जानिए, सॉवरेन या संप्रभु एआई के लिए देशों की चाहत कैसे बढ़ रही है एवं यह उपयुक्त क्यों है?
आज के लेख में हम समझेंगे कि, सॉवरेन एआई (Sovereign AI) या संप्रभु एआई क्या है, और इससे संबंधित प्रमुख पहलू क्या हैं। फिर, हम उन देशों की सूची देखेंगे, जिनके पास स्वतंत्र नियंत्रित इंटरनेट सिस्टम (Internet System) हैं। इसके अलावा, हम पूरी तरह से संप्रभु इंटरनेट के बिना, संप्रभु एआई प्राप्त करने की चुनौतियों का पता लगाएंगे। अंततः हम जांच करेंगे कि, क्या एक परस्पर जुड़ी वैश्विक प्रणाली में सच्ची डिजिटल संप्रभुता वास्तव में संभव है या नहीं।सॉवरेन या संप्रभु एआई का उद्देश्य, एआई के देशज उत्पादन को सुनिश्चित करना है। इसमें एआई को प्रशिक्षित करने हेतु उपयोग किया जाने वाला डेटा, किसी क्वेरी (Query) या प्रश्न पर शोध करते समय एआई द्वारा खोजा गया डेटा, और किसी प्रश्न के जवाब में एआई द्वारा आउटपुट के रूप में उत्पन्न डेटा शामिल है।इस संदर्भ में, संप्रभु एआई में "कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence)" के रूप में लेबल की गई किसी भी या सभी प्रकार की प्रौद्योगिकियां शामिल हो सकती हैं। इसमें डेटा रुझानों को समझने और विसंगतियों को पहचानने के लिए मशीन लर्निंग (Machine Learning) भी शामिल है। ऐसे एआई में, एआई प्रौद्योगिकियों के उपयोग को नियंत्रित करने वाले नियम भी शामिल हो सकते हैं, जैसे कि गोपनीयता (Privacy) से संबंधित नियम।संप्रभु एआई, डेटा संप्रभुता से संबंधित है। किसी कंपनी या संगठन को राष्ट्रीय नियमों पर विचार करना चाहिए कि, उनका डेटा कहां संग्रहीत और संसाधित किया जा सकता है। आज अधिकांश संगठनों के पास डेटा प्रशासन नीतियां मौजूद हैं। परीक्षण के आरंभ में ही उन नीतियों को एआई तक विस्तारित करने से, भविष्य में आने वाली समस्याओं से बचा जा सकता है। इसी के साथ, इन्हें स्वीकार्य उपयोग को निर्देशित किया जा सकता है। यहां यह विचार भी महत्वपूर्ण है कि, एल्गोरिदम (Algorithm) को प्रशिक्षित करने के लिए डेटा का उपयोग कैसे किया जाता है, और तैयार एआई मॉडल क्या उत्तर प्रदान करते हैं।संप्रभु एआई से संबंधित विचार करने के लिए, छह मुख्य पहलू निम्नलिखित हैं: आपके संगठन पर लागू होने वाले नियमों को समझना; आपके पसंदीदा एआई बुनियादी ढांचे का निर्धारण करना; डेटा स्थानीयकरण नियंत्रण लागू करना; डेटा गोपनीयता नियंत्रण स्थापित करना; कानूनी नियंत्रण स्थापित करना और अपने एआई स्टैक (Data stack) को सुरक्षित करना। उदाहरण के तौर पर, वांछित एआई बुनियादी ढांचे के निर्धारण में क्लाउड (Cloud) शामिल है, जिसमें एआई बुनियादी ढांचे का निर्माण, संकलन और प्रबंधन करना अक्सर आसान होता है। इसके साथ ही, यदि आपका क्लाउड डेटा संप्रभुता मुद्दों को प्रबंधित करने में आपकी सहायता कर सकता है, तो आपके लिए एआई संप्रभुता के साथ काम करना आसान हो जाएगा।एक तरफ डेटा गोपनीयता, डेटा के प्रकार और इसका उपयोग कैसे किया जा सकता है, पर केंद्रित है। इसके लिए, आपके सॉफ़्टवेयर को एक लचीली नियंत्रण प्रणाली की आवश्यकता हो सकती है, जो जटिल उपयोग के मामलों को संभालने में सहायक हो। जबकि, एआई स्टैक को सुरक्षित करना, आखिरी पहलू है। कभी-कभी कंपनियां चाहती हैं कि एआई उनके सुरक्षा नियमों के अंदर काम करे। लेकिन इसके लिए ज्यादा जांच और परीक्षण करना पड़ता है। इसलिए वे ऐसे मामलों को पकड़ने के लिए टेस्ट करती हैं, जहां यूज़र (user) गलत तरीके से संवेदनशील जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं।चलिए, अब राष्ट्रीय इंट्रानेट (National intranet) के बारे में पढ़ते हैं। यह एक इंटरनेट शिष्टाचार-आधारित बंद नेटवर्क होता है, जिसे एक राष्ट्र द्वारा वैश्विक इंटरनेट के राष्ट्रीय विकल्प के रूप में बनाए रखा जाता है। इसका उद्देश्य अपने निवासियों के संचार को नियंत्रित करना और उसकी निगरानी करना है। साथ ही, बाहरी मीडिया तक उनकी पहुंच को यह प्रतिबंधित करता है। ईरान (Iran) में इसके लिए ‘हलाल इंटरनेट’ शब्द का उपयोग किया गया है। ऐसे नेटवर्क आम तौर पर राज्य-नियंत्रित मीडिया और विदेशी संचालित इंटरनेट सेवाओं के राष्ट्रीय विकल्पों तक पहुंच के साथ आते हैं, जैसे कि - खोज इंजन (search engine), वेब-आधारित ईमेल (Web-based email), इत्यादि।राष्ट्रीय इंट्रानेट वाले देशों की सूची निम्नलिखित है-1. म्यांमार (Myanmar),2. क्यूबा (Cuba),3. उत्तर कोरिया (North Korea),4. रूस (Russia),5. चीन (China),6. ईरान।एआई स्टैक पर पूर्ण स्वायत्तता का विचार, अधिकांश उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए आर्थिक और संस्थागत रूप से निषेधात्मक है। हर चीज़ स्वयं बनाना भी महंगा है। जब कोई राष्ट्र एआई स्टैक के हर स्तर का मालिक बनना चुनता है, तो जरूरी नहीं कि वह अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर रहा हो। एक हालिया अध्ययन में पाया गया है कि, अमेरिकी कंपनियों ने 18% डेटा सेंटर (Data Center) परियोजनाओं के लिए ऑपरेटर (Operator) के रूप में काम किया है। "संप्रभु" सुविधाओं का निर्माण करने वाले देश भी संचालन के लिए, अक्सर अमेरिकी हाइपरस्केलर्स (Hyperscalers) जैसे एडब्ल्यूएस (AWS), माइक्रोसॉफ्ट एज्यूर( Microsoft Azure), या गूगल क्लाउड (Google Cloud) पर निर्भर रहते हैं। जब क्षेत्रीय और परिचालन क्षेत्राधिकार पर विचार किया जाता है, तो एआई क्षमता सहित वैश्विक गणना पर अमेरिका का पर्याप्त प्रभाव है। व्यवहार में, अधिकांश "संप्रभु गणना" अमेरिकी प्रौद्योगिकी पर निर्भर रहती है। यह प्रश्न मौजूद है कि, एआई आपूर्ति श्रृंखला के किन हिस्सों पर एक राष्ट्र का स्वामित्व, नियंत्रण या शासन होना चाहिए; और एक राष्ट्र किन हिस्सों के साथ सुरक्षित रूप से साझेदारी कर सकता है, किराए पर ले सकता है या साझा कर सकता है? इस प्रश्न का उत्तर परिस्थिति के आधार पर बदलता रहता है। सामान्य रूप से संप्रभुता पाने के बजाय, इन परिस्थितियों को सही करना ही 2026 की रणनीतिक चुनौती है।हाल ही में, यूरोपीय संघ (European Union) और भारत ने एआई विकास के लिए अधिक संप्रभु दृष्टिकोण की इच्छा व्यक्त की है। हालांकि अभी के लिए, यूरोपीय संघ और भारत के ‘एआई स्टैक’ आपूर्ति श्रृंखलाओं में मजबूती से अंतर्निहित हैं, जो कुछ अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों द्वारा नियंत्रित हैं। चीन द्वारा नियंत्रित महत्वपूर्ण खनिज प्रसंस्करण और हार्डवेयर विनिर्माण (Hardware manufacturing) पर इनकी निर्भरता है। अमेरिका और भारत के बीच सहयोग, बुनियादी ढांचे, कॉर्पोरेट भागीदारी और आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण पर केंद्रित है। उन्नत प्रोसेसर (Processor) और अच्छी कंप्यूटिंग क्षमता (Computing capacity) पर ध्यान देने के साथ, भारतीय कंपनियों को अमेरिकी अग्रणी एआई कंपनियों के साथ जोड़ने के लिए समझौते किए गए हैं। इससे भारत मौजूदा वैश्विक एआई आपूर्ति श्रृंखलाओं में अधिक गहराई से एकीकृत होगा। इस प्रवृत्ति को भारत के अमेरिकी पहल ‘पैक्स सिलिका (Pax Silica)’ में शामिल होने से स्पष्ट किया गया है। इसका उद्देश्य चयनित भागीदारों के बीच एआई आपूर्ति श्रृंखलाओं में समन्वय और लचीलेपन को मजबूत करना है।पूर्ण-स्टैक एआई संप्रभुता, लगभग किसी भी देश के लिए संरचनात्मक रूप से अव्यवहार्य है। क्योंकि एआई खनिजों, ऊर्जा, कंप्यूट हार्डवेयर, नेटवर्क, डिजिटल बुनियादी ढांचे (digital infrastructure), डेटा परिसंपत्तियों, मॉडलों, अनुप्रयोगों, प्रतिभा के क्रॉसकटिंग एनबलर्स (Crosscutting enablers) तथा शासन में केंद्रित एक अंतरराष्ट्रीय स्टैक है। इसलिए, विकल्प यह है कि एआई स्टैक में जोखिमों को कम करने के लिए रणनीतिक गठबंधन और साझेदारी पर काम करना चाहिए। अगर आपसी निर्भरता को सही तरीके से संभाला जाए, तो खुले बाजार और देशों के सहयोग के फायदे बने रहते हैं और साथ ही मजबूती भी बढ़ती है।भारत डिजिटल संप्रभुता की बात करता है, और हमने डेटा स्थानीयकरण और देशज स्टार्टअप को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाए हैं। रूस, ब्राज़ील (Brazil) और अन्य देशों ने अपने डिजिटल ढांचे को अधिक नियंत्रित करने की इच्छा व्यक्त की है। विश्व में आज विदेशी प्रौद्योगिकी पर कम निर्भर होने की चाहत, काफी सार्वभौमिक हो गई है। आधुनिक तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र वैश्वीकृत है, और कोई भी एक राष्ट्र संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला को नियंत्रित नहीं करता है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/zwhcj5xj 2. https://tinyurl.com/4ratzyea 3. https://tinyurl.com/4zdunpvb 4. https://tinyurl.com/3mbhjrnh 5. https://tinyurl.com/4j6nk324 6. https://tinyurl.com/5cccbf7f
शहरीकरण - नगर/ऊर्जा
भारत में क्लीन एनर्जी के दौर में भी काले कोयले का राज क्यों कायम है?
गुजरात के सफ़ेद रण में बन रहा खावड़ा नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र साल 2030 तक 30 गीगावाट सौर और पवन ऊर्जा पैदा करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा स्वच्छ ऊर्जा प्रतिष्ठान बनने जा रहा है। लेकिन उसी समय महाराष्ट्र के चंद्रपुर में एक 3 गीगावाट का कोयला आधारित संयंत्र लगातार धुआं उगल रहा है, जो उन सैकड़ों संयंत्रों में से एक है जो आज भी भारत के 60 प्रतिशत से अधिक बिजली तंत्र को शक्ति प्रदान करते हैं। रामपुर और इसके आस-पास के बिजली उपभोक्ताओं के लिए यह जानना बहुत दिलचस्प होगा कि जब भारत में सौर ऊर्जा की क़ीमत 30 डॉलर प्रति मेगावाट घंटे तक गिर गई है, जो कोयले की क़ीमत से लगभग आधी है, फिर भी सरकार के अनुमान के मुताबिक साल 2047 तक भारत में कोयले की मांग 1755 मीट्रिक टन (metric ton) तक क्यों पहुंच जाएगी। विकास और जलवायु लक्ष्यों के बीच फँसे भारत के लिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर हमारी अर्थव्यवस्था कोयले पर इतनी निर्भर क्यों है, इसके क्या फ़ायदे और नुक़सान हैं, और साफ़ ऊर्जा की तरफ़ कैसे बढ़ा जा सकता है। भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा में कोयले का क्या महत्व है? भारत की ऊर्जा ज़रूरतों के लिए कोयला एक आधारशिला है, जो हमारी प्राथमिक ऊर्जा ज़रूरतों के आधे से अधिक हिस्से का योगदान देता है और उद्योगों की रीढ़ की हड्डी बना हुआ है। पिछले एक दशक में देश के कुल बिजली उत्पादन में थर्मल पावर की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक रही है। इसके अलावा कोयला क्षेत्र का आर्थिक महत्व ऊर्जा उत्पादन से कहीं आगे तक फैला हुआ है। भारतीय रेलवे को माल ढुलाई से जो कमाई होती है, उसमें करीब 49% हिस्सा सिर्फ कोयले से आता है, जो वित्तीय वर्ष 2022-23 में 82,275 करोड़ रुपये रही थी। यह क्षेत्र केंद्र और राज्य सरकारों को रॉयल्टी (Royalty) और अन्य करों के माध्यम से सालाना 70,000 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व देता है। रोज़गार के मामले में भी यह क्षेत्र काफ़ी अहम है, विशेष रूप से पूर्वी राज्यों में, जहाँ कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Limited) और उसकी सहायक कंपनियों में 2,39,210 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं और इसके अलावा हज़ारों लोग ठेके और आउटसोर्सिंग (Outsourcing) के ज़रिए जुड़े हुए हैं। कोयले के इस्तेमाल के मुख्य फ़ायदे और नुक़सान क्या हैं?कोयला दुनिया भर में ऊर्जा के सबसे प्रचुर स्रोतों में से एक है और यह तेल या प्राकृतिक गैस जैसे अन्य जीवाश्म ईंधनों की तुलना में सस्ता है। सौर या पवन ऊर्जा के विपरीत, जो पूरी तरह से मौसम पर निर्भर होते हैं, कोयला बिजली संयंत्र किसी भी मौसम में दिन-रात चल सकते हैं। कोयले का ऊर्जा घनत्व भी अधिक होता है, जिसका अर्थ है कि यह प्रति किलोग्राम बड़ी मात्रा में ऊर्जा पैदा कर सकता है। इसके अलावा कोयले से सिंथेटिक ईंधन (synthetic fuel) और रोज़मर्रा के सामान में इस्तेमाल होने वाले रसायन भी बनाए जा सकते हैं। लेकिन इन फ़ायदों के साथ इसके बड़े नुक़सान भी जुड़े हुए हैं। कोयला जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) जैसी ग्रीनहाउस गैसों (greenhouse gases) का भारी उत्सर्जन होता है जो जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण है। कोयले के प्रदूषण से अस्थमा और हृदय रोग का ख़तरा बढ़ता है, और खदानों में काम करने वाले मज़दूरों को ब्लैक लंग डिज़ीज़ (Black Lung Disease) जैसी जानलेवा बीमारियां होती हैं। इसके खनन के लिए जंगलों और पहाड़ों को नष्ट किया जाता है और बिजली संयंत्रों को ठंडा करने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। इन संयंत्रों से निकलने वाली ज़हरीली राख ज़मीन और पानी दोनों को दूषित करती है। सौर ऊर्जा सस्ती होने के बावजूद भारत कोयले पर इतना निर्भर क्यों है?भारत में सौर ऊर्जा अब कोयले से सस्ती हो चुकी है, फिर भी नए कोयला संयंत्र (coal plant) बनाए जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि सौर और पवन ऊर्जा हमेशा उपलब्ध नहीं रहती है। एक सौर संयंत्र एक वर्ष में अपने अधिकतम उत्पादन का केवल 15 से 25 प्रतिशत ही पैदा कर पाता है और पवन संयंत्र 25 से 35 प्रतिशत पैदा करता है। इसकी तुलना में कोयला संयंत्र दिन-रात सातों दिन चल सकते हैं और इनका क्षमता उपयोग कारक 70 से 90 प्रतिशत तक होता है। भारत में बिजली की मांग दिन में दो बार चरम पर होती है, एक बार दोपहर में और दूसरी बार सूर्यास्त के बाद। सौर ऊर्जा दिन की मांग को तो पूरा कर देती है, लेकिन जब लोग शाम को घर लौटते हैं और बिजली की मांग बढ़ती है, तब सूरज ढल चुका होता है। इस समस्या को सुलझाने के लिए विशाल बैटरी स्टोरेज (Battery Storage) की ज़रूरत है, जो अभी व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य नहीं है। इसके अलावा एक बड़ी भौगोलिक चुनौती भी है क्योंकि भारत में नवीकरणीय ऊर्जा मुख्य रूप से छह दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में केंद्रित है, जबकि कोयले वाले राज्य मध्य और पूर्वी भारत में हैं। इन क्षेत्रों को जोड़ने के लिए ट्रांसमिशन बुनियादी ढांचा(Transmission infrastructure) अभी भी कमज़ोर है, जिस कारण कोयले पर निर्भरता कम करना आसान नहीं है। कोयले पर निर्भर इस व्यवस्था को साफ़ ऊर्जा में कैसे बदला जा सकता है? भारत को कार्बन मुक्त बनाने के लिए कोयला संयंत्रों को साफ़ ऊर्जा की ओर ले जाना सबसे बड़ी चुनौती है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के एक हालिया शोध में भारत के 806 कोयला संयंत्रों के डेटा का विश्लेषण किया गया है। इस शोध के अनुसार, यदि केवल नवीकरणीय ऊर्जा पर भारी निवेश किया जाता है, तो बिजली सस्ती तो होगी लेकिन सामाजिक असमानता बढ़ेगी। अमीर पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में हवा और सूरज की रोशनी होने के कारण सारा निवेश वहीं होगा, जबकि पूर्वी भारत के ग़रीब कोयला उत्पादक राज्य पीछे छूट जाएंगे। शोध में पाया गया है कि बिजली की लागत और सामाजिक न्याय दोनों को संतुलित करने का सबसे अच्छा तरीक़ा मौजूदा उच्च दक्षता वाले कोयला संयंत्रों में कार्बन कैप्चर एंड सिक्वेस्ट्रेशन (Carbon Capture and Sequestration) तकनीक लगाना है, जिसके तहत धुएं से कार्बन सोख लिया जाता है। इसके साथ ही कोयले के साथ बायोमास को मिलाकर जलाना भी एक बेहतर विकल्प है। अगर इन तकनीकों को अपनाया जाता है, तो बिजली की लागत में 22 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है और कोयला संयंत्रों का बेहतर उपयोग भी हो सकेगा। हालांकि भारत इस नई कार्बन सोखने वाली तकनीक को लेकर अभी बहुत सतर्क है, लेकिन विदेशी सहयोग और बेहतर नीतियों से इस संकट को सुलझाकर देश एक स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा वाले भविष्य की ओर बढ़ सकता है। संदर्भ https://tinyurl.com/2y25ybm9https://tinyurl.com/2c28hvevhttps://tinyurl.com/22e5fmj6https://tinyurl.com/295pdwy2https://tinyurl.com/24uqa5jl
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
आशा भोसले और माइकल स्टाइप का 'द वे यू ड्रीम' में सुरीला संगम
आशा भोसले (Asha Bhosle) भारतीय सिनेमा की सबसे बहुमुखी और प्रसिद्ध गायिकाओं में से एक हैं, जिनकी आवाज़ ने संगीत की सीमाओं को पार करते हुए दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने केवल फिल्मी गीतों तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ भी काम करके अपनी कला को एक वैश्विक रूप दिया।इसी कड़ी में उनका एक खास सहयोग अंग्रेज़ी संगीत समूह 1 जायंट लीप (1 Giant Leap) और गायक माइकल स्टाइप (Michael Stipe) के साथ देखने को मिलता है। “द वे यू ड्रीम” (The Way You Dream) गीत में आशा भोसले की आवाज़ सबसे पहले सुनाई देती है, जो पूरे गीत को एक गहराई और शांति देती है। यह गीत अलग अलग देशों की ध्वनियों और विचारों को जोड़कर एकता का संदेश देता है।दिलचस्प बात यह है कि यह सहयोग पहले से तय नहीं था। जयपुर में अचानक मुलाकात के दौरान उन्हें एक धुन सुनाई गई और उन्होंने उसी समय गाना रिकॉर्ड किया। उनकी सहज और भावपूर्ण गायकी ने इस गीत को एक खास पहचान दी।यह सहयोग दिखाता है कि आशा भोसले की आवाज़ सिर्फ भारत की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की है। उनका संगीत लोगों को जोड़ता है और यह एहसास कराता है कि अलग अलग संस्कृतियों के बीच भी एक गहरी समानता होती है। संदर्भ:https://tinyurl.com/35y794vx https://tinyurl.com/53u8rhur https://tinyurl.com/mvucaw7a https://tinyurl.com/3frjzcrk
मध्यकाल : 1450 ई. से 1780 ई.
