अरुणाचल प्रदेश की न्यीशी जनजाति की ब्योपा टोपी, प्रकृति के साथ सामंजस्य बयां करती है
जौनपुर, हम आपको बता दें कि हमारे देश के पूर्वोत्तर राज्य - अरुणाचल प्रदेश की जंगली पहाड़ियों में, न्यीशी जनजाति वास करती है। यह जनजाति, एक समय अपनी पारंपरिक सिर टोपी को बड़े हॉर्नबिल (Hornbill) (धनेश पक्षी) की चोंचों से सजाती थी, जो गर्व और योद्धा प्रवृत्ति का प्रतीक थी। लेकिन जैसे-जैसे ये पक्षी कम होने लगे, वही लोग जो कभी उनका शिकार करते थे, उनके सबसे बड़े रक्षक बन गए। आज, न्यीशी शिल्पकार बिना किसी हॉर्नबिल पक्षी की जान लेकर भी, अपनी संस्कृति को जीवित रखते हुए, बांस और लकड़ी से हूबहू चोंच बनाते हैं।गीतों, अनुष्ठानों और कहानियों के माध्यम से, अरुणाचल प्रदेश में हॉर्नबिल एक प्रतीक से आगे बढ़कर, सह-अस्तित्व का एक पवित्र तत्व है। जनजाति के बुजुर्ग, युवाओं को सिखाते हैं कि, हॉर्नबिल की रक्षा करना जंगल की रक्षा करना है, क्योंकि ये पक्षी बीज वाहक हैं। न्यीशी हृदयभूमि में ऐसा संरक्षण, कानून द्वारा नहीं, बल्कि प्रेम द्वारा किया जाता है।न्यीशी जनजाति अरुणाचल प्रदेश की मूल जनजातियों में से एक है, और प्रकृति के साथ घनिष्ठ सामंजस्य में रहती है। वे भोजन, आश्रय, चिकित्सा, जादु या धार्मिकं, सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाओं व अपने जीवन के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। इसी तरह, ब्योपा, उनके हस्तनिर्मित सांस्कृतिक पोशाकों में से एक प्रकार है, और इसका उपयोग पारंपरिक टोपी के रूप में किया जाता है। पहले, इसे पारंपरिक रूप से पुजारी (न्यूब) द्वारा जादू या धार्मिक प्रथाओं के दौरान, और अन्य सदस्यों द्वारा अपने दैनिक जीवन में पहना जाता था। हालांकि, आजकल यह सांस्कृतिक पोशाक न्यीशी दिवस, न्योकुम त्यौहार और विवाह उत्सव जैसे शुभ अवसरों के दौरान ही पहनी जाती है।ब्योपा को इसके कारीगरों और स्थानीय लोगों के कल्याण के लिए, भौगोलिक संकेत (जीआई) के माध्यम से संरक्षित करने की आवश्यकता है। दरअसल, इस पारंपरिक टोपी का मुख्य आधार या ढांचा, बेंत की विशेष स्थानीय प्रजातियों से बुना जाता है, जो इसे मजबूती और निश्चित आकार प्रदान करता है। इस टोपी की सबसे प्रमुख विशेषता इसके सामने के हिस्से पर लगी हॉर्नबिल की प्रतिकृति चोंच होती है। पहले इसके लिए असली पक्षी की चोंच का उपयोग होता था, लेकिन वन्यजीव संरक्षण के चलते, अब इसे स्थानीय लकड़ियों को तराश कर बनाया जाता है। इस चोंच के पिछले हिस्से की ओर, सजावट के लिए एक पंख लगाया जाता है। वर्तमान समय में, इसके लिए पालतू मस्कोवी बत्तख के पंखों का उपयोग किया जाता है। टोपी के पिछले हिस्से को सजाने के लिए, हालांकि कृत्रिम बालों का प्रयोग किया जाता है। पुराने समय में, जनजाति के पुरुष लंबे बाल रखते थे, और उन्हें टोपी के पीछे बांधते थे। लेकिन, बदलते दौर में इसकी जगह कृत्रिम बालों ने ले ली है। इन बालों को आकर्षक बनाने के लिए इन्हें पीले, हरे और लाल रंग के सूती धागों से लपेटा जाता है, और इस पूरी संरचना को स्थानीय रूप से ‘दुमसो’ कहा जाता है।इस टोपी को सिर और माथे पर मजबूती से टिकाए रखने के लिए, एल्युमिनियम या बांस से बनी विशेष सुई जैसी पिनों का उपयोग किया जाता है। इनमें एक लंबी सुई जैसी संरचना होती है, जिसे दुमसो पर फिट किया जाता है, ताकि माथे के पास बालों को बांधा जा सके। इसी के साथ, एक छोटी पिन लगाई जाती है।ब्योपा बनाने में शामिल कारीगर, मुख्य रूप से पुरुष थे। सबसे पहले, गुंबद के आकार में बुनी हुई पोडम नामक बेंत की टोपी पर काम किया जाता है, जिसे पक्षी की चोंच का अनुकरण करने के लिए, पीछे की तरफ थोड़ा बढ़ाया जाता है। फिर, बांस की एक छड़ी पर, एक सिरे से बेंत का एक टुकड़ा बांधा जाता है। छोटे चाकू से धागों को काटा जाता है, जबकि मोटे धागों को एक सुई का उपयोग करके पतले धागों पर बुना जाता है। इन मोटे धागों को स्थानीय रूप से ‘प्यालो’, और सुई को ‘साइलो’ के रूप में जाना जाता है।एक बार बुनने के बाद, बेंत की टोपी को रंगा जाता है, और धूप में सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसके पश्चात, इस पर सजावट की जाती है। औसतन, एक कारीगर को एक पूर्ण टोपी बनाने में, लगभग चार से पांच दिन लगते हैं। एक बार तैयार होने के बाद, टोपी को थोड़ा सा झुकाकर पहना जाता है, जिससे माथे के ऊपर एक गांठ बनाने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है।2001 में, अरुणाचल प्रदेश के वन विभाग और भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट जैसे गैर सरकारी संगठनों ने, लुप्तप्राय पक्षी प्रजाति – हॉर्नबिल की रक्षा के लिए न्यीशी समुदाय के साथ काम करना शुरू किया। इसके परिणामस्वरूप पुराने, पक्षी-आधारित ब्योपा को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का सामुदायिक समर्थन प्राप्त हुआ। इस कदम को ब्योपा के निर्माताओं और पहनने वालों से व्यापक समर्थन मिला है, और हाल के वर्षों में सामूहिक प्रयासों ने हॉर्नबिल आबादी को फिर से बढ़ने में मदद की है।ब्योपा की अरुणाचल प्रदेश के सांस्कृतिक परिदृश्य में मजबूत पकड़ बनी हुई है, और यह स्थानीय बाजारों में आसानी से उपलब्ध है। वास्तव में, चोंच से इसकी प्रतिकृतियों तक हुए, समुदाय के नेतृत्व वाले बदलाव ने शिल्प की पहचान में संरक्षण संदेश अंतर्निहित कर दिया है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2fmfp6wm 2. https://tinyurl.com/4kbwvejc 3. https://tinyurl.com/bdhc5sr6 4. https://tinyurl.com/ym26kxyy
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
आखिर क्यों राग सूर मल्हार को वर्षा ऋतु के शांत और मननशील रागों में गिना जाता है?
अगर मल्हार राग-परिवार के शांत और गंभीर रागों की चर्चा की जाए, तो राग सूर मल्हार एक विशिष्ट स्थान रखता है। इसे प्रायः “सूरदासी मल्हार” के नाम से भी जाना जाता है। परंपरागत रूप से इसका संबंध वर्षा ऋतु से माना जाता है, और इसकी मधुर तथा भावपूर्ण प्रकृति इसे मल्हार परिवार के अन्य रागों से अलग पहचान देती है।सूर मल्हार अपनी सहज, शांत और आत्ममंथनपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए जाना जाता है। इसकी स्वर-संरचना में वर्षा की कोमल फुहारों, ठंडी हवाओं और प्रकृति की ताजगी का आभास मिलता है। कलाकार आलाप, बंदिश और तानों के माध्यम से इस राग के विविध भावों को अभिव्यक्त करते हैं, जिससे प्रत्येक प्रस्तुति में इसकी अलग छटा दिखाई देती है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में इसे वर्षा ऋतु के उपयुक्त रागों में गिना जाता है, जो श्रोताओं को एक शांत और मननशील वातावरण का अनुभव कराता है।इस राग की विभिन्न प्रस्तुतियाँ इसकी बहुमुखी प्रकृति को उजागर करती हैं। पंडित वेंकटेश कुमार की गायकी में सूर मल्हार की गंभीरता और विस्तार का सुंदर परिचय मिलता है। पंडित भीमसेन जोशी की प्रसिद्ध प्रस्तुति "गरजत आए" इस राग के भावों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है, जबकि कृष सुगंथ का सितार वादन इसकी मधुरता और प्रवाहपूर्ण स्वर-यात्रा को वाद्य संगीत के माध्यम से अनुभव कराने का अवसर देता है।यदि आप वर्षा ऋतु से जुड़े ऐसे राग की खोज में हैं, जो तीव्रता से अधिक शांति और आत्मचिंतन का अनुभव कराए, तो राग सूर मल्हार की ये प्रस्तुतियाँ एक उत्कृष्ट परिचय हैं। इनमें भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा, वर्षा ऋतु का सौंदर्य और सुरों की गहन अभिव्यक्ति का सुंदर संगम सुनाई देता है।संदर्भ -https://tinyurl.com/rxhfy9fmhttps://tinyurl.com/3yb4brt4https://tinyurl.com/msjzccrehttps://tinyurl.com/jt2spv7s
तितलियाँ और कीट
जौनपुर के शहरी इलाकों में कैसे फल-फूल रही है स्मॉल साल्मन अरब तितली?
जौनपुर की सड़कों और बगीचों में अक्सर एक छोटी सी, साल्मन जैसे गुलाबी-नारंगी रंग की तितली उड़ती दिखाई देती है, जिसे 'स्मॉल साल्मन अरब' कहा जाता है। 'पिएरिडी' (Pieridae) परिवार से ताल्लुक रखने वाली यह तितली अपनी विशेष रंगत और कठोर परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता के लिए जानी जाती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका साल्मन नाम इसके पंखों के गुलाबी आभा वाले रंग के कारण पड़ा है, जबकि 'अरब' शब्द शुरुआती प्रकृतिवादियों द्वारा इसके विशिष्ट वर्गीकरण के लिए इस्तेमाल किया गया था।यह तितली भारत में कहां पाई जाती है?स्मॉल साल्मन अरब (वैज्ञानिक नाम: Colotis amata) मुख्य रूप से मध्य एशिया से लेकर भारतीय उपमहाद्वीप तक फैली हुई है। भारत में यह मध्य, दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में प्रचुरता में पाई जाती है। बंगाल तितली डेटाबेस और अन्य शोधों के अनुसार, यह तितली विशेष रूप से तटीय क्षेत्रों, ज्वारीय मिट्टी के मैदानों और शुष्क इलाकों में देखी जाती है। जौनपुर जैसे शहरों में, यह बाग-बगीचों, सड़क किनारे की वनस्पतियों और खाली पड़े शहरी भूखंडों में अपना बसेरा बनाती है। इसकी उड़ान जमीन के काफी करीब, कमजोर लेकिन दिशात्मक होती है।स्मॉल साल्मन अरब का आवास कैसा होता है?अन्य तितलियों के विपरीत, जो घने जंगलों पर निर्भर रहती हैं, स्मॉल साल्मन अरब को खुले और शुष्क स्थान पसंद हैं। यह गर्म और शुष्क क्षेत्रों, बबूल (Acacia) के झाड़-झंखाड़, घास के मैदानों और कृषि भूमि में आसानी से देखी जा सकती है। यह समुद्र तल से लेकर लगभग 1200 मीटर की ऊंचाई तक निवास करती है। 'लर्न बटरफ्लाई' पोर्टल के अनुसार, ये तितलियाँ अक्सर धूप सेंकने के लिए झाड़ियों पर अपने पंख फैलाकर बैठती हैं।कैसे चलती है इसकी जीवन यात्रा?इस तितली का जीवन चक्र बेहद दिलचस्प और तेज होता है। आंध्र प्रदेश के पूर्वी घाटों में किए गए एक शोध (जुलाई 2025) के अनुसार, यह एक 'मल्टीवोल्टाइन' (Multivoltine) प्रजाति है, जिसका अर्थ है कि यह साल भर प्रजनन करती है। इसका पूरा जीवन चक्र अंडे से वयस्क बनने तक मात्र 24 से 28 दिनों में पूरा हो जाता है।अंडे: मादा तितली एक बार में 8 से 15 अंडों के समूह को मेजबान पौधे की कोमल पत्तियों या कांटों पर देती है। ये अंडे हल्के पीले रंग के होते हैं, जो 3 से 4 दिनों में फूट जाते हैं।इल्ली (Larva): अंडे से निकलने के बाद लार्वा पांच चरणों (Instars) से गुजरता है। शुरुआती दिनों में इसका रंग क्रीम जैसा होता है, जो बाद में गहरे घास जैसे हरे रंग में बदल जाता है। यह अवस्था 15 से 17 दिनों तक चलती है।प्यूपा: पूरी तरह विकसित होने के बाद, लार्वा भोजन बंद कर देता है और प्यूपा में बदल जाता है। यह अवस्था 5 से 9 दिनों की होती है।कौन से पौधे इसके जीवन का आधार हैं?स्मॉल साल्मन अरब का जीवन मुख्य रूप से 'साल्वाडोरा' (Salvadora) परिवार के पौधों पर निर्भर है। इनमें 'साल्वाडोरा पर्सिका' (पीलू) और 'साल्वाडोरा ओलियोइड्स' प्रमुख हैं। चूंकि साल्वाडोरा खारी मिट्टी में भी उग सकता है, इसलिए ये तितलियाँ गुजरात जैसे तटीय क्षेत्रों और लवणीय भूमि में बहुत अधिक पाई जाती हैं। जौनपुर में, यह 'माएरुया एपेटाला' (Maerua apetala) जैसे पौधों पर भी आश्रित रहती है, जो इसके लार्वा के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।शहरी माहौल में यह तितली इतनी सफल क्यों है?जहाँ अधिकांश तितलियाँ बढ़ते शहरीकरण के कारण विलुप्त हो रही हैं, वहीं स्मॉल साल्मन अरब ने खुद को इंसानी बस्तियों के अनुकूल ढाल लिया है। इसकी इस सफलता के पीछे कई कारण हैं। पहला, इसके मेजबान पौधे (जैसे साल्वाडोरा) खराब या प्रदूषित मिट्टी में भी उग जाते हैं। दूसरा, यह तितली वन-विशेषज्ञ प्रजातियों की तुलना में अधिक तापमान और कम नमी को सहन कर सकती है। इसकी त्वरित प्रजनन क्षमता इसे प्रतिकूल परिस्थितियों से तेजी से उबरने में मदद करती है।इस नन्ही प्रजाति के सामने क्या चुनौतियां हैं?अनुकूलन क्षमता के बावजूद, स्मॉल साल्मन अरब खतरों से मुक्त नहीं है। तेजी से होता शहरी विस्तार और सघन कृषि इसके प्राकृतिक आवास को नष्ट कर रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में 'लैंडस्केपिंग' के नाम पर जंगली झाड़ियों और देशी पौधों को हटाना इनके प्रजनन स्थलों को कम कर देता है।एक बड़ा खतरा कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग है। कीटनाशक न केवल सीधे तौर पर इल्लियों और तितलियों को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि इनके अमृत स्रोतों और मेजबान पौधों को भी जहरीला बना देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जौनपुर जैसे शहरों में इन देशी पौधों का संरक्षण नहीं किया गया, तो भविष्य में यह लचीली प्रजाति भी स्थानीय स्तर पर विलुप्त हो सकती है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/22sbv2va 2. https://tinyurl.com/25s9btr6 3. https://tinyurl.com/28bta6vk 4. https://tinyurl.com/226fzh7z
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
क्या हम सुपरबाइक्स के वैश्विक दौर के लिए तैयार हैं?
पूरी दुनिया में बनने वाले कुल दोपहिया वाहनों का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत में तैयार होता है। एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का दोपहिया उद्योग न केवल देश की व्यक्तिगत गतिशीलता (लोकोमोशन) की रीढ़ है, बल्कि यह लगभग 45 से 50 लाख लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार भी प्रदान करता है। जौनपुर जैसे शहरों में, जहाँ परिवहन के लिए दोपहिया वाहन सबसे सुलभ और लोकप्रिय साधन हैं, वहाँ भी बाज़ार की यह धमक साफ़ दिखाई देती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बाज़ार केवल किफ़ायती 'कम्यूटर' बाइक्स तक सीमित रहेगा या यहाँ सुपरबाइक्स का शोर भी सुनाई देगा?भारत में बजट और ईंधन-कुशल बाइक्स का इतना दबदबा क्यों है?भारतीय बाज़ार की प्रकृति यहाँ की आर्थिक स्थिति से गहराई से जुड़ी है। आंकड़ों के अनुसार, साल 2020 में भारत की प्रति व्यक्ति आय लगभग 1,900 डॉलर थी, जिसने दोपहिया वाहनों को व्यक्तिगत परिवहन का सबसे सस्ता विकल्प बना दिया। जौनपुर के मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बाइक केवल आवाजाही का साधन नहीं, बल्कि उनकी बचत का एक हिस्सा भी है। Kearney के विश्लेषण से पता चलता है कि लगभग 60 प्रतिशत भारतीय परिवारों के पास दोपहिया वाहन है, जबकि केवल 15 प्रतिशत के पास चार पहिया वाहन हैं।किफ़ायती होने के साथ-साथ सुविधा और दक्षता (Efficiency) इन बाइक्स की सबसे बड़ी यूएसपी है। भारतीय निर्माता जैसे हीरो मोटोकॉर्प और बजाज ऑटो ने दशकों तक इसी 'मास मार्केट' की मांग को पूरा करने के लिए अपनी उत्पादन प्रणालियों को बेहतर बनाया है। हीरो मोटोकॉर्प का 'स्प्लेंडर' मॉडल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो जून 2025 तक कंपनी के कुल पोर्टफोलियो का 63.13 प्रतिशत हिस्सा था।हीरो और बजाज की रणनीतियों में क्या अंतर है?भारतीय सड़कों पर कौन सी कंपनी राज करती है, इसे समझने के लिए दो अलग-अलग बिज़नेस मॉडल्स को देखना ज़रूरी है। हीरो मोटोकॉर्प का ध्यान 'स्केल' यानी ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में गाड़ियाँ बेचने पर है। वित्त वर्ष 2024-25 में हीरो की घरेलू बाज़ार हिस्सेदारी 28.84 प्रतिशत थी। वे जौनपुर के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अपनी गहरी पहुँच और किफ़ायती ब्रांड वैल्यू के कारण पैठ बनाए हुए हैं।दूसरी ओर, बजाज ऑटो की रणनीति 'यूनिट इकोनॉमिक्स' यानी प्रति वाहन मुनाफ़े पर केंद्रित है। आंकड़ों के अनुसार, जहाँ हीरो प्रति वाहन लगभग 7,815 रुपये का मुनाफ़ा कमाता है, वहीं बजाज ऑटो प्रति वाहन लगभग 20,468 रुपये का लाभ अर्जित करता है। बजाज ने प्रीमियम बाइक्स, निर्यात और ब्रांड-आधारित मूल्य निर्धारण (Pricing Power) को अपनी ताकत बनाया है। यह मुकाबला 'संख्या बनाम मुनाफ़ा' का है, जहाँ दोनों ही कंपनियां भारत की विविधतापूर्ण मांग को अलग-अलग तरीके से संबोधित कर रही हैं। एक सुपरबाइक सामान्य बाइक से तकनीकी रूप से कैसे अलग होती है?बजाज ऑटो क्रेडिट के अनुसार, सुपरबाइक केवल रफ़्तार का नाम नहीं है, बल्कि यह इंजीनियरिंग की पराकाष्ठा है। सामान्यतः 1000cc या उससे अधिक क्षमता वाले इंजन, एडवांस एयरोडायनामिक्स और रेस-ग्रेड हैंडलिंग इन्हें अलग बनाती है। जौनपुर के जिम और फिटनेस केंद्रों में जाने वाले युवाओं के लिए, स्पोर्ट्स बाइक्स का रोमांच एक तरह के 'एड्रेनालाईन रश' जैसा है, जो शारीरिक और मानसिक सक्रियता से जुड़ा महसूस होता है।सुपरबाइक्स में इनलाइन-फोर या V4 जैसे जटिल इंजनों का उपयोग होता है। इनमें 'लिक्विड कूलिंग सिस्टम' होता है ताकि तेज़ रफ़्तार पर इंजन गर्म न हो। इसके अलावा, इनमें 'राइड-बाय-वायर' जैसी तकनीकें होती हैं, जो पारंपरिक थ्रॉटल केबल की जगह इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल का उपयोग करती हैं। इससे राइडर को सटीक थ्रॉटल रिस्पॉन्स और विभिन्न राइडिंग मोड्स मिलते हैं।सुपरबाइक्स में उन्नत सामग्री और इलेक्ट्रॉनिक्स का क्या महत्व है?आधुनिक सुपरबाइक्स की परफ़ॉरमेंस केवल इंजन पर नहीं, बल्कि उनके हल्के वजन और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों पर भी टिकी होती है। डुकाटी और बीएमडब्ल्यू मोटरराड (BMW Motorrad) जैसी वैश्विक कंपनियां अपनी तकनीक के लिए प्रसिद्ध हैं। इन बाइक्स में 'ट्रैक्शन कंट्रोल' सिस्टम होता है जो पहियों की गति की निगरानी करता है और फिसलन रोकने के लिए रीयल-टाइम में पावर को एडजस्ट करता है।वजन घटाने के लिए कार्बन फ़ाइबर और टाइटेनियम जैसे महंगे पदार्थों का उपयोग किया जाता है। कार्बन फ़ाइबर बॉडी पैनल्स को मजबूती देता है जबकि टाइटेनियम का उपयोग एग्जॉस्ट सिस्टम और इंजन के हिस्सों में किया जाता है क्योंकि यह हल्का होने के साथ-साथ गर्मी सहने की अद्भुत क्षमता रखता है। यही कारण है कि बीएमडब्ल्यू की HP (High Performance) फिलॉसफी 'न एक ग्राम ज़्यादा, न एक हॉर्स पावर कम' के सिद्धांत पर काम करती है।भारतीय कंपनियां सुपरबाइक सेगमेंट में चुनौतियों का सामना क्यों कर रही हैं?इसके पीछे कई कारण हैं:R&D और निवेश: अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुपरबाइक्स बनाने के लिए भारी रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) की ज़रूरत होती है, जो भारतीय कंपनियों के लिए वर्तमान में प्राथमिकता नहीं है।.ईंधन की गुणवत्ता: सुपरबाइक्स को हाई-ऑक्टेन ईंधन की आवश्यकता होती है, जो भारत के छोटे शहरों यहाँ तक कि महानगरों में भी आसानी से उपलब्ध नहीं है।.सड़क और बुनियादी ढांचा: भारतीय सड़कें, विशेषकर गड्ढे और अनियमित ट्रैफ़िक, 1000cc वाली मशीनों की पूरी क्षमता का उपयोग करने के अनुकूल नहीं हैं।.आयात शुल्क: अधिकांश सुपरबाइक्स का आयात होता है और भारत में आयात शुल्क बहुत अधिक है, जिससे ये मिडिल क्लास की पहुँच से बाहर हो जाती हैं।परफ़ॉरमेंस का यह अंतर वास्तव में कितना बड़ा है?अगर हम टीवीएस अपाचे (TVS Apache RR 310) और बीएमडब्ल्यू (BMW M 1000 RR) की तुलना करें, तो अंतर साफ़ हो जाता है। अपाचे RR 310 की अधिकतम रफ़्तार लगभग 160 किमी प्रति घंटा है, जिसे रोज़ाना के इस्तेमाल और भारतीय सड़कों के हिसाब से डिज़ाइन किया गया है। इसके विपरीत, बीएमडब्ल्यू M 1000 RR लगभग 300 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार पकड़ सकती है। यह केवल रफ़्तार की बात नहीं है, बल्कि दो बिल्कुल अलग श्रेणियों और इंजीनियरिंग के स्तरों की कहानी है। एक का ध्यान किफ़ायती परफ़ॉरमेंस पर है, तो दूसरा ट्रैक डोमिनेंस (Track Dominance) के लिए बनाया गया है।क्या वैश्विक साझेदारी से भारत की इंजीनियरिंग क्षमता बदल रही है?भले ही भारत के पास अभी अपनी 1000cc की सुपरबाइक न हो, लेकिन स्थिति तेज़ी से बदल रही है। टीवीएस और बीएमडब्ल्यू मोटरराड जैसी साझेदारियों ने भारतीय इंजीनियरों को उन्नत इंजन डिज़ाइन और सटीक निर्माण प्रक्रिया को समझने का मौका दिया है। हीरो और हार्ले डेविडसन (Harley Davidson) का सहयोग भी इसी दिशा में एक कदम है।हार्ले डेविडसन बाइकइन साझेदारियों के माध्यम से तकनीक का हस्तांतरण (Technology Transfer) हो रहा है, जिससे भारतीय फर्में धीरे-धीरे तकनीकी रूप से सक्षम बन रही हैं। स्थानीय स्तर पर उन्नत तकनीक विकसित करने और R&D में निवेश बढ़ाने से यह उम्मीद जगी है कि आने वाले समय में भारतीय कंपनियां भी वैश्विक स्तर की हाई-परफ़ॉरमेंस बाइक्स तैयार कर सकेंगी।जौनपुर जैसे उभरते शहरों के लिए, जहाँ युवा वर्ग नई तकनीक और स्पोर्ट्स बाइक्स के प्रति आकर्षित है, यह बदलाव न केवल लोकोमोशन का तरीका बदलेगा बल्कि भारत को दुनिया के एक 'मैन्युफैक्चरिंग हब' से हटाकर 'इंजीनियरिंग और इनोवेशन हब' के रूप में स्थापित करेगा।संदर्भ1. https://tinyurl.com/29dtxc2z 2. https://tinyurl.com/2bh79fow 3. https://tinyurl.com/2xl8rgbx 4. https://tinyurl.com/29fznjgf 5. https://tinyurl.com/2aek6mkn 6. https://tinyurl.com/2cg4bmg2 7. https://tinyurl.com/275ofbun
स्पर्श - बनावट/वस्त्र
जौनपुर, बुनकरों के कपड़े चुनकर हमें गुणवत्ता के साथ मिलेगी, किसी की मदद करने की संतुष्टि
