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भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है, और बदलते वैश्विक हालातों के बीच यह बात और भी स्पष्ट होती जा रही है कि कृषि केवल किसानों तक सीमित विषय नहीं, बल्कि देश की आर्थिक सुरक्षा और भविष्य की स्थिरता से सीधे जुड़ी हुई है। आज जब दुनिया के कई हिस्से खाद्यान्न आपूर्ति और आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहे हैं, तब भारत के लिए कृषि आत्मनिर्भरता एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुकी है। ऐसे में यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि भारतीय कृषि किन आधारों पर टिकी है, किन चुनौतियों का सामना कर रही है और किन सुधारों के ज़रिये इसे मज़बूत बनाया जा सकता है।
आज हम सबसे पहले भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की केंद्रीय भूमिका को समझेंगे और जानेंगे कि यह देश की आर्थिक संरचना के लिए क्यों रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इसके बाद, हम कृषि क्षेत्र की उन संरचनात्मक समस्याओं पर चर्चा करेंगे, जिनमें भूमि, पूंजी और संसाधनों की कमी प्रमुख है। फिर हम किसानों के सामने मौजूद वित्तीय और उत्पादन संबंधी चुनौतियों को सरल भाषा में समझेंगे। आगे बढ़ते हुए, भंडारण और कोल्ड चेन (cold chain) जैसी आपूर्ति व्यवस्था की कमजोर कड़ी पर बात करेंगे। अंत में, हम कृषि आत्मनिर्भरता को साकार करने के लिए आवश्यक संस्थागत सुधारों और भविष्य की दिशा पर नज़र डालेंगे।
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की केंद्रीय भूमिका
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की भूमिका केवल खाद्यान्न उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की सामाजिक और आर्थिक संरचना की आधारशिला भी है। कृषि क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 17-18 प्रतिशत का योगदान देता है और देश की बड़ी आबादी की आजीविका इससे सीधे जुड़ी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों की आय, उपभोग और रोज़गार की संभावनाएँ काफी हद तक कृषि पर निर्भर करती हैं। इसके साथ ही, कृषि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करके देश को आत्मनिर्भर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। यही वजह है कि किसी भी वैश्विक या घरेलू आर्थिक दबाव की स्थिति में कृषि क्षेत्र को भारत की आर्थिक रीढ़ माना जाता है, जो स्थिरता और संतुलन बनाए रखता है।

कृषि क्षेत्र की संरचनात्मक समस्याएँ: भूमि, पूंजी और संसाधन
कृषि की मज़बूत आर्थिक भूमिका के बावजूद, इसकी संरचना कई गंभीर समस्याओं से जूझ रही है। सबसे बड़ी चुनौती छोटी और खंडित भूमि जोत की है, जो विशेष रूप से सघन कृषि वाले क्षेत्रों में देखने को मिलती है। सीमित खेत आकार के कारण किसान आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने, सिंचाई सुविधाओं में निवेश करने या दीर्घकालिक सुधारों की योजना बनाने में असमर्थ रहते हैं। इसके अलावा, कृषि से जुड़े संसाधनों और पूंजी की कमी खेती को पारंपरिक तरीकों तक सीमित कर देती है। परिणामस्वरूप, कृषि उत्पादकता प्रभावित होती है और यह क्षेत्र एक लाभकारी और टिकाऊ व्यवसाय के रूप में विकसित नहीं हो पाता।
किसानों के सामने वित्तीय और उत्पादन संबंधी चुनौतियाँ
संरचनात्मक समस्याओं के साथ-साथ किसानों को गंभीर वित्तीय और उत्पादन संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। औपचारिक बैंकिंग और ऋण सुविधाओं तक सीमित पहुँच के कारण कई किसान अनौपचारिक ऋण स्रोतों - जैसे साहूकार, व्यापारी और कमीशन एजेंट (commission agent) - पर निर्भर हो जाते हैं, जहाँ ब्याज दरें अत्यधिक होती हैं और शोषण की संभावना बनी रहती है। इसके अलावा, खराब सिंचाई व्यवस्था, जल संसाधनों की अनिश्चित उपलब्धता और उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की कमी फसल उत्पादन को प्रभावित करती है। इन समस्याओं के कारण किसानों की लागत बढ़ती है, उत्पादन घटता है और वे अपेक्षित आय प्राप्त नहीं कर पाते।

भंडारण, कोल्ड चेन और आपूर्ति व्यवस्था की कमजोर कड़ी
कृषि क्षेत्र की एक बड़ी कमजोरी फसल के बाद की व्यवस्था में दिखाई देती है। ग्रामीण इलाकों में पर्याप्त भंडारण सुविधाओं और विकसित कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) के अभाव में बड़ी मात्रा में कृषि उपज नष्ट हो जाती है। उचित भंडारण की कमी के कारण किसान अपनी उपज को लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रख पाते और मजबूरी में उसे कम कीमत पर बेच देते हैं। इससे न केवल किसानों की आय प्रभावित होती है, बल्कि पूरी आपूर्ति श्रृंखला भी असंतुलित हो जाती है। मज़बूत भंडारण और वितरण व्यवस्था के बिना कृषि क्षेत्र की उत्पादकता और लाभप्रदता दोनों पर नकारात्मक असर पड़ता है।

कृषि आत्मनिर्भरता के लिए संस्थागत सुधार और भविष्य की दिशा
इन तमाम चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि क्षेत्र में संस्थागत सुधारों की आवश्यकता है। कृषि-व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए विशेष कृषि व्यवसाय बैंक की स्थापना, सीएसआर फंडिंग (CDR funding) के माध्यम से किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ - FPO) को सशक्त बनाना और कृषि आधारित उद्यमिता को प्रोत्साहित करना अहम कदम साबित हो सकते हैं। इसके साथ ही, कृषि विकास परिषद जैसे संस्थानों के ज़रिये भूमि पट्टे, निजी निवेश और कृषि अनुसंधान एवं विकास को गति दी जा सकती है। ऐसे सुधार न केवल कृषि को आधुनिक बनाएंगे, बल्कि भारत को कृषि क्षेत्र में दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाने में भी सहायक होंगे।
संदर्भ
https://bit.ly/3zg6tPw
https://bit.ly/3aHChCP
https://bit.ly/3tfg8SQ
https://tinyurl.com/yc7e9vxj
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