Writer:
Stephen Markel, Tushara Bindu Gude, Muzaffar Alam, Los Angeles County Museum of ArtPublisher:
Los Angeles County Museum of ArtTags:Art Objects - Art/Beauty
2.
WAILING BEAUTY : The Perishing Art of Nawabi Lucknow
Writer:
Sir William Henry Sleeman, Peter Denis REEVESPublisher:
Saiyed Anwer AbbasTags:Art Objects - Art/Beauty
माराडोना के हैंड ऑफ गॉड ने कैसे जिताया अर्जेंटीना को विश्व कप
डिएगो माराडोना (Diego Maradona) फुटबॉल इतिहास के सबसे महान खिलाड़ियों में से एक माने जाते हैं। वर्ष 1986 के फीफा विश्व कप में इंग्लैंड के खिलाफ उनका प्रदर्शन आज भी खेल जगत के सबसे चर्चित पलों में गिना जाता है। इसी मैच में उन्होंने पहला गोल किया, जिसे बाद में “हैंड ऑफ गॉड” के नाम से जाना गया। इस गोल में माराडोना ने अपने हाथ से गेंद को जाल में पहुंचाया, लेकिन रेफरी यह देख नहीं पाए और गोल मान लिया गया। बाद में माराडोना ने मजाकिया अंदाज़ में कहा कि यह गोल “थोड़ा माराडोना के सिर से और थोड़ा भगवान के हाथ से” हुआ था।इसी मैच में कुछ मिनट बाद माराडोना ने दूसरा गोल किया, जिसे “गोल ऑफ द सेंचुरी” कहा जाता है। उन्होंने मैदान के बीच से गेंद लेकर कई इंग्लिश खिलाड़ियों को शानदार ड्रिब्लिंग (dribbling) से पीछे छोड़ा और गोल दाग दिया। यह गोल फुटबॉल इतिहास के सबसे बेहतरीन गोलों में गिना जाता है।माराडोना अपनी अद्भुत गेंद नियंत्रण क्षमता और कठिन अभ्यास के लिए भी जाने जाते थे। वे घंटों तक ड्रिब्लिंग, बॉल कंट्रोल और संतुलन पर मेहनत करते थे, जिसने उन्हें दुनिया के सबसे कुशल खिलाड़ियों में शामिल किया। उनकी प्रतिभा, जुनून और खेल शैली ने उन्हें फुटबॉल का अमर सितारा बना दिया। संदर्भ - https://tinyurl.com/55wth494 https://tinyurl.com/yc3f7986https://tinyurl.com/2bht2epfhttps://tinyurl.com/yc4k6he8https://tinyurl.com/tcdxzrv6
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
चलिए, आज भारत के राष्ट्रीय खेल - हॉकी के विकास व उपलब्धियों की जांच करते हैं
लखनऊ, आज हम हॉकी खेल के इतिहास को समझेंगे, और देखेंगे कि, यह एक आधुनिक खेल के रूप में कैसे विकसित हुआ। फिर हम पता लगाएंगे कि, भारत में औपनिवेशिक काल के दौरान हॉकी कैसे लोकप्रिय हुआ। इसके पश्चात, हम हॉकी के नियमों और खेल साहित्य पर नजर डालेंगे। बाद में, हम अंतरराष्ट्रीय हॉकी में भारत की उपलब्धियों की जांच करेंगे। और अंततः, हम ध्यानचंद जी जैसे हॉकी के महान खिलाड़ियों और इस खेल के स्टेडियमों एवं प्रशिक्षण केंद्रों के बारे में जानेंगे।फ़ील्ड हॉकी (Field hockey), 11-11 खिलाड़ियों के दो विरोधी संघों द्वारा खेला जाने वाला एक मैदानी खेल है। इसके खिलाड़ी, अपने विरोधी संघ के गोल (Goal) में एक छोटी गेंद को मारने के लिए, स्ट्राइकिंग छोर (Striking end) पर घुमावदार बनी छड़ियों का उपयोग करते हैं। माना जाता है कि, हॉकी की शुरुआत बहुत प्राचीन सभ्यताओं से हुई है। हॉकी में अरब, यूनानी, फारसी और रोमन लोगों के अपने-अपने संस्करण थे। साथ ही, दक्षिण अमेरिका के एज़्टेक इंडियन्स (Aztec Indians) द्वारा खेले जाने वाले, एक समान छड़ी खेल के प्रमाण भी पाए गए हैं। हॉकी को हर्लिंग (Hurling) और शिंटी (Shinty) जैसे अन्य शुरुआती खेलों से भी पहचाना जा सकता है। मध्य युग के दौरान, फ्रांस में हॉक्वेट (Hoquet) नामक एक छड़ी वाला खेल खेला जाता था। हॉकी का नाम इसी शब्द से आने की संभावना है।उन्नीसवीं सदी के अंत में अंग्रेजी स्कूलों में भी हॉकी प्रचलित हुआ। दक्षिणपूर्वी लंदन (London) के एक इलाके में स्थापित पहले पुरुष हॉकी क्लब ने, 1861 में एक नियम पुस्तक रिकॉर्ड की। लंदन के एक अन्य क्लब ने इन नियमों में कई प्रमुख बदलाव पेश किए। इनमें हाथों का उपयोग करने या कंधे के ऊपर लाठी उठाने पर प्रतिबंध; गेंद के रूप में रबर के स्थान पर एक गोले को अपनाना; और एक स्ट्राइकिंग सर्कल (Striking circle) को अपनाना शामिल था। ये नए नियम, 1886 में लंदन में स्थापित हुए हॉकी एसोसिएशन (Hockey Association) में लागू किए गए। भारत और पूर्वी विश्व में इस खेल को फैलाने के लिए, ब्रिटिश सेना काफी हद तक जिम्मेदार थी। हॉकी की अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता 1895 में शुरू हुई, और 1928 तक यह भारत का राष्ट्रीय खेल बन गया था। उस वर्ष ओलंपिक खेलों में भारतीय संघ ने पहली बार प्रतिस्पर्धा करते हुए स्वर्ण पदक जीता था। बाद में, अधिक अंतर्राष्ट्रीय मैचों के आह्वान के कारण, 1971 में हॉकी विश्व कप की शुरुआत हुई। इस खेल की अन्य प्रमुख अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में एशियाई कप, एशियाई खेल, यूरोपीय कप और पैन-अमेरिकन खेल शामिल हैं।खेल के मैदानों के रूप में, भूमि के बड़े भूखंडों की उपलब्धता और उपकरणों की सरल प्रकृति के कारण, हॉकी, धीरे-धीरे भारत में बच्चों और युवाओं के बीच लोकप्रिय खेल बन गया था। हमारे देश का पहला हॉकी क्लब, 1855 में तत्कालीन कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में बनाया गया था। अगले कुछ दशकों में, कलकत्ता में ‘बीटन कप’ और बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) में ‘आगा खान टूर्नामेंट’ जैसी नई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं ने इस खेल को अधिक लोकप्रिय बनाया। 1907 और 1908 में भारत में हॉकी एसोसिएशन बनाने की बात चल रही थी, हालांकि, यह नहीं बन पाया। फिर बाद में, अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ (FIH) के गठन के बाद, 1925 में भारतीय हॉकी महासंघ (IHF) का गठन हुआ था।भारतीय हॉकी महासंघ ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय दौरा, 1926 में न्यूजीलैंड (New Zealand) में आयोजित किया था। यहां भारतीय हॉकी पुरुष संघ ने 21 मैच खेले, और उनमें से 18 मैच जीते। इस प्रतियोगिता में युवा खिलाड़ी ध्यानचंद जी का उदय भी हुआ।1924 तक ओलंपिक खेलों के साथ समझौता न होने पर हॉकी को ओलंपिक से हटा दिया गया था। परंतु, अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ ने हॉकी को एम्स्टर्डम 1928 (Amsterdam 1928) ओलंपिक से स्थायी दर्जा प्राप्त करवाया। भारतीय हॉकी महासंघ ने 1927 में अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ की सदस्यता अर्जित की। इस प्रकार, भारतीय हॉकी संघ ने 1928 में अपना पहला ओलंपिक खेल खेला।दरअसल, हॉकी खेल का उद्देश्य, निर्धारित समय समाप्त होने से पहले विरोधी संघ से अधिक गोल करना है। सभी खिलाड़ी गेंद को नियंत्रित करने के लिए हॉकी स्टिक (Hockey stick) का उपयोग करते हैं, और अपने संघ के लिए स्कोर करने हेतु, इसे विरोधी गोल पोस्ट में डालते हैं। हॉकी स्टिक में घुमावदार छोर वाला एक लंबा हैंडल होता है, जो एक तरफ से सपाट होता है। स्टिक का वजन 737 ग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। पहले मैदानी हॉकी स्टिक लकड़ी के बनते थे, लेकिन आधुनिक हॉकी स्टिक कांच, कार्बन और अरैमिड (Aramid) के रेशों से बनाई जाती हैं।खिलाड़ियों को गेंद को छूने के लिए, स्टिक के केवल सपाट हिस्से का उपयोग करने की अनुमति है। ऐसा न करने पर बैकस्टिक फाउल (Backstick foul) होता है, और तब गेंद विपक्षी को दे दी जाती है। खिलाड़ियों को केवल अपनी स्टिक से ही गेंद को पास या ड्रिबल (Dribble) करके विपरीत गोल की ओर ले जाना होता है। इसके अलावा, गोल शॉट केवल स्ट्राइकिंग सर्कल के अंदर से ही किया जा सकता है।क्या आप जानते हैं कि, आज 13 ओलंपिक पदकों ( 8 स्वर्ण, 1 रजत और 4 कांस्य पदक) के साथ, भारत ने खुद को हॉकी खेल की सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित किया है। एक खिलाड़ी, जिन्होंने भारत की इस कहानी को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वे 1980 के मॉस्को ओलंपिक खेलों (Moscow Olympics) के स्वर्ण पदक विजेता जफर इकबाल हैं। दिलचस्प बात यह है कि, पिछले 100 वर्षों में दुनिया के किसी भी अन्य हॉकी संघ ने ऐसी सफलता नहीं पाई है। 1947 में भारत की आजादी के बाद, भारतीय हॉकी ने बहुत कुछ हासिल किया है। हमने 1947 से अब तक, 5 स्वर्ण पदक जीते हैं।1976 में ओलंपिक खेलों में, हॉकी एस्ट्रोटर्फ (Astroturf) में बदल गई, जबकि भारतीय संघ को प्राकृतिक घास वाले मैदानों पर खेलने की आदत थी। हालांकि, 1980 में भारत ने इस नई सतह पर खेलने की सभी चुनौतियों को पार कर लिया, और मॉस्को में प्रतिष्ठित स्वर्ण पदक जीता।जफर इकबाल के अलावा, हॉकी के एक अन्य खिलाड़ी, जो काफ़ी मशहूर एवं प्रतिभाशाली है, मेजर ध्यानचंद है। ध्यानचंद वे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपनी छड़ी की खेल रणनीति से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया था। इसी कारण, उन्हें ‘हॉकी के जादूगर’ यह उपनाम मिला। 29 अगस्त, 1905 को इलाहाबाद में ब्रिटिश भारतीय सेना के एक सैनिक के घर जन्मे ध्यान सिंह, बहुत कम उम्र में ही हॉकी की ओर आकर्षित हो गए थे। अपने पिता की तरह वे भी 16 साल की उम्र में सेना में भर्ती हो गए, और वहां अपना पसंदीदा खेल खेलना जारी रखा।सैन्य में बिताए अपने समय के दौरान, उन्होंने 1922 और 1926 के बीच विभिन्न सेना हॉकी प्रतियोगिताओं और रेजिमेंटल खेलों को खेला। ध्यानचंद खेल में इतने तल्लीन रहते थे कि, वे अपनी ड्यूटी के बाद रात में भी हॉकी खेलते थे। चांदनी रात में खेलने के कारण ही, उन्हें ध्यानचंद नाम मिला, क्योंकि 'चंद' शब्द का हिंदी अर्थ ‘चंद्रमा’ है।उनकी रैंकों में प्रगति के कारण, उन्हें 1926 में न्यूजीलैंड दौरे के लिए भारतीय सेना के संघ में शामिल किया गया। न्यूजीलैंड में भारतीय संघ ने 18 मैच जीते, दो मैच ड्रा (Draw) खेले और केवल एक ही मुकाबला हारा। भारत के इस अद्भुत प्रदर्शन की कई लोगों ने सराहना की, और विशेष रूप से ध्यानचंद जी को अपने पहले अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में अपनी प्रतिभा के लिए बहुत प्रशंसा मिली। दौरे से वापसी पर, उन्हें ब्रिटिश भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट में लांस नायक नामित किया गया।हॉकी को पहली बार ओलंपिक में शामिल करने के साथ, नवगठित भारतीय हॉकी महासंघ, नीदरलैंड (Netherland) खेलों के लिए सर्वोत्तम संभव संघ भेजने के लिए उत्सुक था। पंजाब, बंगाल, राजपुताना, संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और मध्य प्रांत ने इन खेलों में भाग लिया। और जब भारतीय सेना ये खेल नहीं खेल पाई, तब ध्यानचंद जी को संयुक्त प्रांत अर्थात हमारे वर्तमान उत्तर प्रदेश के लिए खेलने दिया गया।ध्यान चंद गेंद के साथवास्तव में, ध्यानचंद जी के कार्यकाल से ही उत्तर प्रदेश में हॉकी खेल के लिए लोकप्रियता है। आज भी, हमारे राज्य में ऐसी कई पहले हैं, जिनसे इस खेल के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ पाए। उदाहरण के तौर पर, के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम, पहली बार 1957 में हमारे शहर लखनऊ के हलचल भरे हजरतगंज के ठीक मध्य में खोला गया था। इसका नाम महान हॉकी खिलाड़ी - बाबू के. डी. सिंह के नाम पर रखा गया है, जिनका जन्म लखनऊ में हुआ था। यह भारत के सबसे पुराने बहुउद्देशीय स्टेडियमों में से एक है। के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम में क्रिकेट, टेनिस, फुटबॉल और हॉकी सहित कई अलग-अलग खेल खेले जाते हैं। इस स्थल ने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय हॉकी मैचों की मेजबानी की है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/mc4sw5fh 2. https://tinyurl.com/3h9eed3j 3. https://tinyurl.com/5tvx36rw 4. https://tinyurl.com/yp34n4bw 5. https://tinyurl.com/27st9xtx 6. https://tinyurl.com/5n8a645w
धर्म का युग : 600 ई.पू. से 300 ई.
जरूर जानें, अलेक्जेंड्रिया के महान पुस्तकालय ने कैसे रखी प्राचीन विश्व में ज्ञान की नींव?
आज, हम पढ़ेंगे कि सिकंदर (Alexander the Great) कौन था, और वैश्विक इतिहास को आकार देने में उनकी क्या भूमिका थी। फिर, हम पता लगाएंगे कि उन्होंने ज्ञान और संस्कृति के केंद्र के रूप में, अलेक्जेंड्रिया (Alexandria) शहर की स्थापना कैसे की। लेख में आगे, हम देखेंगे कि अलेक्जेंड्रिया कैसे एशिया, यूरोप और अफ्रीका का मिलन स्थल और व्यापार केंद्र था। फिर हम अलेक्जेंड्रिया के महान पुस्तकालय पर गौर करेंगे। इसके पश्चात, हम पता लगाएंगे कि सिकंदर की मृत्यु के बाद, पुस्तकालय के केंद्रीकृत ज्ञान का महत्व कैसे कम होने लगा। जबकि अंत में हम देखेंगे कि, आज अलेक्जेंड्रिया के पुस्तकालय की क्या विरासत बची है।सिकंदर का जन्म, जुलाई 356 ईसा पूर्व में मैसीडोनिया (Macedonia) की प्राचीन राजधानी पेला (Pella) में हुआ था। उनके माता-पिता मैसीडोन के फिलिप द्वितीय (Philip II) और उनकी पत्नी - ओलंपियास (Olympias) थे। सिकंदर ने, प्रसिद्ध दार्शनिक एरिस्टोटल (Aristotle) से शिक्षा प्राप्त की थी। 336 ईसा पूर्व में फिलिप द्वितीय की हत्या हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप, सिकंदर को उनका शक्तिशाली लेकिन अस्थिर राज्य विरासत में मिला। तब, उसने अपने घर में ही मौजूद दुश्मनों से निपटकर, ग्रीस में मैसीडोनियन शक्ति को फिर से स्थापित किया। इसके पश्चात, वह विशाल फ़ारसी साम्राज्य को जीतने के लिए निकल पड़ा। इस मुहिम में आई बाधाओं के बावजूद, सिकंदर कभी नहीं हारा। उन्होंने अपनी सेना को एशिया, सीरिया और मिस्र के फ़ारसी क्षेत्रों में जीत दिलाई। उनकी सबसे बड़ी जीत 331 ईसा पूर्व में गौगामेला (Gaugamela) की लड़ाई में थी, जो अब उत्तरी इराक है। इस प्रकार, वह केवल 25 वर्ष की आयु में ही फारस का 'महान राजा' बन गया। अगले आठ वर्षों में, राजा, सेनापति, राजनीतिज्ञ, विद्वान और खोजकर्ता के रूप में सिकंदर ने अपनी सेना को 11,000 मील आगे बढ़ाया, 70 से अधिक शहरों की स्थापना की। इस प्रकार उसने एक ऐसा साम्राज्य बनाया, जो तीन महाद्वीपों तक फैला हुआ था।इसी साम्राज्य में उत्तरी मिस्र में, भूमध्य सागर पर ‘अलेक्जेंड्रिया’ नामक एक बंदरगाह शहर बसा है, जिसकी स्थापना सिकंदर ने 331 ईसा पूर्व में की थी। सीरिया पर विजय प्राप्त करने के बाद, सिकंदर अपनी सेना के साथ मिस्र में गया। तब उसने ग्रीक के एक महत्वपूर्ण व्यापार केंद्र – नौक्रैटिस (Naucratis) से बेहतर वाणिज्यिक केंद्र बनाने के इरादे से अलेक्जेंड्रिया की स्थापना की थी। उसने अपनी इच्छा अनुसार, शहर का बुनियादी डिजाइन तैयार किया था। ग्रिड पैटर्न में आटा या अनाज डालकर इस शहर की योजना तैयार की गई थी, जिसे बाद में उनके वास्तुकार ने अपनाया था। यह प्राचीन दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक - फ़ारोस (Pharos), और अलेक्जेंड्रिया के पौराणिक पुस्तकालय का स्थल था। एक समय में, यह प्राचीन दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र भी था।अलेक्जेंड्रियासिकंदर के आगमन के बाद, यह शहर एक छोटे बंदरगाह से विकसित हुआ। बाद में, इस शहर को टॉलेमिक राजवंश (Ptolemaic Dynasty) (323-30 ईसा पूर्व) के तहत एक बौद्धिक, सांस्कृतिक और वाणिज्यिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। बाद में, यह प्रारंभिक ईसाई धर्म के केंद्र के रूप में भी प्रसिद्ध हो गया।अलेक्जेंड्रिया की सबसे उल्लेखनीय चीजों में से एक इसका पुस्तकालय था। यह ज्ञान के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण था। दरअसल, माउसियन (Mouseion), उच्च शिक्षा का एक संस्थान था, जो अलेक्जेंड्रिया के पुस्तकालय का हिस्सा था। यह ज्ञान की देवियों - म्यूज़ेस (Muses) को समर्पित था और संभवतः टॉलेमी द्वितीय (Ptolemy II – 282-246 ईसा पूर्व) द्वारा स्थापित किया गया था। यह विद्वानों के लिए एक सभा स्थल और घर के रूप में भी कार्य करता था, जिनके कार्यों ने इस पुस्तकालय की स्थापना में योगदान दिया था।331 ईसा पूर्व में, अलेक्जेंड्रिया समुद्र और नील नदी के बीच अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण, भूमध्य सागर का सबसे बड़ा व्यापार केंद्र बन गया। इसमें भव्य बंदरगाह (Port / Portus), सैन्य बेड़े के लिए पोर्टस मैग्नस (Portus Magnus) और नहरों, महलों और बाजारों के साथ-साथ वाणिज्य के लिए पोर्टस यूनोस्टस (Portus Eunostus) शामिल थे। अलेक्जेंड्रिया शहर समुद्री व्यापार के कारण विकसित हुआ। यहां से मिस्र के अनाज, पैपीरस (Papyrus) और कांच का निर्यात होता था , जबकि, ग्रीस और रोम से विलासिता की वस्तुओं का आयात होता था। नील नदी और कारवां मार्गों ने इसे अंतर्देशीय मिस्र, अरब, भारत और पूर्वी अफ्रीका से जोड़ा, जिससे मसालों, धूप बत्ती और वस्त्रों के आदान-प्रदान की सुविधा हुई। टॉलेमिक शासन के तहत, राज्य ने प्रमुख उद्योगों (विशेषकर गेहूं) को नियंत्रित किया था। साथ ही, महानगरीय बाजारों और उन्नत बंदरगाह सुविधाओं ने प्राचीन दुनिया के सबसे प्रभावशाली वाणिज्यिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में इसकी भूमिका को मजबूत किया।अलेक्जेंड्रिया का पुस्तकालय, वास्तव में प्राचीन दुनिया का एक आश्चर्य था, तथा ज्ञान और सीखने की शक्ति का प्रमाण भी था। इसमें पुस्तकों, पांडुलिपियों, स्क्रॉल और मानचित्रों का एक विशाल संग्रह था, जो इसे प्राचीन दुनिया के सबसे बड़े और व्यापक पुस्तकालयों में से एक बनाता है। कहा जाता है कि, इसमें 7 लाख से अधिक स्क्रॉल शामिल थे, जिनमें साहित्य, विज्ञान, दर्शन और अन्य विषयों के कार्य शामिल थे। इन स्क्रॉल की मदद से ही प्राचीन यूनानी, दुनिया के ज्ञान और अंतर्दृष्टि से वाकिब हुए। इसके अतिरिक्त, इस पुस्तकालय में मानचित्रों का एक बड़ा संग्रह था, जिनका नाविकों और व्यापारियों द्वारा भूमध्य सागर में नौचालन करने हेतु उपयोग किया जाता था। यह पुस्तकालय प्राचीन यूनानियों के लिए अत्यधिक गर्व और प्रशंसा का भी स्रोत था, और इसकी विरासत सदियों से कायम है।अलेक्जेंड्रिया का प्राचीन पुस्तकालयटॉलेमी द्वितीय के शासनकाल के दौरान, अलेक्जेंड्रिया के पुस्तकालय ने दुनिया में ज्ञान का सर्वोच्च केंद्र बनने के लिए, एक क्रांतिकारी नीति लागू की। शाही आदेश के अनुसार, शहर के बंदरगाह पर उतरने वाले प्रत्येक जहाज की पुस्तकों और स्क्रॉल के लिए अनिवार्य खोज की जाती थी। किसी भी पांडुलिपि को तुरंत जब्त कर लिया जाता था, और निरीक्षण के लिए पुस्तकालय में भेजा जाता था। इस अधिग्रहण रणनीति ने इस पुस्तकालय को भूमध्य सागर के बौद्धिक उत्पादन के लिए एक विशाल भंडार में बदल दिया। एक बार जब कोई किताब जब्त कर ली जाती थी, तो पुस्तकालय के लेखक इसकी एक हस्तलिखित प्रति तैयार करते थे। इसके बाद, पुस्तकालय में मूल पांडुलिपि रखी जाती थी, जबकि, उसकी प्रति जहाज के मालिक को लौटाई जाती थी।सिकंदर की मृत्यु के बाद, टॉलेमी तृतीय के शासनकाल से लेकर क्लियोपेट्रा सप्तम (Cleopatra VII) के शासनकाल तक, अलेक्जेंड्रिया के पतन को राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों द्वारा चिह्नित किया गया था। इसी कारण, अंततः टॉलेमिक राजवंश का अंत हुआ। इस अवधि के दौरान, इस शहर ने अपना पूर्व गौरव खो दिया। लगातार उत्तराधिकार विवादों और नागरिक अशांति से राज्य की राजनीतिक स्थिरता भी कमजोर हो गई थी। महंगे सैन्य अभियान, भव्य शाही व्यय और खराब संसाधन प्रबंधन ने राज्य के वित्त पर भी दबाव डाला, जिसके परिणामस्वरूप कराधान में वृद्धि हुई, और जनता में असंतोष हुआ। इसके पुस्तकालय का पतन भी, इतिहास के दुखद और गर्म बहस वाले रहस्यों में से एक बना हुआ है।अलेक्जेंड्रिया का यह पुस्तकालय आज सही सलामत नहीं है। लेकिन इसके खंडहरों में भी, सहस्राब्दियों तक इसका प्रभाव गूंजता है। इस पुस्तकालय ने इस बात को आकार दिया कि, समाज किस प्रकार शिक्षा, अनुसंधान और सांस्कृतिक संरक्षण को महत्व देता है। यहां बनाए गए नवीन बिब्लियोथेका अलेक्जेंड्रिना (Bibliotheca Alexandrina) पुस्तकालय में संग्रहालय, गैलरी और अनुसंधान केंद्र शामिल हैं।जबकि, अलेक्जेंड्रिया के मूल पुस्तकालय का कोई निश्चित खंडहर नहीं मिला है, पुरातत्वविदों ने माउसियन परिसर के कुछ हिस्सों, प्राचीन व्याख्यान कक्षों और भूमिगत कमरों का पता लगाया है। माना जाता है कि, वे भंडारण सुविधाएं या उपभवन थे। इस उत्खनन से हेलेनिस्टिक वास्तुकला (Hellenistic architecture) और कलाकृतियों का पता चलता है, जो अलेक्जेंड्रिया के इस उत्खनन से हेलेनिस्टिक वास्तुकला (Hellenistic architecture) और कलाकृतियों का पता चलता है, जो अलेक्जेंड्रिया के प्रज्वलित और ज्ञान पर आधारित अतीत का संकेत देते हैं। संदर्भ1. https://tinyurl.com/ywey7428 2. https://tinyurl.com/4w6v8pap 3. https://tinyurl.com/yuxtnsfe 4. https://tinyurl.com/y9e535vb 5. https://tinyurl.com/yrn34bw6 6. https://tinyurl.com/2thta6e9 7. https://tinyurl.com/4uwntwxj
आधुनिक राज्य : 1947 ई. से वर्तमान तक
भारी कर्ज के बावजूद संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका का दबदबा क्यों?