आइए, आज प्राकृतिक, कृत्रिम और नैनोफाइबर जैसे धागों के प्रकारों का पता लगाते हैं, और समझते हैं कि उन्हें कैसे बनाया जाता हैं। फिर, हम उनकी लागत, आराम सुविधा और व्यावहारिकता की तुलना करेंगे, और देखेंगे कि क्यों कुछ कपड़े रोज पहनने के लिए अधिक उपयुक्त हैं। और लेख के अंत में, हम जांच करेंगे कि मशीन से बने कपड़ों का उदय पारंपरिक कारीगरों और उनकी आजीविका को कैसे प्रभावित कर रहा है।रेशों (Fibers) को धागे में पिरोने के लिए ज़रूरी आवश्यकताओं में, कम से कम 5 मिलीमीटर की लंबाई, लचीलापन, एकजूटता या मजबूती और पर्याप्त ताकत होना शामिल है। धागे बनाने के लिए तंतुओं को आम तौर पर संयोजित किया जाता हैं और मोड़ा जाता है; जबकि इस प्रकार बने रेशों को काता जाता है। फिर धागे को आम तौर पर बुना जाता है, या कपड़े में बुना जाता है। कपड़े के एक टुकड़े में, असंख्य रेशे होते हैं। रेशे या धागे सभी कपड़ा उत्पादों की नींव हैं, और प्राकृतिक या मानव निर्मित हो सकते हैं। इस प्रकार, रेशों के तीन मूल प्रकार हैं:1. प्राकृतिक रेशे2. पुनर्निर्मित तंतु या मानव-निर्मित रेशे, और3. कृत्रिम रेशेआम तौर पर पुनर्निर्मित और कृत्रिम रेशों को सामूहिक रूप से मानव निर्मित रेशों के रूप में जाना जाता है। प्राकृतिक रेशे प्रकृति में पाए जाते हैं, जैसे कि - भेड़ से ऊन या कपास के पौधों से कपास। पुनर्निर्मित रेशे प्राकृतिक पॉलिमर (Polymer) से बने होते हैं, जो अपने मूल रूप में उपयोग करने योग्य नहीं होते हैं। लेकिन उपयोगी रेशे बनाने के लिए इनमें सुधार किया जा सकता है। कुछ सबसे पहले पुनर्निर्मित रेशों में से एक रेयोन (Rayon) था, जिसे विस्कोस (Viscose) या विस्कोस रेयोन भी कहा जाता है। इसे लकड़ी के गूदे से पुनर्निर्मित किया गया था।नैनोफाइबर अब एक ऐसे कपड़े की कल्पना करें, जो इतना हल्का हो कि आपको मुश्किल से ही महसूस हो; फिर भी यह इतना मजबूत हो कि, आपको हानिकारक रोगजनकों, चरम मौसम और यहां तक कि रासायनिक खतरों से भी बचा सके। दरअसल, नैनोफाइबर (Nanofiber) तकनीक इसे सामने ला रही है। नैनोफाइबर, इलेक्ट्रोस्पिनिंग (Electrospinning) नामक प्रक्रिया के माध्यम से तैयार किए गए, एवं मानव बाल से भी छोटे और पतले फाइबर होते हैं। यह विधि एक विद्युत क्षेत्र का उपयोग करके, एक पॉलिमर घोल को अविश्वसनीय रूप से महीन धागों में बदलती है। इसके परिणामस्वरूप ऐसे फाइबर बनते हैं, जो हल्के, लचीले और बेहद टिकाऊ होते हैं।सुरक्षात्मक वस्त्र, संतुलन बनाने के बारे में है, जिससे आप कवच जैसी सुरक्षा चाहते हैं, लेकिन आप उसे महसूस नहीं करना चाहते हैं। नैनोफाइबर यहीं पर काम आते हैं। भारी महसूस होने वाले पारंपरिक सुरक्षात्मक कपड़ों के विपरीत, नैनोफाइबर वस्त्र सुरक्षा से समझौता किए बिना उच्च गतिशीलता प्रदान करते हैं। उनका सूक्ष्म आकार एक घनी एवं आपस में जुड़ी हुई संरचना बनाता है, जो बैक्टीरिया, वायरस और यहां तक कि महीन धूल कणों जैसे दूषित पदार्थों को रोकती है। साथ ही, ये फाइबर टूट-फूट और अधिक धुलाई का प्रतिरोध करते हैं, जो उन्हें उच्च जोखिम वाले व्यवसायों के लिए आदर्श बनाते हैं।रेशे से कपड़ा बनाने की विधि में, कताई, बुनाई, रंगाई, मुद्रण या छपाई, और फिनिशिंग शामिल हैं। कताई वह प्रक्रिया है, जिसमें रेशों को सूत या धागे में बदला जाता है। साफ और संरेखित रेशे कताई मशीन में डाले जाते हैं। फिर, इन रेशों को आगे संरेखित करने और वांछित मोटाई प्राप्त करने के लिए बाहर निकाला जाता है, या लंबा किया जाता है। यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि, वे रेशे चिकने और सुसंगत हों। निकाले गए रेशों को एक साथ घुमाकर धागा बनाया जाता है। रेशों को घुमाने से उन्हें मजबूती और एकजुटता मिलती है, जिससे धागा टिकाऊ बनता है और बुनाई के लिए उपयुक्त हो जाता है।मशीन वाली कताई के विपरीत, पारंपरिक कताई विधियों का उपयोग सदियों से किया जाता रहा है। तकली और चरखा जैसे सरल उपकरणों का उपयोग करके, रेशों को मानवीय रूप से धागे में घुमाया जाता है। यह विधि श्रम-गहन और समय साध्य है, लेकिन अद्वितीय धागे का उत्पादन करती है। परंतु, प्रौद्योगिकी में हुई प्रगति ने कताई प्रक्रिया में क्रांति ला दी है।एक बार धागा बन जाने पर इसकी बुनाई की जाती है। बुनाई, धागों की संरचनाओं को एक-दूसरे से समकोण पर जोड़ने की प्रक्रिया है। ये दो संरचनाएं, ताना (अनुदैर्ध्य सूत) और बाना (अनुप्रस्थ सूत) हैं। कपड़ा बनाने के लिए, ताने के धागों को करघे पर तनाव में रखा जाता है, जबकि बाने के धागों को ताने के ऊपर और नीचे पिरोया या डाला जाता है। बुनाई की कई तकनीकें हैं, जिनमें से प्रत्येक में अलग-अलग बनावट, पैटर्न और विशेषताओं के साथ कपड़े बनाएं जाते है। सबसे सरल और बुनियादी बुनाई ऊपर उल्लेखित है। सादे बुनाई वाले कपड़े मजबूत और टिकाऊ होते हैं, और उनकी सतह सख्त और समतल होती है।इसके अलावा, टवील बुनाई (Twill weave), साटन बुनाई (Satin weave), जैक्वार्ड बुनाई (Jacquard weave), और डॉबी बुनाई (Dobby weave) अन्य प्रमुख प्रकार हैं। समय के साथ बुनाई में करघे से लेकर, उन्नत स्वचालित मशीनों तक काफी विकास हुआ है।इसके अलावा, जैसा कि हमने ऊपर पढ़ा हैं, नैनोफाइबर के निर्माण के लिए इलेक्ट्रोस्पिनिंग एक परिवर्तनकारी तकनीक के रूप में उभरी है। यह तकनीक उनकी आकृति विज्ञान, संरचना और कार्यक्षमता पर सटीक नियंत्रण प्रदान करती है। यह बहुमुखी प्रक्रिया विविध सामग्रियों को एकीकृत करते हुए, अनुकूलित नैनोफाइबर उत्पादन की सुविधा प्रदान करती है। कोएक्सियल इलेक्ट्रोस्पिनिंग (Coaxial electrospinning), संरेखित इलेक्ट्रोस्पिनिंग (Aligned electrospinning), यार्न इलेक्ट्रोस्पिनिंग (Yarn electrospinning) और रोल-टू-रोल प्रक्रियाओं (Roll‐to‐roll processes) जैसी उन्नत इलेक्ट्रोस्पिनिंग तकनीकें, अगली पीढ़ी के नैनोमटेरियल के विकास का वादा करती हैं। इस प्रकार बने नैनोफाइबर को सक्रिय रूप से कार्यात्मक झिल्ली (Membrane), गैस सेंसर, ऊर्जा प्रणालियों और उत्प्रेरक प्रक्रियाओं पर लागू किया जा रहा है, जिससे इन संबंधित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण चुनौतियों का समाधान किया जा रहा है। जबकि, पर्यावरण के अनुकूल "हरित" पॉलिमर घोल के उपयोग के साथ, रोबोटिक्स-आधारित एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) द्वारा संचालित अनुकूलन को एकीकृत करने की क्षमता पर जोर देना आवश्यक माना जा रहा है।इलेक्ट्रोस्पन नैनोफाइबर (Electrospun nanofiber)मानव निर्मित धागों में हो रही प्रगति के बावजूद, प्राकृतिक रेशे, कई कारणों से लोकप्रिय बने हुए हैं। प्राकृतिक रेशों में उच्च अवशोषण क्षमता होती है, क्योंकि पौधों और जानवरों के रेशों में पानी के प्रति गहरा आकर्षण होता है। यह प्राकृतिक रेशों को चादरों और तौलियों के लिए एक बढ़िया विकल्प बनाता है, क्योंकि इन वस्तुओं के लिए अवशोषण क्षमता एक महत्वपूर्ण कारक है। प्राकृतिक रेशों का पर्यावरणीय प्रभाव आमतौर पर मानव निर्मित रेशों की तुलना में कम होता है, क्योंकि प्राकृतिक रेशों की उत्पादन प्रक्रिया के दौरान अधिक रसायनों का उपयोग नहीं होता है। अधिकांश पौधे-आधारित रेशे मजबूत होते हैं। रेशम और ऊन जैसे पशु-आधारित रेशे भी मजबूत होते हैं।दूसरी ओर, हमारे दैनिक जीवन में मानव निर्मित धागों के भी कई फायदे हैं। अधिकांश शुद्ध प्राकृतिक रेशे महंगे हो सकते हैं, जबकि, मानव निर्मित रेशे प्राकृतिक उत्पादों के सस्ते विकल्प हैं। कई सिंथेटिक कपड़े ऊन और रेशम जैसे प्राकृतिक कपड़ों के नकली संस्करण भी हैं। मानव निर्मित कपड़े अधिक दाग प्रतिरोधी होते हैं, और कुछ कपड़ों को दाग प्रतिरोधी बनाने के लिए ही डिज़ाइन किया गया है। इसलिए, ऐसे कपड़े दैनिक तौर पर एवं नियमित पहनावे के लिए बहुत अच्छे हो सकते हैं। जबकि कुछ प्राकृतिक रेशे पानी का प्रतिरोध करते हैं, मानव निर्मित रेशों को लगभग पूरी तरह से जलरोधी बनाने के लिए डिज़ाइन किया जा सकता है। इस कारण, वे बाहरी वातावरण और बारिश के लिए बहुत अच्छे हैं।तेज़ फैशन के लिए, डिज़ाइन से लेकर उत्पादन तक त्वरित बदलाव की आवश्यकता होती है। स्वचालित मशीनें उन कार्यों को मिनटों में पूरा कर सकती हैं, जिनमें मानवीय रूप से घंटों लगते हैं। इससे समय की बचत होती है। उत्पादित कपड़ों का प्रत्येक टुकड़ा समान गुणवत्ता बनाए रखता है, जिससे सुसंगति रहती है। साथ ही, सटीक कटाई और सिलाई कपड़े के अपशिष्ट को कम करती है, जिससे प्रक्रिया अधिक कुशल हो जाती है। दूसरी ओर, उन्नत मशीनरी के साथ, तेजी से और प्रतिस्पर्धी कीमतों पर नई शैलियां पेश की जा सकती हैं।शायद, इन्हीं कारणों की वजह से भारत में स्वदेशी कला, शिल्प और हथकरघा उत्पादों की मांग और बाजार में, हाल के वर्षों में भारी गिरावट देखी गई है। ऑनलाइन बिक्री के माध्यम से मशीन-निर्मित उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता, और उत्पाद की गुणवत्ता के लिए निगरानी की कमी के कारण, कला और शिल्प क्षेत्र सामान्य हो गया है। यह स्वदेशी और पारंपरिक हस्तशिल्प व्यवसायों के लिए हानिकारक है। इसके साथ ही, उत्पाद में विश्वास की कमी के कारण यह उपभोक्ता मांग भी कम करता है। अतः एक उपभोक्ता के रूप में आज यह हमारी जिम्मेदारी है कि, हम इन पारंपरिक बुनकरों से कपड़े खरीदकर उनकी मदद करें, और उनका रोज़गार बरकरार रखें। संदर्भ1. https://tinyurl.com/68jre59z2. https://tinyurl.com/mr3xneeb3. https://tinyurl.com/8dz87x3h4. https://tinyurl.com/483uba6k5. https://tinyurl.com/5edms2ee6. https://tinyurl.com/yw7hn6477. https://tinyurl.com/m4a83jhx8. https://tinyurl.com/yeyp6cs4
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
आपकी तस्वीरों से करोड़ों कमा रही हैं कंपनियाँ: क्या है प्राइवेसी का यह खेल?
जौनपुर के इंटरनेट और सोशल मीडिया यूज़र्स के लिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि मेटा ने इस बात की पुष्टि की है कि साल 2007 से लेकर अब तक वयस्कों द्वारा फेसबुक और इंस्टाग्राम पर पब्लिक किए गए सभी टेक्स्ट और फोटो को स्क्रैप किया गया है और कंपनी के आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल किया गया है। एक तरफ़ सोशल मीडिया लोगों को जोड़ने का काम कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ यह आपके व्यक्तिगत डेटा और कॉपीराइट सामग्री का उपयोग भी अप्रत्याशित तरीकों से कर रहा है। इंटरनेट की दुनिया में एक रिपोर्ट के मुताबिक़ लगभग 49 प्रतिशत ब्लॉगर्स और सोशल मीडिया यूज़र्स अनजाने में या जानबूझकर कॉपीराइट का उल्लंघन कर चुके हैं।क्या सोशल मीडिया पर पब्लिश किया गया कंटेंट कॉपीराइट के दायरे में आता है?लोगों के बीच यह एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है कि सोशल मीडिया साइट्स पर अपना काम या तस्वीरें अपलोड करने का मतलब है कि आप अपना कॉपीराइट खो देते हैं और यदि कोई आपकी अनुमति के बिना आपके काम का उपयोग करता है तो आप कुछ नहीं कर सकते। हक़ीक़त में ऐसा नहीं है। लगभग हर सोशल मीडिया साइट के नियम और शर्तों के अनुसार, जो व्यक्ति कंटेंट बनाता और अपलोड करता है, वह ही अपने काम का असली कॉपीराइट मालिक बना रहता है। जब कोई विज़ुअल वर्क (जैसे फोटो या वीडियो) बनाया जाता है, तो कॉपीराइट स्वचालित रूप से निर्माता को मिल जाता है। आधिकारिक तौर पर कॉपीराइट प्राप्त करने के लिए किसी तस्वीर को रजिस्टर करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है।भारत में कॉपीराइट अधिनियम 1957 के तहत, किसी भी काम पर कॉपीराइट के मालिक को विशेष अधिकार प्राप्त होते हैं, जैसे कि उस काम का उपयोग करना, उसे वितरित करना, या प्रकाशित करना। इसलिए, किसी भी फोटो या वीडियो का कॉपीराइट मालिक ही उसे किसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अपलोड करने का अधिकार रखता है। यदि कोई और व्यक्ति आपकी अनुमति के बिना आपकी रचना का उपयोग करता है, तो यह कॉपीराइट उल्लंघन माना जाता है। बहुत से लोग यह मानते हैं कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर मौजूद हर चीज़ मुफ़्त है, लेकिन यह सच नहीं है। जब कोई अपना मूल कंटेंट सोशल मीडिया पर पोस्ट करता है, तो वह महज़ एक पब्लिकेशन होता है, ना कि मुफ़्त इस्तेमाल के लिए दिया गया लाइसेंस। "फेयर यूज़" का नियम कुछ विशेष परिस्थितियों (जैसे समीक्षा, समाचार रिपोर्टिंग, या शोध) में अनुमति के बिना काम का उपयोग करने की छूट देता है, लेकिन यह हर परिस्थिति पर लागू नहीं होता।प्लेटफ़ॉर्म के नियमों और प्राइवेसी सेटिंग्स के तहत आपकी ओनरशिप का क्या होता है?जब आप इंस्टाग्राम या फेसबुक पर कोई फोटो, वीडियो, या कैप्शन पोस्ट करते हैं, तो आप कॉपीराइट के मालिक होते हैं, लेकिन यहाँ एक पेंच है। आप अपनी ओनरशिप तो बरकरार रखते हैं, लेकिन आप इंस्टाग्राम को बहुत बड़े स्तर पर उपयोग के अधिकार भी देते हैं। इसका मतलब है कि आप उन्हें अपने कंटेंट को एक ख़ास तरीके से इस्तेमाल करने की अनुमति देते हैं जिसके लिए वे आपको कोई भुगतान नहीं करते। प्लेटफ़ॉर्म के नियमों के तहत आप उन्हें एक नॉन-एक्सक्लूसिव, रॉयल्टी-फ्री और वर्ल्डवाइड लाइसेंस देते हैं। इसका मतलब यह है कि आप अपनी सामग्री को अन्य जगहों पर भी इस्तेमाल कर सकते हैं, इंस्टाग्राम आपको इस इस्तेमाल के लिए पैसे नहीं देगा, और यह अधिकार दुनिया भर में लागू होगा।इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफ़ॉर्म अपनी सर्विस चलाने के लिए आपके कंटेंट का उपयोग कर सकते हैं, उसे वितरित कर सकते हैं, बदल सकते हैं, प्रदर्शित कर सकते हैं और यहां तक कि उससे जुड़े अन्य काम भी बना सकते हैं। जब आप अपना कंटेंट या अकाउंट डिलीट करते हैं तो यह लाइसेंस आम तौर पर समाप्त हो जाता है। लेकिन, यदि किसी अन्य यूज़र ने आपके कंटेंट को शेयर या एम्बेड किया है, और उन्होंने उसे डिलीट नहीं किया है, तो प्लेटफ़ॉर्म का वह लाइसेंस जारी रह सकता है। फेसबुक के नियम यह कहते हैं कि यदि ओरिजिनल यूज़र अपना कंटेंट हटा भी दे, तो भी लाइसेंस तब तक बना रहेगा जब तक कि उस कंटेंट को शेयर करने वाले बाकी सभी लोग उसे डिलीट न कर दें। इस तरह वायरल फोटो या वीडियो के लिए यह लाइसेंस अनिश्चित काल तक चल सकता है। एक्स (पूर्व में ट्विटर) के मामले में तो यह और भी आगे जाता है, जहाँ अकाउंट बंद करने के बाद भी अपलोड किए गए कंटेंट पर उपयोग का लाइसेंस हमेशा के लिए बना रहता है।एआई सिस्टम को कैसे ट्रेन किया जाता है और इसके कॉपीराइट से जुड़े ख़तरे क्या हैं?आजकल जनरेटिव एआई मॉडल, जैसे कि लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) और इमेज जनरेटर, मशीन लर्निंग तकनीकों के माध्यम से विकसित किए जा रहे हैं। इन मॉडल्स की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने के लिए इन्हें बहुत बड़े डेटासेट्स पर ट्रेन किया जाता है। इनमें से कई डेटासेट्स में कॉपीराइट वाला काम शामिल हो सकता है। ट्रेनिंग की प्रक्रिया में कई चरण होते हैं, जिसमें जनरल पैटर्न सीखने के लिए प्री-ट्रेनिंग, और विशिष्ट कार्यों के लिए पोस्ट-ट्रेनिंग या फाइन-ट्यूनिंग शामिल होती है। डेवलपर्स भारी मात्रा में डेटा को स्क्रैप करते हैं, फ़िल्टर करते हैं और इकट्ठा करते हैं, जिस पर एआई मॉडल भविष्यवाणी करना सीखते हैं।ट्रेनिंग डेटासेट्स के लिए कॉपीराइट किए गए कार्यों को डाउनलोड करने, कॉपी करने और मॉडिफाई करने से कॉपीराइट के नियमों पर असर पड़ता है। इसके अलावा, एआई सिस्टम ऐसा कंटेंट आउटपुट कर सकते हैं जो कॉपीराइट किए गए काम की बिल्कुल नकल करता हो या उससे बहुत मिलता-जुलता हो। रिट्रीवल-ऑगमेंटेड जनरेशन (रैग) का उपयोग करके जनरेशन के समय बाहरी कंटेंट को शामिल करना भी उल्लंघन के सवाल खड़े कर सकता है। अमेरिकी कॉपीराइट कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, एआई द्वारा उपयोग में "फेयर यूज़" (उचित उपयोग) एक बचाव हो सकता है, लेकिन यह हर स्थिति में लागू नहीं होता है। यदि एआई का आउटपुट ओरिजिनल काम से प्रतिस्पर्धा करता है या बाज़ार में उसकी जगह लेने लगता है, तो वह फेयर यूज़ के अंतर्गत नहीं आएगा।क्या आप अपना डेटा एआई ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल होने से रोक सकते हैं?सोशल मीडिया कंपनियाँ अक्सर हमारी अनुमति के बिना एआई मॉडल को ट्रेन करने के लिए हमारे डेटा का उपयोग कर रही हैं। यूरोपीय संघ में जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (जीडीपीआर) लागू है, जिसकी वजह से मेटा को यूरोपीय उपभोक्ताओं को एक नोटिस भेजना पड़ा और उन्हें डेटा कलेक्शन से बाहर निकलने (ऑप्ट-आउट) का विकल्प देना पड़ा। लेकिन अमेरिका या कई अन्य देशों में इस तरह का कोई कड़ा राष्ट्रीय कानून नहीं है जो सोशल मीडिया कंपनियों को एआई मॉडल ट्रेनिंग के लिए यूज़र्स का डेटा इस्तेमाल करने से रोक सके। हालाँकि, आप अपनी प्राइवेसी सेटिंग्स बदलकर अपने डेटा को भविष्य में इस्तेमाल होने से कुछ हद तक बचा सकते हैं।इंस्टाग्राम पर अपना डेटा एआई ट्रेनिंग से बचाने का एकमात्र वास्तविक तरीका यह है कि आप अपने अकाउंट को प्राइवेट कर लें। मेटा ने कहा है कि वह प्राइवेट अकाउंट्स से डेटा या जानकारी का उपयोग नहीं करेगा। इसके लिए अपनी प्रोफ़ाइल पर जाएँ, सेटिंग आइकॉन पर क्लिक करें, और 'अकाउंट प्राइवेसी' में जाकर 'प्राइवेट अकाउंट' के स्विच को ऑन कर दें। इसी तरह फेसबुक पर भी आपको अपनी पोस्ट्स की विज़िबिलिटी को 'पब्लिक' से हटाकर 'फ्रेंड्स' पर सेट करना होगा। 'सेटिंग्स एंड प्राइवेसी' में जाकर 'ऑडियंस एंड विज़िबिलिटी' के तहत 'पोस्ट्स' चुनें, और "आपकी भविष्य की पोस्ट कौन देख सकता है?" को 'फ्रेंड्स' कर दें।एक्स (ट्विटर) ने भी नए नियम लागू किए हैं जिसमें यूज़र्स का डेटा 'ग्रोक' (Grok) जैसे एआई को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इसे रोकने के लिए आप सेटिंग्स में जाकर 'प्राइवेसी एंड सेफ्टी' पर क्लिक करें, फिर 'Grok & Third-party Collaborators' को चुनें और बॉक्स को अनचेक कर दें। लिंक्डइन पर भी 'सेटिंग्स एंड प्राइवेसी' में जाकर 'डेटा प्राइवेसी' चुनें, और 'Data for Generative AI Improvement' के स्विच को ऑफ़ कर दें। चैटजीपीटी में भी मुफ़्त अकाउंट वाले यूज़र्स की चैट का डेटा इस्तेमाल होता है। इसे बंद करने के लिए चैटजीपीटी की सेटिंग्स में 'डेटा कंट्रोल्स' पर जाएँ और 'Improve the model for everyone' स्विच को बंद कर दें। याद रखें कि ये सेटिंग्स केवल भविष्य के डेटा को बचाएंगी, आपके पिछले इस्तेमाल हो चुके डेटा को नहीं।संदर्भ 1. https://tinyurl.com/2cklyk36 2. https://tinyurl.com/29gopexr 3. https://tinyurl.com/2d4pul3j 4. https://tinyurl.com/22vmml2f 5. https://tinyurl.com/2xoqnx9y6. https://tinyurl.com/2c9g7g4j
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
जाबुलानी: फीफा विश्व कप 2010 की वह गेंद जिसने गोलकीपरों को चौंका दिया
वर्ष 2010 के फीफा विश्व कप की बात हो और जाबुलानी (Jabulani) गेंद का ज़िक्र न हो, ऐसा संभव नहीं है। एडिडास (Adidas) द्वारा निर्मित यह गेंद दक्षिण अफ्रीका में आयोजित 2010 विश्व कप की आधिकारिक मैच बॉल थी। ज़ुलू भाषा में "जाबुलानी" का अर्थ है "खुश रहो", और इसका नाम विश्व कप के उत्साह और जश्न की भावना को दर्शाने के लिए चुना गया था।जाबुलानी अपने अनोखे डिज़ाइन के कारण चर्चा का विषय बन गई थी। इसमें केवल आठ त्रि-आयामी पैनल लगाए गए थे, जबकि 2006 विश्व कप की गेंद में 14 पैनल थे। इसकी सतह पर विशेष खांचे बनाए गए थे, जिन्हें एडिडास ने "ग्रिप एन ग्रूव" तकनीक का नाम दिया। इसका उद्देश्य गेंद की वायुगतिकी को बेहतर बनाना था। इस गेंद के विकास में ब्रिटेन के लॉफबरो विश्वविद्यालय (Loughborough University) के शोधकर्ताओं का भी योगदान था।हालाँकि, मैदान पर खिलाड़ियों और विशेष रूप से गोलकीपरों का अनुभव कुछ अलग रहा। कई गोलकीपरों ने शिकायत की कि गेंद की उड़ान का अनुमान लगाना बेहद कठिन था। तेज़ गति से चलते समय जाबुलानी अचानक दिशा बदल लेती थी, जिससे उसके रास्ते का अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता था। वैज्ञानिकों ने भी पाया कि इसमें "नकलबॉल प्रभाव" दिखाई देता था, जिसमें गेंद हवा में अप्रत्याशित रूप से हिलती-डुलती हुई आगे बढ़ती है।यही कारण था कि कुछ खिलाड़ियों ने इसे विश्व कप इतिहास की सबसे चुनौतीपूर्ण गेंदों में से एक बताया। फिर भी जाबुलानी फुटबॉल इतिहास का एक यादगार हिस्सा बन गई और आज भी 2010 विश्व कप की सबसे चर्चित पहचान में गिनी जाती है।संदर्भ -https://tinyurl.com/yvwbfeauhttps://tinyurl.com/y3ze5x2jhttps://tinyurl.com/4p6f25d7https://tinyurl.com/52j2cncn
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
कुश्ती में भारत की बढ़ती उपलब्धियों को देखकर, उत्तर प्रदेश में क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
