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लखनऊ, क्या आप जानते हैं कि "धरणी" संस्कृत मंत्र क्या हैं? दरअसल, दुनिया में प्रिंटिंग (मुद्रण) की सबसे पहली तकनीक (चीन, कोरिया और जापान में) इन्हीं धरणी मंत्रों को रिकॉर्ड करने, दोहराने और प्रचारित करने के लिए शुरू की गई थी। आइए, आज इसके पीछे मौजूद संभावित कारणों और इतिहास को समझते हैं। अधिकांश धरणी "सिद्धम" लिपि में हैं, जिसका उपयोग शुरूआत में भारत में होता था। सिद्धम लिपि एक आबूगीदा या वर्णमाला लिपि है, जो आधुनिक भारतीय लिपियों से निकटता से संबंधित है। चलिए पढ़ते हैं।
धरणी, जिन्हें विद्या और परिता के नाम से भी जाना जाता है, लंबे बौद्ध मंत्र हैं, जो स्मरणीय कोड, मंत्र या सस्वर पाठ के रूप में कार्य करते हैं। लगभग सभी धरणी मंत्र संस्कृत में रचे गए थे, हालांकि कुछ धरणी पाली भाषा में भी मिलते हैं। माना जाता है कि, ये मंत्र बौद्ध साधकों के लिए सुरक्षा रुपी कवच बनकर, उन्हें आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी ले जाने की शक्ति रखते हैं। यही वजह है कि ये मंत्र ऐतिहासिक बौद्ध साहित्य का एक बड़ा हिस्सा हैं। अधिकांश संस्कृत धरणी को 'सिद्धम' जैसी लिपियों में लिखा गया है, जिसका चीनी, कोरियाई, जापानी, वियतनामी, सिंहली, थाई आदि क्षेत्रीय लिपियों में लिप्यंतरण (Transliteration) किया जा सकता है। ये मंत्र वैदिक मंत्रों और पाठों के समान ही हैं, और उनकी निरंतरता को दर्शाते हैं।

धरणी मंत्र बौद्ध धर्म की सभी प्रमुख परंपराओं के प्राचीन ग्रंथों में पाए जाते हैं। ये थेरवाद परंपरा द्वारा संरक्षित 'पाली कैनन' (Pali Cannon) का एक बड़ा हिस्सा हैं। 'सद्धर्मपुण्डरीक सूत्र' (कमल सूत्र) और 'हृदय सूत्र' जैसे महायान सूत्रों में भी धरणी मंत्र शामिल हैं, या उनके अंत में ये मंत्र दिए गए हैं। 'पंचरक्षा' जैसे कुछ बौद्ध ग्रंथ, पूरी तरह से धरणी को ही समर्पित हैं। ये नियमित अनुष्ठानिक प्रार्थनाओं का हिस्सा होने के साथ-साथ अपने आप में एक ताबीज या भाग्य आकर्षक भी माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इनका पाठ करने से दुर्भाग्य, बीमारियाँ या अन्य आपदाएँ टल जाती हैं। पूर्वी एशिया में, बौद्ध मठों के प्रशिक्षण में ये एक अनिवार्य हिस्सा थे। कुछ बौद्ध क्षेत्रों में तो इनका इतना महत्व था कि, किसी भी कारवाही की स्तिथि में, कोई गवाह सत्य बोलने की शपथ इन्हीं ग्रंथों पर हाथ रखकर लेते थे।
पहली सहस्राब्दी ईस्वी में पूर्वी एशिया में 'धरणी-साहित्य' काफी लोकप्रिय हो गया था। चीनी रिकॉर्ड बताते हैं कि, ईस्वी सन् की शुरुआती शताब्दियों में ही इनका काफी प्रसार हो चुका था। तभी से ये चीन से कोरिया और जापान में पहुँचे। बौद्ध भक्तों के बीच इन छपे हुए धरणी मंत्रों की भारी मांग ने ही, शायद मुद्रण (Printing) तकनीक के विकास को प्रेरणा दी। रॉबर्ट सीवेल (Robert Sewell) और