दुनिया भर में शांति बनाए रखने का दावा करने वाले संयुक्त राष्ट्र को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि अमेरिका इसका सबसे बड़ा ख़र्च क्यों उठाता है। आम तौर पर लोगों को लगता है कि बाइस प्रतिशत का भारी भरकम बजट देकर अमेरिका शायद कोई घाटे का सौदा कर रहा है। लेकिन असलियत इसके बिल्कुल उलट है। अकेले न्यूयॉर्क शहर को संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय की मेज़बानी करने से हर साल लगभग तीन अरब अड़सठ करोड़ डॉलर का सीधा आर्थिक फ़ायदा होता है और पंद्रह हज़ार से ज़्यादा लोगों को रोज़गार मिलता है। सिर्फ़ पैसा ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे ताक़तवर कूटनीतिक मंच के अपने देश में होने से अमेरिका को ख़ुफ़िया जानकारी और वैश्विक राजनीति पर ऐसा नियंत्रण मिलता है जिसे किसी भी क़ीमत पर ख़रीदा नहीं जा सकता। दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की राख से निकालकर आज के आधुनिक दौर तक पहुँचाने वाली इस विशाल संस्था का इतिहास, इसकी ताक़त और इसकी कमज़ोरियों को समझना आज के दौर में बेहद ज़रूरी है।द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र का गठन क्यों हुआ?बीसवीं सदी में दुनिया ने दो भयानक महायुद्ध देखे थे। पहले विश्व युद्ध के बाद शांति बनाए रखने के लिए साल 1919 में लीग ऑफ नेशंस नाम की संस्था बनाई गई थी। लेकिन यह संस्था दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की आग में जलने से नहीं रोक सकी और साल 1946 में इसे भंग कर दिया गया। इसी विफलता से सबक लेते हुए दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने एक नया और ज़्यादा मज़बूत वैश्विक संगठन बनाने का फ़ैसला किया। इसकी पहली सुगबुगाहट अगस्त 1941 में तब हुई जब अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूज़वेल्ट और ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने अटलांटिक चार्टर पर हस्ताक्षर किए। बाद में डंबार्टन ओक्स और याल्टा सम्मेलनों में अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ के नेताओं ने इसकी रूपरेखा तैयार की। आख़िरकार 25 अप्रैल 1945 को सैन फ्रांसिस्को में दुनिया भर के पचास देशों के प्रतिनिधि जमा हुए। पोलैंड जो इस सम्मेलन में नहीं आ सका था, उसे भी बाद में संस्थापक सदस्य के रूप में शामिल किया गया। इस तरह 24 अक्टूबर 1945 को इक्यावन संस्थापक देशों के साथ संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक तौर पर स्थापना हुई। इसका मुख्य मक़सद आने वाली पीढ़ियों को युद्ध के ख़तरे से बचाना, मानवाधिकारों की रक्षा करना और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का पालन सुनिश्चित करना है।सुरक्षा परिषद कैसे काम करती है और यह वीटो पावर क्या है?संयुक्त राष्ट्र के भीतर सबसे ताक़तवर हिस्सा उसकी सुरक्षा परिषद है। यही वह इकलौती संस्था है जो अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने के लिए सैन्य बल के इस्तेमाल की मंज़ूरी दे सकती है और इसके फ़ैसले सदस्य देशों पर क़ानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं। इस परिषद में कुल पंद्रह सदस्य होते हैं जिनमें से पाँच स्थायी सदस्य हैं और दस अस्थायी सदस्य होते हैं जिन्हें दो साल के लिए चुना जाता है। ये पाँच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन हैं। इन पाँचों देशों के पास एक बेहद ख़ास ताक़त है जिसे वीटो पावर कहा जाता है। किसी भी बड़े और ग़ैर-प्रक्रियागत फ़ैसले को पास करने के लिए पंद्रह में से नौ सदस्यों की हाँ ज़रूरी है, लेकिन इसके साथ ही यह भी ज़रूरी है कि पाँचों स्थायी सदस्यों में से कोई भी इसके ख़िलाफ़ वोट न करे। अगर एक भी स्थायी सदस्य न में वोट देता है तो वह प्रस्ताव रद्द हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र बनाते समय इन बड़े देशों को डर था कि कहीं बहुमत उनके ख़िलाफ़ न इस्तेमाल होने लगे। अगर इन्हें यह ताक़त न दी जाती तो ये देश इस संस्था में शामिल ही नहीं होते और पुरानी संस्था लीग ऑफ नेशंस की तरह यह भी नाकाम हो जाती। हालाँकि अब यह वीटो पावर एक बड़ी समस्या बन चुकी है। स्थायी सदस्य अक्सर अंतरराष्ट्रीय शांति के बजाय अपने आर्थिक और राजनीतिक फ़ायदों के लिए या अपने सहयोगी देशों को बचाने के लिए इस ताक़त का इस्तेमाल करते हैं। अगर कोई स्थायी देश किसी प्रस्ताव को रोकना नहीं चाहता लेकिन उसका समर्थन भी नहीं करना चाहता, तो वह वोटिंग में हिस्सा न लेने का विकल्प चुन सकता है।सुरक्षा परिषदभारत सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य क्यों नहीं है?भारत जैसे विशाल और प्रभावशाली देश का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य न होना आज के समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी बहस का विषय है। दुनिया भर के तमाम मंचों और रेडिट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के एशिया केंद्रित फ़ोरम पर यह सवाल लगातार उठता रहता है कि आख़िर भारत इसका स्थायी हिस्सा क्यों नहीं है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अब तक दुनिया काफ़ी बदल चुकी है लेकिन सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता आज भी उन्हीं पाँच देशों तक सीमित है। इस मुद्दे पर वैश्विक कूटनीति में लगातार चर्चा होती रहती है और भारत की दावेदारी को लेकर विभिन्न देशों और जानकारों के बीच एक लंबी बहस जारी है।दुनिया के कितने देश संयुक्त राष्ट्र का हिस्सा हैं और कौन बाहर है?इस समय दुनिया भर के एक सौ पचानवे देश संयुक्त राष्ट्र के दायरे में गिने जाते हैं। इनमें से एक सौ तिरानवे देश इसके पूर्ण सदस्य हैं जबकि दो देशों को स्थायी ग़ैर-सदस्य पर्यवेक्षक का दर्जा मिला हुआ है। ये दो देश वेटिकन सिटी और फ़िलिस्तीन हैं। पर्यवेक्षक होने के नाते वे महासभा की बैठकों में हिस्सा ले सकते हैं लेकिन उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं है। वेटिकन सिटी दुनिया का इकलौता ऐसा आज़ाद देश है जिसने ख़ुद ही पूर्ण सदस्य बनने के लिए आवेदन नहीं किया क्योंकि वहां के सर्वोच्च धर्मगुरु पोप अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सीधा दख़ल नहीं देना चाहते। दूसरी तरफ़ फ़िलिस्तीन को एक सौ अड़तीस देशों ने संप्रभु राष्ट्र माना है लेकिन इज़रायल के साथ चल रहे विवाद के कारण अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश उसे पूर्ण सदस्य बनने से रोकते हैं। इनके अलावा ताइवान, कोसोवो और पश्चिमी सहारा जैसे कई इलाक़े हैं जो पूर्ण देश की मान्यता पाना चाहते हैं। ताइवान तो शुरुआत में संस्थापक सदस्य था लेकिन चीन में हुए गृह युद्ध के बाद जब वहाँ कम्युनिस्ट सरकार आई तो संयुक्त राष्ट्र ने पुरानी सरकार को निकालकर नई चीनी सरकार को मान्यता दे दी। अब चीन अपने वीटो की ताक़त से ताइवान को कभी सदस्य नहीं बनने देता। किसी भी नए देश को सदस्य बनने के लिए सुरक्षा परिषद के पाँचों स्थायी सदस्यों की सहमति और फिर महासभा में दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होती है।संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों का मानचित्रइस विशाल वैश्विक संस्था को पैसा कहाँ से मिलता है?संयुक्त राष्ट्र को चलाने का ज़्यादातर ख़र्च इसके एक सौ तिरानवे सदस्य देश उठाते हैं। संस्था के मुख्य रूप से दो बजट होते हैं जिनमें एक नियमित बजट है और दूसरा शांति स्थापना बजट है। हर देश को कितना पैसा देना है यह उसकी भुगतान क्षमता के आधार पर तय होता है। इसके लिए उस देश की कुल राष्ट्रीय आय, जनसंख्या और बाहरी कर्ज़ जैसे आँकड़े देखे जाते हैं। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है इसलिए वह सबसे ज़्यादा बाइस प्रतिशत पैसा देता है जो कि लगभग अस्सी करोड़ डॉलर से ज़्यादा बैठता है। इसके बाद चीन बीस प्रतिशत और जापान लगभग सात प्रतिशत का योगदान देते हैं। शांति स्थापना के काम में भी अमेरिका छब्बीस प्रतिशत से ज़्यादा का ख़र्च उठाता है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि कई देश समय पर पैसा नहीं चुकाते। इस साल के शुरुआती आँकड़ों के मुताबिक़ बानवे देशों ने अपना पूरा बकाया नहीं चुकाया है। अमेरिका पर ख़ुद डेढ़ अरब डॉलर का भारी बकाया है और चीन पर भी लगभग साठ करोड़ डॉलर का कर्ज़ है। अगर कोई देश लगातार दो साल तक अपना ज़रूरी बकाया नहीं चुकाता है तो संयुक्त राष्ट्र महासभा में उसका वोट देने का अधिकार छीना जा सकता है। अफ़ग़ानिस्तान और वेनेज़ुएला जैसे देशों को ऐसी ही कार्रवाई का सामना करना पड़ा है।अमेरिका को अपने यहाँ मुख्यालय होने का क्या फ़ायदा मिलता है?साल 1946 में संयुक्त राष्ट्र ने अपने मुख्यालय के लिए अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर को चुना था। बहुत से अमेरिकियों को लगता है कि उनके देश का पैसा इस वैश्विक संस्था पर बेवज़ह ख़र्च हो रहा है और इसीलिए वहाँ की सरकार भी कई बार बजट में कटौती की बात करती है। लेकिन मुख्यालय का अमेरिका में होना उसके लिए एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो दुनिया के किसी और देश के पास नहीं है। हर साल होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में दुनिया भर के नेता और बड़े अधिकारी न्यूयॉर्क आते हैं। इन विदेशी प्रतिनिधियों के बच्चे अमेरिका में पढ़ाई करते हैं और छुट्टियाँ बिताते हैं जिससे अमेरिका का कूटनीतिक दबदबा बढ़ता है। साल 2009 में विकीलीक्स के दस्तावेज़ों से यह बात सामने आई थी कि यह मुख्यालय अमेरिका के लिए दुनिया भर की ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने का एक बहुत बड़ा केंद्र है। इसके अलावा वीज़ा जारी करने का अधिकार अमेरिका के पास है। वह कई बार इसका इस्तेमाल अपने राजनीतिक मक़सद के लिए करता है। हाल ही में अमेरिका ने फ़िलिस्तीन के प्रतिनिधिमंडल को वीज़ा न देने की धमकी दी थी। अगर अमेरिका अपने बजट में कटौती करता है या पीछे हटता है तो चीन जैसे देश इस ख़ाली जगह को भरने के लिए पूरी तरह तैयार बैठे हैं। जानकार मानते हैं कि अगर अमेरिका से यह संस्था किसी और देश में चली गई तो अमेरिका दुनिया के एजेंडे को तय करने की अपनी सबसे बड़ी ताक़त खो देगा।संदर्भ 1. https://tinyurl.com/ybhgprqy2. https://tinyurl.com/255f3fy73. https://tinyurl.com/28n22sh34. https://tinyurl.com/2d5hlhdt5. https://tinyurl.com/2at2pq5z6. https://tinyurl.com/225xx2zo
निवास : 2000 ई.पू. से 600 ई.पू.
भागवत पुराण में कैसे पनपी इंद्रप्रस्थ नगरी श्रो कृष्ण के भक्ति रस में
क्या आप जानते हैं कि प्राचीन भारतीय इतिहास और ज्ञान के सबसे बड़े विश्वकोशों में से एक, भागवत पुराण, मूल रूप से 18 हज़ार श्लोकों और 332 अध्यायों में लिखा गया था जो बारह स्कंधों में विभाजित है। यह महज़ एक धार्मिक किताब नहीं है, बल्कि यह समय की गणना से लेकर मानव जीवन की उत्पत्ति, भ्रूण के विकास और ब्रह्मांड के विनाश तक के रहस्यों को खोलता है। हिंदू धार्मिक परंपरा के अनुसार कलियुग की शुरुआत में महर्षि व्यास द्वारा रचित यह ग्रंथ मुख्य रूप से परमेश्वर के प्रति अगाध प्रेम पर केंद्रित है। जब पांडव वंशी राजा परीक्षित को एक ब्राह्मण ने सात दिन में मृत्यु का श्राप दिया था, तब उन्होंने अपना राज-पाट छोड़कर जीवन का असली लक्ष्य खोजने का निश्चय किया। उसी समय उनकी भेंट महान संत शुकदेव गोस्वामी से हुई, जिन्होंने लगातार सात दिनों तक बिना खाए-पिए राजा परीक्षित को यही भागवत पुराण सुनाया था ताकि उन्हें मोक्ष मिल सके। इसी पवित्र ग्रंथ में हम देखते हैं कि कैसे भगवान कृष्ण पांडवों का मार्गदर्शन करते हैं और इंद्रप्रस्थ जैसी भव्य राजधानी की स्थापना से लेकर उनके जीवन की कई अहम घटनाओं में अपनी भूमिका निभाते हैं।भागवत पुराण में जीवन, मृत्यु और परम भक्ति का क्या रहस्य छिपा है?भागवत पुराण अठारह महापुराणों में से एक है जिसे वैदिक ज्ञान का सबसे प्रामाणिक स्रोत माना जाता है। यह ग्रंथ आत्मा की प्रकृति से लेकर ब्रह्मांड की उत्पत्ति तक ज्ञान के सभी क्षेत्रों को छूता है। यह जीवन क्या है, मृत्यु और जन्म का चक्र क्या है, और ईश्वर व मनुष्य के बीच क्या संबंध है, जैसे मूलभूत सवालों के जवाब देता है। हिंदू धर्म में जीवन के चार मुख्य पहलू माने गए हैं— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। भागवत पुराण इन चारों के अलावा एक पाँचवाँ तत्व भी जोड़ता है, और वह है ईश्वरीय सेवा या परम भक्ति। इसका दसवाँ स्कंध सबसे अधिक प्रसिद्ध है, जिसमें वृंदावन में कृष्ण के बचपन की लीलाओं का विस्तार से वर्णन है। इसमें कृष्ण को केवल एक मार्गदर्शक के रूप में नहीं, बल्कि एक शूरवीर बालक के रूप में दिखाया गया है, जो राक्षसों से गाँव वालों की रक्षा करता है। वृंदावन की गोपियों का कृष्ण के प्रति जो अगाध और तीव्र प्रेम था, उसे ही बाद में भक्ति योग के रूप में जाना गया। जब कृष्ण मथुरा चले जाते हैं, तो गोपियाँ दुख से भर जाती हैं और उनका यही वियोग सर्वोच्च भगवान के प्रति चरम भक्ति का एक आदर्श प्रस्तुत करता है। भगवत पुराण का दसवां खंडबंजर खांडवप्रस्थ कैसे बना भव्य और दिव्य इंद्रप्रस्थ?भागवत पुराण और महाभारत की कथाओं में इंद्रप्रस्थ को एक ऐसी जगह के रूप में दर्शाया गया है जहाँ पांडवों के जीवन की कई ऐतिहासिक घटनाएँ घटीं। जब कौरवों और पांडवों के बीच राज्य का बँटवारा हुआ, तो युधिष्ठिर ने खांडवप्रस्थ का बंजर और वीरान जंगल अपने हिस्से में लिया ताकि कोई और विवाद न हो। यह यमुना नदी के पश्चिमी तट पर स्थित एक बंजर भूमि थी, जिसके चारों ओर प्राचीन खांडव वन था। इस वन की रक्षा देवराज इंद्र करते थे और यहाँ नागों के राजा तक्षक का राज था। इंद्र ने यह सुनिश्चित किया था कि इस क्षेत्र में बारिश न हो और यह भूमि बंजर ही रहे ताकि इंसान यहाँ बस न सकें। एक दिन अग्नि देव एक कमज़ोर ब्राह्मण का रूप धारण करके कृष्ण और अर्जुन के पास आए। उन्होंने बताया कि बारह साल तक चले एक यज्ञ में लगातार घी पीने के कारण उन्हें अपच हो गई है और इसका इलाज केवल खांडव वन के जीवों की चर्बी खाने से ही हो सकता है। अग्नि देव ने भगवान विश्वकर्मा द्वारा बनाए गए दिव्य अस्त्र कृष्ण और अर्जुन को दिए। अर्जुन को प्रसिद्ध कपिध्वज रथ और गांडीव धनुष मिला, जबकि कृष्ण को अजेय सुदर्शन चक्र और कौमोदकी गदा प्राप्त हुई। खंडवा वन का दहन, बंतेय श्री मंदिर, 10वीं शताब्दी, अंगकोर, कंबोडियादेवराज इंद्र के तूफ़ान को अर्जुन और कृष्ण ने कैसे रोका?जब अस्त्रों से सुसज्जित होकर कृष्ण और अर्जुन ने खांडव वन को जलाना शुरू किया, तो देवराज इंद्र अपने पूरे दल-बल के साथ इसे बचाने आ पहुँचे। इंद्र ने अपने विशाल ऐरावत हाथी पर सवार होकर तूफ़ानी बारिश शुरू कर दी ताकि आग बुझाई जा सके। तब अर्जुन ने अपने अतुलनीय तीरंदाज़ी कौशल का प्रदर्शन करते हुए आसमान में तीरों की एक ऐसी छत या चंदवा बना दिया जिससे बारिश की बूँदें ज़मीन तक पहुँच ही नहीं पाईं। खमेर कला और कंबोडिया के मंदिरों की मूर्तियों में इस दृश्य को बहुत ही बारीकी से उकेरा गया है जहाँ दिखाया गया है कि तीरों की उस छत को हंसों की एक कतार ने सँभाल रखा है, जबकि नीचे नाग, शेर, हाथी और अन्य जानवर आग से बचने की कोशिश कर रहे हैं। इसी विनाश के बीच, अग्नि देव की कृपा से मंडपाल ऋषि की पत्नी जरिता और उनके चार बेटों को बचा लिया गया, जिनके नाम जरितारि, सारिसृक्क, स्तंबमित्र और द्रोण थे। इस पूरे प्रलय के बीच अर्जुन ने मयासुर नाम के एक महान असुर वास्तुकार की जान बख्श दी। मयासुर ने अपने प्राण बचाने के बदले में पांडवों के लिए एक ऐसा अद्भुत और भव्य नगर बसाया जिसकी सुंदरता के आगे स्वर्ग भी फीका पड़ जाए। देवराज इंद्र के सम्मान में इस भव्य नगर का नाम इंद्रप्रस्थ रखा गया। राजसूय यज्ञ में भगवान कृष्ण ने शिशुपाल का वध क्यों किया?इंद्रप्रस्थ के भव्य निर्माण के बाद, पांडवों ने वहां एक विशाल राजसूय यज्ञ का आयोजन किया। जरासंध के मारे जाने के बाद, भगवान कृष्ण और बलराम इस यज्ञ में शामिल होने के लिए मयासुर द्वारा निर्मित इस नई राजधानी में पधारे। यज्ञ के समापन समारोह में जब सबसे सम्मानित व्यक्ति को चुनने की बात आई, तो पांडवों में सबसे छोटे भाई सहदेव ने कृष्ण का नाम प्रस्तावित किया। इस पर जरासंध के पुराने सहयोगी राजा शिशुपाल ने कड़ी आपत्ति जताई। शिशुपाल कृष्ण की बुआ श्रुतदेवी का पुत्र था और जब उसका जन्म हुआ था, तब वह बहुत काला और बदसूरत था, और उसकी तीन आँखें व चार हाथ थे। उस समय एक आकाशवाणी हुई थी कि एक महान व्यक्ति इसे अपनी गोद में लेगा और इसके अतिरिक्त अंग गिर जाएंगे, और अंततः वही व्यक्ति इसका वध भी करेगा। बुआ श्रुतदेवी के अनुरोध पर कृष्ण ने वचन दिया था कि वह शिशुपाल की सौ गालियां माफ़ करेंगे। राजसूय यज्ञ में शिशुपाल ने कृष्ण को धोखेबाज़, स्त्रियों के पीछे भागने वाला और भगोड़ा कहते हुए सारी मर्यादाएँ लांघ दीं। जब शिशुपाल ने अपनी गालियों की गिनती पूरी कर ली, तो भगवान कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल की गर्दन काट दी। शिशुपाल के वध के बाद कृष्ण ने इंद्रप्रस्थ क्यों छोड़ा?राजसूय यज्ञ के सफलतापूर्वक संपन्न होने और शिशुपाल के मारे जाने के पश्चात की घटनाओं का वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के दसवें स्कंध (अध्याय 77, श्लोक 6-7) में स्पष्ट रूप से किया गया है।इन्द्रप्रस्थं गतः कृष्ण आहुतो धर्मसूनुना ।राजसूयेऽथ निवृत्ते शिशुपाले च संस्थिते ॥ ६ ॥कुरुवृद्धाननुज्ञाप्य मुनींश्च ससुतां पृथाम् ।निमित्तान्यतिघोराणि पश्यन् द्वारवतीं ययौ ॥७॥इस श्लोक का अर्थ यह है कि धर्मपुत्र युधिष्ठिर के आमंत्रित करने पर भगवान कृष्ण इंद्रप्रस्थ गए थे। राजसूय यज्ञ के संपन्न होने और शिशुपाल के मारे जाने के बाद, भगवान को बहुत ही अशुभ संकेत दिखाई देने लगे। अतः उन्होंने कुरु वंश के बुजुर्गों, महान ऋषियों, पृथा और उनके पुत्रों से अनुमति ली और द्वारका लौट गए। उनके जाने के बाद ही कौरवों के मन में पांडवों की समृद्धि और प्रसिद्धि को लेकर गहरी ईर्ष्या पैदा हुई। यह जलन तब और भड़क गई जब दुर्योधन भ्रमवश इंद्रप्रस्थ के एक पानी से भरे तालाब में गिर पड़ा और द्रौपदी ज़ोर से हँस पड़ीं। इन्हीं घटनाओं ने महाभारत के उस विनाशकारी युद्ध की नींव रखी। द्वारका में यदुवंश का विनाश कैसे शुरू हुआ?भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कंध के तीसवें अध्याय में यदुवंश के पतन की हृदय विदारक कथा है। आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष में बहुत भयानक और अशुभ संकेत देखने के बाद भगवान कृष्ण ने यदुवंशियों को सुधर्मा सभा में संबोधित किया। उन्होंने कहा कि द्वारका में अब एक पल भी रुकना सुरक्षित नहीं है। कृष्ण के निर्देश पर महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को शंखोद्धार भेज दिया गया, जबकि बाक़ी शूरवीर प्रभास क्षेत्र की ओर निकल पड़े जहाँ सरस्वती नदी पश्चिम की ओर बहती है। प्रभास पहुँचकर यदुवंशियों ने खूब मीठी शराब पी, जिससे उनकी बुद्धि पूरी तरह भ्रष्ट हो गई। अत्यधिक शराब के नशे में चूर होकर वे अहंकारी हो गए और आपस में भयानक रूप से लड़ने लगे। उन्होंने धनुष, तलवार, भाले और गदा जैसे हथियारों से एक-दूसरे पर जानलेवा हमले किए। प्रद्युम्न सांब से भिड़ गया, और अक्रूर भोज से लड़ने लगा। जब उनके पास तीर और हथियार खत्म हो गए, तो उन्होंने समुद्र तट पर उगी नरकट नाम की घास को उखाड़ लिया। ब्राह्मणों के पुराने श्राप के कारण वह घास उनके हाथों में आते ही वज्र जैसी मज़बूत लोहे की छड़ों में बदल गई। अपनी सुध-बुध खो चुके यदुवंशियों ने एक-दूसरे को बेरहमी से मारना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि जब कृष्ण ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो उन्होंने बलराम और कृष्ण पर भी हमला कर दिया, जिसके बाद वे दोनों भी इस भयंकर लड़ाई में शामिल हो गए। इस तरह ब्राह्मणों के श्राप और कृष्ण की माया के प्रभाव में आकर यदुवंश जलते हुए बाँस के जंगल की तरह राख हो गया। भगवत पुराण, खंड 11भगवान कृष्ण ने अपना शरीर कैसे त्यागा और इंद्रप्रस्थ फिर से शरणस्थली कैसे बना?अपने पूरे वंश को नष्ट होता देख, बलराम ने समुद्र के किनारे ध्यान लगाया और अपने आप को स्वयं में विलीन करके मानव दुनिया को त्याग दिया। बलराम के जाने के बाद भगवान कृष्ण एक पीपल के पेड़ के नीचे जाकर शांति से बैठ गए। उनका दायां पैर, जिसका तलवा लाल कमल के समान था, उनकी जांघ पर रखा हुआ था और वह बिल्कुल एक हिरण के चेहरे जैसा लग रहा था। उसी समय ज़रा नाम के एक शिकारी ने उसे हिरण समझकर तीर मार दिया। यह तीर उसी लोहे के टुकड़े से बना था जो ब्राह्मणों द्वारा श्रापित और नष्ट की गई गदा से बचा हुआ था। जब शिकारी ने पास आकर चतुर्भुज रूप देखा तो अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। कृष्ण ने उसे बताया कि उसे डरने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह सब उन्हीं की इच्छा से हुआ है। इसके बाद कृष्ण का सारथी दारुक वहाँ पहुँचा और उनके चरणों में गिर पड़ा। कृष्ण ने दारुक को आदेश दिया कि वह तुरंत द्वारका जाए और बचे हुए परिवार वालों को इस आपसी विनाश की ख़बर दे। कृष्ण ने कहा कि वे सभी द्वारका छोड़ दें क्योंकि अब यह नगरी समुद्र में डूब जाएगी। कृष्ण ने निर्देश दिया कि सभी लोग अपने परिवारों को लेकर अर्जुन के संरक्षण में इंद्रप्रस्थ चले जाएं। इंद्रप्रस्थ उस अराजकता और संकट के समय महिलाओं और कमज़ोरों के लिए एक सुरक्षित शरणस्थली बना। अर्जुन ने वहाँ पहुँचकर कृष्ण के पोते वज्र को इंद्रप्रस्थ के सिंहासन पर बैठाया, जिसने पांडवों के प्रस्थान के बाद भी वहाँ राज किया। संदर्भ 1. https://shorturl.at/B4BZ2 2. https://tinyurl.com/267s8ngr3. https://tinyurl.com/243z565a4. https://tinyurl.com/23mrevoq5. https://tinyurl.com/2b2av6h6
तितलियाँ और कीट
ब्लू नवाब तितली का अद्भुत सफर इल्ली से रंगीन उड़ान तक
ब्लू नवाब तितली (Blue Nawab butterfly ) भारत की सबसे सुंदर और दुर्लभ तितलियों में से एक मानी जाती है। यह मुख्य रूप से पश्चिमी घाट, असम और पश्चिम बंगाल के घने जंगलों में दिखाई देती है। इसकी सबसे रोचक बात इसका जीवन चक्र है, जिसमें एक छोटा सा अंडा धीरे धीरे रंगीन तितली में बदल जाता है।मादा तितली पत्तियों पर अंडे देती है। लगभग चार दिनों बाद इनमें से छोटी इल्लियाँ निकलती हैं, जो सबसे पहले अपने अंडे के खोल को ही खा जाती हैं। शुरुआत में उनका रंग सुनहरा भूरा होता है, लेकिन कुछ ही दिनों में वे हरी हो जाती हैं ताकि पत्तियों के बीच आसानी से छिप सकें। ये इल्लियाँ पत्तियों को खाकर तेजी से बढ़ती हैं और बढ़ने के साथ कई बार अपनी त्वचा बदलती हैं।कुछ समय बाद इल्ली रेशम जैसा सहारा बनाकर प्यूपा में बदल जाती है। यह अवस्था लगभग दस से ग्यारह दिनों तक रहती है। फिर एक दिन प्यूपा का खोल टूटता है और उसमें से एक सुंदर ब्लू नवाब तितली बाहर निकलती है। अपने पंख फैलाकर सूखाने के बाद यह पहली बार उड़ान भरती है। यह पूरा रूपांतरण प्रकृति के सबसे अद्भुत परिवर्तनों में से एक माना जाता है।संदर्भ - https://tinyurl.com/yk7edrym https://tinyurl.com/2rmssv9dhttps://tinyurl.com/222thtpahttps://tinyurl.com/4smjxrm7
भूमि और मिट्टी के प्रकार : कृषि योग्य, बंजर, मैदान
हमारे कृषि प्रधान राज्य में, उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के खिलाफ क्या हो सकते हैं समाधान?
चलिए, आज समझते हैं कि ‘उर्वरक’ क्या हैं, और कृषि में उनकी क्या भूमिका है। फिर, हम देखेंगे कि उनका उत्पादन तेल और गैस उद्योग से कैसे जुड़ा है। लेख में आगे, हम पता लगाएंगे कि वैश्विक तेल संकट के दौरान उर्वरकों की कीमतें क्यों बढ़ती हैं। जबकि, अंत में हम टिकाऊ उर्वरक विकल्पों और नई प्रौद्योगिकियों की जांच करेंगे, जो जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता को कम करती हैं।हमारे भारतवर्ष में, मिट्टी के प्रकार और मौसम की स्थिति के आधार पर विविध फसलों की खेती की जाती है। पिछले कुछ वर्षों में विविध फसल पैटर्न और पोषक तत्वों की बढ़ती मांग के कारण, खेती में उर्वरकों के इस्तेमाल में काफी वृद्धि हुई है। प्रत्येक फसल के स्वस्थ विकास के लिए उर्वरक की आवश्यकता होती है, क्योंकि यह उन्हें आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है।दरअसल, ‘उर्वरक’ वे कार्बनिक या अकार्बनिक पदार्थ होते हैं, जो फसलों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं। आम तौर पर, वे दानेदार या तरल होते हैं। अधिकांश उर्वरकों में तीन प्राथमिक मैक्रोन्यूट्रिएंट्स (Macronutrients) होते हैं: नाइट्रोजन (Nitrogen), फास्फोरस (Phosphorus), और पोटेशियम (Potassium)। इन्हें आमतौर पर एनपीके (NPK) उर्वरक के रूप में जाना जाता है। ये पोषक तत्व पौधों की वृद्धि और विकास में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।जब फसलें बढ़ती हैं, तो वे मिट्टी से पोषक तत्व अवशोषित करती हैं। समय के साथ, मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, और मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है। उर्वरक इन पोषक तत्वों को प्रदान करने में मदद करते हैं। इसलिए पौधों को वे पोषक तत्व मिलते हैं, जो मिट्टी अकेले प्रदान नहीं कर सकती।भारतीय फसलों में, उर्वरक ‘वृद्धि वर्धक’ के रूप में कार्य करते हैं। ऊर्वरकों से प्राप्त पोषक तत्व जड़ों की मदद से पौधे के सभी भागों में जाते हैं। तब, पोटेशियम पौधे के तने को मजबूत करता है, और अनाज की गुणवत्ता में सुधार करता है। नाइट्रोजन पत्तियों को हरा-भरा बनाता है, और जीवंत रखता है। जबकि, फॉस्फोरस मजबूत जड़ विकास को बढ़ावा देता है। आम तौर पर, ये तत्व पौधों के चयापचय कार्यों को बेहतर बनाने और तेज विकास को बढ़ावा देने के लिए मिलकर काम करते हैं।नाइट्रोजन उर्वरक, वैश्विक कृषि उत्पादकता की रीढ़ बने हुए हैं, और यूरिया (Urea) उनमें से सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला नाइट्रोजन उर्वरक है। लगभग 46 % नाइट्रोजन सामग्री के साथ, यूरिया गेहूं, चावल, मक्का और कई बागवानी फसलों को नाइट्रोजन की आपूर्ति करता है। हालांकि, प्रत्येक टन यूरिया के पीछे एक अत्यधिक ऊर्जा-गहन औद्योगिक प्रक्रिया निहित है। यूरिया का उत्पादन काफी हद तक प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है। प्राकृतिक गैस,यूरिया उत्पादन में रासायनिक सामग्री और ऊर्जा स्रोत के रूप में कार्य करता है। जिन देशों में देशज गैस उत्पादन सीमित है, वहां उर्वरक विनिर्माण को बनाए रखने के लिए तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी - LNG) आवश्यक हो जाती है। प्राकृतिक गैस और उर्वरकों के बीच इस संबंध का मतलब है कि, वैश्विक ऊर्जा बाजार हमेशा ही उर्वरक उपलब्धता, उत्पादन लागत और अंततः खाद्य सुरक्षा को सीधे प्रभावित करते हैं।यूरिया का उत्पादन अमोनिया (Ammonia) के निर्माण से शुरू होता है, जो सभी नाइट्रोजन उर्वरकों का मूलभूत निर्माण घटक है। अमोनिया का उत्पादन, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन का उपयोग करके किया जाता है। नाइट्रोजन हवा से आसानी से उपलब्ध होता है, लेकिन हाइड्रोजन का उत्पादन औद्योगिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है।आधुनिक उर्वरक संयंत्रों में हाइड्रोजन, मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस से निकाला जाता है, क्योंकि उसमें मुख्य रूप से मीथेन (CH₄) गैस होता है। उत्पादन के पहले चरण में, प्राकृतिक गैस की लगभग 800-900 डिग्री सेल्सियस पर भाप के साथ प्रक्रिया की जाती है। इस प्रक्रिया में हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड (Carbon monoxide) उत्पन्न होते हैं। फिर कार्बन मोनोऑक्साइड को एक अन्य प्रतिक्रिया के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित किया जाता है। इस प्रक्रिया में फिर से अतिरिक्त हाइड्रोजन उत्पन्न होता है।एक बार हाइड्रोजन का उत्पादन होने के बाद, इसे हेबर-बॉश प्रक्रिया (Haber–Bosch process) में नाइट्रोजन के साथ जोड़ा जाता है। इस चरण में, नाइट्रोजन और हाइड्रोजन अत्यधिक उच्च दबाव और तापमान में प्रक्रिया करके अमोनिया (NH₃) बनाते हैं। अमोनिया का उपयोग उर्वरक के रूप में किया जा सकता है, लेकिन इसका सुरक्षित रूप से भंडारण और परिवहन करना मुश्किल है। इसलिए, अधिकांश अमोनिया यूरिया में परिवर्तित किया जाता है।इस प्रकार, प्रक्रिया के अंतिम चरण में, संयंत्र में पहले उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके अमोनिया को यूरिया में परिवर्तित किया जाता है। दरअसल, पहले अमोनिया और कार्बन डाइऑक्साइड प्रतिक्रिया करके अमोनियम कार्बामेट (Ammonium carbamate) बनाते हैं। यह मध्यवर्ती यौगिक, फिर यूरिया और पानी में विघटित हो जाता है। इसी जटिल प्रक्रिया के कारण, प्राकृतिक गैस महत्वपूर्ण हो जाती है। होर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है, जहां से लगभग एक चौथाई समुद्री तेल, तरलीकृत प्राकृतिक गैस और उर्वरकों की महत्वपूर्ण मात्रा का वहन होता है। हाल ही में बढ़े वैश्विक संघर्ष के बाद से, इस जलसंधि के माध्यम से होने वाले नौ-परिवहन में काफी गिरावट आई है। ऊर्जा बाज़ारों में इसका परिणाम दिखने लगा है। तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। और जैसे ही गैस की कीमतें बढ़ती हैं, उर्वरक उत्पादन लागत बढ़ जाती है, जिससे उनकी भी कीमतें उच्च हो जाती हैं। नतीजतन, नाइट्रोजन-आधारित उर्वरकों की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, क्योंकि उनके उत्पादन में प्राकृतिक गैस महत्वपूर्ण है।बढ़ती कीमतें, मिट्टी के स्वास्थ्य, पानी की गुणवत्ता और पारिस्थितिकी तंत्र पर संभावित प्रतिकूल प्रभावों के कारण, आज रासायनिक उर्वरकों का उपयोग जांच के दायरे में आ गया है। सौभाग्य से, रासायनिक उर्वरकों के कई पर्यावरण-अनुकूल विकल्प हैं, जो मिट्टी की उर्वरता को बढ़ावा देते हैं, पौधों के विकास में सहायता करते हैं, और टिकाऊ एवं धारणीय कृषि पद्धतियों में योगदान करते हैं। ये विकल्प निम्नलिखित हैं -1. खाद और जैविक पदार्थकम्पोस्ट (Compost) या "काला सोना", हमारी रसोई एवं आंगन अपशिष्ट और पौधों के अवशेषों जैसे विघटित कार्बनिक पदार्थों से बनता है। यह आवश्यक पोषक तत्वों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों से भरपूर होता है, तथा मिट्टी की संरचना में सुधार करता है। जैविक कचरे को पुनर्चक्रित करके और उसे मिट्टी में लौटाकर खाद बनाने से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो जाती है।2. हरी खाद और आवरण फसलेंआवरण फसलें (Cover crops), जिन्हें हरी खाद के रूप में भी जाना जाता है, मिट्टी के स्वास्थ्य और उर्वरता में सुधार के लिए लगाई जाती हैं। फलियां, घास और तिपतिया घास जैसी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ग्रहण करती हैं, तथा खरपतवारों और मिट्टी के कटाव को रोकती हैं। जब ये फसलें विघटित हो जाती हैं, तो वे पोषक तत्व और कार्बनिक पदार्थों से मिट्टी को समृद्ध करती हैं। इस प्रकार, वे मुख्य फसल के विकास में सहायक हैं। 3. जैवउर्वरक और माइक्रोबियल इनोकुलेंट्स (Microbial Inoculants)राइजोबियम (rhizobium), माइकोराइजा (mycorrhizae) और नाइट्रोजन-फिक्सिंग बैक्टीरिया (nitrogen-fixing bacteria) जैसे जैव उर्वरक, माइक्रोबियल इनोकुलेंट हैं। ये जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता और पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाते हैं। ये लाभकारी सूक्ष्मजीव, पौधों के साथ सहजीवी संबंध बनाते हैं, पोषक तत्वों के अवशोषण में मदद करते हैं, पौधों के विकास को बढ़ावा देते हैं, और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करते हैं। इसके अलावा, अगला बड़ा नवाचार ‘हरित अमोनिया’ का उत्पादन है। यह नाइट्रोजन उर्वरक उत्पादन के लिए कार्बन-मुक्त विकल्प प्रदान करता है, जो टिकाऊ कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हरित अमोनिया का उत्पादन, प्राकृतिक गैस के बजाय पवन, सौर या जलविद्युत ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके किया जाता है। सबसे पहले, नवीकरणीय बिजली से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है। फिर, वायु पृथक्करण इकाइयां वायुमंडल से नाइट्रोजन गैस अलग करती हैं। इसके पश्चात, हरित हैबर-बॉश प्रक्रिया में अमोनिया का उत्पादन करने के लिए, उत्प्रेरक का उपयोग करके हाइड्रोजन और नाइट्रोजन को दबाव में संयोजित किया जाता है। यह जीवाश्म ईंधन (प्राकृतिक गैस) के बजाय नवीकरणीय ऊर्जा द्वारा संचालित होता है। हरित अमोनिया, पारंपरिक अमोनिया उत्पादन से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को समाप्त करता है, तथा नाइट्रोजन उर्वरक के लिए एक स्वच्छ विकल्प प्रदान करता है। साथ ही, यह वैश्विक स्थिरता और जलवायु कार्रवाई लक्ष्यों के साथ संरेखित है।संदर्भ 1. https://tinyurl.com/yzkbr6bb 2. https://tinyurl.com/3rtky2e4 3. https://tinyurl.com/2wt98vyj 4. https://tinyurl.com/5cjehkfw 5. https://tinyurl.com/4sjnpfck 6. https://tinyurl.com/bd6cpvtb
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
क्या 1970 के दशक की उस एक बगावत ने हमेशा के लिए बदल दिया क्रिकेट का इतिहास?
