। युवा पीढ़ी से लेकर फूड लवर्स तक, हर कोई इसके स्वाद और प्रेज़ेंटेशन का दीवाना होता जा रहा है। लेकिन इसके साथ एक गंभीर सवाल भी जुड़ा है — क्या सूशी की बढ़ती लोकप्रियता समुद्री मछलियों को विलुप्ति की ओर तो नहीं ले जा रही? यह लेख इसी स्वाद और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को समझाने का प्रयास करता है। आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2019 से सूशी (Sushi) के ऑर्डर (order) में करीब 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। गुवाहाटी और लुधियाना जैसे छोटे शहरों से भी इसकी काफी मांग दर्ज की गई है। जापानी व्यंजन सूशी को, चावल, जिन्हें वेजीटेबल (Vegetable), सैल्मन और टूना मछली (salmon and tuna) और फलों के साथ भी परोसा जाता है, भारत में इसके काफी प्रशंसक है, विशेष रूप से दिल्ली में, और हाल ही में एक ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म स्विगी (Swiggy) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण ने इसकी पुष्टि की है।सूशी के विकास का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसकी शुरुआत प्राचीन चीन (china) से हुई थी। मछली को लम्बे समय तक संरक्षित रखने के लिए सूशी के प्रारंभिक स्वरूप का जन्म हुआ।मछली को ताजा रखने के लिए, इसे चावल के साथ किण्वित किया जाता था और बाद में चावल को त्याग दिया गया और मछली का सेवन कर लिया जाता। इस प्रकिया ने जापान में भी अपना रास्ता बना लिया, जहां लोगों ने मछली के साथ चावल खाना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे कुछ संशोधनों के साथ सूशी का जन्म हुआ। यह जल्द ही जापानियों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गया और उन्होंने इसे एकदम सही बनाने के लिए सीज़निंग और सिरके (seasonings and vinegar) के साथ इसे पकाना शुरू कर दिया। सूशी व्यापक रूप से खाए जाने वाले फास्ट फूड के रूप में उभरी जो जापानी संस्कृति और परंपरा से दृढ़ता से जुड़ा हुआ है। अब, आधुनिक समय में, सूशी एक विश्व स्तर पर पसंद किया जाने वाला फास्ट फूड बन गया है, जिसे दुनिया भर में विभिन्न लोगों द्वारा अलग-अलग तरीके से खाया जाता है।वर्तमान में भारत में भी सूशी काफी लोकप्रिय है, परन्तु पहले भारतीयों के लिए यह इतनी स्वादिष्ट या सुलभ नहीं थी, जिसे ज्यादातर महंगे पांच सितारा होटलों में ही परोसा जाता था। हालांकि, बदलते समय में जापानी व्यंजनों की लोकप्रियता में वृद्धि के साथ सूशी में भी कई बदलाव हुए, विशेष रूप से शाकाहारी लोगों के लिए विभिन्न सामग्रियों के साथ सूशी की शुरूआत हुई, कई बदलाव भारतीयों के स्वाद अनुसार किये गए जिससे भारतीयों के बीच इस जापानी व्यंजन ने अपनी एक ख़ास जगह बना ली।वर्तमान समय में भारत में आपको होटलो के मेन्यू में 15 तरह की सूशी देखने को मिल जाएंगी जिन्हे भारतीय स्वाद को ध्यान में रखते हुए विभिन्न सामग्रियों और टॉपिंग के साथ नए प्रकार से बनाया जाता है। भारत में सूशी की खपत और दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में बहुत अलग है, क्योंकि अच्छी गुणवत्ता वाली सूशी को उच्च कीमत के साथ जोड़ा जाता है। दुनिया भर में सूशी महंगी है जिसके तीन मुख्य कारण है: पहला, उत्पाद की गुणवत्ता; दूसरा, शेफ (chef) के कौशल का स्तर और तीसरा, मछली जिसे कम तापमान में रखने के लिए आवश्यक उपकरणों को खरीदने और चलाने में पैसा लगता है। जापान विदेश व्यापार संगठन की रिपोर्ट कहती है कि भारत में लगभग 100 रेस्तरां (restaurant) हैं जो मुख्य रूप से जापानी व्यंजन परोसते हैं।आप जानते हैं कि नई दिल्ली में “टोक्यो”, भारत का पहला जापानी रेस्तरां था? यह 1989 में भारत पर्यटन विकास निगम की मदद से भारत में जापानी व्यंजनों के लिए खोला गया था। हालांकि, ताजी मछली और मुख्य सामग्री की कमी की शिकायतों के कारण इसे बंद कर दिया गया। “सकुरा”, वर्ष 2000 में कनॉट प्लेस के मेट्रोपॉलिटन में खुलने वाला अगला होटल था। इसके बाद तो जैसे झड़ी ही लग गई जापानी रेस्तरां की! मुंबई में त्सुबाकी (Tsubaki), ताकी- ताकी (Taki-Taki), वाकाई(Wakai); नई दिल्ली में हाराजुकु कैफे (Harajuku Cafe) और मेन्शो टोक्यो (Mensho Tokyo), गोवा में मकुत्सु (Makutsu), इज़ुमी (Izumi’s) और कोफुकु का नया आउटलेट (Kofuku’s new outlet); और चेन्नई में ओयामा (Oyama), कुछ नाम जो शीर्ष पर है और ये एक वर्ष के भीतर ही बने हैं। वर्तमान में जापानी रेस्तरां भी शाकाहारियों के लिए सूशी परोसते हैं, अब यह व्यंजन सभी का पसंदीदा बन गया है। यह रेस्तरां उन लोगों के स्वाद का भी ध्यान रखते हैं जो कच्चा मांस पसंद नहीं करते हैं।सैल्मन का उपयोग न केवल सूशी बल्कि कई व्यजनों में किया जा रहा है। अब 'अमृतसारी तवा सैल्मन' और 'बंगाली दही सरसों सामन' जैसे भारतीय संस्करणों में उत्तरी अटलांटिक (North Atlantic) और प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की सहायक नदियों के मूल निवासी सैल्मन का स्वाद ले सकते हैं। 2015 में सैल्मन की भारतीय खपत लगभग 450 टन थी, परन्तु यह धीरे-धीरे बढ़ रही है, देश में हर साल लगभग 9.2 मिलियन टन समुद्री भोजन की खपत होती है, जिसमें से आधा हिस्सा हिंद महासागर से आता है और शेष ताजे पानी के जलीय कृषि से आता है। भारत में आयातित समुद्री भोजन की दीर्घकालिक संभावना है।हालांकि, भारत में सैल्मन के बारे में किसी को भी कोई ख़ास जानकारी नहीं है फिर भी ये मछली यहाँ बड़े चाव\खाई जाती है, यह ठंडे पानी की मछली है जो समुद्र के पानी में 4 से 15 डिग्री सेल्सियस के बीच रहती है। इसलिए, अधिकांश सैल्मन फार्म उत्तरी गोलार्ध में हैं। इस मछली को खाने से रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद मिल सकती है। इसमें मौजूद फैटी एसिड हृदय के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होते है। इन्ही लाभों के कारण इसकी मांग साल दरसाल बढ़ती ही जा रही है।उत्तरी अमेरिका (North America), यूरोप (Europe) और एशिया (Asia) में सूशी और डिब्बाबंद टूना मछली की मांग से हिंद महासागर में तेजी से येलोफिन (yellowfin) टूना खत्म हो रही है। पर्यावरणविदों का कहना है कि अधिक मछली पकड़ने से टूना के विलुप्त होने का खतरा है। इनकी आबादी इतनी कम हो गई है की प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (The International Union for Conservation of Nature) की "लाल सूची" में इसकी कई प्रजातियों को रखा गया हैं। मछलियों को प्रजनन करने से पहले ही मार या पकड़ लिया जाता है, जिसका अर्थ है कि वे विलुप्त होने की ओर बढ़ रहे हैं।लंदन स्थित ब्लू मरीन फाउंडेशन (Blue Marine Foundation-BLUE) एडवोकेसी ग्रुप (advocacy group) के अनुसार, इन मछलियों को वैश्विक स्तर पर लगभग 450,000 मीट्रिक टन के करीब सालाना पकड़ा जाता है। फ्रांसीसी (French) और स्पैनिश (Spanish) भी मछली पकड़ने के बेड़े में "पर्स सीन" (purse seine) जैसे औद्योगिक तरीकों का उपयोग करते हुए विशाल जाल के साथ अधिकांश मछली लेते हैं, जो अक्सर किशोर पीले फिन का शिकार करते हैं। मछली पकड़ना समुद्री जीवों के आबादी में गिरावट लाने का एक महत्वपूर्ण कारण है। मछली की शिकार करना कोई बुरी बात नहीं है, पर यह जब बड़े बड़े जहाजों द्वारा तेजी से पकड़ी जाती है, तो इसे ओवेर फिशिंग (Over Fishing) कहा जाता है। अरबों लोग प्रोटीन के लिए मछली पर निर्भर होते है। मछली पकड़ना मुख्य रूप से लोगों का व्ययसाय होता है और लाखो लोगों का यह आजीविका का साधन है।ओवेर फिशिंग मतलब एक हद से ज्यादा मछली को पकड़ना है। इससे प्रजनन करने वाली आबादी ठीक होने के लिए बहुत कम हो जाती है। इसके लिए ख़राब मत्स्य प्रबंधन, मछली पकड़ने की अस्थिरता, आर्थिक जरूरतों के साथ-साथ अवैधता को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। इसके प्रभावों में समुद्री जीवन असंतुलन, आय की हानि, और लुप्तप्राय समुद्री प्रजातियों की कटाई शामिल है, और यह दुनिया के महासागर और समुद्री जीवन को अनकहा नुकसान पहुंचा रहा है।संदर्भ:https://bit.ly/3xEeUlq https://bit.ly/3zWEWTJ https://bit.ly/3tWlYJ3
शहरीकरण - नगर/ऊर्जा
मिट्टी के तेल की रोशनी: केरोसिन का आविष्कार, वैश्विक यात्रा और भारत में बदलती भूमिका
दैनिक जीवन के विभिन्न कार्यों को करने के लिए हमें ऊर्जा की आवश्यकता होती है। विद्युत ऊर्जा और ईंधन ऊर्जा हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, जो हमें विभिन्न नवीकरणीय और गैर नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त होती है। वर्तमान समय में इनके बिना जीवन की कल्पना करना असंभव प्रतीत होता है। एक समय ऐसा था जब विद्युत ऊर्जा या ईंधन ऊर्जा के लिए मनुष्य मिट्टी के तेल अर्थात केरोसिन (Kerosene) पर निर्भर था। तो आइए, आज इस लेख के जरिए केरोसिन के आविष्कार तथा इसकी उपयोगिता के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।मिट्टी का तेल अर्थात केरोसिन, जिसे पैराफिन (Paraffin) के नाम से भी जाना जाता है, एक दहनशील हाइड्रोकार्बन तरल (hydrocarbon liquid) है, जिसे पेट्रोलियम (Petroleum) से प्राप्त किया जाता है। केरोसिन का उपयोग हवा में उड़ने वाले विमानों के साथ-साथ घरों में ईंधन के रूप में व्यापक रूप से किया जाता है। केरोसिन शब्द “ग्रीक” (Greek) भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है "मोम”। केरोसिन शब्द का उपयोग अर्जेंटीना (Argentina), ऑस्ट्रेलिया (Australia), कनाडा (Canada), भारत, न्यूजीलैंड (New Zealand), नाइजीरिया (Nigeria) और संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) के अधिकांश हिस्सों में किया जाता है, जबकि चिली (Chile), पूर्वी अफ्रीका (Eastern Africa), दक्षिण अफ़्रीका (South Africa), नॉर्वे (Norway) और यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) में केरोसिन को पैराफिन के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा एशिया (Asia) और दक्षिणपूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिकांश हिस्सों में केरोसिन को लैंप ऑयल (Lamp Oil) के नाम से जाना जाता है।केरोसिन के बारे में एक अवधारणा है कि यह पेट्रोलियम से प्राप्त होता है किंतु सबसे पहले केरोसिन का आविष्कार पेट्रोलियम से नहीं, बल्कि कोयले का आसवन करके किया गया था तथा इसका पहला बड़ा अनुप्रयोग खाना पकाने के ईंधन के रूप में नहीं, बल्कि लैंप जलाने के लिए (बिजली के आविष्कार से पहले) किया गया।तेल के लैंप का उपयोग सदियों से किया जाता रहा है, सबसे पहले खोजे गए लैंप 9वीं शताब्दी के फारस (Persia) के हैं। ऐतिहासिक रूप से ये लैंप वनस्पति तेल, मनुष्य या पशु वसा से जलाए जाते थे। 1700 और 1800 के दशक की शुरुआत में, लैंप जलाने के लिए व्हेल के तेल का उपयोग किया जाता था । लेकिन फिर 1846 में जब कनाडा (Canada) के प्रसिद्ध भूविज्ञानी और आविष्कारक अब्राहम गेस्नर (Abraham Gesner) बिटुमिनस कोयले (Bituminous coal) और तेल शेल (Oil shale) का आसवन कर रहे थे, तब उन्हें एक महत्वपूर्ण पदार्थ प्राप्त हुआ जिसे केरोसिन नाम दिया गया। केरोसिन पारंपरिक तेल के लैंप को रोशन करने के लिए इस्तेमाल होने पर एक चमकदार लौ पैदा करता था जिससे इसका उपयोग व्यापक हो गया। केरोसिन के आविष्कार के बाद 1854 में इसका व्यावसायिक उत्पादन शुरू हुआ। इसका उपयोग व्यापक रूप से विमान के जेट इंजनों और कुछ रॉकेट इंजनों को रॉकेट प्रोपेलेंट-1 या रिफाइंड पेट्रोलियम-1 (Rocket Propellant-1 or Refined Petroleum-1 (RP-1) के रूप में ऊर्जा देने के लिए किया जाता है। इसके अलावा इसका उपयोग आमतौर पर खाना पकाने के लिए और प्रकाश ईंधन के रूप में भी किया जाता है। एशिया के कुछ हिस्सों में केरोसिन का उपयोग छोटी आउटबोर्ड मोटरों (Outboard motors) या मोटरसाइकिलों के लिए ईंधन के रूप में किया जाता है। ऐसा अनुमान है कि पूरे विश्व में विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रति दिन लगभग 1,110,000 घन मीटर केरोसिन का उपयोग होता है। केरोसिन की खोज के बाद कई दैनिक गतिविधियां बहुत आसान बन गईं। उद्योगों और घरों में इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाने लगा। विभिन्न उद्योग बिजली पैदा करने और ईंधन के रूप में केरोसिन का उपयोग करने लगे तथा लोगों ने दीयों या लैंपों को जलाने और खाना पकाने के लिए केरोसिन का उपयोग शुरू कर दिया।