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लखनऊवासियों, हमारी नवाबी सरज़मीं हमेशा से ही विविध संस्कृतियों, लोक–परंपराओं और रंगीन उत्सवों को खुले दिल से अपनाने के लिए जानी जाती है। यहाँ की गली में अदब, तहज़ीब, संगीत और त्योहारों की रौनक एक साथ धड़कती है। ऐसे में, भले ही लोहड़ी पंजाब और उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों का प्रमुख पर्व हो, लेकिन इसकी लोककथाएँ, अग्नि–पूजन की परंपरा, फसल कटाई की खुशी और समुदाय को जोड़ने वाली गर्माहट ऐसी है कि इसे समझना और इसके बारे में जानना हम लखनऊवासियों के लिए भी उतना ही दिलचस्प है। लोहड़ी सिर्फ एक त्योहार नहीं—यह लोकमान्यताओं, ऐतिहासिक वीरगाथाओं और सामाजिक एकता का प्रतीक है। इसकी शुरुआत, इसके पीछे छिपी कहानियाँ, दुल्ला भट्टी की लोकनायकता, सर्द रात में जलता अलाव, तिल–गुड़ की मिठास और फसल की खुशहाली जैसे पहलू इस पर्व को और भी अर्थपूर्ण बनाते हैं।
आज हम लोहड़ी की उत्पत्ति और इससे जुड़ी प्रमुख लोकमान्यताओं को समझने से शुरुआत करेंगे। फिर, हम इसकी तिथि, समय और सूर्य की उत्तरायण गति से जुड़े धार्मिक-सांस्कृतिक आधार पर नज़र डालेंगे। इसके बाद, हम दुल्ला भट्टी की वीरगाथा जानेंगे—जिन्हें लोहड़ी का लोकनायक माना जाता है। अंत में, हम लोहड़ी के अलाव, नृत्य-संगीत, भोजन और कृषि से जुड़े महत्व पर चर्चा करेंगे, जिससे इस पर्व का सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप पूरी तरह स्पष्ट हो सके।
लोहड़ी का इतिहास, उत्पत्ति और लोकमान्यताएँ
लोहड़ी का इतिहास उतना ही गर्मजोशीभरा है जितना इसके अलाव की लौ। इसकी उत्पत्ति को लेकर कई मान्यताएँ और लोककथाएँ सदियों से लोगों के हृदय में बसी हुई हैं। सबसे प्राचीन मान्यता बताती है कि यह पर्व दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की स्मृति में मनाया जाता है। लोग मानते थे कि अग्नि पवित्रता, त्याग और आत्मशक्ति का प्रतीक है—और यही कारण है कि समय के साथ यह अग्नि लोहड़ी के अलाव के रूप में स्थापित हो गई। एक दूसरी लोकप्रिय लोककथा इसे संत कबीर की पत्नी लोई से जोड़ती है। कहा जाता है कि उनके नाम से ही “लोई → लोहड़ी” एक सांस्कृतिक परिवर्तन के रूप में विकसित हुआ। यह नाम आज भी उत्तर भारत के ग्रामीण लोकगीतों और कहावतों में सुना जा सकता है। कुछ विद्वान “लोह” शब्द को गर्मी, रोशनी या अग्नि के अर्थ से जोड़ते हैं, जो इसे एक सर्दियों-विदाई पर्व के रूप में दिखाता है। वहीं, पंजाब की एक और मनमोहक कथा बताती है कि होलिका और लोहड़ी दो बहनें थीं—जहाँ होलिका अग्नि में जल गई, पर लोहड़ी जीवित बच गई। इसलिए लोग इस पर्व में अग्नि को जीवन, सौभाग्य और सुरक्षा का प्रतीक मानकर उसकी परिक्रमा करते हैं। इन सभी कथाओं को जोड़ने वाला धागा एक ही है—लोहड़ी मनुष्य के जीवन में अग्नि, ऊष्मा, प्रकाश और शुभारंभ का उत्सव है, जो प्रकृति और समाज के बीच गहरा भावनात्मक संबंध स्थापित करता है।

लोहड़ी का समय, तिथि और धार्मिक-सांस्कृतिक आधार
लोहड़ी की तिथि केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि सूर्य की गति, मौसम के बदलाव और प्रकृति के चक्र से जुड़ी हुई है। शक संवत पंचांग के अनुसार यह पर्व पौष माह के अंतिम दिन, यानी मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर में यह प्रायः 12 या 13 जनवरी को पड़ता है—और यही निश्चितता इसे हर वर्ष एक स्थायी प्रतीक बनाती है। लोहड़ी का धार्मिक महत्व सूर्य की उत्तरायण गति से आता है। जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर बढ़ना शुरू करता है, तो इसे ऊर्जा, उष्मा और जीवनशक्ति की वापसी माना जाता है। इसी कारण लोहड़ी को सर्दियों की समाप्ति और बसंत ऋतु की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है। यह त्योहार उत्तर भारत की सांस्कृतिक धड़कन है—पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर के लोग इसे अपार उत्साह, संगीत और समुदायिक मेल-मिलाप के साथ मनाते हैं। अग्नि की पूजा इस दिन का केंद्र है, जहाँ लोग तिल, गुड़, रेवड़ी और मूंगफली अर्पित करते हैं। ये वस्तुएँ समृद्धि, पवित्रता, ऊर्जा और कृषि-समृद्धि के प्रतीक मानी जाती हैं। यह सिर्फ एक पर्व नहीं—बल्कि सूर्य, प्रकृति और मानव जीवन के बीच एक गहरा आध्यात्मिक संवाद है।