हम, आज कुश्ती के इतिहास को समझेंगे, और पढ़ेंगे कि यह कुछ पुराने लड़ाकू खेलों में से एक के रूप में कैसे विकसित हुआ। फिर, हम यह पता लगाएंगे कि, भारत में कुश्ती कैसे विकसित हुई, और इसका पारंपरिक अखाड़ों से क्या संबंध है। लेख में आगे, हम देखेंगे कि महाभारत जैसे भारतीय महाकाव्यों में कुश्ती किस प्रकार वर्णित की गई है। इसके पश्चात, हम आधुनिक कुश्ती के नियमों और तकनीकों को देखेंगे। जबकि अंत में, हम कुश्ती में भारत की उपलब्धियों और हमारे राज्य उत्तर प्रदेश में इस खेल को बढ़ावा देने हेतु उठाए जा रहे कदमों की जांच करेंगे।कुश्ती की उत्पत्ति, संभवतः हाथों या आमने–सामने की लड़ाई से हुई थी। यह विशेषतः लड़ाई के एक ऐसे खेल के रूप में उभरी, जिसमें प्रतिद्वंद्वी की मृत्यु के बजाय उसे हार स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाता है। 3000 ईसा पूर्व की कुछ कलाकृतियां बेबीलोनिया (Babylonia) और मिस्र (Egypt) में प्रचलित ‘बेल्ट कुश्ती’ को दर्शाती हैं। सुमेरियन गिलगमेश (Sumerian Gilgamesh) महाकाव्य में भी ऐसी कुश्ती का वर्णन है। भारत में 1500 ईसा पूर्व से ही कुश्ती चली आ रही है। 700 ईसा पूर्व के चीनी दस्तावेज़ ‘लूज कुश्ती’ (loose wrestling) का वर्णन करते हैं, जबकि, पहली शताब्दी ईसा पूर्व के जापानी रिकॉर्ड भी ऐसा वर्णन करते हैं। बीसवीं शताब्दी में उत्तरी एवं पूर्वी यूरोप (Europe) तथा जापान में स्थानीय स्तर पर प्रचलित बेल्ट कुश्ती, 2500 ईसा पूर्व में मिस्रवासियों की कुश्ती से मेल खाती थी।कुश्ती, संभवतः प्राचीन यूनानियों (Greeks) का सबसे लोकप्रिय खेल था। यूनानी युवा पुरुष, अपने सामाजिक जीवन के केंद्र बिंदु के रूप में पैलेस्ट्रास (Palaestras) या कुश्ती प्रशिक्षण केंद्रों से संबंधित थे। प्राचीन यूनानी फूलदानों और सिक्कों पर भी लूज कुश्ती के चित्र आम हैं। बाद में, 776 ईसा पूर्व से कुश्ती ओलंपिक खेलों का हिस्सा थी। दूसरी तरफ, कुश्ती यूनानियों की तुलना में रोमनों (Romans) के बीच कम लोकप्रिय थी। रोमन साम्राज्य के पतन के साथ, लगभग 800 ईस्वी तक यूरोप में कुश्ती के संदर्भ गायब हो गए।जब फारस (Persia) के इस्लामी शासकों ने लगभग 800 ईसा पूर्व में तुर्क (Turk) सैनिकों को नियुक्त करना शुरू किया, तो वे सैनिक अपने साथ लूज कुश्ती की एक शैली लेकर आए। इसे कोरेश (Koresh) कहा जाता था। धीरे-धीरे तुर्कों ने पूरे मुस्लिम प्रभुत्व पर कब्ज़ा कर लिया, और वहां उनकी कुश्ती शैली फैल गई। बाद में, तेरहवीं शताब्दी में मंगोलियाई आक्रमणों (Mongolian invasions) से मंगोलियाई कुश्ती की शुरुआत हुई, जिसे शाही संरक्षण प्राप्त हुआ। इस प्रकार, कुश्ती आधुनिक ईरान (Iran) का राष्ट्रीय खेल बन गया।जापानी बेल्ट-कुश्ती शैली - सूमो (Sumo), शाही संरक्षण (710-1185) के तहत एक लोकप्रिय दर्शक खेल था। सत्रहवीं शताब्दी तक सूमो कुश्ती, जापान में एक पेशेवर खेल बन गया था। जूडो (Judo) एक अन्य प्रमुख जापानी कुश्ती शैली है, जो बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में एक अंतरराष्ट्रीय खेल बन गई।मध्य युग में, पूरे यूरोप में कई शैलियों में कुश्ती होती थी। पहला दर्ज इंग्लिश मैच, तेरहवीं सदी की शुरुआत में लंदन (London) में आयोजित किया गया था। इंग्लैंड (England) और ब्रिटनी (Brittany) में ‘जैकेट कुश्ती’ का एक रूप, जिसे ‘कॉर्नवाल व डेवोन (Cornwall and Devon)’ कहा जाता है, चौथी या पांचवीं शताब्दी से प्रख्यात है। रोमन साम्राज्य के शूरवीरों को, एक मार्शल कौशल के रूप में कुश्ती सिखाई जाती थी। मुद्रण की शुरुआत से पहले पांडुलिपियों में और उसके बाद प्रिंट में भी, कुश्ती नियम पुस्तकें दिखाई देती थीं। जबकि, भारत में 1526 की मुगल विजय के बाद, यहां शुरू की गई मंगोलियाई लूज कुश्ती, भारत और पाकिस्तान में ज्ञात है।पहलवानी या कुश्ती, आज इस खेल का भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचलित एक पारंपरिक रूप है। इस खेल ने मुगल साम्राज्य के दौरान आकार लिया, जो फारसी कोष्टी पहलवानी और मल्ल-युद्ध की प्राचीन भारतीय परंपरा के मिश्रण से विकसित हुआ है। सदियों से, पहलवानी एक अनुशासन के रूप में विकसित हुई है। यह न केवल शारीरिक शक्ति और सहनशक्ति की परीक्षा है, बल्कि अनुष्ठान, अनुशासन और सांस्कृतिक विरासत में निहित जीवन का एक तरीका भी है।अखाड़े, न केवल कुश्ती प्रशिक्षण मैदान के रूप में, बल्कि कई युवा पहलवानों के लिए आश्रय के रूप में भी काम करते हैं। लड़के नौ या दस साल की उम्र से ही प्रशिक्षण शुरू कर देते हैं, ताकि भविष्य में वे पेशेवर पहलवान बन सकें। जब छात्र अखाड़े में रहते हैं, तो वे अधिक अनुशासित हो जाते हैं। परंतु आज भारत ने, अखाड़ों की मिट्टी कुश्ती को अंतरराष्ट्रीय मैट कुश्ती में परिवर्तित होतेे देखा है।हाल के वर्षों में, महिलाएं भी इस खेल के केंद्र में रही हैं। साक्षी मलिक, फोगाट बहनें तथा अंतिम पंघाल जैसी महिला कुश्ती खिलाड़ियों का नाम हमने सुना ही हैं।लेकिन, क्या आप जानते हैं कि, भारत में कुश्ती का एक उल्लेख, महाकाव्य महाभारत में, श्री कृष्ण के समय में भी मिलता है। एक बार, भीम, अर्जुन और कृष्ण, ब्राह्मणों के वेश में मगध की राजधानी - राजगृह गए थे। वहां जरासंध राजा ने उनका स्वागत किया, जो कृष्ण के दुश्मन थे। भीम, अर्जुन और कृष्ण ने अपनी असली पहचान बताए बिना, जरासंध को बताया कि भीम उसके साथ कुश्ती करना चाहते थे। दरअसल, भीम जरासंध को मारना चाहते थे। फिर भी, जरासंध ने अपने मेहमानों की तरह उनका शानदार आतिथ्य किया। कुछ दिनों बाद, कुश्ती का मुकाबला शुरू हुआ।जरासंध के मुकाबले, भीम छोटा और कम ताकतवर था, और जरासंध की जान लेने में सक्षम नहीं था। छब्बीस दिनों तक, वे प्रतिदिन तीन घंटे तक युद्ध या कुश्ती करते रहे। तब कृष्ण ने, उस युद्ध को समाप्त करने का सोचा, क्योंकि, उन्हें एहसास हुआ कि वे कुश्ती में जरासंध को नहीं मार सकते। इसलिए उन्होंने गदाओं से युद्ध करने का सुझाव दिया। लेकिन भीम के असंख्य प्रहारों से भी जरासंध नहीं मरा।अमावस्या की रात, जरासंध को अलौकिक शक्तियां प्राप्त होती थी। जब अमावस्या आती है, तो वह अपराजेय होता है। जरासंध भी, भीम को अमावस्या पर मारने का सोच रहा था। इसलिए, कृष्ण ने भीम से उसे अमावस्या के पहले दिन मारने को कहा। उस निर्णायक कुश्ती में, भीम ने जरासंध के पैर को तोड़ा, और उसे विपरीत दिशा में फेंक दिया। अतः जरासंध की मृत्यु हो गई।आधुनिक कुश्ती, दरअसल इन सभी शैलियों से थोड़ी अलग है। एक सामान्य फ्रीस्टाइल कुश्ती मुकाबले को, तीन-तीन मिनट की दो अवधियों में विभाजित किया जाता है और बीच में 30 सेकंड का विराम होता है। आधिकारिक अंडर-15, कैडेटों और अनुभवी प्रतियोगिताओं के लिए, इस अवधि को दो-दो मिनट तक कम कर दिया गया है। दो प्रतिस्पर्धी पहलवान, नौ मीटर व्यास वाली एक चटाई पर एक-दूसरे का सामना करते हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी के कंधों को थोड़े समय के लिए चटाई पर टिकाना होता है, जिससे प्रतिस्पर्धी पहलवान को गिराकर तत्काल जीत मिलती है।चूंकि ऐसी जीत दुर्लभ होती है, इस खेल को अन्य तरीकों से भी जीता जा सकता है। कोई पहलवान, नियम होल्ड (Legal hold), थ्रो (Throw), या टेकडाउन (Takedown) की मदद से प्रतिद्वंद्वी को कुछ सेकंड के लिए, उसे मैट पर पीठ के बल गिराने या रिवर्सल (Reversal) तकनीक अपनाकर, अंक हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं। जबकि, उलटफेर में, रक्षात्मक स्थिति से प्रतिद्वंद्वी की लाभ स्थिति को नकारना और उस स्थिति पर नियंत्रण हासिल करना शामिल है।कुश्ती की चालें, उनकी कठिनाई के अनुसार अंक प्रदान करती हैं। साथ ही, यदि प्रतिद्वंद्वी किसी नियम का उल्लंघन करता है, तो खिलाड़ी ज्यादा अंक प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि, एक मुकाबले के दौरान, तीन चेतावनियां पाने पर दोषी पहलवान को अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।छह मिनट की अवधि के अंत में, कुल अंकों का मिलान किया जाता है, और अधिक अंक वाला पहलवान जीत जाता है। बराबरी की स्थिति में, जिस पहलवान ने एक ही चाल में सबसे अधिक अंक बनाए हैं, उसे विजेता घोषित किया जाता है।आठ ओलंपिक पदक जीतने के बाद, ग्रीष्मकालीन खेलों में, हॉकी के बाद कुश्ती भारत का दूसरा सबसे सफल खेल है। के. डी. जाधव ने भारत को पहला ओलंपिक पदक, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 57 किलो श्रेणी में, हेलसिंकी 1952 (Helsinki 1952) में कांस्य पदक जीतकर दिया था। बीजिंग 2008 (Beijing 2008) में, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 66 किलो श्रेणी में सुशील कुमार ने भी कांस्य पदक जीता था। सुशील कुमार ने ही, समान श्रेणी में लंदन 2012 (London 2012) में रजत पदक पाया। उसी ओलंपिक में, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 60 किलो श्रेणी में योगेश्वर दत्त ने कांस्य पदक जीता।दूसरी ओर, साक्षी मलिक ने रियो 2016 (Rio 2016) में महिलाओं की फ़्रीस्टाइल 58 किलो श्रेणी में कांस्य पदक जीता था। टोक्यो 2020 (Tokyo 2020) के दौरान, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 57 किलो श्रेणी में, रवि कुमार दहिया रजत पदक पाकर जीतते है। उसी ओलंपिक में, बजरंग पुनिया पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 65 किलो श्रेणी में कांस्य पदक जीतते है। जबकि, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 57 किलो श्रेणी में अमन सहरावत ने, हाल ही में पेरिस 2024 (Paris 2024) में कांस्य पदक जीता है।इन्हीं उपलब्धियों के कारण, भारतीय कुश्ती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने हेतु, हमारी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2032 ओलंपिक तक पहलवानों के बुनियादी ढांचे और समर्थन में 170 करोड़ रुपये का निवेश करने की उम्मीद है। भारतीय कुश्ती महासंघ ने हमारी सरकार से यह समर्थन मांगा था। यह प्रायोजन केवल देश के विशिष्ट पहलवानों को ही नहीं, बल्कि कैडेट स्तर के पहलवानों को भी मिलेगा। इससे, राष्ट्रीय चैंपियनों को भी पुरस्कार राशि मिल पाएगी। साथ ही, कैडेट पहलवानों को प्रशिक्षण और प्रदर्शन के लिए विदेश भेजा जा सकता है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/a8xsyz66 2. https://tinyurl.com/3fu7dm5w 3. https://tinyurl.com/4w2r8c29 4. https://tinyurl.com/5cpsajc3 5. https://tinyurl.com/5x8frkzr 6. https://tinyurl.com/yc4rdzwf
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
किस प्रकार ज्ञान की धारा ने किया है हम जौनपुर वासियों को सदैव सशक्त
जौनपुर, आज हम समझेंगे कि मानव प्रगति के लिए, ज्ञान को हमेशा से ही शक्तिशाली और आवश्यक क्यों माना गया है। फिर हम प्राचीन भारतीय ज्ञान की परंपरा और शिक्षा प्रणालियों एवं दर्शन का पता लगाएंगे। बाद में, हम शिक्षा के केंद्र के रूप में जौनपुर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखेंगे। तब हम संस्कृति के विचार को समझेंगे, और जानेंगे कि यह किसी समाज के सांस्कृतिक और बौद्धिक जीवन को कैसे प्रतिबिंबित करती है। और लेख के अंत में, हम देखेंगे कि विभिन्न संस्कृतियां स्थानीय परंपराओं की कहानियों और रूपकों के माध्यम से अपनी संस्कृति को कैसे व्यक्त करती हैं।ज्ञान एक ऐसी शक्ति है, जिसमें हमारे जीवन को बदलने, प्रगति बढ़ाने और भविष्य को आकार देने की शक्ति है। यह व्यक्तियों को सशक्त बनाता है, व्यक्तिगत विकास को सक्षम बनाता है, और सामूहिक उन्नति को बढ़ावा देता है। हालांकि, ऐसी महान शक्ति के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है। समाज और दुनिया पर इसके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, ज्ञान का नैतिक उपयोग करना आवश्यक है। ज्ञान को अपनाकर, जिज्ञासा को बढ़ावा देकर, आलोचनात्मक सोच और नैतिक व्यवहार की संस्कृति को अपनाकर, तथा आजीवन सीखने को बढ़ावा देकर, हम इसकी पूर्ण क्षमता का उपयोग कर सकते हैं। ज्ञान के अधिग्रहण के माध्यम से, व्यक्तियों को अपने विचार एवं बुद्धि को व्यापक बनाने, सूचित निर्णय लेने और अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने का अधिकार मिलता है। सामूहिक रूप से, ज्ञान नवाचार को बढ़ावा देता है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति होती है और जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार होता है। इसलिए, हमें इसका सकारात्मक परिवर्तन के लिए एक शक्ति के रूप में उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि, इसकी शक्ति मानवता को लाभान्वित करती है और सतत विकास को बढ़ावा देती है।भारतीय दर्शन, विचार और चिंतन वे प्रणालियां हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप की सभ्यताओं द्वारा विकसित हुई हैं। उनमें रूढ़िवादी (आस्तिक) प्रणालियां, अपरंपरागत (नास्तिक) प्रणालियां, और दर्शन के वेदांत संप्रदाय शामिल हैं। रूढ़िवादी प्रणालियां, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व-मीमांसा, आदि से बनती हैं। जबकि, अपरंपरागत प्रणालियों में बौद्ध और जैन धर्म शामिल हैं। भारतीय विचार, विभिन्न दार्शनिक समस्याओं पर गौर करता है, जिनमें दुनिया की प्रकृति (ब्रह्मांड विज्ञान), वास्तविकता की प्रकृति (तत्वमीमांसा), तर्क एवं ज्ञान की प्रकृति (ज्ञानमीमांसा), तथा नैतिकता और धर्म का दर्शन, आदि महत्वपूर्ण हैं।इसके अलावा, भारतीय दार्शनिक विचार की आधारशिला तीन बुनियादी अवधारणाओं से बनती है। ये अवधारणाएं, स्वयं या आत्मा, कार्य (कर्म), और मुक्ति (मोक्ष) हैं। चार्वाक संप्रदाय को छोड़कर, संपूर्ण भारतीय दर्शन इन तीन अवधारणाओं और उनके अंतर्संबंधों से संबंधित हैं। इसका मतलब हालांकि यह नहीं है कि, वे इन अवधारणाओं की वस्तुनिष्ठ वैधता को ठीक उसी तरीके से स्वीकार करते हैं। इनमें से कर्म की अवधारणा, सबसे आम तौर पर भारतीय प्रतीत होती है। परंतु, आत्मा की अवधारणा एक निश्चित अर्थ में पारलौकिक या पूर्ण आत्मा की पश्चिमी अवधारणा से मेल खाती है। साथ ही, सर्वोच्च आदर्श की अवधारणा के रूप में, मोक्ष की अवधारणा भी पश्चिमी विचार में रही है। अधिकांश भारतीय दर्शन मानते हैं कि, मोक्ष संभव है, और "मोक्ष की असंभवता" (निर्मोक्ष) को दार्शनिक सिद्धांत को ख़राब करने वाली एक भौतिक भ्रांति के रूप में माना जाता है।भारतीय दर्शन का प्रभाव पूरे भारतवर्ष में देखा जा सकता है। हमारा जौनपुर शहर भी इसमें शामिल है। शर्की राजवंश ने, जौनपुर को दिल्ली के प्रतिद्वंद्वी के रूप में एक शक्तिशाली साम्राज्य में बदल दिया। मलिक सरवर और सुल्तान हुसैन जैसे शासकों के साथ, हमारे जौनपुर क्षेत्र को तैमूर के आक्रमण का तत्काल लाभ मिला। क्योंकि, तब दिल्ली की अराजकता से भाग रहे विद्वानों, कारीगरों और शिल्पकारों को उन शासकों ने जौनपुर में आश्रय दिया। इन प्रभावों ने तुगलक परंपराओं से गहराई से प्रेरित, एक नई वास्तुशिल्प शैली को जन्म दिया। बड़ी दीवारों, स्मारकीय प्रवेश द्वारों और न्यूनतम अलंकरण के साथ मजबूत, सैन्यवादी संरचनाएं जौनपुर में आम होने लगी। इसका उदाहरण भव्य अटाला मस्जिद (1408) में देखा जा सकता है।मध्य गंगा के किनारे जौनपुर की रणनीतिक स्थिति ने, युद्ध-हाथियों जैसे संसाधनों तक पहुंच भी प्रदान की, जो बिहार और बंगाल के जंगलों में घूमते थे। हालांकि, मध्य एशियाई व्यापार मार्गों से इसकी दूरी का मतलब, युद्ध के घोड़ों तक सीमित पहुंच था। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि, शर्की शासकों के अधीन, जौनपुर प्रतिभाशाली व्यक्तियों के लिए एक चुंबक बन गया। संत, सूफ़ी, कवि और विद्वान हमारे शहर में आते रहे, जिससे यह शिक्षा और आध्यात्मिकता का केंद्र बन गया। लोग इसे "पूर्व का शिराज" कहते थे, जो इसके समृद्ध बौद्धिक और कलात्मक जीवन का प्रतीक है। शाह मदार जैसे रहस्यवादियों, संत कबीर सहित भक्ति आंदोलन के नेताओं और महदावी आंदोलन के संस्थापक - सैय्यद मुहम्मद ने हमारे शहर को घर समझा, जिन्होंने इसके जीवंत आध्यात्मिक परिदृश्य को आकार दिया।शर्की राजवंश के पतन के बाद भी, जौनपुर की विरासत जीवित रही। उनके द्वारा प्रवर्तित ज्ञान और संस्कृति की परंपराएं, सदियों तक इस क्षेत्र को प्रभावित करती रहीं। इसके जीवंत बौद्धिक वातावरण ने काजी शिहाब-उद-दीन दौलताबादी और मौलाना ख्वाजगी जैसे दिग्गजों को आकर्षित किया, जिनकी तफ़सीर, फ़िक़्ह और कलाम पर रचनाएं काफी प्रसिद्ध हैं।दर्शन से निकटता से संबंधित एक चीज, ‘संस्कृति' है। ‘संस्कृति’ एक संस्कृत शब्द है, जो किसी समाज या समुदाय के सामूहिक रीति-रिवाजों, परंपराओं और मूल्यों को संदर्भित करता है। भारतीय विरासत के संदर्भ में, संस्कृति पीढ़ियों से चली आ रही समृद्ध और विविध सांस्कृतिक प्रथाओं, भाषाओं, कलाओं और रीति-रिवाजों को समाहित करती है।माना जाता है कि, जिस प्रकार नदी बहती है, उसी तरह ज्ञान और जीवन भी बहता है। ये सभी निरंतरता के सीमाहीन प्रवाह हैं। "गंगा" केवल एक सीमित नदी न होकर, भारतीय संस्कृति में सभी नदियों को संदर्भित करती है। उसी तरह, "सरस्वती" केवल एक देवी नहीं, बल्कि स्वयं ज्ञान का संदर्भ है। जिस प्रकार नदी बहती है और सब कुछ अपने प्रवाह में ले लेती है, उसी प्रकार संस्कृति भी बहती रहती है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय रूपक में संस्कृति अलग-अलग हो सकती है। इस संस्कृति से ‘ज्ञान की धाराएं’ संबंधित हैं, जिनका अर्थ ज्ञान एवं आध्यात्मिकता का प्रसारण है।विश्व भर में संस्कृति, ज्ञान और नदियों की अवधारणाएं :1. एशिया/ऑस्ट्रेलिया की संस्कृतिसंस्कृत धातु "सृ" का अर्थ "बहना” या "प्रवाह करना" है, जिससे सरिता अर्थात नदी निकलती है। सार या सरस्वती सरिता का जल, एशिया से होकर बहता है। इसी सार या पानी के साथ, कुछ ऑस्ट्रेलियाई पौराणिक कथाएं सामने आई। एक कथा इस प्रकार है - दरअसल, एक समय दो भाई रेगिस्तान से उभरे। फिर, उन्होंने धरती को खोदना शुरू किया, जब तक कि वे पानी तक नहीं पहुंच गए। तब उन्होंने नदियों, पहाड़ों, फूलों और पेड़ों की स्थापना की। जब इन भाइयों की मृत्यु हो गई, तो वे पानी के सांपों के रूप में पुनर्जन्म लेते रहे, नदियों में बहते रहे, और इसके पश्चात उनकी आत्माएं बादलों का निर्माण करते हुए आकाश में उड़ गईं। ये बादल बारिश लाते रहते हैं, और उनका पानी एशिया/ऑस्ट्रेलिया की संस्कृति में ज्ञान की धाराओं के माध्यम से बहता रहता है।2. अफ़्रीका की संस्कृतियोरूबा (Yoruba) लोगों के लिए उनके आराध्य - ओरुनमिला (Orunmila), ज्ञान, कुशाग्रता और दूरदर्शिता की ओरिशा (Orisha), अर्थात भौतिक रूप में प्रकट आत्मा है। उनकी पत्नी - ओसुन (Osun) नदी की देवी हैं, जो ताजे पानी, उर्वरता और सुंदरता की आत्मा हैं। जबकि उनका पानी भूमि और लोगों का पोषण करता है, ओरुनमिला शहरों और गांवों में यात्रा करते हैं। वे भविष्यवाणी के माध्यम से लोगों के जीवन को ठीक भी करते हैं। ओरुनमिला की तरह, अफ़्रीका की संस्कृति की धाराएं स्थानों और भाषाओं में बहती हैं, तथा ज्ञान की नदी से अंतर्दृष्टि प्राप्त करती हैं।3. यूरोप की संस्कृतियुद्ध की देवी और शहर की रक्षक – एथेना (Athena), संघर्ष और हिंसा से बढ़कर तर्क और वृत्ति को महत्व देती है। वह शिल्प, साहित्य और कृषि की संरक्षक भी है। उन्होंने बांसुरी का आविष्कार किया था, और उनका प्रतिनिधित्व उल्लू द्वारा किया जाता है। यह उल्लू उनकी बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक है। उनका नेडॉन नदी (Nedon river) पर एक पुण्यस्थान भी है। दूसरी ओर, एथिया (Aethiya) के रूप में, वह जहाज निर्माण और नेविगेशन में कुशल है। यूरोप के शहरों में ज्ञान की कई धाराएं बहती हैं। इनके तटों पर ज्ञानी और देखभाल करने वाली देवी - सोफिया की भी पूजा की जाती है। वह भाग्य की देवता एवं महिला प्रतिनिधि है, तथा समय और स्थान पर राज करती है।एथेना4. चीन की संस्कृतिक्विंगशुई नदी (Qingshui river) के स्रोत पर, माउंट वुताई (Mount Wutai) है, जो चीन के चार पवित्र पहाड़ों में से एक है। यह एक युवा बोधिसत्व - मंजुश्री का निवास है, जो महान ज्ञान का अवतार है, और सौम्य महिमा से देदीप्यमान है। मंजुश्री, अंतर्दृष्टि की एक ज्वलंत शक्ति से अज्ञानता और पीड़ा को दूर करते है। अपने बाएं हाथ से अपने हृदय में, वह एक कमल धारण करते है, जिस पर महान बुद्धि सूत्र लिखा है। जब मंजुश्री के कमल का डंठल, पारलौकिक ज्ञान की ओर ले जाता है, तब चीनी संस्कृति की धाराएं, उसे ज्ञान की महान नदी की ओर ले जाती हैं।5. मध्य पूर्व की संस्कृतिप्राचीन मिस्र की बुद्धि और ज्ञान की देवी – सेशत (Seshat) ने लेखन का आविष्कार किया था। सेशत, थॉट (Thot) की समकक्ष हैं, जो लेखन और ज्ञान के चंद्र देवता हैं। उनके पुस्तकालय की वह मालकिन भी हैं। वह पानी के माध्यम से प्रजनन क्षमता प्रदान करने वाली देवी - आइसिस (Isis) से भी जुड़ी हैं। लेखन के कार्य में चित्रित, वह एकमात्र देवी हैं। वह वास्तुकला, खगोल विज्ञान, ज्योतिष, भवन निर्माण, गणित, इतिहास और सर्वेक्षण की भी देवी हैं। अंतरिक्ष और समय के पार से ज्ञान की ये विविध धाराएं, मध्य पूर्व संस्कृति की नदी में विलीन होती हैं।6. अमेरिका की संस्कृतिक्वेट्ज़ेलकोटल (Quetzelcoatl), सीखने, ज्ञान और लेखन के अमेरिकी देवता हैं। अपने जुड़वां देवता - ज़ोलोटल (Xolotl) के साथ, वह मानव जाति, हवा और बारिश के निर्माता है। मानव जाति के देवता के रूप में वह हमारी आंतरिक ऊर्जा का प्रतीक हैं। अमेरिका की संस्कृति की जीवंतता उसके ज्ञान की धाराओं में है, जो सीमाओं से परे और आगे बढ़ती है। संदर्भ1. https://tinyurl.com/6am8mzpj 2. https://tinyurl.com/yk7ht8ry 3. https://tinyurl.com/ms8pnbsv 4. https://tinyurl.com/3nkyyjn9 5. https://tinyurl.com/bdh5k2hs
आधुनिक राज्य : 1947 ई. से वर्तमान तक
क्या 75 साल पुराना नेटो गठबंधन अब सिर्फ इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा?