साल 1977 की बात है, जब क्रिकेट की दुनिया के सबसे बड़े और रूढ़िवादी अधिकारियों के सामने एक व्यक्ति ने खड़े होकर निडरता से कहा था कि "हम सभी के अंदर थोड़ा बहुत लालच होता है, आपकी कीमत क्या है?" जब उन क्रिकेट अधिकारियों ने उसकी बात नहीं मानी, तो उस व्यक्ति ने एक बेहद आक्रामक रास्ता अपनाया और दुनिया के 50 से अधिक बेहतरीन क्रिकेटरों को अपनी ही एक अलग क्रिकेट प्रतियोगिता के लिए गुप्त रूप से साइन कर लिया। यह कोई और नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया के अरबपति मीडिया टाइकून (media tycoon) केरी पैकर (Kerry Packer) थे। पैकर का शुरुआती जीवन चुनौतियों से भरा था। बचपन में पोलियो के कारण वे नौ महीने अस्पताल में रहे, लेकिन इस बीमारी से उबरकर वे अपने स्कूल के हैवीवेट बॉक्सिंग चैंपियन (Heavyweight Boxing Champion) बने। पैकर को पढ़ने-लिखने में दिक्कत होती थी, जिसे अनजानी बीमारी डिस्लेक्सिया (dyslexia) कहा जाता है, और उनके पिता उन्हें परिवार का सबसे बेवकूफ सदस्य मानते थे। लेकिन इसी लड़ाकू स्वभाव ने आगे चलकर उन्हें व्यापार और क्रिकेट की दुनिया में अलग पहचान दिलाई। उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया जिसने सफेद कपड़ों और दिन के उजाले में खेले जाने वाले इस पारंपरिक खेल को रंगीन कपड़ों, दूधिया रोशनी और खिलाड़ियों को मिलने वाले भारी वेतन के एक बिल्कुल नए युग में धकेल दिया। केरी पैकर कौन थे और उन्होंने पारंपरिक क्रिकेट से इतनी बड़ी बगावत क्यों की?केरी पैकर ऑस्ट्रेलिया के एक बेहद ताकतवर मीडिया घराने से ताल्लुक रखते थे। साल 1974 में उनके पिता की मृत्यु के बाद उन्हें विरासत में 100 मिलियन डॉलर का साम्राज्य मिला था, जिसे उन्होंने अपनी कुशाग्र व्यापारिक बुद्धि से अपनी मृत्यु तक 6.5 बिलियन डॉलर के विशाल साम्राज्य में बदल दिया था। 1976 के मध्य में, पैकर अपने टीवी चैनल 'चैनल नाइन' (Channel Nine) के लिए ऑस्ट्रेलिया के घरेलू टेस्ट मैचों के प्रसारण के विशेष अधिकार चाहते थे। उन्होंने इसके लिए तीन साल के 1.5 मिलियन डॉलर की भारी-भरकम पेशकश की, जो कि पिछले प्रसारण अनुबंध से पूरे आठ गुना अधिक थी। लेकिन ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट बोर्ड (Australian Cricket Board) ने उनके इस आकर्षक प्रस्ताव को खारिज कर दिया और सरकारी चैनल को तरजीह दी। पैकर को यह महसूस हुआ कि यह फैसला एक पुराने नेटवर्क की आपसी मिलीभगत का नतीजा है। इस अपमान से पैकर को इतनी नाराज़गी हुई कि उन्होंने खुद की एक क्रिकेट प्रतियोगिता शुरू करने की ठान ली, जिसे 'वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट' (world series cricket) का नाम दिया गया। 1977 की शुरुआत में ही उन्होंने इंग्लैंड के तत्कालीन कप्तान टोनी ग्रेग (Tony Greig) और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान इयान चैपल (Ian Chappell) की मदद से दुनिया भर के दिग्गज खिलाड़ियों को अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाना शुरू कर दिया। इयान चैपल ने बाद में कहा था कि यह उनके जीवन का सबसे कठिन क्रिकेट था क्योंकि इसमें दुनिया के सभी सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी शामिल थे।दुनिया भर के क्रिकेट प्रशासकों और अदालतों ने इस बड़े बदलाव पर कैसी प्रतिक्रिया दी?मई 1977 में जब पैकर की इस गुप्त योजना का खुलासा हुआ, तो क्रिकेट जगत में जैसे भूचाल आ गया। क्रिकेट प्रशासकों ने इसे पैकर का सर्कस करार दिया और खिलाड़ियों को भाड़े का टट्टू कहकर अपमानित किया। इंग्लैंड के टोनी ग्रेग से उनकी कप्तानी छीन ली गई। इस विद्रोह को दबाने के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (International Cricket Council) ने लंदन में एक बैठक बुलाई, जिसमें बात न बनने पर पैकर ने स्पष्ट कह दिया कि अब हर कोई अपने लिए लड़ेगा। जुलाई में परिषद ने फैसला सुनाया कि पैकर के मैचों को प्रथम श्रेणी का दर्जा नहीं दिया जाएगा और इसमें हिस्सा लेने वाले खिलाड़ियों पर टेस्ट क्रिकेट खेलने से प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। इसके खिलाफ पैकर ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। अदालत में चले एक लंबे मुकदमे में जस्टिस स्लेड (Justice Slade) ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि पेशेवर क्रिकेटरों को अपनी आजीविका कमाने का पूरा हक है और क्रिकेट बोर्ड उनके रास्ते में सिर्फ इसलिए बाधा नहीं डाल सकता क्योंकि इससे उनके अपने हित प्रभावित होते हैं। इस फैसले से क्रिकेट प्रतिष्ठानों को भारी झटका लगा और उन्हें मुकदमे के खर्च के रूप में लगभग 250,000 पाउंड भी चुकाने पड़े। हालांकि, अलग-अलग देशों का रुख समय के साथ बदलता गया। वेस्टइंडीज़ का क्रिकेट बोर्ड आर्थिक रूप से बहुत कमज़ोर था, इसलिए 1979 के वसंत में उन्होंने पैकर के साथ सीरीज़ के लिए बातचीत शुरू कर दी। पाकिस्तान ने शुरुआत में सख्त रवैया अपनाया, लेकिन बाद में इंग्लैंड के खिलाफ बुरी तरह हारने पर उन्होंने व्यावहारिक सोच अपनाते हुए 1978 में भारत के खिलाफ सीरीज़ के लिए पैकर के खिलाड़ियों को टीम में वापस बुला लिया। न्यूज़ीलैंड के प्रशासक वाल्टर हैडली (Walter Hadley) शुरू से ही समझौता चाहते थे। वहीं, रंगभेद के कारण अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध झेल रहे दक्षिण अफ्रीका के खिलाड़ी भी इस मौके का फायदा उठाकर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के साथ खेलने के लिए उत्सुक थे। उस समय भारत इस विवाद से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा था, लेकिन ऐसी ज़ोरदार अफ़वाहें फैल गई थीं कि भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी (Bishan Singh Bedi) और स्टार बल्लेबाज़ सुनील गावस्कर (Sunil Gavaskar) ने भी पैकर की लीग के विकल्पों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।दूधिया रोशनी, हेलमेट और ड्रॉप-इन पिचों ने पारंपरिक खेल को कैसे नया रूप दिया?क्रिकेट को रात के समय फ्लडलाइट्स (floodlights) में खेलने का विचार सबसे पहले 1930 के दशक में सामने आया था, लेकिन माना जाता है कि इंग्लैंड में पहली बार फ्लडलाइट्स में क्रिकेट मैच 11 अगस्त 1952 को मिडिलसेक्स काउंटी क्रिकेट क्लब (Middlesex County Cricket Club) और आर्सेनल फुटबॉल क्लब (Arsenal Football Club) के बीच खेला गया था। लेकिन इसे नियमित रूप से शुरू करने का पूरा श्रेय केरी पैकर को ही जाता है। वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट के शुरुआती मैचों में दर्शकों की संख्या बहुत कम थी। पैकर को पारंपरिक मैदानों पर खेलने की अनुमति नहीं थी, इसलिए उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई नियमों वाले फुटबॉल स्टेडियम (Football Stadium) पट्टे पर लिए। सबसे बड़ी समस्या वहां क्रिकेट की पिच बनाने की थी। पैकर ने जॉन मै (John May) को काम पर रखा, जिन्होंने ग्रीनहाउस (greenhouse) में पिचें उगाईं और क्रेन की मदद से उन्हें स्टेडियम की सतह में स्थापित किया, जिसे आज हम ड्रॉप-इन पिच (drop-in pitch) के नाम से जानते हैं। इस तकनीक के बिना यह लीग पूरी तरह से विफल हो जाती। पैकर ने तेज़ गेंदबाज़ी के आक्रामक पहलू पर बहुत ज़ोर दिया और डेनिस लिली (Dennis Lillee), इमरान खान (Imran Khan) तथा एंडी रॉबर्ट्स (Andy Roberts) जैसे गेंदबाज़ों का भारी प्रचार किया। सिडनी (Sydney) के एक मैच में वेस्टइंडीज़ के एंडी रॉबर्ट्स की एक खतरनाक बाउंसर से ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ डेविड हूक्स (David Hookes) का जबड़ा टूट गया। इस भयानक घटना ने खिलाड़ियों को सुरक्षा के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया और इसी के बाद क्रिकेट में हेलमेट का चलन शुरू हुआ। शुरुआत में डेनिस एमिस (Dennis Amis) ने बल्लेबाज़ी करते समय अपनी सुरक्षा के लिए मोटरसाइकिल का हेलमेट पहना था। पैकर ने दर्शकों को मैदान में लाने के लिए मार्केटिंग (Marketing) पर ज़ोर दिया। नतीजा यह हुआ कि नवंबर 1978 में सिडनी क्रिकेट ग्राउंड में फ्लडलाइट्स के नीचे खेले गए एक डे-नाइट मैच को देखने के लिए 44,374 दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। रात के समय रंगीन कपड़ों में क्रिकेट का यह नया रूप दर्शकों को बहुत पसंद आया। वनडे क्रिकेट का उदय कैसे हुआ और इसे दुनिया की सबसे बड़ी पहचान कैसे मिली?वनडे यानी वन डे इंटरनेशनल (One Day International) सीमित ओवरों का क्रिकेट है, जो मुख्य रूप से 1970 के दशक में अस्तित्व में आया। क्रिकेट के इतिहास का पहला आधिकारिक वनडे मैच 5 जनवरी 1971 को मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड (Melbourne Cricket Ground) पर ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच खेला गया था। लेकिन इसे आज के आधुनिक, पेशेवर और तेज़-तर्रार रूप में ढालने का काम 1970 के दशक के अंत में पैकर की इसी बगावत ने किया। रंगीन जर्सी (Jersey), रात के समय मैच, सफेद गेंदें, काली साइट स्क्रीन (black site screen), अलग-अलग एंगल वाले कई टीवी कैमरे, पिच के माइक्रोफोन और टीवी स्क्रीन पर ग्राफिक्स—यह सब उसी वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट की देन हैं। 17 जनवरी 1979 को पहली बार पूरी तरह से रंगीन जर्सी में मैच खेला गया, जिसमें ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी सुनहरे पीले (golden yellow) और वेस्टइंडीज़ के खिलाड़ी कोरल पिंक (coral pink) कपड़ों में मैदान पर उतरे थे। धीरे-धीरे वनडे क्रिकेट में सफेद कपड़ों और लाल गेंद का चलन खत्म हो गया और 2001 तक इसे पूरी तरह से बंद कर दिया गया। 1979 आते-आते भारी आर्थिक नुकसान और मुकदमों से थककर ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट बोर्ड ने पैकर के साथ शांति समझौता कर लिया। पैकर के चैनल को न सिर्फ क्रिकेट के विशेष प्रसारण अधिकार मिले बल्कि खेल के प्रचार-प्रसार का दस साल का बड़ा अनुबंध भी हासिल हुआ। आज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद सभी टीमों की वनडे रैंकिंग जारी करती है। इस समय दुनिया में 12 पूर्ण सदस्य देश हैं जिन्हें वनडे क्रिकेट का स्थायी दर्ज़ा प्राप्त है, और क्रिकेट का सबसे बड़ा महाकुंभ यानी विश्व कप भी इसी 50-ओवर के प्रारूप में खेला जाता है। लखनऊ के खेल प्रेमी पहली बार अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट का गवाह कब बने?वनडे क्रिकेट और डे-नाइट मैचों के इस रोमांचक सफर ने धीरे-धीरे दुनिया भर के देशों और भारत के हर कोने को क्रिकेट के खुमार में पूरी तरह से रंग दिया। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के खेल प्रेमियों के लिए भी वह दिन बेहद खास और ऐतिहासिक था, जब उनके अपने शहर में पहली बार अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट का शानदार आगाज़ हुआ। लखनऊ के मशहूर के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम (K. D. Singh Babu Stadium) में पहला पुरुष वनडे मैच 27 अक्टूबर 1989 को खेला गया था। यह ऐतिहासिक मुकाबला एमआरएफ वर्ल्ड सीरीज़, (जिसे क्रिकेट जगत में नेहरू कप के नाम से भी जाना जाता है!) का एक अहम हिस्सा था। इस बड़े मंच पर पाकिस्तान और श्रीलंका की मजबूत टीमें आमने-सामने थीं। उस दौर में स्टेडियम की सीढ़ियों पर बैठकर दुनिया के दिग्गज खिलाड़ियों को एक दूसरे के खिलाफ कड़ा संघर्ष करते देखना लखनऊ के दर्शकों के लिए एक बिल्कुल नया, अद्भुत और रोमांचक अनुभव था। इसी मैच के साथ लखनऊ शहर ने भी विश्व क्रिकेट के नक़्शे पर एक शानदार मेज़बान के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई, जो आज भी इस शहर की समृद्ध खेल विरासत का एक बेहद अहम हिस्सा है। इस एक मैच ने लखनऊ के युवाओं में खेल के प्रति जो दीवानगी पैदा की, वह आज भी यहाँ के हर गली-मोहल्ले में खेलते बच्चों में साफ़ देखी जा सकती है। संदर्भ https://tinyurl.com/252t65tchttps://tinyurl.com/26vpbjymhttps://tinyurl.com/25aorczjhttps://tinyurl.com/2ak7ll6uhttps://tinyurl.com/22anss5j
हथियार और खिलौने
जानें, आधुनिक सैन्य अभियानों में सटीकता व दक्षता में सुधार के लिए ड्रोन का महत्व
लखनऊवासियों आज हम पता लगाएंगे कि, ड्रोन (Drone) आधुनिक सैन्य अभियानों को कैसे बदल रहे हैं। फिर हम समझेंगे कि, सटीकता और दक्षता में सुधार के लिए एआई डेटा (AI Data) और सिमुलेशन (Simulation) का उपयोग करके, ड्रोन को कैसे प्रशिक्षित किया जाता है। लेख में आगे बढ़ते हुए, हम रशिया-यूक्रेन (Russia-Ukraine) युद्ध में ड्रोन की भूमिका की जांच करेंगे। इसके पश्चात, हम देखेंगे कि अमेरिकी सेना द्वारा विश्लेषण और निर्णय लेने हेतु, एंथ्रोपिक (Anthropic) द्वारा विकसित एआई टूल्स का उपयोग कैसे किया जा रहा है। अंततः हम पढ़ेंगे कि, पैलांटिर (Palantir) स्वायत्त ड्रोन मिशन और सैन्य प्रौद्योगिकी को आगे बढ़ाने में कैसे योगदान दे रहा है।आज वैश्विक सैन्य रणनीतियां जैसे-जैसे विकसित हो रही हैं, ड्रोन तकनीक अपनी परिवर्तनकारी क्षमता के साथ विभिन्न क्षेत्रों में योगदान दे रही है। ड्रोन अब आधुनिक युद्ध और राष्ट्रीय रक्षा में भी अपरिहार्य उपकरण बन गए हैं। निम्नलिखित उपायों के माध्यम से हम सेना में ड्रोन की उपयोगिता जान सकते हैं।1. खुफिया जानकारी, निगरानी और परीक्षणदुश्मन के इलाकों या संघर्ष-प्रवण क्षेत्रों पर ड्रोन उपरोक्त क्षमताएं प्रदान करते हैं। ड्रोन की उच्च-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग (High-resolution imaging), थर्मल सेंसर (Thermal sensors) और रात्रि-दृष्टि क्षमताएं, सैनिकों को भौतिक तैनाती के बिना खुफिया जानकारी इकट्ठा करने की अनुमति देती हैं। ड्रोन रणनीतिक क्षेत्रों पर उड़ते हैं, निरंतर स्थितिजन्य जागरूकता प्रदान करते हैं, और तेज़ एवं डेटा-समर्थित निर्णय लेने में मदद करते हैं।2. लक्ष्य प्राप्ति और ट्रैकिंग (Tracking)आधुनिक युद्धक्षेत्रों में गति और सटीकता महत्वपूर्ण हैं। सैन्य अभियानों में प्रयुक्त ड्रोन स्वायत्त रूप से हलचल या लक्ष्यों की पहचान और उन्हें ट्रैक कर सकते हैं। इससे लंबे अवलोकन की आवश्यकता कम हो जाती है। वे न्यूनतम मानवीय त्रुटि के साथ दिशादर्शक बनकर, तोपखाने की आग के लिए भी दिशा दिखा सकते हैं।3. सीमा निगरानीसंवेदनशील सीमा क्षेत्रों की निरंतर निगरानी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण होती है। ड्रोन सीमा इलाके के बड़े हिस्से में गश्त करते हैं, और अनधिकृत गतिविधियों का पता लगाते हैं। दुर्गम या ऊबड़-खाबड़ इलाकों में, ड्रोन पारंपरिक निगरानी तरीकों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं ।इससे नेटवर्क क्षेत्र अधिक और सुरक्षा बेहतर मिलती है।4. खोज एवं बचाव ऑपरेशनप्राकृतिक आपदाओं के बाद या युद्धकालीन परिदृश्यों में, लापता कर्मियों को शीघ्रता से ढूंढना काफ़ी ज़रूरी होता है। थर्मल सेंसर और वास्तविक समय संचार प्रणालियों से लैस ड्रोन, विशाल क्षेत्रों को स्कैन कर सकते हैं और ऊष्मा संकेतों की पहचान कर सकते हैं। इस प्रकार, बचाव इकाइयों को निर्देशित करने में वे सहायता कर सकते हैं।5. मानव जोखिम को कम करनाजिन मिशनों को परंपरागत रूप से जमीन या हवाई सैन्य तैनाती की आवश्यकता होती है, उन्हें ड्रोन की सहायता से अब दूर से निष्पादित किया जा सकता है। विवादित क्षेत्रों, खदान क्षेत्रों, या रासायनिक रूप से खतरनाक क्षेत्रों की निगरानी के लिए अब सीधे सैन्य भागीदारी की आवश्यकता नहीं है। ड्रोन परिचालन जोखिम और संचालन तनाव दोनों को कम करते हैं।ड्रोन तकनीक, आज तेजी से आगे बढ़ते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) की सहायता से भी मौलिक रूप से बदल रही है। केवल मानव पायलटों (pilot) पर निर्भर रहने के बजाय, आज ड्रोन हवा में कुछ सीखने, अनुकूलन करने और वास्तविक समय पर निर्णय लेने में सक्षम हैं। इस बदलाव ने ड्रोन को कृषि, रसद, खनन और शहरी नियोजन जैसे उद्योगों में भी बुद्धिमान हवाई मित्रों के रूप में स्थापित किया है।ड्रोन की स्वयं सीखने की क्षमता, निम्नलिखित तीन मुख्य प्रौद्योगिकियों द्वारा संभव बनाई गई है -1. मशीन लर्निंग (Machine Learning) और कंप्यूटर विजन (Computer Vision)एआई ड्रोन को कैमरों और सेंसरों से दृश्य डेटा की व्याख्या करने में सक्षम बनाता है। उदाहरण के लिए, वे एक पेड़, एक बिजली लाइन और एक इमारत के बीच अंतर कर सकते हैं। इससे उनको सुरक्षित एवं अधिक सटीक चालन की अनुमति मिलती है।2. सेंसर फ्यूजन (Sensor fusion)आधुनिक ड्रोन जीपीएस (GPS), एलआईडीएआर (LIDAR), इन्फ्रारेड (Infrared) और अल्ट्रासोनिक सेंसर (Ultrasonic sensor) से इनपुट को जोड़ते हैं। एआई एल्गोरिदम (AI Algorithm), पर्यावरण के सटीक व वास्तविक समय मॉडल (Time model) बनाने हेतु इस डेटा को संयोजित करते हैं।3. पूर्वानुमानित विश्लेषणस्व-प्रशिक्षण की क्षमता वाले ड्रोन, जोखिमों और परिणामों की भविष्यवाणी कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि हवा का पैटर्न अचानक बदल जाता है, तो ड्रोन अपने मार्ग को स्वायत्त रूप से समायोजित कर लेता है। इससे विफलता की संभावना कम हो जाती है।ड्रोन की इन विशेषताओं के कारण, इनका उपयोग आज वास्तविक युद्ध क्षेत्रों में आम बनता जा रहा है। हम जानते ही हैं कि, पिछले कुछ वर्षों से रशिया और यूक्रेन देशों के बीच युद्ध चल रहा है। इस संघर्ष में, जिसे दुनिया के पहले ड्रोन युद्ध के रूप में जाना जा रहा है, कुछ उल्लेखनीय घटनाओं में से एक फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन (Fiber-optic drones) का उपयोग है। रशिया के कुर्स्क (Kursk) क्षेत्र में यूक्रेन की सीमा पार घुसपैठ के जवाब में, पहली बार अगस्त 2024 में फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन उभरे थे। फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन एक काफ़ी पतली केबल से लैस होते हैं, जो इसके ऑपरेटर (Drone Operator) तक वापस जाती है। यह तार रेडियो सिग्नल (radio signal) पर निर्भर होने के बजाय भौतिक संबंध बनाए रखती है। इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों को जाम करने के लिए, कोई रेडियो लिंक न होने के कारण, फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन उन क्षेत्रों में काम कर सकते हैं, जहां पारंपरिक ड्रोन विफल होते हैं। ये ड्रोन सटीकता और स्पष्ट वीडियो के साथ 30 किलोमीटर से भी अधिक दूरी पर हमला करने में सक्षम है।कुर्स्क में, यूक्रेन की घुसपैठी के जवाब में फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन ने उस क्षेत्र में यूक्रेन की उपस्थिति को लगातार अस्थिर बनाने में मदद की। अंततः मार्च 2025 में यूक्रेनी सेनाएं सीमा पार वापस चली गईं। आश्चर्यजनक रूप से, रशिया के फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन हमलों ने अभूतपूर्व वाहन हानि में योगदान दिया। इससे कुर्स्क में यूक्रेन को रशिया की तुलना में 25% अधिक वाहन हानि हुई।युद्ध में ड्रोन एवं एआई के बढ़ते उपयोग से कुछ अन्य पहलू भी सामने आ रहे हैं। अमेरिकी एआई कंपनी - एंथ्रोपिक अपने सॉफ्टवेयर के दुरुपयोग को रोकने के लिए, एक रासायनिक हथियार और विस्फोटक विशेषज्ञ को नियुक्त करना चाह रही है। एंथ्रोपिक को डर है कि, उसके एआई उपकरण किसी को रासायनिक या रेडियोधर्मी हथियार बनाने का तरीका बता सकते हैं। इस प्रकार के हथियारों के साथ एआई के उपयोग के लिए, कोई अंतरराष्ट्रीय संधि या अन्य विनियमन नहीं है।एआई उद्योग ने अपनी प्रौद्योगिकी से उत्पन्न संभावित अस्तित्वगत खतरों के बारे में लगातार चेतावनी दी है। लेकिन, इस प्रगति को धीमा करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। यह मुद्दा इसलिए अत्यावश्यक बन गया है, क्योंकि अमेरिकी सरकार ने ईरान (Iran) में युद्ध और वेनेजुएला (Venezuela) में सैन्य अभियान शुरू करते समय एआई कंपनियों को बुलाया है। हालांकि, अमेरिकी सरकार ने कहा है कि, अमेरिकी सेना तकनीकी कंपनियों द्वारा शासित नहीं होगी। एंथ्रोपिक का एआई सहायक - क्लाड (Claude) अभी तक चरणबद्ध तरीके से समाप्त नहीं किया गया है, और वर्तमान में पैलांटिर द्वारा प्रदान किए गए सिस्टम में मौजूद है। यह अमेरिका-इज़राइल–ईरान युद्ध में अमेरिका द्वारा तैनात किया जा रहा है।एक तरफ, आधुनिक युद्धक्षेत्र में ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (Global Positioning System) या जीपीएस (GPS) पर भरोसा नहीं किया जा सकता। कुछ युद्ध परिदृश्यों में जीपीएस सिग्नल जाम होने, स्पूफिंग (Spoofing) या पूरी तरह से अस्वीकार होने के प्रति संवेदनशील होते हैं। उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं वाले प्रतिद्वंद्वी, आसानी से जीपीएस सिग्नल को बाधित कर सकते हैं। इससे ड्रोन अपना रास्ता भटक सकते हैं, या दुश्मन के हाथों में भी जा सकते हैं। इन स्थितियों में रेडियो नियंत्रण का उपयोग भी उतना ही खतरनाक है, क्योंकि इसका जल्द ही पता लगता है। इसके अतिरिक्त, शत्रुतापूर्ण वातावरण में लंबी दूरी के संचालन में अक्सर कमजोर या टूटे हुए सिग्नल होते हैं, जिससे ड्रोन की परिचालन सीमा और प्रभावशीलता सीमित हो जाती है।इस चुनौती से निपटने के लिए, पैलांटिर ने विज़ुअल नेविगेशन (वीएनएवी – Visual Navigation) बनाया है। यह एक नया समाधान है, जो अप्रभावी जीपीएस वाले क्षेत्रों में स्वायत्त ड्रोन मिशनों को सक्षम करने के लिए पैलांटिर इंटेलिजेंस और सॉफ्टवेयर को ऑनबोर्ड लाता है। यह जीपीएस या रेडियो नियंत्रण संकेतों से पूरी तरह से स्वतंत्र संचालन प्रदान करता है। दरअसल, विज़ुअल नेविगेशन ड्रोन को मानचित्र पढ़कर संचालित करने देता है। इसकी शक्ति को प्रदर्शित करने में मदद के लिए, पैलांटिर ने फ्लाईबी रोबोटिक्स (Flyby Robotics) के साथ साझेदारी की है।अतः वैश्विक संघर्षों के इस दौर में, यह देखना रोमांचक होगा कि, नई प्रौद्योगिकियां सैन्य अभियानों को कैसे बदल सकती हैं।संदर्भ1. https://tinyurl.com/bp22z8n4 2. https://tinyurl.com/2zsnucz5 3. https://tinyurl.com/36k4p3n7 4. https://tinyurl.com/ynwdj9ck 5. https://tinyurl.com/2dtwx9ue
शहरीकरण - नगर/ऊर्जा
सूरज की रोशनी से हमारा सबसे बड़ा बिजली संकट कैसे खत्म होगा?
