समय - सीमा 279
मानव और उनकी इंद्रियाँ 1061
मानव और उनके आविष्कार 817
भूगोल 276
जीव-जंतु 319
जौनपुरवासियों, जैसे-जैसे हमारा शहर तेज़ी से शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे एक गंभीर समस्या भी हमारे आसपास धीरे-धीरे गहराती जा रही है - प्लास्टिक कचरे की समस्या। रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस्तेमाल होने वाली पॉलीथिन, पैकेजिंग सामग्री, बोतलें और एकल-उपयोग प्लास्टिक न केवल जौनपुर की स्वच्छता और सुंदरता को प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि गोमती नदी, आसपास के जल स्रोतों और जनस्वास्थ्य के लिए भी एक बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। यह समस्या केवल जौनपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट एक राष्ट्रीय संकट का रूप ले चुका है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि हम प्लास्टिक कचरे से जुड़े आंकड़ों, इसके बढ़ते कारणों और इसके दूरगामी प्रभावों को गहराई से समझें और समाधान की दिशा में सोचें।
इस लेख में हम सबसे पहले भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट की वर्तमान स्थिति और उससे जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़ों को समझेंगे। इसके बाद, हम जानेंगे कि आखिर किन कारणों से भारत में प्लास्टिक कचरे की समस्या इतनी तेज़ी से बढ़ रही है। आगे, हम अपशिष्ट प्रबंधन ढांचे की कमज़ोरियों और डेटा रिपोर्टिंग (data reporting) में मौजूद विसंगतियों पर चर्चा करेंगे। फिर, अनौपचारिक अपशिष्ट क्षेत्र की भूमिका और उसकी चुनौतियों को समझने का प्रयास करेंगे। इसके साथ-साथ, कुप्रबंधित प्लास्टिक कचरे के पर्यावरणीय, स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभावों पर भी विस्तार से बात होगी। अंत में, भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े नियमों और सरकारी पहलों पर नज़र डालेंगे, ताकि समाधान की दिशा स्पष्ट हो सके।
भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट की वर्तमान स्थिति और सांख्यिकी
भारत आज वैश्विक प्लास्टिक प्रदूषण के मानचित्र पर एक गंभीर केंद्र बन चुका है। ओईसीडी (OECD) की रिपोर्ट के अनुसार, देश में हर वर्ष लगभग 18 मिलियन मेट्रिक टन (million metric ton) से अधिक प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जो भारत को दुनिया के सबसे बड़े प्लास्टिक कचरा उत्पादक देशों में शामिल करता है। हालाँकि, राज्यों द्वारा रिपोर्ट किए गए सरकारी आंकड़े अक्सर इससे कहीं कम दिखाई देते हैं। यही अंतर इस बात की ओर इशारा करता है कि भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट की वास्तविक स्थिति पूरी तरह दर्ज ही नहीं हो पा रही है। इसके अतिरिक्त, भारत का वैश्विक स्तर पर कुप्रबंधित प्लास्टिक कचरे में लगभग 21% योगदान माना जाता है, जो चिंता का विषय है। यह आँकड़े स्पष्ट करते हैं कि प्लास्टिक अपशिष्ट अब केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं रहा, बल्कि यह नीति निर्माण, प्रशासनिक क्षमता और शहरी नियोजन से जुड़ी एक बड़ी चुनौती बन चुका है।
भारत में प्लास्टिक कचरे की बढ़ती समस्या के प्रमुख कारण
भारत में प्लास्टिक कचरे की तेज़ी से बढ़ती मात्रा के पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और व्यवहारिक कारण हैं। तेज़ शहरीकरण, बढ़ती आबादी और उपभोग-केंद्रित जीवनशैली ने प्लास्टिक उत्पादों की मांग को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है। आज दैनिक उपयोग की लगभग हर वस्तु - खाद्य पैकेजिंग, ऑनलाइन डिलीवरी (online delivery), चिकित्सा आपूर्ति और घरेलू सामान - किसी न किसी रूप में प्लास्टिक पर निर्भर है। विशेष रूप से एकल-उपयोग प्लास्टिक, जैसे कैरी बैग, स्ट्रॉ, डिस्पोज़ेबल (disposable) कटलरी और पैकेजिंग सामग्री, इस समस्या को और गंभीर बनाते हैं। ये वस्तुएँ सस्ती, हल्की और आसानी से उपलब्ध तो हैं, लेकिन इनके उपयोग के बाद निपटान की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है। जागरूकता के बावजूद, व्यवहार में बदलाव की कमी और विकल्पों की सीमित उपलब्धता के कारण इनका इस्तेमाल लगातार जारी है।
अपशिष्ट प्रबंधन ढांचे की कमज़ोरियाँ और डेटा विसंगतियाँ
भारत का अपशिष्ट प्रबंधन ढांचा बढ़ती प्लास्टिक समस्या के अनुरूप विकसित नहीं हो पाया है। बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक, कचरा संग्रहण, पृथक्करण और प्रसंस्करण की व्यवस्थाएँ अक्सर अधूरी या असंगठित दिखाई देती हैं। शहरी क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले कचरे का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी वैज्ञानिक उपचार के खुले लैंडफिल में डाल दिया जाता है। इसके अलावा, कचरा संग्रहण और पुनर्चक्रण से जुड़े आंकड़ों में भी भारी विसंगति पाई जाती है। आधिकारिक रूप से कचरा संग्रहण दर काफ़ी ऊँची बताई जाती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरा या तो खुले में पड़ा रहता है, जलाया जाता है या जल स्रोतों में बह जाता है। इस तरह के डेटा अंतर प्रभावी नीति निर्माण और संकट प्रबंधन को और अधिक जटिल बना देते हैं।