दुनिया भर में 32 देशों का एक ऐसा सैन्य गठबंधन चर्चा में है, जो शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के ख़िलाफ़ बना था, लेकिन आज अपने ही सबसे बड़े सदस्य देश अमेरिका की नीतियों की वजह से ऐतिहासिक संकट का सामना कर रहा है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध ने जहां एक तरफ़ इस गठबंधन को अपनी सैन्य ताक़त बढ़ाने पर मजबूर किया है, वहीं अमेरिकी नेतृत्व के नए बयानों और रक्षा ख़र्च की चेतावनियों ने नेटो के भविष्य पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नेटो क्या है और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसे क्यों बनाया गया?नेटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन की स्थापना साल 1949 में अमेरिका, कनाडा और पश्चिमी यूरोप के कई राष्ट्रों द्वारा मिलकर की गई थी। इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य सोवियत संघ के ख़िलाफ़ सामूहिक सुरक्षा प्रदान करना था। यह पहला ऐसा शांतिकालीन सैन्य गठबंधन था जिसमें अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध के बाहर शामिल हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध की भारी तबाही के बाद, यूरोप के देश अपनी चरमराई अर्थव्यवस्थाओं को फिर से बनाने और अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे थे। उस वक़्त युद्ध से तबाह हुए परिदृश्य में उद्योगों को फिर से स्थापित करने और खाद्य उत्पादन को बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता की सख़्त ज़रूरत थी।नेटो का झंडाइसके साथ ही, एक बार फिर से ताक़तवर होते जर्मनी या सोवियत संघ की घुसपैठ के ख़िलाफ़ यूरोप को सुरक्षा आश्वासनों की भी दरकार थी। अमेरिका का मानना था कि पूरे यूरोप में कम्युनिस्ट विस्तार को रोकने के लिए एक आर्थिक रूप से मज़बूत, हथियारों से लैस और एकजुट यूरोप बेहद ज़रूरी है। इसी रणनीति के तहत तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री जॉर्ज मार्शल ने यूरोप को बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता देने का प्रस्ताव रखा। इसे यूरोपीय रिकवरी प्रोग्राम या 'मार्शल प्लान' कहा गया, जिसने न केवल यूरोपीय आर्थिक एकीकरण को सुगम बनाया बल्कि अमेरिका और यूरोप के बीच साझा हितों को भी मज़बूत किया। जब सोवियत संघ ने इस मार्शल प्लान में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया और अपने पूर्वी यूरोपीय सहयोगी देशों को भी यह आर्थिक सहायता लेने से रोक दिया, तो यूरोप में पूर्व और पश्चिम के बीच की खाई और गहरी हो गई। साल 1947 और 1948 के दौरान कई ऐसी भू-राजनीतिक घटनाएं हुईं जिन्होंने पश्चिमी यूरोप के देशों को अपनी भौतिक और राजनीतिक सुरक्षा के प्रति चिंतित कर दिया। ग्रीस में चल रहे गृह युद्ध और तुर्की में बढ़ते तनाव के कारण तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन को यह ऐलान करना पड़ा कि अमेरिका दोनों देशों को आर्थिक और सैन्य सहायता प्रदान करेगा। इसी बीच चेकोस्लोवाकिया में सोवियत समर्थित तख्तापलट हुआ और जर्मनी की सीमाओं पर एक कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में आ गई। साल 1948 के मध्य में सोवियत प्रीमियर जोसेफ स्टालिन ने पश्चिमी देशों के संकल्प को परखने के लिए पश्चिम बर्लिन की नाकेबंदी कर दी, जिससे अमेरिका और सोवियत संघ सीधे टकराव के कगार पर आ गए थे। इन घटनाओं ने ट्रूमैन प्रशासन को पश्चिमी यूरोप की सुरक्षा के लिए एक ठोस यूरोपीय-अमेरिकी गठबंधन बनाने पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया। सामूहिक रक्षा में इसका उद्देश्य क्या है और इसके सदस्य कौन हैं?बढ़ते तनाव और सुरक्षा चिंताओं के जवाब में पश्चिमी यूरोपीय देश सामूहिक सुरक्षा समाधान पर विचार करने के लिए आगे आए। मार्च 1948 में ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्ज़मबर्ग ने ब्रुसेल्स संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि ने सामूहिक रक्षा का आधार तय किया, जिसके तहत यदि इनमें से किसी एक राष्ट्र पर हमला होता है, तो अन्य देश उसकी रक्षा के लिए बाध्य होंगे। महीनों की लंबी बातचीत और अमेरिकी कांग्रेस में कई बहसों के बाद, आख़िरकार 1949 में नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते में यह सहमति बनी कि किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमले को सभी पर हमला माना जाएगा। इस संधि के मूल 12 सदस्य अमेरिका, कनाडा, बेल्जियम, डेनमार्क, फ्रांस, आइसलैंड, इटली, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल और यूनाइटेड किंगडम थे। यह सामूहिक रक्षा व्यवस्था औपचारिक रूप से केवल यूरोप या उत्तरी अमेरिका में होने वाले हमलों पर लागू होती थी और इसमें औपनिवेशिक क्षेत्रों के संघर्षों को शामिल नहीं किया गया था। बाद में कोरियाई युद्ध के छिड़ने से नेटो सदस्यों ने तेज़ी से एक केंद्रीकृत मुख्यालय के ज़रिए अपने रक्षा बलों को एकीकृत और समन्वित करना शुरू कर दिया। साल 1952 में ग्रीस और तुर्की को नेटो में शामिल किया गया और 1955 में पश्चिमी जर्मनी भी इसका हिस्सा बन गया। पश्चिमी जर्मनी के प्रवेश के जवाब में सोवियत संघ ने अपना अलग 'वारसॉ ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन' (वारसॉ पैक्ट) बनाया। 1950 के दशक में नेटो का सैन्य सिद्धांत 'बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई' के इर्द-गिर्द घूमता था, जिसका मतलब था कि किसी भी हमले का जवाब अमेरिका बड़े परमाणु हमले से देगा। शीत युद्ध की ज़रूरतों के लिए बना यह गठबंधन उस संघर्ष के ख़त्म होने के बाद भी न सिर्फ़ क़ायम रहा, बल्कि इसका लगातार विस्तार हुआ है। वर्तमान में नेटो के सदस्यों की संख्या 32 तक पहुंच गई है, जिनमें कई पूर्व सोवियत राज्य भी शामिल हैं। आज यह दुनिया का सबसे बड़ा शांतिकालीन सैन्य गठबंधन है। इसका मुख्यालय ब्रुसेल्स में है और यह आम सहमति पर आधारित गठबंधन है जहां सभी फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। हाल के वर्षों में रूस के बढ़ते ख़तरे को देखते हुए स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों ने भी अपनी पारंपरिक सैन्य गुटनिरपेक्ष नीति को छोड़कर नेटो की सदस्यता हासिल कर ली है। फिनलैंड अप्रैल 2023 में शामिल हुआ, जिससे रूस के साथ नेटो की सीमा दोगुनी हो गई, और तुर्की व हंगरी के राजनीतिक विवादों के सुलझने के बाद मार्च 2024 में स्वीडन भी इसका पूर्ण सदस्य बन गया। रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक सुरक्षा में नेटो की क्या भूमिका है?शीत युद्ध के बाद नेटो ने अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना शुरू किया। 1990 के दशक की शुरुआत में यूगोस्लाविया के विघटन और बोस्निया में जातीय संघर्ष के दौरान नेटो ने पहली बार अहम भूमिका निभाई और अप्रैल 1994 में अपने इतिहास के पहले लड़ाकू अभियान में बोस्नियाई सर्ब विमानों को मार गिराया। इसके इतिहास में पहली और इकलौती बार 'आर्टिकल 5' का इस्तेमाल अमेरिका पर हुए 9/11 के आतंकी हमलों के बाद किया गया था। इसके परिणामस्वरूप अफ़ग़ानिस्तान में एक बड़ा मिशन शुरू हुआ, जिसमें 50 गठबंधन और भागीदार देशों के 130,000 से ज़्यादा सैनिकों ने हिस्सा लिया। यह ऐतिहासिक सैन्य अभियान साल 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के साथ समाप्त हुआ। साल 2022 की शुरुआत में रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए हमले ने यूरोप के पूरे सुरक्षा ढांचे को हिला कर रख दिया। यूक्रेन हालांकि नेटो का सदस्य नहीं है, लेकिन अमेरिका सहित कई नेटो देशों ने उसे अभूतपूर्व मात्रा में सैन्य सहायता प्रदान की है। इसमें टैंक, भारी तोपखाने, सशस्त्र ड्रोन और विमान भेदी प्रणालियां जैसे आधुनिक हथियार शामिल हैं। हालांकि, नेटो नेताओं ने सीधे तौर पर रूस के साथ सीधे संघर्ष में उलझने या 'नो-फ्लाई ज़ोन' लागू करने से बचने की पूरी कोशिश की है। फिर भी, रूस ने कड़ी चेतावनी दी है कि इस सहायता को देकर नेटो सहयोगी परमाणु युद्ध के भड़कने का भारी जोखिम उठा रहे हैं। यूक्रेन लगातार पूर्ण नेटो सदस्यता हासिल करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा होना मुश्किल है। रूसी आक्रामकता ने नेटो को अपनी पूर्वी सीमाओं पर रक्षा प्रणाली मज़बूत करने के लिए विवश कर दिया है। 2014 के बाद से नेटो ने अपने सैन्य अभ्यास काफ़ी बढ़ा दिए हैं और बुल्गारिया, एस्टोनिया, हंगरी, लातविया, लिथुआनिया, पोलैंड, रोमानिया और स्लोवाकिया में नए कमांड सेंटर खोले हैं। 2017 में नेटो ने बाल्टिक राज्यों और पोलैंड में बहुराष्ट्रीय युद्ध समूहों को तैनात करना शुरू किया और रोमानिया में एक नया बहुराष्ट्रीय बल बनाया। इसके अलावा, गठबंधन ने अपनी पूर्वी सीमाओं पर हवाई गश्त में इज़ाफ़ा किया है। जून 2025 में द हेग, नीदरलैंड्स में होने वाले नेटो शिखर सम्मेलन में यह उम्मीद की जा रही है कि भविष्य के हमलों से बचने के लिए वायु और मिसाइल रक्षा प्रणाली में चार सौ प्रतिशत की वृद्धि को मंज़ूरी दी जाएगी। क्या अमेरिका नेटो के भविष्य के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन गया है?जहां एक तरफ़ नेटो रूस से मिल रही सैन्य चुनौतियों का सामना कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ सत्ता में लौटे अमेरिकी प्रशासन के रवैये ने गठबंधन के भीतर एक अभूतपूर्व संकट पैदा कर दिया है। आज यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका ही नेटो के भविष्य के लिए नंबर एक ख़तरा बनकर उभरा है। जनवरी 2025 में कार्यभार संभालने के बाद, डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने यूक्रेन के लिए अपने समर्थन को कमज़ोर कर दिया है, कुछ सैन्य सहायता को अस्थायी रूप से रोक दिया है और मॉस्को के बजाय कीव पर संघर्ष विराम के लिए रियायतें देने का ज़्यादा दबाव बनाया है। फ़रवरी 2025 में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने यूक्रेन के नेटो में शामिल होने की संभावना को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया। रक्षा ख़र्च को लेकर भी अमेरिका और अन्य नेटो सदस्यों के बीच मतभेद चरम पर हैं। ट्रम्प प्रशासन अब नेटो सदस्यों से अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 5 प्रतिशत रक्षा पर ख़र्च करने की मांग कर रहा है, जिसमें से 3.5 प्रतिशत मुख्य रक्षा ख़र्च और 1.5 प्रतिशत रक्षा-संबंधी व्यय होना चाहिए। मार्च 2025 में उन्होंने यहां तक सुझाव दे दिया कि जो सदस्य देश रक्षा ख़र्च में पर्याप्त योगदान नहीं दे रहे हैं, अमेरिका उनकी रक्षा नहीं करेगा। ट्रम्प प्रशासन के इस बदलते रुख और बार-बार दी जा रही चेतावनियों ने यूरोप के देशों में अपनी सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा कर दी है। इसके अलावा, ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति की ताज़ा बयानबाज़ी ने पूरे गठबंधन को गहरे असमंजस में डाल दिया है। वेनेज़ुएला में ऑपरेशन के बाद, अमेरिका ने कथित तौर पर ग्रीनलैंड को अपने अगले हस्तक्षेप के स्थान के रूप में चिह्नित किया है। ग्रीनलैंड अमेरिका, कनाडा और आर्कटिक की रक्षा के लिए एक अहम रणनीतिक स्थिति रखता है और अमेरिकी अंतरिक्ष कमान (स्पेस कमांड) का मुख्य केंद्र भी है। लेकिन अगर अमेरिका वास्तव में ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने के लिए सैन्य आक्रमण करता है, तो यह तकनीकी रूप से नेटो संधि के आर्टिकल 5 को ट्रिगर कर देगा, जिसके तहत सभी सदस्य देशों को डेनमार्क की रक्षा के लिए आना होगा। इस संभावित ख़तरे के जवाब में डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि डेनमार्क ग्रीनलैंड पर किसी भी क़दम का कड़ा विरोध करेगा। डेनिश सेना को 1952 के एक निर्देश की भी याद दिलाई गई है जो उन्हें उच्च कमान के आदेशों का इंतज़ार किए बिना डेनिश क्षेत्र पर किसी भी हमले का तुरंत जवाब देने की शक्ति देता है। आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों के कारण वहां नेटो की मौजूदगी पहले से ही बढ़ रही है। जानकारों का कहना है कि अगर अमेरिका इसी तरह नेटो के उन बहुपक्षीय सिद्धांतों से दूर जाता रहा जिन पर इस गठबंधन की नींव रखी गई थी, तो नेटो को जल्द ही अपनी भविष्य की रणनीति को फिर से परिभाषित करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। संदर्भ 1. https://tinyurl.com/h2oqj3a 2. https://tinyurl.com/2zqqdpcm 3. https://tinyurl.com/29fhngv4 4. https://tinyurl.com/29wmjhvh 5. https://tinyurl.com/28fvhs79 6. https://tinyurl.com/22bk59me
प्रारंभिक मध्यकाल : 1000 ई. से 1450 ई.
1000 साल, 7 शहर और इतने साम्राज्य: क्या आप जानते हैं हमारी राजधानी दिल्ली का यह इतिहास?
जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो दिल्ली की एक बेहद अनोखी तस्वीर सामने आती है। दिल्ली के पुरातात्विक निष्कर्षों और हालिया खुदाइयों ने यह साबित कर दिया है कि यहाँ तीसरी और चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर मुग़ल काल तक सांस्कृतिक परतों की एक निरंतर और अटूट श्रृंखला मौजूद रही है। इतिहासकार और पुरातत्वविद उस समय और भी हैरान रह गए जब यहाँ खुदाई के दौरान मिट्टी के बर्तनों के ऐसे अवशेष (पॉटरी फ्रैगमेंट्स) मिले जिनका समय काल लगभग एक हज़ार से पाँच सौ ईसा पूर्व माना जाता है। ये प्राचीन अवशेष इस बात की गवाही देते हैं कि दिल्ली महज़ कुछ सौ साल पुराना शहर नहीं है, बल्कि यह हज़ारों सालों से मानव सभ्यता और संस्कृति का एक बेहद महत्वपूर्ण और जीवंत केंद्र रहा है। शासक बदलते रहे, लेकिन इस ज़मीन ने हर दौर की संस्कृति को अपने भीतर संजो कर रखा। दिल्ली के सात शहर – गॉर्डन रिस्ले हर्न, 1906दिल्ली के सात शहर:तोमर और चौहान वंश ने दिल्ली के पहले शहर 'लाल कोट' की नींव कैसे रखी?अगर हम दिल्ली के पहले आधिकारिक शहर की बात करें, तो इसका निर्माण ग्यारहवीं शताब्दी में हुआ था। दिल्ली के इस सबसे पहले शहर को 'लाल कोट' के नाम से जाना जाता था, जिसकी स्थापना साल एक हज़ार साठ ईस्वी में तोमर वंश के शासकों द्वारा की गई थी। तोमर वंश ने इस शहर को अपनी सत्ता का एक मज़बूत केंद्र बनाया था। लेकिन बारहवीं शताब्दी के मध्य में इतिहास ने फिर करवट ली और चौहान वंश ने तोमर शासकों को सत्ता से हटाकर इस क्षेत्र पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। चौहान शासकों ने इस शहर को केवल जीता ही नहीं, बल्कि इसका विस्तार भी किया। उन्होंने लाल कोट की पुरानी सीमाओं को और आगे बढ़ाया और इस नई व विस्तारित संरचना को 'क़िला राय पिथौरा' का नाम दिया। यह क़िला आज भी दिल्ली के शुरुआती राजनीतिक और सैन्य इतिहास का एक सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।दिल्ली सल्तनत के दौर में 'सीरी' और 'तुग़लक़ाबाद' का निर्माण कैसे हुआ?दिल्ली ने सही मायनों में एक विशाल साम्राज्य की राजधानी का रूप तब लिया जब यहाँ 'दिल्ली सल्तनत' की स्थापना हुई। इसी दौर में दिल्ली का दूसरा शहर बसाया गया जिसे 'सीरी' के नाम से जाना गया। सत्ता के गलियारों में बदलाव का दौर जारी रहा और ख़िलजी वंश के पतन के बाद सत्ता तुग़लक़ वंश के हाथों में आ गई। साल तेरह सौ बीस से लेकर तेरह सौ चौबीस ईस्वी तक राज करने वाले ग़यासुद्दीन तुग़लक़ इस वंश के पहले शासक थे। अपनी सामरिक और प्रशासनिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने दिल्ली के तीसरे शहर की नींव रखी, जिसे आज हम 'तुग़लक़ाबाद' के नाम से जानते हैं। इसके विशाल और ऊँचे खंडहर आज भी तुग़लक़ वंश की वास्तुकला और उनके भव्य इरादों की गवाही देते हैं।'जहाँपनाह' और 'फ़िरोज़ाबाद' के ज़रिए दिल्ली का भूगोल कैसे बदला गया?तुग़लक़ वंश के शासकों ने दिल्ली के भूगोल और इसके शहरों के निर्माण में सबसे अहम भूमिका निभाई थी। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ के बाद जब मुहम्मद-बिन-तुग़लक़ सत्ता में आए, तो उन्होंने साल तेरह सौ छब्बीस-सत्ताईस ईस्वी में एक बहुत ही अनूठा निर्माण कार्य करवाया। उन्होंने दिल्ली के दो पुराने शहरों, यानी लाल कोट और सीरी को दो विशाल दीवारों के ज़रिए आपस में जोड़ दिया। इस तरह लाल कोट और सीरी के बीच की ज़मीन को सुरक्षित करके दिल्ली का चौथा शहर बसाया गया, जिसे 'जहाँपनाह' नाम दिया गया। इसके बाद साल तेरह सौ इक्यावन से तेरह सौ अट्ठासी तक शासन करने वाले फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने वास्तुकला की इस परंपरा को और आगे बढ़ाया। उन्होंने यमुना नदी के शांत तटों पर दिल्ली के पाँचवें शहर 'फ़िरोज़ाबाद' का निर्माण करवाया। हालांकि, यह भी एक ऐतिहासिक सत्य है कि दिल्ली पर राज करने वाले हर वंश ने अपना कोई नया शहर नहीं बसाया। पंद्रहवीं शताब्दी में राज करने वाले सैय्यद वंश और पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य में राज करने वाले लोधी वंश ने अपने पीछे दिल्ली में कोई विशेष नया शहर या राजधानी नहीं छोड़ी।दिल्ली का नक्शा – मिसेज़ शूस्मिथ का बनाया मज़ेदार कार्टून नक्शा (1930)मुग़ल साम्राज्य ने 'दीनपनाह' और 'शाहजहाँनाबाद' की भव्यता को कैसे तराशा?सोलहवीं शताब्दी के मध्य से लेकर सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक दिल्ली ने मुग़ल साम्राज्य की राजधानी के रूप में एक बहुत ही अस्थिर दौर देखा, जहाँ सत्ता का केंद्र अक्सर बदलता रहता था। मुग़ल बादशाह हुमायूँ ने वास्तुकला के इस ऐतिहासिक सफ़र में अपना योगदान देते हुए साल पंद्रह सौ तैंतीस ईस्वी में 'दीनपनाह' का निर्माण करवाया, जिसे दिल्ली का छठा शहर माना जाता है। लेकिन दिल्ली का सबसे भव्य और ऐतिहासिक रूप तब सामने आया जब मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने सत्ता सँभाली। साल सोलह सौ उनतालीस ईस्वी में बादशाह शाहजहाँ ने मुग़ल साम्राज्य की राजधानी को वापस दिल्ली लाने का एक बड़ा ऐतिहासिक फ़ैसला किया। इसी फ़ैसले के तहत उन्होंने एक पूरी तरह से चारदीवारी से घिरे हुए नए शहर का निर्माण करवाया। इस शहर को 'शाहजहाँनाबाद' का नाम दिया गया, जो मुग़ल वास्तुकला का सबसे बेहतरीन नमूना बना और इसे दिल्ली का सातवाँ शहर कहा गया। अलेक्जेंडर राउज़ (Alexander Rouse), पीडब्ल्यूडी (PWD), दिल्ली का नक्शाअंग्रेज़ों ने अपनी राजधानी के रूप में कलकत्ता छोड़कर आधुनिक 'नई दिल्ली' की रूपरेखा कैसे तैयार की?समय का पहिया घूमता रहा और भारत के राजनीतिक परिदृश्य में एक बहुत बड़ा बदलाव तब आया जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी ताक़त बढ़ानी शुरू की। साल अठारह सौ तीन ईस्वी में अंग्रेज़ों ने मराठों को एक निर्णायक युद्ध में हरा दिया और दिल्ली की ऐतिहासिक ज़मीन पर अपना पूरा कब्ज़ा कर लिया। लंबे समय तक अंग्रेज़ों की राजधानी कलकत्ता ही रही, लेकिन साल उन्नीस सौ ग्यारह ईस्वी में ब्रिटिश साम्राज्य ने एक बहुत ही अहम रणनीतिक फ़ैसला लिया। उन्होंने अपनी राजधानी को कलकत्ता से हटाकर पूरी तरह से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया। प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने और ब्रिटिश सत्ता की भव्यता को दर्शाने के लिए मुग़लों द्वारा बसाए गए पुराने शहर 'शाहजहाँनाबाद' के दक्षिण-पश्चिम इलाके में एक बिल्कुल नया शहर बसाया गया। इस नए और आधुनिक शहर को 'नई दिल्ली' का नाम दिया गया, जो आज भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की गौरवशाली राजधानी के रूप में शान से खड़ा है।दिल्ली को 'सात शहरों' (Seven Cities of Delhi) के रूप में देखने का नज़रिया आखिर मशहूर कैसे हुआ? दरअसल, इस पहचान को लोकप्रिय बनाने का बहुत बड़ा श्रेय गॉर्डन रिस्ले हर्न (Gordon Risley Hearn) को जाता है। सर गॉर्डन रिस्ले हर्न भारत में तैनात एक ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी (इंजीनियर) और कर्नल थे। उनके पिता का नाम चार्ल्स शकबर्ग हर्न (1829–1884) और माता का नाम मार्गरेट मिलर मेगौन (1844–1932) था। उन्होंने अपनी शिक्षा विंचेस्टर कॉलेज, वूलविच मिलिट्री अकादमी और स्कूल ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग से पूरी की। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध किताब 'द सेवन सिटीज़ ऑफ़ दिल्ली' में सबसे पहले इस मुहावरे को गढ़ा था और दिल्ली के इस ऐतिहासिक सफर की तुलना सात पहाड़ियों वाले 'रोम' (Rome) शहर से की थी।हर्न के इस ऐतिहासिक विचार को एक बेहद दिलचस्प और विज़ुअल रूप तब मिला, जब 1931 में 'नई दिल्ली' के औपचारिक उद्घाटन के मौके पर मिसेज शूस्मिथ (Mrs. Shoosmith) ने एक अद्भुत नक्शा तैयार किया। मिसेज शूस्मिथ, दिल्ली के निर्माण से जुड़ी प्रमुख ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स टीम (लुटियंस-बेकर) के एक सदस्य की पत्नी थीं। कॉमिक और मज़ेदार अंदाज़ में हाथ से बनाए गए इस नक़्शे (non-scale map) में दिल्ली के सभी 7 ऐतिहासिक शहरों के सफर को एक ही पन्ने पर बेहद बारीकी से कैद किया गया था। समय के उस दुर्लभ पल को दर्शाने वाले इस शानदार नक़्शे की इकलौती ज्ञात प्रति आज कैम्ब्रिज (Cambridge) में मिसेज शूस्मिथ के लिगेसी बॉक्स में सुरक्षित रखी गई है। संदर्भ 1. https://tinyurl.com/28aadpb62. https://tinyurl.com/2bcg3z3k3. https://tinyurl.com/25bztq5l4. https://tinyurl.com/6d8ewjn9