पृथ्वी से लगभग 14 करोड़ 96 लाख किलोमीटर की दूरी पर होकर भी सूरज एक प्राकृतिक परमाणु रिएक्टर (nuclear reactor) की तरह कार्य करता है जो फोटॉन (photon) नामक ऊर्जा के छोटे पैकेट छोड़ता है। इन फोटॉन को सूर्य से पृथ्वी तक 149.6 मिलियन किलोमीटर की दूरी तय करने में लगभग 8.5 मिनट का समय लगता है। आपको जानकर शायद हैरानी हो कि हर एक घंटे में पृथ्वी पर इतने फोटॉन टकराते हैं, जिनसे सैद्धांतिक रूप से पूरे एक वर्ष के लिए वैश्विक ऊर्जा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त सौर ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है। धरती पर सूर्य द्वारा प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा की कुल मात्रा दुनिया की वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं से कहीं अधिक है। आज जब जलवायु संकट पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा ख़तरा बन चुका है, तो ऐसे में जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाना बेहद अहम हो गया है। यह एक बड़ी राहत की बात है कि अब लखनऊ शहर भी तेज़ी से साफ़ और सस्ती ऊर्जा के इस विकल्प को अपनाते हुए भारत की सौर क्रांति का एक बड़ा हिस्सा बन रहा है। नवीकरणीय ऊर्जा क्या है और यह जीवाश्म ईंधन से बेहतर क्यों है? नवीकरणीय ऊर्जा वह ऊर्जा है जो प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त होती है और जितनी तेज़ी से हम इसका उपभोग करते हैं, उससे कहीं अधिक तेज़ी से यह प्राकृतिक रूप से वापस भर जाती है। धूप और हवा ऐसे स्रोत हैं जो लगातार प्रकृति द्वारा बनाए जाते रहते हैं और हमारे चारों ओर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इसके विपरीत कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधन (fossil fuels) गैर-नवीकरणीय संसाधन हैं जिन्हें बनने में करोड़ों साल लगते हैं। जब ऊर्जा उत्पादन के लिए जीवाश्म ईंधन को जलाया जाता है, तो कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) जैसी हानिकारक ग्रीनहाउस गैसों (greenhouse gases) का भारी उत्सर्जन होता है। वर्तमान में उत्सर्जन का सबसे बड़ा हिस्सा जीवाश्म ईंधन का ही है, इसलिए जलवायु संकट को दूर करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा की ओर रुख करना सबसे ज़रूरी है। ज़्यादातर देशों में अब नवीकरणीय ऊर्जा सस्ती हो गई है और यह जीवाश्म ईंधन की तुलना में तीन गुना अधिक रोज़गार भी पैदा करती है। नवीकरणीय ऊर्जा में सौर ऊर्जा के अलावा जलविद्युत सबसे बड़ा स्रोत है, जो उच्च से निम्न स्थानों पर बहते पानी की ऊर्जा का दोहन करता है। इसके साथ ही पवन ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, महासागर ऊर्जा और बायोएनर्जी भी इसके प्रमुख स्रोत माने जाते हैं। सौर ऊर्जा से बिजली बनाने का विज्ञान कब और कैसे खोजा गया? सौर ऊर्जा का पूरा विज्ञान फोटोवोल्टिक प्रभाव (photovoltaic effect) पर निर्भर करता है, जिसे पहली बार साल 1839 में फ्रांसीसी भौतिक विज्ञानी एडमंड बेकरेल (Edmond Becquerel) द्वारा प्रदर्शित किया गया था। उन्होंने एक इलेक्ट्रोकेमिकल सेल (electrochemical cell) का उपयोग किया था और यह पाया था कि जब एसिड, तटस्थ या क्षारीय घोल में डूबी प्लैटिनम (platinum) या सोने की दो प्लेटों को असमान रूप से सौर विकिरण के संपर्क में लाया जाता है, तो वहां विद्युत प्रवाह उत्पन्न होता है। बाद में साल 1884 में चार्ल्स फ्रिट्स (Charles Fritts) द्वारा पहले सौर सेल का प्रयोग किया गया था, जिसमें सोने की एक पतली फिल्म से ढकी सेलेनियम (Selenium) की एक परत थी, हालांकि इसकी कार्यक्षमता बहुत ख़राब थी। असल में फोटोवोल्टिक प्रभाव एक भौतिक घटना है जिसमें एक अर्धचालक पदार्थ प्रकाश के संपर्क में आने पर विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करता है। जब सूर्य की रोशनी फोटोडायोड (photodiode) पर पड़ती है, तो वैलेंस बैंड (valence band) में मौजूद इलेक्ट्रॉन ऊर्जा को अवशोषित करते हैं और उत्तेजित होकर चालन बैंड (conduction band) में कूद जाते हैं और मुक्त हो जाते हैं। इस तरह आवेशों के अलग होने से एक विद्युत विभव या वोल्टेज उत्पन्न होता है और प्रकाश ऊर्जा आसानी से विद्युत ऊर्जा में बदल जाती है। एडमंड बेकरेलछत पर लगे सोलर पैनल असल में बिजली का उत्पादन कैसे करते हैं? फोटोवोल्टिक सोलर पैनल विभिन्न प्रकार की कांच की पैकेजिंग में कई सौर कोशिकाओं से बने होते हैं। ये सौर कोशिकाएं अर्धचालक की तरह सिलिकॉन (silicon) से बनी होती हैं और एक सकारात्मक परत और एक नकारात्मक परत के साथ निर्मित होती हैं, जो बैटरी की तरह ही एक विद्युत क्षेत्र बनाती हैं। जब फोटॉन एक सौर सेल से टकराते हैं, तो वे इलेक्ट्रॉनों को उनके परमाणुओं से मुक्त कर देते हैं। यदि सेल के सकारात्मक और नकारात्मक किनारों से कंडक्टर (conductor) जुड़े होते हैं, तो यह एक विद्युत सर्किट बनाता है और जब इलेक्ट्रॉन ऐसे सर्किट से प्रवाहित होते हैं, तो बिजली उत्पन्न होने लगती है। ये फोटोवोल्टिक पैनल डायरेक्ट करंट बिजली उत्पन्न करते हैं, जिसमें इलेक्ट्रॉन सर्किट के चारों ओर एक ही दिशा में बहते हैं। लेकिन हमारे घरों और पावर ग्रिड में अल्टरनेटिंग करंट बिजली का इस्तेमाल होता है, जिसमें इलेक्ट्रॉन आगे और पीछे धकेले जाते हैं। डायरेक्ट करंट (direct current) को अल्टरनेटिंग करंट (Alternating Current) ग्रिड में ले जाने के लिए इनवर्टर (inverter) का उपयोग किया जाता है। इनवर्टर इस पूरे सिस्टम के दिमाग़ की तरह होते हैं, जो न केवल करंट बदलते हैं बल्कि ग्राउंड फॉल्ट सुरक्षा (ground fault protection) और सिस्टम के आंकड़े भी प्रदान करते हैं। आज की तकनीक में माइक्रो-इनवर्टर का इस्तेमाल भी काफ़ी बढ़ गया है, जो एक पूरे सिस्टम के बजाय प्रत्येक व्यक्तिगत सौर पैनल के लिए अनुकूलित होते हैं, जिससे हर पैनल अपनी अधिकतम क्षमता पर प्रदर्शन कर पाता है। जब एक सामान्य ग्रिड-बंधा सिस्टम दिन के उजाले के दौरान ज़रूरत से ज़्यादा ऊर्जा का उत्पादन करता है, तो वह अतिरिक्त ऊर्जा ग्रिड में वापस भेज दी जाती है जिसके लिए ग्राहक को क्रेडिट मिलता है। इस क्रेडिट का उपयोग रात में या बादल वाले दिनों में पारंपरिक ग्रिड से बिजली लेने के लिए किया जा सकता है, जिसे फ़ीड इन टैरिफ (feed in tariff) कहा जाता है। सौर ऊर्जा के उपयोग के अन्य बड़े तरीक़े क्या हैं? सौर विकिरण को न केवल बिजली में बल्कि तापीय ऊर्जा या गर्मी में भी बदला जा सकता है। सौर ऊर्जा को पकड़ने और उसे तापीय ऊर्जा में बदलने के लिए सबसे आम उपकरणों में फ्लैट-प्लेट कलेक्टर (flat-plate collector) शामिल हैं। क्योंकि पृथ्वी की सतह पर सौर विकिरण की तीव्रता कम होती है, इसलिए इन कलेक्टरों का क्षेत्रफल काफ़ी बड़ा होना चाहिए। इनका उपयोग आमतौर पर सौर वॉटर हीटर और घरों को गर्म करने के लिए किया जाता है, जो वाहक तरल पदार्थों को 66 से 93 डिग्री सेल्सियस के तापमान तक गर्म करते हैं। तापीय ऊर्जा रूपांतरण का एक अन्य बेहतरीन तरीक़ा सौर तालाबों में देखने को मिलता है। ये विशेष रूप से खारे पानी के निकाय होते हैं जिन्हें सौर ऊर्जा को इकट्ठा करने और संग्रहीत करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इनसे निकलने वाली गर्मी रसायनों, भोजन और कपड़ा उत्पादन को संभव बनाती है और ग्रीनहाउस व स्विमिंग पूल को गर्म करने के लिए भी इस्तेमाल की जाती है। इसके अलावा संकेंद्रित सौर ऊर्जा संयंत्रों में दर्पणों या लेंसों की कतारों का उपयोग किया जाता है जो सूर्य के प्रकाश को एक छोटे बिंदु पर केंद्रित करते हैं। इससे तापमान 2000 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक तक पहुंच सकता है, जिसका उपयोग स्टीम टरबाइन (steam turbine) चलाने के लिए किया जाता है। अब सौर तकनीक कृत्रिम पत्तियों के रूप में भी सामने आ रही है, जो प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया की नक़ल करते हुए सौर ऊर्जा का उपयोग करके पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करती है और बिना किसी प्रदूषण के साफ़ ईंधन देती है। उत्तर प्रदेश और विशेषकर लखनऊ में सौर ऊर्जा का भविष्य कैसा है? सरकारी नीतियों के मज़बूत समर्थन और बढ़ती पर्यावरणीय जागरूकता ने उद्योगों और आम उपभोक्ताओं दोनों को अपने परिसरों के लिए सौर प्रणाली अपनाने के लिए पूरी तरह आश्वस्त कर दिया है। पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश की सौर ऊर्जा क्षमता में दस गुना से अधिक की भारी वृद्धि हुई है, जो साल 2017 में लगभग 288 मेगावाट से बढ़कर 2025 में 2653 मेगावाट तक पहुंच गई है। राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत मार्च 2027 तक 8 लाख रूफटॉप सोलर प्लांट (Rooftop Solar Plant) स्थापित करने का एक बेहद महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके तहत अब तक 1 लाख से अधिक सिस्टम स्थापित किए जा चुके हैं, जिनकी रफ़्तार लगभग 11,000 स्थापना प्रति माह है। लखनऊ शहर भी अब भारत की इस सौर क्रांति को अपनाते हुए ऊर्जा के साफ़ और सस्ते विकल्पों की ओर बढ़ रहा है। लखनऊ को एक टिकाऊ शहर में बदलने और स्वच्छ ऊर्जा के इस विकास को गति देने में यहाँ के शीर्ष सौर वितरकों का बहुत बड़ा योगदान है। इनमें अरसिगा सोलर शामिल है, जिसकी स्थापना 2019 में हुई थी और जो व्यवसायों को सस्ते सौर उपकरण दे रहा है। इसके अलावा लूम सोलर भी अपनी उन्नत तकनीक के साथ लखनऊ में ऊर्जा की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए विश्वसनीय सौर ऊर्जा प्रदान कर रहा है। मार्स सोलर सॉल्यूशन, ओम सोलर सॉल्यूशंस और एमज़ो पॉवरटेक जैसी कंपनियां भी आवासीय, वाणिज्यिक और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए बेहतरीन गुणवत्ता वाले सोलर पैनल, इनवर्टर और कस्टम बैटरी की सुविधा देकर लखनऊ को ऊर्जा कुशल और एक हरित भविष्य की ओर ले जाने का काम कर रही हैं। संदर्भ https://tinyurl.com/2axfehedhttps://tinyurl.com/23mtukqhhttps://tinyurl.com/27qqham7https://tinyurl.com/yay93m2hhttps://tinyurl.com/28bd6o9n
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
ब्रिटिश बैंड कॉर्नरशॉप के गीत से सजी आशा भोसले की सुरीली विरासत को नमन
आशा भोसले (Asha Bhosle) भारतीय सिनेमा की सबसे लोकप्रिय और बहुमुखी गायिकाओं में से एक हैं। उन्होंने अपने लंबे करियर में हज़ारों गीत गाए और फिल्मी संगीत, ग़ज़ल और पॉप जैसे कई रूपों में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी आवाज़ ने कई पीढ़ियों के संगीत को प्रभावित किया है।सन 1997 में ब्रिटिश बैंड कॉर्नरशॉप (Cornershop) ने ब्रिमफुल ऑफ़ आशा (Brimful of Asha) गीत प्रस्तुत किया, जो आशा भोसले को एक विशेष श्रद्धांजलि है। बाद में इसके नए रूप ने बहुत लोकप्रियता पाई और यह गीत यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) के संगीत सूची में प्रथम स्थान तक पहुँचा। यह गीत दिखाता है कि भारतीय फिल्म संगीत दुनिया तक कैसे पहुँचा। हमारे यहाँ फिल्मों में गीत पार्श्व गायक गाते हैं और कलाकार उन पर अभिनय करते हैं। इस परंपरा को इस गीत में सरल रूप से प्रस्तुत किया गया है। इसमें लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जैसे महान गायकों का भी उल्लेख मिलता है। इस प्रकार ब्रिमफुल ऑफ़ आशा केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि कैसे आशा भोसले की आवाज़ भारत से निकलकर पूरे विश्व में अपनी पहचान बना चुकी है।संदर्भ:https://tinyurl.com/mr3wf7u8 https://tinyurl.com/5xuxrwdshttps://tinyurl.com/4xavsexvhttps://tinyurl.com/w7pntxbr
ध्वनि II - भाषाएँ
हिंदी-उर्दू भाषा और लखनऊ के इतिहास, तहज़ीब, कारीगरी और कबाब में छिपे ईरान के गहरे राज़
क्या आपको पता है कि भारत और ईरान का रिश्ता आधुनिक राजनीति और देशों की वर्तमान सीमाओं से कहीं ज़्यादा पुराना है। जब 60,000 साल पहले इंसानों ने अफ्रीका से बाहर क़दम रखा था, तब वे फ़ारसी तटों के साथ चलते हुए ही दक्षिण एशिया तक पहुंचे थे। यह रिश्ता सिंधु घाटी सभ्यता के समय से और भी गहरा हो गया था, जो कि शुरुआती एलामाइट और मेसोपोटामिया संस्कृतियों के बिल्कुल समकालीन थी और जिनके साथ प्राचीन ईरान का सीधा संपर्क रहता था। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि डेरियस प्रथम (Darius I) के नेतृत्व में हखामनी साम्राज्य ने 516 ईसा पूर्व में उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों यानी सिंध और पंजाब पर कब्ज़ा कर लिया था और इसे अपने विशाल साम्राज्य का बीसवां प्रांत बना लिया था। यह क्षेत्र न केवल आर्थिक रूप से बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण था, बल्कि इसने यूनान के ख़िलाफ़ ज़ेरेक्सिस के सैन्य अभियानों के लिए सैनिक भी मुहैया कराए थे। भारत पर इसी ईरानी प्रभाव के साथ खरोष्ठी लिपि का भी प्रवेश हुआ, जो मूल रूप से अरामी भाषा से निकली थी और इसे उर्दू की ही तरह दाएं से बाएं लिखा जाता था। यह लिपि तीसरी शताब्दी तक उत्तर-पश्चिमी भारत में मज़बूती से मौजूद रही। यहाँ तक कि सम्राट अशोक के मशहूर शिलालेख और उनके नैतिक नियम भी इसी ईरानी शाही घोषणाओं की शैली से प्रेरित थे। अशोक के स्तंभों पर जो घंटी के आकार के शीर्ष दिखाई देते हैं, वे ईरान के पर्सिपोलिस (Persepolis) में पाए जाने वाले स्तंभों से बेहद मिलते-जुलते हैं। पर्सिपोलिस आधुनिक आनुवंशिक शोध भी आज इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, ख़ासकर हमारे उत्तरी और मध्य क्षेत्रों में, प्राचीन ईरानी किसानों के साथ अपनी गहरी आनुवंशिक विरासत साझा करता है। आज भी रिज़वी (Rizwi), काज़मी (Kazmi) और नक़वी (Naqvi) जैसे कई प्रमुख भारतीय शिया परिवार अपनी जड़ें सीधे ईरान से ही जोड़ते हैं। ईरान में आज भी अल्पसंख्यक पूरी सुरक्षा के साथ रहते हैं। वहाँ 19वीं सदी में भारतीय व्यापारियों द्वारा बनाए गए दो हिंदू मंदिर और चार प्रमुख गुरुद्वारे आज भी मौजूद हैं जहाँ लोग शांति से पूजा करते हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान भी भारत और ईरान के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध न केवल बनाए रखे गए बल्कि उन्हें संस्थागत रूप भी दिया गया। व्यापार फला-फूला और आध्यात्मिक संबंध बने रहे। आज़ादी के बाद भी भारत और ईरान ने सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे। हालाँकि, हाल के दशकों में सामरिक बदलावों, ख़ासकर इज़राइल और अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती नज़दीकियों ने इस गतिशीलता को बहुत प्रभावित किया है। साल 2005 में एक बड़ा मोड़ तब आया जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र में ईरान के परमाणु कार्यक्रम के ख़िलाफ़ वोट दिया। इसके बावजूद व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान आज भी जारी है। इंडो-आर्यन और ईरानी भाषाओं के बीच क्या समानताएं हैं?भारत की सबसे पुरानी भाषाओं में से एक संस्कृत का सीधा और गहरा संबंध इंडो-ईरानी भाषा परिवार से है। 1500 ईसा पूर्व में शुरू हुए वैदिक काल और उसके बाद के हज़ारों सालों तक भारतीय संस्कृति ने ईरान से बहुत कुछ ग्रहण किया। प्राचीन ईरानी भाषा और वैदिक संस्कृत में इतने सारे शब्द एक जैसे हैं कि भाषाविज्ञानी भी हैरान रह जाते हैं। उदाहरण के लिए, ईरानी धर्मगुरु ज़रथुस्त्र (Zarathustra) ने अहुर मज़्दा का उपदेश दिया था। यह ईरानी शब्द अहुर हमारे वेदों में असुर है। इसी तरह प्राचीन ईरान का अशा हमारे उपनिषदों के ईशा के बिल्कुल समान है। ईरानी भाषा के हवान, यस्न, जरन्य, नामन और सेना जैसे शब्द वैदिक संस्कृत के हवन, यज्ञ, हिरण्य, नामन और सेना ही हैं। दोनों महान परंपराओं की कविता के मीटर भी काफी मिलते-जुलते हैं। प्राचीन ईरानी कविता के मीटर वेदों के त्रिष्टुभ मीटर के बहुत क़रीब हैं। इतना ही नहीं, हमारी रोज़मर्रा की बातचीत में इस्तेमाल होने वाले बहुत से शब्द सीधे फ़ारसी से ही आए हैं। चादर, ज़मीन, दिल, चेहरा, ज़रूरी, दीवाना, ख़ूब, रंग, नारंगी, सफ़ेद, हमेशा, शायद, ख़राब, ख़ाली, गाय, मुर्ग़ी और चर्बी जैसे शब्द पूरी तरह से फ़ारसी के हैं, जिन्हें आज हम आम हिंदी और उर्दू में धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। इतिहास इस बात का भी गवाह है कि 17वीं शताब्दी में जब मराठा साम्राज्य के छत्रपति शिवाजी को दक्कन क्षेत्र में मुग़ल सेना के सेनापति राजस्थानी जय सिंह से कोई बातचीत करनी होती थी, तो वे संचार के लिए फ़ारसी भाषा का ही उपयोग करते थे। जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने सूरत में अपना पहला कार्यालय शुरू किया, तो सर थॉमस रो को स्थानीय भारतीय अधिकारियों के साथ संवाद करने के लिए फ़ारसी अनुवादकों को नौकरी पर रखना पड़ा था। यहाँ तक कि समाज सुधारक राजा राममोहन राय द्वारा लिखी गई सबसे पहली किताब भी फ़ारसी में ही रची गई थी। शाह, नामदार या नरीमन जैसे भारतीय नाम भी असल में फ़ारसी मूल के ही हैं। दोनों सभ्यताओं की काव्य और साहित्यिक परंपराएं कैसी रही हैं?साहित्य और दर्शन के क्षेत्र में भी दोनों ही सभ्यताओं ने पूरी दुनिया को महान और कालजयी रचनाएं दी हैं। अगर हम भारतीय उपमहाद्वीप के संस्कृत साहित्य की बात करें, तो यह आर्यों द्वारा रचित एक अत्यंत विशाल और समृद्ध संग्रह है। आर्य लोग शायद दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के दौरान उत्तर-पश्चिम की दिशा से भारतीय उपमहाद्वीप में आए थे। धीरे-धीरे यह विशाल साहित्य उस ब्राह्मणवादी समाज की अभिव्यक्ति का मुख्य और सबसे ताक़तवर ज़रिया बन गया। 1500 ईसा पूर्व से शुरू हुए गौरवशाली वैदिक काल के बाद, संस्कृत साहित्य का शास्त्रीय काल 500 ईसा पूर्व से लेकर लगभग 1000 ईसवी तक चला। इस साहित्य ने पूरे क्षेत्र में एक मुख्य सांस्कृतिक शक्ति के रूप में ख़ुद को स्थापित किया। दक्षिण में शुरू हुए भक्ति साहित्य ने उत्तर भारत में ज़ोर पकड़ा और इसने वर्ण व्यवस्था पर आधारित सामाजिक पदानुक्रम के विचार को एक गंभीर चुनौती दी।मौलाना जलालुद्दीन बल्खीवहीं दूसरी ओर, फ़ारसी और सूफ़ी काव्य परंपरा में मौलाना जलालुद्दीन बल्खी (Maulana Jalaluddin Balkhi) का नाम सबसे ऊंचे मुक़ाम पर आता है, जिन्हें आज पूरी दुनिया रूमी के नाम से जानती है। उनका जन्म 30 सितंबर 1207 को फ़ारसी साम्राज्य के पूर्वी छोर पर मौजूद बल्ख प्रांत में हुआ था। जब वे युवा ही थे, तब चंगेज़ ख़ान की हमलावर सेना के खौफ़ से बचने के लिए उनके पिता अपने परिवार को लेकर पश्चिम की ओर चले गए और वर्तमान तुर्की में बस गए। 1244 में उनकी मुलाक़ात शम्स तबरीज़ नाम के एक फ़क़ीर से हुई। रूमी ख़ुद यह मानते थे कि उनकी असली कविता शम्स से मिलने के बाद ही निखर कर सामने आई। शम्स के अचानक ग़ायब होने के बाद रूमी ने उनके गहरे वियोग में 40,000 से ज़्यादा शानदार गीत और छंद लिखे। इस महान संग्रह को दीवान-ए-शम्स-ए-तबरीज़ी कहा जाता है। अपने जीवन के आख़िरी 12 सालों में रूमी ने 64,000 पंक्तियों वाली अपनी सबसे महान रचना मसनवी-ए-मानवी (Masnavi-e-manavi) भी अपने मुंशी को बोलकर लिखवाई। इस मसनवी को कुछ सूफ़ी विचारक फ़ारसी भाषा का क़ुरान भी मानते हैं। संगीत के क्षेत्र में अमीर खुसरो ने भारत की कई स्थायी संगीत परंपराओं की नींव रखी, और उन्होंने भी अपना ज़्यादातर काम फ़ारसी में ही किया था। लखनऊ और ईरान के बीच इस गहरे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जुड़ाव का एक और बेहद अहम पहलू ईरान के पहले सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी (Ayatollah Ruhollah Khomeini) से भी जुड़ता है। शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि 1979 की इस्लामी क्रांति के प्रणेता खुमैनी की जड़ें असल में उत्तर प्रदेश की इसी ज़मीन से जुड़ी हुई थीं। उनके दादा, सैयद अहमद मूसवी, लखनऊ से महज़ कुछ दूरी पर स्थित बाराबंकी के पास पैदा हुए थे। 1830 के दशक में जब वे भारत से इराक और फिर बाद में ईरान के खुमैन शहर में जाकर बसे, तब भी उन्होंने अपनी भारतीय जड़ों और अपनी जन्मभूमि की पहचान को कभी नहीं भुलाया। इसी पहचान को आजीवन जीवित रखने के लिए उन्होंने अपने नाम के साथ हमेशा "हिंदी" उपनाम जोड़े रखा।अहमद हिंदी एक प्रखर विद्वान थे और उनके इसी गहरे शिया विश्वास और आध्यात्मिक मूल्यों की विरासत ने अयातुल्ला खुमैनी के वैचारिक दृष्टिकोण को इतनी गहराई से आकार दिया। यह उनके दादा से मिले इन्हीं संस्कारों का प्रभाव था जिसने खुमैनी को एक सुन्नी-बहुल मध्य पूर्व (Middle East) के बीच ईरान के शिया भविष्य को एक नई दिशा देने और उसे एक शक्तिशाली शिया राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की प्रेरणा दी। लखनऊ और बाराबंकी से जुड़ा यह एक इतना सशक्त और प्रसिद्ध ऐतिहासिक तथ्य है जिससे यहाँ के ज़्यादातर लोग भली-भांति परिचित हैं। ज़ाहिर है, इस महत्वपूर्ण कड़ी को शामिल किए बिना भारत और ईरान, ख़ासकर अवध और फ़ारस के रिश्तों की कहानी पूरी तरह अधूरी ही मानी जाएगी।लखनऊ की नवाबी तहज़ीब और ईरान के बीच क्या गहरा नाता है?लखनऊ की पूरी संस्कृति, वास्तुकला और मशहूर तहज़ीब पर ईरानी प्रभाव बिल्कुल साफ़ और जीवंत देखा जा सकता है। अवध के इन्हीं नवाबों ने लखनऊ को उत्तर भारत का सबसे परिष्कृत शहर बनाया था। ये शिया मुस्लिम शासक अपने पूर्वजों के तार सीधे ईरान के निशापुर शहर से जोड़ते थे। वे 15वीं शताब्दी के सैय्यद सुल्तानों के समय गंगा के मैदानी इलाक़ों में आकर बसे थे। 1707 में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद पैदा हुई राजनीतिक अराजकता का भरपूर फ़ायदा उठाते हुए ये नवाब मुग़ल साम्राज्य के कमज़ोर होने पर धीरे-धीरे स्वतंत्र शासक बन गए। नवाब आसफ़-उद्दौला और उनके बाद वाजिद अली शाह के शानदार शासनकाल में ईरान से पूरी तरह प्रभावित लखनऊ की यह कलात्मक नवाबी संस्कृति अपने चरम शिखर पर पहुँच गई। शासक और दरबारी बेहतरीन मलमल के लंबे कपड़े और उन पर खूबसूरत ब्रोकेड कोट पहना करते थे। आज भी लखनऊ के पुराने मोहल्लों और ऐतिहासिक इमारतों में यह खूबसूरत ईरानी झलक क़ायम है। नवाब आसफ़-उद्दौला द्वारा बनवाया गया विशाल आसफ़ी इमामबाड़ा शिया धार्मिक अनुष्ठानों का एक प्रमुख केंद्र है। मोहर्रम के दौरान पैगंबर के पोते इमाम हुसैन की शहादत की याद में जो ख़ूबसूरत ताज़िया बनाए जाते हैं, वे असल में हुसैन के मक़बरे की ही हूबहू प्रतिकृतियां होते हैं। लखनऊ की विश्व प्रसिद्ध चिकनकारी, ख़ासकर बारीक मलमल के कपड़े पर सफ़ेद धागे से की जाने वाली जादुई कढ़ाई, इसी परिष्कृत ईरानी संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। पुराने शहर की गलियों में आपको आज भी क़ुरान रखने के स्टैंड बनाने वाले, ताज़िया बनाने वाले कारीगर और पीतल का काम करने वाले आसानी से मिल जाएंगे। खान-पान की बात करें तो इदरीस की दुकान पर कोयले की धीमी आंच पर एक बड़े बर्तन में पकने वाली मटन बिरयानी, मुबीन का लज़ीज़ मुर्ग़ और निहारी कुल्चा, और मशहूर गलावटी कबाब जिसमें 160 प्रकार के विशेष मसाले पड़ते हैं, इसी समृद्ध नवाबी और ईरानी पाक कला की विरासत की देन हैं। लखनऊ, उत्तर प्रदेश और ईरान का रिश्ता केवल इतिहास तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह राजनीतिक रूप से भी अक्सर चर्चा के केंद्र में रहता है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ईरान के पहले सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी (Ayatollah Khomeini) और उत्तर प्रदेश के बीच के ऐतिहासिक संबंध को समझाने वाली ख़बरें भी प्रमुखता से छपी हैं। इन ताज़ा ख़बरों के केंद्र में ईरान की वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति और अमेरिका तथा इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए ताज़ा हवाई हमले हैं। इन भयानक हमलों में ईरान के मौजूदा सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई और उनके परिवार के कई सदस्यों के मारे जाने की बात सामने आई है। इस बड़ी घटना के बाद पूरे ईरान में 40 दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। ये तमाम आधुनिक घटनाक्रम और पुरानी ऐतिहासिक कड़ियाँ इस बात को पूरी तरह से साबित करती हैं कि भारत, ख़ासकर उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर और ईरान के बीच के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक संबंध कितने गहरे और अटूट हैं। सन्दर्भ 1. https://tinyurl.com/25bjytc62. https://tinyurl.com/23lrv9j53. https://tinyurl.com/yblyj7v64. https://tinyurl.com/2y3r4hr45. https://tinyurl.com/24mnzghf6. https://tinyurl.com/25kj4ovc
