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भारत में सरकारी नौकरी महज़ एक रोज़गार नहीं, बल्कि एक सामाजिक रुतबा और जीवनभर की सुरक्षा का पर्याय बन चुकी है। देश भर के कोचिंग हब, चाहे वह दिल्ली का मुखर्जी नगर हो या उत्तर प्रदेश के छोटे-बड़े शहर, हर जगह युवा अपने सुनहरे भविष्य का सपना लिए किताबों में उलझे नज़र आते हैं। साल 2026 आते-आते यह प्रतिस्पर्धा अपने चरम पर पहुंच गई है। करोड़ों युवा हर साल उन चंद हज़ार नौकरियों के लिए आवेदन कर रहे हैं, जिनकी सफलता दर एक फ़ीसदी से भी कम है।
क्या है सरकारी नौकरी के पीछे युवाओं के इस दीवानेपन की असली वजह?
सरकारी परीक्षाओं में बढ़ती इस भयंकर प्रतिस्पर्धा के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण छिपे हैं। भारत में युवाओं की एक बहुत बड़ी आबादी हर साल ग्रैजुएशन पूरी करके नौकरी के बाज़ार में कदम रखती है। लेकिन निजी क्षेत्र में नौकरियों की अनिश्चितता, छंटनी का डर और आर्थिक मंदी के दौर में अस्थिरता युवाओं को सरकारी नौकरी की ओर धकेल रही है।
सरकारी नौकरियां एक तय वेतन, समय पर प्रमोशन, रिटायरमेंट के बाद पेंशन और बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करती हैं। इसके अलावा, समाज में सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाली इज़्ज़त और शादी के बाज़ार में उनकी बढ़ती मांग भी एक बड़ा भावनात्मक कारण है। आज इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की पहुंच के कारण गांवों और छोटे कस्बों के छात्र भी ऑनलाइन कोचिंग और मॉक टेस्ट के ज़रिए इन परीक्षाओं की पूरी गंभीरता से तैयारी कर रहे हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा का स्तर और भी ज़्यादा कठिन हो गया है।
कौन सी प्रमुख परीक्षाएं बनी हैं युवाओं का सबसे बड़ा लक्ष्य?
भारत में सरकारी नौकरियों के लिए कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं। इनमें सबसे ऊपर संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा आती है। इसके तहत आईएएस, आईपीएस और आईएफएस जैसे शीर्ष पदों पर भर्तियां होती हैं। यह देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक है, जिसमें तीन चरण होते हैं—प्रिलिम्स, मेन्स और इंटरव्यू।

इसके बाद कर्मचारी चयन आयोग यानी एसएससी की सीजीएल और सीएचएसएल परीक्षाएं युवाओं के बीच काफ़ी लोकप्रिय हैं। सीजीएल के ज़रिए ग्रुप बी और ग्रुप सी के पदों पर भर्तियां होती हैं, जबकि सीएचएसएल के ज़रिए क्लर्क और डाटा एंट्री ऑपरेटर के पदों पर चयन होता है। वहीं, रेलवे भर्ती बोर्ड की एनटीपीसी परीक्षा देश की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक है, जिसमें स्टेशन मास्टर और क्लर्क जैसे पदों के लिए एक करोड़ से ज़्यादा आवेदन आते हैं।
रक्षा क्षेत्र में जाने के इच्छुक युवा एनडीए, सीडीएस और एफ़कैट जैसी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। इसके अलावा, राज्यों के लोक सेवा आयोग और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में इंजीनियरों की भर्ती के लिए होने वाली गेट परीक्षा भी युवाओं के प्रमुख लक्ष्यों में शामिल है।
बैंकिंग परीक्षाओं में कितनी भयंकर है प्रतिस्पर्धा की ज़मीनी हक़ीक़त?
बैंकिंग सेक्टर हमेशा से युवाओं की पहली पसंद रहा है। आईबीपीएस, एसबीआई और रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया द्वारा आयोजित परीक्षाओं में हर साल लाखों उम्मीदवार भाग लेते हैं। आंकड़ों पर नज़र डालें तो आईबीपीएस की विभिन्न परीक्षाओं के लिए हर साल लगभग डेढ़ से दो करोड़ उम्मीदवार आवेदन करते हैं। आईबीपीएस पीओ परीक्षा में आम तौर पर आठ से दस लाख उम्मीदवार महज़ कुछ हज़ार पदों के लिए परीक्षा देते हैं।
एसबीआई पीओ की बात करें तो इसके लिए भी लगभग 9 लाख उम्मीदवार आवेदन करते हैं। अगर सफलता दर की बात की जाए, तो आईबीपीएस पीओ में यह महज़ 0.5 फ़ीसदी के आसपास रहती है, जबकि एसबीआई पीओ में उच्च प्रतिस्पर्धा के कारण सफलता दर 0.22 फ़ीसदी तक गिर जाती है। रिज़र्व बैंक के ग्रेड बी अफ़सर की परीक्षा सबसे कठिन मानी जाती है, जहां सफलता दर 0.1 से 0.2 फ़ीसदी ही है। बैंकिंग परीक्षाओं में लगभग 40 से 45 फ़ीसदी महिला उम्मीदवार भी भाग लेती हैं, जो इस क्षेत्र में महिलाओं के बढ़ते रुझान को दर्शाता है।
आईबीपीएस पीओ परीक्षा में पिछले पांच सालों के रिक्त पदों के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि अवसर कैसे घटते-बढ़ते रहते हैं। साल 2021 में 4,135 पद थे, जो 2022 में बढ़कर 6,432 हो गए। साल 2023 में यह संख्या गिरकर 3,049 रह गई। वहीं, 2024 में 5,973 पदों पर भर्ती हुई और 2025 में 5,208 पदों के लिए अधिसूचना जारी की गई है। पदों की यह अस्थिरता उम्मीदवारों के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाती है।
क्या नई भर्ती नीतियों से बैंकिंग उम्मीदवारों को राहत मिलेगी?
बैंकिंग क्षेत्र में लंबे समय से एक बड़ी समस्या देखी जा रही थी। ग्रामीण बैंकों यानी आरआरबी, राष्ट्रीयकृत बैंकों और एसबीआई के बीच उम्मीदवारों के बार-बार नौकरी बदलने से बैंकों को भारी नुक़सान हो रहा था। कई उम्मीदवार पहले आरआरबी ज्वाइन कर लेते थे और फिर एसबीआई या अन्य बड़े बैंकों का रिज़ल्ट आने पर वहां चले जाते थे।
इस समस्या को सुलझाने के लिए वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग ने नई भर्ती नीतियां लागू की हैं। अब रिज़ल्ट जारी करने का एक तय क्रम होगा। सबसे पहले एसबीआई अपने रिज़ल्ट घोषित करेगा, उसके बाद राष्ट्रीयकृत बैंक और सबसे अंत में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के रिज़ल्ट आएंगे। इसके साथ ही, अफ़सर स्तर के रिज़ल्ट क्लर्क स्तर से पहले जारी किए जाएंगे। इससे उम्मीदवारों को अपने करियर का सही फ़ैसला लेने में मदद मिलेगी और बैंकों में खाली होने वाले पदों की समस्या भी ख़त्म होगी।
क्या यह कठिन संघर्ष देश के युवाओं का सुनहरा समय बर्बाद कर रहा है?
एक कड़वी हक़ीक़त यह भी है कि सरकारी नौकरी पाने की इस अंधी दौड़ में करोड़ों युवा अपनी ज़िंदगी का सबसे सुनहरा समय खो रहे हैं। 18 से 30 वर्ष की उम्र वह समय होता है जब इंसान की रचनात्मकता और ऊर्जा सबसे अधिक होती हैं। लेकिन लाखों युवा इस उम्र को एक छोटे से कमरे में बंद होकर, केवल उन तथ्यों को रटने में गुज़ार देते हैं, जिनका असल दुनिया में कोई ख़ास उपयोग नहीं है।