50 हज़ार शेरों वाला फ़ारसी महाकाव्य 'शाहनामा' यूपी के रामपुर कैसे पहुँचा?
क्या आपने कभी सोचा है कि एक 1010 ईसवी में लगभग पचास हज़ार शेरों में लिखा गया एक ऐसा महाकाव्य, जो दुनिया के निर्माण से लेकर सातवीं शताब्दी के इस्लामी आक्रमण तक की कहानी बयां करता है, हमारे रामपुर शहर की सबसे सुरक्षित और ऐतिहासिक तिजोरी तक कैसे पहुँचा? यह दास्तान है 'शाहनामा' की, जिसे हकीम अबुल-कासिम फिरदौसी (Hakim Abul-Qasim Firdausi) ने लिखा था। फ़ारस से उठी यह साहित्यिक लहर मुग़ल बादशाहों के दरबारों से होती हुई, रामपुर के नवाबों के उस जुनून तक पहुँची, जिन्होंने दुनिया के दुर्लभ ग्रंथों को हासिल करने के लिए इस्तांबुल, काहिरा, बग़दाद, तेहरान और समरकंद तक खाली चेक देकर अपने नुमाइंदे भेजे थे। यह केवल एक किताब का सफ़र नहीं है, बल्कि यह इंसानी इतिहास, कला और सभ्यताओं के आपसी जुड़ाव की एक ऐसी जीती-जागती कहानी है, जो आज भी रामपुर की रज़ा लाइब्रेरी की अलमारियों में महक रही है। शाहनामा क्या है और यह फ़ारसी पौराणिक कथाओं तथा इतिहास को कैसे प्रस्तुत करता है?शाहनामा, जिसे राजाओं की किताब के रूप में भी जाना जाता है, ग्रेटर ईरान (ईरान ज़मीन) के इतिहास और पौराणिक कथाओं का एक निर्विवाद राष्ट्रीय महाकाव्य है। यह महाकाव्य दुनिया के निर्माण से शुरू होकर सातवीं शताब्दी में अरबों की विजय तक के कालखंड को समेटता है। इस ग्रंथ में रुस्तम जैसे महान योद्धाओं और सिकंदर महान जैसे ऐतिहासिक राजाओं की दिलचस्प कहानियाँ दर्ज हैं। ईरान, अफ़ग़ानिस्तान (Afghanistan), ताजिकिस्तान (Tajikistan) और काकेशस (Caucasus) के लोग इस ग्रंथ को अपनी साझा सांस्कृतिक विरासत मानते हैं। फिरदौसी ने पूर्व-इस्लामी ईरानी पौराणिक कथाओं को शामिल करके फ़ारसी भाषा और संस्कृति को सहेजने का महान काम किया था। हालांकि बीसवीं सदी में कई राष्ट्रवादियों और विशेष रूप से पहलवी राजवंश ने इस ग्रंथ का राजनीतिकरण किया। उन्होंने इसे अरब और तुर्क प्रभाव के खिलाफ ईरानी श्रेष्ठता का प्रतीक बना दिया और यह भ्रांति फैलाई कि शाहनामा में कोई अरबी शब्द नहीं है और यह इस्लाम या अरबों के ख़िलाफ़ है।शाहनामा वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट है। राष्ट्रवादी विचारों ने शाहनामा को एक धर्मनिरपेक्ष और शुद्ध फ़ारसी ग्रंथ साबित करने की कोशिश की, लेकिन तथ्य बताते हैं कि इस महाकाव्य में लगभग नौ प्रतिशत अरबी शब्दों का इस्तेमाल हुआ है। फिरदौसी ने अपनी किताब की शुरुआत में ईश्वर, ग़ज़नी के सुल्तान महमूद, पैगंबर और उनके परिवार (अहल-ए बैत) की भरपूर प्रशंसा की है, जो उनकी आस्था को दर्शाता है। इस ग्रंथ में बुराई का स्रोत बाहरी दुनिया को नहीं, बल्कि 'अह्रिमन' के रूप में समाज के भीतर ही दिखाया गया है। सियावश और सोहराब जैसे ईरानी नायकों ने ईरानी पठार की सीमाओं के पार जाकर रिश्ते बनाए थे। फिरदौसी ने अपनी कहानी में सुदाबेह और अयोग्य राजा के कवुस जैसे भ्रष्ट ईरानी किरदारों को भी जगह दी है, जो साबित करता है कि यह महाकाव्य केवल खोखले राष्ट्रवाद की वकालत नहीं करता। 1934 में जब तूस शहर में फिरदौसी के मकबरे का पुनर्निर्माण हुआ, तो उसमें सफ़ेद पत्थर का इस्तेमाल इसी तथाकथित भाषाई शुद्धता को दर्शाने के लिए किया गया था और पारसी प्रतीक 'फ़रहर' को परसेपोलिस (Persepolis) से हूबहू नकल किया गया था। तेरहवीं शताब्दी में मंगोल आक्रमणों के बाद जब व्यापारिक मार्ग फिर से खुले, तो इलखानी और तैमूरी काल के चित्रकारों ने शाहनामा के चित्रों में चीनी कला को भी अपनाया। मशहूर ईरानी पौराणिक पक्षी 'सीमूर्घ' के चित्रण पर चीनी ड्रैगन (Chinese dragon) और फ़ीनिक्स (Phoenix) का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। मुग़ल साम्राज्य ने शाहनामा और अन्य फ़ारसी साहित्य को कैसे सहेजा और बढ़ावा दिया?भारत में मुग़ल साम्राज्य की नींव 1526 में बाबर ने रखी थी। बाबर महान विजेता तैमूर और चंगेज़ ख़ान का वंशज था। वह मूल रूप से उज़्बेकिस्तान (Uzbekistan) की फ़रग़ना घाटी से आया था और उसका सपना समरकंद पर कब्ज़ा करना था। जब वह तीन बार असफल रहा, तो उसने काबुल और फिर भारत का रुख किया, जहाँ उसने अफ़ग़ान शासक इब्राहिम लोदी को हराया। मुग़ल मूल रूप से तुर्क थे, लेकिन वे फ़ारसी संस्कृति को बहुत परिष्कृत और महान मानते थे। इसी कारण उन्होंने फ़ारसी को अपने दरबार और प्रशासन की आधिकारिक भाषा बना दिया। बाबर कला और साहित्य का प्रेमी था; उसने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' (Baburnama) अपनी मातृभाषा चगताई तुर्की में लिखी थी, जिसमें उसने अपने युद्धों और भारत की गर्मी का ज़िक्र किया था।बाबर के बाद उसके बेटे हुमायूँ को अफ़ग़ान शासक शेर शाह सूरी से हारकर भागना पड़ा और उसने ईरान में सफ़वी शासक शाह तहमास्प के दरबार में पनाह ली। यह निर्वासन मुग़ल इतिहास और कला के लिए एक वरदान साबित हुआ। शाह की मदद से हुमायूँ को राजनीतिक ताकत तो मिली ही, साथ ही उसने तबरीज़ में शाह के स्टूडियो (studio) में बेहतरीन कलाकृतियाँ भी देखीं। वापसी में हुमायूँ अपने साथ कम से कम दो महान फ़ारसी कलाकारों को भारत ले आया, जिन्होंने मुग़ल चित्रकला स्टूडियो की नींव रखी। बाद में अनपढ़ होने के बावजूद बादशाह अकबर ने किताबों के प्रति अपने गहरे प्रेम के कारण अपने पिता की इस परंपरा को बहुत आगे बढ़ाया। अकबर ने हमज़ानामा (Hamzanama) बनवाया, जिसमें चौदह सौ चित्र थे और जिसे पूरा होने में पंद्रह साल लगे थे। अकबर के समय में बाबरनामा का तुर्की से फ़ारसी में अनुवाद किया गया और निज़ामी, फ़िरदौसी, हाफ़िज़ तथा सादी के ग्रंथों को चित्रित करवाया गया। इस प्रकार मुग़ल काल में फ़ारसी कला और साहित्य ने भारतीय संस्कृति के साथ मिलकर एक नया मुकाम हासिल किया। हमज़ानामा मुग़ल लघु चित्रकला की उत्पत्ति कैसे हुई और सचित्र पांडुलिपियों से इसका क्या संबंध है?मुग़ल लघु चित्रकला वास्तव में फ़ारसी और भारतीय कला शैलियों का एक अनूठा संगम है, जो सोलहवीं शताब्दी में अपने चरम पर पहुँची। जब हुमायूँ ईरान से लौटा, तो वह अपने साथ मीर सैयद अली और अब्द अल-समद जैसे महान फ़ारसी कलाकारों को लाया था। इन कलाकारों ने भारतीय कला में आलंकारिक शैली, जटिल विवरण और जीवंत रंगों को पिरोया। सम्राट अकबर के शासनकाल में इस कला को सबसे ज़्यादा संरक्षण मिला और मुग़ल चित्रकला की एक बिल्कुल नई शैली का जन्म हुआ। इन लघु चित्रों के ज़रिए न केवल दरबार की भव्यता को दर्शाया गया, बल्कि हिंदू महाकाव्यों जैसे रामायण और महाभारत को भी मुग़ल शैली में सचित्र किया गया।इन चित्रों को बनाने की तकनीक बहुत ही बारीक और मेहनत भरी होती थी। मुग़ल चित्रकार मुख्य रूप से कागज़ पर चित्र बनाते थे, जो ताड़ के पत्तों पर चित्रकारी करने की पुरानी भारतीय परंपरा से एक बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव था। रंग भरने के लिए खनिजों, पौधों और यहां तक कि कीमती पत्थरों से निकले प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता था। सबसे दिलचस्प बात यह है कि चित्रकारी के लिए इस्तेमाल होने वाले ब्रश गिलहरी या बिल्ली के बालों से बनाए जाते थे। इन चित्रों में पदानुक्रमित पैमाने का उपयोग किया जाता था, जिसका अर्थ है कि बादशाह या मुख्य व्यक्ति को हमेशा अन्य आकृतियों की तुलना में बड़ा दिखाया जाता था। चित्रों में गहरे लाल, नीले, हरे और सुनहरे रंगों का भरपूर इस्तेमाल होता था और छाया के ज़रिए एक गहरी जीवंतता पैदा की जाती थी। इस तरह लघु चित्रकला ने पांडुलिपियों को केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि देखने और महसूस करने वाली कला का खजाना बना दिया। रामपुर की रज़ा लाइब्रेरी में संरक्षित सचित्र शाहनामा का क्या सांस्कृतिक महत्व है?अठारहवीं सदी के अंत में जब मुग़ल साम्राज्य का पतन हो रहा था और दिल्ली में उथल-पुथल मची थी, तब रामपुर के पहले नवाब फैज़ुल्लाह ख़ान (1774 से 1794) ने भागते हुए कलाकारों, कवियों और विद्वानों को अपने यहां पनाह दी। नवाब फैज़ुल्लाह ख़ान एक उत्कृष्ट नज़रिए और गहरी बुद्धि वाले इंसान थे। उन्होंने सत्ता के साथ-साथ ज्ञान को सहेजने के महत्व को समझा और पुरानी पांडुलिपियों को इकट्ठा करना शुरू किया, जिससे महान रज़ा लाइब्रेरी की नींव पड़ी। बाद में नवाब कल्ब अली ख़ान और उनके बेटे नवाब हामिद अली ख़ान के दौर में यह लाइब्रेरी पूरी दुनिया में मशहूर हो गई। इन नवाबों ने इस्तांबुल, काहिरा, बग़दाद, तेहरान और समरकंद जैसी जगहों पर अपने विशेष लोग भेजे और उन्हें खाली चेक देकर दुनिया की सबसे दुर्लभ पांडुलिपियों को रामपुर लाने का काम सौंपा। आज रामपुर के शानदार हामिद मंज़िल में स्थित इस लाइब्रेरी में सत्रह हज़ार से ज़्यादा पांडुलिपियां और अस्सी हज़ार से ज़्यादा मुद्रित किताबें मौजूद हैं।इसी विशाल और अनमोल संग्रह में सफ़वी फ़ारसी शासक शाह तहमास्प के आदेश पर तैयार किए गए 'शाहनामा' का एक शानदार सचित्र पन्ना भी सुरक्षित रखा गया है। इसके हर पन्ने पर बनी जटिल मुग़ल और फ़ारसी चित्रकारी फ़ारसी नायकों की कहानियों को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाती है। इसके अलावा यहाँ बारहवीं सदी की एक ऐसी कुरान भी मौजूद है जिसे केवल स्याही से नहीं, बल्कि सोने से लिखा गया है। यहाँ मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब आलमगीर द्वारा अपने हाथों से लिखी गई 'दीवान-ए-हाफ़िज़' (Diwan-e-hafiz) की एक प्रति और ग्यारहवीं सदी के महान विद्वान अल-बरूनी की मूल पांडुलिपि भी सहेजी गई है। इस लाइब्रेरी में अरबी, फ़ारसी, संस्कृत, हिंदी, तुर्की, पश्तो और उर्दू की बेशकीमती पांडुलिपियां हैं, साथ ही बाबर, हुमायूँ और अकबर के मूल शाही फ़रमान भी मौजूद हैं। 1951 में नवाब सैयद मुर्तज़ा अली ख़ान ने इस लाइब्रेरी को एक ट्रस्ट को सौंप दिया और अंततः 1975 में भारत सरकार ने संसद के एक अधिनियम के माध्यम से इसे राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित कर दिया। आज यह रज़ा लाइब्रेरी केवल किताबों का संग्रह नहीं है, बल्कि दुनिया भर के शोधकर्ताओं के लिए एक तीर्थस्थल है, जो रामपुर शहर को वैश्विक इतिहास के नक्शे पर हमेशा के लिए अमर कर देता है। संदर्भ 1. https://tinyurl.com/2ytjm3ub 2. https://tinyurl.com/29ohewd6 3. https://tinyurl.com/23nk87f7 4. https://tinyurl.com/2cvrtw2e
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
धर्मयुद्ध और रणनीति: पढ़ते हैं, भगवदगीता एवं सन त्ज़ु की युद्ध शिक्षाओं का विश्लेषण
रामपुरवासियों, आज हम जानेंगे कि भगवत गीता के अनुसार, युद्ध लड़ना कब और कैसे सही माना जाता है। लेख में हम कर्म योग के विचारों को समझेंगे, जो भक्ति के साथ-साथ निस्वार्थ कार्य और अनुशासन पर केंद्रित है। आगे बढ़ते हुए, ज्ञान के मार्ग के रूप में, हम ज्ञान योग की जांच करेंगे, और देखेंगे कि, यह हमें कैसे आंतरिक शांति की ओर ले जा सकता है। फिर हम युद्ध में रणनीतिक सोच को समझने के लिए, सन त्ज़ु (Sun Tzu) की युद्ध कला को देखेंगे। अंततः हम युद्ध और संघर्ष को समझने में आंतरिक निपुणता और बाहरी रणनीति के बीच अंतर देखने हेतु, भगवद गीता और सन त्ज़ु की शिक्षाओं की तुलना करेंगे।भगवद गीता एवं महाभारत में दर्शाया गया युद्ध, दो चचेरे भाइयों - पांडवों और कौरवों के बीच की लड़ाई है, जब दोनों हस्तिनापुर राज्य पर नियंत्रण पाने की कोशिश कर रहे थे। पांडवों और कौरवों के बीच मौजूद कई वर्षों की दुश्मनी के कारण, उनके पड़ोसी राज्य के शासक – भगवान श्रीकृष्ण, उनके बीच समाधान के लिए मध्यस्थता करने की कोशिश करते हैं। जब यह वार्ता विफल हो जाती है, तो युद्ध अपरिहार्य हो जाता है। तब श्रीकृष्ण दोनों पक्षों को यह कहते हुए आगे की सेवाएं प्रदान करते हैं कि, एक पक्ष को वह अपनी सेना देंगे, और दूसरे पक्ष में वह रथ सारथी के रूप में कार्य करेंगे। कौरव उनकी सेना को चुनते हैं और पांडव योद्धा राजकुमार अर्जुन, श्रीकृष्ण को सारथी के रूप में चुनते हैं। इस पृष्ठभूमि में, कृष्ण और अर्जुन के बीच हुए वार्तालाप का संग्रह ही गीता है। इसमें अर्जुन स्वीकार करते हैं कि, अपने ही लोगों या चचेरे भाईयों के साथ युद्ध में जाने के विचार से उनका शरीर कांप उठता है। तब कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि, सबसे पहली चीज़ जो किसी को करनी चाहिए, वह अपने धर्म अर्थात कर्तव्य या नैतिकता को समझना है। यदि आवश्यकता हो, तो अगला कदम 'धर्म के लिए' युद्ध छेड़ना है। कृष्ण चाहते हैं कि अर्जुन को पता चले कि, एक योद्धा के रूप में अर्जुन को धर्मयुद्ध में भाग लेने से बड़ा कोई महान उद्देश्य नहीं मिल सकता है। ऐसे प्रयास के महत्व को रेखांकित करते हुए, कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि,'यदि तुम मारे गए, तो तुम स्वर्ग पहुँचोगे;यदि तुम विजयी हुए, तो तुम पृथ्वी का आनंद ले पाओगे; तो कुंती के पुत्र, अपने संकल्प में दृढ़ होकर, लड़ने के लिए खड़े हो जाओ!' (श्लोक 37, अध्याय 2)शेष अध्याय में जटिल बौद्धिक तर्कों, धार्मिक औचित्य और नैतिक विचारों पर बात की गई है। इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाने की पेशकश करते हैं कि, युद्ध से दूर जाना ही 'नुकसान' है। क्योंकि, युद्ध न करने पर वह अपने धर्म को त्याग देगा। गीता, इस प्रकार अर्जुन के अनिर्णय और निष्क्रियता से बंधे व्यक्तिमत्व में परिवर्तन के बारे में एक पाठ है। कृष्ण अर्जुन से आग्रह करते हैं और उसे आश्वस्त करते हैं कि, धर्मयुद्ध लड़ना ही उसका धर्म है। कृष्ण का दावा है कि, यह अर्जुन की प्रकृति और वास्तविकता की सीमित समझ से उत्पन्न होता है। गीता के समापन अर्थात अठारहवें अध्याय में, अर्जुन ने घोषणा की है कि, शुरूआत में उसने जो संदेह और निराशा व्यक्त की थी, वह एक 'भ्रम' थी और कृष्ण के साथ इस बातचीत ने उसकी 'बुद्धिमान स्मृति' का मार्ग प्रशस्त किया है। इस प्रकार, उसने युद्ध में जाने के लिए अपनी तत्परता की घोषणा की, जो उसका सच्चा धर्म है।