क्या जानवर भी दुखी होते हैं? मेरठवासियों, आइए प्रकृति के दिल की यह सच्चाई जानें

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07-01-2026 09:18 AM
क्या जानवर भी दुखी होते हैं? मेरठवासियों, आइए प्रकृति के दिल की यह सच्चाई जानें

नमस्कार मेरठवासियों, आपने जरूर महसूस किया होगा कि जब हमारा प्यारा कुत्ता, बिल्ली, गाय या कोई भी पालतू साथी किसी प्रिय को खो देता है, तो उसके स्वभाव में अचानक बदलाव आ जाता है। वह कम बोलता है, उसी जगह टकटकी लगाकर बैठा रहता है जहाँ वह अपने साथी को देखने का आदी था, या घर के दरवाजे के पास लगातार आवाज़ सुनकर चौंकता है, मानो कोई लौट आएगा। हम इंसान भी ऐसा ही करते हैं। जब कोई अपना चला जाता है, तो हम खामोश हो जाते हैं, यादों में खो जाते हैं, उम्मीद करते हैं कि शायद किसी दिन सब फिर पहले जैसा हो जाए। लेकिन बहुत कम लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि इंसानों की यह भावनाएँ सिर्फ हमारी तक सीमित नहीं होतीं। कई जानवर भी इसी तरह के खोने के दर्द को महसूस करते हैं, बस वे इसे अपने तरीके से जीते हैं।
आज हम समझेंगे कि हाथी अपने मृत साथियों के लिए किस तरह मौन सम्मान और संवेदना प्रकट करते हैं। फिर हम यह जानेंगे कि डॉल्फ़िन, बंदर, जिराफ़ और कुत्ते जैसे अन्य जीव इस अनुभव को कैसे महसूस करते हैं। साथ ही हम सीखेंगे कि किसी शोकग्रस्त जानवर की अवस्था को कैसे पहचाना जाए और उसके दर्द को कम करने में हम क्या भूमिका निभा सकते हैं।

हाथी और उनका मौन दुख
हाथियों की कहानियाँ पढ़कर और देखकर यह एहसास होता है कि वे केवल बड़े शरीर वाले जंतु नहीं हैं, बल्कि संवेदनशील जीव हैं जिनका अपना सामाजिक ढांचा, रिश्तों का ताना बाना और यादें होती हैं।दुनिया भर में कई ऐसे दृश्य सामने आए जहाँ हाथी किसी मृत हाथी के शरीर को सूंड से धीरे धीरे छूते हैं। कुछ उसे चखते हैं, किसी ने समय लेकर उसे उठाने और दूसरी जगह ले जाने की कोशिश भी की। एक दृश्य में देखा गया कि हाथी मिट्टी, पत्तियों और घास से अपने साथी के शरीर को ढक रहे थे। मानो वे यह सुनिश्चित कर रहे हों कि उसकी विदाई सम्मानपूर्वक हो। हाथियों के बारे में अध्ययन बताते हैं कि वे अपने मृत रिश्तेदारों की हड्डियों के पास लौटते रहते हैं। कुछ समय तक उनकी खामोश मौजूदगी यह दिखाती है कि वे किसी स्मृति को महसूस कर रहे हैं। उनकी खामोशी शायद उनके भावनात्मक बोझ की भाषा है। सन् 2013 में केन्या (Kenya) में विक्टोरिया (Victoria) नाम की मादा हाथी की मृत्यु पर कई हाथी उसके चारों ओर खड़े हो गए। उसका बेटा मलासो सबसे अंत में वहाँ से गया। इस दृश्य ने वैज्ञानिकों को सोचने पर मजबूर किया कि शायद जानवर भी चीज़ों के खत्म होने और विदा लेने की पीड़ा को समझते हैं।उदासी में जानवरों का बदलता व्यवहार
हम मनुष्य शोक में जीवन की लय खो बैठते हैं। ठीक उसी तरह जानवरों में भी एक गहरा बदलाव आता है। इन बदलावों को पहचानना उनके साथ रिश्ते की गहराई का हिस्सा है।