तितलियाँ और कीट
तितलियों का अद्भुत प्रवास और प्रकृति से उनका गहरा जुड़ाव
तितलियों का प्रवास प्रकृति के सबसे अद्भुत दृश्यों में से एक माना जाता है। हर साल कुछ तितलियाँ मौसम बदलने के साथ कभी कभी हजारों किलोमीटर की यात्रा करती हैं। वे ठंड, भोजन की कमी और बदलते वातावरण से बचने के लिए ऐसे स्थानों की ओर जाती हैं, जहाँ उन्हें फूलों का रस और अपने बच्चों के लिए उपयुक्त पौधे मिल सकें।दुनिया की सभी तितलियाँ प्रवास नहीं करतीं, लेकिन मोनार्क, पेंटेड लेडी और रेड एडमिरल जैसी कुछ प्रजातियाँ लंबी यात्राओं के लिए जानी जाती हैं। ये तितलियाँ मौसम और दिन की अवधि में होने वाले बदलावों को पहचानकर सही दिशा में उड़ान भरती हैं।तितलियों का यह सफर केवल उनका जीवन बचाने के लिए ही नहीं होता, बल्कि यह प्रकृति के संतुलन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। प्रवास के दौरान वे कई फूलों का परागण करती हैं, जिससे पौधों और जंगलों का जीवन चक्र चलता रहता है।तितलियों के प्रवास का अध्ययन वैज्ञानिकों को जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और प्राकृतिक आवासों की स्थिति को समझने में भी मदद करता है। इस तरह तितलियों की ये लंबी यात्राएँ प्रकृति और जीवन के बीच एक सुंदर जुड़ाव को दर्शाती हैं।संदर्भ:https://tinyurl.com/yfn5spw7https://tinyurl.com/y5ussmrf https://tinyurl.com/zmafb44x https://tinyurl.com/332ae3mt
अवधारणा II - नागरिक की पहचान
27-07-2026 09:25 AM • Jaunpur District-Hindi
अरुणाचल प्रदेश की न्यीशी जनजाति की ब्योपा टोपी, प्रकृति के साथ सामंजस्य बयां करती है
जौनपुर, हम आपको बता दें कि हमारे देश के पूर्वोत्तर राज्य - अरुणाचल प्रदेश की जंगली पहाड़ियों में, न्यीशी जनजाति वास करती है। यह जनजाति, एक समय अपनी पारंपरिक सिर टोपी को बड़े हॉर्नबिल (Hornbill) (धनेश पक्षी) की चोंचों से सजाती थी, जो गर्व और योद्धा प्रवृत्ति का प्रतीक थी। लेकिन जैसे-जैसे ये पक्षी कम होने लगे, वही लोग जो कभी उनका शिकार करते थे, उनके सबसे बड़े रक्षक बन गए। आज, न्यीशी शिल्पकार बिना किसी हॉर्नबिल पक्षी की जान लेकर भी, अपनी संस्कृति को जीवित रखते हुए, बांस और लकड़ी से हूबहू चोंच बनाते हैं।
गीतों, अनुष्ठानों और कहानियों के माध्यम से, अरुणाचल प्रदेश में हॉर्नबिल एक प्रतीक से आगे बढ़कर, सह-अस्तित्व का एक पवित्र तत्व है। जनजाति के बुजुर्ग, युवाओं को सिखाते हैं कि, हॉर्नबिल की रक्षा करना जंगल की रक्षा करना है, क्योंकि ये पक्षी बीज वाहक हैं। न्यीशी हृदयभूमि में ऐसा संरक्षण, कानून द्वारा नहीं, बल्कि प्रेम द्वारा किया जाता है।
न्यीशी जनजाति अरुणाचल प्रदेश की मूल जनजातियों में से एक है, और प्रकृति के साथ घनिष्ठ सामंजस्य में रहती है। वे भोजन, आश्रय, चिकित्सा, जादु या धार्मिकं, सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाओं व अपने जीवन के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। इसी तरह, ब्योपा, उनके हस्तनिर्मित सांस्कृतिक पोशाकों में से एक प्रकार है, और इसका उपयोग पारंपरिक टोपी के रूप में किया जाता है। पहले, इसे पारंपरिक रूप से पुजारी (न्यूब) द्वारा जादू या धार्मिक प्रथाओं के दौरान, और अन्य सदस्यों द्वारा अपने दैनिक जीवन में पहना जाता था। हालांकि, आजकल यह सांस्कृतिक पोशाक न्यीशी दिवस, न्योकुम त्यौहार और विवाह उत्सव जैसे शुभ अवसरों के दौरान ही पहनी जाती है।
ब्योपा को इसके कारीगरों और स्थानीय लोगों के कल्याण के लिए, भौगोलिक संकेत (जीआई) के माध्यम से संरक्षित करने की आवश्यकता है। दरअसल, इस पारंपरिक टोपी का मुख्य आधार या ढांचा, बेंत की विशेष स्थानीय प्रजातियों से बुना जाता है, जो इसे मजबूती और निश्चित आकार प्रदान करता है। इस टोपी की सबसे प्रमुख विशेषता इसके सामने के हिस्से पर लगी हॉर्नबिल की प्रतिकृति चोंच होती है। पहले इसके लिए असली पक्षी की चोंच का उपयोग होता था, लेकिन वन्यजीव संरक्षण के चलते, अब इसे स्थानीय लकड़ियों को तराश कर बनाया जाता है। इस चोंच के पिछले हिस्से की ओर, सजावट के लिए एक पंख लगाया जाता है। वर्तमान समय में, इसके लिए पालतू मस्कोवी बत्तख के पंखों का उपयोग किया जाता है। टोपी के पिछले हिस्से को सजाने के लिए, हालांकि कृत्रिम बालों का प्रयोग किया जाता है। पुराने समय में, जनजाति के पुरुष लंबे बाल रखते थे, और उन्हें टोपी के पीछे बांधते थे। लेकिन, बदलते दौर में इसकी जगह कृत्रिम बालों ने ले ली है। इन बालों को आकर्षक बनाने के लिए इन्हें पीले, हरे और लाल रंग के सूती धागों से लपेटा जाता है, और इस पूरी संरचना को स्थानीय रूप से ‘दुमसो’ कहा जाता है।
इस टोपी को सिर और माथे पर मजबूती से टिकाए रखने के लिए, एल्युमिनियम या बांस से बनी विशेष सुई जैसी पिनों का उपयोग किया जाता है। इनमें एक लंबी सुई जैसी संरचना होती है, जिसे दुमसो पर फिट किया जाता है, ताकि माथे के पास बालों को बांधा जा सके। इसी के साथ, एक छोटी पिन लगाई जाती है।
ब्योपा बनाने में शामिल कारीगर, मुख्य रूप से पुरुष थे। सबसे पहले, गुंबद के आकार में बुनी हुई पोडम नामक बेंत की टोपी पर काम किया जाता है, जिसे पक्षी की चोंच का अनुकरण करने के लिए, पीछे की तरफ थोड़ा बढ़ाया जाता है। फिर, बांस की एक छड़ी पर, एक सिरे से बेंत का एक टुकड़ा बांधा जाता है। छोटे चाकू से धागों को काटा जाता है, जबकि मोटे धागों को एक सुई का उपयोग करके पतले धागों पर बुना जाता है। इन मोटे धागों को स्थानीय रूप से ‘प्यालो’, और सुई को ‘साइलो’ के रूप में जाना जाता है।
एक बार बुनने के बाद, बेंत की टोपी को रंगा जाता है, और धूप में सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसके पश्चात, इस पर सजावट की जाती है। औसतन, एक कारीगर को एक पूर्ण टोपी बनाने में, लगभग चार से पांच दिन लगते हैं। एक बार तैयार होने के बाद, टोपी को थोड़ा सा झुकाकर पहना जाता है, जिससे माथे के ऊपर एक गांठ बनाने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है।
2001 में, अरुणाचल प्रदेश के वन विभाग और भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट जैसे गैर सरकारी संगठनों ने, लुप्तप्राय पक्षी प्रजाति – हॉर्नबिल की रक्षा के लिए न्यीशी समुदाय के साथ काम करना शुरू किया। इसके परिणामस्वरूप पुराने, पक्षी-आधारित ब्योपा को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का सामुदायिक समर्थन प्राप्त हुआ। इस कदम को ब्योपा के निर्माताओं और पहनने वालों से व्यापक समर्थन मिला है, और हाल के वर्षों में सामूहिक प्रयासों ने हॉर्नबिल आबादी को फिर से बढ़ने में मदद की है।
ब्योपा की अरुणाचल प्रदेश के सांस्कृतिक परिदृश्य में मजबूत पकड़ बनी हुई है, और यह स्थानीय बाजारों में आसानी से उपलब्ध है। वास्तव में, चोंच से इसकी प्रतिकृतियों तक हुए, समुदाय के नेतृत्व वाले बदलाव ने शिल्प की पहचान में संरक्षण संदेश अंतर्निहित कर दिया है।
आखिर क्यों राग सूर मल्हार को वर्षा ऋतु के शांत और मननशील रागों में गिना जाता है?
अगर मल्हार राग-परिवार के शांत और गंभीर रागों की चर्चा की जाए, तो राग सूर मल्हार एक विशिष्ट स्थान रखता है। इसे प्रायः “सूरदासी मल्हार” के नाम से भी जाना जाता है। परंपरागत रूप से इसका संबंध वर्षा ऋतु से माना जाता है, और इसकी मधुर तथा भावपूर्ण प्रकृति इसे मल्हार परिवार के अन्य रागों से अलग पहचान देती है।
सूर मल्हार अपनी सहज, शांत और आत्ममंथनपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए जाना जाता है। इसकी स्वर-संरचना में वर्षा की कोमल फुहारों, ठंडी हवाओं और प्रकृति की ताजगी का आभास मिलता है। कलाकार आलाप, बंदिश और तानों के माध्यम से इस राग के विविध भावों को अभिव्यक्त करते हैं, जिससे प्रत्येक प्रस्तुति में इसकी अलग छटा दिखाई देती है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में इसे वर्षा ऋतु के उपयुक्त रागों में गिना जाता है, जो श्रोताओं को एक शांत और मननशील वातावरण का अनुभव कराता है।
इस राग की विभिन्न प्रस्तुतियाँ इसकी बहुमुखी प्रकृति को उजागर करती हैं। पंडित वेंकटेश कुमार की गायकी में सूर मल्हार की गंभीरता और विस्तार का सुंदर परिचय मिलता है। पंडित भीमसेन जोशी की प्रसिद्ध प्रस्तुति "गरजत आए" इस राग के भावों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है, जबकि कृष सुगंथ का सितार वादन इसकी मधुरता और प्रवाहपूर्ण स्वर-यात्रा को वाद्य संगीत के माध्यम से अनुभव कराने का अवसर देता है।
यदि आप वर्षा ऋतु से जुड़े ऐसे राग की खोज में हैं, जो तीव्रता से अधिक शांति और आत्मचिंतन का अनुभव कराए, तो राग सूर मल्हार की ये प्रस्तुतियाँ एक उत्कृष्ट परिचय हैं। इनमें भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा, वर्षा ऋतु का सौंदर्य और सुरों की गहन अभिव्यक्ति का सुंदर संगम सुनाई देता है।
जौनपुर के शहरी इलाकों में कैसे फल-फूल रही है स्मॉल साल्मन अरब तितली?
जौनपुर की सड़कों और बगीचों में अक्सर एक छोटी सी, साल्मन जैसे गुलाबी-नारंगी रंग की तितली उड़ती दिखाई देती है, जिसे 'स्मॉल साल्मन अरब' कहा जाता है। 'पिएरिडी' (Pieridae) परिवार से ताल्लुक रखने वाली यह तितली अपनी विशेष रंगत और कठोर परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता के लिए जानी जाती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका साल्मन नाम इसके पंखों के गुलाबी आभा वाले रंग के कारण पड़ा है, जबकि 'अरब' शब्द शुरुआती प्रकृतिवादियों द्वारा इसके विशिष्ट वर्गीकरण के लिए इस्तेमाल किया गया था।
यह तितली भारत में कहां पाई जाती है? स्मॉल साल्मन अरब (वैज्ञानिक नाम: Colotis amata) मुख्य रूप से मध्य एशिया से लेकर भारतीय उपमहाद्वीप तक फैली हुई है। भारत में यह मध्य, दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में प्रचुरता में पाई जाती है। बंगाल तितली डेटाबेस और अन्य शोधों के अनुसार, यह तितली विशेष रूप से तटीय क्षेत्रों, ज्वारीय मिट्टी के मैदानों और शुष्क इलाकों में देखी जाती है। जौनपुर जैसे शहरों में, यह बाग-बगीचों, सड़क किनारे की वनस्पतियों और खाली पड़े शहरी भूखंडों में अपना बसेरा बनाती है। इसकी उड़ान जमीन के काफी करीब, कमजोर लेकिन दिशात्मक होती है।
स्मॉल साल्मन अरब का आवास कैसा होता है? अन्य तितलियों के विपरीत, जो घने जंगलों पर निर्भर रहती हैं, स्मॉल साल्मन अरब को खुले और शुष्क स्थान पसंद हैं। यह गर्म और शुष्क क्षेत्रों, बबूल (Acacia) के झाड़-झंखाड़, घास के मैदानों और कृषि भूमि में आसानी से देखी जा सकती है। यह समुद्र तल से लेकर लगभग 1200 मीटर की ऊंचाई तक निवास करती है। 'लर्न बटरफ्लाई' पोर्टल के अनुसार, ये तितलियाँ अक्सर धूप सेंकने के लिए झाड़ियों पर अपने पंख फैलाकर बैठती हैं।
कैसे चलती है इसकी जीवन यात्रा? इस तितली का जीवन चक्र बेहद दिलचस्प और तेज होता है। आंध्र प्रदेश के पूर्वी घाटों में किए गए एक शोध (जुलाई 2025) के अनुसार, यह एक 'मल्टीवोल्टाइन' (Multivoltine) प्रजाति है, जिसका अर्थ है कि यह साल भर प्रजनन करती है। इसका पूरा जीवन चक्र अंडे से वयस्क बनने तक मात्र 24 से 28 दिनों में पूरा हो जाता है।
अंडे: मादा तितली एक बार में 8 से 15 अंडों के समूह को मेजबान पौधे की कोमल पत्तियों या कांटों पर देती है। ये अंडे हल्के पीले रंग के होते हैं, जो 3 से 4 दिनों में फूट जाते हैं। इल्ली (Larva): अंडे से निकलने के बाद लार्वा पांच चरणों (Instars) से गुजरता है। शुरुआती दिनों में इसका रंग क्रीम जैसा होता है, जो बाद में गहरे घास जैसे हरे रंग में बदल जाता है। यह अवस्था 15 से 17 दिनों तक चलती है। प्यूपा: पूरी तरह विकसित होने के बाद, लार्वा भोजन बंद कर देता है और प्यूपा में बदल जाता है। यह अवस्था 5 से 9 दिनों की होती है।
कौन से पौधे इसके जीवन का आधार हैं? स्मॉल साल्मन अरब का जीवन मुख्य रूप से 'साल्वाडोरा' (Salvadora) परिवार के पौधों पर निर्भर है। इनमें 'साल्वाडोरा पर्सिका' (पीलू) और 'साल्वाडोरा ओलियोइड्स' प्रमुख हैं। चूंकि साल्वाडोरा खारी मिट्टी में भी उग सकता है, इसलिए ये तितलियाँ गुजरात जैसे तटीय क्षेत्रों और लवणीय भूमि में बहुत अधिक पाई जाती हैं। जौनपुर में, यह 'माएरुया एपेटाला' (Maerua apetala) जैसे पौधों पर भी आश्रित रहती है, जो इसके लार्वा के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।
शहरी माहौल में यह तितली इतनी सफल क्यों है? जहाँ अधिकांश तितलियाँ बढ़ते शहरीकरण के कारण विलुप्त हो रही हैं, वहीं स्मॉल साल्मन अरब ने खुद को इंसानी बस्तियों के अनुकूल ढाल लिया है। इसकी इस सफलता के पीछे कई कारण हैं। पहला, इसके मेजबान पौधे (जैसे साल्वाडोरा) खराब या प्रदूषित मिट्टी में भी उग जाते हैं। दूसरा, यह तितली वन-विशेषज्ञ प्रजातियों की तुलना में अधिक तापमान और कम नमी को सहन कर सकती है। इसकी त्वरित प्रजनन क्षमता इसे प्रतिकूल परिस्थितियों से तेजी से उबरने में मदद करती है।
इस नन्ही प्रजाति के सामने क्या चुनौतियां हैं? अनुकूलन क्षमता के बावजूद, स्मॉल साल्मन अरब खतरों से मुक्त नहीं है। तेजी से होता शहरी विस्तार और सघन कृषि इसके प्राकृतिक आवास को नष्ट कर रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में 'लैंडस्केपिंग' के नाम पर जंगली झाड़ियों और देशी पौधों को हटाना इनके प्रजनन स्थलों को कम कर देता है।
एक बड़ा खतरा कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग है। कीटनाशक न केवल सीधे तौर पर इल्लियों और तितलियों को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि इनके अमृत स्रोतों और मेजबान पौधों को भी जहरीला बना देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जौनपुर जैसे शहरों में इन देशी पौधों का संरक्षण नहीं किया गया, तो भविष्य में यह लचीली प्रजाति भी स्थानीय स्तर पर विलुप्त हो सकती है।
क्या हम सुपरबाइक्स के वैश्विक दौर के लिए तैयार हैं?
पूरी दुनिया में बनने वाले कुल दोपहिया वाहनों का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत में तैयार होता है। एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का दोपहिया उद्योग न केवल देश की व्यक्तिगत गतिशीलता (लोकोमोशन) की रीढ़ है, बल्कि यह लगभग 45 से 50 लाख लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार भी प्रदान करता है। जौनपुर जैसे शहरों में, जहाँ परिवहन के लिए दोपहिया वाहन सबसे सुलभ और लोकप्रिय साधन हैं, वहाँ भी बाज़ार की यह धमक साफ़ दिखाई देती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बाज़ार केवल किफ़ायती 'कम्यूटर' बाइक्स तक सीमित रहेगा या यहाँ सुपरबाइक्स का शोर भी सुनाई देगा?
भारत में बजट और ईंधन-कुशल बाइक्स का इतना दबदबा क्यों है? भारतीय बाज़ार की प्रकृति यहाँ की आर्थिक स्थिति से गहराई से जुड़ी है। आंकड़ों के अनुसार, साल 2020 में भारत की प्रति व्यक्ति आय लगभग 1,900 डॉलर थी, जिसने दोपहिया वाहनों को व्यक्तिगत परिवहन का सबसे सस्ता विकल्प बना दिया। जौनपुर के मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बाइक केवल आवाजाही का साधन नहीं, बल्कि उनकी बचत का एक हिस्सा भी है। Kearney के विश्लेषण से पता चलता है कि लगभग 60 प्रतिशत भारतीय परिवारों के पास दोपहिया वाहन है, जबकि केवल 15 प्रतिशत के पास चार पहिया वाहन हैं।
किफ़ायती होने के साथ-साथ सुविधा और दक्षता (Efficiency) इन बाइक्स की सबसे बड़ी यूएसपी है। भारतीय निर्माता जैसे हीरो मोटोकॉर्प और बजाज ऑटो ने दशकों तक इसी 'मास मार्केट' की मांग को पूरा करने के लिए अपनी उत्पादन प्रणालियों को बेहतर बनाया है। हीरो मोटोकॉर्प का 'स्प्लेंडर' मॉडल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो जून 2025 तक कंपनी के कुल पोर्टफोलियो का 63.13 प्रतिशत हिस्सा था।
हीरो और बजाज की रणनीतियों में क्या अंतर है? भारतीय सड़कों पर कौन सी कंपनी राज करती है, इसे समझने के लिए दो अलग-अलग बिज़नेस मॉडल्स को देखना ज़रूरी है। हीरो मोटोकॉर्प का ध्यान 'स्केल' यानी ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में गाड़ियाँ बेचने पर है। वित्त वर्ष 2024-25 में हीरो की घरेलू बाज़ार हिस्सेदारी 28.84 प्रतिशत थी। वे जौनपुर के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अपनी गहरी पहुँच और किफ़ायती ब्रांड वैल्यू के कारण पैठ बनाए हुए हैं।
दूसरी ओर, बजाज ऑटो की रणनीति 'यूनिट इकोनॉमिक्स' यानी प्रति वाहन मुनाफ़े पर केंद्रित है। आंकड़ों के अनुसार, जहाँ हीरो प्रति वाहन लगभग 7,815 रुपये का मुनाफ़ा कमाता है, वहीं बजाज ऑटो प्रति वाहन लगभग 20,468 रुपये का लाभ अर्जित करता है। बजाज ने प्रीमियम बाइक्स, निर्यात और ब्रांड-आधारित मूल्य निर्धारण (Pricing Power) को अपनी ताकत बनाया है। यह मुकाबला 'संख्या बनाम मुनाफ़ा' का है, जहाँ दोनों ही कंपनियां भारत की विविधतापूर्ण मांग को अलग-अलग तरीके से संबोधित कर रही हैं।
एक सुपरबाइक सामान्य बाइक से तकनीकी रूप से कैसे अलग होती है? बजाज ऑटो क्रेडिट के अनुसार, सुपरबाइक केवल रफ़्तार का नाम नहीं है, बल्कि यह इंजीनियरिंग की पराकाष्ठा है। सामान्यतः 1000cc या उससे अधिक क्षमता वाले इंजन, एडवांस एयरोडायनामिक्स और रेस-ग्रेड हैंडलिंग इन्हें अलग बनाती है। जौनपुर के जिम और फिटनेस केंद्रों में जाने वाले युवाओं के लिए, स्पोर्ट्स बाइक्स का रोमांच एक तरह के 'एड्रेनालाईन रश' जैसा है, जो शारीरिक और मानसिक सक्रियता से जुड़ा महसूस होता है।
सुपरबाइक्स में इनलाइन-फोर या V4 जैसे जटिल इंजनों का उपयोग होता है। इनमें 'लिक्विड कूलिंग सिस्टम' होता है ताकि तेज़ रफ़्तार पर इंजन गर्म न हो। इसके अलावा, इनमें 'राइड-बाय-वायर' जैसी तकनीकें होती हैं, जो पारंपरिक थ्रॉटल केबल की जगह इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल का उपयोग करती हैं। इससे राइडर को सटीक थ्रॉटल रिस्पॉन्स और विभिन्न राइडिंग मोड्स मिलते हैं।
सुपरबाइक्स में उन्नत सामग्री और इलेक्ट्रॉनिक्स का क्या महत्व है? आधुनिक सुपरबाइक्स की परफ़ॉरमेंस केवल इंजन पर नहीं, बल्कि उनके हल्के वजन और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों पर भी टिकी होती है। डुकाटी और बीएमडब्ल्यू मोटरराड (BMW Motorrad) जैसी वैश्विक कंपनियां अपनी तकनीक के लिए प्रसिद्ध हैं। इन बाइक्स में 'ट्रैक्शन कंट्रोल' सिस्टम होता है जो पहियों की गति की निगरानी करता है और फिसलन रोकने के लिए रीयल-टाइम में पावर को एडजस्ट करता है।
वजन घटाने के लिए कार्बन फ़ाइबर और टाइटेनियम जैसे महंगे पदार्थों का उपयोग किया जाता है। कार्बन फ़ाइबर बॉडी पैनल्स को मजबूती देता है जबकि टाइटेनियम का उपयोग एग्जॉस्ट सिस्टम और इंजन के हिस्सों में किया जाता है क्योंकि यह हल्का होने के साथ-साथ गर्मी सहने की अद्भुत क्षमता रखता है। यही कारण है कि बीएमडब्ल्यू की HP (High Performance) फिलॉसफी 'न एक ग्राम ज़्यादा, न एक हॉर्स पावर कम' के सिद्धांत पर काम करती है।
भारतीय कंपनियां सुपरबाइक सेगमेंट में चुनौतियों का सामना क्यों कर रही हैं? इसके पीछे कई कारण हैं: R&D और निवेश: अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुपरबाइक्स बनाने के लिए भारी रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) की ज़रूरत होती है, जो भारतीय कंपनियों के लिए वर्तमान में प्राथमिकता नहीं है। .ईंधन की गुणवत्ता: सुपरबाइक्स को हाई-ऑक्टेन ईंधन की आवश्यकता होती है, जो भारत के छोटे शहरों यहाँ तक कि महानगरों में भी आसानी से उपलब्ध नहीं है। .सड़क और बुनियादी ढांचा: भारतीय सड़कें, विशेषकर गड्ढे और अनियमित ट्रैफ़िक, 1000cc वाली मशीनों की पूरी क्षमता का उपयोग करने के अनुकूल नहीं हैं। .आयात शुल्क: अधिकांश सुपरबाइक्स का आयात होता है और भारत में आयात शुल्क बहुत अधिक है, जिससे ये मिडिल क्लास की पहुँच से बाहर हो जाती हैं।
परफ़ॉरमेंस का यह अंतर वास्तव में कितना बड़ा है? अगर हम टीवीएस अपाचे (TVS Apache RR 310) और बीएमडब्ल्यू (BMW M 1000 RR) की तुलना करें, तो अंतर साफ़ हो जाता है। अपाचे RR 310 की अधिकतम रफ़्तार लगभग 160 किमी प्रति घंटा है, जिसे रोज़ाना के इस्तेमाल और भारतीय सड़कों के हिसाब से डिज़ाइन किया गया है। इसके विपरीत, बीएमडब्ल्यू M 1000 RR लगभग 300 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार पकड़ सकती है। यह केवल रफ़्तार की बात नहीं है, बल्कि दो बिल्कुल अलग श्रेणियों और इंजीनियरिंग के स्तरों की कहानी है। एक का ध्यान किफ़ायती परफ़ॉरमेंस पर है, तो दूसरा ट्रैक डोमिनेंस (Track Dominance) के लिए बनाया गया है।
क्या वैश्विक साझेदारी से भारत की इंजीनियरिंग क्षमता बदल रही है? भले ही भारत के पास अभी अपनी 1000cc की सुपरबाइक न हो, लेकिन स्थिति तेज़ी से बदल रही है। टीवीएस और बीएमडब्ल्यू मोटरराड जैसी साझेदारियों ने भारतीय इंजीनियरों को उन्नत इंजन डिज़ाइन और सटीक निर्माण प्रक्रिया को समझने का मौका दिया है। हीरो और हार्ले डेविडसन (Harley Davidson) का सहयोग भी इसी दिशा में एक कदम है।
हार्ले डेविडसन बाइक
