कंप्यूटर के आविष्कार से पहले, लोग संख्याओं का हिसाब रखने और बुनियादी गणना करने के लिए लाठी, पत्थर और हड्डियों जैसे सरल उपकरणों पर निर्भर थे। जैसे-जैसे तकनीक आगे बढ़ी और इंसानी समझ का विकास हुआ, एबेकस (Abacus) और नेपियर्स बोन्स (Napier's Bones) जैसे अधिक उन्नत उपकरण विकसित किए गए। हालांकि ये शुरुआती उपकरण बुनियादी कम्प्यूटेशनल उपकरणों के रूप में काम करते थे, लेकिन जटिल गणनाओं को संभालने में इनकी क्षमता बेहद सीमित थी। समय के साथ तकनीक ने करवट ली और आज हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) के युग में प्रवेश कर चुके हैं।
शुरुआती दौर में गणना के लिए किन उपकरणों का इस्तेमाल होता था?
कंप्यूटर का इतिहास हजारों साल पुराना है। चीन द्वारा बनाया गया एबेकस 4000 ईसा पूर्व के आसपास अस्तित्व में आया और इसे अक्सर पहला कंप्यूटिंग उपकरण माना जाता है। इसमें छड़ों पर मोतियां पिरोई गई थीं और इसका उपयोग जोड़ और घटाव जैसी सरल अंकगणितीय संक्रियाओं के लिए किया जाता था। समय के साथ एबेकस के विभिन्न संस्करण पूरे एशिया में फैल गए। इसके बाद 1617 में जॉन नेपियर (John Napier) द्वारा नेपियर्स बोन्स का आविष्कार किया गया। यह संख्याओं के साथ उकेरी गई हाथीदांत की छड़ों का एक सेट था, जिसे गुणा और भाग में सहायता के लिए डिज़ाइन किया गया था। इसी आविष्कार ने दशमलव बिंदु की अवधारणा भी पेश की।
मैकेनिकल कैलकुलेटर और इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटिंग की शुरुआत कैसे हुई?
फ्रांसीसी गणितज्ञ ब्लेज़ पास्कल (Blaise Pascal) ने 1642 और 1644 के बीच पास्कलाइन (Pascaline) विकसित किया, जिसे अरिथमेटिक मशीन (Arithmetic Machine) या एडिंग मशीन (Adding Machine) भी कहा जाता है। यह जोड़ और घटाव करने में सक्षम पहला मैकेनिकल कैलकुलेटर था। बाद में जर्मन दार्शनिक गॉटफ्रीड विल्हेम लाइबनिज़ (Gottfried Wilhelm Leibniz) ने 1673 में पास्कल के डिजाइन में सुधार करते हुए स्टेप्ड रेकनर (Stepped Reckoner) विकसित किया।

1820 के दशक में, "आधुनिक कंप्यूटर के पिता" कहे जाने वाले चार्ल्स बैबेज (Charles Babbage) ने डिफरेंस इंजन (Difference Engine) को डिज़ाइन किया। 1830 के दशक में उन्होंने एनालिटिकल इंजन (Analytical Engine) भी विकसित किया, जो मेमोरी और पंच कार्ड का उपयोग करने वाला पहला सामान्य-उद्देश्य वाला मैकेनिकल कंप्यूटर था। 1890 में अमेरिकी सांख्यिकीविद् हरमन होलेरिथ (Herman Hollerith) ने टेबुलेटिंग मशीन (Tabulating Machine) का आविष्कार किया। उनकी कंपनी 1924 में इंटरनेशनल बिजनेस मशीन यानी आईबीएम (IBM) बन गई। 1930 के दशक में वन्नेवर बुश (Vannevar Bush) ने डिफरेंशियल एनालाइज़र (Differential Analyzer) का आविष्कार किया। इसके बाद 1944 में आईबीएम और हार्वर्ड की साझेदारी में मार्क 1 (Mark I) कंप्यूटर बनाया गया, जिसे हावर्ड ऐकेन (Howard Aiken) ने डिज़ाइन किया था।
दुनिया का पहला इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर एनिएक कैसे बना?