  • खाने की आदतों में बदलाव
    दुखी जानवर अक्सर खाना छोड़ देते हैं। वे अपने कटोरे के पास जाते हैं, लेकिन मुड़ जाते हैं। कई बार वे खाना खाते समय किसी परिचित आवाज़ या गंध को खोजते हैं, जैसे उम्मीद करते हों कि कोई पुराने साथी का स्पर्श या आवाज़ उन्हें फिर मिले। ऐसे समय में उनके पसंदीदा भोजन को शामिल करना, या कुछ दिनों तक मृत साथी का स्थान और वस्तुएँ वहीं रहने देना, उन्हें मानसिक रूप से बदलाव को स्वीकारने में मदद करता है। लेकिन यदि वजन तेज़ी से घट रहा हो, तो चिकित्सकीय परामर्श लेना जरूरी है।
  • सोने और आराम की लय में बदलाव
    दुखी जानवर अचानक उस जगह पर सोने लगते हैं जहाँ मृत साथी सोता था। वे सुस्ती से भरे रहते हैं और सामान्य से अधिक समय तक झपकते हैं। ऐसे समय में उनके साथ समय बिताना, उन्हें टहलाना, बाहर घूमाने ले जाना या नए अनुभव देना उन्हें मानसिक रूप से बाहर आने में मदद करता है। नई यादें किसी खोई हुई याद को मिटाती नहीं हैं, पर वह खालीपन थोड़ा हल्का जरूर करती हैं।
  • रिश्तों में बदलाव
    जानवर भी किसी प्रिय के खोने के बाद भ्रमित हो जाते हैं। वे कभी तो इंसानों से अधिक चिपक जाते हैं, कभी अकेले रहना पसंद करते हैं। कई बार वे अपने साथी को खोजते हैं, उसके कमरे के पास जाते हैं या उसकी गंध को ढूंढते हैं। कभी कभी वे चिड़चिड़े भी हो जाते हैं, जो उनके भीतर के भावनात्मक उलझन का संकेत होता है।

वे जानवर जिनके दुख हमसे बहुत मिलते जुलते हैं

  • बंदर
    बंदर अपने सामाजिक समूह में पारिवारिक रिश्तों को बहुत महत्व देते हैं। कई बार उन्हें अपने मृत शिशु को दिनों तक उठाए फिरते देखा गया है। समूह के सदस्य उसके पास बैठते हैं और एक दूसरे के पास रहकर मानो दुख साझा करते हैं। कुछ चिंपैंज़ी तो इतने उदास हो जाते हैं कि वे खाना भी छोड़ देते हैं।
  • डॉल्फ़िन
    समुद्र में डॉल्फ़िनों को अक्सर अपने मृत बच्चे को सतह पर धकेलते हुए देखा गया है, जैसे वह उसे सांस दिलाने की कोशिश कर रही हों। वैज्ञानिक मानते हैं कि वे मृत्यु को समझती हैं क्योंकि उनका जीवन रिश्तों पर आधारित होता है और वे अक्सर जीवन भर साथ रहती हैं। उनकी यह कोशिश केवल शारीरिक नहीं, भावनात्मक जुड़ाव का संकेत है।
  • जिराफ़
    एक घटना में देखा गया कि एक मादा जिराफ़ चार दिन तक अपने मृत बच्चे के पास खड़ी रही। दूसरी जिराफ़ें भी उसके पास आईं और गर्दन लपेटकर उसे जैसे सहारा दिया। यह दर्शाता है कि दुख केवल मनुष्य का अनुभव नहीं, बल्कि प्रकृति के कई जीवों का भी हिस्सा है।
  • कुत्ते
    कुत्तों की कहानियाँ सदियों पुरानी हैं। वे किसी की कब्र पर बैठकर पहरा देते हैं, या ताबूत से हटना नहीं चाहते। वैज्ञानिक बताते हैं कि उन्हें दो से पांच साल के बच्चे जैसा समझना चाहिए। वे सोचते हैं कि जिसने साथ छोड़ा है वह लौट आएगा। इस उम्मीद से वे उस जगह से नहीं हटते जहाँ उन्हें अपने प्रिय की याद आती है।

संदर्भ
https://tinyurl.com/4rf9t37n
https://tinyurl.com/943mvce5
https://tinyurl.com/3x3jcj4y
https://tinyurl.com/9zbtwy9w

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