प्रारंभ में केरोसिन बहुत महंगा था, लेकिन जब शोध से पता चला कि केरोसिन को पेट्रोलियम से भी परिष्कृत किया जा सकता है, तो केरोसिन के उपयोग में वृद्धि होने लगी। ऐसा अनुमान है कि 1860 तक अमेरिका में केरोसिन का उत्पादन करने वाली रिफाइनरियों की संख्या 30 के आस-पास हो गई । जिससे धीरे-धीरे केरोसिन के दाम में गिरावट होने लगे । 1850 के दशक के उत्तरार्ध में केरोसिन से जलने वाले लैंपों की मांग में अत्यधिक बढ़ोतरी हुई। 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के दौरान केरोसिन की सहायता से जलने वाले लैंपों का उपयोग घर, खुदरा प्रतिष्ठान, चिकित्सा कार्यालय, अस्पताल, कारखानें इत्यादि लगभग हर जगह किया जाने लगा। एक समय तो ऐसा भी था जब शहरों की कानून व्यवस्था की देखभाल करने वाली पुलिस भी प्रकाश व्यवस्था के लिए पूरी तरह से केरोसिन पर निर्भर थी। इसके अलावा ट्रेनों के लिए इनडोर लाइटिंग (Indoor lighting), हेडलैम्प्स (Headlamps) और सिग्नलिंग उपकरणों (Signaling devices) में भी केरोसिन का उपयोग किया जाने लगा। केरोसिन का आविष्कार कृषि में भी सहायक बना क्योंकि अब किसान घंटों तक अपने खेतों में काम कर सकते थे, परिणामस्वरूप उनकी उपज में वृद्धि हुई। विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी केरोसिन का उपयोग किया जाने लगा, यहां तक कि सिर के जूँ को मारने के लिए भी केरोसिन उपयोगी हो गया।1879 में एक विश्वसनीय, व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य इलेक्ट्रिक लाइट बल्ब के आविष्कार के साथ केरोसिन से जलने वाले लैंपों या दीयों के उपयोग में गिरावट आने लगी। हालांकि, 1940 के दशक तक भी कुछ समुदाय केरोसिन से जलने वाले लैंपों का उपयोग कर रहे थे। आज अधिकांश देशों, विशेष रूप से, उत्तरी अमेरिका में केरोसिन को एक सुखद स्मृति के रूप में याद किया जाता है, जो उन्हें पुराने अच्छे दिनों की याद दिलाता है। कुछ विकासशील देशों जैसे नाइजीरिया (Nigeria) में अनुमानित 90 प्रतिशत घर अभी भी खाना पकाने, प्रकाश आदि के लिए केरोसिन पर निर्भर हैं।भारत में केरोसीन को सबसे पहले अलाप्पुझा स्थित मैसर्स अर्नोल्ड चेनी एंड कंपनी ऑफ न्यूयॉर्क (M/s Arnold Cheney and Co of New York) और बाद में मैसर्स रिप्ले और मैके (M/s Ripley and Mackay) द्वारा त्रावणकोर में आयात किया गया था। इसके बाद बर्मा-शेल (Burma Shell) कंपनी ने 1928 में केरोसिन का आयात और विपणन किया। भारत में केरोसिन में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की शुरुआत करीब 80 से 90 साल पहले हुई थी। अमेरिकियों ने भारत में केरोसिन का एक बड़ा बाजार देखा और इस प्रकार भारत में 5 जुलाई 1952 को 'ईएसएसओ' (ESSO) कंपनी एक नए नाम 'स्टैंडर्ड वैक्यूम रिफाइनिंग कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड' (Standard Vacuum Refining Company of India Limited) के साथ स्थापित की गई। बर्मा शेल (Burma Shell) कंपनी ने भारत में केरोसिन की खोज की, जिससे भारत में केरोसिन का उपयोग अधिक व्यापक हो गया । परिणामस्वरूप, भारत इस तरल पदार्थ पर काफी निर्भर हो गया। घरों में इस्तेमाल होने वाले लैंप और लालटेन केरोसिन से जलाए जाने लगे, गाड़ियाँ, मोटरसाइकिलें और यहाँ तक कि पंखे भी केरोसिन की मदद से चलाए जाने लगे। केरोसिन ने कई अन्य उद्योगों को भी जन्म दिया, जैसे लैंप में इस्तेमाल होने वाले रेशम के आवरण तथा केरोसिन के इस्तेमाल से उपयोग की जाने वाली इस्त्री आदि। भारत में केरोसिन दैनिक जीवन का इतना महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया कि इसे राशन की दुकानों में बेचा जाने लगा। हालांकि, आज विद्युत या बिजली ने केरोसिन का स्थान ले लिया है, जो आज सबसे दूरस्थ स्थानों तक भी पहुंच गई है। जिस केरोसिन से कभी बाइक और कारें चलती थीं, वह बिजली के आविष्कार के बाद से अप्रचलित हो गई। स्वच्छ और अधिक परिष्कृत ईंधन उपलब्ध होने के कारण केरोसिन पर लोगों की निर्भरता कम हो गई।संदर्भ:https://tinyurl.com/y2emjxnchttps://tinyurl.com/2zyd326vhttps://tinyurl.com/mr2mdh5nhttps://tinyurl.com/dpvd43chhttps://tinyurl.com/28ytcytj
फल और सब्जियाँ
16-03-2026 09:35 AM • Jaunpur District-Hindi
वैनिला: दुनिया का दूसरा सबसे महंगा मसाला और इसकी खेती व वैश्विक यात्रा
कश्मीर की शान माने जाने वाले केसर को दुनिया का सबसे महंगा मसाला माना जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि दुनिया का दूसरा सबसे महंगा मसाला “वैनिला” (Vanilla) है। सौंदर्य प्रसाधनों, आइक्रीम (Ice Cream), परफ्यूम (Perfume) और कई प्रकार के पेय पदार्थों में इसका प्रयोग कई दशकों से होता आ रहा है। अपनी मनमोहक सुगंध और अत्यधिक कीमत के लिए जाने जाने वाले मसाले वैनिला का इतिहास भी कई उतार चढ़ावों से भरा पड़ा है। वैनिला एक सुगंधित और अत्यधिक मूल्यवान मसाला है, जिसका समृद्ध इतिहास रहा है। वैनिला की खेती सबसे पहले मेक्सिको (Mexico) के पूर्वी तट पर तत्कालीन देशज ‘टोटोनैक’ (Totonac) द्वारा की गई थी। बाद में एज़्टेक साम्राज्य (Aztec Empire) ने टोटोनैक पर विजय प्राप्त कर ली, जिससे वैनिला एज़्टेक लोगों के पास पहुंच गया। एज़्टेक ने चॉकलेट (Chocolate) का स्वाद बढ़ाने के लिए वैनिला का उपयोग किया। वहीं जब स्पेन (Spain ) ने एज़्टेक पर विजय प्राप्त की, तो स्पेन के लोग वैनिला को यूरोप (Europe) ले गए।
17 वीं शताब्दी की शुरुआत तक वेनिला को मात्र चॉकलेट के सहायक के रूप में उपयोग किया जाता था, किंतु जब क्वीन एलिजाबेथ प्रथम (Queen Elizabeth I) के एक पेशेवर चिकित्सक ह्यू मॉर्गन (Hugh Morgan) ने वैनिला के स्वाद वाली मिठाई का आविष्कार किया,तो रानी को यह मिठाई बेहद पसंद आई थी। बाद में 1780 के दशक में फ्रांस (France) में अमेरिकी मंत्री के रूप में काम करने वाले व्यक्ति थॉमस जेफरसन (Thomas Jefferson) ने वैनिला का प्रयोग आइसक्रीम में किया। 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी की शुरुआत में वैनिला की पाक विधि (Recipe) पाक कला किताबों में दिखाई देने लगी थी। खाद्य इतिहासकार वेवरली रूट (Waverly Root) के अनुसार, पहली ज्ञात वैनिला पाक विधि हन्ना ग्लासि (Hannah Glasse) की पाक पुस्तक ‘द आर्ट ऑफ़ कुकरी’ (The Art of Cookery) के 1805 के संस्करण में दिखाई देती है। यह किताब चॉकलेट के साथ वैनिला के उपयोग का सुझाव देती है। वहीं वैनिला आइसक्रीम के लिए पहली पाक विधि मैरी रैंडोल्फ (Mary Randolph) की पुस्तक ‘द वर्जीनिया हाउसवाइफ’ (The Virginia Housewife (1824) में पाई जाती है। 19वीं सदी के उत्तरार्ध तक, वैनिला की मांग आसमान छू गई थी। आज वैनिला का उपयोग आइसक्रीम, शीतल पेय और अन्य खाद्य पदार्थों के स्वाद के रूप में किया जाता है। वैनिला, केसर के बाद दुनिया का दूसरा सबसे महंगा मसाला है। इसके उत्पादन में बहुत मेहनत और लंबा समय लगता है, इसलिए वैनिला इतना महँगा होता है। वैनिला का पौधा एक लता के रूप में उगता है, जिसकी लंबाई लगभग 300 फीट तक होती है, जिसमें से लगभग चार इंच व्यास वाले हल्के हरे-पीले फूल निकलते हैं । ये फूल आमतौर पर सुबह जल्दी खुलते हैं और लगभग 6 घंटे तक परागण के लिए ग्रहणशील अर्थात पूरी तरह से तैयार होते हैं। प्रत्येक फूल सिर्फ 24 घंटों के लिए खुला रहता है, जिसके बाद परागण न होने पर यह मुरझाकर मर जाता है और जमीन पर गिर जाता है। वैनिला की फली फूल के परागण से उत्पन्न होती है। वैनिला के पौधे का फल एक फली होती है जिसमें हजारों बीज होते हैं। इन्हीं बीजों से वैनिला को निकाला जाता है। इसका परागण मेलिपोना मधुमक्खियों (Melipona Bees) और हमिंग बर्ड्स (Hummingbirds) द्वारा किया जाता है। वैनिला की प्राथमिक प्राकृतिक परागणकर्ता, मेलिपोना मधुमक्खी, केवल मेक्सिको (Mexico) में पाई जाती है, किंतु अब वह भी लगभग विलुप्त हो चुकी हैं। इसलिए आज वैनिला को हाथ से परागित करना पड़ता है। वैनिला को हाथ से परागित करने का अभ्यास, 1841 में हिंद महासागर में रियूनियन द्वीप समूह पर एडमंड एल्बियस (Edmund Albius) नाम के एक 12 वर्षीय अफ्रीकी दास द्वारा विकसित किया गया था। वैनिला की कीमत चांदी से भी अधिक होने का एक और कारण दुनिया भर में प्राकृतिक वैनिला की कमी भी है। हिंद महासागर में स्थित एक द्वीप देश मेडागास्कर (Madagascar), कुल वैनिला आपूर्ति का 75% से अधिक का उत्पादन करता है। लेकिन हाल के चक्रवातों ने इसके उत्पादन को बहुत प्रभावित किया है, जिसकी वजह से कीमतें भी काफी बढ़ गई हैं। इसके साथ ही वैनिला की प्राथमिक परागणकर्ता, मेलिपोना मधुमक्खी, भी लगभग विलुप्त हो चुकी है। प्राकृतिक वैनिला की फलियों के पकने के साथ-साथ देखभाल की प्रक्रिया भी बेहद जटिल होती है। इन सभी चुनौतियों के कारण वैनिला बाज़ार में इतना महंगा है। वैनिला पौधों के आर्किड (Orchid) परिवार का एकमात्र फल देने वाला सदस्य है। हालांकि, वैनिला मूल रूप से दक्षिण और मध्य अमेरिका में उगाया जाता है, किंतु जलवायु और अन्य स्थितियों में समानता के कारण वैनिला, भारत में भी अच्छी तरह से बढ़ता है।
आज वैनिला, मेडागास्कर से लेकर भारत, ताहिती (Tahiti) और इंडोनेशिया (Indonesia) तक, दुनिया भर के बागानों में फ़ैल गया है। दुनिया का 75% वैनिला मेडागास्कर और रीयूनियन (Reunion) से आता है। आज वैनिला का दुनिया भर में कुल उत्पादन लगभग 2000 मीट्रिक टन है। इसके बावजूद मांग की तुलना में इसका उत्पादन काफी कम है। भारत में वैनिला ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (British East India Company) द्वारा पहली बार साल 1835 में पेश किया गया था। हालांकि शुरुआत में पौधा फूलने के तुरंत बाद मुरझा गया था। कंपनी ने केरल, असम, बिहार, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भी वैनिला उगाने की कोशिश की, लेकिन सारे प्रयास विफल रहे। भारत में 1945 में नीलगिरी के ‘कल्लार फल अनुसंधान केंद्र’ और 1960 के दशक में केरल के वायनाड जिले के ‘बागवानी अनुसंधान केंद्र’ में इसकी खेती और अनुसंधान किये गए। किंतु 1990 के दशक तक इस फसल का कोई नियमित खरीदार नहीं था। लेकिन भारत में वैनिला के विकास एवं प्रसार की असली कहानी सन 1996 के आसपास पोलाची में शुरू हुई। दरसल, इस दौरान रबर, नारियल और कॉफी की गिरती कीमतों ने दक्षिण भारत के हताश किसानों को अन्य लाभदायक फसलों की ओर रुख करने को मजबूर किया। इसी दौरान पोलाची के एक मेहनती किसान डॉ. महेंद्रन (Dr. Mahendran) ने वैनिला की खेती करने का फैसला किया। उन्होंने यह विकल्प इसलिए चुना क्योंकि इससे पहले किसी ने भी वैनिला की व्यावसायिक रूप से या सफलतापूर्वक खेती नहीं की थी। उनके द्वारा की गई ऑर्किड वैनिला की खेती को भारत की पहली वेनिला पहल कहा जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि महज एक साल के भीतर अर्थात सन 1998 तक, डॉ. महेंद्रन तकरीबन पांच टन वैनिला का निर्यात भी करने में सफल रहे । 2003 तक, यह निर्यात 30 टन तक बढ़ गया था। वर्तमान में, डॉ. महेंद्रन दुनिया के कुछ सबसे बड़े स्वाद निर्माताओं के लिए वैनिला का उत्पादन कर रहे है। महेंद्रन के समान ही अब अन्य किसान भी वैनिला की खेती से लाभ कमा रहे हैं । उदाहरण के लिए, दक्षिण केरल के कोलेनचेरी के एक किसान थम्पी थॉमस ने भी जहां सन 1999 में कच्ची वैनिला फलियों को 500 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर बेचा था,लेकिन अब मौजूदा समय में उनके द्वारा उगाई गई वैनिला 3,750 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकती है।