हिंदू धर्म में ऐसी ‘युद्ध की कला’, युद्ध के सामरिक पहलुओं से नहीं, बल्कि संघर्ष और कर्तव्य के नैतिक एवं आध्यात्मिक आयामों से संबंधित है। इस परिस्थिति में, युद्ध को एक बुराई के रूप में माना जाता है, जिसका मुकाबला केवल तभी किया जाना चाहिए, जब धार्मिकता (धर्म) को खतरा हो। हिंदू धर्म में, युद्ध व्यक्तिगत लाभ, प्रतिशोध या घृणा के लिए नहीं, बल्कि न्याय की प्राप्ति और धर्म की रक्षा के लिए लड़ा जाना चाहिए। धार्मिकता और कर्तव्य पर यह जोर, कर्म (कार्य और उनके अंतिम परिणाम) और धर्म (कर्तव्य, नैतिकता, और धार्मिकता) में भारतीय विश्वास को दर्शाता है। इसलिए, युद्ध इसके परिणामों की चिंता किए बिना लड़ा जाना चाहिए, जो भारतीय दर्शन में कर्म योग (निःस्वार्थ कर्म का मार्ग) के दर्शन को दर्शाता है। यह दर्शन का एक दुर्लभ संयोजन है। इसके केंद्र में योग के तीन रूप हैं, जो भगवद गीता को सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि हमारे जीवन का एक दर्शन बनाता है। यह दर्शन ऐसे जीवन के लिए मार्गदर्शन करता है, जिसमें कोई व्यक्ति सरल और सामान्य जीवन जीते हुए पारलौकिक वास्तविकता का अनुभव कर सकता है।आइए, अब योग के इन तीन रूपों को समझते हैं -1. ज्ञान योग- योग के सभी रूपों में यह सर्वोच्च स्थान पर है। ज्ञान योग, ज्ञान का उच्चतम मार्ग है, जिसमें व्यक्ति स्वयं एवं परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करता है। यह मुक्ति की प्राप्ति का साधन है। ज्ञान योग दो शब्दों - ज्ञान और योग से बना है। ज्ञान का अर्थ ‘चेतना', और योग का अर्थ 'मिलन' है। यह चेतना, ज्ञान का कोई सामान्य रूप नहीं, बल्कि वह ज्ञान है, जहां व्यक्ति ब्रह्म अर्थात स्वयं को जानने का प्रयास करता है। दूसरी ओर, योग अर्थात मिलन का अर्थ ‘स्वयं का ईश्वरीय स्व के साथ मिलन’ है। ज्ञान योग का महत्व इस तथ्य में निहित है कि, यह मनुष्य को अविद्या या अज्ञान के बंधन से मुक्त करता है। अज्ञानता के कारण ही व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर, मन और इंद्रियों से पहचानता है। ये सभी चीज़ें अवास्तविक, क्षणभंगुर तथा नाशवान हैं। ज्ञान योग का उद्देश्य व्यक्ति को चेतना के माध्यम से यह एहसास कराना है कि, वह ब्रह्म से अलग नहीं है। सभी विज्ञानों में, ज्ञान का मार्ग ही अत्यंत कठिन है। यह उन लोगों के लिए है, जिनके दिल शुद्ध हैं, जिनकी बुद्धि तेज़ है, और जो ईमानदार हैं। 2. कर्म योग-भगवद्गीता का दर्शन कर्मयोग, यानी कर्म के मार्ग की महत्ता को स्वीकार करता है। कर्म योग सामान्य लोगों के लिए मुक्ति प्राप्त करने का सर्वोत्तम मार्ग है। यह गीता की केंद्रीय शिक्षा है। गीता के अनुसार, ज्ञान योग तभी संभव है, जब कर्म योग प्राप्त हो। कोई भी प्राणी कर्मों का पूर्णतः त्याग नहीं कर सकता है, क्योंकि सम्पूर्ण ब्रह्मांड कर्म के सिद्धांत पर कार्य करता है। भक्ति योग वस्तुतः कर्म योग का विशिष्ट रूप है। गीता में 'योग' शब्द का उपयोग सर्वोच्च या 'ईश्वर' के साथ मिलन के अर्थ में किया गया है। कर्म योग में, यह कर्म, ज्ञान और भक्ति के माध्यम से हमारे भगवान से मिलन का मार्ग सिखाता है। गीता कर्मों के त्याग की अपेक्षा कर्तव्यों के पालन को श्रेष्ठ मानती है, जो नि:स्वार्थ या निष्काम कर्म को विकसित करते हैं। निष्काम या अनासक्त कर्मयोग मानवता के कल्याण की भावना को बढ़ावा देता है। इस प्रकार, निःस्वार्थ कर्मों से व्यक्ति शुद्ध हो जाता है, और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने में सक्षम हो जाता है, जिससे उसे परम सत्य का एहसास होता है। 3. भक्ति योग-भक्ति योग या भक्ति का मार्ग, ज्ञान का मार्ग प्राप्त करने के लिए एक सहायक मार्ग है। यह मार्ग कर्म योग का एक विशेष रूप है, जहां क्रिया को भावनात्मक क्रिया या भाव कर्म में परिवर्तित किया जाता है। भक्ति का मार्ग गहन प्रेम और भक्ति के माध्यम से, ईश्वर से मिलन का मार्ग है। भक्ति का अर्थ, सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रति प्रेम और सर्वोच्च भक्ति है। यह योग मनुष्य के संपूर्ण स्वभाव के भावनात्मक तत्व पर आधारित है। इसके माध्यम से मनुष्य की संभावित शक्ति को प्राप्त एवं सक्रिय किया जा सकता है। प्रेम मनुष्य के लिए बहुत स्वाभाविक चीज़ है। लेकिन, सामान्यतः प्रेम का अर्थ सीमित वस्तुएं हैं, जो क्षणभंगुर, नाशवान और अवास्तविक हैं। इस अर्थ में, प्रेम शुद्ध नहीं बल्कि लगाव है। जबकि भक्ति इस क्षणभंगुर संसार और भौतिक सुखों से परे प्रेम का सबसे शुद्ध रूप है। भक्ति मार्ग सभी मार्गों में सबसे सुविधाजनक और लोकप्रिय माना जाता है, क्योंकि प्रेम, भक्ति, और लगाव ऐसी भावनाएँ हैं, जो मनुष्य के लिए बहुत स्वाभाविक हैं। अत: इसके लिए किसी विशेष दृष्टिकोण या क्षमता अथवा संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। इस प्रकार, भक्ति योग शुद्ध प्रेम या भक्ति के माध्यम से मुक्ति का मार्ग है।चलिए, अब हम भगवद गीता के युद्ध दर्शन की सन त्ज़ु की पुस्तक – द आर्ट ऑफ़ वॉर (The Art of War) के साथ तुलना करते हैं। सन त्ज़ु के अनुसार, सभी युद्ध धोखे पर आधारित होते हैं। इसलिए, जब परिस्थितियां अनुकूल हों, तब हमें वैसे–वैसे बदलाव करने चाहिए। उनका कहना है कि, हालांकि, लंबे युद्ध से किसी देश को फ़ायदा होने का कोई उदाहरण नहीं है। इस प्रकार, बिना लड़े ही दुश्मन के प्रतिरोध को तोड़ने में सर्वोच्च उत्कृष्टता है। साथ ही, जीत के लिए आवश्यक पांच चीजें निम्नलिखित हैं: • युद्ध में वही जीतेगा, जो जानता है कि कब लड़ना है, और कब नहीं लड़ना है।• युद्ध वही जीतेगा, जो श्रेष्ठ और निम्न दोनों शक्तियों को संभालना जानता है।• युद्ध वह जीतेगा, जिसकी सेना सभी परिस्थितियों में समान रूप से जोशपूर्ण है।• युद्ध वह जीतेगा, जो खुद को तैयार करके, निम्न तैयारी के दुश्मन पर कब्ज़ा करने की प्रतीक्षा करेगा। • युद्ध वह जीतेगा, जिसके पास अपनी सैन्य क्षमता है, और जिसमें किसी संप्रभु द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया गया है।इसके अलावा, द आर्ट ऑफ़ वॉर के अनुसार, यदि आप शत्रु और स्वयं को जानते हैं, तो आपको लड़ाइयों के परिणाम से डरने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप शत्रु को नहीं, बल्कि केवल स्वयं को जानते हैं, तो प्रत्येक जीत के साथ आपको एक हार भी झेलनी पड़ेगी। यदि आप न तो दुश्मन को जानते हैं, और न ही खुद को, तो आप हर लड़ाई में हार मान लेंगे। यदि आप केवल असुरक्षित स्थानों पर हमला करते हैं, तो आप अपने हमलों में सफल हो सकते हैं। युद्ध में, अच्छा रास्ता यह है कि, जो शक्तिशाली है उससे बचें, और जो कमजोर है उस पर वार करें। और यदि युद्ध आपके लाभ के लिए है, तो आगे बढ़ें; तथा यदि नहीं, तो युद्ध ना करें।द आर्ट ऑफ़ वॉरभगवद गीता और द आर्ट ऑफ़ वॉर की विधियों की तुलना करने से, आंतरिक निपुणता और बाहरी रणनीति के बीच एक आकर्षक अंतर का पता चलता है। गीता की प्राथमिक पद्धति निष्काम कर्म है; जो साधक को परिणामों को मानसिक रूप से समर्पित करते हुए, पूरी तीव्रता के साथ अपना कर्तव्य निभाना सिखाती है। इस पद्धति का लक्ष्य चेतना प्राप्त करना है, जहां उतार-चढ़ाव वाले मन के बजाय अपरिवर्तनीय आत्मा के रूप में शांति पाई जाती है। इसके विपरीत, सन त्ज़ु की विधि गणना अनुकूलन और धोखे में से एक है। उनका तर्क है कि, सभी युद्ध धोखे पर आधारित हैं। उनकी रणनीति कम से कम प्रयास के साथ जीत हासिल करने हेतु, पर्यावरण, स्थान और दुश्मन की धारणाओं में हेरफेर करने पर ध्यान केंद्रित करती है।जबकि दोनों पाठ आत्म-जागरूकता को महत्व देते हैं, वे इसका उपयोग अलग-अलग उद्देश्यों के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण के लिए, आत्म-जागरूकता वासना, क्रोध और लालच के आंतरिक शत्रुओं को खत्म करने की विधि है, जो समभाव की स्थिति की ओर ले जाती है। दूसरी तरफ, सन त्ज़ु के लिए, आत्म-जागरूकता वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन का एक उपकरण है। उनके मुताबिक, अपनी खुद की ताकत और दुश्मन की कमजोरियों को जानने से, कोई अपनी रणनीति को विशिष्ट क्षण के अनुसार अपना सकता है। अर्थात, गीता धार्मिकता (धर्म) के लिए एक विधि प्रदान करती है, जबकि द आर्ट ऑफ़ वॉर अस्तित्व और प्रभुत्व सुनिश्चित करने के लिए एक विधि प्रदान करती है। संदर्भ 1. https://tinyurl.com/3w2ktasa 2. https://tinyurl.com/nykmu63f 3. https://tinyurl.com/2uhnavut 4. https://tinyurl.com/2bd4m465 5. https://tinyurl.com/2ads32sd 6. https://tinyurl.com/2jrxzedh 7. https://tinyurl.com/5cfneka2 8. https://tinyurl.com/4s5fmbjy
वास्तुकला II - कार्यालय/कार्य उपकरण
इंग्लैंड में कैक्सटन की पुस्तक ट्रॉय व् भारत में डौट्रिना क्रिस्टा: जानिए मुद्रण का विकास
आज हम विलियम कैक्सटन (William Caxton) के बारे में जानेंगे, जिन्होंने अंग्रेजी में पहली किताब छापी थी। पहली अंग्रेजी मुद्रित पुस्तक का नाम ‘द रिक्यूयेल ऑफ द हिस्ट्रीज़ ऑफ ट्रॉय’ था। इसके अलावा, हम भारत में प्रारंभिक मुद्रण पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जिसकी शुरुआत बंगाल में सेरामपुर से हुई थी। फिर, हम गोवा में स्थापित हुई उस प्रिंटिंग प्रेस के बारे में जानेंगे, जहां भारत में पहली पुस्तक - 'डौट्रिना क्रिस्टा' छापी गई थी। अंत में, हम ट्रैंकेबार में स्थित एक और प्रिंटिंग प्रेस के बारे में पता लगाएंगे, जिसे डच मिशनरी बार्थोलोम्यू ज़िगेनबाल्ग द्वारा स्थापित किया गया था।विलियम कैक्सटन (William Caxton) अंग्रेजी साहित्य और मुद्रण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। इन्हें पंद्रहवीं शताब्दी के अंत में इंग्लैंड (England) में प्रिंटिंग प्रेस शुरू करने वाले पहले व्यक्ति के रूप में जाना जाता हैं। उन्होंने ब्रूझ (Bruges) जाने से पहले एक व्यापारी के प्रशिक्षु के रूप में अपना पेशा शुरू किया, जहां वे एक सफल व्यापारी और अनुवादक बन गए। उनका महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान 1469 के आसपास शुरू हुआ, जब उन्होंने 1475 में अंग्रेजी में छपी पहली पुस्तक ‘द रिक्यूयेल ऑफ द हिस्ट्रीज़ ऑफ ट्रॉय (The Recuyell of the Historyes of Troye)’ जैसी कृतियों का अनुवाद और मुद्रण किया। 1476 में वेस्टमिंस्टर (Westminster) में स्थानांतरित होने के बाद, उन्होंने इंग्लैंड का पहला प्रिंटिंग प्रेस स्थापित किया, जहां उन्होंने सौ से अधिक पुस्तकों का उत्पादन किया। इनमें 'ले मोर्टे डी'आर्थर (Le Morte d'Arthur)' और 'द कैंटरबरी टेल्स (The Canterbury Tales)' जैसे प्रसिद्ध ग्रंथ शामिल थे।1471-72 के दौरान कोलोन (Cologne) में प्रिंट करना सीखने के बाद, कैक्सटन ने ब्रूझ (लगभग 1474) में अपनी प्रेस की स्थापना की, जहां वह लंबे समय से व्यवसाय में स्थापित थे। उनकी पहली पुस्तक, 'द रिक्यूयेल ऑफ द हिस्ट्रीज़ ऑफ ट्रॉय', फ्रांसीसी भाषा से उनका अपना अनुवाद था। इसका उत्पादन ही संभवतः वह मुख्य कारण था कि, उन्होंने 50 वर्ष की आयु में मुद्रण करना शुरू कर दिया। फिर वह एडवर्ड चतुर्थ (Edward IV) के प्रोत्साहन से इंग्लैंड लौट आए। इसके बाद भी उन्हें शाही संरक्षण मिलता रहा। प्रारंभिक अंग्रेजी साहित्य को संरक्षित करने और बढ़ावा देने में कैक्सटन का काम महत्वपूर्ण था, क्योंकि उन्होंने ग्रंथों का सावधानीपूर्वक संपादन किया और सुलभ पठन सामग्री प्रदान करने का लक्ष्य रखा। उन्होंने अंग्रेजी के मानकीकृत रूप का उपयोग करने के महत्व को पहचाना, जिससे क्षेत्रीय बोलियों को कम करने में मदद मिली और अंग्रेजी भाषा के विकास में योगदान मिला। उनके प्रिंटिंग प्रेस ने न केवल कुलीन वर्ग की जरूरतों को पूरा किया, बल्कि वे व्यापक दर्शकों तक भी पहुंचे। उन्होंने जो 90 किताबें छापीं, उनमें से 74 अंग्रेजी में थीं। उनमें से 22 कार्य उनके अपने अनुवाद थे।चलिए अब सेरामपुर मिशन प्रेस के बारे में बात करते हैं। सेरामपुर मिशन प्रेस एक पुस्तक और समाचार पत्र प्रकाशक था, जो 1800 से 1837 तक डेनिश (Danish) भारत के सेरामपुर में संचालित होता था। इस प्रेस की स्थापना ब्रिटिश बैपटिस्ट मिशनरियों विलियम कैरी (William Carey), विलियम वार्ड (William Ward) और जोशुआ मार्शमैन (Joshua Marshman) द्वारा की गई थी। इसका संचालन 10 जनवरी 1800 को शुरू हुआ था। मिशनरियों पर अत्यधिक संदेह करने वाली ब्रिटिश सरकार ने अपने भारतीय क्षेत्रों में मिशनरी कार्यों को हतोत्साहित किया था। हालाँकि, चूंकि सेरामपुर डेनिश शासन के अधीन था, इसलिए यहां मिशनरी और प्रेस स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम थे।इस प्रेस ने 1800 और 1832 के बीच 2,12,000 पुस्तकें तैयार की। अगस्त 1800 में, प्रेस ने सेंट मैथ्यू (St Matthew) के अनुसार गॉस्पेल का बंगाली अनुवाद प्रकाशित किया। हालाँकि, इसकी प्रमुख गतिविधि स्थानीय पाठ्यपुस्तकों का प्रकाशन थी; प्रेस ने धार्मिक ईसाई ट्रैक्ट, भारतीय साहित्यिक रचनाएँ, पच्चीस भारतीय स्थानीय भाषाओं और अन्य दक्षिण एशियाई भाषाओं में बाइबिल के अनुवाद भी प्रकाशित किए। प्रेस ने फोर्ट विलियम कॉलेज और कलकत्ता स्कूल-बुक सोसाइटी के लिए व्याकरण, शब्दकोश, इतिहास, किंवदंतियों और नैतिक कहानियों पर किताबें भी छापीं। 1818 में, प्रेस ने पहला बंगाली समाचार पत्र और पत्रिका प्रकाशित की। इसने लगभग पैंतालीस भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित कीं। परंतु, 1837 में जब मिशन भारी कर्ज में डूब गया तो प्रेस बंद हो गई।वास्तव में, भारत में पहला चल-प्रकार का प्रिंटिंग प्रेस लगभग संयोग से आया था। जेसुइट्स (Jesuits) धर्मांतरण में सहायता के रूप में मुद्रण के महत्व को अच्छी तरह से जानते थे। उदाहरण के लिए, 1549 में सेंट फ्रांसिस ज़ेवियर (St Francis Xavier) द्वारा लिखे गए एक पत्र में ईसाई मिशनरी साहित्य को जापानी भाषा में मुद्रित करने के लिए कहा गया है। तभी गोवा में भी, स्थानीय भाषाओं में छपे मिशनरी साहित्य के संभावित मूल्य का एहसास बढ़ रहा था। हालाँकि, अधिकारी प्रिंटिंग प्रेस के लिए उत्सुक नहीं थे। लगभग 1510 में गोवा को पुर्तगालियों ने उपनिवेश बनाया था। इसके औपनिवेशिक शासकों द्वारा संचालित राजनीतिक शक्ति को ईसाई धर्म के प्रसार के लिए पर्याप्त माना जाता था। इस प्रकार, जो प्रिंटिंग प्रेस अंततः गोवा पहुंची थी, उसका उद्देश्य दरअसल भारत में नहीं, बल्कि इथियोपिया (Ethiopia) में मिशनरी कार्य करना था।