पवित्र, शुद्ध, शांत और सुन्दर है काव्य के सभी रसों में सबसे प्रमुख, श्रृंगार रस

दृष्टि III - कला/सौंदर्य
14-02-2022 11:12 AM
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पवित्र, शुद्ध, शांत और सुन्दर है काव्य के सभी रसों में सबसे प्रमुख, श्रृंगार रस

किसी भी व्यक्ति अथवा जीव के लिए प्रेम को अनुभव करना जितना आसान होता है, उतना ही जटिल होता है, उसे परिभाषित करना! मीरा ने कृष्ण की केवल छवि मात्र का सुमिरन किया, लेकिन उन्होंने कृष्ण से अपार और अवर्णित प्रेम किया! "मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई॥ जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।" मीरा पर लिखित यह पंक्तियां स्पष्ट रूप से यह दर्शाने में सक्षम हैं की, कृष्ण की मोर मुकुट वाली छवि पर मीरा मंत्रमुग्द थी! मीरा के इस प्रेम को काव्यों के प्रमुख 11 रसों में से एक "श्रृंगार रस" से कुछ हद तक समझा जा सकता है।
शृंगार रस सभी रसों में से एक प्रमुख रस माना जाता है। यह रति भाव (रति का सामान्य अर्थ प्रीत होता है अर्थात किसी मनोकूल व्यक्ति से लगाव या उसकी और झुकाव) को दर्शाता है। रस का शाब्दिक अर्थ है - आनन्द। काव्य में जो आनन्द आता है, वह ही काव्य का रस है। काव्य में आने वाला आनन्द अर्थात् रस लौकिक न होकर अलौकिक होता है। श्रृंगार रस को आमतौर पर कामुक प्रेम, प्रेम प्रसंगयुक्त (Romantic), आकर्षण या सौंदर्य के रूप में अनुवादित किया जाता है। इस रस का सिद्धांत रंगमंच, संगीत, नृत्य, कविता और मूर्तिकला सहित शास्त्रीय भारतीय कलाओं के पीछे निहित प्राथमिक अवधारणा है। पारंपरिक भारतीय कलाओं की अधिकांश व्याख्या एक पुरुष और एक महिला के बीच संबंधों के इर्द-गिर्द घूमती है। इस प्रकार उत्पन्न एक प्राथमिक भावना श्रृंगार है। शास्त्रीय रंगमंच/नर्तक (यानी भरतनाट्यम, ओडिसी, मोहिनीअट्टम) श्रृंगार को 'सभी रसों की माता' के रूप में संदर्भित करते हैं। श्रृंगार रस ईर्ष्या, भय, क्रोध, करुणा, और निश्चित रूप से शारीरिक अंतरंगता की अभिव्यक्ति सहित अन्य भावनाओं की अनगिनत अभिव्यक्तियाँ प्रदान करता है। इसके अलावा किसी भी अन्य रस का इतना व्यापक दायरा नहीं है। जो कुछ भी पवित्र, शुद्ध, शांत और देखने योग्य है" उसकी तुलना श्रृंगार रस से की जा सकती है। सभी रसों में से, श्रृंगार को सबसे विस्तृत और उत्साही रस के रूप में निरुपित किया गया है। इसे भावनाओं के राजा (रसराज) के रूप में भी जाना जाता है। जैसे व्यक्तियों के नाम उनके परिवार में पारंपरिक रीति-रिवाजों और प्रथाओं के अनुसार दिए जाते हैं, वैसे ही रस, भाव और अन्य चीजों का नामकरण उनके नाटकीय प्रदर्शन से संबंधित होते हैं। श्रृंगार रस के मामले में भी, इसका नाम इसलिए रखा गया है क्योंकि यह एक सुंदर उज्ज्वल पोशाक के साथ जुड़ता है और सभी को सुखद बनाता है। नाट्यशास्त्र के अनुसार, श्रृंगार रस के परिणाम के पीछे पुरुष और महिला दोनों पात्र हैं। इसके