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
21-06-2026 09:17 AM • Lucknow-Hindi
माराडोना के हैंड ऑफ गॉड ने कैसे जिताया अर्जेंटीना को विश्व कप
डिएगो माराडोना (Diego Maradona) फुटबॉल इतिहास के सबसे महान खिलाड़ियों में से एक माने जाते हैं। वर्ष 1986 के फीफा विश्व कप में इंग्लैंड के खिलाफ उनका प्रदर्शन आज भी खेल जगत के सबसे चर्चित पलों में गिना जाता है। इसी मैच में उन्होंने पहला गोल किया, जिसे बाद में “हैंड ऑफ गॉड” के नाम से जाना गया। इस गोल में माराडोना ने अपने हाथ से गेंद को जाल में पहुंचाया, लेकिन रेफरी यह देख नहीं पाए और गोल मान लिया गया। बाद में माराडोना ने मजाकिया अंदाज़ में कहा कि यह गोल “थोड़ा माराडोना के सिर से और थोड़ा भगवान के हाथ से” हुआ था।
इसी मैच में कुछ मिनट बाद माराडोना ने दूसरा गोल किया, जिसे “गोल ऑफ द सेंचुरी” कहा जाता है। उन्होंने मैदान के बीच से गेंद लेकर कई इंग्लिश खिलाड़ियों को शानदार ड्रिब्लिंग (dribbling) से पीछे छोड़ा और गोल दाग दिया। यह गोल फुटबॉल इतिहास के सबसे बेहतरीन गोलों में गिना जाता है।
माराडोना अपनी अद्भुत गेंद नियंत्रण क्षमता और कठिन अभ्यास के लिए भी जाने जाते थे। वे घंटों तक ड्रिब्लिंग, बॉल कंट्रोल और संतुलन पर मेहनत करते थे, जिसने उन्हें दुनिया के सबसे कुशल खिलाड़ियों में शामिल किया। उनकी प्रतिभा, जुनून और खेल शैली ने उन्हें फुटबॉल का अमर सितारा बना दिया।
चलिए, आज भारत के राष्ट्रीय खेल - हॉकी के विकास व उपलब्धियों की जांच करते हैं
लखनऊ, आज हम हॉकी खेल के इतिहास को समझेंगे, और देखेंगे कि, यह एक आधुनिक खेल के रूप में कैसे विकसित हुआ। फिर हम पता लगाएंगे कि, भारत में औपनिवेशिक काल के दौरान हॉकी कैसे लोकप्रिय हुआ। इसके पश्चात, हम हॉकी के नियमों और खेल साहित्य पर नजर डालेंगे। बाद में, हम अंतरराष्ट्रीय हॉकी में भारत की उपलब्धियों की जांच करेंगे। और अंततः, हम ध्यानचंद जी जैसे हॉकी के महान खिलाड़ियों और इस खेल के स्टेडियमों एवं प्रशिक्षण केंद्रों के बारे में जानेंगे।
फ़ील्ड हॉकी (Field hockey), 11-11 खिलाड़ियों के दो विरोधी संघों द्वारा खेला जाने वाला एक मैदानी खेल है। इसके खिलाड़ी, अपने विरोधी संघ के गोल (Goal) में एक छोटी गेंद को मारने के लिए, स्ट्राइकिंग छोर (Striking end) पर घुमावदार बनी छड़ियों का उपयोग करते हैं। माना जाता है कि, हॉकी की शुरुआत बहुत प्राचीन सभ्यताओं से हुई है। हॉकी में अरब, यूनानी, फारसी और रोमन लोगों के अपने-अपने संस्करण थे। साथ ही, दक्षिण अमेरिका के एज़्टेक इंडियन्स (Aztec Indians) द्वारा खेले जाने वाले, एक समान छड़ी खेल के प्रमाण भी पाए गए हैं। हॉकी को हर्लिंग (Hurling) और शिंटी (Shinty) जैसे अन्य शुरुआती खेलों से भी पहचाना जा सकता है। मध्य युग के दौरान, फ्रांस में हॉक्वेट (Hoquet) नामक एक छड़ी वाला खेल खेला जाता था। हॉकी का नाम इसी शब्द से आने की संभावना है।
उन्नीसवीं सदी के अंत में अंग्रेजी स्कूलों में भी हॉकी प्रचलित हुआ। दक्षिणपूर्वी लंदन (London) के एक इलाके में स्थापित पहले पुरुष हॉकी क्लब ने, 1861 में एक नियम पुस्तक रिकॉर्ड की। लंदन के एक अन्य क्लब ने इन नियमों में कई प्रमुख बदलाव पेश किए। इनमें हाथों का उपयोग करने या कंधे के ऊपर लाठी उठाने पर प्रतिबंध; गेंद के रूप में रबर के स्थान पर एक गोले को अपनाना; और एक स्ट्राइकिंग सर्कल (Striking circle) को अपनाना शामिल था। ये नए नियम, 1886 में लंदन में स्थापित हुए हॉकी एसोसिएशन (Hockey Association) में लागू किए गए।
भारत और पूर्वी विश्व में इस खेल को फैलाने के लिए, ब्रिटिश सेना काफी हद तक जिम्मेदार थी। हॉकी की अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता 1895 में शुरू हुई, और 1928 तक यह भारत का राष्ट्रीय खेल बन गया था। उस वर्ष ओलंपिक खेलों में भारतीय संघ ने पहली बार प्रतिस्पर्धा करते हुए स्वर्ण पदक जीता था। बाद में, अधिक अंतर्राष्ट्रीय मैचों के आह्वान के कारण, 1971 में हॉकी विश्व कप की शुरुआत हुई। इस खेल की अन्य प्रमुख अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में एशियाई कप, एशियाई खेल, यूरोपीय कप और पैन-अमेरिकन खेल शामिल हैं।
खेल के मैदानों के रूप में, भूमि के बड़े भूखंडों की उपलब्धता और उपकरणों की सरल प्रकृति के कारण, हॉकी, धीरे-धीरे भारत में बच्चों और युवाओं के बीच लोकप्रिय खेल बन गया था। हमारे देश का पहला हॉकी क्लब, 1855 में तत्कालीन कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में बनाया गया था। अगले कुछ दशकों में, कलकत्ता में ‘बीटन कप’ और बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) में ‘आगा खान टूर्नामेंट’ जैसी नई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं ने इस खेल को अधिक लोकप्रिय बनाया। 1907 और 1908 में भारत में हॉकी एसोसिएशन बनाने की बात चल रही थी, हालांकि, यह नहीं बन पाया। फिर बाद में, अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ (FIH) के गठन के बाद, 1925 में भारतीय हॉकी महासंघ (IHF) का गठन हुआ था।
भारतीय हॉकी महासंघ ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय दौरा, 1926 में न्यूजीलैंड (New Zealand) में आयोजित किया था। यहां भारतीय हॉकी पुरुष संघ ने 21 मैच खेले, और उनमें से 18 मैच जीते। इस प्रतियोगिता में युवा खिलाड़ी ध्यानचंद जी का उदय भी हुआ।
1924 तक ओलंपिक खेलों के साथ समझौता न होने पर हॉकी को ओलंपिक से हटा दिया गया था। परंतु, अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ ने हॉकी को एम्स्टर्डम 1928 (Amsterdam 1928) ओलंपिक से स्थायी दर्जा प्राप्त करवाया। भारतीय हॉकी महासंघ ने 1927 में अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ की सदस्यता अर्जित की। इस प्रकार, भारतीय हॉकी संघ ने 1928 में अपना पहला ओलंपिक खेल खेला।
दरअसल, हॉकी खेल का उद्देश्य, निर्धारित समय समाप्त होने से पहले विरोधी संघ से अधिक गोल करना है। सभी खिलाड़ी गेंद को नियंत्रित करने के लिए हॉकी स्टिक (Hockey stick) का उपयोग करते हैं, और अपने संघ के लिए स्कोर करने हेतु, इसे विरोधी गोल पोस्ट में डालते हैं। हॉकी स्टिक में घुमावदार छोर वाला एक लंबा हैंडल होता है, जो एक तरफ से सपाट होता है। स्टिक का वजन 737 ग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। पहले मैदानी हॉकी स्टिक लकड़ी के बनते थे, लेकिन आधुनिक हॉकी स्टिक कांच, कार्बन और अरैमिड (Aramid) के रेशों से बनाई जाती हैं।
खिलाड़ियों को गेंद को छूने के लिए, स्टिक के केवल सपाट हिस्से का उपयोग करने की अनुमति है। ऐसा न करने पर बैकस्टिक फाउल (Backstick foul) होता है, और तब गेंद विपक्षी को दे दी जाती है। खिलाड़ियों को केवल अपनी स्टिक से ही गेंद को पास या ड्रिबल (Dribble) करके विपरीत गोल की ओर ले जाना होता है। इसके अलावा, गोल शॉट केवल स्ट्राइकिंग सर्कल के अंदर से ही किया जा सकता है।
क्या आप जानते हैं कि, आज 13 ओलंपिक पदकों ( 8 स्वर्ण, 1 रजत और 4 कांस्य पदक) के साथ, भारत ने खुद को हॉकी खेल की सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित किया है। एक खिलाड़ी, जिन्होंने भारत की इस कहानी को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वे 1980 के मॉस्को ओलंपिक खेलों (Moscow Olympics) के स्वर्ण पदक विजेता जफर इकबाल हैं। दिलचस्प बात यह है कि, पिछले 100 वर्षों में दुनिया के किसी भी अन्य हॉकी संघ ने ऐसी सफलता नहीं पाई है। 1947 में भारत की आजादी के बाद, भारतीय हॉकी ने बहुत कुछ हासिल किया है। हमने 1947 से अब तक, 5 स्वर्ण पदक जीते हैं।
1976 में ओलंपिक खेलों में, हॉकी एस्ट्रोटर्फ (Astroturf) में बदल गई, जबकि भारतीय संघ को प्राकृतिक घास वाले मैदानों पर खेलने की आदत थी। हालांकि, 1980 में भारत ने इस नई सतह पर खेलने की सभी चुनौतियों को पार कर लिया, और मॉस्को में प्रतिष्ठित स्वर्ण पदक जीता।
जफर इकबाल के अलावा, हॉकी के एक अन्य खिलाड़ी, जो काफ़ी मशहूर एवं प्रतिभाशाली है, मेजर ध्यानचंद है। ध्यानचंद वे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपनी छड़ी की खेल रणनीति से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया था। इसी कारण, उन्हें ‘हॉकी के जादूगर’ यह उपनाम मिला। 29 अगस्त, 1905 को इलाहाबाद में ब्रिटिश भारतीय सेना के एक सैनिक के घर जन्मे ध्यान सिंह, बहुत कम उम्र में ही हॉकी की ओर आकर्षित हो गए थे। अपने पिता की तरह वे भी 16 साल की उम्र में सेना में भर्ती हो गए, और वहां अपना पसंदीदा खेल खेलना जारी रखा।
सैन्य में बिताए अपने समय के दौरान, उन्होंने 1922 और 1926 के बीच विभिन्न सेना हॉकी प्रतियोगिताओं और रेजिमेंटल खेलों को खेला। ध्यानचंद खेल में इतने तल्लीन रहते थे कि, वे अपनी ड्यूटी के बाद रात में भी हॉकी खेलते थे। चांदनी रात में खेलने के कारण ही, उन्हें ध्यानचंद नाम मिला, क्योंकि 'चंद' शब्द का हिंदी अर्थ ‘चंद्रमा’ है।
उनकी रैंकों में प्रगति के कारण, उन्हें 1926 में न्यूजीलैंड दौरे के लिए भारतीय सेना के संघ में शामिल किया गया। न्यूजीलैंड में भारतीय संघ ने 18 मैच जीते, दो मैच ड्रा (Draw) खेले और केवल एक ही मुकाबला हारा। भारत के इस अद्भुत प्रदर्शन की कई लोगों ने सराहना की, और विशेष रूप से ध्यानचंद जी को अपने पहले अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में अपनी प्रतिभा के लिए बहुत प्रशंसा मिली। दौरे से वापसी पर, उन्हें ब्रिटिश भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट में लांस नायक नामित किया गया।
हॉकी को पहली बार ओलंपिक में शामिल करने के साथ, नवगठित भारतीय हॉकी महासंघ, नीदरलैंड (Netherland) खेलों के लिए सर्वोत्तम संभव संघ भेजने के लिए उत्सुक था। पंजाब, बंगाल, राजपुताना, संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और मध्य प्रांत ने इन खेलों में भाग लिया। और जब भारतीय सेना ये खेल नहीं खेल पाई, तब ध्यानचंद जी को संयुक्त प्रांत अर्थात हमारे वर्तमान उत्तर प्रदेश के लिए खेलने दिया गया।
ध्यान चंद गेंद के साथ
वास्तव में, ध्यानचंद जी के कार्यकाल से ही उत्तर प्रदेश में हॉकी खेल के लिए लोकप्रियता है। आज भी, हमारे राज्य में ऐसी कई पहले हैं, जिनसे इस खेल के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ पाए। उदाहरण के तौर पर, के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम, पहली बार 1957 में हमारे शहर लखनऊ के हलचल भरे हजरतगंज के ठीक मध्य में खोला गया था। इसका नाम महान हॉकी खिलाड़ी - बाबू के. डी. सिंह के नाम पर रखा गया है, जिनका जन्म लखनऊ में हुआ था। यह भारत के सबसे पुराने बहुउद्देशीय स्टेडियमों में से एक है। के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम में क्रिकेट, टेनिस, फुटबॉल और हॉकी सहित कई अलग-अलग खेल खेले जाते हैं। इस स्थल ने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय हॉकी मैचों की मेजबानी की है।
जरूर जानें, अलेक्जेंड्रिया के महान पुस्तकालय ने कैसे रखी प्राचीन विश्व में ज्ञान की नींव?
आज, हम पढ़ेंगे कि सिकंदर (Alexander the Great) कौन था, और वैश्विक इतिहास को आकार देने में उनकी क्या भूमिका थी। फिर, हम पता लगाएंगे कि उन्होंने ज्ञान और संस्कृति के केंद्र के रूप में, अलेक्जेंड्रिया (Alexandria) शहर की स्थापना कैसे की। लेख में आगे, हम देखेंगे कि अलेक्जेंड्रिया कैसे एशिया, यूरोप और अफ्रीका का मिलन स्थल और व्यापार केंद्र था। फिर हम अलेक्जेंड्रिया के महान पुस्तकालय पर गौर करेंगे। इसके पश्चात, हम पता लगाएंगे कि सिकंदर की मृत्यु के बाद, पुस्तकालय के केंद्रीकृत ज्ञान का महत्व कैसे कम होने लगा। जबकि अंत में हम देखेंगे कि, आज अलेक्जेंड्रिया के पुस्तकालय की क्या विरासत बची है।
सिकंदर का जन्म, जुलाई 356 ईसा पूर्व में मैसीडोनिया (Macedonia) की प्राचीन राजधानी पेला (Pella) में हुआ था। उनके माता-पिता मैसीडोन के फिलिप द्वितीय (Philip II) और उनकी पत्नी - ओलंपियास (Olympias) थे। सिकंदर ने, प्रसिद्ध दार्शनिक एरिस्टोटल (Aristotle) से शिक्षा प्राप्त की थी। 336 ईसा पूर्व में फिलिप द्वितीय की हत्या हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप, सिकंदर को उनका शक्तिशाली लेकिन अस्थिर राज्य विरासत में मिला। तब, उसने अपने घर में ही मौजूद दुश्मनों से निपटकर, ग्रीस में मैसीडोनियन शक्ति को फिर से स्थापित किया। इसके पश्चात, वह विशाल फ़ारसी साम्राज्य को जीतने के लिए निकल पड़ा।
इस मुहिम में आई बाधाओं के बावजूद, सिकंदर कभी नहीं हारा। उन्होंने अपनी सेना को एशिया, सीरिया और मिस्र के फ़ारसी क्षेत्रों में जीत दिलाई। उनकी सबसे बड़ी जीत 331 ईसा पूर्व में गौगामेला (Gaugamela) की लड़ाई में थी, जो अब उत्तरी इराक है। इस प्रकार, वह केवल 25 वर्ष की आयु में ही फारस का 'महान राजा' बन गया। अगले आठ वर्षों में, राजा, सेनापति, राजनीतिज्ञ, विद्वान और खोजकर्ता के रूप में सिकंदर ने अपनी सेना को 11,000 मील आगे बढ़ाया, 70 से अधिक शहरों की स्थापना की। इस प्रकार उसने एक ऐसा साम्राज्य बनाया, जो तीन महाद्वीपों तक फैला हुआ था।
इसी साम्राज्य में उत्तरी मिस्र में, भूमध्य सागर पर ‘अलेक्जेंड्रिया’ नामक एक बंदरगाह शहर बसा है, जिसकी स्थापना सिकंदर ने 331 ईसा पूर्व में की थी। सीरिया पर विजय प्राप्त करने के बाद, सिकंदर अपनी सेना के साथ मिस्र में गया। तब उसने ग्रीक के एक महत्वपूर्ण व्यापार केंद्र – नौक्रैटिस (Naucratis) से बेहतर वाणिज्यिक केंद्र बनाने के इरादे से अलेक्जेंड्रिया की स्थापना की थी। उसने अपनी इच्छा अनुसार, शहर का बुनियादी डिजाइन तैयार किया था। ग्रिड पैटर्न में आटा या अनाज डालकर इस शहर की योजना तैयार की गई थी, जिसे बाद में उनके वास्तुकार ने अपनाया था। यह प्राचीन दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक - फ़ारोस (Pharos), और अलेक्जेंड्रिया के पौराणिक पुस्तकालय का स्थल था। एक समय में, यह प्राचीन दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र भी था।
अलेक्जेंड्रिया
सिकंदर के आगमन के बाद, यह शहर एक छोटे बंदरगाह से विकसित हुआ। बाद में, इस शहर को टॉलेमिक राजवंश (Ptolemaic Dynasty) (323-30 ईसा पूर्व) के तहत एक बौद्धिक, सांस्कृतिक और वाणिज्यिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। बाद में, यह प्रारंभिक ईसाई धर्म के केंद्र के रूप में भी प्रसिद्ध हो गया।
अलेक्जेंड्रिया की सबसे उल्लेखनीय चीजों में से एक इसका पुस्तकालय था। यह ज्ञान के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण था। दरअसल, माउसियन (Mouseion), उच्च शिक्षा का एक संस्थान था, जो अलेक्जेंड्रिया के पुस्तकालय का हिस्सा था। यह ज्ञान की देवियों - म्यूज़ेस (Muses) को समर्पित था और संभवतः टॉलेमी द्वितीय (Ptolemy II – 282-246 ईसा पूर्व) द्वारा स्थापित किया गया था। यह विद्वानों के लिए एक सभा स्थल और घर के रूप में भी कार्य करता था, जिनके कार्यों ने इस पुस्तकालय की स्थापना में योगदान दिया था।
331 ईसा पूर्व में, अलेक्जेंड्रिया समुद्र और नील नदी के बीच अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण, भूमध्य सागर का सबसे बड़ा व्यापार केंद्र बन गया। इसमें भव्य बंदरगाह (Port / Portus), सैन्य बेड़े के लिए पोर्टस मैग्नस (Portus Magnus) और नहरों, महलों और बाजारों के साथ-साथ वाणिज्य के लिए पोर्टस यूनोस्टस (Portus Eunostus) शामिल थे। अलेक्जेंड्रिया शहर समुद्री व्यापार के कारण विकसित हुआ। यहां से मिस्र के अनाज, पैपीरस (Papyrus) और कांच का निर्यात होता था , जबकि, ग्रीस और रोम से विलासिता की वस्तुओं का आयात होता था। नील नदी और कारवां मार्गों ने इसे अंतर्देशीय मिस्र, अरब, भारत और पूर्वी अफ्रीका से जोड़ा, जिससे मसालों, धूप बत्ती और वस्त्रों के आदान-प्रदान की सुविधा हुई। टॉलेमिक शासन के तहत, राज्य ने प्रमुख उद्योगों (विशेषकर गेहूं) को नियंत्रित किया था। साथ ही, महानगरीय बाजारों और उन्नत बंदरगाह सुविधाओं ने प्राचीन दुनिया के सबसे प्रभावशाली वाणिज्यिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में इसकी भूमिका को मजबूत किया।
अलेक्जेंड्रिया का पुस्तकालय, वास्तव में प्राचीन दुनिया का एक आश्चर्य था, तथा ज्ञान और सीखने की शक्ति का प्रमाण भी था। इसमें पुस्तकों, पांडुलिपियों, स्क्रॉल और मानचित्रों का एक विशाल संग्रह था, जो इसे प्राचीन दुनिया के सबसे बड़े और व्यापक पुस्तकालयों में से एक बनाता है। कहा जाता है कि, इसमें 7 लाख से अधिक स्क्रॉल शामिल थे, जिनमें साहित्य, विज्ञान, दर्शन और अन्य विषयों के कार्य शामिल थे। इन स्क्रॉल की मदद से ही प्राचीन यूनानी, दुनिया के ज्ञान और अंतर्दृष्टि से वाकिब हुए। इसके अतिरिक्त, इस पुस्तकालय में मानचित्रों का एक बड़ा संग्रह था, जिनका नाविकों और व्यापारियों द्वारा भूमध्य सागर में नौचालन करने हेतु उपयोग किया जाता था। यह पुस्तकालय प्राचीन यूनानियों के लिए अत्यधिक गर्व और प्रशंसा का भी स्रोत था, और इसकी विरासत सदियों से कायम है।
अलेक्जेंड्रिया का प्राचीन पुस्तकालय
टॉलेमी द्वितीय के शासनकाल के दौरान, अलेक्जेंड्रिया के पुस्तकालय ने दुनिया में ज्ञान का सर्वोच्च केंद्र बनने के लिए, एक क्रांतिकारी नीति लागू की। शाही आदेश के अनुसार, शहर के बंदरगाह पर उतरने वाले प्रत्येक जहाज की पुस्तकों और स्क्रॉल के लिए अनिवार्य खोज की जाती थी। किसी भी पांडुलिपि को तुरंत जब्त कर लिया जाता था, और निरीक्षण के लिए पुस्तकालय में भेजा जाता था। इस अधिग्रहण रणनीति ने इस पुस्तकालय को भूमध्य सागर के बौद्धिक उत्पादन के लिए एक विशाल भंडार में बदल दिया। एक बार जब कोई किताब जब्त कर ली जाती थी, तो पुस्तकालय के लेखक इसकी एक हस्तलिखित प्रति तैयार करते थे। इसके बाद, पुस्तकालय में मूल पांडुलिपि रखी जाती थी, जबकि, उसकी प्रति जहाज के मालिक को लौटाई जाती थी।
सिकंदर की मृत्यु के बाद, टॉलेमी तृतीय के शासनकाल से लेकर क्लियोपेट्रा सप्तम (Cleopatra VII) के शासनकाल तक, अलेक्जेंड्रिया के पतन को राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों द्वारा चिह्नित किया गया था। इसी कारण, अंततः टॉलेमिक राजवंश का अंत हुआ। इस अवधि के दौरान, इस शहर ने अपना पूर्व गौरव खो दिया। लगातार उत्तराधिकार विवादों और नागरिक अशांति से राज्य की राजनीतिक स्थिरता भी कमजोर हो गई थी। महंगे सैन्य अभियान, भव्य शाही व्यय और खराब संसाधन प्रबंधन ने राज्य के वित्त पर भी दबाव डाला, जिसके परिणामस्वरूप कराधान में वृद्धि हुई, और जनता में असंतोष हुआ। इसके पुस्तकालय का पतन भी, इतिहास के दुखद और गर्म बहस वाले रहस्यों में से एक बना हुआ है।
अलेक्जेंड्रिया का यह पुस्तकालय आज सही सलामत नहीं है। लेकिन इसके खंडहरों में भी, सहस्राब्दियों तक इसका प्रभाव गूंजता है। इस पुस्तकालय ने इस बात को आकार दिया कि, समाज किस प्रकार शिक्षा, अनुसंधान और सांस्कृतिक संरक्षण को महत्व देता है। यहां बनाए गए नवीन बिब्लियोथेका अलेक्जेंड्रिना (Bibliotheca Alexandrina) पुस्तकालय में संग्रहालय, गैलरी और अनुसंधान केंद्र शामिल हैं।
जबकि, अलेक्जेंड्रिया के मूल पुस्तकालय का कोई निश्चित खंडहर नहीं मिला है, पुरातत्वविदों ने माउसियन परिसर के कुछ हिस्सों, प्राचीन व्याख्यान कक्षों और भूमिगत कमरों का पता लगाया है। माना जाता है कि, वे भंडारण सुविधाएं या उपभवन थे। इस उत्खनन से हेलेनिस्टिक वास्तुकला (Hellenistic architecture) और कलाकृतियों का पता चलता है, जो अलेक्जेंड्रिया के इस उत्खनन से हेलेनिस्टिक वास्तुकला (Hellenistic architecture) और कलाकृतियों का पता चलता है, जो अलेक्जेंड्रिया के प्रज्वलित और ज्ञान पर आधारित अतीत का संकेत देते हैं।
भारी कर्ज के बावजूद संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका का दबदबा क्यों?