अनौपचारिक अपशिष्ट क्षेत्र की भूमिका और उसकी चुनौतियाँ
भारत में प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन में अनौपचारिक अपशिष्ट क्षेत्र की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। कचरा बीनने वाले, छोटे स्तर के रीसाइक्लर (recycler) और कबाड़ी तंत्र मिलकर देश के लगभग 60% प्लास्टिक कचरे को संभालते हैं। ये लोग बिना किसी सरकारी सहायता या सुरक्षा के, पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को अलग कर पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में योगदान देते हैं। हालाँकि, इस क्षेत्र को न तो औपचारिक मान्यता मिली है और न ही आधुनिक तकनीक, स्वास्थ्य सुरक्षा या सामाजिक सुरक्षा का लाभ। नतीजतन, असुरक्षित और अवैज्ञानिक रीसाइक्लिंग प्रक्रियाएँ कई बार पर्यावरणीय नुकसान को कम करने के बजाय बढ़ा देती हैं। यदि इस क्षेत्र को संगठित, प्रशिक्षित और समर्थित किया जाए, तो यह भारत की प्लास्टिक समस्या के समाधान में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
कुप्रबंधित प्लास्टिक कचरे के पर्यावरणीय, स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभाव
कुप्रबंधित प्लास्टिक कचरा पर्यावरण के लिए अत्यंत विनाशकारी साबित हो रहा है। नालों और जल निकासी प्रणालियों में प्लास्टिक के जमाव से शहरी बाढ़ की समस्या बढ़ रही है, जिसका असर शहरों की बुनियादी संरचना और आम जनजीवन पर पड़ता है। समुद्री और स्थलीय जीव अक्सर प्लास्टिक को भोजन समझकर निगल लेते हैं, जिससे उनकी मृत्यु या गंभीर बीमारियाँ होती हैं। इसके अलावा, माइक्रोप्लास्टिक्स (microplastics) अब पानी, मिट्टी और खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर चुके हैं, जो दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिम पैदा करते हैं। खुले में प्लास्टिक जलाने से निकलने वाले ज़हरीले रसायन श्वसन रोगों, हार्मोनल असंतुलन (hormonal imbalance) और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जुड़े हुए हैं। आर्थिक दृष्टि से भी, बिना एकत्रित और कुप्रबंधित प्लास्टिक कचरा भारत को हर वर्ष अरबों डॉलर के संभावित नुकसान की ओर धकेल रहा है।
भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के नियम और सरकारी पहलें
प्लास्टिक संकट से निपटने के लिए भारत सरकार ने समय-समय पर कई महत्वपूर्ण नियम और नीतियाँ लागू की हैं। प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 और उसके बाद के संशोधनों में एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध, प्लास्टिक कैरी बैग की मोटाई बढ़ाना और विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) जैसे प्रावधान शामिल हैं। इनका उद्देश्य उत्पादकों को अपने उत्पादों से उत्पन्न कचरे की ज़िम्मेदारी लेने के लिए बाध्य करना है। इसके साथ ही, स्वच्छ भारत मिशन, भारत प्लास्टिक समझौता, प्रोजेक्ट रीप्लान (Project Replan) और अन्य साझेदारी पहलें प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने की दिशा में प्रयास कर रही हैं। हालांकि, इन नियमों और पहलों की वास्तविक सफलता उनके सख़्त क्रियान्वयन, निगरानी और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी पर निर्भर करती है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/mr46ubpb
https://tinyurl.com/2s4x4pzp
https://tinyurl.com/433swx8z
https://tinyurl.com/bdfju4cv
A. City Readerships (FB + App) - This is the total number of city-based unique readers who reached this specific post from the Prarang Hindi FB page and the Prarang App.
B. Website (Google + Direct) - This is the Total viewership of readers who reached this post directly through their browsers and via Google search.
C. Messaging Subscribers - This is the total viewership from City Portal subscribers who opted for hyperlocal daily messaging and received this post.
D. Total Viewership - This is the Sum of all our readers through FB+App, Website (Google+Direct), Email, WhatsApp, and Instagram who reached this Prarang post/page.
E. The Reach (Viewership) - The reach on the post is updated either on the 6th day from the day of posting or on the completion (Day 31 or 32) of one month from the day of posting.