इनके अलावा भी जिन-जिन लोगों ने वैनिला प्रसंस्करण में परिश्रम किया है, उनमें से अधिकांश लोग शानदार रकम कमा रहे हैं। 1998 में प्रसंस्कृत वैनिला बीन्स का अंतर्राष्ट्रीय मूल्य केवल $19 था वहीं 2002 में यह बढ़कर $200 हो गया और आज की तारीख में इसकी कीमत बढ़कर तकरीबन $350-400 हो गई है। हालांकि, विशेषज्ञों का अनुमान है कि वैनिला के अधिक उत्पादन से इसकी कीमतों में गिरावट आ सकती है। साथ ही कई मृदा जनित कवक रोगजनकों और विषाणुओं के उद्भव के कारण भी वैनिला उगाना एक जोखिम भरा उद्योग भी बन सकता है। इसके अलवा फफूंद संक्रमण भी वैनिला प्रसंस्करण को भी प्रभावित कर सकता है। वैनिला का बाज़ार भी अत्यधिक अस्थिर और अनियमित माना जाता हैं। ऊपर से प्रसंस्कृत वैनिला फलियों की खरीद में केवल 10 निगमित दिग्गजों का ही दबदबा है। हालांकि, वर्तमान में प्राकृतिक वैनिला की कुल वैश्विक मांग लगभग 4,000-5,000 टन प्रति वर्ष है। साथ ही कृत्रिम उत्पादों के प्रति उपभोक्ताओं की बढ़ती अरुचि के साथ इसके और बढ़ने की उम्मीद है। हाल ही में, देश में वैनिला की खेती का तेजी से विस्तार भी हुआ है। केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के दक्षिणी राज्यों के साथ-साथ वैनिला की खेती, उड़ीसा और पूर्वोत्तर राज्यों में भी जोर पकड़ रही है।
मसाला उद्योग के पर्यवेक्षकों के अनुसार, केरल में इसी वर्ष वैनिला की खेती में 25 फीसदी की वृद्धि देखी गई है,जिसका प्रमुख कारण मसाले की उपज अवधि का कम होना और खेती की लागत कम होना है। साथ ही इसे अन्य फसलों के साथ मिश्रित खेती के तौर पर भी उगाया जा सकता है। इसलिए वैनिला की खेती भी कॉफी, काली मिर्च, नारियल और सुपारी जैसी पारंपरिक फसलों के बीच अपनी पहचान स्थापित करने में सफल रही है। इन सभी कारणों से वैनिला की फसल को छोटे किसानों के द्वारा भी बड़े पैमाने पर अपनाया जा रहा है।
तितलियां: पर्यावरण संतुलन और हमारी खाद्य सुरक्षा की अनमोल कड़ी
‘तितली’, यह शब्द सुनकर ही मन प्रसन्न हो जाता है। यह एक खूबसूरत जीव है। बचपन में, आपने तितलियों का पीछा अवश्य किया होगा, सोचिए अगर तितलियां न होती तो क्या होता ? आपको बता दें कि स्वस्थ तितलियों की आबादी बेहतर पर्यावरणीय परिस्थितियों का संकेतक है। तितलियां परागण, खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हालांकि, प्रदूषण रोकने हेतु कीटनाशकों का उपयोग, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन तितलियों के अस्तित्व के लिए खतरा साबित हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के खाद्य एवं कृषि संगठन (Food and Agriculture Organization) का कहना है कि दुनिया की 75% कृषि के लिए परागण आवश्यक है, जो तितलियों से संभव है। आपको बता दें कि फूलों के परागण में तितलियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है कुछ फूल तो विशेष रूप से तितलियों द्वारा ही परागित होते हैं। तितलियां लंबी दूरी तय करने में सक्षम होती है और फूलों के पौधों में पराग को समान मात्रा में फैला देती है। भोजन की खोज करते समय तितलियां बड़े फूलों के मकरंद का सेवन करती है और तभी उनके पैरों और शरीर पर पराग इकट्ठा हो जाता है, तब वही पराग वह दूसरे फूलों में ले जाती है, जिससे अन्य फूल परागित हो जाते हैं। कई पौधों की प्रजातियां, जिनमें सेब से लेकर कॉफी तक शामिल है, परागण के लिए तितलियों पर निर्भर करती हैं। यदि धरती से तितलियां गायब हो जाती हैं, तो इसके परिणाम इनकी कृषि के प्रतिकूल होंगे, औरये प्रजातियां पुनरुत्पादन करने में असमर्थ हो जाएंगी। ‘प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ’ (International Union for Conservation of Nature (IUCN) द्वारा भारत में किए गए एक प्राणी सर्वेक्षण के अनुसार, अनुसार, देश में तितलियों की 1,318 प्रजातियाँ हैं, जिनमें से 35 प्रजातियाँ गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं। जैसा कि ऊपर बताया गया है कि तितलियों की आबादी पर मानव गतिविधि और जलवायु परिवर्तन का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है, लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है? क्या आप जानते हैं ? मानव निरंतर अपनी दिनचर्या में ऐसी गतिविधि कर रहे हैं जिससे तितलियों को क्षति पहुंच रही है। फसलों एवं फूलों की सुरक्षा के नाम पर कीटनाशक का प्रयोग, बढ़ता प्रदूषण एवं तस्करी इनके वजूद को खत्म कर रहा है। आए दिन हमें यह खबर सुनने को मिल ही जाती है कि देश-विदेश में तितलियों की तस्करी कर भारी दामों में बेचा जा रहा है। तितलियों को गहनों एवं सजावट के सामान के तौर पर, फोटो फ्रेम में बंद कर दीवारों पर सजाने के लिए एवं कानों में गहने की तरह इस्तेमाल करने के लिए पकड़ कर या मार कर तस्करी किया जाता है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) के अंतर्गत तितलियों को पकड़ना, मारना एवं इसकी तस्करी करना कानूनन जुर्म है। मानव गतिविधियों के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन भी तितलियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है एवं उनके आकार को कम करता है। शोधकर्ताओं ने एक लैब अध्ययन में ग्लोबल वॉर्मिंग जैसी परिस्थितियां उत्पन्न करके पता लगाया गया कि ग्लोबल वार्मिंग की अधिक या कम स्थिति में , प्रत्येक परिदृश्य के लिए तितलियां स्वयं को कैसे अनुकूलित करेंगी? दुर्भाग्य से, शोधकर्ताओं ने पाया कि वार्मिंग के कारण वातावरण जितना अधिक गर्महोगा , तितलियों का आकार उतना ही कम होता जाएगा । इसका मतलब यह है कि उनके पंख भी छोटे हो जाएंगे और छोटे पंख होने की वजह से ये तितलियां बड़ी दूरी तक उड़ान भरने में असमर्थ हो जाएंगी । यदि तितलियां आकार में छोटी हो जाएंगी, तो वे पर्याप्त मात्रा में फूलों के बीच पराग को फैलाने में असमर्थ हो जाएंगी, नतीजतन, भोजन की पैदावार कम होगी, और अंततः वैश्विक भोजन की कमी हो जाएगी । यह हमारे पारिस्थितिकी संतुलन के लिए खेद की बात है। बाग- बगीचे, खेत -खलिहान व घर- आंगन के पास लगे फूलों पर मंडराने वाली तितलियां अगर विलुप्त हो गई तो पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ जाएगा, साथ ही हम अपनी तितली जैसी विरासत को खो देंगे। तितलियां खास तरह के पौधों पर ही अंडे देती है इन कारणों से ही अगर तितलियों के वास स्थल समाप्त हो गए तो अंडे देने की प्रक्रिया बाधित हो जाएगी और इनका वजूद भी धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा।
हाइफ़ा की लड़ाई में भारतीय सैनिकों की वीरता और ऐतिहासिक योगदान
आज की तारीख में हम सभी भारत और इजरायल की गहरी मित्रता से परिचित हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस मित्रता की नीवं आज से कई दशक पूर्व पड़ चुकी थी? साल 1918 में भारतीय सैनिकों ने ओटोमन शासन (Ottoman Rule) से हाइफ़ा (इज़राइल का तीसरा सबसे बड़े शहर) की मुक्ति में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। हाइफ़ा, तेल अवीव (Tel Aviv) से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थित है।
ईसाइयों और यहूदियों जैसे अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा हाइफ़ा पर किये गए कब्जे ने तुर्की सुल्तानों के उत्पीड़न से मुक्ति का बिगुल फूंक दिया था। ब्रिटिश शासन के तहत, दोनों समुदायों (ईसाइयों और यहूदियों) के समग्र विकास में बड़ी कामयाबी हासिल हुई। भारतीयों द्वारा हाइफ़ा की फ़तेह का एक और फायदा “बहाई धर्म के आध्यात्मिक नेता अब्दुल बहा की मुक्ति” के रूप में भी मिला। दरअसल 1892 में बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह की मृत्यु के बाद, उनके बेटे, अब्दुल बहा ने नवोदित समुदाय का नेतृत्व संभाला। ईरान में स्थापित होने के बावजूद, बहाई धर्म का प्रशासनिक और आध्यात्मिक केंद्र, इजराइल के हाइफ़ा में माउंट कार्मेल (Mount Carmel In Haifa) पर स्थित है। अब्दुल बहा ने अपना अधिकांश जीवन हाइफ़ा में एक कैदी के रूप में ही बिताया। जैसे-जैसे प्रथम विश्व युद्ध निकट आया, वैसे-वैसे साठ साल के अब्दुल बहा को हाइफ़ा के तुर्क गवर्नर से धमकियाँ मिलने लगी। स्थिति इस हद तक बिगड़ गई कि अधिकारियों ने अब्दुल बहा को फाँसी देने और माउंट कार्मेल पर बहाई धर्मस्थलों को नष्ट करने की योजना बना दी। ये जगह बहाई आस्था के सबसे पवित्र स्थल मानी जाती है। सौभाग्य से, जनरल एलनबी (General Allenby) के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना, जिसमें दो भारतीय घुड़सवार ब्रिगेड भी शामिल थीं, को फिलिस्तीन में तुर्की और जर्मन सेना को हराने का काम सौंपा गया था। सितंबर 1918 में, जोधपुर लांसर्स (Jodhpur Lancers) और मैसूर लांसर्स (Mysore Lancers), शेरवुड फॉरेस्टर येओमेनरी (Sherwood Forester Yeomanry) समर्थित टुकड़ियाँ, हाइफ़ा और अब्दुल बहा के बचाव के लिए आगे आई। इसके बाद हुए एक साहसी युद्ध के दौरान जोधपुर लांसर्स ने माउंट कार्मेल की ढलानों पर हमला कर दिया, जबकि मैसूर लांसर्स के एक स्क्वाड्रन ने दक्षिण से हमला किया। 23 सितंबर, 1918 के दिन 15वीं (इंपीरियल सर्विस) कैवलरी ब्रिगेड, 5वीं कैवलरी डिवीजन और डेजर्ट माउंटेन कोर के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने हाइफ़ा के पास ओटोमन रियर गार्ड बलों (Ottoman rear guard) पर हमला किया। यह हमला शेरोन की लड़ाई के अंत में हुआ। ब्रिटिश साम्राज्य की पैदल सेना ने पहले ही ओटोमन मुख्यालय पर कब्जा कर लिया था, जिससे घुड़सवार सेना को उत्तर की ओर बढ़ने तथा ओटोमन पैदल सेना को घेरना आसान हो गया। 25 सितंबर तक, तुर्क सेना दमिश्क की ओर पीछे हट गई थी। लड़ाई की शुरुआत में ही कमांडिंग ऑफिसरों में से एक, कर्नल ठाकुर दलपत सिंह मारे गए। लेकिन इस झटके के बावजूद, लांसर्स अपने डिप्टी बहादुर अमन सिंह जोधा की कमान के तहत एकजुट हुए। भारी तोपखाने और मशीन-गन की आग का सामना करते हुए भी भारतीय घुड़सवार सेना आगे बढ़ी और उन्होंने हाइफ़ा के लिए जाने वाला मार्ग खोल दिया। मैसूर लांसर्स की एक टुकड़ी ने तुरंत अब्दुल बहा के घर को सुरक्षित कर लिया और बहाई तीर्थस्थलों को विनाश से बचा लिया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हाइफा की लड़ाई में भारतीय सैनिकों का प्रदर्शन असाधारण था जो कि भारतीयों के लिए भी लाभदायक साबित हुआ था। क्यूंकि इसके बाद ही ब्रिटिश शासित भारत में भी भारतीयों को अधिकारी बनने की अनुमति मिल गई। इससे पहले शाही अधिकारी यह मानते थे, कि “भारतीयों में कमीशन पदों के लिए आवश्यक नेतृत्व गुणों का अभाव होता है।” लेकिन इस युद्ध के तुरंत बाद, भारतीयों को सैंडहर्स्ट रॉयल मिलिट्री अकादमी (Sandhurst Royal Military Academy) में प्रवेश की अनुमति दी गई। इसके साथ ही संभावित सैंडहर्स्ट कैडेटों (Sandhurst Cadets) को प्रशिक्षित करने के लिए 1922 में प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल इंडियन मिलिट्री कॉलेज “Prince of Wales Royal Indian Military College” (अब देहरादून में राष्ट्रीय भारतीय मिलिट्री कॉलेज) की स्थापना की गई। इजरायल में, भारतीय सैनिकों के स्मारक हाइफ़ा, येरुशलम (Monument Haifa, Jerusalem) और रामले में मौजूद हैं। इजराइल के इन शहरों के कब्रिस्तानों में करीब 900 भारतीय सैनिकों को दफनाया गया है। हाइफ़ा की मुक्ति में भारतीय सैनिकों की बहादुरी और भूमिका के बारे में आज भी इज़रायली स्कूलों में इतिहास पाठ्यक्रम में इस बारे में पढ़ाया जाता है। हालांकि हमारा दुर्भाग्य है कि इस बारे में भारतीय इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में कहीं भी चर्चा नहीं की गई है। बड़े ही दुःख की बात है कि प्रथम विश्व युद्ध के मध्य पूर्वी क्षेत्र में भारतीय सैनिकों की वीरता और बलिदान के किस्से धीरे-धीरे लोगों के दिमाग से ही लुप्त हो रहे हैं। क्या आप जानते हैं कि, प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश भारतीय सेना,अपने लगभग दो मिलियन सैनिकों के साथ, इतिहास की सबसे बड़ी स्वयंसेवी सेना थी। लेकिन इतने बलिदानों के बावजूद, इन सैनिकों को अफ्रीकी और कैरेबियाई सैनिकों की "अदृश्य सेना" के हिस्से के रूप में संदर्भित किया जाता है। हाइफा की लड़ाई न केवल बहाई समुदाय के लिए बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए एक महत्वपूर्ण जीत मानी जा रही थी। इसने भारतीय सैनिकों के साहस और बलिदान को प्रदर्शित किया, जिन्होंने चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में बहादुरी से लड़ाई लड़ी। उनकी विरासत दुनिया भर के लोगों को प्रेरित करती रहती है। भारत और इजराइल के बीच संबंध इजरायल की आजादी के शुरुआती दिनों से ही मजबूत हैं। दोनों देशों ने रक्षा, आतंकवाद विरोधी और व्यापार सहित कई मुद्दों पर सहयोग किया है। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच रिश्ते और गहरे हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार इजराइल का दौरा कर चुके हैं और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) कई बार भारत का दौरा कर चुके हैं। दोनों देशों ने कई समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें एक रक्षा समझौता और कृषि में सहयोग पर एक समझौता शामिल है। वर्तमान में भारत में बहाई समुदाय के दो मिलियन से अधिक सदस्य रहते हैं। नई दिल्ली में स्थित “लोटस टेम्पल (Lotus Temple)” एक महत्वपूर्ण बहाई उपासना गृह है। इसे दिसंबर 1986 में समर्पित किया गया था, और यह अपनी सुंदर कमल जैसी आकृति के लिए जाना जाता है। लोटस टेम्पल सभी धर्मों के लोगों के लिए खुला है।
हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि: उत्पत्ति, विकास और विशेषताएं
हम जानते ही हैं कि, हमारे शहर जौनपुर की अधिकांश आबादी, हिंदी भाषा बोलती है। अपने प्रारंभिक रूप में, हिंदी भाषा, 7वीं शताब्दी में देखी जा सकती थी । यह संस्कृत और प्राकृत के क्रमिक रूप से, उत्पन्न हुई थी। कई सदियों पश्चात, उर्दू, फ़ारसी, अवधी आदि भाषाओं को मानकीकृत करने के बाद, हिंदी का झुकाव संस्कृत की ओर हुआ। इस प्रकार, हिंदी ने देवनागरी लिपि अपना ली। तो आइए, आज, हिंदी की उत्पत्ति के इतिहास के बारे में जानते हैं। फिर, हम, देवनागरी लिपि के बारे में, विस्तार से बात करेंगे। आगे, हम कुछ उदाहरणों की मदद से, यह समझने की कोशिश करेंगे कि, देवनागरी वर्णमाला कैसे काम करती है। अंत में, हम देवनागरी लिपि की कुछ विशिष्ट विशेषताओं पर भी चर्चा करेंगे। हिंदी भाषा, संस्कृत की प्रत्यक्ष वंशज है, और इसकी उत्पत्ति 769 ईसा पूर्व की है। समय के साथ, इस भाषा को प्रमुखता मिली, जिसे, शुरू में, पुरानी हिंदी के रूप में जाना जाता था। तब यह दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में, बोली जाती थी। यह दिल्ली की बोली का प्रारंभिक चरण था, जो आधुनिक हिंदी, और उर्दू दोनों के मूल रूप के तौर पर, कार्य करता था । भाषा का यह पहला संस्करण, देवनागरी लिपि में लिखा गया था। 8वीं और 10वीं शताब्दी के बीच(इस्लामी आक्रमणों और उत्तरी भारत में मुस्लिम नियंत्रण के गठन के दौरान), अफ़गानों, फ़ारसियों और तुर्कों ने, दिल्ली के आसपास की स्थानीय आबादी के साथ, बातचीत की साझा भाषा के रूप में, पुरानी हिंदी को अपनाया। समय के साथ, यह भाषा विकसित हुई, और इसमें अरबी और फ़ारसी के शब्दों को अपनाया गया। इस प्रकार, आज, वे हिंदी शब्दावली का लगभग 25% हिस्सा बनाते हैं! पहली भाषा के रूप में, हिंदी बोलना और सीखना 13वीं और 15वीं शताब्दी में लोकप्रिय था। लगभग, उसी समय, साहित्य में प्रारंभिक हिंदी लेखन सामने आया। हिंदी भाषा में लिखे गए, प्रसिद्ध साहित्य के उदाहरणों में, पृथ्वीराज रासो और अमीर खुसरो की रचनाएं शामिल हैं। भाषा के इस संस्करण को, पिछले कुछ वर्षों में, कई अलग-अलग नामों से जाना गया है, जिनमें हिंदी, हिंदुस्तानी, दहलवी और हिंदवी, या अधिक सरल रूप से – ‘भारत की भाषा’ शामिल हैं। इसके अलावा, देवनागरी लिपि, संस्कृत, प्राकृत, हिंदी, मराठी, कोंकणी और नेपाली भाषाओं को लिखने के लिए, इस्तेमाल की जाती है । यह, उत्तर भारतीय स्मारकीय लिपि – गुप्त और अंततः ब्राह्मी वर्णमाला से विकसित हुई है। यह लिपि, 7वीं शताब्दी ईस्वी से उपयोग में है, और 11वीं शताब्दी के बाद से, यह पूरी तरह विकसित हुई। देवनागरी लिपि में, अक्षरों के शीर्ष पर, लंबे क्षैतिज आघात की विशेषता है। साथ ही, देवनागरी लेखन प्रणाली, शब्दांश और वर्णमाला का एक संयोजन है। देवनागरी, स्वरों और व्यंजनों को, एक क्रम में व्यवस्थित करती है, जो मौखिक गुहिका के पीछे उच्चारित, ध्वनियों से शुरू होती है, और मुंह के सामने उत्पन्न होने वाली ध्वनियों तक जाती है। देवनागरी बाएं से दाएं लिखी जाती है, और संस्कृत के उच्चारण का बारीकी से अनुसरण करती है। लैटिन लिपि में, एक अक्षर, दूसरे अक्षर के ठीक बाद, बाएं से दाएं आता है। लेकिन, देवनागरी लिपि में, आमतौर पर, प्रतीकों को शब्दांशों में, वर्गीकृत किया जाता है। इस प्रकार, दे व ना ग री अक्षर, देवनागरी शब्द बनाता है । ऐसे प्रत्येक अक्षर में, अधिकतम एक स्वर होता है। और जहां संभव हो, अक्षरों का अंत, व्यंजन के साथ नहीं होना चाहिए। साधारणतः, व्यंजन के प्रतीकों में, उनके बाद, स्वर ध्वनि का उच्चारण होता है। जैसे कि – द व न ग र इसलिए, हमें आवश्यक, विशिष्ट ध्वनियों को व्यक्त करने के लिए, इन व्यंजनों में अतिरिक्त अंक जोड़ने होंगे: द → दे न→ न र → री, इत्यादि। अंत में, संस्कृत पाठ लिखते समय, पारंपरिक अभ्यास शब्दों को लगातार लिखना है, खासकर यदि शब्द व्यंजन के साथ समाप्त होते हैं: फलम् इच्छामि → फलमिच्छामि •स्वर: हम संस्कृत में, दीर्घ स्वर – ॡ को शामिल करते हैं, लेकिन, वास्तविक संस्कृत में, इसका कभी भी उपयोग नहीं किया जाता है। सामान्य तौर पर, लघु और दीर्घ स्वर, एक समान तरीके से लिखे जाते हैं: अ और ए, इ और ई, उ और ऊ, ऋ और ॠ, और ऌ और ॡ। ध्यान दें कि, प्रत्येक जोड़ी में, दूसरा प्रतीक, पहले प्रतीक में, कुछ चिह्न या अतिरिक्त विशेषता जोड़ता है। •व्यंजन: जब, हम संस्कृत को देवनागरी में लिखते हैं, तो सभी व्यंजन, स्वर, ‘अ’ के साथ उच्चारित होते हैं। इसलिए, प्रतीक – क, का उच्चारण हमेशा ही, ‘का’ के रूप में किया जाता है। इनमें से कुछ व्यंजनों को, पहली बार में, अलग पहचानना मुश्किल है। यहां, वे व्यंजन हैं, जिनके कारण आप आसानी से भ्रमित होते हैं: ख रव घ ध ङ ड देवनागरी लिपि की अनूठी विशेषताएं निम्नलिखित हैं: 1.) वर्णमाला संरचना: देवनागरी एक अबुगिडा लिपि है। इसका अर्थ है कि, यह एक ऐसी लेखन प्रणाली है, जहां व्यंजन, एक अंतर्निहित स्वर ध्वनि रखते हैं, और, स्वर ध्वनि को संशोधित करने के लिए, अतिरिक्त विशेषक चिह्नों का उपयोग किया जाता है। इस लिपि में, व्यंजन का प्रतिनिधित्व करने वाले मूल वर्णों का एक संघ और स्वर के विशेषक चिह्नों का एक अलग संघ होता है। 2.) स्वर: देवनागरी में छोटे स्वरों का प्रतिनिधित्व करने वाले मूल स्वर वर्णों का एक समूह है। दीर्घ स्वरों को, अक्सर ही, मूल स्वर वर्ण और विशेषक चिह्न के संयोजन का उपयोग करके दर्शाया जाता है। अनुनासिक स्वरों के लिए भी, विशेष वर्ण हैं, जो देवनागरी लिपि की एक अनूठी विशेषता है। 3.) व्यंजन: मूल व्यंजन वर्णों को, उनके उच्चारण के तरीके के आधार पर, समूहों में व्यवस्थित किया जाता है: आवाज रहित, ध्वनिहीन, अनुनासिक, आदि । प्रत्येक व्यंजन वर्ण, एक अंतर्निहित स्वर के साथ, एक व्यंजन ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है। 4.) विराम (हलंत): देवनागरी, एक व्यंजन में अंतर्निहित स्वर के दमन को इंगित करने के लिए, विराम का उपयोग करती है, जो एक क्षैतिज रेखा जैसा विशेषक चिह्न है। इसे “हलंत” कहा जाता है। हलंत का उपयोग, संयुक्त व्यंजन बनाने या अंतर्निहित स्वर ध्वनि के बिना व्यंजन का प्रतिनिधित्व करने के लिए किया जाता है। 5.) मात्रा (स्वर चिह्न): विशेषक चिह्न, जिन्हें ‘मंत्र’ कहा जाता है, का उपयोग, अंतर्निहित “ए” ध्वनि के अलावा, अन्य स्वर ध्वनियों को दर्शाने के लिए, किया जाता है। उन्हें व्यंजन वर्णों के ऊपर, नीचे, पहले या बाद में रखा जा सकता है। 6.) शीर्ष पर क्षैतिज रेखा (शिरोरेखा): देवनागरी की सबसे पहचानने योग्य विशेषताओं में से एक, अक्षरों के शीर्ष पर क्षैतिज रेखा है। इस पंक्ति को ‘शिरोरेखा’ के नाम से जाना जाता है, और यह लिपि की एक अनूठी विशेषता है। 7.) बाएं से दाएं दिशा: देवनागरी, अंग्रेज़ी और अधिकांश अन्य आधुनिक लिपियों की तरह, बाएं से दाएं लिखी जाती है।
संघर्ष से शिखर तक: श्रेया घोषाल की अद्भुत संगीत यात्रा
श्रेया घोषाल (जन्म 12 मार्च 1984) भारतीय संगीत की सबसे प्रमुख और प्रतिष्ठित पार्श्व गायिकाओं में से एक हैं, जिनका सफर बेहद प्रेरणादायक रहा है। उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा मात्र चार साल की उम्र में ही शुरू कर दी थी और छह वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पहली स्टेज प्रस्तुति दी थी। अपनी प्रतिभा का पहला बड़ा मान्यता उन्होंने “सा रे गा मा पा” (Sa Re Ga Ma Pa) जैसे प्रतिष्ठित संगीत प्रतियोगिता के माध्यम से पाया, जिससे उन्हें प्रसिद्ध निर्देशक संजय लीला भंसाली और संगीतकार इस्माइल दरबार ने 2002 की फिल्म देवदास में मौका दिया। इसी फिल्म के लिए गाए गए गीतों — जैसे “बैरी पिया” और “डोला रे डोला” — ने न सिर्फ उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई, बल्कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ प्लेबैक सिंगर के राष्ट्रीय और फिल्मफेयर जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार भी दिलाए। आज तक उन्होंने 400 से अधिक फिल्मों और कई भाषाओं में गीत रिकॉर्ड किए हैं, जिससे उनकी आवाज़ भारत की सांस्कृतिक विविधता और संगीत की व्यापकता दोनों का प्रतिनिधित्व करती है।
उनकी संगीत यात्रा सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रही; श्रेया घोषाल ने पार्श्व गायन के क्षेत्र में स्पॉटिफाई इक्वल ग्लोबल एंबेसडर (Spotify EQUAL Global Ambassador) जैसे वैश्विक मान्यता प्राप्त की है, और उनका संगीत विश्व भर के श्रोताओं तक पहुंचा है। उन्होंने सिडनी ओपेरा हाउस, रॉयल अल्बर्ट हॉल जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुति दी है और अमेरिका के डॉल्बी थिएटर में प्रदर्शन करने वाली पहली भारतीय कलाकार के रूप में भी अपना स्थान बनाया है। उल्लेखित वीडियो प्रस्तुतियों में उनकी आवाज़ की मधुरता, तकनीकी दक्षता और भावपूर्ण अभिव्यक्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जो आधुनिक भारत की भावनात्मक और सांस्कृतिक पहचान को परिभाषित करती है और दर्शाती है कि उनकी आवाज़ सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि लाखों लोगों की यादें और भावनाएं भी है।
हथकड़ी का इतिहास, आविष्कार और भारत में इसके उपयोग से जुड़े कानून और विवाद