अन्य विद्वानों का मानना है कि, पूर्वी एशिया के ये धरणी रिकॉर्ड दुनिया के सबसे पुराने "प्रमाणित मुद्रित ग्रंथ" हैं। दक्षिण कोरिया के ग्योंग्जू (Gyeongju) में स्थित 'बुलगुक्सा (Bulguksa)' मंदिर से मिले आठवीं शताब्दी के शुरुआती धरणी ग्रंथों को दुनिया के सबसे पुराने ज्ञात मुद्रित ग्रंथों के रूप में मान्यता प्राप्त है। एक तरफ, कागज पर 'वुडब्लॉक प्रिंटिंग' (लकड़ी के ठप्पों से मुद्रण) का सबसे पुराना नमूना 1974 में, चीन के शियान (Xi'an) में खुदाई के दौरान मिला था। यह गांजे के रेशों से बने कागज (Hemp paper) पर छपा एक धरणी सूत्र है, जो तत्कालीन तांग राजवंश (618–907 ईस्वी) के दौरान लगभग 650 से 670 ईस्वी का है। वहीं तांग राजवंश के ही शुरुआती काल का एक और मुद्रित दस्तावेज़ मिला है, जो 690 से 699 ईस्वी के बीच छपा 'सद्धर्मपुण्डरीक सूत्र' या कमल सूत्र (Lotus Sutra) है।1966 में शोधकर्ताओं को दक्षिण कोरिया के बुलगुक्सा बौद्ध मंदिर के अंदर रेशमी कपड़े में लिपटा हुआ कागज का एक स्क्रॉल (Paper Scroll) मिला। यह 'प्योर लाइट धरणी सूत्र (Pure Light Dharani Sutra)' नामक बौद्ध सूत्र की एक प्रति थी। जोसेफ नीधम (Joseph Needham) ने 1970 में इसके लिखे जाने का समय लगभग 684 से 704 ईस्वी के बीच बताया था। बाद में, 1968 में मैकगिल विश्वविद्यालय (McGill University) ने 'ह्याकुमान्तो धरणी' (Hyakumanto Dharani) की एक प्रति हासिल की, जो मुद्रित पाठ के सबसे पुराने जीवित उदाहरणों में से एक है। इसके साथ वह छोटा लकड़ी का पैगोडा भी था, जिसमें इसे हजार साल से भी पहले रखा गया था।
प्राचीन काल में माना जाता था कि, धरणी का जाप करने या उसकी प्रतिलिपि तैयार करने से व्यक्ति या पूरे देश की रक्षा होती है। जापान की महारानी - शोतोकु (Shotoku) ने आठवीं शताब्दी में बौद्ध धर्मगुरुओं को शांत करने और तब वहां हुए एक विद्रोह में मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए इन धरणी मंत्रों को छपवाया था। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, लगभग 770 ईस्वी के आसपास पूरे जापान में इस धरणी की दस लाख प्रतियाँ बनाकर बांटी गई थीं। इनमें से प्रत्येक धरणी को एक छोटे लकड़ी के पैगोडा में रखा गया था। पैगोडा का सबसे मुख्य धार्मिक कार्य बुद्ध के अवशेषों को सुरक्षित रखना और पूजा स्वीकार करना होता है। इस पैगोडा का मुख्य हिस्सा 'हिनोकी' लकड़ी से बना है और सफेद रंग से रंगा गया है। इसका शिखर चेरी के पेड़ से प्राप्त लकड़ी से बना है।

यह धरणी पाठ एक छोटे कागज के स्क्रॉल पर छपा है, जिसमें चीनी अक्षरों की तेईस कतारें हैं। इन प्रतियों की विशाल संख्या और छपे हुए अक्षरों की बनावट को देखते हुए, आज भी विद्वानों के बीच बहस होती है कि, क्या इन्हें लकड़ी के ब्लॉकों से छापा गया था या फिर, धातु प्रकार (Metal type) यंत्र का इस्तेमाल किया गया था? जो भी हो, उत्पादन का इतना बड़ा पैमाना सदियों तक दोबारा नहीं देखा गया।