गोवा में आगमन के कुछ ही समय बाद, इस प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की गई और इसने काम करना शुरू कर दिया गया। 19 अक्टूबर, 1556 को ‘तर्क और दर्शन’ पर इसमें एक थीसिस छपी थी। ये संभवतः पुस्तक के बजाय, चर्चों के दरवाजों पर चिपकाई जाने वाली ढीली चादरों के रूप में थे। 1557 को सेंट ज़ेवियर द्वारा ‘डौट्रिना क्रिस्टा (Doutrina Christa)’ मुद्रित किया गया था। यह भारत में मुद्रित होने वाली पहली ज्ञात पुस्तक बन गई। हालाँकि दुनिया में कहीं भी इस मुद्रित पुस्तक की कोई प्रति मौजूद नहीं है, लेकिन समकालीन खातों में इस बात के निर्णायक सबूत मिलते हैं कि, यह वास्तव में मुद्रित हुई थी।बाद में कुछ वर्षों पश्चात, एक डच मिशनरी - बार्थोलोम्यू ज़िगेनबाल्ग (Bartholomew Ziegenbalg), एशिया में पहला औपचारिक प्रोटेस्टेंट मिशन स्थापित करने के लिए 1706 में ट्रेंकेबार (तरंगमबाड़ी) आए थे। तब भारत में पुस्तक छपाई फिर से शुरू हो गई। 1712-13 में, एक प्रिंटिंग प्रेस यहां आई और ट्रेंकेबार प्रेस (Tranquebar press) से पहला प्रकाशन शुरू हुआ। ज़िगेनबाल्ग ने तमिल में भी छपाई करने पर जोर दिया, और इस प्रकार प्रेस से 1713 के अंत में पहला तमिल प्रकाशन सामने आया। इसके बाद 1715 में न्यू टेस्टामेंट (New Testament) की छपाई हुई। डौट्रिना क्रिस्टा1715 के बाद पुर्तगालियों के समय के पश्चात, शेष भारत में मुद्रण और प्रकाशन फैलने का कारण, ज़िगेनबाल्ग और उनके साथी मिशनरियों द्वारा ऐसी नई प्रौद्योगिकियों को साझा करना था। इस प्रक्रिया में, उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि मुद्रित शब्द, बॉम्बे, बंगाल, और मद्रास जैसे भारत के अन्य हिस्सों तक फैल जाए।तमिल भाषा प्रिंट होने वाली न केवल पहली भारतीय भाषा है, बल्कि प्रिंट होने वाली पहली गैर-यूरोपीय भाषा भी है। पहली तमिल किताबें पुर्तगालियों द्वारा पश्चिमी तट पर मुद्रित की गई थीं। परंतु, भारत में महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव वाली मुद्रण की वास्तविक कहानी अठारहवीं शताब्दी के पहले दशक में लूथरन मिशनरियों (Lutheran missionaries) द्वारा ट्रैंकेबार (tranquebar) प्रेस की स्थापना के साथ शुरू होती है। ट्रैंकेबार में छपाई की पहली शताब्दी तक मुद्रित तमिल पुस्तकों की संख्या तीन सौ के करीब थी। यह आंकड़ा फारसी और बंगाली जैसी अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं से काफी आगे था। सामग्री और गुणवत्ता के संदर्भ में, ट्रैकेबार में डेनिश प्रेस से जारी किए गए पहले मुद्रित तमिल व्याकरण और शब्दकोश, पूर्वी संस्कृतियों की आधुनिक यूरोपीय समझ में मील का पत्थर हैं। संदर्भ1. https://tinyurl.com/mu4bvsdy 2. https://tinyurl.com/3937fa43 3. https://tinyurl.com/tkas4k6r 4. https://tinyurl.com/567ufrax 5. https://tinyurl.com/4hh2hua6 6. https://tinyurl.com/yfx9nr6b
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
भक्ति, साधना और स्वर की गरिमा: एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी
मदुरै शन्मुखवदिवु सुब्बुलक्ष्मी (1916–2004), जिन्हें दुनिया एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी के नाम से जानती है, केवल कर्नाटक संगीत की महान गायिका नहीं थीं, बल्कि 20वीं शताब्दी के भारत की सांस्कृतिक चेतना की प्रमुख आवाज़ थीं। मदुरै के एक संगीत-परिवार में जन्मी सुब्बुलक्ष्मी ने बहुत कम आयु में ही मंच पर प्रस्तुति देनी शुरू कर दी थी। उस समय शास्त्रीय संगीत की दुनिया परंपरागत सामाजिक सीमाओं से घिरी हुई थी, फिर भी उन्होंने अपनी साधना, अनुशासन और असाधारण प्रतिभा से उस क्षेत्र में विशिष्ट स्थान बनाया। उनकी कला में केवल तकनीकी दक्षता नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिकता और भक्ति की आंतरिक अनुभूति थी। वे 1966 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्तुति देने वाली पहली भारतीय शास्त्रीय संगीतकार बनीं, और बाद में उन्हें भारत रत्न, पद्म विभूषण तथा पद्म भूषण जैसे उच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया गया।उनकी गायकी में राग की शुद्धता, शब्दों की स्पष्टता और भाव की निर्मलता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। वे केवल गीत प्रस्तुत नहीं करती थीं, बल्कि उन्हें साधना के रूप में जीती थीं। उल्लेखित वीडियो में भी उनकी वही शांत, संयत और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति दिखाई देती है, जिसने भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक सम्मान दिलाया। जब वे भजन या कर्नाटक रचना गाती थीं, तो वह प्रस्तुति भारत की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत रूप बन जाती थी। एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी ने यह सिद्ध किया कि शास्त्रीय संगीत सीमित वर्ग की कला नहीं, बल्कि एक ऐसी सार्वभौमिक भाषा है जो विश्व के किसी भी कोने में समान भाव से सुनी और समझी जा सकती है।संदर्भ:https://tinyurl.com/4hx5j9wd https://tinyurl.com/4u7zrzu6 https://tinyurl.com/yte3pcxj
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
होली से जुड़ी पौराणिक कथाएं और इस पर्व का आध्यात्मिक महत्व
होली का त्यौहार केवल रंगों तक सीमित नहीं है, इस त्यौहार की जड़े बुराई पर अच्छाई की जीत के जश्न पर आधारित है। साथ ही यह प्राचीन हिंदू धार्मिक विश्वास को दर्शाता है कि भगवान के प्रति अगाध आस्था और भक्ति सभी को मोक्ष दिला सकती है। वहीं अन्य सभी हिंदू त्यौहारों की तरह, होली का त्यौहार कई पौराणिक कथाओं से जुड़ा हुआ है। हालांकि होली की सटीक उत्पत्ति ज्ञात नहीं है, लेकिन कई इतिहासकारों का दावा है कि होली का त्यौहार आर्यों द्वारा ही शुरू किया गया है। वहीं होली से जुड़ी कुछ सामान्य किंवदंतियाँ निम्न हैं:प्रहलाद और होलिका की कथा:प्राचीन काल में अत्याचारी राक्षसराज हिरण्यकश्यप ने स्वर्ग, पृथ्वी और अधोलोक की तीनों दुनिया पर विजय प्राप्त कर ली थी और इस तरह वो काफी घमंडी हो गया था। गर्व में डूबे हुए हिरण्यकश्यप को यह लगने लगा कि वह भगवान विष्णु को भी पराजय कर सकता है और इस विचार में उसने अपने राज्य के लोगों को विष्णु भगवान की पूजा करने से मना कर दिया और अपनी (हिरण्यकश्यप) आराधना करने के लिए विवश कर दिया। लेकिन उनका छोटा बेटा प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था, इसलिए उसने इस आदेश का पालन करने से इंकार कर दिया। इससे हिरण्यकश्यप काफी क्रोधित हो गया और उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि प्रहलाद को पहाड़ से नीचे फेंक कर मार दिया जाएं। प्रहलाद द्वारा विष्णु भगवान् की प्रार्थना करना जारी रहा और उसने खुद को भगवान विष्णु के समक्ष छोड़ दिया, भगवान विष्णु अंतिम क्षण में प्रकट हुए और प्रहलाद को बचा लिया, उपरोक्त चित्र में प्रहलाद को भगवान् विष्णु की आराधना करते हुए दिखाया है जब प्रह्लाद अग्नि से घिर गये थे।इसके बाद परेशान होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी राक्षसी बहन होलिका से मदद मांगी, होलिका को किसी भी प्रकार की अग्नि भस्म नहीं कर सकती थी, ऐसा वरदान प्राप्त था। हिरण्यकश्यप द्वारा प्रहलाद को होलिका के साथ आग में भेजा गया, परंतु उस वक्त ये दोनों भाई-बहन ये भूल गए थे कि होलिका अग्नि से बिना भस्म हुए तभी बहार आ सकती थी, यदि वो अग्नि में अकेले प्रवेश करें। इस प्रकार होलिका तो अग्नि में भस्म हो गई और प्रहलाद को भगवान विष्णु द्वारा फिर से बचा लिया गया। तब से आज भी लोग अग्नि जला कर होलिका दहन मनाते हैं।राधा और कृष्ण की कथा:इस कथा में राधा और कृष्ण के अमर प्रेम को दर्शाया गया है। एक बार बालपन में भगवान कृष्ण ने अपनी माँ यशोदा से अपने सांवले रंग के बारे में शिकायत की और राधा का गोरा रंग होने के पीछे का कारण पूछा। और इस पर माँ यशोदा ने भगवान कृष्ण को राधा के चेहरे पर अपना पसंदीदा रंग लगाने की सलाह दी और बोला कि इससे राधा का रंग भी बदल जाएगा। इसके बाद भगवान कृष्ण ने राधा और गोपियों पर रंग डाल दिया। इस प्रकार रंग के त्यौहार होली को उत्सव के रुप में मनाया जाने लगा।कामदेव की कथा:होली के त्यौहार से भगवान शिव का गहन संबंध है, ये तब की बात है जब देवी सती के मृत्यु उपरांत भगवान शिव तपस्या में लीन हो गए थे, लेकिन इससे पृथ्वी पर असंतुलन पैदा हो गया था। इस बीच देवी सती का पुनर्जन्म हुआ और उन्होंने शिव को जगाने और उनका दिल जीतने के लिए अनेक प्रयास करें, पर सारे विफल रहें। अंतः उन्होंने कामदेव से मदद मांगी और कामदेव द्वारा शिव पर पुष्पबाण चलाया गया, जिससे उनकी तपस्या भंग हो गई। तपस्या भंग होने से भगवान शिव काफी क्रोधित हो गए और उनकी तीसरी आंख खूल गई, जिससे अग्नि बाहर आई और कामदेव उसमे जलकर भस्म हो गये। बाद में जब भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ तो उन्होंने अपनी भूल को समझा और कामदेव को दूसरा जीवन प्रदान किया और अदृश्य रूप में अमर रहने का वरदान दिया। इसलिए कई लोग होली का उत्सव कामदेव के बलिदान के लिए मनाते हैं।संदर्भ :-https://tinyurl.com/2yzvuebd https://tinyurl.com/5faym5jh
खनिज
कार्बन के एलोट्रोप और कोयला: संरचना, गुणधर्म एवं वर्गीकरण का वैज्ञानिक अध्ययन
कोयला हमारी पृथ्वी पर मौजूद कार्बन के प्रमुख रूपों में से एक है। कार्बन को “कोयले की रीढ़” माना जाता है, और इसके मजबूत बंधन (bond) ही कोयले को उच्च स्तर के दहन के लिए एक आदर्श विकल्प और एक कठोर तत्व बनाते हैं। कार्बन हमारी पृथ्वी में पाया जाने वाला सत्रहवाँ सबसे प्रचुर तत्व है। यह एक ऐसा तत्व है जो पौधों, जानवरों सहित सभी जीवित जीवों और कई निर्जीव चीजों के भीतर भी मौजूद होता है। यहाँ तक कि कार्बन हवा में भी Co2 के रूप में उपस्थित होता है। कार्बन के यौगिकों के अध्ययन को रसायन विज्ञान (Chemistry) की एक अलग शाखा, कार्बनिक रसायन विज्ञान (Organic Chemistry) के तहत किया जाता है। हीरा, ग्रेफाइट और कोयला कार्बन के प्रमुख मुक्त रूप हैं। कार्बन में एक अद्वितीय गुण होता है कि, जो अन्य कार्बन परमाणुओं के साथ जुड़कर कार्बन-कार्बन बंधन (Carbon-Carbon Bonds) बना सकता है। इसके परिणामस्वरूप लंबी श्रृंखला वाले यौगिकों का निर्माण हो सकता है।कार्बनकार्बन एक बहुमुखी तत्व है, जो कई अलग-अलग रूप ले सकता है, जिन्हें एलोट्रोप (Allotrope) कहा जाता है। कार्बन के कुछ सबसे प्रसिद्ध, अपरूप हीरा और ग्रेफाइट हैं। अपरूप एक ही तत्त्व के विभिन्न संरचनात्मक रूप (conformation) होते हैं जो काफी अलग भौतिक गुण और रासायनिक व्यवहार प्रदर्शित कर सकते हैं। हालाँकि, वैज्ञानिकों ने हाल के वर्षों में कार्बन के कई और एलोट्रोपों की खोज की है, जिनमें बकमिनस्टरफुलरीन (Buckminsterfullerene) जिसमे अणुओं की सरंचना गेंद के अकार में होती है और ग्राफीन (Graphene) जिसमे अणुओं की सरंचना शीट के अकार में होती है । कार्बन नैनोट्यूब (Nanotubes), नैनोबड्स (Nanobuds) और नैनोरिबन्स (Nanoribbons) जैसी बड़ी संरचनाएं भी बना सकता है। बहुत उच्च तापमान या अत्यधिक दबाव पर, कार्बन और भी अधिक असामान्य रूप धारण कर सकता है। कार्बन के कई अलग-अलग रूपों यानी एलोट्रोप में रासायनिक गुण समान होते हैं, लेकिन इन सभी के भौतिक गुण अलग-अलग होते हैं। ये एलोट्रोप दो रूपों में मौजूद होते हैं:क्रिस्टलीय (Crystalline)अनाकार (Amorphous)कोयला कार्बन का एक अनाकार अपरूप है। यह एक गैर-नवीकरणीय जीवाश्म ईंधन है, जो दहनशील होता है और इसमें हाइड्रोजन, सल्फर, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन और कार्बन की परिवर्तनीय मात्रा होती है। कोयला कार्बन के सबसे महत्वपूर्ण अपरूपों में से एक है। यह दहनशील है, जिसका अर्थ है कि इसे गर्मी और ऊर्जा पैदा करने के लिए जलाया जा सकता है। हालाँकि कोयला, कालिख और कार्बन ब्लैक (Carbon Black) को अक्सर अनाकार कार्बन (Amorphous Carbon) कहा जाता है, लेकिन वे वास्तविक अनाकार कार्बन नहीं हैं। वास्तव में इनका उत्पादन पायरोलिसिस (Pyrolysis) नामक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है, जिसके तहत किसी पदार्थ को तोड़ने के लिए उसे उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है। सामान्य परिस्थितियों में, पायरोलिसिस प्रक्रिया में अनाकार कार्बन का उत्पादन नहीं होता है। कोयले की संरचना को परिभाषित करना कठिन है, क्योंकि यह प्रोटीन जैसी दोहराई जाने वाली इकाइयों (monomers) से नहीं बनता है। वास्तव में कोयला कई अलग-अलग अणुओं का मिश्रण होता है, जिससे इसे एक विशिष्ट संरचना में निर्दिष्ट करना कठिन हो जाता है। हालाँकि, वैज्ञानिक कोयले का वर्णन उसके संरचनात्मक मापदंडों के आधार पर कर सकते हैं। वैन क्रेवेलन के कोयला (Van Crevelen's Coal (1961) नामक पुस्तक के अनुसार, कोयला उच्च आणविक भार और गैर-समान संरचना वाला पदार्थ है। समग्र रूप से कोयला अत्यधिक सुगंधित होता है, और इसकी सुगंध रैंक के साथ कम या ज्यादा लगातार बढ़ती है। कोयले की एक बहुलक संरचना होती है।कोयला मुख्य रूप से चार प्रकार का होता है।इनमें से प्रत्येक में अलग-अलग स्तर पर कार्बनिक पदार्थ मौजूद होता है। 1. एन्थ्रेसाइट (Anthracite): इसमें कार्बन की सांद्रता सबसे अधिक होती है और यह उच्चतम श्रेणी का कोयला होता है। यह कठोर, भंगुर और काला चमकदार होता है। इसमें 92-98% कार्बन और कम प्रतिशत वाष्पशील पदार्थ होता है।2. बिटुमिनस कोयला (Bituminous Coal): इस कोयले में 70 - 90% कार्बन होता है और इसका उपयोग मुख्य रूप से भाप-विद्युत ऊर्जा उत्पादन में किया जाता है। इसका गलनांक (melting point) भी अधिक होता है, यह कोयला चमकदार और चिकना होता है।3. उप बिटुमिनस कोयला (Sub Bituminous Coal): यह कोयला रंग में काला और दिखने में फीका होता है। इसमें 35-45% कार्बन होता है और इसका उपयोग मुख्य रूप से बिजली उत्पादन में किया जाता है।4. लिग्नाइट (Lignite): इसमें 25-35% कार्बनिक पदार्थ होता है और इसे कोयले के सभी प्रकारों में सबसे निम्न श्रेणी माना जाता है। इस प्रकार हमे ये जानकारी मिलती है कि कोयले की गुणवत्ता उसकी कार्बनिक पदार्थ पर निर्भर करती है। उच्च कार्बनिक पदार्थ वाले कोयले में ऊर्जा की मात्रा अधिक होती है और यह अधिक कुशलता से जलता है।संदर्भhttp://tinyurl.com/a256xrz8 http://tinyurl.com/mw6nu7d9 http://tinyurl.com/mfdkv42r http://tinyurl.com/4kb7w8sb