यदि आप कभी भी जौनपुर की जिला कारागार (District Jail) के बाहर गए हों, तो जेल के बाहर कोर्ट में पेशी के लिए जाते कैदियों को आपने जरूर देखा होगा। इन कैदियों के जुर्म भले ही अलग-अलग हो लेकिन इनमें से सभी कैदियों या यूँ कहें कि पूरे देश के कैदियों में एक समानता दूर से ही नजर आ जाती है, और वह समानता है, “उनकी हथकड़ी"! आज हम पुलिसवालों और कैदियों को आपस में जोड़े रखने वाले इसी बंधन के रोमांचक और ऐतिहासिक सफर और भारत में इसे लगाने से जुड़े नियमों पर एक नजर डालेंगे। हथकड़ी (Handcuffs), खतरनाक या अनियंत्रित कैदियों को नियंत्रित करने के लिए, कानून प्रवर्तन और सुरक्षा कर्मियों द्वारा उपयोग किए जाने वाले सामान्य उपकरण होते हैं। पुलिस अधिकारी अपने काम में नियमित रूप से हथकड़ी का उपयोग करते हैं। दुनियाभर के देशों में हथकड़ी उपयोग सदियों से किया जा रहा है। लोग इनका उपयोग धातु के प्रयोग होने से भी पहले से करते आ रहे हैं। प्राचीन समय में लोग कभी-कभी रस्सी या जानवरों की खाल या किसी अन्य चीज़ का हथकड़ी के रूप उपयोग करते थे जो काफी मजबूत होती थी। हथकड़ी के बारे में पहली बार एक ग्रीक देवता प्रोटियस (Proteus) से जुड़े एक पुराने ग्रीक मिथक में सुनने को मिलता है। कहा जाता है कि वह बहुत सी गुप्त बातें जानता था, जिस कारण लोग उसका यह गुण उससे सीखना चाहते थे। लेकिन उसे अपने रहस्य साझा करना पसंद नहीं था, इसलिए जब भी कोई उससे पूछता तो वह अपना रूप बदल लेता और भाग जाता। एक दिन, अरिस्टियस (Aristius) नामक देवता प्रोटियस से यह जानना चाहता था कि उसकी मधुमक्खियां क्यों मर रही हैं? लेकिन चूंकि प्रोटियस बार-बार भाग जाता था इसलिए अरिस्टियस ने उसे पकड़ने के लिए मानव इतिहास में पहली बार हथकड़ी का उपयोग किया। उसने प्रोटियस को हथकड़ी लगा दी और इस प्रकार उसे अपना आकार बदलने और भागने से रोक दिया। माना जाता है कि आधुनिक हथकड़ी जैसी दिखने वाली, विश्व में पहली धातु की हथकड़ी, लोगों द्वारा कांस्य और लोहे का उपयोग करना सीखने के बाद बनाई गई थी। लेकिन इसे समायोजित करना बहुत मुश्किल काम साबित होता था, क्यों कि ये हथकड़ी अपराधियों की कलाइयों में या तो बहुत तंग या बहुत ढीली हो जाती थी, जिस कारण इसका इस्तेमाल करने में काफी परेशानी होती थी। इस समस्या का समाधान साल 1862 में जब डब्ल्यू.वी. एडम्स (W.V. Adams) ने खोज लिया, जिन्होंने विश्व की पहली ऐसी हथकड़ी बनाई जिसे विभिन्न कलाई के आकार में फिट करने के लिए समायोजित किया जा सकता था। इसके लिए उन्होंने हथकड़ी में रैचेट्स (Ratchets) जोड़ दिए, जो ऐसे हिस्से हैं जो एक दिशा में तो चल सकते हैं लेकिन दूसरी दिशा में नहीं। इसके कुछ साल बाद ऑरसन सी. फेल्प्स (Orson C. Phelps) नामक एक अन्य वैज्ञानिक ने, रैचेट के आकार को बदलकर इस डिजाइन में सुधार किया।
साल 1865 में एक अमेरिकी व्यापारी जॉन टावर (John Tower) ने एक कंपनी शुरू की, जो एडम्स और फेल्प्स के डिजाइन का उपयोग करके हथकड़ी बनाती थी। उन्होंने दो प्रकार (एक जंजीर वाली और दूसरी उनके बीच छल्ले वाली) की हथकड़ियां बनाईं। उन्होंने हथकड़ी खोलने के लिए चाबी लगाने का स्थान भी बगल से नीचे की तरफ कर दिया। साथ ही उन्होंने कलाई के चारों ओर जाने वाले हिस्से को चौकोर के बजाय गोल बना दिया। 1874 में उन्हें अपने इस गोल डिजाइन के लिए पेटेंट (Patent) भी प्राप्त हो गया। दरअसल “पेटेंट एक तरह का विशेष अधिकार होता, जो किसी नए उत्पाद या प्रक्रिया की खोज करने वाले आविष्कारक या खोजकर्ता को दिया जाता है। इस अधिकार के तहत केवल उस आविष्कारक को आम तौर पर 20 साल की अवधि के लिए उसके द्वारा खोजे गए उत्पाद को बनाने, उपयोग करने और बेचने की विशेष अनुमति दी जाती है।” दूसरे शब्दों में “पेटेंट ऐसा कानूनी अधिकार होता है, जो आविष्कारों को उनके उत्पादों को बिना उनकी अनुमति के दूसरों द्वारा चुराने, कॉपी (Copy) किए जाने या उपयोग किए जाने से बचाते हैं।” पेटेंट प्राप्त करने के लिए, आविष्कार के बारे में तकनीकी जानकारी को पेटेंट आवेदन में जनता के सामने प्रकट किया जाना चाहिए। पेटेंट हमारे रोजमर्रा के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
टॉवर ने 1879 में हथकड़ियों में एक और सुधार किया। उन्होंने उन्हें डबल-लॉकिंग (Double-Locking) बना दिया, यानी उनमें हथकड़ी को लॉक करने के एक के बजाय दो तरीके थे। इससे लोगों के लिए इन हथकड़ियों को स्वयं या किसी अन्य चीज़ से खोलना कठिन हो गया। डबल-लॉकिंग हथकड़ी में दो मोड (सिंगल-लॉक और डबल-लॉक (Single-Lock And Double-Lock) थे। आप चाबी को एक या दूसरे तरफ घुमाकर उनके बीच स्विच कर सकते हैं। 1912 में हथकड़ी और भी बेहतर हो गई, जब जॉर्ज कार्नी (George Carney) ने पहली स्विंग कफ (Swing Cuff) का आविष्कार किया। यह एक नया डिज़ाइन था जिसने कानून प्रवर्तन अधिकारियों के लिए केवल एक हाथ से लोगों को हथकड़ी लगाना आसान बना दिया। आज पीयरलेस हैंडकफ (Peerless Handcuffs) नामक एक कंपनी को हथकड़ी बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी माना जाता है। इसी कंपनी ने पहली बार स्विंग कफ को बेचना शुरू किया। तब से लेकर आज तक हथकड़ी की कार्यशैली और इसके रूप में कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा गया है।
हालाँकि, आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत में, हथकड़ी लगाना एक विवादास्पद मुद्दा रहा है, कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रथा किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। कानूनी ढांचा, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। इस अधिकार में आंदोलन की स्वतंत्रता और मनमानी हिरासत से सुरक्षा का अधिकार शामिल है। हालाँकि, दंड प्रक्रिया संहिता (Code Of Criminal Procedure) की धारा 46 किसी आरोपी व्यक्ति की गिरफ्तारी या उसके भागने को रोकने के लिए उचित बल के उपयोग की अनुमति देती है। हथकड़ी का उपयोग भी इस प्रावधान के अंतर्गत आता है, और यदि पुलिस आवश्यक समझे तो उनका उपयोग कर सकती है। हालांकि, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी हथकड़ी के उपयोग पर कुछ प्रतिबंध लगाए हैं। सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1978) के मामले में, अदालत ने कहा कि हथकड़ी के इस्तेमाल को पुलिस द्वारा उचित ठहराया जाना चाहिए और इसे सजा के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि अहिंसक अपराधों, महिलाओं और किशोरों में हथकड़ी का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। अदालत ने आगे कहा कि हथकड़ी का इस्तेमाल अंतिम उपाय होना चाहिए ।
अदालत ने अपने फैसले को मानवीय गरिमा के सिद्धांत पर आधारित किया, जो अनुच्छेद 21 में निहित है। अदालत ने कहा कि हथकड़ी लगाना एक "बर्बर प्रथा" है जो किसी व्यक्ति को "अपमानित” करती है। अदालत ने यह भी कहा कि हथकड़ी लगाना अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों, जैसे मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा और नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध के विपरीत है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद, भारत में हथकड़ी लगाने की प्रथा व्यापक रूप से बनी हुई है। 2010 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, हथकड़ी का उपयोग सबसे अधिक उत्तर प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर सहित कई राज्यों में किया जाता है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि पुलिस अक्सर सज़ा के तौर पर हथकड़ी का इस्तेमाल करती है और कुछ मामलों में, बंदियों को लंबे समय तक हथकड़ी में रखा जाता है, जिससे उन्हें शारीरिक और मनोवैज्ञानिक तौर पर आघात पहुचता है।
हथकड़ी लगाने के कारण मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़े कई मामले भी हमारे सामने आये हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में, एक महिला को तपेदिक के इलाज के दौरान अस्पताल के बिस्तर पर हथकड़ी लगा दी गई थी। बिहार में साइकिल चुराने के आरोप में एक व्यक्ति को तीन दिनों तक हथकड़ी लगाकर पेड़ से लटकाया गया। हथकड़ियों के दुरुपयोग के लिए कई कारक हैं, जिनमें पुलिस के बीच जागरूकता की कमी, जवाबदेही तंत्र की कमी, न्यायिक निरीक्षण की कमी और संयम के वैकल्पिक तरीकों की कमी भी शामिल है। प्रेम शंकर शुक्ला बनाम दिल्ली प्रशासन (1980) इस मामले में, अदालत ने माना कि हथकड़ी का उपयोग अनिवार्य नहीं है और इसे मामले-दर-मामले के आधार पर तय किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि हथकड़ी के इस्तेमाल को रिकॉर्ड किया जाना चाहिए और मजिस्ट्रेट (Magistrate) को रिपोर्ट किया जाना चाहिए। एक मामले में अदालत ने यह भी कहा कि हथकड़ी का उपयोग एक न्यायिक अधिकारी द्वारा अधिकृत होना चाहिए और न्यायिक समीक्षा के अधीन होना चाहिए।
लठमार होली की अनोखी परंपरा और उससे जुड़ी सांस्कृतिक विरासत
भारत अत्यंत सांस्कृतिक विविधता वाला देश है, और यही कारण है कि देश में विभिन्न धर्मों के विभिन्न त्यौहार देखने को मिलते हैं। प्रत्येक क्षेत्र में इन त्यौहार को मनाने की विधियां और परंपराएं भी अलग-अलग होती हैं। होली भी भारत का एक ऐसा ही अनूठा पर्व है, जिसे अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न परंपराओं के साथ मनाया जाता है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश की ‘लठमार’ होली अर्थात ऐसी होली जिसमें लाठियों का प्रयोग मारने के लिए किया जाता है। पूरे देश में यह एक बहुत दिलचस्प होली है, जिसे मथुरा में बड़े हर्ष-उल्लास के साथ मनाया जाता है। मथुरा और उसके आस-पास के इलाकों जैसे बरसाना और नंदगाँव में होली के कुछ दिन पहले से ही इस परंपरा को निभाया जाता है, जिसमें हर साल हजारों हिंदू और बाह्य पर्यटक भाग लेते हैं। लठमार होली के उत्सव के लिए उत्तर प्रदेश में मथुरा जिले के सभी हिस्सों से हजारों लोग बरसाना नामक गाँव में राधा रानी मंदिर आते हैं। राधा रानी मंदिर को भारत का इकलौता राधा मंदिर माना जाता है, जहां एक छोटे से अनुष्ठान समारोह के बाद, हर कोई मंदिर परिसर में और उसके सामने प्रसिद्ध संकीर्ण गली में इकट्ठा होता है, जिसे 'रंग रंगेली गली' (रंगीन गली) कहा जाता है।यह उत्सव महिलाओं द्वारा पुरुषों पर रंग लगाने के साथ शुरू होता है तथा यह सुनिश्चित किया जाता है कि कोई भी व्यक्ति बाहर न निकले। ग्रामीणों द्वारा लोकगीत गाए जाते हैं तथा महिलाओं द्वारा नृत्य भी किया जाता है। मिठाईयों की विभिन्न दुकानें भांग से बनी ठंडाई से सजी होती हैं, जिसका सेवन उत्सव में भाग लेने वाले अनेक लोगों द्वारा किया जाता है। उत्सव के दूसरे दिन, पुरुष फिर से बरसाना पहुंचते हैं, और इस बार वे गाँव की महिलाओं पर रंग लगाने की कोशिश करते हैं। इसके बाद महिलाएं अपनी-अपनी लाठियां लेती हैं और उन पुरुषों को पीटने की कोशिश करती हैं। अपने बचाव में पुरुष एक ढाल का प्रयोग करते हैं, जो पुरूष ऐसा नहीं कर पाते उन्हें महिलाओं के कपड़े पहनाए जाते हैं तथा सार्वजनिक रूप से नृत्य भी करवाया जाता है। मजेदार बात यह है कि ये सब क्रियाएं एक मजाक या मस्ती के तौर पर आयोजित की जाती हैं, इसका उद्देश्य किसी को हानि या ठेस पहुंचाना नहीं होता है। होली मनाने की इस परंपरा को सदियों से मथुरा में आयोजित किया जा रहा है।
इस परंपरा को निभाने के पीछे एक किवदंती छिपी हुई है, जिसके अनुसार इस दिन भगवान कृष्ण ने अपनी प्रिया राधा के गांव जाकर उन्हें व उनकी सहेलियों को चिढाया था। इसको अपमान मानते हुए बरसाना की महिलाओं ने उनका पीछा किया। ठीक इसी प्रकार हर साल उसी रूप से तालमेल बनाते हुए नंदगाँव के पुरुष बरसाना शहर आते हैं, जहां उनका अभिवादन वहां की महिलाओं द्वारा लाठियों से किया जाता है। महिलाएं पुरुषों पर लाठी चलाती हैं, तथा पुरूष ढाल से जितना हो सके बचने की कोशिश करते हैं। यह एक ऐसा अवसर है, जहाँ लंबे समय से चली आ रही परंपरा के रूप में भांग और दूध से बने पेय को परोसना पूरी तरह से स्वीकृत होता है। विभिन्न स्थानों पर होली की शाम को होलिका दहन का आयोजन किया जाता है।