चलिए, अब हम धरणी मंत्रों की सिद्धम लिपि और आबूगीदा प्रणाली के बारे में जानते हैं। सिद्धम (जिसे कुटिला भी कहा जाता है) एक भारतीय लिपि है, जिसका उपयोग भारत में छठी से तेरहवीं शताब्दी तक किया गया था। इसे 'सिद्धमृत्का' के नाम से भी जाना जाता है। यह मध्यकालीन ब्राह्मी ‘आबूगीदा’ लिपि है, जो गुप्त लिपि से निकली है और आज की नागरी (देवनागरी), बंगाली, तिरहुता, ओडिया और नेपाली लिपियों की जननी है। भारतीय बौद्धों द्वारा सिद्धम लिपि का व्यापक रूप से उपयोग किया गया था, और आज भी पूर्वी एशियाई बौद्धों के बीच मंत्रों और धरणी लिखने के लिए इसका उपयोग होता है।
संस्कृत में 'सिद्धम' शब्द का अर्थ "सिद्ध", "पूर्ण" या "सफल" है। इस लिपि का यह नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि दस्तावेजों की शुरुआत में 'सिद्धम' या 'सिद्धम अस्तु' (सिद्धि हो) लिखने का रिवाज था। सिद्धम एक वर्णमाला (Alphabet Set) न होकर, एक आबूगीदा (Abugida) लिपि है। इसमें हर अक्षर एक शब्दांश (Syllable) को दर्शाता है, जिसमें एक व्यंजन और (संभावित रूप से) एक स्वर शामिल होता है। यदि स्वर अलग से नहीं दिखाया गया है, तो 'अ' का स्वर उसमें पहले से ही माना जाता है। अन्य स्वरों को दर्शाने के लिए मात्राओं (Diacritic marks) का उपयोग किया जाता है, जैसे कि - अनुस्वार और विसर्ग।
सिद्धम ग्रंथों को अन्य भारतीय लिपियों की तरह, आमतौर पर बाएं से दाएं और फिर ऊपर से नीचे लिखा जाता था। लेकिन कभी-कभी इसे पारंपरिक चीनी शैली में, ऊपर से नीचे और दाएं से बाएं भी लिखा जाता था। सिद्धम-जापानी द्विभाषी ग्रंथों में एक रोचक बात दिखती है। पांडुलिपि को 90 डिग्री घुमाकर जापानी भाषा ऊपर से नीचे लिखी जाती थी, और फिर वापस घुमाकर सिद्धम लिपि बाएं से दाएं लिखी जाती थी।
दरअसल, एक आबूगीदा (जिसे 'अल्फासिलेबल' भी कहते हैं - alphasyllable) एक ऐसी लेखन प्रणाली है, जिसमें व्यंजन-स्वर के अनुक्रम को एक इकाई के रूप में लिखा जाता है। हर इकाई एक व्यंजन पर आधारित होती है और स्वर का स्थान गौण (मात्रा के रूप में) होता है। यह अंग्रेजी जैसी पूर्ण ‘अल्फाबेट’ प्रणाली से अलग है, जहाँ स्वर और व्यंजन का दर्जा बराबर होता है। हिंदी और अंग्रेजी के बीच सबसे बड़ा अंतर यही है कि, हिंदी में शब्द केवल व्यंजनों और स्वरों का क्रम नहीं है। यहाँ व्यंजन-स्वर मिलकर एक इकाई बनते हैं, जहाँ स्वर की मात्रा व्यंजन पर निर्भर होती है। इसी को अबुगिदा या वर्णमाला प्रणाली कहते हैं।
संदर्भ
1. https://shorturl.at/mUOvx
2. https://shorturl.at/jtU4n
3. https://shorturl.at/pBoPI
4. https://shorturl.at/n9NDx
5. https://shorturl.at/Yaidp
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7. https://rb.gy/eeldjm
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