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
महाशिवरात्रि: पूजा, उपवास, जागरण और आत्मिक चिंतन का पावन पर्व
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ!महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक पावन और आध्यात्मिक पर्व है, जिसे भगवान शिव की उपासना और आत्मसंयम के साथ मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं और पूजा, जप व ध्यान के माध्यम से शिव कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। उपवास के दौरान कुछ लोग निर्जल रहते हैं, जबकि कई भक्त फल, दूध और जल ग्रहण कर व्रत का पालन करते हैं। इसका उद्देश्य केवल शरीर का संयम नहीं, बल्कि मन को भी शुद्ध और स्थिर बनाना होता है। महाशिवरात्रि की रात्रि विशेष महत्व रखती है। भक्त पूरी रात जागरण करते हैं, “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हैं और शिव भजनों में लीन रहते हैं। इस दौरान शिवलिंग पर जल, दूध, शहद, घी और बेलपत्र अर्पित कर अभिषेक किया जाता है तथा दीप और धूप से वातावरण को पवित्र बनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस रात्रि की गई साधना अत्यंत फलदायी होती है।इस अवसर पर देशभर के शिव मंदिरों में विशेष पूजा होती है। श्रद्धालु काशी विश्वनाथ मंदिर, केदारनाथ मंदिर, सोमनाथ मंदिर और महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग जैसे प्रमुख शिवधामों में दर्शन के लिए पहुँचते हैं। व्रत के दौरान सात्त्विक भोजन किया जाता है, जिसमें फल, साबूदाना, दूध से बनी मिठाइयाँ, नारियल पानी और सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजन शामिल होते हैं। साथ ही भजन-कीर्तन, ध्यान, योग और दान-पुण्य भी किए जाते हैं। इस प्रकार महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम और आध्यात्मिक जागरण का अवसर है, जो जीवन में शांति और संतुलन का संदेश देता है।संदर्भ:https://tinyurl.com/mhxkbv97https://tinyurl.com/ms2churr
अवधारणा I - मापन उपकरण (कागज़/घड़ी)
रामपुर की अर्थव्यवस्था में कागज़ी मुद्रा की भूमिका: इतिहास, विकास और वैश्विक शुरुआत
अपने समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध रामपुर ने समय के साथ अपनी अर्थव्यवस्था में कई परिवर्तन देखे हैं। एक समय था जब व्यापार कीमती धातुओं से बने सिक्कों के माध्यम से किया जाता था, लेकिन आज अन्य शहरों की तरह रामपुर में भी कागज़ी मुद्रा का व्यापक उपयोग होता है। कागज़ी मुद्रा, जिसकी शुरुआत सबसे पहले प्राचीन चीन में हुई थी, ने बाज़ारों और व्यवसायों के संचालन को सरल, तेज़ और अधिक संगठित बना दिया है। जैसे-जैसे कोई शहर विकसित होता है, व्यापारिक गतिविधियाँ बढ़ती हैं और इसमें कागज़ी मुद्रा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने के साथ-साथ कुछ चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करती है। इस लेख में हम भारत में कागज़ी मुद्रा के इतिहास, इसके लाभ और सीमाओं, वैश्विक शुरुआत तथा इसके मूल स्वरूप को समझने का प्रयास करेंगे।भारत में कागज़ी मुद्रा का परिचय अठारहवीं शताब्दी के अंत में हुआ। इसके प्रारंभिक जारीकर्ताओं में जनरल बैंक ऑफ़ बंगाल एंड बिहार (1773–75) शामिल था, जो एक राज्य-प्रायोजित संस्था थी और स्थानीय विशेषज्ञों के सहयोग से स्थापित की गई थी। बैंक ऑफ़ हिंदोस्तान (1770–1832), जिसे एलेक्ज़ेंडर एंड कंपनी द्वारा स्थापित किया गया था, उस समय काफी सफल रहा। हालांकि 1832 के वाणिज्यिक संकट में इसकी मूल कंपनी के विफल होने के कारण यह बैंक भी बंद हो गया।पहला प्रेसीडेंसी बैंक, बैंक ऑफ़ बंगाल, वर्ष 1806 में 50 लाख रुपये की पूंजी के साथ “बैंक ऑफ़ कलकत्ता” के रूप में स्थापित किया गया था। इसके नोटों पर नदी किनारे बैठी “वाणिज्य” का प्रतीक एक रूपक महिला आकृति अंकित होती थी। ये नोट दोनों ओर से मुद्रित होते थे और उनके अग्रभाग पर बैंक का नाम तथा मूल्यवर्ग उर्दू, बंगाली और नागरी—तीनों लिपियों में लिखा होता था। दूसरा प्रेसीडेंसी बैंक 1840 में बॉम्बे में स्थापित हुआ, जो एक प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र के रूप में उभरा। हालांकि सट्टा कपास के अचानक समाप्त होने से उत्पन्न आर्थिक संकट के कारण 1868 में बैंक ऑफ़ बॉम्बे का परिसमापन हो गया।1843 में स्थापित बैंक ऑफ़ मद्रास तीसरा प्रेसीडेंसी बैंक था, जिसके नोटों पर मद्रास के गवर्नर (1817–1827) सर थॉमस मुनरो का चित्र अंकित था। इसके अतिरिक्त, ओरिएंट बैंक कॉरपोरेशन जैसे निजी बैंकों ने भी बैंक नोट जारी किए। लेकिन 1861 के कागज़ी मुद्रा अधिनियम ने इन बैंकों से नोट जारी करने का अधिकार वापस ले लिया और यह अधिकार सरकार के अधीन कर दिया गया। प्रेसीडेंसी बैंकों को सरकारी शेष राशि के उपयोग और सरकारी नोटों के प्रबंधन की अनुमति दी गई।कागज़ी मुद्रा के कई महत्वपूर्ण लाभ हैं:• इसे नियंत्रित करना अपेक्षाकृत आसान होता है।• यह आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में सहायक होती है।• इसे संभालना और गिनना सरल है।• लेन-देन तेज़ी से किए जा सकते हैं।हालांकि इसके कुछ नुकसान भी हैं:• अधिक मात्रा में छपाई महंगाई को बढ़ा सकती है।• विनिमय दर में अस्थिरता आ सकती है।• यह फटने या क्षतिग्रस्त होने की आशंका रखती है।विश्व स्तर पर कागज़ी मुद्रा की शुरुआत अलग-अलग परिस्थितियों में हुई, लेकिन इस दिशा में अग्रणी भूमिका प्राचीन चीन ने निभाई। प्रारंभ में वहाँ तांबे के सिक्कों का उपयोग होता था, जिनके बीच छेद होता था ताकि उन्हें रस्सी में पिरोकर रखा जा सके। लेकिन भारी वजन के कारण व्यापारियों को कठिनाई होती थी। परिणामस्वरूप 11वीं शताब्दी तक सोंग राजवंश के दौरान जियाओज़ी (Jiaozi)—जिसे दुनिया का पहला बैंकनोट माना जाता है—आधिकारिक रूप से जारी किया जाने लगा। तांबे की कमी और आर्थिक आवश्यकताओं ने बैंक नोटों को लोकप्रिय बना दिया, और शीघ्र ही इनके लिए विशेष मुद्रण केंद्र स्थापित किए गए। जालसाजी रोकने के लिए नोटों के डिज़ाइन जटिल बनाए गए।यूरोप में भी कागज़ी मुद्रा का विकास हुआ। 17वीं शताब्दी तक लंदन के सुनार जमाकर्ताओं को रसीदें देने लगे, जो बाद में भुगतान के साधन के रूप में स्वीकार की जाने लगीं। 1661 में स्वीडन का स्टॉकहोम्स बैंको (Stockholms Banco) बैंक नोट जारी करने वाला पहला केंद्रीय बैंक बना, हालांकि यह जल्द ही दिवालिया हो गया। बाद में 1694 में स्थापित बैंक ऑफ़ इंग्लैंड ने स्थायी रूप से बैंक नोट जारी करने की परंपरा शुरू की।कागज़ी मुद्रा किसी देश की आधिकारिक मुद्रा होती है, जिसका उपयोग वस्तुओं और सेवाओं के लेन-देन में किया जाता है। आमतौर पर इसकी छपाई देश के केंद्रीय बैंक या राजकोष द्वारा नियंत्रित की जाती है, ताकि अर्थव्यवस्था में धन का संतुलन बना रहे। समय-समय पर नए सुरक्षा फीचर्स के साथ नोटों को अपडेट किया जाता है, जिससे जालसाजी की संभावना कम हो सके। कागज़ी मुद्रा को फ़िएट मुद्रा (Fiat Money) भी कहा जाता है—अर्थात वह मुद्रा जिसे सरकार द्वारा वैध घोषित किया गया हो।इस प्रकार, सिक्कों से लेकर आधुनिक कागज़ी मुद्रा तक की यह यात्रा न केवल आर्थिक विकास की कहानी है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि कैसे बदलती आवश्यकताओं के साथ वित्तीय प्रणालियाँ विकसित होती रही हैं। आज कागज़ी मुद्रा रामपुर सहित पूरे देश की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है, जो व्यापार को सुगम बनाते हुए विकास की गति को निरंतर आगे बढ़ा रही है।संदर्भ https://tinyurl.com/dnv54fwj https://tinyurl.com/35b2zuph
नदियाँ और नहरें
जलीय पर्यटन के संभावनाएँ और चुनौतियाँ: दोनों पहलुओं को समझना क्यों है आवश्यक
भारतीय संस्कृति और नदियों के बीच प्राचीन काल से ही गहरा आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक संबंध रहा है। समय के साथ-साथ 21वीं सदी में नदियाँ केवल आस्था का केंद्र ही नहीं रहीं, बल्कि सिंचाई, मछलीपालन, परिवहन और पर्यटन के माध्यम से वाणिज्यिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन गई हैं। आज देश में लाखों परिवारों की आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नदियों पर निर्भर है। इसी संदर्भ में जल आधारित पर्यटन एक नए और आकर्षक आर्थिक क्षेत्र के रूप में उभर कर सामने आया है, जिसने विकास के नए अवसर तो पैदा किए हैं, लेकिन साथ ही कई पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं।वर्तमान समय में जल आधारित पर्यटन, विशेषकर नदी पर्यटन, तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। नदी पर्यटन से नदियों के आसपास के क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विकास होता है, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं और क्षेत्र की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। पर्यटन गतिविधियों के विस्तार से समुदायों के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संकेतकों में व्यापक परिवर्तन देखने को मिलते हैं। नौकायान या रिवर क्रूज़िंग (River Cruising) अपनी सीमित क्षमता, आरामदायक वातावरण और विलासिता से भरपूर अनुभव के कारण पर्यटन उद्योग का एक लाभदायक स्वरूप बन चुका है। ये रिवर क्रूज़ (River Cruise) अंतर्देशीय जलमार्गों पर संचालित होते हैं और आमतौर पर एक सप्ताह या उससे अधिक समय तक चलने वाली यात्राओं का हिस्सा होते हैं। जहाज के आकार के अनुसार इनमें 100 से 250 पर्यटकों तक की क्षमता होती है।इसी क्रम में हाल ही में शुरू हुआ दुनिया का सबसे लंबा रिवर क्रूज़ ‘गंगा विलास’ (Ganga Vilas) जल पर्यटन के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। इस विलासितापूर्ण क्रूज़ (Luxury Cruise) को 13 जनवरी, 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हरी झंडी दिखाई गई थी। यह क्रूज़ वाराणसी से बांग्लादेश की राजधानी ढाका होते हुए पुनः भारत में प्रवेश करेगा और असम के डिब्रूगढ़ (Dibrugarh) में अपनी यात्रा समाप्त करेगा। 51 दिनों की इस यात्रा में 15 दिन बांग्लादेश के जलमार्गों से गुजरते हुए, यह क्रूज़ कुल 3,200 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करेगा, जो अब तक किसी नदी क्रूज़ द्वारा की गई सबसे लंबी यात्रा मानी जा रही है।गंगा विलास पोत 62 मीटर लंबा और 12 मीटर चौड़ा है। इसमें तीन डेक (Decks) और 18 सुइट्स (Suites) हैं, जिनमें लगभग 36 पर्यटकों के ठहरने की सुविधा है। जहाज में आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ आराम और सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा गया है। यह दावा किया गया है कि गंगा विलास क्रूज़ प्रदूषण-मुक्त प्रणाली और शोर नियंत्रण तकनीकों से युक्त है। अपनी यात्रा के दौरान यह 50 से अधिक पर्यटन स्थलों, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों से होकर गुजरेगा, जिनमें सुंदरवन डेल्टा—जो रॉयल बंगाल टाइगर्स (Royal Bengal Tigers) के लिए प्रसिद्ध है—और एक सींग वाले गैंडों के लिए विख्यात काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान भी शामिल हैं। यह क्रूज़ भारत के पाँच राज्यों और बांग्लादेश की कुल 27 नदी प्रणालियों से होकर गंगा, भागीरथी, हुगली, ब्रह्मपुत्र और वेस्ट कोस्ट नहर (West Coast Canal) में संचालित होगा।हालाँकि जलीय पर्यटन आर्थिक दृष्टि से लाभकारी सिद्ध हो सकता है, लेकिन इसके नकारात्मक प्रभावों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, तटीय और नदी क्षेत्रों में पर्यटन गतिविधियों के बढ़ने से प्राकृतिक आवासों पर गंभीर दबाव पड़ता है। पर्यटकों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए तटीय विकास, होटल निर्माण और बुनियादी ढांचे के विस्तार के कारण जंगलों की कटाई और पारिस्थितिक तंत्र का क्षरण हो सकता है। इसके अतिरिक्त, पर्यटकों द्वारा उत्पन्न कचरा, प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट जल तथा जलीय जीवन के लिए हानिकारक साबित होते हैं।तटीय पर्यटन स्थलों के विकास की प्रक्रिया में मैंग्रोव वनों (Mangrove Forests) और प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) को भी भारी नुकसान पहुँचता है। प्रवाल भित्तियाँ अत्यंत नाज़ुक और जैव विविधता से भरपूर पारिस्थितिक तंत्र होती हैं, जो हजारों जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास हैं। इनके नष्ट होने से किसी क्षेत्र की जैव विविधता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा नदी परिभ्रमण से कटाव, बाढ़, सूखा, जलमार्गों में आवाजाही की बाधाएँ तथा बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं। गैर-जिम्मेदार पर्यटन, अति-पर्यटन और यात्रियों की लापरवाही जलीय पारिस्थितिकी को और अधिक नुकसान पहुँचा सकती है।इसलिए यह आवश्यक है कि जलीय पर्यटन के विकास के साथ-साथ उसके पर्यावरणीय प्रभावों पर भी गंभीरता से विचार किया जाए। आर्थिक विकास और रोजगार सृजन को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ-साथ सतत विकास के सिद्धांतों को अपनाना भी उतना ही ज़रूरी है। भविष्य की पीढ़ियों के लिए नदियों, जल संसाधनों और जलीय पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा तभी संभव है, जब पर्यटन की योजनाओं में पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए और इसके नकारात्मक प्रभावों को कम करने के ठोस प्रयास किए जाएँ।संदर्भhttps://bit.ly/3Xx7Z93 https://bit.ly/3Xu2ZSA https://bit.ly/3H1GPl6https://tinyurl.com/uprmz63e
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
06-05-2026 09:45 AM • Rampur-Hindi
जानिए, सॉवरेन या संप्रभु एआई के लिए देशों की चाहत कैसे बढ़ रही है एवं यह उपयुक्त क्यों है?