दुल्ला भट्टी: लोहड़ी के लोकनायक की गाथा
लोहड़ी का जश्न दुल्ला भट्टी की वीरता के बिना अधूरा है। “सुंदर मुंदरिए हो…” जैसे लोकगीत आज भी पंजाब के गाँवों में गूँजते हैं और हर बार लोगों को उस नायक की याद दिलाते हैं जिसने सामाजिक न्याय को अपना धर्म माना। अकबर के शासनकाल में पंजाब के कई हिस्सों में गरीब लड़कियों को जबरन अमीरों को बेच दिया जाता था। यह बाज़ार की तरह चलने वाली अमानवीय प्रथा समाज के लिए कलंक थी। दुल्ला भट्टी ने इसका विरोध किया, लड़कियों को छुड़ाया और उनकी रक्षा की। इतना ही नहीं—उन्होंने बिना किसी स्वार्थ के उचित वर ढूँढकर उनकी शादी भी करवाई और समाज को एक संदेश दिया कि मानवता सबसे बड़ा धर्म है। उनकी बहादुरी और न्यायप्रियता के कारण उन्हें “पंजाब का रॉबिनहुड” कहा गया। लोहड़ी की रात, जब बच्चे और बड़े दुल्ला भट्टी के गीत गाते हैं, तो यह केवल एक परंपरा नहीं—बल्कि उस ऐतिहासिक नायक के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव है, जिसने निडर होकर दूसरों के लिए खड़े होने का साहस दिखाया।
लोहड़ी का अलाव, अनुष्ठान और लोक परंपराएँ
लोहड़ी का अलाव केवल जलती लकड़ियाँ नहीं—यह गाँव, मोहल्ले और परिवारों को एक साथ लाने वाली सांस्कृतिक लौ है। त्योहार से कई दिन पहले बच्चे घर-घर जाकर लकड़ी, उपले, सूखे पत्ते, रेवड़ी और अन्य सामग्री इकट्ठा करते हैं। यह प्रक्रिया ही समुदायिकता और साझेदारी की भावना सिखाती है। त्योहार की शाम जब अलाव जलता है, तो लोग उसके चारों ओर बैठते, नाचते और गीत गाते हैं। वे अलाव में—
जैसी चीज़ें डालते हैं। माना जाता है कि ये अर्पण समृद्धि, ऊर्जा और शुभकामना के प्रतीक हैं। नवविवाहित दंपतियों और नवजात पुत्र वाले परिवारों के लिए यह दिन विशेष रूप से शुभ माना जाता है। उनके घर की पहली लोहड़ी धूमधाम, गीत-संगीत और सामूहिक और आशीर्वाद के साथ मनाई जाती है। लोग विश्वास करते हैं कि लोहड़ी की आग के सामने कही गई मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं—इसलिए लोग अलाव के चारों ओर घूमकर अपने जीवन की आशाएँ अग्नि को सौंपते हैं।
लोकनृत्य, संगीत, भोजन और पारंपरिक रीति-रिवाज
लोहड़ी का जश्न संगीत और नृत्य के बिना अधूरा है। ढोल की थाप पर जब भांगड़ा और गिद्धा की झूमती लय उठती है, तो पूरा वातावरण एक उत्सवस्थल बन जाता है। पुरुष ढोल की तेज थाप पर नाचते हैं और महिलाएँ फुलकारी दुपट्टे और पारंपरिक गहनों के साथ गिद्धा करती हैं। पंजाबी खानपान इस दिन एक विशेष रंग जोड़ता है। घरों में विशेष रूप से—
बनाए जाते हैं। ये न केवल स्वाद, बल्कि कृषि और मौसम से जुड़े प्रतीक हैं। कई जगह पतंगबाजी भी लोहड़ी का अभिन्न हिस्सा है—रंग-बिरंगी पतंगें आकाश में जैसे नया मौसम, नई उम्मीदें और नए सपनों का संदेश देती हैं। यह पर्व पारंपरिक पंजाबी पोशाकों, रंग, रौनक और खुशियों का मेल है जो इसे भारत के सबसे जीवंत त्योहारों में से एक बनाता है।

किसानों के लिए लोहड़ी का महत्व और सामाजिक आयाम
किसानों के लिए लोहड़ी केवल त्योहार नहीं—बल्कि धन्यवाद और उम्मीद का पर्व है। यह रबी फसलों, विशेषकर गन्ने और गेहूँ, के तैयार होने का प्रतीक है। खेतों में लगी मेहनत के फल देखने का यह समय खुशी, गर्व और आभार का अवसर होता है। किसान इस दिन प्रकृति, मौसम और धरती माता के प्रति आभार व्यक्त करते हैं और प्रार्थना करते हैं—
के लिए। पंजाब के कई इलाकों में इसे “लोही” भी कहा जाता है, जहाँ फसल की पहली बाली अग्नि को अर्पित की जाती है। यह कृषि-आश्रित समाज में प्रकृति और मनुष्य के बीच संबंध को और मजबूत करता है। लोहड़ी किसानों के लिए नए कृषि वर्ष की शुरुआत भी मानी जाती है—एक तरह से उनका आर्थिक नववर्ष। इस प्रकार लोहड़ी केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति, कृषि और जीवन के उत्साह का एक अद्भुत संगम है।
संदर्भ
https://bit.ly/3KcEELe
https://tinyurl.com/mpa3b5ze
https://tinyurl.com/4fyb9maf
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