इन साझेदारियों के माध्यम से तकनीक का हस्तांतरण (Technology Transfer) हो रहा है, जिससे भारतीय फर्में धीरे-धीरे तकनीकी रूप से सक्षम बन रही हैं। स्थानीय स्तर पर उन्नत तकनीक विकसित करने और R&D में निवेश बढ़ाने से यह उम्मीद जगी है कि आने वाले समय में भारतीय कंपनियां भी वैश्विक स्तर की हाई-परफ़ॉरमेंस बाइक्स तैयार कर सकेंगी।
जौनपुर जैसे उभरते शहरों के लिए, जहाँ युवा वर्ग नई तकनीक और स्पोर्ट्स बाइक्स के प्रति आकर्षित है, यह बदलाव न केवल लोकोमोशन का तरीका बदलेगा बल्कि भारत को दुनिया के एक 'मैन्युफैक्चरिंग हब' से हटाकर 'इंजीनियरिंग और इनोवेशन हब' के रूप में स्थापित करेगा।
जौनपुर, बुनकरों के कपड़े चुनकर हमें गुणवत्ता के साथ मिलेगी, किसी की मदद करने की संतुष्टि
आइए, आज प्राकृतिक, कृत्रिम और नैनोफाइबर जैसे धागों के प्रकारों का पता लगाते हैं, और समझते हैं कि उन्हें कैसे बनाया जाता हैं। फिर, हम उनकी लागत, आराम सुविधा और व्यावहारिकता की तुलना करेंगे, और देखेंगे कि क्यों कुछ कपड़े रोज पहनने के लिए अधिक उपयुक्त हैं। और लेख के अंत में, हम जांच करेंगे कि मशीन से बने कपड़ों का उदय पारंपरिक कारीगरों और उनकी आजीविका को कैसे प्रभावित कर रहा है।
रेशों (Fibers) को धागे में पिरोने के लिए ज़रूरी आवश्यकताओं में, कम से कम 5 मिलीमीटर की लंबाई, लचीलापन, एकजूटता या मजबूती और पर्याप्त ताकत होना शामिल है। धागे बनाने के लिए तंतुओं को आम तौर पर संयोजित किया जाता हैं और मोड़ा जाता है; जबकि इस प्रकार बने रेशों को काता जाता है। फिर धागे को आम तौर पर बुना जाता है, या कपड़े में बुना जाता है। कपड़े के एक टुकड़े में, असंख्य रेशे होते हैं। रेशे या धागे सभी कपड़ा उत्पादों की नींव हैं, और प्राकृतिक या मानव निर्मित हो सकते हैं। इस प्रकार, रेशों के तीन मूल प्रकार हैं:
1. प्राकृतिक रेशे
2. पुनर्निर्मित तंतु या मानव-निर्मित रेशे, और
3. कृत्रिम रेशे
आम तौर पर पुनर्निर्मित और कृत्रिम रेशों को सामूहिक रूप से मानव निर्मित रेशों के रूप में जाना जाता है। प्राकृतिक रेशे प्रकृति में पाए जाते हैं, जैसे कि - भेड़ से ऊन या कपास के पौधों से कपास। पुनर्निर्मित रेशे प्राकृतिक पॉलिमर (Polymer) से बने होते हैं, जो अपने मूल रूप में उपयोग करने योग्य नहीं होते हैं। लेकिन उपयोगी रेशे बनाने के लिए इनमें सुधार किया जा सकता है। कुछ सबसे पहले पुनर्निर्मित रेशों में से एक रेयोन (Rayon) था, जिसे विस्कोस (Viscose) या विस्कोस रेयोन भी कहा जाता है। इसे लकड़ी के गूदे से पुनर्निर्मित किया गया था।
नैनोफाइबर
अब एक ऐसे कपड़े की कल्पना करें, जो इतना हल्का हो कि आपको मुश्किल से ही महसूस हो; फिर भी यह इतना मजबूत हो कि, आपको हानिकारक रोगजनकों, चरम मौसम और यहां तक कि रासायनिक खतरों से भी बचा सके। दरअसल, नैनोफाइबर (Nanofiber) तकनीक इसे सामने ला रही है। नैनोफाइबर, इलेक्ट्रोस्पिनिंग (Electrospinning) नामक प्रक्रिया के माध्यम से तैयार किए गए, एवं मानव बाल से भी छोटे और पतले फाइबर होते हैं। यह विधि एक विद्युत क्षेत्र का उपयोग करके, एक पॉलिमर घोल को अविश्वसनीय रूप से महीन धागों में बदलती है। इसके परिणामस्वरूप ऐसे फाइबर बनते हैं, जो हल्के, लचीले और बेहद टिकाऊ होते हैं।
सुरक्षात्मक वस्त्र, संतुलन बनाने के बारे में है, जिससे आप कवच जैसी सुरक्षा चाहते हैं, लेकिन आप उसे महसूस नहीं करना चाहते हैं। नैनोफाइबर यहीं पर काम आते हैं। भारी महसूस होने वाले पारंपरिक सुरक्षात्मक कपड़ों के विपरीत, नैनोफाइबर वस्त्र सुरक्षा से समझौता किए बिना उच्च गतिशीलता प्रदान करते हैं। उनका सूक्ष्म आकार एक घनी एवं आपस में जुड़ी हुई संरचना बनाता है, जो बैक्टीरिया, वायरस और यहां तक कि महीन धूल कणों जैसे दूषित पदार्थों को रोकती है। साथ ही, ये फाइबर टूट-फूट और अधिक धुलाई का प्रतिरोध करते हैं, जो उन्हें उच्च जोखिम वाले व्यवसायों के लिए आदर्श बनाते हैं।
रेशे से कपड़ा बनाने की विधि में, कताई, बुनाई, रंगाई, मुद्रण या छपाई, और फिनिशिंग शामिल हैं। कताई वह प्रक्रिया है, जिसमें रेशों को सूत या धागे में बदला जाता है। साफ और संरेखित रेशे कताई मशीन में डाले जाते हैं। फिर, इन रेशों को आगे संरेखित करने और वांछित मोटाई प्राप्त करने के लिए बाहर निकाला जाता है, या लंबा किया जाता है। यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि, वे रेशे चिकने और सुसंगत हों। निकाले गए रेशों को एक साथ घुमाकर धागा बनाया जाता है। रेशों को घुमाने से उन्हें मजबूती और एकजुटता मिलती है, जिससे धागा टिकाऊ बनता है और बुनाई के लिए उपयुक्त हो जाता है।
मशीन वाली कताई के विपरीत, पारंपरिक कताई विधियों का उपयोग सदियों से किया जाता रहा है। तकली और चरखा जैसे सरल उपकरणों का उपयोग करके, रेशों को मानवीय रूप से धागे में घुमाया जाता है। यह विधि श्रम-गहन और समय साध्य है, लेकिन अद्वितीय धागे का उत्पादन करती है। परंतु, प्रौद्योगिकी में हुई प्रगति ने कताई प्रक्रिया में क्रांति ला दी है।
एक बार धागा बन जाने पर इसकी बुनाई की जाती है। बुनाई, धागों की संरचनाओं को एक-दूसरे से समकोण पर जोड़ने की प्रक्रिया है। ये दो संरचनाएं, ताना (अनुदैर्ध्य सूत) और बाना (अनुप्रस्थ सूत) हैं। कपड़ा बनाने के लिए, ताने के धागों को करघे पर तनाव में रखा जाता है, जबकि बाने के धागों को ताने के ऊपर और नीचे पिरोया या डाला जाता है। बुनाई की कई तकनीकें हैं, जिनमें से प्रत्येक में अलग-अलग बनावट, पैटर्न और विशेषताओं के साथ कपड़े बनाएं जाते है। सबसे सरल और बुनियादी बुनाई ऊपर उल्लेखित है। सादे बुनाई वाले कपड़े मजबूत और टिकाऊ होते हैं, और उनकी सतह सख्त और समतल होती है।
इसके अलावा, टवील बुनाई (Twill weave), साटन बुनाई (Satin weave), जैक्वार्ड बुनाई (Jacquard weave), और डॉबी बुनाई (Dobby weave) अन्य प्रमुख प्रकार हैं। समय के साथ बुनाई में करघे से लेकर, उन्नत स्वचालित मशीनों तक काफी विकास हुआ है।
इसके अलावा, जैसा कि हमने ऊपर पढ़ा हैं, नैनोफाइबर के निर्माण के लिए इलेक्ट्रोस्पिनिंग एक परिवर्तनकारी तकनीक के रूप में उभरी है। यह तकनीक उनकी आकृति विज्ञान, संरचना और कार्यक्षमता पर सटीक नियंत्रण प्रदान करती है। यह बहुमुखी प्रक्रिया विविध सामग्रियों को एकीकृत करते हुए, अनुकूलित नैनोफाइबर उत्पादन की सुविधा प्रदान करती है। कोएक्सियल इलेक्ट्रोस्पिनिंग (Coaxial electrospinning), संरेखित इलेक्ट्रोस्पिनिंग (Aligned electrospinning), यार्न इलेक्ट्रोस्पिनिंग (Yarn electrospinning) और रोल-टू-रोल प्रक्रियाओं (Roll‐to‐roll processes) जैसी उन्नत इलेक्ट्रोस्पिनिंग तकनीकें, अगली पीढ़ी के नैनोमटेरियल के विकास का वादा करती हैं। इस प्रकार बने नैनोफाइबर को सक्रिय रूप से कार्यात्मक झिल्ली (Membrane), गैस सेंसर, ऊर्जा प्रणालियों और उत्प्रेरक प्रक्रियाओं पर लागू किया जा रहा है, जिससे इन संबंधित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण चुनौतियों का समाधान किया जा रहा है। जबकि, पर्यावरण के अनुकूल "हरित" पॉलिमर घोल के उपयोग के साथ, रोबोटिक्स-आधारित एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) द्वारा संचालित अनुकूलन को एकीकृत करने की क्षमता पर जोर देना आवश्यक माना जा रहा है।
इलेक्ट्रोस्पन नैनोफाइबर (Electrospun nanofiber)
मानव निर्मित धागों में हो रही प्रगति के बावजूद, प्राकृतिक रेशे, कई कारणों से लोकप्रिय बने हुए हैं। प्राकृतिक रेशों में उच्च अवशोषण क्षमता होती है, क्योंकि पौधों और जानवरों के रेशों में पानी के प्रति गहरा आकर्षण होता है। यह प्राकृतिक रेशों को चादरों और तौलियों के लिए एक बढ़िया विकल्प बनाता है, क्योंकि इन वस्तुओं के लिए अवशोषण क्षमता एक महत्वपूर्ण कारक है। प्राकृतिक रेशों का पर्यावरणीय प्रभाव आमतौर पर मानव निर्मित रेशों की तुलना में कम होता है, क्योंकि प्राकृतिक रेशों की उत्पादन प्रक्रिया के दौरान अधिक रसायनों का उपयोग नहीं होता है। अधिकांश पौधे-आधारित रेशे मजबूत होते हैं। रेशम और ऊन जैसे पशु-आधारित रेशे भी मजबूत होते हैं।
दूसरी ओर, हमारे दैनिक जीवन में मानव निर्मित धागों के भी कई फायदे हैं। अधिकांश शुद्ध प्राकृतिक रेशे महंगे हो सकते हैं, जबकि, मानव निर्मित रेशे प्राकृतिक उत्पादों के सस्ते विकल्प हैं। कई सिंथेटिक कपड़े ऊन और रेशम जैसे प्राकृतिक कपड़ों के नकली संस्करण भी हैं। मानव निर्मित कपड़े अधिक दाग प्रतिरोधी होते हैं, और कुछ कपड़ों को दाग प्रतिरोधी बनाने के लिए ही डिज़ाइन किया गया है। इसलिए, ऐसे कपड़े दैनिक तौर पर एवं नियमित पहनावे के लिए बहुत अच्छे हो सकते हैं। जबकि कुछ प्राकृतिक रेशे पानी का प्रतिरोध करते हैं, मानव निर्मित रेशों को लगभग पूरी तरह से जलरोधी बनाने के लिए डिज़ाइन किया जा सकता है। इस कारण, वे बाहरी वातावरण और बारिश के लिए बहुत अच्छे हैं।
तेज़ फैशन के लिए, डिज़ाइन से लेकर उत्पादन तक त्वरित बदलाव की आवश्यकता होती है। स्वचालित मशीनें उन कार्यों को मिनटों में पूरा कर सकती हैं, जिनमें मानवीय रूप से घंटों लगते हैं। इससे समय की बचत होती है। उत्पादित कपड़ों का प्रत्येक टुकड़ा समान गुणवत्ता बनाए रखता है, जिससे सुसंगति रहती है। साथ ही, सटीक कटाई और सिलाई कपड़े के अपशिष्ट को कम करती है, जिससे प्रक्रिया अधिक कुशल हो जाती है। दूसरी ओर, उन्नत मशीनरी के साथ, तेजी से और प्रतिस्पर्धी कीमतों पर नई शैलियां पेश की जा सकती हैं।
शायद, इन्हीं कारणों की वजह से भारत में स्वदेशी कला, शिल्प और हथकरघा उत्पादों की मांग और बाजार में, हाल के वर्षों में भारी गिरावट देखी गई है। ऑनलाइन बिक्री के माध्यम से मशीन-निर्मित उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता, और उत्पाद की गुणवत्ता के लिए निगरानी की कमी के कारण, कला और शिल्प क्षेत्र सामान्य हो गया है। यह स्वदेशी और पारंपरिक हस्तशिल्प व्यवसायों के लिए हानिकारक है। इसके साथ ही, उत्पाद में विश्वास की कमी के कारण यह उपभोक्ता मांग भी कम करता है। अतः एक उपभोक्ता के रूप में आज यह हमारी जिम्मेदारी है कि, हम इन पारंपरिक बुनकरों से कपड़े खरीदकर उनकी मदद करें, और उनका रोज़गार बरकरार रखें।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/68jre59z
2. https://tinyurl.com/mr3xneeb
3. https://tinyurl.com/8dz87x3h
4. https://tinyurl.com/483uba6k
5. https://tinyurl.com/5edms2ee
6. https://tinyurl.com/yw7hn647
7. https://tinyurl.com/m4a83jhx
8. https://tinyurl.com/yeyp6cs4
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
27-06-2026 09:26 AM • Jaunpur District-Hindi
आपकी तस्वीरों से करोड़ों कमा रही हैं कंपनियाँ: क्या है प्राइवेसी का यह खेल?
जौनपुर के इंटरनेट और सोशल मीडिया यूज़र्स के लिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि मेटा ने इस बात की पुष्टि की है कि साल 2007 से लेकर अब तक वयस्कों द्वारा फेसबुक और इंस्टाग्राम पर पब्लिक किए गए सभी टेक्स्ट और फोटो को स्क्रैप किया गया है और कंपनी के आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल किया गया है। एक तरफ़ सोशल मीडिया लोगों को जोड़ने का काम कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ यह आपके व्यक्तिगत डेटा और कॉपीराइट सामग्री का उपयोग भी अप्रत्याशित तरीकों से कर रहा है। इंटरनेट की दुनिया में एक रिपोर्ट के मुताबिक़ लगभग 49 प्रतिशत ब्लॉगर्स और सोशल मीडिया यूज़र्स अनजाने में या जानबूझकर कॉपीराइट का उल्लंघन कर चुके हैं।
क्या सोशल मीडिया पर पब्लिश किया गया कंटेंट कॉपीराइट के दायरे में आता है? लोगों के बीच यह एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है कि सोशल मीडिया साइट्स पर अपना काम या तस्वीरें अपलोड करने का मतलब है कि आप अपना कॉपीराइट खो देते हैं और यदि कोई आपकी अनुमति के बिना आपके काम का उपयोग करता है तो आप कुछ नहीं कर सकते। हक़ीक़त में ऐसा नहीं है। लगभग हर सोशल मीडिया साइट के नियम और शर्तों के अनुसार, जो व्यक्ति कंटेंट बनाता और अपलोड करता है, वह ही अपने काम का असली कॉपीराइट मालिक बना रहता है। जब कोई विज़ुअल वर्क (जैसे फोटो या वीडियो) बनाया जाता है, तो कॉपीराइट स्वचालित रूप से निर्माता को मिल जाता है। आधिकारिक तौर पर कॉपीराइट प्राप्त करने के लिए किसी तस्वीर को रजिस्टर करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है।
भारत में कॉपीराइट अधिनियम 1957 के तहत, किसी भी काम पर कॉपीराइट के मालिक को विशेष अधिकार प्राप्त होते हैं, जैसे कि उस काम का उपयोग करना, उसे वितरित करना, या प्रकाशित करना। इसलिए, किसी भी फोटो या वीडियो का कॉपीराइट मालिक ही उसे किसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अपलोड करने का अधिकार रखता है। यदि कोई और व्यक्ति आपकी अनुमति के बिना आपकी रचना का उपयोग करता है, तो यह कॉपीराइट उल्लंघन माना जाता है। बहुत से लोग यह मानते हैं कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर मौजूद हर चीज़ मुफ़्त है, लेकिन यह सच नहीं है। जब कोई अपना मूल कंटेंट सोशल मीडिया पर पोस्ट करता है, तो वह महज़ एक पब्लिकेशन होता है, ना कि मुफ़्त इस्तेमाल के लिए दिया गया लाइसेंस। "फेयर यूज़" का नियम कुछ विशेष परिस्थितियों (जैसे समीक्षा, समाचार रिपोर्टिंग, या शोध) में अनुमति के बिना काम का उपयोग करने की छूट देता है, लेकिन यह हर परिस्थिति पर लागू नहीं होता।
प्लेटफ़ॉर्म के नियमों और प्राइवेसी सेटिंग्स के तहत आपकी ओनरशिप का क्या होता है? जब आप इंस्टाग्राम या फेसबुक पर कोई फोटो, वीडियो, या कैप्शन पोस्ट करते हैं, तो आप कॉपीराइट के मालिक होते हैं, लेकिन यहाँ एक पेंच है। आप अपनी ओनरशिप तो बरकरार रखते हैं, लेकिन आप इंस्टाग्राम को बहुत बड़े स्तर पर उपयोग के अधिकार भी देते हैं। इसका मतलब है कि आप उन्हें अपने कंटेंट को एक ख़ास तरीके से इस्तेमाल करने की अनुमति देते हैं जिसके लिए वे आपको कोई भुगतान नहीं करते। प्लेटफ़ॉर्म के नियमों के तहत आप उन्हें एक नॉन-एक्सक्लूसिव, रॉयल्टी-फ्री और वर्ल्डवाइड लाइसेंस देते हैं। इसका मतलब यह है कि आप अपनी सामग्री को अन्य जगहों पर भी इस्तेमाल कर सकते हैं, इंस्टाग्राम आपको इस इस्तेमाल के लिए पैसे नहीं देगा, और यह अधिकार दुनिया भर में लागू होगा।
इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफ़ॉर्म अपनी सर्विस चलाने के लिए आपके कंटेंट का उपयोग कर सकते हैं, उसे वितरित कर सकते हैं, बदल सकते हैं, प्रदर्शित कर सकते हैं और यहां तक कि उससे जुड़े अन्य काम भी बना सकते हैं। जब आप अपना कंटेंट या अकाउंट डिलीट करते हैं तो यह लाइसेंस आम तौर पर समाप्त हो जाता है। लेकिन, यदि किसी अन्य यूज़र ने आपके कंटेंट को शेयर या एम्बेड किया है, और उन्होंने उसे डिलीट नहीं किया है, तो प्लेटफ़ॉर्म का वह लाइसेंस जारी रह सकता है। फेसबुक के नियम यह कहते हैं कि यदि ओरिजिनल यूज़र अपना कंटेंट हटा भी दे, तो भी लाइसेंस तब तक बना रहेगा जब तक कि उस कंटेंट को शेयर करने वाले बाकी सभी लोग उसे डिलीट न कर दें। इस तरह वायरल फोटो या वीडियो के लिए यह लाइसेंस अनिश्चित काल तक चल सकता है। एक्स (पूर्व में ट्विटर) के मामले में तो यह और भी आगे जाता है, जहाँ अकाउंट बंद करने के बाद भी अपलोड किए गए कंटेंट पर उपयोग का लाइसेंस हमेशा के लिए बना रहता है।
एआई सिस्टम को कैसे ट्रेन किया जाता है और इसके कॉपीराइट से जुड़े ख़तरे क्या हैं? आजकल जनरेटिव एआई मॉडल, जैसे कि लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) और इमेज जनरेटर, मशीन लर्निंग तकनीकों के माध्यम से विकसित किए जा रहे हैं। इन मॉडल्स की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने के लिए इन्हें बहुत बड़े डेटासेट्स पर ट्रेन किया जाता है। इनमें से कई डेटासेट्स में कॉपीराइट वाला काम शामिल हो सकता है। ट्रेनिंग की प्रक्रिया में कई चरण होते हैं, जिसमें जनरल पैटर्न सीखने के लिए प्री-ट्रेनिंग, और विशिष्ट कार्यों के लिए पोस्ट-ट्रेनिंग या फाइन-ट्यूनिंग शामिल होती है। डेवलपर्स भारी मात्रा में डेटा को स्क्रैप करते हैं, फ़िल्टर करते हैं और इकट्ठा करते हैं, जिस पर एआई मॉडल भविष्यवाणी करना सीखते हैं।
ट्रेनिंग डेटासेट्स के लिए कॉपीराइट किए गए कार्यों को डाउनलोड करने, कॉपी करने और मॉडिफाई करने से कॉपीराइट के नियमों पर असर पड़ता है। इसके अलावा, एआई सिस्टम ऐसा कंटेंट आउटपुट कर सकते हैं जो कॉपीराइट किए गए काम की बिल्कुल नकल करता हो या उससे बहुत मिलता-जुलता हो। रिट्रीवल-ऑगमेंटेड जनरेशन (रैग) का उपयोग करके जनरेशन के समय बाहरी कंटेंट को शामिल करना भी उल्लंघन के सवाल खड़े कर सकता है। अमेरिकी कॉपीराइट कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, एआई द्वारा उपयोग में "फेयर यूज़" (उचित उपयोग) एक बचाव हो सकता है, लेकिन यह हर स्थिति में लागू नहीं होता है। यदि एआई का आउटपुट ओरिजिनल काम से प्रतिस्पर्धा करता है या बाज़ार में उसकी जगह लेने लगता है, तो वह फेयर यूज़ के अंतर्गत नहीं आएगा।
क्या आप अपना डेटा एआई ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल होने से रोक सकते हैं? सोशल मीडिया कंपनियाँ अक्सर हमारी अनुमति के बिना एआई मॉडल को ट्रेन करने के लिए हमारे डेटा का उपयोग कर रही हैं। यूरोपीय संघ में जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (जीडीपीआर) लागू है, जिसकी वजह से मेटा को यूरोपीय उपभोक्ताओं को एक नोटिस भेजना पड़ा और उन्हें डेटा कलेक्शन से बाहर निकलने (ऑप्ट-आउट) का विकल्प देना पड़ा। लेकिन अमेरिका या कई अन्य देशों में इस तरह का कोई कड़ा राष्ट्रीय कानून नहीं है जो सोशल मीडिया कंपनियों को एआई मॉडल ट्रेनिंग के लिए यूज़र्स का डेटा इस्तेमाल करने से रोक सके। हालाँकि, आप अपनी प्राइवेसी सेटिंग्स बदलकर अपने डेटा को भविष्य में इस्तेमाल होने से कुछ हद तक बचा सकते हैं।
इंस्टाग्राम पर अपना डेटा एआई ट्रेनिंग से बचाने का एकमात्र वास्तविक तरीका यह है कि आप अपने अकाउंट को प्राइवेट कर लें। मेटा ने कहा है कि वह प्राइवेट अकाउंट्स से डेटा या जानकारी का उपयोग नहीं करेगा। इसके लिए अपनी प्रोफ़ाइल पर जाएँ, सेटिंग आइकॉन पर क्लिक करें, और 'अकाउंट प्राइवेसी' में जाकर 'प्राइवेट अकाउंट' के स्विच को ऑन कर दें। इसी तरह फेसबुक पर भी आपको अपनी पोस्ट्स की विज़िबिलिटी को 'पब्लिक' से हटाकर 'फ्रेंड्स' पर सेट करना होगा। 'सेटिंग्स एंड प्राइवेसी' में जाकर 'ऑडियंस एंड विज़िबिलिटी' के तहत 'पोस्ट्स' चुनें, और "आपकी भविष्य की पोस्ट कौन देख सकता है?" को 'फ्रेंड्स' कर दें।
एक्स (ट्विटर) ने भी नए नियम लागू किए हैं जिसमें यूज़र्स का डेटा 'ग्रोक' (Grok) जैसे एआई को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इसे रोकने के लिए आप सेटिंग्स में जाकर 'प्राइवेसी एंड सेफ्टी' पर क्लिक करें, फिर 'Grok & Third-party Collaborators' को चुनें और बॉक्स को अनचेक कर दें। लिंक्डइन पर भी 'सेटिंग्स एंड प्राइवेसी' में जाकर 'डेटा प्राइवेसी' चुनें, और 'Data for Generative AI Improvement' के स्विच को ऑफ़ कर दें। चैटजीपीटी में भी मुफ़्त अकाउंट वाले यूज़र्स की चैट का डेटा इस्तेमाल होता है। इसे बंद करने के लिए चैटजीपीटी की सेटिंग्स में 'डेटा कंट्रोल्स' पर जाएँ और 'Improve the model for everyone' स्विच को बंद कर दें। याद रखें कि ये सेटिंग्स केवल भविष्य के डेटा को बचाएंगी, आपके पिछले इस्तेमाल हो चुके डेटा को नहीं।
जाबुलानी: फीफा विश्व कप 2010 की वह गेंद जिसने गोलकीपरों को चौंका दिया
वर्ष 2010 के फीफा विश्व कप की बात हो और जाबुलानी (Jabulani) गेंद का ज़िक्र न हो, ऐसा संभव नहीं है। एडिडास (Adidas) द्वारा निर्मित यह गेंद दक्षिण अफ्रीका में आयोजित 2010 विश्व कप की आधिकारिक मैच बॉल थी। ज़ुलू भाषा में "जाबुलानी" का अर्थ है "खुश रहो", और इसका नाम विश्व कप के उत्साह और जश्न की भावना को दर्शाने के लिए चुना गया था।
जाबुलानी अपने अनोखे डिज़ाइन के कारण चर्चा का विषय बन गई थी। इसमें केवल आठ त्रि-आयामी पैनल लगाए गए थे, जबकि 2006 विश्व कप की गेंद में 14 पैनल थे। इसकी सतह पर विशेष खांचे बनाए गए थे, जिन्हें एडिडास ने "ग्रिप एन ग्रूव" तकनीक का नाम दिया। इसका उद्देश्य गेंद की वायुगतिकी को बेहतर बनाना था। इस गेंद के विकास में ब्रिटेन के लॉफबरो विश्वविद्यालय (Loughborough University) के शोधकर्ताओं का भी योगदान था।
हालाँकि, मैदान पर खिलाड़ियों और विशेष रूप से गोलकीपरों का अनुभव कुछ अलग रहा। कई गोलकीपरों ने शिकायत की कि गेंद की उड़ान का अनुमान लगाना बेहद कठिन था। तेज़ गति से चलते समय जाबुलानी अचानक दिशा बदल लेती थी, जिससे उसके रास्ते का अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता था। वैज्ञानिकों ने भी पाया कि इसमें "नकलबॉल प्रभाव" दिखाई देता था, जिसमें गेंद हवा में अप्रत्याशित रूप से हिलती-डुलती हुई आगे बढ़ती है।
यही कारण था कि कुछ खिलाड़ियों ने इसे विश्व कप इतिहास की सबसे चुनौतीपूर्ण गेंदों में से एक बताया। फिर भी जाबुलानी फुटबॉल इतिहास का एक यादगार हिस्सा बन गई और आज भी 2010 विश्व कप की सबसे चर्चित पहचान में गिनी जाती है।
कुश्ती में भारत की बढ़ती उपलब्धियों को देखकर, उत्तर प्रदेश में क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