दो अधिष्ठान या आधार हैं, अर्थात् सम्भोग (संघ में प्रेम) और विप्रलंभ (पृथक्करण में प्रेम)। संभोग मिलन का प्रेम है और स्वयं को विभावों या निर्धारकों (adjectives or determiners) के माध्यम से प्रकट करता है। सुहावना मौसम, मालाएं, असगंध, आभूषण, प्रिय और निकट के लोग, कामुक वस्तुएं, उत्कृष्ट भवन, सुख की वस्तुएं, बगीचे में जाना, सुख का अनुभव करना, मधुर आवाज सुनना, सुंदर चीजें देखना, और खेल आदि की प्रस्तुति नाटक में श्रृंगार रस अनुभावों (परिणामों) के इशारों के माध्यम से होता है। शृंगार शब्द का अर्थ एक ऐसे व्यक्ति से है जो सभी वांछनीय चीजों से भरपूर है और आनंद में बहुत रुचि रखता है। जो अपने आनंद को बढ़ाने के लिए ऋतुओं का पूरा उपयोग करता है और जिसके साथ एक युवा युवती भी होती है। नाटकीय प्रदर्शन में इसकी प्रस्तुति मधुर मुस्कान, मनभावन शब्द, धैर्य, हर्षित भाव, शांत आंखें, मुस्कराता हुआ चेहरा आदि के साथ अंगों के सुंदर प्रदर्शनों के माध्यम से होती है। गुप्तोत्तर एवं मध्यकालीन मूर्तियों तथा भारतीय लघुचित्रों में श्रृंगार का विषय अति प्रचलित है। कई विद्वान मानते हैं कि श्रृंगार, रस के रूप में सबसे प्रमुख है, क्योंकि यह एकमात्र ऐसा रस है जिसके साथ भय, आलस्य, क्रूरता और घृणा को छोड़कर सभी पूरक भावनात्मक अवस्थाओं को जोड़ा जा सकता है, और घृणा को सद्भाव में लाया जा सकता है।
श्रंगार रस में डूबी हुई कला को देखने में एक परम आनंद आता है। इसका बेहतरीन उदाहरण राजपूत चित्रों में मौजूद है। इनके अलावा गुप्त और उत्तर-गुप्त काल के दौरान एक पेड़ के नीचे बैठे दिव्य प्रेमियों की मूर्ति, मुगल पेंटिंग जहां एक राजकुमार अपनी दुल्हन की प्रतीक्षा करता है, और विषय के रूप में राधा-कृष्ण के चित्र भी इस संदर्भ में ध्यान देने योग्य हैं।
भारतीय सौंदर्य परंपराओं में, आनंद , प्रेम और (सौंदर्य) एक हो जाते हैं। सौंदर्य के अनुभव के बाद आनंद आता है, और आनंद की वस्तु प्रेम की वस्तु बन जाती है। प्रेम के विभिन्न गुणात्मक रूप हैं। प्रेमी के लिए प्रेम, माता का अपने बच्चे के लिए प्रेम या व्यक्ति का परमात्मा के प्रति प्रेम। प्रेम का अनुभव एक सौंदर्य अनुभव होता है। यह हमारे जीवन को सुशोभित करता है और एक व्यक्ति को एक अहंकार रहित प्राणी में भी परिवर्तित कर सकता है।

संदर्भ

https://bit.ly/34PiwpV
https://bit.ly/3BkF8L5
https://bit.ly/3gHh3ol
https://en.wikipedia.org/wiki/Sringara

चित्र संदर्भ

1. गायों, चरवाहों और गोपियों के साथ कृष्ण को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
2. चेन्नई में श्री देवी नृत्यालय भरतनाट्यम स्कूल की एक नर्तकी द्वारा दर्शाये गए श्रृंगार रस को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
3. मणि माधव चक्यार-श्रृंगार रस अभिव्यक्ति को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)

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