दुनिया भर में शांति बनाए रखने का दावा करने वाले संयुक्त राष्ट्र को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि अमेरिका इसका सबसे बड़ा ख़र्च क्यों उठाता है। आम तौर पर लोगों को लगता है कि बाइस प्रतिशत का भारी भरकम बजट देकर अमेरिका शायद कोई घाटे का सौदा कर रहा है। लेकिन असलियत इसके बिल्कुल उलट है। अकेले न्यूयॉर्क शहर को संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय की मेज़बानी करने से हर साल लगभग तीन अरब अड़सठ करोड़ डॉलर का सीधा आर्थिक फ़ायदा होता है और पंद्रह हज़ार से ज़्यादा लोगों को रोज़गार मिलता है। सिर्फ़ पैसा ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे ताक़तवर कूटनीतिक मंच के अपने देश में होने से अमेरिका को ख़ुफ़िया जानकारी और वैश्विक राजनीति पर ऐसा नियंत्रण मिलता है जिसे किसी भी क़ीमत पर ख़रीदा नहीं जा सकता। दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की राख से निकालकर आज के आधुनिक दौर तक पहुँचाने वाली इस विशाल संस्था का इतिहास, इसकी ताक़त और इसकी कमज़ोरियों को समझना आज के दौर में बेहद ज़रूरी है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र का गठन क्यों हुआ? बीसवीं सदी में दुनिया ने दो भयानक महायुद्ध देखे थे। पहले विश्व युद्ध के बाद शांति बनाए रखने के लिए साल 1919 में लीग ऑफ नेशंस नाम की संस्था बनाई गई थी। लेकिन यह संस्था दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की आग में जलने से नहीं रोक सकी और साल 1946 में इसे भंग कर दिया गया। इसी विफलता से सबक लेते हुए दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने एक नया और ज़्यादा मज़बूत वैश्विक संगठन बनाने का फ़ैसला किया। इसकी पहली सुगबुगाहट अगस्त 1941 में तब हुई जब अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूज़वेल्ट और ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने अटलांटिक चार्टर पर हस्ताक्षर किए। बाद में डंबार्टन ओक्स और याल्टा सम्मेलनों में अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ के नेताओं ने इसकी रूपरेखा तैयार की। आख़िरकार 25 अप्रैल 1945 को सैन फ्रांसिस्को में दुनिया भर के पचास देशों के प्रतिनिधि जमा हुए। पोलैंड जो इस सम्मेलन में नहीं आ सका था, उसे भी बाद में संस्थापक सदस्य के रूप में शामिल किया गया। इस तरह 24 अक्टूबर 1945 को इक्यावन संस्थापक देशों के साथ संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक तौर पर स्थापना हुई। इसका मुख्य मक़सद आने वाली पीढ़ियों को युद्ध के ख़तरे से बचाना, मानवाधिकारों की रक्षा करना और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का पालन सुनिश्चित करना है।
सुरक्षा परिषद कैसे काम करती है और यह वीटो पावर क्या है? संयुक्त राष्ट्र के भीतर सबसे ताक़तवर हिस्सा उसकी सुरक्षा परिषद है। यही वह इकलौती संस्था है जो अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने के लिए सैन्य बल के इस्तेमाल की मंज़ूरी दे सकती है और इसके फ़ैसले सदस्य देशों पर क़ानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं। इस परिषद में कुल पंद्रह सदस्य होते हैं जिनमें से पाँच स्थायी सदस्य हैं और दस अस्थायी सदस्य होते हैं जिन्हें दो साल के लिए चुना जाता है। ये पाँच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन हैं। इन पाँचों देशों के पास एक बेहद ख़ास ताक़त है जिसे वीटो पावर कहा जाता है। किसी भी बड़े और ग़ैर-प्रक्रियागत फ़ैसले को पास करने के लिए पंद्रह में से नौ सदस्यों की हाँ ज़रूरी है, लेकिन इसके साथ ही यह भी ज़रूरी है कि पाँचों स्थायी सदस्यों में से कोई भी इसके ख़िलाफ़ वोट न करे। अगर एक भी स्थायी सदस्य न में वोट देता है तो वह प्रस्ताव रद्द हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र बनाते समय इन बड़े देशों को डर था कि कहीं बहुमत उनके ख़िलाफ़ न इस्तेमाल होने लगे। अगर इन्हें यह ताक़त न दी जाती तो ये देश इस संस्था में शामिल ही नहीं होते और पुरानी संस्था लीग ऑफ नेशंस की तरह यह भी नाकाम हो जाती। हालाँकि अब यह वीटो पावर एक बड़ी समस्या बन चुकी है। स्थायी सदस्य अक्सर अंतरराष्ट्रीय शांति के बजाय अपने आर्थिक और राजनीतिक फ़ायदों के लिए या अपने सहयोगी देशों को बचाने के लिए इस ताक़त का इस्तेमाल करते हैं। अगर कोई स्थायी देश किसी प्रस्ताव को रोकना नहीं चाहता लेकिन उसका समर्थन भी नहीं करना चाहता, तो वह वोटिंग में हिस्सा न लेने का विकल्प चुन सकता है।
सुरक्षा परिषद
भारत सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य क्यों नहीं है? भारत जैसे विशाल और प्रभावशाली देश का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य न होना आज के समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी बहस का विषय है। दुनिया भर के तमाम मंचों और रेडिट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के एशिया केंद्रित फ़ोरम पर यह सवाल लगातार उठता रहता है कि आख़िर भारत इसका स्थायी हिस्सा क्यों नहीं है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अब तक दुनिया काफ़ी बदल चुकी है लेकिन सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता आज भी उन्हीं पाँच देशों तक सीमित है। इस मुद्दे पर वैश्विक कूटनीति में लगातार चर्चा होती रहती है और भारत की दावेदारी को लेकर विभिन्न देशों और जानकारों के बीच एक लंबी बहस जारी है।
दुनिया के कितने देश संयुक्त राष्ट्र का हिस्सा हैं और कौन बाहर है? इस समय दुनिया भर के एक सौ पचानवे देश संयुक्त राष्ट्र के दायरे में गिने जाते हैं। इनमें से एक सौ तिरानवे देश इसके पूर्ण सदस्य हैं जबकि दो देशों को स्थायी ग़ैर-सदस्य पर्यवेक्षक का दर्जा मिला हुआ है। ये दो देश वेटिकन सिटी और फ़िलिस्तीन हैं। पर्यवेक्षक होने के नाते वे महासभा की बैठकों में हिस्सा ले सकते हैं लेकिन उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं है। वेटिकन सिटी दुनिया का इकलौता ऐसा आज़ाद देश है जिसने ख़ुद ही पूर्ण सदस्य बनने के लिए आवेदन नहीं किया क्योंकि वहां के सर्वोच्च धर्मगुरु पोप अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सीधा दख़ल नहीं देना चाहते। दूसरी तरफ़ फ़िलिस्तीन को एक सौ अड़तीस देशों ने संप्रभु राष्ट्र माना है लेकिन इज़रायल के साथ चल रहे विवाद के कारण अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश उसे पूर्ण सदस्य बनने से रोकते हैं। इनके अलावा ताइवान, कोसोवो और पश्चिमी सहारा जैसे कई इलाक़े हैं जो पूर्ण देश की मान्यता पाना चाहते हैं। ताइवान तो शुरुआत में संस्थापक सदस्य था लेकिन चीन में हुए गृह युद्ध के बाद जब वहाँ कम्युनिस्ट सरकार आई तो संयुक्त राष्ट्र ने पुरानी सरकार को निकालकर नई चीनी सरकार को मान्यता दे दी। अब चीन अपने वीटो की ताक़त से ताइवान को कभी सदस्य नहीं बनने देता। किसी भी नए देश को सदस्य बनने के लिए सुरक्षा परिषद के पाँचों स्थायी सदस्यों की सहमति और फिर महासभा में दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होती है।
संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों का मानचित्र
इस विशाल वैश्विक संस्था को पैसा कहाँ से मिलता है? संयुक्त राष्ट्र को चलाने का ज़्यादातर ख़र्च इसके एक सौ तिरानवे सदस्य देश उठाते हैं। संस्था के मुख्य रूप से दो बजट होते हैं जिनमें एक नियमित बजट है और दूसरा शांति स्थापना बजट है। हर देश को कितना पैसा देना है यह उसकी भुगतान क्षमता के आधार पर तय होता है। इसके लिए उस देश की कुल राष्ट्रीय आय, जनसंख्या और बाहरी कर्ज़ जैसे आँकड़े देखे जाते हैं। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है इसलिए वह सबसे ज़्यादा बाइस प्रतिशत पैसा देता है जो कि लगभग अस्सी करोड़ डॉलर से ज़्यादा बैठता है। इसके बाद चीन बीस प्रतिशत और जापान लगभग सात प्रतिशत का योगदान देते हैं। शांति स्थापना के काम में भी अमेरिका छब्बीस प्रतिशत से ज़्यादा का ख़र्च उठाता है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि कई देश समय पर पैसा नहीं चुकाते। इस साल के शुरुआती आँकड़ों के मुताबिक़ बानवे देशों ने अपना पूरा बकाया नहीं चुकाया है। अमेरिका पर ख़ुद डेढ़ अरब डॉलर का भारी बकाया है और चीन पर भी लगभग साठ करोड़ डॉलर का कर्ज़ है। अगर कोई देश लगातार दो साल तक अपना ज़रूरी बकाया नहीं चुकाता है तो संयुक्त राष्ट्र महासभा में उसका वोट देने का अधिकार छीना जा सकता है। अफ़ग़ानिस्तान और वेनेज़ुएला जैसे देशों को ऐसी ही कार्रवाई का सामना करना पड़ा है।
अमेरिका को अपने यहाँ मुख्यालय होने का क्या फ़ायदा मिलता है? साल 1946 में संयुक्त राष्ट्र ने अपने मुख्यालय के लिए अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर को चुना था। बहुत से अमेरिकियों को लगता है कि उनके देश का पैसा इस वैश्विक संस्था पर बेवज़ह ख़र्च हो रहा है और इसीलिए वहाँ की सरकार भी कई बार बजट में कटौती की बात करती है। लेकिन मुख्यालय का अमेरिका में होना उसके लिए एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो दुनिया के किसी और देश के पास नहीं है। हर साल होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में दुनिया भर के नेता और बड़े अधिकारी न्यूयॉर्क आते हैं। इन विदेशी प्रतिनिधियों के बच्चे अमेरिका में पढ़ाई करते हैं और छुट्टियाँ बिताते हैं जिससे अमेरिका का कूटनीतिक दबदबा बढ़ता है। साल 2009 में विकीलीक्स के दस्तावेज़ों से यह बात सामने आई थी कि यह मुख्यालय अमेरिका के लिए दुनिया भर की ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने का एक बहुत बड़ा केंद्र है। इसके अलावा वीज़ा जारी करने का अधिकार अमेरिका के पास है। वह कई बार इसका इस्तेमाल अपने राजनीतिक मक़सद के लिए करता है। हाल ही में अमेरिका ने फ़िलिस्तीन के प्रतिनिधिमंडल को वीज़ा न देने की धमकी दी थी। अगर अमेरिका अपने बजट में कटौती करता है या पीछे हटता है तो चीन जैसे देश इस ख़ाली जगह को भरने के लिए पूरी तरह तैयार बैठे हैं। जानकार मानते हैं कि अगर अमेरिका से यह संस्था किसी और देश में चली गई तो अमेरिका दुनिया के एजेंडे को तय करने की अपनी सबसे बड़ी ताक़त खो देगा।
भागवत पुराण में कैसे पनपी इंद्रप्रस्थ नगरी श्रो कृष्ण के भक्ति रस में
क्या आप जानते हैं कि प्राचीन भारतीय इतिहास और ज्ञान के सबसे बड़े विश्वकोशों में से एक, भागवत पुराण, मूल रूप से 18 हज़ार श्लोकों और 332 अध्यायों में लिखा गया था जो बारह स्कंधों में विभाजित है। यह महज़ एक धार्मिक किताब नहीं है, बल्कि यह समय की गणना से लेकर मानव जीवन की उत्पत्ति, भ्रूण के विकास और ब्रह्मांड के विनाश तक के रहस्यों को खोलता है। हिंदू धार्मिक परंपरा के अनुसार कलियुग की शुरुआत में महर्षि व्यास द्वारा रचित यह ग्रंथ मुख्य रूप से परमेश्वर के प्रति अगाध प्रेम पर केंद्रित है। जब पांडव वंशी राजा परीक्षित को एक ब्राह्मण ने सात दिन में मृत्यु का श्राप दिया था, तब उन्होंने अपना राज-पाट छोड़कर जीवन का असली लक्ष्य खोजने का निश्चय किया। उसी समय उनकी भेंट महान संत शुकदेव गोस्वामी से हुई, जिन्होंने लगातार सात दिनों तक बिना खाए-पिए राजा परीक्षित को यही भागवत पुराण सुनाया था ताकि उन्हें मोक्ष मिल सके। इसी पवित्र ग्रंथ में हम देखते हैं कि कैसे भगवान कृष्ण पांडवों का मार्गदर्शन करते हैं और इंद्रप्रस्थ जैसी भव्य राजधानी की स्थापना से लेकर उनके जीवन की कई अहम घटनाओं में अपनी भूमिका निभाते हैं।
भागवत पुराण में जीवन, मृत्यु और परम भक्ति का क्या रहस्य छिपा है? भागवत पुराण अठारह महापुराणों में से एक है जिसे वैदिक ज्ञान का सबसे प्रामाणिक स्रोत माना जाता है। यह ग्रंथ आत्मा की प्रकृति से लेकर ब्रह्मांड की उत्पत्ति तक ज्ञान के सभी क्षेत्रों को छूता है। यह जीवन क्या है, मृत्यु और जन्म का चक्र क्या है, और ईश्वर व मनुष्य के बीच क्या संबंध है, जैसे मूलभूत सवालों के जवाब देता है। हिंदू धर्म में जीवन के चार मुख्य पहलू माने गए हैं— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। भागवत पुराण इन चारों के अलावा एक पाँचवाँ तत्व भी जोड़ता है, और वह है ईश्वरीय सेवा या परम भक्ति। इसका दसवाँ स्कंध सबसे अधिक प्रसिद्ध है, जिसमें वृंदावन में कृष्ण के बचपन की लीलाओं का विस्तार से वर्णन है। इसमें कृष्ण को केवल एक मार्गदर्शक के रूप में नहीं, बल्कि एक शूरवीर बालक के रूप में दिखाया गया है, जो राक्षसों से गाँव वालों की रक्षा करता है। वृंदावन की गोपियों का कृष्ण के प्रति जो अगाध और तीव्र प्रेम था, उसे ही बाद में भक्ति योग के रूप में जाना गया। जब कृष्ण मथुरा चले जाते हैं, तो गोपियाँ दुख से भर जाती हैं और उनका यही वियोग सर्वोच्च भगवान के प्रति चरम भक्ति का एक आदर्श प्रस्तुत करता है।
भगवत पुराण का दसवां खंड
बंजर खांडवप्रस्थ कैसे बना भव्य और दिव्य इंद्रप्रस्थ? भागवत पुराण और महाभारत की कथाओं में इंद्रप्रस्थ को एक ऐसी जगह के रूप में दर्शाया गया है जहाँ पांडवों के जीवन की कई ऐतिहासिक घटनाएँ घटीं। जब कौरवों और पांडवों के बीच राज्य का बँटवारा हुआ, तो युधिष्ठिर ने खांडवप्रस्थ का बंजर और वीरान जंगल अपने हिस्से में लिया ताकि कोई और विवाद न हो। यह यमुना नदी के पश्चिमी तट पर स्थित एक बंजर भूमि थी, जिसके चारों ओर प्राचीन खांडव वन था। इस वन की रक्षा देवराज इंद्र करते थे और यहाँ नागों के राजा तक्षक का राज था। इंद्र ने यह सुनिश्चित किया था कि इस क्षेत्र में बारिश न हो और यह भूमि बंजर ही रहे ताकि इंसान यहाँ बस न सकें। एक दिन अग्नि देव एक कमज़ोर ब्राह्मण का रूप धारण करके कृष्ण और अर्जुन के पास आए। उन्होंने बताया कि बारह साल तक चले एक यज्ञ में लगातार घी पीने के कारण उन्हें अपच हो गई है और इसका इलाज केवल खांडव वन के जीवों की चर्बी खाने से ही हो सकता है। अग्नि देव ने भगवान विश्वकर्मा द्वारा बनाए गए दिव्य अस्त्र कृष्ण और अर्जुन को दिए। अर्जुन को प्रसिद्ध कपिध्वज रथ और गांडीव धनुष मिला, जबकि कृष्ण को अजेय सुदर्शन चक्र और कौमोदकी गदा प्राप्त हुई।
खंडवा वन का दहन, बंतेय श्री मंदिर, 10वीं शताब्दी, अंगकोर, कंबोडिया
देवराज इंद्र के तूफ़ान को अर्जुन और कृष्ण ने कैसे रोका? जब अस्त्रों से सुसज्जित होकर कृष्ण और अर्जुन ने खांडव वन को जलाना शुरू किया, तो देवराज इंद्र अपने पूरे दल-बल के साथ इसे बचाने आ पहुँचे। इंद्र ने अपने विशाल ऐरावत हाथी पर सवार होकर तूफ़ानी बारिश शुरू कर दी ताकि आग बुझाई जा सके। तब अर्जुन ने अपने अतुलनीय तीरंदाज़ी कौशल का प्रदर्शन करते हुए आसमान में तीरों की एक ऐसी छत या चंदवा बना दिया जिससे बारिश की बूँदें ज़मीन तक पहुँच ही नहीं पाईं। खमेर कला और कंबोडिया के मंदिरों की मूर्तियों में इस दृश्य को बहुत ही बारीकी से उकेरा गया है जहाँ दिखाया गया है कि तीरों की उस छत को हंसों की एक कतार ने सँभाल रखा है, जबकि नीचे नाग, शेर, हाथी और अन्य जानवर आग से बचने की कोशिश कर रहे हैं। इसी विनाश के बीच, अग्नि देव की कृपा से मंडपाल ऋषि की पत्नी जरिता और उनके चार बेटों को बचा लिया गया, जिनके नाम जरितारि, सारिसृक्क, स्तंबमित्र और द्रोण थे। इस पूरे प्रलय के बीच अर्जुन ने मयासुर नाम के एक महान असुर वास्तुकार की जान बख्श दी। मयासुर ने अपने प्राण बचाने के बदले में पांडवों के लिए एक ऐसा अद्भुत और भव्य नगर बसाया जिसकी सुंदरता के आगे स्वर्ग भी फीका पड़ जाए। देवराज इंद्र के सम्मान में इस भव्य नगर का नाम इंद्रप्रस्थ रखा गया।
राजसूय यज्ञ में भगवान कृष्ण ने शिशुपाल का वध क्यों किया? इंद्रप्रस्थ के भव्य निर्माण के बाद, पांडवों ने वहां एक विशाल राजसूय यज्ञ का आयोजन किया। जरासंध के मारे जाने के बाद, भगवान कृष्ण और बलराम इस यज्ञ में शामिल होने के लिए मयासुर द्वारा निर्मित इस नई राजधानी में पधारे। यज्ञ के समापन समारोह में जब सबसे सम्मानित व्यक्ति को चुनने की बात आई, तो पांडवों में सबसे छोटे भाई सहदेव ने कृष्ण का नाम प्रस्तावित किया। इस पर जरासंध के पुराने सहयोगी राजा शिशुपाल ने कड़ी आपत्ति जताई। शिशुपाल कृष्ण की बुआ श्रुतदेवी का पुत्र था और जब उसका जन्म हुआ था, तब वह बहुत काला और बदसूरत था, और उसकी तीन आँखें व चार हाथ थे। उस समय एक आकाशवाणी हुई थी कि एक महान व्यक्ति इसे अपनी गोद में लेगा और इसके अतिरिक्त अंग गिर जाएंगे, और अंततः वही व्यक्ति इसका वध भी करेगा। बुआ श्रुतदेवी के अनुरोध पर कृष्ण ने वचन दिया था कि वह शिशुपाल की सौ गालियां माफ़ करेंगे। राजसूय यज्ञ में शिशुपाल ने कृष्ण को धोखेबाज़, स्त्रियों के पीछे भागने वाला और भगोड़ा कहते हुए सारी मर्यादाएँ लांघ दीं। जब शिशुपाल ने अपनी गालियों की गिनती पूरी कर ली, तो भगवान कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल की गर्दन काट दी।
शिशुपाल के वध के बाद कृष्ण ने इंद्रप्रस्थ क्यों छोड़ा? राजसूय यज्ञ के सफलतापूर्वक संपन्न होने और शिशुपाल के मारे जाने के पश्चात की घटनाओं का वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के दसवें स्कंध (अध्याय 77, श्लोक 6-7) में स्पष्ट रूप से किया गया है।
इन्द्रप्रस्थं गतः कृष्ण आहुतो धर्मसूनुना ।
राजसूयेऽथ निवृत्ते शिशुपाले च संस्थिते ॥ ६ ॥
कुरुवृद्धाननुज्ञाप्य मुनींश्च ससुतां पृथाम् ।
निमित्तान्यतिघोराणि पश्यन् द्वारवतीं ययौ ॥७॥
इस श्लोक का अर्थ यह है कि धर्मपुत्र युधिष्ठिर के आमंत्रित करने पर भगवान कृष्ण इंद्रप्रस्थ गए थे। राजसूय यज्ञ के संपन्न होने और शिशुपाल के मारे जाने के बाद, भगवान को बहुत ही अशुभ संकेत दिखाई देने लगे। अतः उन्होंने कुरु वंश के बुजुर्गों, महान ऋषियों, पृथा और उनके पुत्रों से अनुमति ली और द्वारका लौट गए। उनके जाने के बाद ही कौरवों के मन में पांडवों की समृद्धि और प्रसिद्धि को लेकर गहरी ईर्ष्या पैदा हुई। यह जलन तब और भड़क गई जब दुर्योधन भ्रमवश इंद्रप्रस्थ के एक पानी से भरे तालाब में गिर पड़ा और द्रौपदी ज़ोर से हँस पड़ीं। इन्हीं घटनाओं ने महाभारत के उस विनाशकारी युद्ध की नींव रखी।
द्वारका में यदुवंश का विनाश कैसे शुरू हुआ? भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कंध के तीसवें अध्याय में यदुवंश के पतन की हृदय विदारक कथा है। आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष में बहुत भयानक और अशुभ संकेत देखने के बाद भगवान कृष्ण ने यदुवंशियों को सुधर्मा सभा में संबोधित किया। उन्होंने कहा कि द्वारका में अब एक पल भी रुकना सुरक्षित नहीं है। कृष्ण के निर्देश पर महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को शंखोद्धार भेज दिया गया, जबकि बाक़ी शूरवीर प्रभास क्षेत्र की ओर निकल पड़े जहाँ सरस्वती नदी पश्चिम की ओर बहती है। प्रभास पहुँचकर यदुवंशियों ने खूब मीठी शराब पी, जिससे उनकी बुद्धि पूरी तरह भ्रष्ट हो गई। अत्यधिक शराब के नशे में चूर होकर वे अहंकारी हो गए और आपस में भयानक रूप से लड़ने लगे। उन्होंने धनुष, तलवार, भाले और गदा जैसे हथियारों से एक-दूसरे पर जानलेवा हमले किए। प्रद्युम्न सांब से भिड़ गया, और अक्रूर भोज से लड़ने लगा। जब उनके पास तीर और हथियार खत्म हो गए, तो उन्होंने समुद्र तट पर उगी नरकट नाम की घास को उखाड़ लिया। ब्राह्मणों के पुराने श्राप के कारण वह घास उनके हाथों में आते ही वज्र जैसी मज़बूत लोहे की छड़ों में बदल गई। अपनी सुध-बुध खो चुके यदुवंशियों ने एक-दूसरे को बेरहमी से मारना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि जब कृष्ण ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो उन्होंने बलराम और कृष्ण पर भी हमला कर दिया, जिसके बाद वे दोनों भी इस भयंकर लड़ाई में शामिल हो गए। इस तरह ब्राह्मणों के श्राप और कृष्ण की माया के प्रभाव में आकर यदुवंश जलते हुए बाँस के जंगल की तरह राख हो गया।
भगवत पुराण, खंड 11
भगवान कृष्ण ने अपना शरीर कैसे त्यागा और इंद्रप्रस्थ फिर से शरणस्थली कैसे बना? अपने पूरे वंश को नष्ट होता देख, बलराम ने समुद्र के किनारे ध्यान लगाया और अपने आप को स्वयं में विलीन करके मानव दुनिया को त्याग दिया। बलराम के जाने के बाद भगवान कृष्ण एक पीपल के पेड़ के नीचे जाकर शांति से बैठ गए। उनका दायां पैर, जिसका तलवा लाल कमल के समान था, उनकी जांघ पर रखा हुआ था और वह बिल्कुल एक हिरण के चेहरे जैसा लग रहा था। उसी समय ज़रा नाम के एक शिकारी ने उसे हिरण समझकर तीर मार दिया। यह तीर उसी लोहे के टुकड़े से बना था जो ब्राह्मणों द्वारा श्रापित और नष्ट की गई गदा से बचा हुआ था। जब शिकारी ने पास आकर चतुर्भुज रूप देखा तो अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। कृष्ण ने उसे बताया कि उसे डरने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह सब उन्हीं की इच्छा से हुआ है। इसके बाद कृष्ण का सारथी दारुक वहाँ पहुँचा और उनके चरणों में गिर पड़ा। कृष्ण ने दारुक को आदेश दिया कि वह तुरंत द्वारका जाए और बचे हुए परिवार वालों को इस आपसी विनाश की ख़बर दे। कृष्ण ने कहा कि वे सभी द्वारका छोड़ दें क्योंकि अब यह नगरी समुद्र में डूब जाएगी। कृष्ण ने निर्देश दिया कि सभी लोग अपने परिवारों को लेकर अर्जुन के संरक्षण में इंद्रप्रस्थ चले जाएं। इंद्रप्रस्थ उस अराजकता और संकट के समय महिलाओं और कमज़ोरों के लिए एक सुरक्षित शरणस्थली बना। अर्जुन ने वहाँ पहुँचकर कृष्ण के पोते वज्र को इंद्रप्रस्थ के सिंहासन पर बैठाया, जिसने पांडवों के प्रस्थान के बाद भी वहाँ राज किया।
ब्लू नवाब तितली का अद्भुत सफर इल्ली से रंगीन उड़ान तक
ब्लू नवाब तितली (Blue Nawab butterfly ) भारत की सबसे सुंदर और दुर्लभ तितलियों में से एक मानी जाती है। यह मुख्य रूप से पश्चिमी घाट, असम और पश्चिम बंगाल के घने जंगलों में दिखाई देती है। इसकी सबसे रोचक बात इसका जीवन चक्र है, जिसमें एक छोटा सा अंडा धीरे धीरे रंगीन तितली में बदल जाता है।
मादा तितली पत्तियों पर अंडे देती है। लगभग चार दिनों बाद इनमें से छोटी इल्लियाँ निकलती हैं, जो सबसे पहले अपने अंडे के खोल को ही खा जाती हैं। शुरुआत में उनका रंग सुनहरा भूरा होता है, लेकिन कुछ ही दिनों में वे हरी हो जाती हैं ताकि पत्तियों के बीच आसानी से छिप सकें। ये इल्लियाँ पत्तियों को खाकर तेजी से बढ़ती हैं और बढ़ने के साथ कई बार अपनी त्वचा बदलती हैं।
कुछ समय बाद इल्ली रेशम जैसा सहारा बनाकर प्यूपा में बदल जाती है। यह अवस्था लगभग दस से ग्यारह दिनों तक रहती है। फिर एक दिन प्यूपा का खोल टूटता है और उसमें से एक सुंदर ब्लू नवाब तितली बाहर निकलती है। अपने पंख फैलाकर सूखाने के बाद यह पहली बार उड़ान भरती है। यह पूरा रूपांतरण प्रकृति के सबसे अद्भुत परिवर्तनों में से एक माना जाता है।
भूमि और मिट्टी के प्रकार : कृषि योग्य, बंजर, मैदान
19-05-2026 10:18 AM • Lucknow-Hindi
हमारे कृषि प्रधान राज्य में, उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के खिलाफ क्या हो सकते हैं समाधान?
चलिए, आज समझते हैं कि ‘उर्वरक’ क्या हैं, और कृषि में उनकी क्या भूमिका है। फिर, हम देखेंगे कि उनका उत्पादन तेल और गैस उद्योग से कैसे जुड़ा है। लेख में आगे, हम पता लगाएंगे कि वैश्विक तेल संकट के दौरान उर्वरकों की कीमतें क्यों बढ़ती हैं। जबकि, अंत में हम टिकाऊ उर्वरक विकल्पों और नई प्रौद्योगिकियों की जांच करेंगे, जो जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता को कम करती हैं।
हमारे भारतवर्ष में, मिट्टी के प्रकार और मौसम की स्थिति के आधार पर विविध फसलों की खेती की जाती है। पिछले कुछ वर्षों में विविध फसल पैटर्न और पोषक तत्वों की बढ़ती मांग के कारण, खेती में उर्वरकों के इस्तेमाल में काफी वृद्धि हुई है। प्रत्येक फसल के स्वस्थ विकास के लिए उर्वरक की आवश्यकता होती है, क्योंकि यह उन्हें आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है।
दरअसल, ‘उर्वरक’ वे कार्बनिक या अकार्बनिक पदार्थ होते हैं, जो फसलों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं। आम तौर पर, वे दानेदार या तरल होते हैं। अधिकांश उर्वरकों में तीन प्राथमिक मैक्रोन्यूट्रिएंट्स (Macronutrients) होते हैं: नाइट्रोजन (Nitrogen), फास्फोरस (Phosphorus), और पोटेशियम (Potassium)। इन्हें आमतौर पर एनपीके (NPK) उर्वरक के रूप में जाना जाता है। ये पोषक तत्व पौधों की वृद्धि और विकास में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
जब फसलें बढ़ती हैं, तो वे मिट्टी से पोषक तत्व अवशोषित करती हैं। समय के साथ, मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, और मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है। उर्वरक इन पोषक तत्वों को प्रदान करने में मदद करते हैं। इसलिए पौधों को वे पोषक तत्व मिलते हैं, जो मिट्टी अकेले प्रदान नहीं कर सकती।
भारतीय फसलों में, उर्वरक ‘वृद्धि वर्धक’ के रूप में कार्य करते हैं। ऊर्वरकों से प्राप्त पोषक तत्व जड़ों की मदद से पौधे के सभी भागों में जाते हैं। तब, पोटेशियम पौधे के तने को मजबूत करता है, और अनाज की गुणवत्ता में सुधार करता है। नाइट्रोजन पत्तियों को हरा-भरा बनाता है, और जीवंत रखता है। जबकि, फॉस्फोरस मजबूत जड़ विकास को बढ़ावा देता है। आम तौर पर, ये तत्व पौधों के चयापचय कार्यों को बेहतर बनाने और तेज विकास को बढ़ावा देने के लिए मिलकर काम करते हैं।
नाइट्रोजन उर्वरक, वैश्विक कृषि उत्पादकता की रीढ़ बने हुए हैं, और यूरिया (Urea) उनमें से सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला नाइट्रोजन उर्वरक है। लगभग 46 % नाइट्रोजन सामग्री के साथ, यूरिया गेहूं, चावल, मक्का और कई बागवानी फसलों को नाइट्रोजन की आपूर्ति करता है। हालांकि, प्रत्येक टन यूरिया के पीछे एक अत्यधिक ऊर्जा-गहन औद्योगिक प्रक्रिया निहित है। यूरिया का उत्पादन काफी हद तक प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है। प्राकृतिक गैस,यूरिया उत्पादन में रासायनिक सामग्री और ऊर्जा स्रोत के रूप में कार्य करता है। जिन देशों में देशज गैस उत्पादन सीमित है, वहां उर्वरक विनिर्माण को बनाए रखने के लिए तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी - LNG) आवश्यक हो जाती है। प्राकृतिक गैस और उर्वरकों के बीच इस संबंध का मतलब है कि, वैश्विक ऊर्जा बाजार हमेशा ही उर्वरक उपलब्धता, उत्पादन लागत और अंततः खाद्य सुरक्षा को सीधे प्रभावित करते हैं।
यूरिया का उत्पादन अमोनिया (Ammonia) के निर्माण से शुरू होता है, जो सभी नाइट्रोजन उर्वरकों का मूलभूत निर्माण घटक है। अमोनिया का उत्पादन, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन का उपयोग करके किया जाता है। नाइट्रोजन हवा से आसानी से उपलब्ध होता है, लेकिन हाइड्रोजन का उत्पादन औद्योगिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है।
आधुनिक उर्वरक संयंत्रों में हाइड्रोजन, मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस से निकाला जाता है, क्योंकि उसमें मुख्य रूप से मीथेन (CH₄) गैस होता है। उत्पादन के पहले चरण में, प्राकृतिक गैस की लगभग 800-900 डिग्री सेल्सियस पर भाप के साथ प्रक्रिया की जाती है। इस प्रक्रिया में हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड (Carbon monoxide) उत्पन्न होते हैं। फिर कार्बन मोनोऑक्साइड को एक अन्य प्रतिक्रिया के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित किया जाता है। इस प्रक्रिया में फिर से अतिरिक्त हाइड्रोजन उत्पन्न होता है।
एक बार हाइड्रोजन का उत्पादन होने के बाद, इसे हेबर-बॉश प्रक्रिया (Haber–Bosch process) में नाइट्रोजन के साथ जोड़ा जाता है। इस चरण में, नाइट्रोजन और हाइड्रोजन अत्यधिक उच्च दबाव और तापमान में प्रक्रिया करके अमोनिया (NH₃) बनाते हैं। अमोनिया का उपयोग उर्वरक के रूप में किया जा सकता है, लेकिन इसका सुरक्षित रूप से भंडारण और परिवहन करना मुश्किल है। इसलिए, अधिकांश अमोनिया यूरिया में परिवर्तित किया जाता है।
इस प्रकार, प्रक्रिया के अंतिम चरण में, संयंत्र में पहले उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके अमोनिया को यूरिया में परिवर्तित किया जाता है। दरअसल, पहले अमोनिया और कार्बन डाइऑक्साइड प्रतिक्रिया करके अमोनियम कार्बामेट (Ammonium carbamate) बनाते हैं। यह मध्यवर्ती यौगिक, फिर यूरिया और पानी में विघटित हो जाता है।
इसी जटिल प्रक्रिया के कारण, प्राकृतिक गैस महत्वपूर्ण हो जाती है। होर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है, जहां से लगभग एक चौथाई समुद्री तेल, तरलीकृत प्राकृतिक गैस और उर्वरकों की महत्वपूर्ण मात्रा का वहन होता है। हाल ही में बढ़े वैश्विक संघर्ष के बाद से, इस जलसंधि के माध्यम से होने वाले नौ-परिवहन में काफी गिरावट आई है। ऊर्जा बाज़ारों में इसका परिणाम दिखने लगा है। तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। और जैसे ही गैस की कीमतें बढ़ती हैं, उर्वरक उत्पादन लागत बढ़ जाती है, जिससे उनकी भी कीमतें उच्च हो जाती हैं। नतीजतन, नाइट्रोजन-आधारित उर्वरकों की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, क्योंकि उनके उत्पादन में प्राकृतिक गैस महत्वपूर्ण है।
बढ़ती कीमतें, मिट्टी के स्वास्थ्य, पानी की गुणवत्ता और पारिस्थितिकी तंत्र पर संभावित प्रतिकूल प्रभावों के कारण, आज रासायनिक उर्वरकों का उपयोग जांच के दायरे में आ गया है। सौभाग्य से, रासायनिक उर्वरकों के कई पर्यावरण-अनुकूल विकल्प हैं, जो मिट्टी की उर्वरता को बढ़ावा देते हैं, पौधों के विकास में सहायता करते हैं, और टिकाऊ एवं धारणीय कृषि पद्धतियों में योगदान करते हैं। ये विकल्प निम्नलिखित हैं -
1. खाद और जैविक पदार्थ कम्पोस्ट (Compost) या "काला सोना", हमारी रसोई एवं आंगन अपशिष्ट और पौधों के अवशेषों जैसे विघटित कार्बनिक पदार्थों से बनता है। यह आवश्यक पोषक तत्वों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों से भरपूर होता है, तथा मिट्टी की संरचना में सुधार करता है। जैविक कचरे को पुनर्चक्रित करके और उसे मिट्टी में लौटाकर खाद बनाने से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो जाती है।
2. हरी खाद और आवरण फसलें आवरण फसलें (Cover crops), जिन्हें हरी खाद के रूप में भी जाना जाता है, मिट्टी के स्वास्थ्य और उर्वरता में सुधार के लिए लगाई जाती हैं। फलियां, घास और तिपतिया घास जैसी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ग्रहण करती हैं, तथा खरपतवारों और मिट्टी के कटाव को रोकती हैं। जब ये फसलें विघटित हो जाती हैं, तो वे पोषक तत्व और कार्बनिक पदार्थों से मिट्टी को समृद्ध करती हैं। इस प्रकार, वे मुख्य फसल के विकास में सहायक हैं।
3. जैवउर्वरक और माइक्रोबियल इनोकुलेंट्स (Microbial Inoculants) राइजोबियम (rhizobium), माइकोराइजा (mycorrhizae) और नाइट्रोजन-फिक्सिंग बैक्टीरिया (nitrogen-fixing bacteria) जैसे जैव उर्वरक, माइक्रोबियल इनोकुलेंट हैं। ये जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता और पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाते हैं। ये लाभकारी सूक्ष्मजीव, पौधों के साथ सहजीवी संबंध बनाते हैं, पोषक तत्वों के अवशोषण में मदद करते हैं, पौधों के विकास को बढ़ावा देते हैं, और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करते हैं।
इसके अलावा, अगला बड़ा नवाचार ‘हरित अमोनिया’ का उत्पादन है। यह नाइट्रोजन उर्वरक उत्पादन के लिए कार्बन-मुक्त विकल्प प्रदान करता है, जो टिकाऊ कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हरित अमोनिया का उत्पादन, प्राकृतिक गैस के बजाय पवन, सौर या जलविद्युत ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके किया जाता है। सबसे पहले, नवीकरणीय बिजली से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है। फिर, वायु पृथक्करण इकाइयां वायुमंडल से नाइट्रोजन गैस अलग करती हैं। इसके पश्चात, हरित हैबर-बॉश प्रक्रिया में अमोनिया का उत्पादन करने के लिए, उत्प्रेरक का उपयोग करके हाइड्रोजन और नाइट्रोजन को दबाव में संयोजित किया जाता है। यह जीवाश्म ईंधन (प्राकृतिक गैस) के बजाय नवीकरणीय ऊर्जा द्वारा संचालित होता है। हरित अमोनिया, पारंपरिक अमोनिया उत्पादन से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को समाप्त करता है, तथा नाइट्रोजन उर्वरक के लिए एक स्वच्छ विकल्प प्रदान करता है। साथ ही, यह वैश्विक स्थिरता और जलवायु कार्रवाई लक्ष्यों के साथ संरेखित है।
क्या 1970 के दशक की उस एक बगावत ने हमेशा के लिए बदल दिया क्रिकेट का इतिहास?