"पंच डैगर्स" (Punch daggers) (जिसमें चाकू को पकड़ने की जगह और ब्लेड लंबवत होते हैं) की अवधारणा भारत के लिए अद्वितीय नहीं है, लेकिन कोई भी पंच डैगर अवधारणा या डिजाइन भारतीय कटार की तरह व्यापक और समृद्ध नहीं था। कटार की मुख्य विशेषता एच-आकारकी पकड़ (H-shaped grip) है, जो एक मजबूत पकड़ बनाता है और ब्लेड को उपयोगकर्ता की मुट्ठी के ऊपर रखता है।
इस तरह के हथियारों के पहले ज्ञात नमूने विजयनगर साम्राज्य के समय से प्राप्त हुए हैं, हालांकि इस बात के भी कुछ सबूत हैं, कि कटार का इस्तेमाल उससे पहले से किया जा रहा है। अधिक प्राचीन कटारों में ब्लेड के लिए उन डिज़ाइनों को शामिल किया गया था, जो पत्ती के आकार के थे, ताकि ब्लेड की नोक अन्य भागों की तुलना में मोटी हो जाए। इसके पीछे तर्क यह था कि हथियार को और अधिक मजबूत बनाया जाए और इसे चेन या युद्ध में पहने जाने वाले कवचों को तोड़ने में उपयोगी बनाया जाए। युद्ध में इसे एक प्रतिद्वंद्वी के कवच में बड़ी ताकत के साथ डाला जाता, जिससे आसानी से कटार कवच को तोड़ देती।
दुनिया का सबसे महंगा फूल और भारत की गुलाब खेती: खुशबू, विज्ञान और आय का संगम
2006 में चेल्सी फ्लावर शो (Chelsea Flower Show) में प्रदर्शित, जूलियट रोज (Juliet Rose) को 15.8 मिलियन डॉलर की भारी राशि में बेचा गया, जिसके बाद यह सबसे महंगा फूल बन गया, जूलियट रोज को उगाने में डेविस ऑस्टिन (Davis Austin) ने 15 साल निवेश किए। हमारे जौनपुर में इत्र बनाने के लिए बड़े पैमाने पर गुलाब की खेती की जाती है, यहां उत्पादित गुलाब को राज्य के अन्य जिलों और भारत के अन्य राज्यों में भी भेजा जाता है। भारत भर में गुलाब की विभिन्न किस्में उगाई जाती हैं। भारत में वर्गीकृत गुलाब की कुछ सबसे लोकप्रिय प्रजातियों इस प्रकार हैं:
1. हाइब्रिड टी गुलाब (Hybrid Tea Rose): यह सबसे लोकप्रिय किस्मों में से एक है, जो एक झाड़ीदार प्रकृति का है। इसके फूलों में लगभग 30-50 पंखुड़ियाँ होती हैं जो इसको एक बड़ा एवं सुंदर आकार देती हैं। यह सदाबहार गुलाब का एक संकर है। 2. ग्रैंडिफ्लोरा गुलाब (Grandiflora Rose) यह गुलाब फ्लोरिबुंडा गुलाब (Floribunda roses) और एचटी (HT) के बीच एक संकर है। इसके पौधे में एक ही तने पर फूलों का एक गुच्छा लगता है। इस गुलाब की खास बात इसके आकर्षक रंग पीले, नारंगी, लाल, गुलाबी और बैंगनी रंग हैं। 3. फ्लोरिबुंडा गुलाब (Floribunda Rose) यह गुलाब पॉलींथा गुलाब (Polyantha rose) और एचटी के बीच का एक संकर है। पौधे में पीले, सफेद, गुलाबी, बैंगनी और नारंगी रंग के सुंदर रंगों में बड़े फूलों के घने समूह होते हैं। यह गुलाब हेजेज (hedges) के लिए सबसे उपयुक्त है, क्योंकि यह कम उगने वाली झाड़ी है।
4.पॉलींथस गुलाब (Polyanthas Rose) इस गुलाब को कम रखरखाव की आवश्यकता होती है और यह रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता प्रदर्शित करता है। जब आप उन्हें हेजेज के साथ या गमलों की एक पंक्ति में उगाते हैं तो यह गुलाब बहुत ही मनोरम दृश्य प्रदान करता है। लाल, गुलाबी और सफेद रंग के शेड्स (shades) आपके बगीचे में एक परीकथा का नजारा बनाते हैं। 5.लता और रामबलर गुलाब (Climber and Rambler Rose) यह गुलाब बेल की तरह है, लेकिन वास्तव में बेल नहीं है। इसके लंबे, कड़े तने होते हैं जिन्हें समर्थन देकर आगे बढ़ाया जाता है। क्षैतिज प्रशिक्षण बेहतर तरीके से खिलने को प्रोत्साहित करता है। पौधे अपने बड़े फूलों से सभी को प्रसन्न करता है जो इसके बढ़ते मौसम के दौरान बार-बार आते हैं। 6.लैंडस्केप गुलाब (Landscape Rose) इस गुलाब के फूल साल भर खिलते हैं। यह व्यापक रूप से विस्तारित होते हैं। ये कम बढ़ते हैं और इन्हें कम रखरखाव की आवश्यकता होती है। उनके पुष्प पैटर्न दिलचस्प हैं, जो इसकी झाड़ी को एक करिश्माई रूप देते हैं।
7.झाड़ी गुलाब (Shrub Rose): यह गुलाब पारंपरिक और आधुनिक गुलाब की विशेषताओं को प्रदर्शित करता है। फूलों में दोहरी पंखुड़ियाँ होती हैं और वे एक-दूसरे से सटे हुए होते हैं, जिससे यह एक छोटी गोभी जैसा दिखता है। हरे और नीले रंग को छोड़कर यह इंद्रधनुष के सभी रंगों में उपलब्ध हैं। 8.बोर्बोन गुलाब (Bourbon Rose) यह गुलाब पुराने ब्लश चाइना रोज (old blush China rose) और जामदानी गुलाब (Damask rose) के बीच का संकर है। यह हल्दीघाटी और पुस्कर क्षेत्र में उगाया जाता है। इसकी सुखद सुगंध के कारण इस किस्म का उपयोग गुलाब के तेल के उत्पादन के लिए किया जाता है। फूल स्नो व्हाइट (snow white) या गहरे गुलाबी रंग के हो सकते हैं। यह गुलकंद बनाने के लिए अच्छा होता है। 9.जामदानी गुलाब यह गुलाब रोजा मोस्चाटा (Rosa moschata) और रोजा गैलिका (Rosa gallica) के बीच एक संकर है। इस किस्म के फूल गहरे गुलाबी से हल्के गुलाबी रंग के होते हैं। भारत में, इस किस्म का उपयोग "अत्तर" एक प्रकार का गुलाब का तेल, बनाने के लिए किया जाता है। इसकी पंखुड़ियां खाने योग्य होती हैं,इनका उपयोग हर्बल चाय बनाने, व्यंजनों को स्वाद देने या परिरक्षक गुलकंद बनाने के लिए किया जाता है। सीएसआईआर-आईएचबीटी(CSIR-IHBT)ने नई किस्में और तेल निष्कर्षण तकनीक विकसित की है।
10.अल्बा रोज़ (Alba Rose) यह गुलाब की सबसे पुरानी किस्मों में से एक है। इसका पौधा छायादार वातावरण का सामना कर सकता है और रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता प्रदर्शित करता है। फूल एक मीठी सुगंध के साथ एक सुंदर गुलाबी एवं सफेद रंग के होते हैं जो इंद्रियों को शांति प्रदान करते हैं। 11.कश्मीरी गुलाब: कटे हुए फूलों (सजावटी फूल) के लिए यह गुलाब बहुत अच्छा है। इसमें हल्की सुगंध और मनमोहक चमकीले लाल फूल हैं। विविधता में एचटी जैसा दिखता है। फूलों की पंखुड़ियां स्पर्श करने में मखमली नरम होती हैं और कटे हुए फूल के रूप में एक आदर्श उपहार के रूप में काम कर सकती हैं। 12.लघु गुलाब (Miniature Rose): छोटे गुलाबों की खेती इस तरह की जाती है कि वे आकार में छोटे रहते हैं। उनके तने छोटे होते हैं, लेकिन वे कठोर होते हैं और 2-3 सप्ताह तक लगातार खिलते हैं। वे बाड़ लगाने वाले पौधों और लटकते गमलों के लिए सबसे उपयुक्त हैं।
गुलाब की खेती के लिए आवश्यक कारक: मिट्टी और जलवायु: इसके लिए अच्छी तरह से सूखी रेतीली दोमट मिट्टी उपयुक्त है, जिसका पीएच 6-7 हो। गुलाब की खेती के लिए कम से कम 6 घंटे तेज धूप की आवश्यकता होती है। दिन का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस और रात का तापमान 15 डिग्री सेल्सियस आदर्श माना जाता है। इसे तमिलनाडु के मैदानी इलाकों में उगाया जा सकता है जहां इसके लिए इष्टतम जलवायु उपलब्ध है। प्रसार और रोपण: इसकी कटिंग को 2-3 कलियों के साथ आईबीए या आईएए (IBA or IAA)@ 500 पीपीएम में डुबोया जाता है। 45 सेमी x 45 सेमी x 45 सेमी के गड्ढे 2.0 x 1.0 मीटर की दूरी पर खोदे जाते हैं और रोपण से पहले प्रत्येक गड्ढे में 10 किग्रा गोबर की खाद डाली जाती है। सिंचाई: गुलाब के पौधे को मार्च से अक्टूबर तक हफ्ते में दो बार सिंचाई की आवश्यकता होती है।वर्षा ऋतु में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है।खेतों में व्यवस्थित जलनिकासी की व्यवस्था होनी चाहिए। ड्रिप सिंचाइ पद्धति इसके लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। खाद डालना: अक्टूबर में और फिर जुलाई में छंटाई के बाद 10 किलो एफवाईएम (FYM) और 6:12:12 ग्राम एनपीके (NPK) प्रति पौधा खाद देने की आवश्यकता होती है। सूक्ष्म पोषक: 20 ग्राम MnSO4 + 15 ग्राम MgSO4 + 10 ग्राम FeSO4 + 5 g B (मिश्रण का 2 ग्राम एक लीटर पानी में घोला जाता है) युक्त 0.2% सूक्ष्म पोषक मिश्रण का अनुप्रयोग चमकीले रंग के फूल पैदा कर सकते हैं। बायो फर्टिलाइजर (Biofertilizers) रोपण के समय प्रति हेक्टेयर 2 किलो एजोस्पिरिलम (azospirillum) और फास्फो बैक्टीरिया (phospho bacteria) को मिट्टी में मिलाएं। इसे 100 किलो गोबर की खाद में मिलाकर गड्ढों में डालें। छंटाई: छंटाई का सबसे अच्छा समय वह अवधि है जब गुलाब के पौधे की गतिविधि कम से कम होती है और पौधा सुप्त अवस्था में होता है। छंटाई के समय विशेष क्षेत्र की जलवायु परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। पिछले सीज़न की लंबी लंबी टहनियों को आधी लंबाई में काट देना चाहिए। सभी कमजोर, रोगग्रस्त, क्रॉस-क्रॉसिंग और अनुत्पादक अंकुर हटा देना चाहिए। कटे हुए सिरों को फाइटोलन पेस्ट (phytolon paste) + कार्बेरिल (carbaryl) 50 WP से सुरक्षित किया जाना चाहिए। फसल की कटाई: गुलाब की खेती में फूलों को तोड़ते वक्त याद रखें कि जब फूल की एक या दो पंखुडियां खिल जाए, तो फूल को पौधे से अलग कर दें। इसके लिए तेज़ धार वाले चाक़ू या ब्लेड का इस्तेमाल करें। फूल को काटने के तुरंत बाद पानी से भरे बर्तन में रख दें। अब उसे कोल्ड स्टोरेज(cold storage) में रख दें। इसका तापमान करीब 2 से 10 डिग्री तक होना चाहिए। इसके बाद फूलों की ग्रेडिंग की जाती है, जिसे कोल्ड स्टोरेज में ही पूर्ण किया जाता है। इसी को फूलों की छटाई भी कहा जाता है। भारत में गुलाब की खेती किसानों के लिए सबसे लाभदायक व्यवसाय है। यहां कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, प।बं, जम्मू कशमीर, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश गुलाब की खेती करने वाले प्रमुख राज्य हैं।
प्रति ऐकड़ भूमि पर गुलाब की खेती की लागत एवं लाभ कुछ इस प्रकार है: भूमि का किराया: 2,00,000 वार्षिक भूमि की तैयारी: 20,000 फसल उत्पादन सामाग्री: 80,000 उर्वरक एवं खाद: 20,000 पौधों के रखरखाव: 15,000 सिंचाई लागत: 50,000 श्रमिक लागत: 60,000 अन्य लागत: 20,000 पैकेजिंग उत्पाद: 15,000 कुल लागत: 3,80,000 यदि किसान अपनी फसल को फूलों के एजेंट को बैचता है तो प्रत्येक फूल की कीमत 3 रूपय होगी, जो कि पूर्णत: चुने गए फूल की किस्म पर निर्भर करता है। अत: आय लगभग 1,50,000*3=4,50,000. लाभ=आय-लागत=4,50,000-3,80,000=70,000. प्रति एकड़ में 70 हजार का लाभ होगा। गुलाब की खेती की आय मृदा, मौसम, किस्म, उर्वरक, ऋतु, बाजार की मांग, उत्पादन विधि पर निर्भर करता है। गुलाब की कीमत बाजार क्षेत्र के अनुसार बदलती रहती है।
धरती की रक्षा बिना हथियार: जौनपुर के खेतों में जीव-जगत का गुप्त योगदान
जौनपुरवासियों, हमारे चारों ओर फैले खेत, बाग़-बग़ीचे, नहरें और गाँव केवल मानव जीवन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक ऐसा संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र है, जिसे हम अनेक अन्य जीवों के साथ साझा करते हैं। इन्हीं जीवों में सांप भी शामिल हैं, जिन्हें अक्सर डर, अज्ञान और भ्रांतियों की नज़र से देखा जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि जौनपुर जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में सांप भारतीय कृषि व्यवस्था, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में एक मौन लेकिन बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज के दौर में, जब खेती, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण एक साथ कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, तब सांपों के वास्तविक महत्व को समझना और उन्हें प्रकृति के सहयोगी के रूप में देखना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।