आज के लेख में हम समझेंगे कि, सॉवरेन एआई (Sovereign AI) या संप्रभु एआई क्या है, और इससे संबंधित प्रमुख पहलू क्या हैं। फिर, हम उन देशों की सूची देखेंगे, जिनके पास स्वतंत्र नियंत्रित इंटरनेट सिस्टम (Internet System) हैं। इसके अलावा, हम पूरी तरह से संप्रभु इंटरनेट के बिना, संप्रभु एआई प्राप्त करने की चुनौतियों का पता लगाएंगे। अंततः हम जांच करेंगे कि, क्या एक परस्पर जुड़ी वैश्विक प्रणाली में सच्ची डिजिटल संप्रभुता वास्तव में संभव है या नहीं।
सॉवरेन या संप्रभु एआई का उद्देश्य, एआई के देशज उत्पादन को सुनिश्चित करना है। इसमें एआई को प्रशिक्षित करने हेतु उपयोग किया जाने वाला डेटा, किसी क्वेरी (Query) या प्रश्न पर शोध करते समय एआई द्वारा खोजा गया डेटा, और किसी प्रश्न के जवाब में एआई द्वारा आउटपुट के रूप में उत्पन्न डेटा शामिल है।
इस संदर्भ में, संप्रभु एआई में "कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence)" के रूप में लेबल की गई किसी भी या सभी प्रकार की प्रौद्योगिकियां शामिल हो सकती हैं। इसमें डेटा रुझानों को समझने और विसंगतियों को पहचानने के लिए मशीन लर्निंग (Machine Learning) भी शामिल है। ऐसे एआई में, एआई प्रौद्योगिकियों के उपयोग को नियंत्रित करने वाले नियम भी शामिल हो सकते हैं, जैसे कि गोपनीयता (Privacy) से संबंधित नियम।
संप्रभु एआई, डेटा संप्रभुता से संबंधित है। किसी कंपनी या संगठन को राष्ट्रीय नियमों पर विचार करना चाहिए कि, उनका डेटा कहां संग्रहीत और संसाधित किया जा सकता है। आज अधिकांश संगठनों के पास डेटा प्रशासन नीतियां मौजूद हैं। परीक्षण के आरंभ में ही उन नीतियों को एआई तक विस्तारित करने से, भविष्य में आने वाली समस्याओं से बचा जा सकता है। इसी के साथ, इन्हें स्वीकार्य उपयोग को निर्देशित किया जा सकता है। यहां यह विचार भी महत्वपूर्ण है कि, एल्गोरिदम (Algorithm) को प्रशिक्षित करने के लिए डेटा का उपयोग कैसे किया जाता है, और तैयार एआई मॉडल क्या उत्तर प्रदान करते हैं।
संप्रभु एआई से संबंधित विचार करने के लिए, छह मुख्य पहलू निम्नलिखित हैं: आपके संगठन पर लागू होने वाले नियमों को समझना; आपके पसंदीदा एआई बुनियादी ढांचे का निर्धारण करना; डेटा स्थानीयकरण नियंत्रण लागू करना; डेटा गोपनीयता नियंत्रण स्थापित करना; कानूनी नियंत्रण स्थापित करना और अपने एआई स्टैक (Data stack) को सुरक्षित करना। उदाहरण के तौर पर, वांछित एआई बुनियादी ढांचे के निर्धारण में क्लाउड (Cloud) शामिल है, जिसमें एआई बुनियादी ढांचे का निर्माण, संकलन और प्रबंधन करना अक्सर आसान होता है। इसके साथ ही, यदि आपका क्लाउड डेटा संप्रभुता मुद्दों को प्रबंधित करने में आपकी सहायता कर सकता है, तो आपके लिए एआई संप्रभुता के साथ काम करना आसान हो जाएगा।
एक तरफ डेटा गोपनीयता, डेटा के प्रकार और इसका उपयोग कैसे किया जा सकता है, पर केंद्रित है। इसके लिए, आपके सॉफ़्टवेयर को एक लचीली नियंत्रण प्रणाली की आवश्यकता हो सकती है, जो जटिल उपयोग के मामलों को संभालने में सहायक हो। जबकि, एआई स्टैक को सुरक्षित करना, आखिरी पहलू है। कभी-कभी कंपनियां चाहती हैं कि एआई उनके सुरक्षा नियमों के अंदर काम करे। लेकिन इसके लिए ज्यादा जांच और परीक्षण करना पड़ता है। इसलिए वे ऐसे मामलों को पकड़ने के लिए टेस्ट करती हैं, जहां यूज़र (user) गलत तरीके से संवेदनशील जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं।
चलिए, अब राष्ट्रीय इंट्रानेट (National intranet) के बारे में पढ़ते हैं। यह एक इंटरनेट शिष्टाचार-आधारित बंद नेटवर्क होता है, जिसे एक राष्ट्र द्वारा वैश्विक इंटरनेट के राष्ट्रीय विकल्प के रूप में बनाए रखा जाता है। इसका उद्देश्य अपने निवासियों के संचार को नियंत्रित करना और उसकी निगरानी करना है। साथ ही, बाहरी मीडिया तक उनकी पहुंच को यह प्रतिबंधित करता है। ईरान (Iran) में इसके लिए ‘हलाल इंटरनेट’ शब्द का उपयोग किया गया है। ऐसे नेटवर्क आम तौर पर राज्य-नियंत्रित मीडिया और विदेशी संचालित इंटरनेट सेवाओं के राष्ट्रीय विकल्पों तक पहुंच के साथ आते हैं, जैसे कि - खोज इंजन (search engine), वेब-आधारित ईमेल (Web-based email), इत्यादि।
राष्ट्रीय इंट्रानेट वाले देशों की सूची निम्नलिखित है-
1. म्यांमार (Myanmar),
2. क्यूबा (Cuba),
3. उत्तर कोरिया (North Korea),
4. रूस (Russia),
5. चीन (China),
6. ईरान।
एआई स्टैक पर पूर्ण स्वायत्तता का विचार, अधिकांश उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए आर्थिक और संस्थागत रूप से निषेधात्मक है। हर चीज़ स्वयं बनाना भी महंगा है। जब कोई राष्ट्र एआई स्टैक के हर स्तर का मालिक बनना चुनता है, तो जरूरी नहीं कि वह अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर रहा हो। एक हालिया अध्ययन में पाया गया है कि, अमेरिकी कंपनियों ने 18% डेटा सेंटर (Data Center) परियोजनाओं के लिए ऑपरेटर (Operator) के रूप में काम किया है। "संप्रभु" सुविधाओं का निर्माण करने वाले देश भी संचालन के लिए, अक्सर अमेरिकी हाइपरस्केलर्स (Hyperscalers) जैसे एडब्ल्यूएस (AWS), माइक्रोसॉफ्ट एज्यूर( Microsoft Azure), या गूगल क्लाउड (Google Cloud) पर निर्भर रहते हैं। जब क्षेत्रीय और परिचालन क्षेत्राधिकार पर विचार किया जाता है, तो एआई क्षमता सहित वैश्विक गणना पर अमेरिका का पर्याप्त प्रभाव है। व्यवहार में, अधिकांश "संप्रभु गणना" अमेरिकी प्रौद्योगिकी पर निर्भर रहती है। यह प्रश्न मौजूद है कि, एआई आपूर्ति श्रृंखला के किन हिस्सों पर एक राष्ट्र का स्वामित्व, नियंत्रण या शासन होना चाहिए; और एक राष्ट्र किन हिस्सों के साथ सुरक्षित रूप से साझेदारी कर सकता है, किराए पर ले सकता है या साझा कर सकता है? इस प्रश्न का उत्तर परिस्थिति के आधार पर बदलता रहता है। सामान्य रूप से संप्रभुता पाने के बजाय, इन परिस्थितियों को सही करना ही 2026 की रणनीतिक चुनौती है।
हाल ही में, यूरोपीय संघ (European Union) और भारत ने एआई विकास के लिए अधिक संप्रभु दृष्टिकोण की इच्छा व्यक्त की है। हालांकि अभी के लिए, यूरोपीय संघ और भारत के ‘एआई स्टैक’ आपूर्ति श्रृंखलाओं में मजबूती से अंतर्निहित हैं, जो कुछ अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों द्वारा नियंत्रित हैं। चीन द्वारा नियंत्रित महत्वपूर्ण खनिज प्रसंस्करण और हार्डवेयर विनिर्माण (Hardware manufacturing) पर इनकी निर्भरता है। अमेरिका और भारत के बीच सहयोग, बुनियादी ढांचे, कॉर्पोरेट भागीदारी और आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण पर केंद्रित है। उन्नत प्रोसेसर (Processor) और अच्छी कंप्यूटिंग क्षमता (Computing capacity) पर ध्यान देने के साथ, भारतीय कंपनियों को अमेरिकी अग्रणी एआई कंपनियों के साथ जोड़ने के लिए समझौते किए गए हैं। इससे भारत मौजूदा वैश्विक एआई आपूर्ति श्रृंखलाओं में अधिक गहराई से एकीकृत होगा। इस प्रवृत्ति को भारत के अमेरिकी पहल ‘पैक्स सिलिका (Pax Silica)’ में शामिल होने से स्पष्ट किया गया है। इसका उद्देश्य चयनित भागीदारों के बीच एआई आपूर्ति श्रृंखलाओं में समन्वय और लचीलेपन को मजबूत करना है।
पूर्ण-स्टैक एआई संप्रभुता, लगभग किसी भी देश के लिए संरचनात्मक रूप से अव्यवहार्य है। क्योंकि एआई खनिजों, ऊर्जा, कंप्यूट हार्डवेयर, नेटवर्क, डिजिटल बुनियादी ढांचे (digital infrastructure), डेटा परिसंपत्तियों, मॉडलों, अनुप्रयोगों, प्रतिभा के क्रॉसकटिंग एनबलर्स (Crosscutting enablers) तथा शासन में केंद्रित एक अंतरराष्ट्रीय स्टैक है। इसलिए, विकल्प यह है कि एआई स्टैक में जोखिमों को कम करने के लिए रणनीतिक गठबंधन और साझेदारी पर काम करना चाहिए। अगर आपसी निर्भरता को सही तरीके से संभाला जाए, तो खुले बाजार और देशों के सहयोग के फायदे बने रहते हैं और साथ ही मजबूती भी बढ़ती है।
भारत डिजिटल संप्रभुता की बात करता है, और हमने डेटा स्थानीयकरण और देशज स्टार्टअप को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाए हैं। रूस, ब्राज़ील (Brazil) और अन्य देशों ने अपने डिजिटल ढांचे को अधिक नियंत्रित करने की इच्छा व्यक्त की है। विश्व में आज विदेशी प्रौद्योगिकी पर कम निर्भर होने की चाहत, काफी सार्वभौमिक हो गई है। आधुनिक तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र वैश्वीकृत है, और कोई भी एक राष्ट्र संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला को नियंत्रित नहीं करता है।
भारत में क्लीन एनर्जी के दौर में भी काले कोयले का राज क्यों कायम है?