साल 1977 की बात है, जब क्रिकेट की दुनिया के सबसे बड़े और रूढ़िवादी अधिकारियों के सामने एक व्यक्ति ने खड़े होकर निडरता से कहा था कि "हम सभी के अंदर थोड़ा बहुत लालच होता है, आपकी कीमत क्या है?" जब उन क्रिकेट अधिकारियों ने उसकी बात नहीं मानी, तो उस व्यक्ति ने एक बेहद आक्रामक रास्ता अपनाया और दुनिया के 50 से अधिक बेहतरीन क्रिकेटरों को अपनी ही एक अलग क्रिकेट प्रतियोगिता के लिए गुप्त रूप से साइन कर लिया। यह कोई और नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया के अरबपति मीडिया टाइकून (media tycoon) केरी पैकर (Kerry Packer) थे। पैकर का शुरुआती जीवन चुनौतियों से भरा था। बचपन में पोलियो के कारण वे नौ महीने अस्पताल में रहे, लेकिन इस बीमारी से उबरकर वे अपने स्कूल के हैवीवेट बॉक्सिंग चैंपियन (Heavyweight Boxing Champion) बने। पैकर को पढ़ने-लिखने में दिक्कत होती थी, जिसे अनजानी बीमारी डिस्लेक्सिया (dyslexia) कहा जाता है, और उनके पिता उन्हें परिवार का सबसे बेवकूफ सदस्य मानते थे। लेकिन इसी लड़ाकू स्वभाव ने आगे चलकर उन्हें व्यापार और क्रिकेट की दुनिया में अलग पहचान दिलाई। उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया जिसने सफेद कपड़ों और दिन के उजाले में खेले जाने वाले इस पारंपरिक खेल को रंगीन कपड़ों, दूधिया रोशनी और खिलाड़ियों को मिलने वाले भारी वेतन के एक बिल्कुल नए युग में धकेल दिया।
केरी पैकर कौन थे और उन्होंने पारंपरिक क्रिकेट से इतनी बड़ी बगावत क्यों की? केरी पैकर ऑस्ट्रेलिया के एक बेहद ताकतवर मीडिया घराने से ताल्लुक रखते थे। साल 1974 में उनके पिता की मृत्यु के बाद उन्हें विरासत में 100 मिलियन डॉलर का साम्राज्य मिला था, जिसे उन्होंने अपनी कुशाग्र व्यापारिक बुद्धि से अपनी मृत्यु तक 6.5 बिलियन डॉलर के विशाल साम्राज्य में बदल दिया था। 1976 के मध्य में, पैकर अपने टीवी चैनल 'चैनल नाइन' (Channel Nine) के लिए ऑस्ट्रेलिया के घरेलू टेस्ट मैचों के प्रसारण के विशेष अधिकार चाहते थे। उन्होंने इसके लिए तीन साल के 1.5 मिलियन डॉलर की भारी-भरकम पेशकश की, जो कि पिछले प्रसारण अनुबंध से पूरे आठ गुना अधिक थी। लेकिन ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट बोर्ड (Australian Cricket Board) ने उनके इस आकर्षक प्रस्ताव को खारिज कर दिया और सरकारी चैनल को तरजीह दी। पैकर को यह महसूस हुआ कि यह फैसला एक पुराने नेटवर्क की आपसी मिलीभगत का नतीजा है। इस अपमान से पैकर को इतनी नाराज़गी हुई कि उन्होंने खुद की एक क्रिकेट प्रतियोगिता शुरू करने की ठान ली, जिसे 'वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट' (world series cricket) का नाम दिया गया। 1977 की शुरुआत में ही उन्होंने इंग्लैंड के तत्कालीन कप्तान टोनी ग्रेग (Tony Greig) और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान इयान चैपल (Ian Chappell) की मदद से दुनिया भर के दिग्गज खिलाड़ियों को अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाना शुरू कर दिया। इयान चैपल ने बाद में कहा था कि यह उनके जीवन का सबसे कठिन क्रिकेट था क्योंकि इसमें दुनिया के सभी सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी शामिल थे। दुनिया भर के क्रिकेट प्रशासकों और अदालतों ने इस बड़े बदलाव पर कैसी प्रतिक्रिया दी? मई 1977 में जब पैकर की इस गुप्त योजना का खुलासा हुआ, तो क्रिकेट जगत में जैसे भूचाल आ गया। क्रिकेट प्रशासकों ने इसे पैकर का सर्कस करार दिया और खिलाड़ियों को भाड़े का टट्टू कहकर अपमानित किया। इंग्लैंड के टोनी ग्रेग से उनकी कप्तानी छीन ली गई। इस विद्रोह को दबाने के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (International Cricket Council) ने लंदन में एक बैठक बुलाई, जिसमें बात न बनने पर पैकर ने स्पष्ट कह दिया कि अब हर कोई अपने लिए लड़ेगा। जुलाई में परिषद ने फैसला सुनाया कि पैकर के मैचों को प्रथम श्रेणी का दर्जा नहीं दिया जाएगा और इसमें हिस्सा लेने वाले खिलाड़ियों पर टेस्ट क्रिकेट खेलने से प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। इसके खिलाफ पैकर ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। अदालत में चले एक लंबे मुकदमे में जस्टिस स्लेड (Justice Slade) ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि पेशेवर क्रिकेटरों को अपनी आजीविका कमाने का पूरा हक है और क्रिकेट बोर्ड उनके रास्ते में सिर्फ इसलिए बाधा नहीं डाल सकता क्योंकि इससे उनके अपने हित प्रभावित होते हैं। इस फैसले से क्रिकेट प्रतिष्ठानों को भारी झटका लगा और उन्हें मुकदमे के खर्च के रूप में लगभग 250,000 पाउंड भी चुकाने पड़े। हालांकि, अलग-अलग देशों का रुख समय के साथ बदलता गया। वेस्टइंडीज़ का क्रिकेट बोर्ड आर्थिक रूप से बहुत कमज़ोर था, इसलिए 1979 के वसंत में उन्होंने पैकर के साथ सीरीज़ के लिए बातचीत शुरू कर दी। पाकिस्तान ने शुरुआत में सख्त रवैया अपनाया, लेकिन बाद में इंग्लैंड के खिलाफ बुरी तरह हारने पर उन्होंने व्यावहारिक सोच अपनाते हुए 1978 में भारत के खिलाफ सीरीज़ के लिए पैकर के खिलाड़ियों को टीम में वापस बुला लिया। न्यूज़ीलैंड के प्रशासक वाल्टर हैडली (Walter Hadley) शुरू से ही समझौता चाहते थे। वहीं, रंगभेद के कारण अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध झेल रहे दक्षिण अफ्रीका के खिलाड़ी भी इस मौके का फायदा उठाकर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के साथ खेलने के लिए उत्सुक थे। उस समय भारत इस विवाद से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा था, लेकिन ऐसी ज़ोरदार अफ़वाहें फैल गई थीं कि भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी (Bishan Singh Bedi) और स्टार बल्लेबाज़ सुनील गावस्कर (Sunil Gavaskar) ने भी पैकर की लीग के विकल्पों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।
दूधिया रोशनी, हेलमेट और ड्रॉप-इन पिचों ने पारंपरिक खेल को कैसे नया रूप दिया? क्रिकेट को रात के समय फ्लडलाइट्स (floodlights) में खेलने का विचार सबसे पहले 1930 के दशक में सामने आया था, लेकिन माना जाता है कि इंग्लैंड में पहली बार फ्लडलाइट्स में क्रिकेट मैच 11 अगस्त 1952 को मिडिलसेक्स काउंटी क्रिकेट क्लब (Middlesex County Cricket Club) और आर्सेनल फुटबॉल क्लब (Arsenal Football Club) के बीच खेला गया था। लेकिन इसे नियमित रूप से शुरू करने का पूरा श्रेय केरी पैकर को ही जाता है। वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट के शुरुआती मैचों में दर्शकों की संख्या बहुत कम थी। पैकर को पारंपरिक मैदानों पर खेलने की अनुमति नहीं थी, इसलिए उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई नियमों वाले फुटबॉल स्टेडियम (Football Stadium) पट्टे पर लिए। सबसे बड़ी समस्या वहां क्रिकेट की पिच बनाने की थी। पैकर ने जॉन मै (John May) को काम पर रखा, जिन्होंने ग्रीनहाउस (greenhouse) में पिचें उगाईं और क्रेन की मदद से उन्हें स्टेडियम की सतह में स्थापित किया, जिसे आज हम ड्रॉप-इन पिच (drop-in pitch) के नाम से जानते हैं। इस तकनीक के बिना यह लीग पूरी तरह से विफल हो जाती। पैकर ने तेज़ गेंदबाज़ी के आक्रामक पहलू पर बहुत ज़ोर दिया और डेनिस लिली (Dennis Lillee), इमरान खान (Imran Khan) तथा एंडी रॉबर्ट्स (Andy Roberts) जैसे गेंदबाज़ों का भारी प्रचार किया। सिडनी (Sydney) के एक मैच में वेस्टइंडीज़ के एंडी रॉबर्ट्स की एक खतरनाक बाउंसर से ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ डेविड हूक्स (David Hookes) का जबड़ा टूट गया। इस भयानक घटना ने खिलाड़ियों को सुरक्षा के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया और इसी के बाद क्रिकेट में हेलमेट का चलन शुरू हुआ। शुरुआत में डेनिस एमिस (Dennis Amis) ने बल्लेबाज़ी करते समय अपनी सुरक्षा के लिए मोटरसाइकिल का हेलमेट पहना था। पैकर ने दर्शकों को मैदान में लाने के लिए मार्केटिंग (Marketing) पर ज़ोर दिया। नतीजा यह हुआ कि नवंबर 1978 में सिडनी क्रिकेट ग्राउंड में फ्लडलाइट्स के नीचे खेले गए एक डे-नाइट मैच को देखने के लिए 44,374 दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। रात के समय रंगीन कपड़ों में क्रिकेट का यह नया रूप दर्शकों को बहुत पसंद आया।
वनडे क्रिकेट का उदय कैसे हुआ और इसे दुनिया की सबसे बड़ी पहचान कैसे मिली? वनडे यानी वन डे इंटरनेशनल (One Day International) सीमित ओवरों का क्रिकेट है, जो मुख्य रूप से 1970 के दशक में अस्तित्व में आया। क्रिकेट के इतिहास का पहला आधिकारिक वनडे मैच 5 जनवरी 1971 को मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड (Melbourne Cricket Ground) पर ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच खेला गया था। लेकिन इसे आज के आधुनिक, पेशेवर और तेज़-तर्रार रूप में ढालने का काम 1970 के दशक के अंत में पैकर की इसी बगावत ने किया। रंगीन जर्सी (Jersey), रात के समय मैच, सफेद गेंदें, काली साइट स्क्रीन (black site screen), अलग-अलग एंगल वाले कई टीवी कैमरे, पिच के माइक्रोफोन और टीवी स्क्रीन पर ग्राफिक्स—यह सब उसी वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट की देन हैं। 17 जनवरी 1979 को पहली बार पूरी तरह से रंगीन जर्सी में मैच खेला गया, जिसमें ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी सुनहरे पीले (golden yellow) और वेस्टइंडीज़ के खिलाड़ी कोरल पिंक (coral pink) कपड़ों में मैदान पर उतरे थे। धीरे-धीरे वनडे क्रिकेट में सफेद कपड़ों और लाल गेंद का चलन खत्म हो गया और 2001 तक इसे पूरी तरह से बंद कर दिया गया। 1979 आते-आते भारी आर्थिक नुकसान और मुकदमों से थककर ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट बोर्ड ने पैकर के साथ शांति समझौता कर लिया। पैकर के चैनल को न सिर्फ क्रिकेट के विशेष प्रसारण अधिकार मिले बल्कि खेल के प्रचार-प्रसार का दस साल का बड़ा अनुबंध भी हासिल हुआ। आज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद सभी टीमों की वनडे रैंकिंग जारी करती है। इस समय दुनिया में 12 पूर्ण सदस्य देश हैं जिन्हें वनडे क्रिकेट का स्थायी दर्ज़ा प्राप्त है, और क्रिकेट का सबसे बड़ा महाकुंभ यानी विश्व कप भी इसी 50-ओवर के प्रारूप में खेला जाता है।
लखनऊ के खेल प्रेमी पहली बार अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट का गवाह कब बने? वनडे क्रिकेट और डे-नाइट मैचों के इस रोमांचक सफर ने धीरे-धीरे दुनिया भर के देशों और भारत के हर कोने को क्रिकेट के खुमार में पूरी तरह से रंग दिया। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के खेल प्रेमियों के लिए भी वह दिन बेहद खास और ऐतिहासिक था, जब उनके अपने शहर में पहली बार अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट का शानदार आगाज़ हुआ। लखनऊ के मशहूर के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम (K. D. Singh Babu Stadium) में पहला पुरुष वनडे मैच 27 अक्टूबर 1989 को खेला गया था। यह ऐतिहासिक मुकाबला एमआरएफ वर्ल्ड सीरीज़, (जिसे क्रिकेट जगत में नेहरू कप के नाम से भी जाना जाता है!) का एक अहम हिस्सा था। इस बड़े मंच पर पाकिस्तान और श्रीलंका की मजबूत टीमें आमने-सामने थीं। उस दौर में स्टेडियम की सीढ़ियों पर बैठकर दुनिया के दिग्गज खिलाड़ियों को एक दूसरे के खिलाफ कड़ा संघर्ष करते देखना लखनऊ के दर्शकों के लिए एक बिल्कुल नया, अद्भुत और रोमांचक अनुभव था। इसी मैच के साथ लखनऊ शहर ने भी विश्व क्रिकेट के नक़्शे पर एक शानदार मेज़बान के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई, जो आज भी इस शहर की समृद्ध खेल विरासत का एक बेहद अहम हिस्सा है। इस एक मैच ने लखनऊ के युवाओं में खेल के प्रति जो दीवानगी पैदा की, वह आज भी यहाँ के हर गली-मोहल्ले में खेलते बच्चों में साफ़ देखी जा सकती है।
जानें, आधुनिक सैन्य अभियानों में सटीकता व दक्षता में सुधार के लिए ड्रोन का महत्व
लखनऊवासियों आज हम पता लगाएंगे कि, ड्रोन (Drone) आधुनिक सैन्य अभियानों को कैसे बदल रहे हैं। फिर हम समझेंगे कि, सटीकता और दक्षता में सुधार के लिए एआई डेटा (AI Data) और सिमुलेशन (Simulation) का उपयोग करके, ड्रोन को कैसे प्रशिक्षित किया जाता है। लेख में आगे बढ़ते हुए, हम रशिया-यूक्रेन (Russia-Ukraine) युद्ध में ड्रोन की भूमिका की जांच करेंगे। इसके पश्चात, हम देखेंगे कि अमेरिकी सेना द्वारा विश्लेषण और निर्णय लेने हेतु, एंथ्रोपिक (Anthropic) द्वारा विकसित एआई टूल्स का उपयोग कैसे किया जा रहा है। अंततः हम पढ़ेंगे कि, पैलांटिर (Palantir) स्वायत्त ड्रोन मिशन और सैन्य प्रौद्योगिकी को आगे बढ़ाने में कैसे योगदान दे रहा है।
आज वैश्विक सैन्य रणनीतियां जैसे-जैसे विकसित हो रही हैं, ड्रोन तकनीक अपनी परिवर्तनकारी क्षमता के साथ विभिन्न क्षेत्रों में योगदान दे रही है। ड्रोन अब आधुनिक युद्ध और राष्ट्रीय रक्षा में भी अपरिहार्य उपकरण बन गए हैं। निम्नलिखित उपायों के माध्यम से हम सेना में ड्रोन की उपयोगिता जान सकते हैं।
1. खुफिया जानकारी, निगरानी और परीक्षण दुश्मन के इलाकों या संघर्ष-प्रवण क्षेत्रों पर ड्रोन उपरोक्त क्षमताएं प्रदान करते हैं। ड्रोन की उच्च-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग (High-resolution imaging), थर्मल सेंसर (Thermal sensors) और रात्रि-दृष्टि क्षमताएं, सैनिकों को भौतिक तैनाती के बिना खुफिया जानकारी इकट्ठा करने की अनुमति देती हैं। ड्रोन रणनीतिक क्षेत्रों पर उड़ते हैं, निरंतर स्थितिजन्य जागरूकता प्रदान करते हैं, और तेज़ एवं डेटा-समर्थित निर्णय लेने में मदद करते हैं।
2. लक्ष्य प्राप्ति और ट्रैकिंग (Tracking) आधुनिक युद्धक्षेत्रों में गति और सटीकता महत्वपूर्ण हैं। सैन्य अभियानों में प्रयुक्त ड्रोन स्वायत्त रूप से हलचल या लक्ष्यों की पहचान और उन्हें ट्रैक कर सकते हैं। इससे लंबे अवलोकन की आवश्यकता कम हो जाती है। वे न्यूनतम मानवीय त्रुटि के साथ दिशादर्शक बनकर, तोपखाने की आग के लिए भी दिशा दिखा सकते हैं।
3. सीमा निगरानी संवेदनशील सीमा क्षेत्रों की निरंतर निगरानी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण होती है। ड्रोन सीमा इलाके के बड़े हिस्से में गश्त करते हैं, और अनधिकृत गतिविधियों का पता लगाते हैं। दुर्गम या ऊबड़-खाबड़ इलाकों में, ड्रोन पारंपरिक निगरानी तरीकों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं ।इससे नेटवर्क क्षेत्र अधिक और सुरक्षा बेहतर मिलती है।
4. खोज एवं बचाव ऑपरेशन प्राकृतिक आपदाओं के बाद या युद्धकालीन परिदृश्यों में, लापता कर्मियों को शीघ्रता से ढूंढना काफ़ी ज़रूरी होता है। थर्मल सेंसर और वास्तविक समय संचार प्रणालियों से लैस ड्रोन, विशाल क्षेत्रों को स्कैन कर सकते हैं और ऊष्मा संकेतों की पहचान कर सकते हैं। इस प्रकार, बचाव इकाइयों को निर्देशित करने में वे सहायता कर सकते हैं।
5. मानव जोखिम को कम करना जिन मिशनों को परंपरागत रूप से जमीन या हवाई सैन्य तैनाती की आवश्यकता होती है, उन्हें ड्रोन की सहायता से अब दूर से निष्पादित किया जा सकता है। विवादित क्षेत्रों, खदान क्षेत्रों, या रासायनिक रूप से खतरनाक क्षेत्रों की निगरानी के लिए अब सीधे सैन्य भागीदारी की आवश्यकता नहीं है। ड्रोन परिचालन जोखिम और संचालन तनाव दोनों को कम करते हैं।
ड्रोन तकनीक, आज तेजी से आगे बढ़ते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) की सहायता से भी मौलिक रूप से बदल रही है। केवल मानव पायलटों (pilot) पर निर्भर रहने के बजाय, आज ड्रोन हवा में कुछ सीखने, अनुकूलन करने और वास्तविक समय पर निर्णय लेने में सक्षम हैं। इस बदलाव ने ड्रोन को कृषि, रसद, खनन और शहरी नियोजन जैसे उद्योगों में भी बुद्धिमान हवाई मित्रों के रूप में स्थापित किया है।
ड्रोन की स्वयं सीखने की क्षमता, निम्नलिखित तीन मुख्य प्रौद्योगिकियों द्वारा संभव बनाई गई है -
1. मशीन लर्निंग (Machine Learning) और कंप्यूटर विजन (Computer Vision) एआई ड्रोन को कैमरों और सेंसरों से दृश्य डेटा की व्याख्या करने में सक्षम बनाता है। उदाहरण के लिए, वे एक पेड़, एक बिजली लाइन और एक इमारत के बीच अंतर कर सकते हैं। इससे उनको सुरक्षित एवं अधिक सटीक चालन की अनुमति मिलती है।
2. सेंसर फ्यूजन (Sensor fusion) आधुनिक ड्रोन जीपीएस (GPS), एलआईडीएआर (LIDAR), इन्फ्रारेड (Infrared) और अल्ट्रासोनिक सेंसर (Ultrasonic sensor) से इनपुट को जोड़ते हैं। एआई एल्गोरिदम (AI Algorithm), पर्यावरण के सटीक व वास्तविक समय मॉडल (Time model) बनाने हेतु इस डेटा को संयोजित करते हैं।
3. पूर्वानुमानित विश्लेषण स्व-प्रशिक्षण की क्षमता वाले ड्रोन, जोखिमों और परिणामों की भविष्यवाणी कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि हवा का पैटर्न अचानक बदल जाता है, तो ड्रोन अपने मार्ग को स्वायत्त रूप से समायोजित कर लेता है। इससे विफलता की संभावना कम हो जाती है।
ड्रोन की इन विशेषताओं के कारण, इनका उपयोग आज वास्तविक युद्ध क्षेत्रों में आम बनता जा रहा है। हम जानते ही हैं कि, पिछले कुछ वर्षों से रशिया और यूक्रेन देशों के बीच युद्ध चल रहा है। इस संघर्ष में, जिसे दुनिया के पहले ड्रोन युद्ध के रूप में जाना जा रहा है, कुछ उल्लेखनीय घटनाओं में से एक फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन (Fiber-optic drones) का उपयोग है। रशिया के कुर्स्क (Kursk) क्षेत्र में यूक्रेन की सीमा पार घुसपैठ के जवाब में, पहली बार अगस्त 2024 में फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन उभरे थे। फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन एक काफ़ी पतली केबल से लैस होते हैं, जो इसके ऑपरेटर (Drone Operator) तक वापस जाती है। यह तार रेडियो सिग्नल (radio signal) पर निर्भर होने के बजाय भौतिक संबंध बनाए रखती है। इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों को जाम करने के लिए, कोई रेडियो लिंक न होने के कारण, फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन उन क्षेत्रों में काम कर सकते हैं, जहां पारंपरिक ड्रोन विफल होते हैं। ये ड्रोन सटीकता और स्पष्ट वीडियो के साथ 30 किलोमीटर से भी अधिक दूरी पर हमला करने में सक्षम है।
कुर्स्क में, यूक्रेन की घुसपैठी के जवाब में फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन ने उस क्षेत्र में यूक्रेन की उपस्थिति को लगातार अस्थिर बनाने में मदद की। अंततः मार्च 2025 में यूक्रेनी सेनाएं सीमा पार वापस चली गईं। आश्चर्यजनक रूप से, रशिया के फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन हमलों ने अभूतपूर्व वाहन हानि में योगदान दिया। इससे कुर्स्क में यूक्रेन को रशिया की तुलना में 25% अधिक वाहन हानि हुई।
युद्ध में ड्रोन एवं एआई के बढ़ते उपयोग से कुछ अन्य पहलू भी सामने आ रहे हैं। अमेरिकी एआई कंपनी - एंथ्रोपिक अपने सॉफ्टवेयर के दुरुपयोग को रोकने के लिए, एक रासायनिक हथियार और विस्फोटक विशेषज्ञ को नियुक्त करना चाह रही है। एंथ्रोपिक को डर है कि, उसके एआई उपकरण किसी को रासायनिक या रेडियोधर्मी हथियार बनाने का तरीका बता सकते हैं। इस प्रकार के हथियारों के साथ एआई के उपयोग के लिए, कोई अंतरराष्ट्रीय संधि या अन्य विनियमन नहीं है।
एआई उद्योग ने अपनी प्रौद्योगिकी से उत्पन्न संभावित अस्तित्वगत खतरों के बारे में लगातार चेतावनी दी है। लेकिन, इस प्रगति को धीमा करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। यह मुद्दा इसलिए अत्यावश्यक बन गया है, क्योंकि अमेरिकी सरकार ने ईरान (Iran) में युद्ध और वेनेजुएला (Venezuela) में सैन्य अभियान शुरू करते समय एआई कंपनियों को बुलाया है। हालांकि, अमेरिकी सरकार ने कहा है कि, अमेरिकी सेना तकनीकी कंपनियों द्वारा शासित नहीं होगी। एंथ्रोपिक का एआई सहायक - क्लाड (Claude) अभी तक चरणबद्ध तरीके से समाप्त नहीं किया गया है, और वर्तमान में पैलांटिर द्वारा प्रदान किए गए सिस्टम में मौजूद है। यह अमेरिका-इज़राइल–ईरान युद्ध में अमेरिका द्वारा तैनात किया जा रहा है।
एक तरफ, आधुनिक युद्धक्षेत्र में ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (Global Positioning System) या जीपीएस (GPS) पर भरोसा नहीं किया जा सकता। कुछ युद्ध परिदृश्यों में जीपीएस सिग्नल जाम होने, स्पूफिंग (Spoofing) या पूरी तरह से अस्वीकार होने के प्रति संवेदनशील होते हैं। उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं वाले प्रतिद्वंद्वी, आसानी से जीपीएस सिग्नल को बाधित कर सकते हैं। इससे ड्रोन अपना रास्ता भटक सकते हैं, या दुश्मन के हाथों में भी जा सकते हैं। इन स्थितियों में रेडियो नियंत्रण का उपयोग भी उतना ही खतरनाक है, क्योंकि इसका जल्द ही पता लगता है। इसके अतिरिक्त, शत्रुतापूर्ण वातावरण में लंबी दूरी के संचालन में अक्सर कमजोर या टूटे हुए सिग्नल होते हैं, जिससे ड्रोन की परिचालन सीमा और प्रभावशीलता सीमित हो जाती है।
इस चुनौती से निपटने के लिए, पैलांटिर ने विज़ुअल नेविगेशन (वीएनएवी – Visual Navigation) बनाया है। यह एक नया समाधान है, जो अप्रभावी जीपीएस वाले क्षेत्रों में स्वायत्त ड्रोन मिशनों को सक्षम करने के लिए पैलांटिर इंटेलिजेंस और सॉफ्टवेयर को ऑनबोर्ड लाता है। यह जीपीएस या रेडियो नियंत्रण संकेतों से पूरी तरह से स्वतंत्र संचालन प्रदान करता है। दरअसल, विज़ुअल नेविगेशन ड्रोन को मानचित्र पढ़कर संचालित करने देता है। इसकी शक्ति को प्रदर्शित करने में मदद के लिए, पैलांटिर ने फ्लाईबी रोबोटिक्स (Flyby Robotics) के साथ साझेदारी की है।
अतः वैश्विक संघर्षों के इस दौर में, यह देखना रोमांचक होगा कि, नई प्रौद्योगिकियां सैन्य अभियानों को कैसे बदल सकती हैं।
सूरज की रोशनी से हमारा सबसे बड़ा बिजली संकट कैसे खत्म होगा?