आइए समझते हैं कि, सांप कृषि के लिए कैसे फायदेमंद होते हैं। हमारे शहर में, रैट स्नेक, अजगर, कोबरा, स्पेक्टाकल्ड कोबरा और कॉमन क्रेट, जैसे विभिन्न प्रकार के सांप पाए जाते हैं। ये सांप कृषि के लिए उपयोगी हैं, क्योंकि, ये फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले चूहों की आबादी को नियंत्रित करते हैं। सांप कीटों को भी खाते हैं, जिससे, फसलों की रक्षा होती है। हालांकि, कई क्षेत्रों में सांपों को मार दिया जाता है, क्योंकि, लोग सोचते हैं कि वे मनुष्यों के लिए हानिकारक हैं। परंतु, केवल 25% सांप ही जहरीले होते हैं, और मनुष्यों के लिए ख़तरा पैदा कर सकते हैं। सांप हमारे पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, और आर्थिक और चिकित्सीय लाभ प्रदान करते हैं। स्वस्थ समाज बनाने के लिए, जैव विविधता में सांपों के महत्व को जानना अतः आवश्यक है।
भारत के अधिकांश क्षेत्रों में, रैट स्नेक (Rat snakes) सबसे आम सांप हैं। एक वयस्क रैट सांप की लंबाई, लगभग तीन मीटर से अधिक होती है। आपको, यह देखकर अक्सर ही आश्चर्य होता होगा कि, किसी सांप ने रेंगते हुए पूरी सड़क की चौड़ाई को नाप लिया हैं। इस सांप की अन्य अनूठी विशेषता, इसकी बड़ी आंखें हैं, जो इसके सिर की चौड़ाई तक फैली हुई होती हैं। उनके भीतर एक अद्भुत चमक के साथ, गोल व काली पुतलियां होती हैं। इसके होठों पर चित्रित ऊबड़-खाबड़ काली रेखाओं पर भी हमारा ध्यान जाता हैं। दरअसल, सांपों को मोटे तौर पर, ‘जहरीले’ और ‘गैर-जहरीले’ श्रेणी में वर्गीकृत किया जा सकता है। हालांकि, कहा जाता है कि, दुनिया भर में सांपों की लगभग 3,500 प्रजातियां पाई जाती हैं। लेकिन, उनमें से बमुश्किल लगभग 25% प्रजातियां ही जहरीली होती हैं।
विषैले सांपों में किंग कोबरा (ओफियोफैगस हन्ना – Ophiophagus Hannah) सबसे घातक है। यह अधिकतर पहाड़ी इलाकों तक ही सीमित है। यह एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगा सकता है, और अपना जहर हवा में छोड़ सकता है। अगर किसी व्यक्ति की आंखों में, किंग कोबरा का जहर चला जाए, तो वह अंधा भी हो सकता है। वे आम तौर पर मानव निवास से बचते हैं। परंतु, यह केवल मनुष्य ही हैं, जो शहरों और कस्बों के विस्तार के साथ-साथ सांपों के आवासों पर आक्रमण करते हैं, और सरीसृपों को दोष देते हैं।
जबकि, कोबरा (नाजा नाजा – Naja Naja) मानव बस्तियों के पास रहता है। वे धान के खेतों में मौजूद चूहों को खाते हैं, और उनकी फसल बचाते हैं। अन्य जहरीले सांपों में, वाइपर (Viper) शामिल है, जिसके, शरीर पर अंडाकार या हीरे के आकार के धब्बे होते हैं। इसका जहर रक्त के थक्के और मांसपेशियों के क्षय का कारण बन सकता है। एक तरफ़, क्रेट (Krait), क्षैतिज सफेद या पीली धारी वाला एक अन्य जहरीला सांप है। क्रेट कीड़ों को खाते हैं, और कीटों को नियंत्रित करते हैं।
वास्तव में, सांप देवता के रूप में भी, विभिन्न संस्कृतियों में पूजनीय हैं। उन्हें प्रजनन क्षमता, पुनर्जन्म, चिकित्सा, उपचार और समृद्धि के प्रतीक के रूप में जाना जाता हैं। विरोधाभासी रूप से, ओफिडियोफोबिया (Ophidiophobia) अर्थात, सांपों का डर, जानवरों के सबसे आम भय में से एक है। यह 2-3% मानव आबादी को प्रभावित करता है। इसलिए, सर्पदंश के डर से अक्सर सांपों को देखते ही मार दिया जाता है।
हालांकि, दुनिया भर में सांपों की लगभग 85-90% प्रजातियां गैर-जहरीली हैं। अधिकांश सांप स्वभाव से आक्रामक नहीं होते हैं, और अक्सर खुद के बचाव में या धमकी दिए जाने या उकसाए जाने पर काटते हैं। सांपों को मारना समस्याग्रस्त है। क्योंकि, उनकी घटती आबादी न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि मनुष्यों के लिए भी हानिकारक है।
शिकारी के रूप में सांप, मेंढकों, कीड़ों, चूहों और अन्य कृंतकों को खाते हैं, जिससे उनकी आबादी को नियंत्रण में रखने में मदद मिलती है। सांपों को अन्य प्रजातियां भी खाती हैं, इस प्रकार वे शिकार के रूप में खाद्य-श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
‘पारिस्थितिकी तंत्र-अभियंता’ के रूप में, सांप ‘द्वितीयक बीज फैलाव’ की सुविधा प्रदान करते हुए, पौधों के प्रजनन में योगदान देते हैं। जब सांप कृंतकों (जो बीज खाते हैं) को निगलते हैं, तो उनके मल के माध्यम से बीज उत्सर्जन होता हैं। इस प्रकार, बीज पर्यावरण में अक्षुण्ण तरीके से निष्कासित हो जाते हैं।
सांप बीमारियों की रोकथाम में भी भूमिका निभाते हैं, और कृषि समुदायों को लाभ पहुंचाते हैं। कृंतक कई पशुजन्य रोगों के वाहक होते हैं, जो मनुष्यों, कुत्तों, मवेशियों, भेड़ और अन्य घरेलू जानवरों को प्रभावित करते हैं। कृंतकों की आबादी में अचानक वृद्धि से, पशुजन्य रोगों का प्रकोप हो सकता है। उनकी अधिक आबादी फसलों को भी प्रभावित कर सकती है। अतः कृंतकों को खाकर, सांप कृंतकों की आबादी को नियंत्रण में रखते हैं, इस प्रकार पशुजन्य रोग के संचरण को रोकते हैं, और खाद्य सुरक्षा में योगदान करते हैं।
सांप कई औषधियों का भी स्रोत होते हैं। सर्पदंश के लिए एकमात्र सिद्ध और प्रभावी उपचार - सांप-विरोधी जहर या एंटी वेनम (Anti venom) भी सांपों के जहर से प्राप्त होता है। सांप के जहर का, विरोधी - जहर उत्पादन से परे चिकित्सीय महत्व है। उनसे प्राप्त कई दवाओं का उपयोग नैदानिक अभ्यास में किया जाता है।
एक तरफ, हमारे गंगा नदी के क्षेत्र में, निम्नलिखित मुख्य सांप पाए जाते हैं।
सूशी का बढ़ता चलन और समुद्री मछलियों के अस्तित्व पर गहराता संकट
जौनपुरवासियों, आज की तेज़ी से बदलती जीवनशैली में हमारे खान-पान के तरीके भी तेजी से बदल रहे हैं। कभी जो विदेशी व्यंजन केवल बड़े होटलों तक सीमित थे, आज वे ऑनलाइन डिलीवरी ऐप्स और कैफे संस्कृति के ज़रिये जौनपुर जैसे शहरों तक पहुँच चुके हैं। इन्हीं में से एक है जापानी व्यंजन सूशी, जो अब केवल लग्ज़री नहीं बल्कि ट्रेंडिंग फ़ास्ट फ़ूड बन चुका है। युवा पीढ़ी से लेकर फूड लवर्स तक, हर कोई इसके स्वाद और प्रेज़ेंटेशन का दीवाना होता जा रहा है। लेकिन इसके साथ एक गंभीर सवाल भी जुड़ा है — क्या सूशी की बढ़ती लोकप्रियता समुद्री मछलियों को विलुप्ति की ओर तो नहीं ले जा रही? यह लेख इसी स्वाद और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को समझाने का प्रयास करता है। आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2019 से सूशी (Sushi) के ऑर्डर (order) में करीब 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। गुवाहाटी और लुधियाना जैसे छोटे शहरों से भी इसकी काफी मांग दर्ज की गई है। जापानी व्यंजन सूशी को, चावल, जिन्हें वेजीटेबल (Vegetable), सैल्मन और टूना मछली (salmon and tuna) और फलों के साथ भी परोसा जाता है, भारत में इसके काफी प्रशंसक है, विशेष रूप से दिल्ली में, और हाल ही में एक ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म स्विगी (Swiggy) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण ने इसकी पुष्टि की है। सूशी के विकास का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसकी शुरुआत प्राचीन चीन (china) से हुई थी। मछली को लम्बे समय तक संरक्षित रखने के लिए सूशी के प्रारंभिक स्वरूप का जन्म हुआ। मछली को ताजा रखने के लिए, इसे चावल के साथ किण्वित किया जाता था और बाद में चावल को त्याग दिया गया और मछली का सेवन कर लिया जाता। इस प्रकिया ने जापान में भी अपना रास्ता बना लिया, जहां लोगों ने मछली के साथ चावल खाना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे कुछ संशोधनों के साथ सूशी का जन्म हुआ। यह जल्द ही जापानियों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गया और उन्होंने इसे एकदम सही बनाने के लिए सीज़निंग और सिरके (seasonings and vinegar) के साथ इसे पकाना शुरू कर दिया। सूशी व्यापक रूप से खाए जाने वाले फास्ट फूड के रूप में उभरी जो जापानी संस्कृति और परंपरा से दृढ़ता से जुड़ा हुआ है। अब, आधुनिक समय में, सूशी एक विश्व स्तर पर पसंद किया जाने वाला फास्ट फूड बन गया है, जिसे दुनिया भर में विभिन्न लोगों द्वारा अलग-अलग तरीके से खाया जाता है। वर्तमान में भारत में भी सूशी काफी लोकप्रिय है, परन्तु पहले भारतीयों के लिए यह इतनी स्वादिष्ट या सुलभ नहीं थी, जिसे ज्यादातर महंगे पांच सितारा होटलों में ही परोसा जाता था। हालांकि, बदलते समय में जापानी व्यंजनों की लोकप्रियता में वृद्धि के साथ सूशी में भी कई बदलाव हुए, विशेष रूप से शाकाहारी लोगों के लिए विभिन्न सामग्रियों के साथ सूशी की शुरूआत हुई, कई बदलाव भारतीयों के स्वाद अनुसार किये गए जिससे भारतीयों के बीच इस जापानी व्यंजन ने अपनी एक ख़ास जगह बना ली। वर्तमान समय में भारत में आपको होटलो के मेन्यू में 15 तरह की सूशी देखने को मिल जाएंगी जिन्हे भारतीय स्वाद को ध्यान में रखते हुए विभिन्न सामग्रियों और टॉपिंग के साथ नए प्रकार से बनाया जाता है। भारत में सूशी की खपत और दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में बहुत अलग है, क्योंकि अच्छी गुणवत्ता वाली सूशी को उच्च कीमत के साथ जोड़ा जाता है। दुनिया भर में सूशी महंगी है जिसके तीन मुख्य कारण है: पहला, उत्पाद की गुणवत्ता; दूसरा, शेफ (chef) के कौशल का स्तर और तीसरा, मछली जिसे कम तापमान में रखने के लिए आवश्यक उपकरणों को खरीदने और चलाने में पैसा लगता है। जापान विदेश व्यापार संगठन की रिपोर्ट कहती है कि भारत में लगभग 100 रेस्तरां (restaurant) हैं जो मुख्य रूप से जापानी व्यंजन परोसते हैं। आप जानते हैं कि नई दिल्ली में “टोक्यो”, भारत का पहला जापानी रेस्तरां था? यह 1989 में भारत पर्यटन विकास निगम की मदद से भारत में जापानी व्यंजनों के लिए खोला गया था। हालांकि, ताजी मछली और मुख्य सामग्री की कमी की शिकायतों के कारण इसे बंद कर दिया गया। “सकुरा”, वर्ष 2000 में कनॉट प्लेस के मेट्रोपॉलिटन में खुलने वाला अगला होटल था। इसके बाद तो जैसे झड़ी ही लग गई जापानी रेस्तरां की! मुंबई में त्सुबाकी (Tsubaki), ताकी- ताकी (Taki-Taki), वाकाई(Wakai); नई दिल्ली में हाराजुकु कैफे (Harajuku Cafe) और मेन्शो टोक्यो (Mensho Tokyo), गोवा में मकुत्सु (Makutsu), इज़ुमी (Izumi’s) और कोफुकु का नया आउटलेट (Kofuku’s new outlet); और चेन्नई में ओयामा (Oyama), कुछ नाम जो शीर्ष पर है और ये एक वर्ष के भीतर ही बने हैं। वर्तमान में जापानी रेस्तरां भी शाकाहारियों के लिए सूशी परोसते हैं, अब यह व्यंजन सभी का पसंदीदा बन गया है। यह रेस्तरां उन लोगों के स्वाद का भी ध्यान रखते हैं जो कच्चा मांस पसंद नहीं करते हैं। सैल्मन का उपयोग न केवल सूशी बल्कि कई व्यजनों में किया जा रहा है। अब 'अमृतसारी तवा सैल्मन' और 'बंगाली दही सरसों सामन' जैसे भारतीय संस्करणों में उत्तरी अटलांटिक (North Atlantic) और प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की सहायक नदियों के मूल निवासी सैल्मन का स्वाद ले सकते हैं। 