गुजरात के सफ़ेद रण में बन रहा खावड़ा नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र साल 2030 तक 30 गीगावाट सौर और पवन ऊर्जा पैदा करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा स्वच्छ ऊर्जा प्रतिष्ठान बनने जा रहा है। लेकिन उसी समय महाराष्ट्र के चंद्रपुर में एक 3 गीगावाट का कोयला आधारित संयंत्र लगातार धुआं उगल रहा है, जो उन सैकड़ों संयंत्रों में से एक है जो आज भी भारत के 60 प्रतिशत से अधिक बिजली तंत्र को शक्ति प्रदान करते हैं। रामपुर और इसके आस-पास के बिजली उपभोक्ताओं के लिए यह जानना बहुत दिलचस्प होगा कि जब भारत में सौर ऊर्जा की क़ीमत 30 डॉलर प्रति मेगावाट घंटे तक गिर गई है, जो कोयले की क़ीमत से लगभग आधी है, फिर भी सरकार के अनुमान के मुताबिक साल 2047 तक भारत में कोयले की मांग 1755 मीट्रिक टन (metric ton) तक क्यों पहुंच जाएगी। विकास और जलवायु लक्ष्यों के बीच फँसे भारत के लिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर हमारी अर्थव्यवस्था कोयले पर इतनी निर्भर क्यों है, इसके क्या फ़ायदे और नुक़सान हैं, और साफ़ ऊर्जा की तरफ़ कैसे बढ़ा जा सकता है।
भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा में कोयले का क्या महत्व है? भारत की ऊर्जा ज़रूरतों के लिए कोयला एक आधारशिला है, जो हमारी प्राथमिक ऊर्जा ज़रूरतों के आधे से अधिक हिस्से का योगदान देता है और उद्योगों की रीढ़ की हड्डी बना हुआ है। पिछले एक दशक में देश के कुल बिजली उत्पादन में थर्मल पावर की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक रही है। इसके अलावा कोयला क्षेत्र का आर्थिक महत्व ऊर्जा उत्पादन से कहीं आगे तक फैला हुआ है। भारतीय रेलवे को माल ढुलाई से जो कमाई होती है, उसमें करीब 49% हिस्सा सिर्फ कोयले से आता है, जो वित्तीय वर्ष 2022-23 में 82,275 करोड़ रुपये रही थी। यह क्षेत्र केंद्र और राज्य सरकारों को रॉयल्टी (Royalty) और अन्य करों के माध्यम से सालाना 70,000 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व देता है। रोज़गार के मामले में भी यह क्षेत्र काफ़ी अहम है, विशेष रूप से पूर्वी राज्यों में, जहाँ कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Limited) और उसकी सहायक कंपनियों में 2,39,210 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं और इसके अलावा हज़ारों लोग ठेके और आउटसोर्सिंग (Outsourcing) के ज़रिए जुड़े हुए हैं।
कोयले के इस्तेमाल के मुख्य फ़ायदे और नुक़सान क्या हैं? कोयला दुनिया भर में ऊर्जा के सबसे प्रचुर स्रोतों में से एक है और यह तेल या प्राकृतिक गैस जैसे अन्य जीवाश्म ईंधनों की तुलना में सस्ता है। सौर या पवन ऊर्जा के विपरीत, जो पूरी तरह से मौसम पर निर्भर होते हैं, कोयला बिजली संयंत्र किसी भी मौसम में दिन-रात चल सकते हैं। कोयले का ऊर्जा घनत्व भी अधिक होता है, जिसका अर्थ है कि यह प्रति किलोग्राम बड़ी मात्रा में ऊर्जा पैदा कर सकता है। इसके अलावा कोयले से सिंथेटिक ईंधन (synthetic fuel) और रोज़मर्रा के सामान में इस्तेमाल होने वाले रसायन भी बनाए जा सकते हैं। लेकिन इन फ़ायदों के साथ इसके बड़े नुक़सान भी जुड़े हुए हैं। कोयला जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) जैसी ग्रीनहाउस गैसों (greenhouse gases) का भारी उत्सर्जन होता है जो जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण है। कोयले के प्रदूषण से अस्थमा और हृदय रोग का ख़तरा बढ़ता है, और खदानों में काम करने वाले मज़दूरों को ब्लैक लंग डिज़ीज़ (Black Lung Disease) जैसी जानलेवा बीमारियां होती हैं। इसके खनन के लिए जंगलों और पहाड़ों को नष्ट किया जाता है और बिजली संयंत्रों को ठंडा करने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। इन संयंत्रों से निकलने वाली ज़हरीली राख ज़मीन और पानी दोनों को दूषित करती है।
सौर ऊर्जा सस्ती होने के बावजूद भारत कोयले पर इतना निर्भर क्यों है? भारत में सौर ऊर्जा अब कोयले से सस्ती हो चुकी है, फिर भी नए कोयला संयंत्र (coal plant) बनाए जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि सौर और पवन ऊर्जा हमेशा उपलब्ध नहीं रहती है। एक सौर संयंत्र एक वर्ष में अपने अधिकतम उत्पादन का केवल 15 से 25 प्रतिशत ही पैदा कर पाता है और पवन संयंत्र 25 से 35 प्रतिशत पैदा करता है। इसकी तुलना में कोयला संयंत्र दिन-रात सातों दिन चल सकते हैं और इनका क्षमता उपयोग कारक 70 से 90 प्रतिशत तक होता है। भारत में बिजली की मांग दिन में दो बार चरम पर होती है, एक बार दोपहर में और दूसरी बार सूर्यास्त के बाद। सौर ऊर्जा दिन की मांग को तो पूरा कर देती है, लेकिन जब लोग शाम को घर लौटते हैं और बिजली की मांग बढ़ती है, तब सूरज ढल चुका होता है। इस समस्या को सुलझाने के लिए विशाल बैटरी स्टोरेज (Battery Storage) की ज़रूरत है, जो अभी व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य नहीं है। इसके अलावा एक बड़ी भौगोलिक चुनौती भी है क्योंकि भारत में नवीकरणीय ऊर्जा मुख्य रूप से छह दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में केंद्रित है, जबकि कोयले वाले राज्य मध्य और पूर्वी भारत में हैं। इन क्षेत्रों को जोड़ने के लिए ट्रांसमिशन बुनियादी ढांचा(Transmission infrastructure) अभी भी कमज़ोर है, जिस कारण कोयले पर निर्भरता कम करना आसान नहीं है। कोयले पर निर्भर इस व्यवस्था को साफ़ ऊर्जा में कैसे बदला जा सकता है? भारत को कार्बन मुक्त बनाने के लिए कोयला संयंत्रों को साफ़ ऊर्जा की ओर ले जाना सबसे बड़ी चुनौती है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के एक हालिया शोध में भारत के 806 कोयला संयंत्रों के डेटा का विश्लेषण किया गया है। इस शोध के अनुसार, यदि केवल नवीकरणीय ऊर्जा पर भारी निवेश किया जाता है, तो बिजली सस्ती तो होगी लेकिन सामाजिक असमानता बढ़ेगी। अमीर पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में हवा और सूरज की रोशनी होने के कारण सारा निवेश वहीं होगा, जबकि पूर्वी भारत के ग़रीब कोयला उत्पादक राज्य पीछे छूट जाएंगे। शोध में पाया गया है कि बिजली की लागत और सामाजिक न्याय दोनों को संतुलित करने का सबसे अच्छा तरीक़ा मौजूदा उच्च दक्षता वाले कोयला संयंत्रों में कार्बन कैप्चर एंड सिक्वेस्ट्रेशन (Carbon Capture and Sequestration) तकनीक लगाना है, जिसके तहत धुएं से कार्बन सोख लिया जाता है। इसके साथ ही कोयले के साथ बायोमास को मिलाकर जलाना भी एक बेहतर विकल्प है। अगर इन तकनीकों को अपनाया जाता है, तो बिजली की लागत में 22 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है और कोयला संयंत्रों का बेहतर उपयोग भी हो सकेगा। हालांकि भारत इस नई कार्बन सोखने वाली तकनीक को लेकर अभी बहुत सतर्क है, लेकिन विदेशी सहयोग और बेहतर नीतियों से इस संकट को सुलझाकर देश एक स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा वाले भविष्य की ओर बढ़ सकता है।
आशा भोसले और माइकल स्टाइप का 'द वे यू ड्रीम' में सुरीला संगम
आशा भोसले (Asha Bhosle) भारतीय सिनेमा की सबसे बहुमुखी और प्रसिद्ध गायिकाओं में से एक हैं, जिनकी आवाज़ ने संगीत की सीमाओं को पार करते हुए दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने केवल फिल्मी गीतों तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ भी काम करके अपनी कला को एक वैश्विक रूप दिया।
इसी कड़ी में उनका एक खास सहयोग अंग्रेज़ी संगीत समूह 1 जायंट लीप (1 Giant Leap) और गायक माइकल स्टाइप (Michael Stipe) के साथ देखने को मिलता है। “द वे यू ड्रीम” (The Way You Dream) गीत में आशा भोसले की आवाज़ सबसे पहले सुनाई देती है, जो पूरे गीत को एक गहराई और शांति देती है। यह गीत अलग अलग देशों की ध्वनियों और विचारों को जोड़कर एकता का संदेश देता है।
दिलचस्प बात यह है कि यह सहयोग पहले से तय नहीं था। जयपुर में अचानक मुलाकात के दौरान उन्हें एक धुन सुनाई गई और उन्होंने उसी समय गाना रिकॉर्ड किया। उनकी सहज और भावपूर्ण गायकी ने इस गीत को एक खास पहचान दी।
यह सहयोग दिखाता है कि आशा भोसले की आवाज़ सिर्फ भारत की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की है। उनका संगीत लोगों को जोड़ता है और यह एहसास कराता है कि अलग अलग संस्कृतियों के बीच भी एक गहरी समानता होती है।
50 हज़ार शेरों वाला फ़ारसी महाकाव्य 'शाहनामा' यूपी के रामपुर कैसे पहुँचा?
क्या आपने कभी सोचा है कि एक 1010 ईसवी में लगभग पचास हज़ार शेरों में लिखा गया एक ऐसा महाकाव्य, जो दुनिया के निर्माण से लेकर सातवीं शताब्दी के इस्लामी आक्रमण तक की कहानी बयां करता है, हमारे रामपुर शहर की सबसे सुरक्षित और ऐतिहासिक तिजोरी तक कैसे पहुँचा? यह दास्तान है 'शाहनामा' की, जिसे हकीम अबुल-कासिम फिरदौसी (Hakim Abul-Qasim Firdausi) ने लिखा था। फ़ारस से उठी यह साहित्यिक लहर मुग़ल बादशाहों के दरबारों से होती हुई, रामपुर के नवाबों के उस जुनून तक पहुँची, जिन्होंने दुनिया के दुर्लभ ग्रंथों को हासिल करने के लिए इस्तांबुल, काहिरा, बग़दाद, तेहरान और समरकंद तक खाली चेक देकर अपने नुमाइंदे भेजे थे। यह केवल एक किताब का सफ़र नहीं है, बल्कि यह इंसानी इतिहास, कला और सभ्यताओं के आपसी जुड़ाव की एक ऐसी जीती-जागती कहानी है, जो आज भी रामपुर की रज़ा लाइब्रेरी की अलमारियों में महक रही है।
शाहनामा क्या है और यह फ़ारसी पौराणिक कथाओं तथा इतिहास को कैसे प्रस्तुत करता है?शाहनामा, जिसे राजाओं की किताब के रूप में भी जाना जाता है, ग्रेटर ईरान (ईरान ज़मीन) के इतिहास और पौराणिक कथाओं का एक निर्विवाद राष्ट्रीय महाकाव्य है। यह महाकाव्य दुनिया के निर्माण से शुरू होकर सातवीं शताब्दी में अरबों की विजय तक के कालखंड को समेटता है। इस ग्रंथ में रुस्तम जैसे महान योद्धाओं और सिकंदर महान जैसे ऐतिहासिक राजाओं की दिलचस्प कहानियाँ दर्ज हैं। ईरान, अफ़ग़ानिस्तान (Afghanistan), ताजिकिस्तान (Tajikistan) और काकेशस (Caucasus) के लोग इस ग्रंथ को अपनी साझा सांस्कृतिक विरासत मानते हैं। फिरदौसी ने पूर्व-इस्लामी ईरानी पौराणिक कथाओं को शामिल करके फ़ारसी भाषा और संस्कृति को सहेजने का महान काम किया था। हालांकि बीसवीं सदी में कई राष्ट्रवादियों और विशेष रूप से पहलवी राजवंश ने इस ग्रंथ का राजनीतिकरण किया। उन्होंने इसे अरब और तुर्क प्रभाव के खिलाफ ईरानी श्रेष्ठता का प्रतीक बना दिया और यह भ्रांति फैलाई कि शाहनामा में कोई अरबी शब्द नहीं है और यह इस्लाम या अरबों के ख़िलाफ़ है।
शाहनामा
वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट है। राष्ट्रवादी विचारों ने शाहनामा को एक धर्मनिरपेक्ष और शुद्ध फ़ारसी ग्रंथ साबित करने की कोशिश की, लेकिन तथ्य बताते हैं कि इस महाकाव्य में लगभग नौ प्रतिशत अरबी शब्दों का इस्तेमाल हुआ है। फिरदौसी ने अपनी किताब की शुरुआत में ईश्वर, ग़ज़नी के सुल्तान महमूद, पैगंबर और उनके परिवार (अहल-ए बैत) की भरपूर प्रशंसा की है, जो उनकी आस्था को दर्शाता है। इस ग्रंथ में बुराई का स्रोत बाहरी दुनिया को नहीं, बल्कि 'अह्रिमन' के रूप में समाज के भीतर ही दिखाया गया है। सियावश और सोहराब जैसे ईरानी नायकों ने ईरानी पठार की सीमाओं के पार जाकर रिश्ते बनाए थे। फिरदौसी ने अपनी कहानी में सुदाबेह और अयोग्य राजा के कवुस जैसे भ्रष्ट ईरानी किरदारों को भी जगह दी है, जो साबित करता है कि यह महाकाव्य केवल खोखले राष्ट्रवाद की वकालत नहीं करता। 1934 में जब तूस शहर में फिरदौसी के मकबरे का पुनर्निर्माण हुआ, तो उसमें सफ़ेद पत्थर का इस्तेमाल इसी तथाकथित भाषाई शुद्धता को दर्शाने के लिए किया गया था और पारसी प्रतीक 'फ़रहर' को परसेपोलिस (Persepolis) से हूबहू नकल किया गया था। तेरहवीं शताब्दी में मंगोल आक्रमणों के बाद जब व्यापारिक मार्ग फिर से खुले, तो इलखानी और तैमूरी काल के चित्रकारों ने शाहनामा के चित्रों में चीनी कला को भी अपनाया। मशहूर ईरानी पौराणिक पक्षी 'सीमूर्घ' के चित्रण पर चीनी ड्रैगन (Chinese dragon) और फ़ीनिक्स (Phoenix) का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है।
मुग़ल साम्राज्य ने शाहनामा और अन्य फ़ारसी साहित्य को कैसे सहेजा और बढ़ावा दिया? भारत में मुग़ल साम्राज्य की नींव 1526 में बाबर ने रखी थी। बाबर महान विजेता तैमूर और चंगेज़ ख़ान का वंशज था। वह मूल रूप से उज़्बेकिस्तान (Uzbekistan) की फ़रग़ना घाटी से आया था और उसका सपना समरकंद पर कब्ज़ा करना था। जब वह तीन बार असफल रहा, तो उसने काबुल और फिर भारत का रुख किया, जहाँ उसने अफ़ग़ान शासक इब्राहिम लोदी को हराया। मुग़ल मूल रूप से तुर्क थे, लेकिन वे फ़ारसी संस्कृति को बहुत परिष्कृत और महान मानते थे। इसी कारण उन्होंने फ़ारसी को अपने दरबार और प्रशासन की आधिकारिक भाषा बना दिया। बाबर कला और साहित्य का प्रेमी था; उसने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' (Baburnama) अपनी मातृभाषा चगताई तुर्की में लिखी थी, जिसमें उसने अपने युद्धों और भारत की गर्मी का ज़िक्र किया था।
बाबर के बाद उसके बेटे हुमायूँ को अफ़ग़ान शासक शेर शाह सूरी से हारकर भागना पड़ा और उसने ईरान में सफ़वी शासक शाह तहमास्प के दरबार में पनाह ली। यह निर्वासन मुग़ल इतिहास और कला के लिए एक वरदान साबित हुआ। शाह की मदद से हुमायूँ को राजनीतिक ताकत तो मिली ही, साथ ही उसने तबरीज़ में शाह के स्टूडियो (studio) में बेहतरीन कलाकृतियाँ भी देखीं। वापसी में हुमायूँ अपने साथ कम से कम दो महान फ़ारसी कलाकारों को भारत ले आया, जिन्होंने मुग़ल चित्रकला स्टूडियो की नींव रखी। बाद में अनपढ़ होने के बावजूद बादशाह अकबर ने किताबों के प्रति अपने गहरे प्रेम के कारण अपने पिता की इस परंपरा को बहुत आगे बढ़ाया। अकबर ने हमज़ानामा (Hamzanama) बनवाया, जिसमें चौदह सौ चित्र थे और जिसे पूरा होने में पंद्रह साल लगे थे। अकबर के समय में बाबरनामा का तुर्की से फ़ारसी में अनुवाद किया गया और निज़ामी, फ़िरदौसी, हाफ़िज़ तथा सादी के ग्रंथों को चित्रित करवाया गया। इस प्रकार मुग़ल काल में फ़ारसी कला और साहित्य ने भारतीय संस्कृति के साथ मिलकर एक नया मुकाम हासिल किया।
हमज़ानामा