एनिएक (ENIAC) यानी इलेक्ट्रॉनिक न्यूमेरिकल इंटीग्रेटर एंड कंप्यूटर, संख्यात्मक समस्याओं को हल करने जैसे सामान्य उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाने वाला पहला इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर था। इसे पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय में जॉन प्रेस्पर एकर्ट (John Presper Eckert) और जॉन मौचली (John Mauchly) द्वारा अमेरिकी सेना की बैलिस्टिक रिसर्च लेबोरेटरी के लिए डिज़ाइन और आविष्कार किया गया था। इसका निर्माण 1943 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मन सेना के खिलाफ युद्ध के प्रयासों में मदद करने के लिए शुरू हुआ और 1946 में पूरा हुआ।

युद्ध के दौरान पुरुष इंजीनियरों की कमी थी, इसलिए छह महिला प्रोग्रामरों की एक टीम ने इसकी प्रोग्रामिंग की: बेट्टी जीन जेनिंग्स (Betty Jean Jennings), मर्लिन वेसकॉफ (Marilyn Wescoff), रूथ लिचरमैन (Ruth Lichterman), एलिज़ाबेथ स्नाइडर (Elizabeth Snyder), फ्रांसिस बिलास (Frances Bilas) और कैथलीन मैकनल्टी (Kathleen McNulty)। एनिएक लगभग 1,800 वर्ग फुट में फैला था। इसमें 20,000 वैक्यूम ट्यूब, 1,500 रिले, 10,000 कैपेसिटर और 70,000 रेसिस्टर्स लगे थे। यह 30 टन से अधिक भारी था और इसे चलाने में 200 किलोवाट बिजली लगती थी। यह एक सेकंड में 5,000 जोड़ चक्र पूरे कर सकता था, जो 50,000 लोगों के बराबर का काम था। 15 फरवरी को एनिएक डे (ENIAC Day) के रूप में मनाया जाता है। बाद में एकर्ट और मौचली ने 1951 में पहला व्यावसायिक रूप से सफल कंप्यूटर यूनिवैक 1 (UNIVAC I) भी विकसित किया।
कंप्यूटर की विभिन्न पीढ़ियों ने तकनीक को कैसे बदला?
पहली पीढ़ी (1940-1956) के कंप्यूटरों में मेमोरी और सीपीयू के लिए वैक्यूम ट्यूब का उपयोग किया जाता था। ये बड़े, धीमे और महंगे थे। एनिएक और यूनिवैक 1 इसी पीढ़ी के उदाहरण हैं। दूसरी पीढ़ी (1957-1963) में ट्रांजिस्टर का उपयोग शुरू हुआ, जो सस्ते और आकार में छोटे थे। इस पीढ़ी में असेंबली और प्रोग्रामिंग भाषाओं के रूप में कोबोल (COBOL) और फोरट्रान (FORTRAN) का उपयोग किया गया।
तीसरी पीढ़ी में ट्रांजिस्टर की जगह इंटीग्रेटेड सर्किट यानी आईसी (ICs) का इस्तेमाल हुआ। पास्कल और पीएल/1 (PASCAL and PL/1) जैसी उच्च-स्तरीय भाषाओं का उपयोग शुरू हुआ। चौथी पीढ़ी (1971-1980) में वीएलएसआई (VLSI) सर्किट का उपयोग किया गया, जिसमें लाखों ट्रांजिस्टर एक चिप पर होते थे। इसी दौर में सी (C) और सी++ (C++) जैसी प्रोग्रामिंग भाषाओं का विकास हुआ। 1980 से लेकर आज तक की पांचवीं पीढ़ी में यूएलएसआई (ULSI) तकनीक का उपयोग किया जा रहा है, जिसमें डेस्कटॉप, लैपटॉप और एआई सॉफ्टवेयर शामिल हैं।
दुनिया का पहला व्यावसायिक लैपटॉप ओसबोर्न 1 कैसा था?