हम, आज कुश्ती के इतिहास को समझेंगे, और पढ़ेंगे कि यह कुछ पुराने लड़ाकू खेलों में से एक के रूप में कैसे विकसित हुआ। फिर, हम यह पता लगाएंगे कि, भारत में कुश्ती कैसे विकसित हुई, और इसका पारंपरिक अखाड़ों से क्या संबंध है। लेख में आगे, हम देखेंगे कि महाभारत जैसे भारतीय महाकाव्यों में कुश्ती किस प्रकार वर्णित की गई है। इसके पश्चात, हम आधुनिक कुश्ती के नियमों और तकनीकों को देखेंगे। जबकि अंत में, हम कुश्ती में भारत की उपलब्धियों और हमारे राज्य उत्तर प्रदेश में इस खेल को बढ़ावा देने हेतु उठाए जा रहे कदमों की जांच करेंगे।
कुश्ती की उत्पत्ति, संभवतः हाथों या आमने–सामने की लड़ाई से हुई थी। यह विशेषतः लड़ाई के एक ऐसे खेल के रूप में उभरी, जिसमें प्रतिद्वंद्वी की मृत्यु के बजाय उसे हार स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाता है। 3000 ईसा पूर्व की कुछ कलाकृतियां बेबीलोनिया (Babylonia) और मिस्र (Egypt) में प्रचलित ‘बेल्ट कुश्ती’ को दर्शाती हैं। सुमेरियन गिलगमेश (Sumerian Gilgamesh) महाकाव्य में भी ऐसी कुश्ती का वर्णन है। भारत में 1500 ईसा पूर्व से ही कुश्ती चली आ रही है। 700 ईसा पूर्व के चीनी दस्तावेज़ ‘लूज कुश्ती’ (loose wrestling) का वर्णन करते हैं, जबकि, पहली शताब्दी ईसा पूर्व के जापानी रिकॉर्ड भी ऐसा वर्णन करते हैं। बीसवीं शताब्दी में उत्तरी एवं पूर्वी यूरोप (Europe) तथा जापान में स्थानीय स्तर पर प्रचलित बेल्ट कुश्ती, 2500 ईसा पूर्व में मिस्रवासियों की कुश्ती से मेल खाती थी।
कुश्ती, संभवतः प्राचीन यूनानियों (Greeks) का सबसे लोकप्रिय खेल था। यूनानी युवा पुरुष, अपने सामाजिक जीवन के केंद्र बिंदु के रूप में पैलेस्ट्रास (Palaestras) या कुश्ती प्रशिक्षण केंद्रों से संबंधित थे। प्राचीन यूनानी फूलदानों और सिक्कों पर भी लूज कुश्ती के चित्र आम हैं। बाद में, 776 ईसा पूर्व से कुश्ती ओलंपिक खेलों का हिस्सा थी। दूसरी तरफ, कुश्ती यूनानियों की तुलना में रोमनों (Romans) के बीच कम लोकप्रिय थी। रोमन साम्राज्य के पतन के साथ, लगभग 800 ईस्वी तक यूरोप में कुश्ती के संदर्भ गायब हो गए।
जब फारस (Persia) के इस्लामी शासकों ने लगभग 800 ईसा पूर्व में तुर्क (Turk) सैनिकों को नियुक्त करना शुरू किया, तो वे सैनिक अपने साथ लूज कुश्ती की एक शैली लेकर आए। इसे कोरेश (Koresh) कहा जाता था। धीरे-धीरे तुर्कों ने पूरे मुस्लिम प्रभुत्व पर कब्ज़ा कर लिया, और वहां उनकी कुश्ती शैली फैल गई। बाद में, तेरहवीं शताब्दी में मंगोलियाई आक्रमणों (Mongolian invasions) से मंगोलियाई कुश्ती की शुरुआत हुई, जिसे शाही संरक्षण प्राप्त हुआ। इस प्रकार, कुश्ती आधुनिक ईरान (Iran) का राष्ट्रीय खेल बन गया।
जापानी बेल्ट-कुश्ती शैली - सूमो (Sumo), शाही संरक्षण (710-1185) के तहत एक लोकप्रिय दर्शक खेल था। सत्रहवीं शताब्दी तक सूमो कुश्ती, जापान में एक पेशेवर खेल बन गया था। जूडो (Judo) एक अन्य प्रमुख जापानी कुश्ती शैली है, जो बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में एक अंतरराष्ट्रीय खेल बन गई।
मध्य युग में, पूरे यूरोप में कई शैलियों में कुश्ती होती थी। पहला दर्ज इंग्लिश मैच, तेरहवीं सदी की शुरुआत में लंदन (London) में आयोजित किया गया था। इंग्लैंड (England) और ब्रिटनी (Brittany) में ‘जैकेट कुश्ती’ का एक रूप, जिसे ‘कॉर्नवाल व डेवोन (Cornwall and Devon)’ कहा जाता है, चौथी या पांचवीं शताब्दी से प्रख्यात है। रोमन साम्राज्य के शूरवीरों को, एक मार्शल कौशल के रूप में कुश्ती सिखाई जाती थी। मुद्रण की शुरुआत से पहले पांडुलिपियों में और उसके बाद प्रिंट में भी, कुश्ती नियम पुस्तकें दिखाई देती थीं। जबकि, भारत में 1526 की मुगल विजय के बाद, यहां शुरू की गई मंगोलियाई लूज कुश्ती, भारत और पाकिस्तान में ज्ञात है।
पहलवानी या कुश्ती, आज इस खेल का भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचलित एक पारंपरिक रूप है। इस खेल ने मुगल साम्राज्य के दौरान आकार लिया, जो फारसी कोष्टी पहलवानी और मल्ल-युद्ध की प्राचीन भारतीय परंपरा के मिश्रण से विकसित हुआ है। सदियों से, पहलवानी एक अनुशासन के रूप में विकसित हुई है। यह न केवल शारीरिक शक्ति और सहनशक्ति की परीक्षा है, बल्कि अनुष्ठान, अनुशासन और सांस्कृतिक विरासत में निहित जीवन का एक तरीका भी है।
अखाड़े, न केवल कुश्ती प्रशिक्षण मैदान के रूप में, बल्कि कई युवा पहलवानों के लिए आश्रय के रूप में भी काम करते हैं। लड़के नौ या दस साल की उम्र से ही प्रशिक्षण शुरू कर देते हैं, ताकि भविष्य में वे पेशेवर पहलवान बन सकें। जब छात्र अखाड़े में रहते हैं, तो वे अधिक अनुशासित हो जाते हैं। परंतु आज भारत ने, अखाड़ों की मिट्टी कुश्ती को अंतरराष्ट्रीय मैट कुश्ती में परिवर्तित होतेे देखा है।
हाल के वर्षों में, महिलाएं भी इस खेल के केंद्र में रही हैं। साक्षी मलिक, फोगाट बहनें तथा अंतिम पंघाल जैसी महिला कुश्ती खिलाड़ियों का नाम हमने सुना ही हैं।
लेकिन, क्या आप जानते हैं कि, भारत में कुश्ती का एक उल्लेख, महाकाव्य महाभारत में, श्री कृष्ण के समय में भी मिलता है। एक बार, भीम, अर्जुन और कृष्ण, ब्राह्मणों के वेश में मगध की राजधानी - राजगृह गए थे। वहां जरासंध राजा ने उनका स्वागत किया, जो कृष्ण के दुश्मन थे। भीम, अर्जुन और कृष्ण ने अपनी असली पहचान बताए बिना, जरासंध को बताया कि भीम उसके साथ कुश्ती करना चाहते थे। दरअसल, भीम जरासंध को मारना चाहते थे। फिर भी, जरासंध ने अपने मेहमानों की तरह उनका शानदार आतिथ्य किया। कुछ दिनों बाद, कुश्ती का मुकाबला शुरू हुआ।
जरासंध के मुकाबले, भीम छोटा और कम ताकतवर था, और जरासंध की जान लेने में सक्षम नहीं था। छब्बीस दिनों तक, वे प्रतिदिन तीन घंटे तक युद्ध या कुश्ती करते रहे। तब कृष्ण ने, उस युद्ध को समाप्त करने का सोचा, क्योंकि, उन्हें एहसास हुआ कि वे कुश्ती में जरासंध को नहीं मार सकते। इसलिए उन्होंने गदाओं से युद्ध करने का सुझाव दिया। लेकिन भीम के असंख्य प्रहारों से भी जरासंध नहीं मरा।
अमावस्या की रात, जरासंध को अलौकिक शक्तियां प्राप्त होती थी। जब अमावस्या आती है, तो वह अपराजेय होता है। जरासंध भी, भीम को अमावस्या पर मारने का सोच रहा था। इसलिए, कृष्ण ने भीम से उसे अमावस्या के पहले दिन मारने को कहा। उस निर्णायक कुश्ती में, भीम ने जरासंध के पैर को तोड़ा, और उसे विपरीत दिशा में फेंक दिया। अतः जरासंध की मृत्यु हो गई।
आधुनिक कुश्ती, दरअसल इन सभी शैलियों से थोड़ी अलग है। एक सामान्य फ्रीस्टाइल कुश्ती मुकाबले को, तीन-तीन मिनट की दो अवधियों में विभाजित किया जाता है और बीच में 30 सेकंड का विराम होता है। आधिकारिक अंडर-15, कैडेटों और अनुभवी प्रतियोगिताओं के लिए, इस अवधि को दो-दो मिनट तक कम कर दिया गया है। दो प्रतिस्पर्धी पहलवान, नौ मीटर व्यास वाली एक चटाई पर एक-दूसरे का सामना करते हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी के कंधों को थोड़े समय के लिए चटाई पर टिकाना होता है, जिससे प्रतिस्पर्धी पहलवान को गिराकर तत्काल जीत मिलती है।
चूंकि ऐसी जीत दुर्लभ होती है, इस खेल को अन्य तरीकों से भी जीता जा सकता है। कोई पहलवान, नियम होल्ड (Legal hold), थ्रो (Throw), या टेकडाउन (Takedown) की मदद से प्रतिद्वंद्वी को कुछ सेकंड के लिए, उसे मैट पर पीठ के बल गिराने या रिवर्सल (Reversal) तकनीक अपनाकर, अंक हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं। जबकि, उलटफेर में, रक्षात्मक स्थिति से प्रतिद्वंद्वी की लाभ स्थिति को नकारना और उस स्थिति पर नियंत्रण हासिल करना शामिल है।
कुश्ती की चालें, उनकी कठिनाई के अनुसार अंक प्रदान करती हैं। साथ ही, यदि प्रतिद्वंद्वी किसी नियम का उल्लंघन करता है, तो खिलाड़ी ज्यादा अंक प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि, एक मुकाबले के दौरान, तीन चेतावनियां पाने पर दोषी पहलवान को अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।
छह मिनट की अवधि के अंत में, कुल अंकों का मिलान किया जाता है, और अधिक अंक वाला पहलवान जीत जाता है। बराबरी की स्थिति में, जिस पहलवान ने एक ही चाल में सबसे अधिक अंक बनाए हैं, उसे विजेता घोषित किया जाता है।
आठ ओलंपिक पदक जीतने के बाद, ग्रीष्मकालीन खेलों में, हॉकी के बाद कुश्ती भारत का दूसरा सबसे सफल खेल है। के. डी. जाधव ने भारत को पहला ओलंपिक पदक, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 57 किलो श्रेणी में, हेलसिंकी 1952 (Helsinki 1952) में कांस्य पदक जीतकर दिया था। बीजिंग 2008 (Beijing 2008) में, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 66 किलो श्रेणी में सुशील कुमार ने भी कांस्य पदक जीता था। सुशील कुमार ने ही, समान श्रेणी में लंदन 2012 (London 2012) में रजत पदक पाया। उसी ओलंपिक में, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 60 किलो श्रेणी में योगेश्वर दत्त ने कांस्य पदक जीता।
दूसरी ओर, साक्षी मलिक ने रियो 2016 (Rio 2016) में महिलाओं की फ़्रीस्टाइल 58 किलो श्रेणी में कांस्य पदक जीता था। टोक्यो 2020 (Tokyo 2020) के दौरान, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 57 किलो श्रेणी में, रवि कुमार दहिया रजत पदक पाकर जीतते है। उसी ओलंपिक में, बजरंग पुनिया पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 65 किलो श्रेणी में कांस्य पदक जीतते है। जबकि, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 57 किलो श्रेणी में अमन सहरावत ने, हाल ही में पेरिस 2024 (Paris 2024) में कांस्य पदक जीता है।
इन्हीं उपलब्धियों के कारण, भारतीय कुश्ती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने हेतु, हमारी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2032 ओलंपिक तक पहलवानों के बुनियादी ढांचे और समर्थन में 170 करोड़ रुपये का निवेश करने की उम्मीद है। भारतीय कुश्ती महासंघ ने हमारी सरकार से यह समर्थन मांगा था। यह प्रायोजन केवल देश के विशिष्ट पहलवानों को ही नहीं, बल्कि कैडेट स्तर के पहलवानों को भी मिलेगा। इससे, राष्ट्रीय चैंपियनों को भी पुरस्कार राशि मिल पाएगी। साथ ही, कैडेट पहलवानों को प्रशिक्षण और प्रदर्शन के लिए विदेश भेजा जा सकता है।
किस प्रकार ज्ञान की धारा ने किया है हम जौनपुर वासियों को सदैव सशक्त
जौनपुर, आज हम समझेंगे कि मानव प्रगति के लिए, ज्ञान को हमेशा से ही शक्तिशाली और आवश्यक क्यों माना गया है। फिर हम प्राचीन भारतीय ज्ञान की परंपरा और शिक्षा प्रणालियों एवं दर्शन का पता लगाएंगे। बाद में, हम शिक्षा के केंद्र के रूप में जौनपुर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखेंगे। तब हम संस्कृति के विचार को समझेंगे, और जानेंगे कि यह किसी समाज के सांस्कृतिक और बौद्धिक जीवन को कैसे प्रतिबिंबित करती है। और लेख के अंत में, हम देखेंगे कि विभिन्न संस्कृतियां स्थानीय परंपराओं की कहानियों और रूपकों के माध्यम से अपनी संस्कृति को कैसे व्यक्त करती हैं।
ज्ञान एक ऐसी शक्ति है, जिसमें हमारे जीवन को बदलने, प्रगति बढ़ाने और भविष्य को आकार देने की शक्ति है। यह व्यक्तियों को सशक्त बनाता है, व्यक्तिगत विकास को सक्षम बनाता है, और सामूहिक उन्नति को बढ़ावा देता है। हालांकि, ऐसी महान शक्ति के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है। समाज और दुनिया पर इसके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, ज्ञान का नैतिक उपयोग करना आवश्यक है। ज्ञान को अपनाकर, जिज्ञासा को बढ़ावा देकर, आलोचनात्मक सोच और नैतिक व्यवहार की संस्कृति को अपनाकर, तथा आजीवन सीखने को बढ़ावा देकर, हम इसकी पूर्ण क्षमता का उपयोग कर सकते हैं। ज्ञान के अधिग्रहण के माध्यम से, व्यक्तियों को अपने विचार एवं बुद्धि को व्यापक बनाने, सूचित निर्णय लेने और अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने का अधिकार मिलता है। सामूहिक रूप से, ज्ञान नवाचार को बढ़ावा देता है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति होती है और जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार होता है। इसलिए, हमें इसका सकारात्मक परिवर्तन के लिए एक शक्ति के रूप में उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि, इसकी शक्ति मानवता को लाभान्वित करती है और सतत विकास को बढ़ावा देती है।
भारतीय दर्शन, विचार और चिंतन वे प्रणालियां हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप की सभ्यताओं द्वारा विकसित हुई हैं। उनमें रूढ़िवादी (आस्तिक) प्रणालियां, अपरंपरागत (नास्तिक) प्रणालियां, और दर्शन के वेदांत संप्रदाय शामिल हैं। रूढ़िवादी प्रणालियां, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व-मीमांसा, आदि से बनती हैं। जबकि, अपरंपरागत प्रणालियों में बौद्ध और जैन धर्म शामिल हैं। भारतीय विचार, विभिन्न दार्शनिक समस्याओं पर गौर करता है, जिनमें दुनिया की प्रकृति (ब्रह्मांड विज्ञान), वास्तविकता की प्रकृति (तत्वमीमांसा), तर्क एवं ज्ञान की प्रकृति (ज्ञानमीमांसा), तथा नैतिकता और धर्म का दर्शन, आदि महत्वपूर्ण हैं।
इसके अलावा, भारतीय दार्शनिक विचार की आधारशिला तीन बुनियादी अवधारणाओं से बनती है। ये अवधारणाएं, स्वयं या आत्मा, कार्य (कर्म), और मुक्ति (मोक्ष) हैं। चार्वाक संप्रदाय को छोड़कर, संपूर्ण भारतीय दर्शन इन तीन अवधारणाओं और उनके अंतर्संबंधों से संबंधित हैं। इसका मतलब हालांकि यह नहीं है कि, वे इन अवधारणाओं की वस्तुनिष्ठ वैधता को ठीक उसी तरीके से स्वीकार करते हैं। इनमें से कर्म की अवधारणा, सबसे आम तौर पर भारतीय प्रतीत होती है। परंतु, आत्मा की अवधारणा एक निश्चित अर्थ में पारलौकिक या पूर्ण आत्मा की पश्चिमी अवधारणा से मेल खाती है। साथ ही, सर्वोच्च आदर्श की अवधारणा के रूप में, मोक्ष की अवधारणा भी पश्चिमी विचार में रही है। अधिकांश भारतीय दर्शन मानते हैं कि, मोक्ष संभव है, और "मोक्ष की असंभवता" (निर्मोक्ष) को दार्शनिक सिद्धांत को ख़राब करने वाली एक भौतिक भ्रांति के रूप में माना जाता है।
भारतीय दर्शन का प्रभाव पूरे भारतवर्ष में देखा जा सकता है। हमारा जौनपुर शहर भी इसमें शामिल है। शर्की राजवंश ने, जौनपुर को दिल्ली के प्रतिद्वंद्वी के रूप में एक शक्तिशाली साम्राज्य में बदल दिया। मलिक सरवर और सुल्तान हुसैन जैसे शासकों के साथ, हमारे जौनपुर क्षेत्र को तैमूर के आक्रमण का तत्काल लाभ मिला। क्योंकि, तब दिल्ली की अराजकता से भाग रहे विद्वानों, कारीगरों और शिल्पकारों को उन शासकों ने जौनपुर में आश्रय दिया। इन प्रभावों ने तुगलक परंपराओं से गहराई से प्रेरित, एक नई वास्तुशिल्प शैली को जन्म दिया। बड़ी दीवारों, स्मारकीय प्रवेश द्वारों और न्यूनतम अलंकरण के साथ मजबूत, सैन्यवादी संरचनाएं जौनपुर में आम होने लगी। इसका उदाहरण भव्य अटाला मस्जिद (1408) में देखा जा सकता है।
मध्य गंगा के किनारे जौनपुर की रणनीतिक स्थिति ने, युद्ध-हाथियों जैसे संसाधनों तक पहुंच भी प्रदान की, जो बिहार और बंगाल के जंगलों में घूमते थे। हालांकि, मध्य एशियाई व्यापार मार्गों से इसकी दूरी का मतलब, युद्ध के घोड़ों तक सीमित पहुंच था। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि, शर्की शासकों के अधीन, जौनपुर प्रतिभाशाली व्यक्तियों के लिए एक चुंबक बन गया। संत, सूफ़ी, कवि और विद्वान हमारे शहर में आते रहे, जिससे यह शिक्षा और आध्यात्मिकता का केंद्र बन गया। लोग इसे "पूर्व का शिराज" कहते थे, जो इसके समृद्ध बौद्धिक और कलात्मक जीवन का प्रतीक है। शाह मदार जैसे रहस्यवादियों, संत कबीर सहित भक्ति आंदोलन के नेताओं और महदावी आंदोलन के संस्थापक - सैय्यद मुहम्मद ने हमारे शहर को घर समझा, जिन्होंने इसके जीवंत आध्यात्मिक परिदृश्य को आकार दिया।
शर्की राजवंश के पतन के बाद भी, जौनपुर की विरासत जीवित रही। उनके द्वारा प्रवर्तित ज्ञान और संस्कृति की परंपराएं, सदियों तक इस क्षेत्र को प्रभावित करती रहीं। इसके जीवंत बौद्धिक वातावरण ने काजी शिहाब-उद-दीन दौलताबादी और मौलाना ख्वाजगी जैसे दिग्गजों को आकर्षित किया, जिनकी तफ़सीर, फ़िक़्ह और कलाम पर रचनाएं काफी प्रसिद्ध हैं।
दर्शन से निकटता से संबंधित एक चीज, ‘संस्कृति' है। ‘संस्कृति’ एक संस्कृत शब्द है, जो किसी समाज या समुदाय के सामूहिक रीति-रिवाजों, परंपराओं और मूल्यों को संदर्भित करता है। भारतीय विरासत के संदर्भ में, संस्कृति पीढ़ियों से चली आ रही समृद्ध और विविध सांस्कृतिक प्रथाओं, भाषाओं, कलाओं और रीति-रिवाजों को समाहित करती है।
माना जाता है कि, जिस प्रकार नदी बहती है, उसी तरह ज्ञान और जीवन भी बहता है। ये सभी निरंतरता के सीमाहीन प्रवाह हैं। "गंगा" केवल एक सीमित नदी न होकर, भारतीय संस्कृति में सभी नदियों को संदर्भित करती है। उसी तरह, "सरस्वती" केवल एक देवी नहीं, बल्कि स्वयं ज्ञान का संदर्भ है। जिस प्रकार नदी बहती है और सब कुछ अपने प्रवाह में ले लेती है, उसी प्रकार संस्कृति भी बहती रहती है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय रूपक में संस्कृति अलग-अलग हो सकती है। इस संस्कृति से ‘ज्ञान की धाराएं’ संबंधित हैं, जिनका अर्थ ज्ञान एवं आध्यात्मिकता का प्रसारण है।
विश्व भर में संस्कृति, ज्ञान और नदियों की अवधारणाएं :
1. एशिया/ऑस्ट्रेलिया की संस्कृति
संस्कृत धातु "सृ" का अर्थ "बहना” या "प्रवाह करना" है, जिससे सरिता अर्थात नदी निकलती है। सार या सरस्वती सरिता का जल, एशिया से होकर बहता है। इसी सार या पानी के साथ, कुछ ऑस्ट्रेलियाई पौराणिक कथाएं सामने आई। एक कथा इस प्रकार है - दरअसल, एक समय दो भाई रेगिस्तान से उभरे। फिर, उन्होंने धरती को खोदना शुरू किया, जब तक कि वे पानी तक नहीं पहुंच गए। तब उन्होंने नदियों, पहाड़ों, फूलों और पेड़ों की स्थापना की। जब इन भाइयों की मृत्यु हो गई, तो वे पानी के सांपों के रूप में पुनर्जन्म लेते रहे, नदियों में बहते रहे, और इसके पश्चात उनकी आत्माएं बादलों का निर्माण करते हुए आकाश में उड़ गईं। ये बादल बारिश लाते रहते हैं, और उनका पानी एशिया/ऑस्ट्रेलिया की संस्कृति में ज्ञान की धाराओं के माध्यम से बहता रहता है।
2. अफ़्रीका की संस्कृति
योरूबा (Yoruba) लोगों के लिए उनके आराध्य - ओरुनमिला (Orunmila), ज्ञान, कुशाग्रता और दूरदर्शिता की ओरिशा (Orisha), अर्थात भौतिक रूप में प्रकट आत्मा है। उनकी पत्नी - ओसुन (Osun) नदी की देवी हैं, जो ताजे पानी, उर्वरता और सुंदरता की आत्मा हैं। जबकि उनका पानी भूमि और लोगों का पोषण करता है, ओरुनमिला शहरों और गांवों में यात्रा करते हैं। वे भविष्यवाणी के माध्यम से लोगों के जीवन को ठीक भी करते हैं। ओरुनमिला की तरह, अफ़्रीका की संस्कृति की धाराएं स्थानों और भाषाओं में बहती हैं, तथा ज्ञान की नदी से अंतर्दृष्टि प्राप्त करती हैं।
3. यूरोप की संस्कृति
युद्ध की देवी और शहर की रक्षक – एथेना (Athena), संघर्ष और हिंसा से बढ़कर तर्क और वृत्ति को महत्व देती है। वह शिल्प, साहित्य और कृषि की संरक्षक भी है। उन्होंने बांसुरी का आविष्कार किया था, और उनका प्रतिनिधित्व उल्लू द्वारा किया जाता है। यह उल्लू उनकी बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक है। उनका नेडॉन नदी (Nedon river) पर एक पुण्यस्थान भी है। दूसरी ओर, एथिया (Aethiya) के रूप में, वह जहाज निर्माण और नेविगेशन में कुशल है। यूरोप के शहरों में ज्ञान की कई धाराएं बहती हैं। इनके तटों पर ज्ञानी और देखभाल करने वाली देवी - सोफिया की भी पूजा की जाती है। वह भाग्य की देवता एवं महिला प्रतिनिधि है, तथा समय और स्थान पर राज करती है।
एथेना
4. चीन की संस्कृति
क्विंगशुई नदी (Qingshui river) के स्रोत पर, माउंट वुताई (Mount Wutai) है, जो चीन के चार पवित्र पहाड़ों में से एक है। यह एक युवा बोधिसत्व - मंजुश्री का निवास है, जो महान ज्ञान का अवतार है, और सौम्य महिमा से देदीप्यमान है। मंजुश्री, अंतर्दृष्टि की एक ज्वलंत शक्ति से अज्ञानता और पीड़ा को दूर करते है। अपने बाएं हाथ से अपने हृदय में, वह एक कमल धारण करते है, जिस पर महान बुद्धि सूत्र लिखा है। जब मंजुश्री के कमल का डंठल, पारलौकिक ज्ञान की ओर ले जाता है, तब चीनी संस्कृति की धाराएं, उसे ज्ञान की महान नदी की ओर ले जाती हैं।
5. मध्य पूर्व की संस्कृति
प्राचीन मिस्र की बुद्धि और ज्ञान की देवी – सेशत (Seshat) ने लेखन का आविष्कार किया था। सेशत, थॉट (Thot) की समकक्ष हैं, जो लेखन और ज्ञान के चंद्र देवता हैं। उनके पुस्तकालय की वह मालकिन भी हैं। वह पानी के माध्यम से प्रजनन क्षमता प्रदान करने वाली देवी - आइसिस (Isis) से भी जुड़ी हैं। लेखन के कार्य में चित्रित, वह एकमात्र देवी हैं। वह वास्तुकला, खगोल विज्ञान, ज्योतिष, भवन निर्माण, गणित, इतिहास और सर्वेक्षण की भी देवी हैं। अंतरिक्ष और समय के पार से ज्ञान की ये विविध धाराएं, मध्य पूर्व संस्कृति की नदी में विलीन होती हैं।
6. अमेरिका की संस्कृति
क्वेट्ज़ेलकोटल (Quetzelcoatl), सीखने, ज्ञान और लेखन के अमेरिकी देवता हैं। अपने जुड़वां देवता - ज़ोलोटल (Xolotl) के साथ, वह मानव जाति, हवा और बारिश के निर्माता है। मानव जाति के देवता के रूप में वह हमारी आंतरिक ऊर्जा का प्रतीक हैं। अमेरिका की संस्कृति की जीवंतता उसके ज्ञान की धाराओं में है, जो सीमाओं से परे और आगे बढ़ती है।
क्या 75 साल पुराना नेटो गठबंधन अब सिर्फ इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा?