पृथ्वी से लगभग 14 करोड़ 96 लाख किलोमीटर की दूरी पर होकर भी सूरज एक प्राकृतिक परमाणु रिएक्टर (nuclear reactor) की तरह कार्य करता है जो फोटॉन (photon) नामक ऊर्जा के छोटे पैकेट छोड़ता है। इन फोटॉन को सूर्य से पृथ्वी तक 149.6 मिलियन किलोमीटर की दूरी तय करने में लगभग 8.5 मिनट का समय लगता है। आपको जानकर शायद हैरानी हो कि हर एक घंटे में पृथ्वी पर इतने फोटॉन टकराते हैं, जिनसे सैद्धांतिक रूप से पूरे एक वर्ष के लिए वैश्विक ऊर्जा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त सौर ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है। धरती पर सूर्य द्वारा प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा की कुल मात्रा दुनिया की वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं से कहीं अधिक है। आज जब जलवायु संकट पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा ख़तरा बन चुका है, तो ऐसे में जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाना बेहद अहम हो गया है। यह एक बड़ी राहत की बात है कि अब लखनऊ शहर भी तेज़ी से साफ़ और सस्ती ऊर्जा के इस विकल्प को अपनाते हुए भारत की सौर क्रांति का एक बड़ा हिस्सा बन रहा है।
नवीकरणीय ऊर्जा क्या है और यह जीवाश्म ईंधन से बेहतर क्यों है? नवीकरणीय ऊर्जा वह ऊर्जा है जो प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त होती है और जितनी तेज़ी से हम इसका उपभोग करते हैं, उससे कहीं अधिक तेज़ी से यह प्राकृतिक रूप से वापस भर जाती है। धूप और हवा ऐसे स्रोत हैं जो लगातार प्रकृति द्वारा बनाए जाते रहते हैं और हमारे चारों ओर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इसके विपरीत कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधन (fossil fuels) गैर-नवीकरणीय संसाधन हैं जिन्हें बनने में करोड़ों साल लगते हैं। जब ऊर्जा उत्पादन के लिए जीवाश्म ईंधन को जलाया जाता है, तो कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) जैसी हानिकारक ग्रीनहाउस गैसों (greenhouse gases) का भारी उत्सर्जन होता है। वर्तमान में उत्सर्जन का सबसे बड़ा हिस्सा जीवाश्म ईंधन का ही है, इसलिए जलवायु संकट को दूर करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा की ओर रुख करना सबसे ज़रूरी है। ज़्यादातर देशों में अब नवीकरणीय ऊर्जा सस्ती हो गई है और यह जीवाश्म ईंधन की तुलना में तीन गुना अधिक रोज़गार भी पैदा करती है। नवीकरणीय ऊर्जा में सौर ऊर्जा के अलावा जलविद्युत सबसे बड़ा स्रोत है, जो उच्च से निम्न स्थानों पर बहते पानी की ऊर्जा का दोहन करता है। इसके साथ ही पवन ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, महासागर ऊर्जा और बायोएनर्जी भी इसके प्रमुख स्रोत माने जाते हैं।
सौर ऊर्जा से बिजली बनाने का विज्ञान कब और कैसे खोजा गया? सौर ऊर्जा का पूरा विज्ञान फोटोवोल्टिक प्रभाव (photovoltaic effect) पर निर्भर करता है, जिसे पहली बार साल 1839 में फ्रांसीसी भौतिक विज्ञानी एडमंड बेकरेल (Edmond Becquerel) द्वारा प्रदर्शित किया गया था। उन्होंने एक इलेक्ट्रोकेमिकल सेल (electrochemical cell) का उपयोग किया था और यह पाया था कि जब एसिड, तटस्थ या क्षारीय घोल में डूबी प्लैटिनम (platinum) या सोने की दो प्लेटों को असमान रूप से सौर विकिरण के संपर्क में लाया जाता है, तो वहां विद्युत प्रवाह उत्पन्न होता है। बाद में साल 1884 में चार्ल्स फ्रिट्स (Charles Fritts) द्वारा पहले सौर सेल का प्रयोग किया गया था, जिसमें सोने की एक पतली फिल्म से ढकी सेलेनियम (Selenium) की एक परत थी, हालांकि इसकी कार्यक्षमता बहुत ख़राब थी। असल में फोटोवोल्टिक प्रभाव एक भौतिक घटना है जिसमें एक अर्धचालक पदार्थ प्रकाश के संपर्क में आने पर विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करता है। जब सूर्य की रोशनी फोटोडायोड (photodiode) पर पड़ती है, तो वैलेंस बैंड (valence band) में मौजूद इलेक्ट्रॉन ऊर्जा को अवशोषित करते हैं और उत्तेजित होकर चालन बैंड (conduction band) में कूद जाते हैं और मुक्त हो जाते हैं। इस तरह आवेशों के अलग होने से एक विद्युत विभव या वोल्टेज उत्पन्न होता है और प्रकाश ऊर्जा आसानी से विद्युत ऊर्जा में बदल जाती है।
एडमंड बेकरेल
छत पर लगे सोलर पैनल असल में बिजली का उत्पादन कैसे करते हैं? फोटोवोल्टिक सोलर पैनल विभिन्न प्रकार की कांच की पैकेजिंग में कई सौर कोशिकाओं से बने होते हैं। ये सौर कोशिकाएं अर्धचालक की तरह सिलिकॉन (silicon) से बनी होती हैं और एक सकारात्मक परत और एक नकारात्मक परत के साथ निर्मित होती हैं, जो बैटरी की तरह ही एक विद्युत क्षेत्र बनाती हैं। जब फोटॉन एक सौर सेल से टकराते हैं, तो वे इलेक्ट्रॉनों को उनके परमाणुओं से मुक्त कर देते हैं। यदि सेल के सकारात्मक और नकारात्मक किनारों से कंडक्टर (conductor) जुड़े होते हैं, तो यह एक विद्युत सर्किट बनाता है और जब इलेक्ट्रॉन ऐसे सर्किट से प्रवाहित होते हैं, तो बिजली उत्पन्न होने लगती है। ये फोटोवोल्टिक पैनल डायरेक्ट करंट बिजली उत्पन्न करते हैं, जिसमें इलेक्ट्रॉन सर्किट के चारों ओर एक ही दिशा में बहते हैं। लेकिन हमारे घरों और पावर ग्रिड में अल्टरनेटिंग करंट बिजली का इस्तेमाल होता है, जिसमें इलेक्ट्रॉन आगे और पीछे धकेले जाते हैं। डायरेक्ट करंट (direct current) को अल्टरनेटिंग करंट (Alternating Current) ग्रिड में ले जाने के लिए इनवर्टर (inverter) का उपयोग किया जाता है। इनवर्टर इस पूरे सिस्टम के दिमाग़ की तरह होते हैं, जो न केवल करंट बदलते हैं बल्कि ग्राउंड फॉल्ट सुरक्षा (ground fault protection) और सिस्टम के आंकड़े भी प्रदान करते हैं। आज की तकनीक में माइक्रो-इनवर्टर का इस्तेमाल भी काफ़ी बढ़ गया है, जो एक पूरे सिस्टम के बजाय प्रत्येक व्यक्तिगत सौर पैनल के लिए अनुकूलित होते हैं, जिससे हर पैनल अपनी अधिकतम क्षमता पर प्रदर्शन कर पाता है। जब एक सामान्य ग्रिड-बंधा सिस्टम दिन के उजाले के दौरान ज़रूरत से ज़्यादा ऊर्जा का उत्पादन करता है, तो वह अतिरिक्त ऊर्जा ग्रिड में वापस भेज दी जाती है जिसके लिए ग्राहक को क्रेडिट मिलता है। इस क्रेडिट का उपयोग रात में या बादल वाले दिनों में पारंपरिक ग्रिड से बिजली लेने के लिए किया जा सकता है, जिसे फ़ीड इन टैरिफ (feed in tariff) कहा जाता है।
सौर ऊर्जा के उपयोग के अन्य बड़े तरीक़े क्या हैं? सौर विकिरण को न केवल बिजली में बल्कि तापीय ऊर्जा या गर्मी में भी बदला जा सकता है। सौर ऊर्जा को पकड़ने और उसे तापीय ऊर्जा में बदलने के लिए सबसे आम उपकरणों में फ्लैट-प्लेट कलेक्टर (flat-plate collector) शामिल हैं। क्योंकि पृथ्वी की सतह पर सौर विकिरण की तीव्रता कम होती है, इसलिए इन कलेक्टरों का क्षेत्रफल काफ़ी बड़ा होना चाहिए। इनका उपयोग आमतौर पर सौर वॉटर हीटर और घरों को गर्म करने के लिए किया जाता है, जो वाहक तरल पदार्थों को 66 से 93 डिग्री सेल्सियस के तापमान तक गर्म करते हैं। तापीय ऊर्जा रूपांतरण का एक अन्य बेहतरीन तरीक़ा सौर तालाबों में देखने को मिलता है। ये विशेष रूप से खारे पानी के निकाय होते हैं जिन्हें सौर ऊर्जा को इकट्ठा करने और संग्रहीत करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इनसे निकलने वाली गर्मी रसायनों, भोजन और कपड़ा उत्पादन को संभव बनाती है और ग्रीनहाउस व स्विमिंग पूल को गर्म करने के लिए भी इस्तेमाल की जाती है। इसके अलावा संकेंद्रित सौर ऊर्जा संयंत्रों में दर्पणों या लेंसों की कतारों का उपयोग किया जाता है जो सूर्य के प्रकाश को एक छोटे बिंदु पर केंद्रित करते हैं। इससे तापमान 2000 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक तक पहुंच सकता है, जिसका उपयोग स्टीम टरबाइन (steam turbine) चलाने के लिए किया जाता है। अब सौर तकनीक कृत्रिम पत्तियों के रूप में भी सामने आ रही है, जो प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया की नक़ल करते हुए सौर ऊर्जा का उपयोग करके पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करती है और बिना किसी प्रदूषण के साफ़ ईंधन देती है।
उत्तर प्रदेश और विशेषकर लखनऊ में सौर ऊर्जा का भविष्य कैसा है? सरकारी नीतियों के मज़बूत समर्थन और बढ़ती पर्यावरणीय जागरूकता ने उद्योगों और आम उपभोक्ताओं दोनों को अपने परिसरों के लिए सौर प्रणाली अपनाने के लिए पूरी तरह आश्वस्त कर दिया है। पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश की सौर ऊर्जा क्षमता में दस गुना से अधिक की भारी वृद्धि हुई है, जो साल 2017 में लगभग 288 मेगावाट से बढ़कर 2025 में 2653 मेगावाट तक पहुंच गई है। राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत मार्च 2027 तक 8 लाख रूफटॉप सोलर प्लांट (Rooftop Solar Plant) स्थापित करने का एक बेहद महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके तहत अब तक 1 लाख से अधिक सिस्टम स्थापित किए जा चुके हैं, जिनकी रफ़्तार लगभग 11,000 स्थापना प्रति माह है। लखनऊ शहर भी अब भारत की इस सौर क्रांति को अपनाते हुए ऊर्जा के साफ़ और सस्ते विकल्पों की ओर बढ़ रहा है। लखनऊ को एक टिकाऊ शहर में बदलने और स्वच्छ ऊर्जा के इस विकास को गति देने में यहाँ के शीर्ष सौर वितरकों का बहुत बड़ा योगदान है। इनमें अरसिगा सोलर शामिल है, जिसकी स्थापना 2019 में हुई थी और जो व्यवसायों को सस्ते सौर उपकरण दे रहा है। इसके अलावा लूम सोलर भी अपनी उन्नत तकनीक के साथ लखनऊ में ऊर्जा की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए विश्वसनीय सौर ऊर्जा प्रदान कर रहा है। मार्स सोलर सॉल्यूशन, ओम सोलर सॉल्यूशंस और एमज़ो पॉवरटेक जैसी कंपनियां भी आवासीय, वाणिज्यिक और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए बेहतरीन गुणवत्ता वाले सोलर पैनल, इनवर्टर और कस्टम बैटरी की सुविधा देकर लखनऊ को ऊर्जा कुशल और एक हरित भविष्य की ओर ले जाने का काम कर रही हैं।
ब्रिटिश बैंड कॉर्नरशॉप के गीत से सजी आशा भोसले की सुरीली विरासत को नमन
आशा भोसले (Asha Bhosle) भारतीय सिनेमा की सबसे लोकप्रिय और बहुमुखी गायिकाओं में से एक हैं। उन्होंने अपने लंबे करियर में हज़ारों गीत गाए और फिल्मी संगीत, ग़ज़ल और पॉप जैसे कई रूपों में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी आवाज़ ने कई पीढ़ियों के संगीत को प्रभावित किया है।
सन 1997 में ब्रिटिश बैंड कॉर्नरशॉप (Cornershop) ने ब्रिमफुल ऑफ़ आशा (Brimful of Asha) गीत प्रस्तुत किया, जो आशा भोसले को एक विशेष श्रद्धांजलि है। बाद में इसके नए रूप ने बहुत लोकप्रियता पाई और यह गीत यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) के संगीत सूची में प्रथम स्थान तक पहुँचा।
यह गीत दिखाता है कि भारतीय फिल्म संगीत दुनिया तक कैसे पहुँचा। हमारे यहाँ फिल्मों में गीत पार्श्व गायक गाते हैं और कलाकार उन पर अभिनय करते हैं। इस परंपरा को इस गीत में सरल रूप से प्रस्तुत किया गया है। इसमें लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जैसे महान गायकों का भी उल्लेख मिलता है।
इस प्रकार ब्रिमफुल ऑफ़ आशा केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि कैसे आशा भोसले की आवाज़ भारत से निकलकर पूरे विश्व में अपनी पहचान बना चुकी है।
हिंदी-उर्दू भाषा और लखनऊ के इतिहास, तहज़ीब, कारीगरी और कबाब में छिपे ईरान के गहरे राज़
क्या आपको पता है कि भारत और ईरान का रिश्ता आधुनिक राजनीति और देशों की वर्तमान सीमाओं से कहीं ज़्यादा पुराना है। जब 60,000 साल पहले इंसानों ने अफ्रीका से बाहर क़दम रखा था, तब वे फ़ारसी तटों के साथ चलते हुए ही दक्षिण एशिया तक पहुंचे थे। यह रिश्ता सिंधु घाटी सभ्यता के समय से और भी गहरा हो गया था, जो कि शुरुआती एलामाइट और मेसोपोटामिया संस्कृतियों के बिल्कुल समकालीन थी और जिनके साथ प्राचीन ईरान का सीधा संपर्क रहता था। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि डेरियस प्रथम (Darius I) के नेतृत्व में हखामनी साम्राज्य ने 516 ईसा पूर्व में उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों यानी सिंध और पंजाब पर कब्ज़ा कर लिया था और इसे अपने विशाल साम्राज्य का बीसवां प्रांत बना लिया था। यह क्षेत्र न केवल आर्थिक रूप से बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण था, बल्कि इसने यूनान के ख़िलाफ़ ज़ेरेक्सिस के सैन्य अभियानों के लिए सैनिक भी मुहैया कराए थे। भारत पर इसी ईरानी प्रभाव के साथ खरोष्ठी लिपि का भी प्रवेश हुआ, जो मूल रूप से अरामी भाषा से निकली थी और इसे उर्दू की ही तरह दाएं से बाएं लिखा जाता था। यह लिपि तीसरी शताब्दी तक उत्तर-पश्चिमी भारत में मज़बूती से मौजूद रही। यहाँ तक कि सम्राट अशोक के मशहूर शिलालेख और उनके नैतिक नियम भी इसी ईरानी शाही घोषणाओं की शैली से प्रेरित थे। अशोक के स्तंभों पर जो घंटी के आकार के शीर्ष दिखाई देते हैं, वे ईरान के पर्सिपोलिस (Persepolis) में पाए जाने वाले स्तंभों से बेहद मिलते-जुलते हैं।
पर्सिपोलिस
आधुनिक आनुवंशिक शोध भी आज इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, ख़ासकर हमारे उत्तरी और मध्य क्षेत्रों में, प्राचीन ईरानी किसानों के साथ अपनी गहरी आनुवंशिक विरासत साझा करता है। आज भी रिज़वी (Rizwi), काज़मी (Kazmi) और नक़वी (Naqvi) जैसे कई प्रमुख भारतीय शिया परिवार अपनी जड़ें सीधे ईरान से ही जोड़ते हैं। ईरान में आज भी अल्पसंख्यक पूरी सुरक्षा के साथ रहते हैं। वहाँ 19वीं सदी में भारतीय व्यापारियों द्वारा बनाए गए दो हिंदू मंदिर और चार प्रमुख गुरुद्वारे आज भी मौजूद हैं जहाँ लोग शांति से पूजा करते हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान भी भारत और ईरान के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध न केवल बनाए रखे गए बल्कि उन्हें संस्थागत रूप भी दिया गया। व्यापार फला-फूला और आध्यात्मिक संबंध बने रहे। आज़ादी के बाद भी भारत और ईरान ने सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे। हालाँकि, हाल के दशकों में सामरिक बदलावों, ख़ासकर इज़राइल और अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती नज़दीकियों ने इस गतिशीलता को बहुत प्रभावित किया है। साल 2005 में एक बड़ा मोड़ तब आया जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र में ईरान के परमाणु कार्यक्रम के ख़िलाफ़ वोट दिया। इसके बावजूद व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान आज भी जारी है।
इंडो-आर्यन और ईरानी भाषाओं के बीच क्या समानताएं हैं? भारत की सबसे पुरानी भाषाओं में से एक संस्कृत का सीधा और गहरा संबंध इंडो-ईरानी भाषा परिवार से है। 1500 ईसा पूर्व में शुरू हुए वैदिक काल और उसके बाद के हज़ारों सालों तक भारतीय संस्कृति ने ईरान से बहुत कुछ ग्रहण किया। प्राचीन ईरानी भाषा और वैदिक संस्कृत में इतने सारे शब्द एक जैसे हैं कि भाषाविज्ञानी भी हैरान रह जाते हैं। उदाहरण के लिए, ईरानी धर्मगुरु ज़रथुस्त्र (Zarathustra) ने अहुर मज़्दा का उपदेश दिया था। यह ईरानी शब्द अहुर हमारे वेदों में असुर है। इसी तरह प्राचीन ईरान का अशा हमारे उपनिषदों के ईशा के बिल्कुल समान है। ईरानी भाषा के हवान, यस्न, जरन्य, नामन और सेना जैसे शब्द वैदिक संस्कृत के हवन, यज्ञ, हिरण्य, नामन और सेना ही हैं। दोनों महान परंपराओं की कविता के मीटर भी काफी मिलते-जुलते हैं। प्राचीन ईरानी कविता के मीटर वेदों के त्रिष्टुभ मीटर के बहुत क़रीब हैं।इतना ही नहीं, हमारी रोज़मर्रा की बातचीत में इस्तेमाल होने वाले बहुत से शब्द सीधे फ़ारसी से ही आए हैं। चादर, ज़मीन, दिल, चेहरा, ज़रूरी, दीवाना, ख़ूब, रंग, नारंगी, सफ़ेद, हमेशा, शायद, ख़राब, ख़ाली, गाय, मुर्ग़ी और चर्बी जैसे शब्द पूरी तरह से फ़ारसी के हैं, जिन्हें आज हम आम हिंदी और उर्दू में धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। इतिहास इस बात का भी गवाह है कि 17वीं शताब्दी में जब मराठा साम्राज्य के छत्रपति शिवाजी को दक्कन क्षेत्र में मुग़ल सेना के सेनापति राजस्थानी जय सिंह से कोई बातचीत करनी होती थी, तो वे संचार के लिए फ़ारसी भाषा का ही उपयोग करते थे। जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने सूरत में अपना पहला कार्यालय शुरू किया, तो सर थॉमस रो को स्थानीय भारतीय अधिकारियों के साथ संवाद करने के लिए फ़ारसी अनुवादकों को नौकरी पर रखना पड़ा था। यहाँ तक कि समाज सुधारक राजा राममोहन राय द्वारा लिखी गई सबसे पहली किताब भी फ़ारसी में ही रची गई थी। शाह, नामदार या नरीमन जैसे भारतीय नाम भी असल में फ़ारसी मूल के ही हैं।
दोनों सभ्यताओं की काव्य और साहित्यिक परंपराएं कैसी रही हैं? साहित्य और दर्शन के क्षेत्र में भी दोनों ही सभ्यताओं ने पूरी दुनिया को महान और कालजयी रचनाएं दी हैं। अगर हम भारतीय उपमहाद्वीप के संस्कृत साहित्य की बात करें, तो यह आर्यों द्वारा रचित एक अत्यंत विशाल और समृद्ध संग्रह है। आर्य लोग शायद दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के दौरान उत्तर-पश्चिम की दिशा से भारतीय उपमहाद्वीप में आए थे। धीरे-धीरे यह विशाल साहित्य उस ब्राह्मणवादी समाज की अभिव्यक्ति का मुख्य और सबसे ताक़तवर ज़रिया बन गया। 1500 ईसा पूर्व से शुरू हुए गौरवशाली वैदिक काल के बाद, संस्कृत साहित्य का शास्त्रीय काल 500 ईसा पूर्व से लेकर लगभग 1000 ईसवी तक चला। इस साहित्य ने पूरे क्षेत्र में एक मुख्य सांस्कृतिक शक्ति के रूप में ख़ुद को स्थापित किया। दक्षिण में शुरू हुए भक्ति साहित्य ने उत्तर भारत में ज़ोर पकड़ा और इसने वर्ण व्यवस्था पर आधारित सामाजिक पदानुक्रम के विचार को एक गंभीर चुनौती दी।
मौलाना जलालुद्दीन बल्खी
वहीं दूसरी ओर, फ़ारसी और सूफ़ी काव्य परंपरा में मौलाना जलालुद्दीन बल्खी (Maulana Jalaluddin Balkhi) का नाम सबसे ऊंचे मुक़ाम पर आता है, जिन्हें आज पूरी दुनिया रूमी के नाम से जानती है। उनका जन्म 30 सितंबर 1207 को फ़ारसी साम्राज्य के पूर्वी छोर पर मौजूद बल्ख प्रांत में हुआ था। जब वे युवा ही थे, तब चंगेज़ ख़ान की हमलावर सेना के खौफ़ से बचने के लिए उनके पिता अपने परिवार को लेकर पश्चिम की ओर चले गए और वर्तमान तुर्की में बस गए। 1244 में उनकी मुलाक़ात शम्स तबरीज़ नाम के एक फ़क़ीर से हुई। रूमी ख़ुद यह मानते थे कि उनकी असली कविता शम्स से मिलने के बाद ही निखर कर सामने आई। शम्स के अचानक ग़ायब होने के बाद रूमी ने उनके गहरे वियोग में 40,000 से ज़्यादा शानदार गीत और छंद लिखे। इस महान संग्रह को दीवान-ए-शम्स-ए-तबरीज़ी कहा जाता है। अपने जीवन के आख़िरी 12 सालों में रूमी ने 64,000 पंक्तियों वाली अपनी सबसे महान रचना मसनवी-ए-मानवी (Masnavi-e-manavi) भी अपने मुंशी को बोलकर लिखवाई। इस मसनवी को कुछ सूफ़ी विचारक फ़ारसी भाषा का क़ुरान भी मानते हैं। संगीत के क्षेत्र में अमीर खुसरो ने भारत की कई स्थायी संगीत परंपराओं की नींव रखी, और उन्होंने भी अपना ज़्यादातर काम फ़ारसी में ही किया था।
लखनऊ और ईरान के बीच इस गहरे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जुड़ाव का एक और बेहद अहम पहलू ईरान के पहले सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी (Ayatollah Ruhollah Khomeini) से भी जुड़ता है। शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि 1979 की इस्लामी क्रांति के प्रणेता खुमैनी की जड़ें असल में उत्तर प्रदेश की इसी ज़मीन से जुड़ी हुई थीं। उनके दादा, सैयद अहमद मूसवी, लखनऊ से महज़ कुछ दूरी पर स्थित बाराबंकी के पास पैदा हुए थे। 1830 के दशक में जब वे भारत से इराक और फिर बाद में ईरान के खुमैन शहर में जाकर बसे, तब भी उन्होंने अपनी भारतीय जड़ों और अपनी जन्मभूमि की पहचान को कभी नहीं भुलाया। इसी पहचान को आजीवन जीवित रखने के लिए उन्होंने अपने नाम के साथ हमेशा "हिंदी" उपनाम जोड़े रखा।
अहमद हिंदी एक प्रखर विद्वान थे और उनके इसी गहरे शिया विश्वास और आध्यात्मिक मूल्यों की विरासत ने अयातुल्ला खुमैनी के वैचारिक दृष्टिकोण को इतनी गहराई से आकार दिया। यह उनके दादा से मिले इन्हीं संस्कारों का प्रभाव था जिसने खुमैनी को एक सुन्नी-बहुल मध्य पूर्व (Middle East) के बीच ईरान के शिया भविष्य को एक नई दिशा देने और उसे एक शक्तिशाली शिया राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की प्रेरणा दी। लखनऊ और बाराबंकी से जुड़ा यह एक इतना सशक्त और प्रसिद्ध ऐतिहासिक तथ्य है जिससे यहाँ के ज़्यादातर लोग भली-भांति परिचित हैं। ज़ाहिर है, इस महत्वपूर्ण कड़ी को शामिल किए बिना भारत और ईरान, ख़ासकर अवध और फ़ारस के रिश्तों की कहानी पूरी तरह अधूरी ही मानी जाएगी।
लखनऊ की नवाबी तहज़ीब और ईरान के बीच क्या गहरा नाता है? लखनऊ की पूरी संस्कृति, वास्तुकला और मशहूर तहज़ीब पर ईरानी प्रभाव बिल्कुल साफ़ और जीवंत देखा जा सकता है। अवध के इन्हीं नवाबों ने लखनऊ को उत्तर भारत का सबसे परिष्कृत शहर बनाया था। ये शिया मुस्लिम शासक अपने पूर्वजों के तार सीधे ईरान के निशापुर शहर से जोड़ते थे। वे 15वीं शताब्दी के सैय्यद सुल्तानों के समय गंगा के मैदानी इलाक़ों में आकर बसे थे। 1707 में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद पैदा हुई राजनीतिक अराजकता का भरपूर फ़ायदा उठाते हुए ये नवाब मुग़ल साम्राज्य के कमज़ोर होने पर धीरे-धीरे स्वतंत्र शासक बन गए। नवाब आसफ़-उद्दौला और उनके बाद वाजिद अली शाह के शानदार शासनकाल में ईरान से पूरी तरह प्रभावित लखनऊ की यह कलात्मक नवाबी संस्कृति अपने चरम शिखर पर पहुँच गई। शासक और दरबारी बेहतरीन मलमल के लंबे कपड़े और उन पर खूबसूरत ब्रोकेड कोट पहना करते थे।
आज भी लखनऊ के पुराने मोहल्लों और ऐतिहासिक इमारतों में यह खूबसूरत ईरानी झलक क़ायम है। नवाब आसफ़-उद्दौला द्वारा बनवाया गया विशाल आसफ़ी इमामबाड़ा शिया धार्मिक अनुष्ठानों का एक प्रमुख केंद्र है। मोहर्रम के दौरान पैगंबर के पोते इमाम हुसैन की शहादत की याद में जो ख़ूबसूरत ताज़िया बनाए जाते हैं, वे असल में हुसैन के मक़बरे की ही हूबहू प्रतिकृतियां होते हैं। लखनऊ की विश्व प्रसिद्ध चिकनकारी, ख़ासकर बारीक मलमल के कपड़े पर सफ़ेद धागे से की जाने वाली जादुई कढ़ाई, इसी परिष्कृत ईरानी संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। पुराने शहर की गलियों में आपको आज भी क़ुरान रखने के स्टैंड बनाने वाले, ताज़िया बनाने वाले कारीगर और पीतल का काम करने वाले आसानी से मिल जाएंगे। खान-पान की बात करें तो इदरीस की दुकान पर कोयले की धीमी आंच पर एक बड़े बर्तन में पकने वाली मटन बिरयानी, मुबीन का लज़ीज़ मुर्ग़ और निहारी कुल्चा, और मशहूर गलावटी कबाब जिसमें 160 प्रकार के विशेष मसाले पड़ते हैं, इसी समृद्ध नवाबी और ईरानी पाक कला की विरासत की देन हैं।लखनऊ, उत्तर प्रदेश और ईरान का रिश्ता केवल इतिहास तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह राजनीतिक रूप से भी अक्सर चर्चा के केंद्र में रहता है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ईरान के पहले सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी (Ayatollah Khomeini) और उत्तर प्रदेश के बीच के ऐतिहासिक संबंध को समझाने वाली ख़बरें भी प्रमुखता से छपी हैं। इन ताज़ा ख़बरों के केंद्र में ईरान की वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति और अमेरिका तथा इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए ताज़ा हवाई हमले हैं। इन भयानक हमलों में ईरान के मौजूदा सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई और उनके परिवार के कई सदस्यों के मारे जाने की बात सामने आई है। इस बड़ी घटना के बाद पूरे ईरान में 40 दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। ये तमाम आधुनिक घटनाक्रम और पुरानी ऐतिहासिक कड़ियाँ इस बात को पूरी तरह से साबित करती हैं कि भारत, ख़ासकर उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर और ईरान के बीच के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक संबंध कितने गहरे और अटूट हैं।