व्यावसायिक रूप से उपलब्ध होने वाला पहला लैपटॉप ओसबोर्न 1 (Osborne 1) था, जिसे अप्रैल 1981 में जारी किया गया था। इसका आविष्कार एडम ओसबोर्न (Adam Osborne) ने किया था। इसका वजन 11.1 किलोग्राम था और इसमें 12.7 सेंटीमीटर का मोनोक्रोम डिस्प्ले था। इसकी कीमत 1,795 डॉलर थी। यह माइक्रोप्रोसेसर (Intel 8088) का उपयोग करने वाले पहले कंप्यूटरों में से एक था। इसमें रिचार्जेबल बैटरी, सीआरटी डिस्प्ले (CRT display), बिल्ट-इन कीबोर्ड और दो 5.25-इंच फ्लॉपी डिस्क ड्राइव शामिल थे। यह Z80A सीपीयू पर चलता था, जिसमें 64K रैम मौजूद थी। हालांकि ओसबोर्न 1 बेहद सफल रहा, लेकिन एडम ओसबोर्न ने इसके अपग्रेड संस्करण ओसबोर्न एक्जीक्यूटिव की घोषणा बहुत जल्दी कर दी, जिससे पहले मॉडल के ऑर्डर रद्द हो गए और 1983 में कंपनी दिवालिया हो गई।

आधुनिक युग में तकनीकी विकास की दिशा क्या है?
1970 और 1980 के दशक में पर्सनल कंप्यूटर क्रांति आई। 1977 में स्टीव जॉब्स (Steve Jobs) और स्टीव वोज्नियाक (Steve Wozniak) ने एप्पल 2 (Apple II) विकसित किया। 1981 में आईबीएम पीसी और 1984 में मैकिन्टोश (Macintosh) आया, जिसने ग्राफिकल यूजर इंटरफेस पेश किया। 1990 के दशक में टिम बर्नर्स-ली (Tim Berners-Lee) द्वारा वर्ल्ड वाइड वेब (World Wide Web) का आविष्कार किया गया। आज क्लाउड कंप्यूटिंग, एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग (Quantum Computing) और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) तकनीक की दुनिया को पूरी तरह बदल रहे हैं।
आईईटी लखनऊ ने भारत में तकनीकी शिक्षा की नींव कैसे रखी?
तकनीकी क्रांति के इसी सफर में भारत भी पीछे नहीं रहा। इंस्टिट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, लखनऊ (Institute of Engineering and Technology, Lucknow) उत्तर प्रदेश में एक राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित तकनीकी संस्थान है। इसकी स्थापना 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग संकाय के रूप में की गई थी, और बाद में इसे एक स्वतंत्र संस्थान के रूप में पुनर्गठित किया गया। साल 2000 से यह डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय से संबद्ध है।
आईईटी लखनऊ 19 नवंबर 1984 को शुरू हुआ था। शुरुआत में, इसने तीन शाखाओं - कंप्यूटर साइंस, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स में बी.टेक की डिग्री की पेशकश की। एक साल के भीतर सिविल और मैकेनिकल शाखाएं भी शुरू की गईं। बाद में इसमें इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और केमिकल ब्रांच के साथ-साथ एमबीए, एम.टेक और एमसीए कोर्स भी शामिल किए गए। संस्थान का 100 एकड़ का परिसर उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम लिमिटेड द्वारा बनाया गया था। संस्थापक निदेशक प्रो. सुरेश चंद्र 26 जून 1984 को शामिल हुए और 11 अक्टूबर 1984 से शिक्षकों ने कार्यभार संभाला।
इस संस्थान में लगभग 2500 छात्रों के रहने के लिए आठ लड़कों के और चार लड़कियों के हॉस्टल हैं, जिनमें विश्वेश्वरैया भवन-ए, विश्वेश्वरैया भवन-बी, रमन भवन-ए, रमन भवन-बी, भाभा हॉस्टल, आर्यभट्ट हॉस्टल, रामानुजम हॉस्टल, राम मनोहर लोहिया हॉस्टल, गार्गी भवन, अपाला हॉस्टल और सरोजनी भवन शामिल हैं। लड़कियों के लिए एक नवनिर्मित मैत्रेयी हॉस्टल भी तैयार है। संस्थान का अपना प्लेसमेंट सेल है, जिसका नेतृत्व मैकेनिकल विभाग के प्रोफेसर डॉ. अरुण कुमार तिवारी कर रहे हैं। आईईटी लखनऊ का यह सफर इस बात का प्रमाण है कि शुरुआती गणना मशीनों से लेकर आधुनिक कंप्यूटर साइंस तक, शिक्षा के बुनियादी ढांचे ने हर पीढ़ी को तकनीक से जोड़ने का अहम कार्य किया है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/23ncd8d3
2. https://tinyurl.com/2cg27lpo
3. https://tinyurl.com/29jya2u4
4. https://tinyurl.com/25jxyynq
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