दुनिया भर में 32 देशों का एक ऐसा सैन्य गठबंधन चर्चा में है, जो शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के ख़िलाफ़ बना था, लेकिन आज अपने ही सबसे बड़े सदस्य देश अमेरिका की नीतियों की वजह से ऐतिहासिक संकट का सामना कर रहा है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध ने जहां एक तरफ़ इस गठबंधन को अपनी सैन्य ताक़त बढ़ाने पर मजबूर किया है, वहीं अमेरिकी नेतृत्व के नए बयानों और रक्षा ख़र्च की चेतावनियों ने नेटो के भविष्य पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नेटो क्या है और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसे क्यों बनाया गया? नेटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन की स्थापना साल 1949 में अमेरिका, कनाडा और पश्चिमी यूरोप के कई राष्ट्रों द्वारा मिलकर की गई थी। इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य सोवियत संघ के ख़िलाफ़ सामूहिक सुरक्षा प्रदान करना था। यह पहला ऐसा शांतिकालीन सैन्य गठबंधन था जिसमें अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध के बाहर शामिल हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध की भारी तबाही के बाद, यूरोप के देश अपनी चरमराई अर्थव्यवस्थाओं को फिर से बनाने और अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे थे। उस वक़्त युद्ध से तबाह हुए परिदृश्य में उद्योगों को फिर से स्थापित करने और खाद्य उत्पादन को बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता की सख़्त ज़रूरत थी।
नेटो का झंडा
इसके साथ ही, एक बार फिर से ताक़तवर होते जर्मनी या सोवियत संघ की घुसपैठ के ख़िलाफ़ यूरोप को सुरक्षा आश्वासनों की भी दरकार थी। अमेरिका का मानना था कि पूरे यूरोप में कम्युनिस्ट विस्तार को रोकने के लिए एक आर्थिक रूप से मज़बूत, हथियारों से लैस और एकजुट यूरोप बेहद ज़रूरी है। इसी रणनीति के तहत तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री जॉर्ज मार्शल ने यूरोप को बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता देने का प्रस्ताव रखा। इसे यूरोपीय रिकवरी प्रोग्राम या 'मार्शल प्लान' कहा गया, जिसने न केवल यूरोपीय आर्थिक एकीकरण को सुगम बनाया बल्कि अमेरिका और यूरोप के बीच साझा हितों को भी मज़बूत किया। जब सोवियत संघ ने इस मार्शल प्लान में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया और अपने पूर्वी यूरोपीय सहयोगी देशों को भी यह आर्थिक सहायता लेने से रोक दिया, तो यूरोप में पूर्व और पश्चिम के बीच की खाई और गहरी हो गई।
साल 1947 और 1948 के दौरान कई ऐसी भू-राजनीतिक घटनाएं हुईं जिन्होंने पश्चिमी यूरोप के देशों को अपनी भौतिक और राजनीतिक सुरक्षा के प्रति चिंतित कर दिया। ग्रीस में चल रहे गृह युद्ध और तुर्की में बढ़ते तनाव के कारण तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन को यह ऐलान करना पड़ा कि अमेरिका दोनों देशों को आर्थिक और सैन्य सहायता प्रदान करेगा। इसी बीच चेकोस्लोवाकिया में सोवियत समर्थित तख्तापलट हुआ और जर्मनी की सीमाओं पर एक कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में आ गई। साल 1948 के मध्य में सोवियत प्रीमियर जोसेफ स्टालिन ने पश्चिमी देशों के संकल्प को परखने के लिए पश्चिम बर्लिन की नाकेबंदी कर दी, जिससे अमेरिका और सोवियत संघ सीधे टकराव के कगार पर आ गए थे। इन घटनाओं ने ट्रूमैन प्रशासन को पश्चिमी यूरोप की सुरक्षा के लिए एक ठोस यूरोपीय-अमेरिकी गठबंधन बनाने पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया।
सामूहिक रक्षा में इसका उद्देश्य क्या है और इसके सदस्य कौन हैं? बढ़ते तनाव और सुरक्षा चिंताओं के जवाब में पश्चिमी यूरोपीय देश सामूहिक सुरक्षा समाधान पर विचार करने के लिए आगे आए। मार्च 1948 में ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्ज़मबर्ग ने ब्रुसेल्स संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि ने सामूहिक रक्षा का आधार तय किया, जिसके तहत यदि इनमें से किसी एक राष्ट्र पर हमला होता है, तो अन्य देश उसकी रक्षा के लिए बाध्य होंगे। महीनों की लंबी बातचीत और अमेरिकी कांग्रेस में कई बहसों के बाद, आख़िरकार 1949 में नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते में यह सहमति बनी कि किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमले को सभी पर हमला माना जाएगा। इस संधि के मूल 12 सदस्य अमेरिका, कनाडा, बेल्जियम, डेनमार्क, फ्रांस, आइसलैंड, इटली, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल और यूनाइटेड किंगडम थे।
यह सामूहिक रक्षा व्यवस्था औपचारिक रूप से केवल यूरोप या उत्तरी अमेरिका में होने वाले हमलों पर लागू होती थी और इसमें औपनिवेशिक क्षेत्रों के संघर्षों को शामिल नहीं किया गया था। बाद में कोरियाई युद्ध के छिड़ने से नेटो सदस्यों ने तेज़ी से एक केंद्रीकृत मुख्यालय के ज़रिए अपने रक्षा बलों को एकीकृत और समन्वित करना शुरू कर दिया। साल 1952 में ग्रीस और तुर्की को नेटो में शामिल किया गया और 1955 में पश्चिमी जर्मनी भी इसका हिस्सा बन गया। पश्चिमी जर्मनी के प्रवेश के जवाब में सोवियत संघ ने अपना अलग 'वारसॉ ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन' (वारसॉ पैक्ट) बनाया। 1950 के दशक में नेटो का सैन्य सिद्धांत 'बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई' के इर्द-गिर्द घूमता था, जिसका मतलब था कि किसी भी हमले का जवाब अमेरिका बड़े परमाणु हमले से देगा।
शीत युद्ध की ज़रूरतों के लिए बना यह गठबंधन उस संघर्ष के ख़त्म होने के बाद भी न सिर्फ़ क़ायम रहा, बल्कि इसका लगातार विस्तार हुआ है। वर्तमान में नेटो के सदस्यों की संख्या 32 तक पहुंच गई है, जिनमें कई पूर्व सोवियत राज्य भी शामिल हैं। आज यह दुनिया का सबसे बड़ा शांतिकालीन सैन्य गठबंधन है। इसका मुख्यालय ब्रुसेल्स में है और यह आम सहमति पर आधारित गठबंधन है जहां सभी फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। हाल के वर्षों में रूस के बढ़ते ख़तरे को देखते हुए स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों ने भी अपनी पारंपरिक सैन्य गुटनिरपेक्ष नीति को छोड़कर नेटो की सदस्यता हासिल कर ली है। फिनलैंड अप्रैल 2023 में शामिल हुआ, जिससे रूस के साथ नेटो की सीमा दोगुनी हो गई, और तुर्की व हंगरी के राजनीतिक विवादों के सुलझने के बाद मार्च 2024 में स्वीडन भी इसका पूर्ण सदस्य बन गया।
रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक सुरक्षा में नेटो की क्या भूमिका है? शीत युद्ध के बाद नेटो ने अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना शुरू किया। 1990 के दशक की शुरुआत में यूगोस्लाविया के विघटन और बोस्निया में जातीय संघर्ष के दौरान नेटो ने पहली बार अहम भूमिका निभाई और अप्रैल 1994 में अपने इतिहास के पहले लड़ाकू अभियान में बोस्नियाई सर्ब विमानों को मार गिराया। इसके इतिहास में पहली और इकलौती बार 'आर्टिकल 5' का इस्तेमाल अमेरिका पर हुए 9/11 के आतंकी हमलों के बाद किया गया था। इसके परिणामस्वरूप अफ़ग़ानिस्तान में एक बड़ा मिशन शुरू हुआ, जिसमें 50 गठबंधन और भागीदार देशों के 130,000 से ज़्यादा सैनिकों ने हिस्सा लिया। यह ऐतिहासिक सैन्य अभियान साल 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के साथ समाप्त हुआ।
साल 2022 की शुरुआत में रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए हमले ने यूरोप के पूरे सुरक्षा ढांचे को हिला कर रख दिया। यूक्रेन हालांकि नेटो का सदस्य नहीं है, लेकिन अमेरिका सहित कई नेटो देशों ने उसे अभूतपूर्व मात्रा में सैन्य सहायता प्रदान की है। इसमें टैंक, भारी तोपखाने, सशस्त्र ड्रोन और विमान भेदी प्रणालियां जैसे आधुनिक हथियार शामिल हैं। हालांकि, नेटो नेताओं ने सीधे तौर पर रूस के साथ सीधे संघर्ष में उलझने या 'नो-फ्लाई ज़ोन' लागू करने से बचने की पूरी कोशिश की है। फिर भी, रूस ने कड़ी चेतावनी दी है कि इस सहायता को देकर नेटो सहयोगी परमाणु युद्ध के भड़कने का भारी जोखिम उठा रहे हैं। यूक्रेन लगातार पूर्ण नेटो सदस्यता हासिल करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा होना मुश्किल है।
रूसी आक्रामकता ने नेटो को अपनी पूर्वी सीमाओं पर रक्षा प्रणाली मज़बूत करने के लिए विवश कर दिया है। 2014 के बाद से नेटो ने अपने सैन्य अभ्यास काफ़ी बढ़ा दिए हैं और बुल्गारिया, एस्टोनिया, हंगरी, लातविया, लिथुआनिया, पोलैंड, रोमानिया और स्लोवाकिया में नए कमांड सेंटर खोले हैं। 2017 में नेटो ने बाल्टिक राज्यों और पोलैंड में बहुराष्ट्रीय युद्ध समूहों को तैनात करना शुरू किया और रोमानिया में एक नया बहुराष्ट्रीय बल बनाया। इसके अलावा, गठबंधन ने अपनी पूर्वी सीमाओं पर हवाई गश्त में इज़ाफ़ा किया है। जून 2025 में द हेग, नीदरलैंड्स में होने वाले नेटो शिखर सम्मेलन में यह उम्मीद की जा रही है कि भविष्य के हमलों से बचने के लिए वायु और मिसाइल रक्षा प्रणाली में चार सौ प्रतिशत की वृद्धि को मंज़ूरी दी जाएगी।
क्या अमेरिका नेटो के भविष्य के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन गया है? जहां एक तरफ़ नेटो रूस से मिल रही सैन्य चुनौतियों का सामना कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ सत्ता में लौटे अमेरिकी प्रशासन के रवैये ने गठबंधन के भीतर एक अभूतपूर्व संकट पैदा कर दिया है। आज यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका ही नेटो के भविष्य के लिए नंबर एक ख़तरा बनकर उभरा है। जनवरी 2025 में कार्यभार संभालने के बाद, डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने यूक्रेन के लिए अपने समर्थन को कमज़ोर कर दिया है, कुछ सैन्य सहायता को अस्थायी रूप से रोक दिया है और मॉस्को के बजाय कीव पर संघर्ष विराम के लिए रियायतें देने का ज़्यादा दबाव बनाया है। फ़रवरी 2025 में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने यूक्रेन के नेटो में शामिल होने की संभावना को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया।
रक्षा ख़र्च को लेकर भी अमेरिका और अन्य नेटो सदस्यों के बीच मतभेद चरम पर हैं। ट्रम्प प्रशासन अब नेटो सदस्यों से अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 5 प्रतिशत रक्षा पर ख़र्च करने की मांग कर रहा है, जिसमें से 3.5 प्रतिशत मुख्य रक्षा ख़र्च और 1.5 प्रतिशत रक्षा-संबंधी व्यय होना चाहिए। मार्च 2025 में उन्होंने यहां तक सुझाव दे दिया कि जो सदस्य देश रक्षा ख़र्च में पर्याप्त योगदान नहीं दे रहे हैं, अमेरिका उनकी रक्षा नहीं करेगा। ट्रम्प प्रशासन के इस बदलते रुख और बार-बार दी जा रही चेतावनियों ने यूरोप के देशों में अपनी सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा कर दी है।
इसके अलावा, ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति की ताज़ा बयानबाज़ी ने पूरे गठबंधन को गहरे असमंजस में डाल दिया है। वेनेज़ुएला में ऑपरेशन के बाद, अमेरिका ने कथित तौर पर ग्रीनलैंड को अपने अगले हस्तक्षेप के स्थान के रूप में चिह्नित किया है। ग्रीनलैंड अमेरिका, कनाडा और आर्कटिक की रक्षा के लिए एक अहम रणनीतिक स्थिति रखता है और अमेरिकी अंतरिक्ष कमान (स्पेस कमांड) का मुख्य केंद्र भी है। लेकिन अगर अमेरिका वास्तव में ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने के लिए सैन्य आक्रमण करता है, तो यह तकनीकी रूप से नेटो संधि के आर्टिकल 5 को ट्रिगर कर देगा, जिसके तहत सभी सदस्य देशों को डेनमार्क की रक्षा के लिए आना होगा।
इस संभावित ख़तरे के जवाब में डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि डेनमार्क ग्रीनलैंड पर किसी भी क़दम का कड़ा विरोध करेगा। डेनिश सेना को 1952 के एक निर्देश की भी याद दिलाई गई है जो उन्हें उच्च कमान के आदेशों का इंतज़ार किए बिना डेनिश क्षेत्र पर किसी भी हमले का तुरंत जवाब देने की शक्ति देता है। आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों के कारण वहां नेटो की मौजूदगी पहले से ही बढ़ रही है। जानकारों का कहना है कि अगर अमेरिका इसी तरह नेटो के उन बहुपक्षीय सिद्धांतों से दूर जाता रहा जिन पर इस गठबंधन की नींव रखी गई थी, तो नेटो को जल्द ही अपनी भविष्य की रणनीति को फिर से परिभाषित करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
1000 साल, 7 शहर और इतने साम्राज्य: क्या आप जानते हैं हमारी राजधानी दिल्ली का यह इतिहास?
जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो दिल्ली की एक बेहद अनोखी तस्वीर सामने आती है। दिल्ली के पुरातात्विक निष्कर्षों और हालिया खुदाइयों ने यह साबित कर दिया है कि यहाँ तीसरी और चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर मुग़ल काल तक सांस्कृतिक परतों की एक निरंतर और अटूट श्रृंखला मौजूद रही है। इतिहासकार और पुरातत्वविद उस समय और भी हैरान रह गए जब यहाँ खुदाई के दौरान मिट्टी के बर्तनों के ऐसे अवशेष (पॉटरी फ्रैगमेंट्स) मिले जिनका समय काल लगभग एक हज़ार से पाँच सौ ईसा पूर्व माना जाता है। ये प्राचीन अवशेष इस बात की गवाही देते हैं कि दिल्ली महज़ कुछ सौ साल पुराना शहर नहीं है, बल्कि यह हज़ारों सालों से मानव सभ्यता और संस्कृति का एक बेहद महत्वपूर्ण और जीवंत केंद्र रहा है। शासक बदलते रहे, लेकिन इस ज़मीन ने हर दौर की संस्कृति को अपने भीतर संजो कर रखा।
दिल्ली के सात शहर – गॉर्डन रिस्ले हर्न, 1906
दिल्ली के सात शहर: तोमर और चौहान वंश ने दिल्ली के पहले शहर 'लाल कोट' की नींव कैसे रखी? अगर हम दिल्ली के पहले आधिकारिक शहर की बात करें, तो इसका निर्माण ग्यारहवीं शताब्दी में हुआ था। दिल्ली के इस सबसे पहले शहर को 'लाल कोट' के नाम से जाना जाता था, जिसकी स्थापना साल एक हज़ार साठ ईस्वी में तोमर वंश के शासकों द्वारा की गई थी। तोमर वंश ने इस शहर को अपनी सत्ता का एक मज़बूत केंद्र बनाया था। लेकिन बारहवीं शताब्दी के मध्य में इतिहास ने फिर करवट ली और चौहान वंश ने तोमर शासकों को सत्ता से हटाकर इस क्षेत्र पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। चौहान शासकों ने इस शहर को केवल जीता ही नहीं, बल्कि इसका विस्तार भी किया। उन्होंने लाल कोट की पुरानी सीमाओं को और आगे बढ़ाया और इस नई व विस्तारित संरचना को 'क़िला राय पिथौरा' का नाम दिया। यह क़िला आज भी दिल्ली के शुरुआती राजनीतिक और सैन्य इतिहास का एक सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
दिल्ली सल्तनत के दौर में 'सीरी' और 'तुग़लक़ाबाद' का निर्माण कैसे हुआ? दिल्ली ने सही मायनों में एक विशाल साम्राज्य की राजधानी का रूप तब लिया जब यहाँ 'दिल्ली सल्तनत' की स्थापना हुई। इसी दौर में दिल्ली का दूसरा शहर बसाया गया जिसे 'सीरी' के नाम से जाना गया। सत्ता के गलियारों में बदलाव का दौर जारी रहा और ख़िलजी वंश के पतन के बाद सत्ता तुग़लक़ वंश के हाथों में आ गई। साल तेरह सौ बीस से लेकर तेरह सौ चौबीस ईस्वी तक राज करने वाले ग़यासुद्दीन तुग़लक़ इस वंश के पहले शासक थे। अपनी सामरिक और प्रशासनिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने दिल्ली के तीसरे शहर की नींव रखी, जिसे आज हम 'तुग़लक़ाबाद' के नाम से जानते हैं। इसके विशाल और ऊँचे खंडहर आज भी तुग़लक़ वंश की वास्तुकला और उनके भव्य इरादों की गवाही देते हैं।
'जहाँपनाह' और 'फ़िरोज़ाबाद' के ज़रिए दिल्ली का भूगोल कैसे बदला गया? तुग़लक़ वंश के शासकों ने दिल्ली के भूगोल और इसके शहरों के निर्माण में सबसे अहम भूमिका निभाई थी। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ के बाद जब मुहम्मद-बिन-तुग़लक़ सत्ता में आए, तो उन्होंने साल तेरह सौ छब्बीस-सत्ताईस ईस्वी में एक बहुत ही अनूठा निर्माण कार्य करवाया। उन्होंने दिल्ली के दो पुराने शहरों, यानी लाल कोट और सीरी को दो विशाल दीवारों के ज़रिए आपस में जोड़ दिया। इस तरह लाल कोट और सीरी के बीच की ज़मीन को सुरक्षित करके दिल्ली का चौथा शहर बसाया गया, जिसे 'जहाँपनाह' नाम दिया गया। इसके बाद साल तेरह सौ इक्यावन से तेरह सौ अट्ठासी तक शासन करने वाले फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने वास्तुकला की इस परंपरा को और आगे बढ़ाया। उन्होंने यमुना नदी के शांत तटों पर दिल्ली के पाँचवें शहर 'फ़िरोज़ाबाद' का निर्माण करवाया। हालांकि, यह भी एक ऐतिहासिक सत्य है कि दिल्ली पर राज करने वाले हर वंश ने अपना कोई नया शहर नहीं बसाया। पंद्रहवीं शताब्दी में राज करने वाले सैय्यद वंश और पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य में राज करने वाले लोधी वंश ने अपने पीछे दिल्ली में कोई विशेष नया शहर या राजधानी नहीं छोड़ी।
दिल्ली का नक्शा – मिसेज़ शूस्मिथ का बनाया मज़ेदार कार्टून नक्शा (1930)
मुग़ल साम्राज्य ने 'दीनपनाह' और 'शाहजहाँनाबाद' की भव्यता को कैसे तराशा? सोलहवीं शताब्दी के मध्य से लेकर सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक दिल्ली ने मुग़ल साम्राज्य की राजधानी के रूप में एक बहुत ही अस्थिर दौर देखा, जहाँ सत्ता का केंद्र अक्सर बदलता रहता था। मुग़ल बादशाह हुमायूँ ने वास्तुकला के इस ऐतिहासिक सफ़र में अपना योगदान देते हुए साल पंद्रह सौ तैंतीस ईस्वी में 'दीनपनाह' का निर्माण करवाया, जिसे दिल्ली का छठा शहर माना जाता है। लेकिन दिल्ली का सबसे भव्य और ऐतिहासिक रूप तब सामने आया जब मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने सत्ता सँभाली। साल सोलह सौ उनतालीस ईस्वी में बादशाह शाहजहाँ ने मुग़ल साम्राज्य की राजधानी को वापस दिल्ली लाने का एक बड़ा ऐतिहासिक फ़ैसला किया। इसी फ़ैसले के तहत उन्होंने एक पूरी तरह से चारदीवारी से घिरे हुए नए शहर का निर्माण करवाया। इस शहर को 'शाहजहाँनाबाद' का नाम दिया गया, जो मुग़ल वास्तुकला का सबसे बेहतरीन नमूना बना और इसे दिल्ली का सातवाँ शहर कहा गया।
अलेक्जेंडर राउज़ (Alexander Rouse), पीडब्ल्यूडी (PWD), दिल्ली का नक्शा
अंग्रेज़ों ने अपनी राजधानी के रूप में कलकत्ता छोड़कर आधुनिक 'नई दिल्ली' की रूपरेखा कैसे तैयार की? समय का पहिया घूमता रहा और भारत के राजनीतिक परिदृश्य में एक बहुत बड़ा बदलाव तब आया जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी ताक़त बढ़ानी शुरू की। साल अठारह सौ तीन ईस्वी में अंग्रेज़ों ने मराठों को एक निर्णायक युद्ध में हरा दिया और दिल्ली की ऐतिहासिक ज़मीन पर अपना पूरा कब्ज़ा कर लिया। लंबे समय तक अंग्रेज़ों की राजधानी कलकत्ता ही रही, लेकिन साल उन्नीस सौ ग्यारह ईस्वी में ब्रिटिश साम्राज्य ने एक बहुत ही अहम रणनीतिक फ़ैसला लिया। उन्होंने अपनी राजधानी को कलकत्ता से हटाकर पूरी तरह से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया। प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने और ब्रिटिश सत्ता की भव्यता को दर्शाने के लिए मुग़लों द्वारा बसाए गए पुराने शहर 'शाहजहाँनाबाद' के दक्षिण-पश्चिम इलाके में एक बिल्कुल नया शहर बसाया गया। इस नए और आधुनिक शहर को 'नई दिल्ली' का नाम दिया गया, जो आज भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की गौरवशाली राजधानी के रूप में शान से खड़ा है।
दिल्ली को 'सात शहरों' (Seven Cities of Delhi) के रूप में देखने का नज़रिया आखिर मशहूर कैसे हुआ? दरअसल, इस पहचान को लोकप्रिय बनाने का बहुत बड़ा श्रेय गॉर्डन रिस्ले हर्न (Gordon Risley Hearn) को जाता है। सर गॉर्डन रिस्ले हर्न भारत में तैनात एक ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी (इंजीनियर) और कर्नल थे। उनके पिता का नाम चार्ल्स शकबर्ग हर्न (1829–1884) और माता का नाम मार्गरेट मिलर मेगौन (1844–1932) था। उन्होंने अपनी शिक्षा विंचेस्टर कॉलेज, वूलविच मिलिट्री अकादमी और स्कूल ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग से पूरी की। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध किताब 'द सेवन सिटीज़ ऑफ़ दिल्ली' में सबसे पहले इस मुहावरे को गढ़ा था और दिल्ली के इस ऐतिहासिक सफर की तुलना सात पहाड़ियों वाले 'रोम' (Rome) शहर से की थी।
हर्न के इस ऐतिहासिक विचार को एक बेहद दिलचस्प और विज़ुअल रूप तब मिला, जब 1931 में 'नई दिल्ली' के औपचारिक उद्घाटन के मौके पर मिसेज शूस्मिथ (Mrs. Shoosmith) ने एक अद्भुत नक्शा तैयार किया। मिसेज शूस्मिथ, दिल्ली के निर्माण से जुड़ी प्रमुख ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स टीम (लुटियंस-बेकर) के एक सदस्य की पत्नी थीं। कॉमिक और मज़ेदार अंदाज़ में हाथ से बनाए गए इस नक़्शे (non-scale map) में दिल्ली के सभी 7 ऐतिहासिक शहरों के सफर को एक ही पन्ने पर बेहद बारीकी से कैद किया गया था। समय के उस दुर्लभ पल को दर्शाने वाले इस शानदार नक़्शे की इकलौती ज्ञात प्रति आज कैम्ब्रिज (Cambridge) में मिसेज शूस्मिथ के लिगेसी बॉक्स में सुरक्षित रखी गई है।
तितलियों का अद्भुत प्रवास और प्रकृति से उनका गहरा जुड़ाव
तितलियों का प्रवास प्रकृति के सबसे अद्भुत दृश्यों में से एक माना जाता है। हर साल कुछ तितलियाँ मौसम बदलने के साथ कभी कभी हजारों किलोमीटर की यात्रा करती हैं। वे ठंड, भोजन की कमी और बदलते वातावरण से बचने के लिए ऐसे स्थानों की ओर जाती हैं, जहाँ उन्हें फूलों का रस और अपने बच्चों के लिए उपयुक्त पौधे मिल सकें।
दुनिया की सभी तितलियाँ प्रवास नहीं करतीं, लेकिन मोनार्क, पेंटेड लेडी और रेड एडमिरल जैसी कुछ प्रजातियाँ लंबी यात्राओं के लिए जानी जाती हैं। ये तितलियाँ मौसम और दिन की अवधि में होने वाले बदलावों को पहचानकर सही दिशा में उड़ान भरती हैं।
तितलियों का यह सफर केवल उनका जीवन बचाने के लिए ही नहीं होता, बल्कि यह प्रकृति के संतुलन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। प्रवास के दौरान वे कई फूलों का परागण करती हैं, जिससे पौधों और जंगलों का जीवन चक्र चलता रहता है।
तितलियों के प्रवास का अध्ययन वैज्ञानिकों को जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और प्राकृतिक आवासों की स्थिति को समझने में भी मदद करता है। इस तरह तितलियों की ये लंबी यात्राएँ प्रकृति और जीवन के बीच एक सुंदर जुड़ाव को दर्शाती हैं।