2015 में सैल्मन की भारतीय खपत लगभग 450 टन थी, परन्तु यह धीरे-धीरे बढ़ रही है, देश में हर साल लगभग 9.2 मिलियन टन समुद्री भोजन की खपत होती है, जिसमें से आधा हिस्सा हिंद महासागर से आता है और शेष ताजे पानी के जलीय कृषि से आता है। भारत में आयातित समुद्री भोजन की दीर्घकालिक संभावना है। हालांकि, भारत में सैल्मन के बारे में किसी को भी कोई ख़ास जानकारी नहीं है फिर भी ये मछली यहाँ बड़े चाव\खाई जाती है, यह ठंडे पानी की मछली है जो समुद्र के पानी में 4 से 15 डिग्री सेल्सियस के बीच रहती है। इसलिए, अधिकांश सैल्मन फार्म उत्तरी गोलार्ध में हैं। इस मछली को खाने से रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद मिल सकती है। इसमें मौजूद फैटी एसिड हृदय के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होते है। इन्ही लाभों के कारण इसकी मांग साल दरसाल बढ़ती ही जा रही है। उत्तरी अमेरिका (North America), यूरोप (Europe) और एशिया (Asia) में सूशी और डिब्बाबंद टूना मछली की मांग से हिंद महासागर में तेजी से येलोफिन (yellowfin) टूना खत्म हो रही है। पर्यावरणविदों का कहना है कि अधिक मछली पकड़ने से टूना के विलुप्त होने का खतरा है। इनकी आबादी इतनी कम हो गई है की प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (The International Union for Conservation of Nature) की "लाल सूची" में इसकी कई प्रजातियों को रखा गया हैं। मछलियों को प्रजनन करने से पहले ही मार या पकड़ लिया जाता है, जिसका अर्थ है कि वे विलुप्त होने की ओर बढ़ रहे हैं। लंदन स्थित ब्लू मरीन फाउंडेशन (Blue Marine Foundation-BLUE) एडवोकेसी ग्रुप (advocacy group) के अनुसार, इन मछलियों को वैश्विक स्तर पर लगभग 450,000 मीट्रिक टन के करीब सालाना पकड़ा जाता है। फ्रांसीसी (French) और स्पैनिश (Spanish) भी मछली पकड़ने के बेड़े में "पर्स सीन" (purse seine) जैसे औद्योगिक तरीकों का उपयोग करते हुए विशाल जाल के साथ अधिकांश मछली लेते हैं, जो अक्सर किशोर पीले फिन का शिकार करते हैं। मछली पकड़ना समुद्री जीवों के आबादी में गिरावट लाने का एक महत्वपूर्ण कारण है। मछली की शिकार करना कोई बुरी बात नहीं है, पर यह जब बड़े बड़े जहाजों द्वारा तेजी से पकड़ी जाती है, तो इसे ओवेर फिशिंग (Over Fishing) कहा जाता है। अरबों लोग प्रोटीन के लिए मछली पर निर्भर होते है। मछली पकड़ना मुख्य रूप से लोगों का व्ययसाय होता है और लाखो लोगों का यह आजीविका का साधन है। ओवेर फिशिंग मतलब एक हद से ज्यादा मछली को पकड़ना है। इससे प्रजनन करने वाली आबादी ठीक होने के लिए बहुत कम हो जाती है। इसके लिए ख़राब मत्स्य प्रबंधन, मछली पकड़ने की अस्थिरता, आर्थिक जरूरतों के साथ-साथ अवैधता को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। इसके प्रभावों में समुद्री जीवन असंतुलन, आय की हानि, और लुप्तप्राय समुद्री प्रजातियों की कटाई शामिल है, और यह दुनिया के महासागर और समुद्री जीवन को अनकहा नुकसान पहुंचा रहा है।
मिट्टी के तेल की रोशनी: केरोसिन का आविष्कार, वैश्विक यात्रा और भारत में बदलती भूमिका
दैनिक जीवन के विभिन्न कार्यों को करने के लिए हमें ऊर्जा की आवश्यकता होती है। विद्युत ऊर्जा और ईंधन ऊर्जा हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, जो हमें विभिन्न नवीकरणीय और गैर नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त होती है। वर्तमान समय में इनके बिना जीवन की कल्पना करना असंभव प्रतीत होता है। एक समय ऐसा था जब विद्युत ऊर्जा या ईंधन ऊर्जा के लिए मनुष्य मिट्टी के तेल अर्थात केरोसिन (Kerosene) पर निर्भर था। तो आइए, आज इस लेख के जरिए केरोसिन के आविष्कार तथा इसकी उपयोगिता के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। मिट्टी का तेल अर्थात केरोसिन, जिसे पैराफिन (Paraffin) के नाम से भी जाना जाता है, एक दहनशील हाइड्रोकार्बन तरल (hydrocarbon liquid) है, जिसे पेट्रोलियम (Petroleum) से प्राप्त किया जाता है। केरोसिन का उपयोग हवा में उड़ने वाले विमानों के साथ-साथ घरों में ईंधन के रूप में व्यापक रूप से किया जाता है। केरोसिन शब्द “ग्रीक” (Greek) भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है "मोम”। केरोसिन शब्द का उपयोग अर्जेंटीना (Argentina), ऑस्ट्रेलिया (Australia), कनाडा (Canada), भारत, न्यूजीलैंड (New Zealand), नाइजीरिया (Nigeria) और संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) के अधिकांश हिस्सों में किया जाता है, जबकि चिली (Chile), पूर्वी अफ्रीका (Eastern Africa), दक्षिण अफ़्रीका (South Africa), नॉर्वे (Norway) और यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) में केरोसिन को पैराफिन के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा एशिया (Asia) और दक्षिणपूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिकांश हिस्सों में केरोसिन को लैंप ऑयल (Lamp Oil) के नाम से जाना जाता है। केरोसिन के बारे में एक अवधारणा है कि यह पेट्रोलियम से प्राप्त होता है किंतु सबसे पहले केरोसिन का आविष्कार पेट्रोलियम से नहीं, बल्कि कोयले का आसवन करके किया गया था तथा इसका पहला बड़ा अनुप्रयोग खाना पकाने के ईंधन के रूप में नहीं, बल्कि लैंप जलाने के लिए (बिजली के आविष्कार से पहले) किया गया।
तेल के लैंप का उपयोग सदियों से किया जाता रहा है, सबसे पहले खोजे गए लैंप 9वीं शताब्दी के फारस (Persia) के हैं। ऐतिहासिक रूप से ये लैंप वनस्पति तेल, मनुष्य या पशु वसा से जलाए जाते थे। 1700 और 1800 के दशक की शुरुआत में, लैंप जलाने के लिए व्हेल के तेल का उपयोग किया जाता था । लेकिन फिर 1846 में जब कनाडा (Canada) के प्रसिद्ध भूविज्ञानी और आविष्कारक अब्राहम गेस्नर (Abraham Gesner) बिटुमिनस कोयले (Bituminous coal) और तेल शेल (Oil shale) का आसवन कर रहे थे, तब उन्हें एक महत्वपूर्ण पदार्थ प्राप्त हुआ जिसे केरोसिन नाम दिया गया। केरोसिन पारंपरिक तेल के लैंप को रोशन करने के लिए इस्तेमाल होने पर एक चमकदार लौ पैदा करता था जिससे इसका उपयोग व्यापक हो गया। केरोसिन के आविष्कार के बाद 1854 में इसका व्यावसायिक उत्पादन शुरू हुआ। इसका उपयोग व्यापक रूप से विमान के जेट इंजनों और कुछ रॉकेट इंजनों को रॉकेट प्रोपेलेंट-1 या रिफाइंड पेट्रोलियम-1 (Rocket Propellant-1 or Refined Petroleum-1 (RP-1) के रूप में ऊर्जा देने के लिए किया जाता है। इसके अलावा इसका उपयोग आमतौर पर खाना पकाने के लिए और प्रकाश ईंधन के रूप में भी किया जाता है। एशिया के कुछ हिस्सों में केरोसिन का उपयोग छोटी आउटबोर्ड मोटरों (Outboard motors) या मोटरसाइकिलों के लिए ईंधन के रूप में किया जाता है। ऐसा अनुमान है कि पूरे विश्व में विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रति दिन लगभग 1,110,000 घन मीटर केरोसिन का उपयोग होता है। केरोसिन की खोज के बाद कई दैनिक गतिविधियां बहुत आसान बन गईं। उद्योगों और घरों में इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाने लगा। विभिन्न उद्योग बिजली पैदा करने और ईंधन के रूप में केरोसिन का उपयोग करने लगे तथा लोगों ने दीयों या लैंपों को जलाने और खाना पकाने के लिए केरोसिन का उपयोग शुरू कर दिया। प्रारंभ में केरोसिन बहुत महंगा था, लेकिन जब शोध से पता चला कि केरोसिन को पेट्रोलियम से भी परिष्कृत किया जा सकता है, तो केरोसिन के उपयोग में वृद्धि होने लगी। ऐसा अनुमान है कि 1860 तक अमेरिका में केरोसिन का उत्पादन करने वाली रिफाइनरियों की संख्या 30 के आस-पास हो गई । जिससे धीरे-धीरे केरोसिन के दाम में गिरावट होने लगे । 1850 के दशक के उत्तरार्ध में केरोसिन से जलने वाले लैंपों की मांग में अत्यधिक बढ़ोतरी हुई। 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के दौरान केरोसिन की सहायता से जलने वाले लैंपों का उपयोग घर, खुदरा प्रतिष्ठान, चिकित्सा कार्यालय, अस्पताल, कारखानें इत्यादि लगभग हर जगह किया जाने लगा। एक समय तो ऐसा भी था जब शहरों की कानून व्यवस्था की देखभाल करने वाली पुलिस भी प्रकाश व्यवस्था के लिए पूरी तरह से केरोसिन पर निर्भर थी। इसके अलावा ट्रेनों के लिए इनडोर लाइटिंग (Indoor lighting), हेडलैम्प्स (Headlamps) और सिग्नलिंग उपकरणों (Signaling devices) में भी केरोसिन का उपयोग किया जाने लगा। केरोसिन का आविष्कार कृषि में भी सहायक बना क्योंकि अब किसान घंटों तक अपने खेतों में काम कर सकते थे, परिणामस्वरूप उनकी उपज में वृद्धि हुई। विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी केरोसिन का उपयोग किया जाने लगा, यहां तक कि सिर के जूँ को मारने के लिए भी केरोसिन उपयोगी हो गया। 1879 में एक विश्वसनीय, व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य इलेक्ट्रिक लाइट बल्ब के आविष्कार के साथ केरोसिन से जलने वाले लैंपों या दीयों के उपयोग में गिरावट आने लगी। हालांकि, 1940 के दशक तक भी कुछ समुदाय केरोसिन से जलने वाले लैंपों का उपयोग कर रहे थे। आज अधिकांश देशों, विशेष रूप से, उत्तरी अमेरिका में केरोसिन को एक सुखद स्मृति के रूप में याद किया जाता है, जो उन्हें पुराने अच्छे दिनों की याद दिलाता है। कुछ विकासशील देशों जैसे नाइजीरिया (Nigeria) में अनुमानित 90 प्रतिशत घर अभी भी खाना पकाने, प्रकाश आदि के लिए केरोसिन पर निर्भर हैं।भारत में केरोसीन को सबसे पहले अलाप्पुझा स्थित मैसर्स अर्नोल्ड चेनी एंड कंपनी ऑफ न्यूयॉर्क (M/s Arnold Cheney and Co of New York) और बाद में मैसर्स रिप्ले और मैके (M/s Ripley and Mackay) द्वारा त्रावणकोर में आयात किया गया था। इसके बाद बर्मा-शेल (Burma Shell) कंपनी ने 1928 में केरोसिन का आयात और विपणन किया। भारत में केरोसिन में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की शुरुआत करीब 80 से 90 साल पहले हुई थी। अमेरिकियों ने भारत में केरोसिन का एक बड़ा बाजार देखा और इस प्रकार भारत में 5 जुलाई 1952 को 'ईएसएसओ' (ESSO) कंपनी एक नए नाम 'स्टैंडर्ड वैक्यूम रिफाइनिंग कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड' (Standard Vacuum Refining Company of India Limited) के साथ स्थापित की गई। बर्मा शेल (Burma Shell) कंपनी ने भारत में केरोसिन की खोज की, जिससे भारत में केरोसिन का उपयोग अधिक व्यापक हो गया । परिणामस्वरूप, भारत इस तरल पदार्थ पर काफी निर्भर हो गया। घरों में इस्तेमाल होने वाले लैंप और लालटेन केरोसिन से जलाए जाने लगे, गाड़ियाँ, मोटरसाइकिलें और यहाँ तक कि पंखे भी केरोसिन की मदद से चलाए जाने लगे।
केरोसिन ने कई अन्य उद्योगों को भी जन्म दिया, जैसे लैंप में इस्तेमाल होने वाले रेशम के आवरण तथा केरोसिन के इस्तेमाल से उपयोग की जाने वाली इस्त्री आदि। भारत में केरोसिन दैनिक जीवन का इतना महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया कि इसे राशन की दुकानों में बेचा जाने लगा। हालांकि, आज विद्युत या बिजली ने केरोसिन का स्थान ले लिया है, जो आज सबसे दूरस्थ स्थानों तक भी पहुंच गई है। जिस केरोसिन से कभी बाइक और कारें चलती थीं, वह बिजली के आविष्कार के बाद से अप्रचलित हो गई। स्वच्छ और अधिक परिष्कृत ईंधन उपलब्ध होने के कारण केरोसिन पर लोगों की निर्भरता कम हो गई।
जनसंख्या (2025)Source:
Census 2011; population projections based on 2011 city growth rates.
221,825
इंटरनेट उपयोगकर्ता
इंटरनेट उपयोगकर्ताSource:
The number of Internet connections was determined by multiplying the number of urban Internet subscribers with the percentage of the District Headquarters (DHQ) population in relation to the total urban population. The value was allocated to DHQs based on population ratio. Urban population is distributed in a 1.5:1 ratio between DHQ and non-DHQ cities. (TRAI September 2025 Report / Number)
281,963
फेसबुक उपयोगकर्ता
फेसबुक उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Facebook Users. (As per Facebook Ad Module, 31 December 2025)
108,300
लिंक्डइन उपयोगकर्ता
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The number of unique member accounts that could be potentially reached in the city. (LinkedIn Ad Module, December 2025)
120,000
ट्विटर उपयोगकर्ता
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Maximum No. of Twitter Users (X Ad Module,December 2025)
6,550
इंस्टाग्राम उपयोगकर्ता
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Maximum No. of Instagram Users (Instagram Ad Module,December 2025)