देश में कोचिंग की एक पूरी इंडस्ट्री खड़ी हो चुकी है, जिसका कारोबार 58,000 करोड़ रुपये को पार कर गया है। हर साल सात करोड़ से ज़्यादा छात्र इन संस्थानों में दाखिला लेते हैं। मुखर्जी नगर और कोटा जैसे शहर इन उम्मीदों के बाज़ार बन चुके हैं। जब एक 28 साल का युवा पांच-छह साल की लगातार असफलता के बाद प्राइवेट सेक्टर में नौकरी खोजने निकलता है, तो उसके पास न तो कोई कार्यानुभव होता है और न ही बाज़ार की मांग के हिसाब से कोई स्किल। इसके अलावा, लगातार मिलने वाली असफलताएं युवाओं को गहरे अवसाद और मानसिक तनाव में धकेल रही हैं।
क्या सरकार और नई योजनाएं छात्रों की इस राह को आसान बना रही हैं?
इन तमाम चुनौतियों और आर्थिक परेशानियों के बीच, उत्तर प्रदेश सरकार की 'मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना' जैसी पहल एक बड़ी राहत बनकर सामने आई है। साल 2020 में शुरू की गई यह योजना राज्य के उन ग़रीब और मेधावी छात्रों के लिए वरदान है, जो महंगी कोचिंग की फ़ीस नहीं भर सकते।

इस योजना के तहत यूपीएससी, एनईईटी, जेईई, एनडीए और सीडीएस जैसी अहम परीक्षाओं के लिए पूरी तरह से मुफ़्त कोचिंग दी जाती है। छात्रों को बड़े शहरों में जाने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि उनके अपने ज़िले में ही अफ़सरों और विशेषज्ञ शिक्षकों द्वारा मार्गदर्शन प्रदान किया जाता है। मुफ़्त स्टडी मटेरियल, मॉक टेस्ट और ऑनलाइन-ऑफ़लाइन क्लास की सुविधा ने उन छात्रों को एक समान अवसर दिया है, जिनके पास प्रतिभा तो है लेकिन संसाधनों की कमी है।
सरकारी नौकरियों का रास्ता आसान नहीं है। इसमें सफलता का प्रतिशत भले ही बहुत कम हो, लेकिन सही रणनीति, स्मार्ट तैयारी और बैकअप प्लान के साथ युवा इस चक्रव्यूह को भेद सकते हैं। 2026 के इस दौर में सिर्फ़ कड़ी मेहनत नहीं, बल्कि एक अनुशासित और योजनाबद्ध नज़रिया ही सफलता की असल कुंजी है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2cz7sp6j
2. https://tinyurl.com/252a6nra
3. https://tinyurl.com/28qphogv
4. https://tinyurl.com/226znn65
5. https://tinyurl.com/27jtskgs
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