मुग़ल लघु चित्रकला की उत्पत्ति कैसे हुई और सचित्र पांडुलिपियों से इसका क्या संबंध है? मुग़ल लघु चित्रकला वास्तव में फ़ारसी और भारतीय कला शैलियों का एक अनूठा संगम है, जो सोलहवीं शताब्दी में अपने चरम पर पहुँची। जब हुमायूँ ईरान से लौटा, तो वह अपने साथ मीर सैयद अली और अब्द अल-समद जैसे महान फ़ारसी कलाकारों को लाया था। इन कलाकारों ने भारतीय कला में आलंकारिक शैली, जटिल विवरण और जीवंत रंगों को पिरोया। सम्राट अकबर के शासनकाल में इस कला को सबसे ज़्यादा संरक्षण मिला और मुग़ल चित्रकला की एक बिल्कुल नई शैली का जन्म हुआ। इन लघु चित्रों के ज़रिए न केवल दरबार की भव्यता को दर्शाया गया, बल्कि हिंदू महाकाव्यों जैसे रामायण और महाभारत को भी मुग़ल शैली में सचित्र किया गया।
इन चित्रों को बनाने की तकनीक बहुत ही बारीक और मेहनत भरी होती थी। मुग़ल चित्रकार मुख्य रूप से कागज़ पर चित्र बनाते थे, जो ताड़ के पत्तों पर चित्रकारी करने की पुरानी भारतीय परंपरा से एक बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव था। रंग भरने के लिए खनिजों, पौधों और यहां तक कि कीमती पत्थरों से निकले प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता था। सबसे दिलचस्प बात यह है कि चित्रकारी के लिए इस्तेमाल होने वाले ब्रश गिलहरी या बिल्ली के बालों से बनाए जाते थे। इन चित्रों में पदानुक्रमित पैमाने का उपयोग किया जाता था, जिसका अर्थ है कि बादशाह या मुख्य व्यक्ति को हमेशा अन्य आकृतियों की तुलना में बड़ा दिखाया जाता था। चित्रों में गहरे लाल, नीले, हरे और सुनहरे रंगों का भरपूर इस्तेमाल होता था और छाया के ज़रिए एक गहरी जीवंतता पैदा की जाती थी। इस तरह लघु चित्रकला ने पांडुलिपियों को केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि देखने और महसूस करने वाली कला का खजाना बना दिया।
रामपुर की रज़ा लाइब्रेरी में संरक्षित सचित्र शाहनामा का क्या सांस्कृतिक महत्व है? अठारहवीं सदी के अंत में जब मुग़ल साम्राज्य का पतन हो रहा था और दिल्ली में उथल-पुथल मची थी, तब रामपुर के पहले नवाब फैज़ुल्लाह ख़ान (1774 से 1794) ने भागते हुए कलाकारों, कवियों और विद्वानों को अपने यहां पनाह दी। नवाब फैज़ुल्लाह ख़ान एक उत्कृष्ट नज़रिए और गहरी बुद्धि वाले इंसान थे। उन्होंने सत्ता के साथ-साथ ज्ञान को सहेजने के महत्व को समझा और पुरानी पांडुलिपियों को इकट्ठा करना शुरू किया, जिससे महान रज़ा लाइब्रेरी की नींव पड़ी। बाद में नवाब कल्ब अली ख़ान और उनके बेटे नवाब हामिद अली ख़ान के दौर में यह लाइब्रेरी पूरी दुनिया में मशहूर हो गई। इन नवाबों ने इस्तांबुल, काहिरा, बग़दाद, तेहरान और समरकंद जैसी जगहों पर अपने विशेष लोग भेजे और उन्हें खाली चेक देकर दुनिया की सबसे दुर्लभ पांडुलिपियों को रामपुर लाने का काम सौंपा। आज रामपुर के शानदार हामिद मंज़िल में स्थित इस लाइब्रेरी में सत्रह हज़ार से ज़्यादा पांडुलिपियां और अस्सी हज़ार से ज़्यादा मुद्रित किताबें मौजूद हैं।
इसी विशाल और अनमोल संग्रह में सफ़वी फ़ारसी शासक शाह तहमास्प के आदेश पर तैयार किए गए 'शाहनामा' का एक शानदार सचित्र पन्ना भी सुरक्षित रखा गया है। इसके हर पन्ने पर बनी जटिल मुग़ल और फ़ारसी चित्रकारी फ़ारसी नायकों की कहानियों को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाती है। इसके अलावा यहाँ बारहवीं सदी की एक ऐसी कुरान भी मौजूद है जिसे केवल स्याही से नहीं, बल्कि सोने से लिखा गया है। यहाँ मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब आलमगीर द्वारा अपने हाथों से लिखी गई 'दीवान-ए-हाफ़िज़' (Diwan-e-hafiz) की एक प्रति और ग्यारहवीं सदी के महान विद्वान अल-बरूनी की मूल पांडुलिपि भी सहेजी गई है। इस लाइब्रेरी में अरबी, फ़ारसी, संस्कृत, हिंदी, तुर्की, पश्तो और उर्दू की बेशकीमती पांडुलिपियां हैं, साथ ही बाबर, हुमायूँ और अकबर के मूल शाही फ़रमान भी मौजूद हैं। 1951 में नवाब सैयद मुर्तज़ा अली ख़ान ने इस लाइब्रेरी को एक ट्रस्ट को सौंप दिया और अंततः 1975 में भारत सरकार ने संसद के एक अधिनियम के माध्यम से इसे राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित कर दिया। आज यह रज़ा लाइब्रेरी केवल किताबों का संग्रह नहीं है, बल्कि दुनिया भर के शोधकर्ताओं के लिए एक तीर्थस्थल है, जो रामपुर शहर को वैश्विक इतिहास के नक्शे पर हमेशा के लिए अमर कर देता है।
धर्मयुद्ध और रणनीति: पढ़ते हैं, भगवदगीता एवं सन त्ज़ु की युद्ध शिक्षाओं का विश्लेषण
रामपुरवासियों, आज हम जानेंगे कि भगवत गीता के अनुसार, युद्ध लड़ना कब और कैसे सही माना जाता है। लेख में हम कर्म योग के विचारों को समझेंगे, जो भक्ति के साथ-साथ निस्वार्थ कार्य और अनुशासन पर केंद्रित है। आगे बढ़ते हुए, ज्ञान के मार्ग के रूप में, हम ज्ञान योग की जांच करेंगे, और देखेंगे कि, यह हमें कैसे आंतरिक शांति की ओर ले जा सकता है। फिर हम युद्ध में रणनीतिक सोच को समझने के लिए, सन त्ज़ु (Sun Tzu) की युद्ध कला को देखेंगे। अंततः हम युद्ध और संघर्ष को समझने में आंतरिक निपुणता और बाहरी रणनीति के बीच अंतर देखने हेतु, भगवद गीता और सन त्ज़ु की शिक्षाओं की तुलना करेंगे।
भगवद गीता एवं महाभारत में दर्शाया गया युद्ध, दो चचेरे भाइयों - पांडवों और कौरवों के बीच की लड़ाई है, जब दोनों हस्तिनापुर राज्य पर नियंत्रण पाने की कोशिश कर रहे थे। पांडवों और कौरवों के बीच मौजूद कई वर्षों की दुश्मनी के कारण, उनके पड़ोसी राज्य के शासक – भगवान श्रीकृष्ण, उनके बीच समाधान के लिए मध्यस्थता करने की कोशिश करते हैं। जब यह वार्ता विफल हो जाती है, तो युद्ध अपरिहार्य हो जाता है। तब श्रीकृष्ण दोनों पक्षों को यह कहते हुए आगे की सेवाएं प्रदान करते हैं कि, एक पक्ष को वह अपनी सेना देंगे, और दूसरे पक्ष में वह रथ सारथी के रूप में कार्य करेंगे। कौरव उनकी सेना को चुनते हैं और पांडव योद्धा राजकुमार अर्जुन, श्रीकृष्ण को सारथी के रूप में चुनते हैं। इस पृष्ठभूमि में, कृष्ण और अर्जुन के बीच हुए वार्तालाप का संग्रह ही गीता है। इसमें अर्जुन स्वीकार करते हैं कि, अपने ही लोगों या चचेरे भाईयों के साथ युद्ध में जाने के विचार से उनका शरीर कांप उठता है। तब कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि, सबसे पहली चीज़ जो किसी को करनी चाहिए, वह अपने धर्म अर्थात कर्तव्य या नैतिकता को समझना है। यदि आवश्यकता हो, तो अगला कदम 'धर्म के लिए' युद्ध छेड़ना है। कृष्ण चाहते हैं कि अर्जुन को पता चले कि, एक योद्धा के रूप में अर्जुन को धर्मयुद्ध में भाग लेने से बड़ा कोई महान उद्देश्य नहीं मिल सकता है। ऐसे प्रयास के महत्व को रेखांकित करते हुए, कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि,
'यदि तुम मारे गए, तो तुम स्वर्ग पहुँचोगे; यदि तुम विजयी हुए, तो तुम पृथ्वी का आनंद ले पाओगे;
तो कुंती के पुत्र, अपने संकल्प में दृढ़ होकर, लड़ने के लिए खड़े हो जाओ!' (श्लोक 37, अध्याय 2) शेष अध्याय में जटिल बौद्धिक तर्कों, धार्मिक औचित्य और नैतिक विचारों पर बात की गई है। इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाने की पेशकश करते हैं कि, युद्ध से दूर जाना ही 'नुकसान' है। क्योंकि, युद्ध न करने पर वह अपने धर्म को त्याग देगा। गीता, इस प्रकार अर्जुन के अनिर्णय और निष्क्रियता से बंधे व्यक्तिमत्व में परिवर्तन के बारे में एक पाठ है। कृष्ण अर्जुन से आग्रह करते हैं और उसे आश्वस्त करते हैं कि, धर्मयुद्ध लड़ना ही उसका धर्म है। कृष्ण का दावा है कि, यह अर्जुन की प्रकृति और वास्तविकता की सीमित समझ से उत्पन्न होता है। गीता के समापन अर्थात अठारहवें अध्याय में, अर्जुन ने घोषणा की है कि, शुरूआत में उसने जो संदेह और निराशा व्यक्त की थी, वह एक 'भ्रम' थी और कृष्ण के साथ इस बातचीत ने उसकी 'बुद्धिमान स्मृति' का मार्ग प्रशस्त किया है। इस प्रकार, उसने युद्ध में जाने के लिए अपनी तत्परता की घोषणा की, जो उसका सच्चा धर्म है।
हिंदू धर्म में ऐसी ‘युद्ध की कला’, युद्ध के सामरिक पहलुओं से नहीं, बल्कि संघर्ष और कर्तव्य के नैतिक एवं आध्यात्मिक आयामों से संबंधित है। इस परिस्थिति में, युद्ध को एक बुराई के रूप में माना जाता है, जिसका मुकाबला केवल तभी किया जाना चाहिए, जब धार्मिकता (धर्म) को खतरा हो। हिंदू धर्म में, युद्ध व्यक्तिगत लाभ, प्रतिशोध या घृणा के लिए नहीं, बल्कि न्याय की प्राप्ति और धर्म की रक्षा के लिए लड़ा जाना चाहिए। धार्मिकता और कर्तव्य पर यह जोर, कर्म (कार्य और उनके अंतिम परिणाम) और धर्म (कर्तव्य, नैतिकता, और धार्मिकता) में भारतीय विश्वास को दर्शाता है। इसलिए, युद्ध इसके परिणामों की चिंता किए बिना लड़ा जाना चाहिए, जो भारतीय दर्शन में कर्म योग (निःस्वार्थ कर्म का मार्ग) के दर्शन को दर्शाता है। यह दर्शन का एक दुर्लभ संयोजन है। इसके केंद्र में योग के तीन रूप हैं, जो भगवद गीता को सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि हमारे जीवन का एक दर्शन बनाता है। यह दर्शन ऐसे जीवन के लिए मार्गदर्शन करता है, जिसमें कोई व्यक्ति सरल और सामान्य जीवन जीते हुए पारलौकिक वास्तविकता का अनुभव कर सकता है। आइए, अब योग के इन तीन रूपों को समझते हैं - 1. ज्ञान योग- योग के सभी रूपों में यह सर्वोच्च स्थान पर है। ज्ञान योग, ज्ञान का उच्चतम मार्ग है, जिसमें व्यक्ति स्वयं एवं परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करता है। यह मुक्ति की प्राप्ति का साधन है। ज्ञान योग दो शब्दों - ज्ञान और योग से बना है। ज्ञान का अर्थ ‘चेतना', और योग का अर्थ 'मिलन' है। यह चेतना, ज्ञान का कोई सामान्य रूप नहीं, बल्कि वह ज्ञान है, जहां व्यक्ति ब्रह्म अर्थात स्वयं को जानने का प्रयास करता है। दूसरी ओर, योग अर्थात मिलन का अर्थ ‘स्वयं का ईश्वरीय स्व के साथ मिलन’ है। ज्ञान योग का महत्व इस तथ्य में निहित है कि, यह मनुष्य को अविद्या या अज्ञान के बंधन से मुक्त करता है। अज्ञानता के कारण ही व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर, मन और इंद्रियों से पहचानता है। ये सभी चीज़ें अवास्तविक, क्षणभंगुर तथा नाशवान हैं। ज्ञान योग का उद्देश्य व्यक्ति को चेतना के माध्यम से यह एहसास कराना है कि, वह ब्रह्म से अलग नहीं है। सभी विज्ञानों में, ज्ञान का मार्ग ही अत्यंत कठिन है। यह उन लोगों के लिए है, जिनके दिल शुद्ध हैं, जिनकी बुद्धि तेज़ है, और जो ईमानदार हैं। 2. कर्म योग- भगवद्गीता का दर्शन कर्मयोग, यानी कर्म के मार्ग की महत्ता को स्वीकार करता है। कर्म योग सामान्य लोगों के लिए मुक्ति प्राप्त करने का सर्वोत्तम मार्ग है। यह गीता की केंद्रीय शिक्षा है। गीता के अनुसार, ज्ञान योग तभी संभव है, जब कर्म योग प्राप्त हो। कोई भी प्राणी कर्मों का पूर्णतः त्याग नहीं कर सकता है, क्योंकि सम्पूर्ण ब्रह्मांड कर्म के सिद्धांत पर कार्य करता है। भक्ति योग वस्तुतः कर्म योग का विशिष्ट रूप है। गीता में 'योग' शब्द का उपयोग सर्वोच्च या 'ईश्वर' के साथ मिलन के अर्थ में किया गया है। कर्म योग में, यह कर्म, ज्ञान और भक्ति के माध्यम से हमारे भगवान से मिलन का मार्ग सिखाता है। गीता कर्मों के त्याग की अपेक्षा कर्तव्यों के पालन को श्रेष्ठ मानती है, जो नि:स्वार्थ या निष्काम कर्म को विकसित करते हैं। निष्काम या अनासक्त कर्मयोग मानवता के कल्याण की भावना को बढ़ावा देता है। इस प्रकार, निःस्वार्थ कर्मों से व्यक्ति शुद्ध हो जाता है, और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने में सक्षम हो जाता है, जिससे उसे परम सत्य का एहसास होता है। 3. भक्ति योग- भक्ति योग या भक्ति का मार्ग, ज्ञान का मार्ग प्राप्त करने के लिए एक सहायक मार्ग है। यह मार्ग कर्म योग का एक विशेष रूप है, जहां क्रिया को भावनात्मक क्रिया या भाव कर्म में परिवर्तित किया जाता है। भक्ति का मार्ग गहन प्रेम और भक्ति के माध्यम से, ईश्वर से मिलन का मार्ग है। भक्ति का अर्थ, सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रति प्रेम और सर्वोच्च भक्ति है। यह योग मनुष्य के संपूर्ण स्वभाव के भावनात्मक तत्व पर आधारित है। इसके माध्यम से मनुष्य की संभावित शक्ति को प्राप्त एवं सक्रिय किया जा सकता है। प्रेम मनुष्य के लिए बहुत स्वाभाविक चीज़ है। लेकिन, सामान्यतः प्रेम का अर्थ सीमित वस्तुएं हैं, जो क्षणभंगुर, नाशवान और अवास्तविक हैं। इस अर्थ में, प्रेम शुद्ध नहीं बल्कि लगाव है। जबकि भक्ति इस क्षणभंगुर संसार और भौतिक सुखों से परे प्रेम का सबसे शुद्ध रूप है। भक्ति मार्ग सभी मार्गों में सबसे सुविधाजनक और लोकप्रिय माना जाता है, क्योंकि प्रेम, भक्ति, और लगाव ऐसी भावनाएँ हैं, जो मनुष्य के लिए बहुत स्वाभाविक हैं। अत: इसके लिए किसी विशेष दृष्टिकोण या क्षमता अथवा संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। इस प्रकार, भक्ति योग शुद्ध प्रेम या भक्ति के माध्यम से मुक्ति का मार्ग है। चलिए, अब हम भगवद गीता के युद्ध दर्शन की सन त्ज़ु की पुस्तक – द आर्ट ऑफ़ वॉर (The Art of War) के साथ तुलना करते हैं। सन त्ज़ु के अनुसार, सभी युद्ध धोखे पर आधारित होते हैं। इसलिए, जब परिस्थितियां अनुकूल हों, तब हमें वैसे–वैसे बदलाव करने चाहिए। उनका कहना है कि, हालांकि, लंबे युद्ध से किसी देश को फ़ायदा होने का कोई उदाहरण नहीं है। इस प्रकार, बिना लड़े ही दुश्मन के प्रतिरोध को तोड़ने में सर्वोच्च उत्कृष्टता है। साथ ही, जीत के लिए आवश्यक पांच चीजें निम्नलिखित हैं:
• युद्ध में वही जीतेगा, जो जानता है कि कब लड़ना है, और कब नहीं लड़ना है। • युद्ध वही जीतेगा, जो श्रेष्ठ और निम्न दोनों शक्तियों को संभालना जानता है। • युद्ध वह जीतेगा, जिसकी सेना सभी परिस्थितियों में समान रूप से जोशपूर्ण है। • युद्ध वह जीतेगा, जो खुद को तैयार करके, निम्न तैयारी के दुश्मन पर कब्ज़ा करने की प्रतीक्षा करेगा। • युद्ध वह जीतेगा, जिसके पास अपनी सैन्य क्षमता है, और जिसमें किसी संप्रभु द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया गया है।
इसके अलावा, द आर्ट ऑफ़ वॉर के अनुसार, यदि आप शत्रु और स्वयं को जानते हैं, तो आपको लड़ाइयों के परिणाम से डरने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप शत्रु को नहीं, बल्कि केवल स्वयं को जानते हैं, तो प्रत्येक जीत के साथ आपको एक हार भी झेलनी पड़ेगी। यदि आप न तो दुश्मन को जानते हैं, और न ही खुद को, तो आप हर लड़ाई में हार मान लेंगे। यदि आप केवल असुरक्षित स्थानों पर हमला करते हैं, तो आप अपने हमलों में सफल हो सकते हैं। युद्ध में, अच्छा रास्ता यह है कि, जो शक्तिशाली है उससे बचें, और जो कमजोर है उस पर वार करें। और यदि युद्ध आपके लाभ के लिए है, तो आगे बढ़ें; तथा यदि नहीं, तो युद्ध ना करें।
द आर्ट ऑफ़ वॉर
भगवद गीता और द आर्ट ऑफ़ वॉर की विधियों की तुलना करने से, आंतरिक निपुणता और बाहरी रणनीति के बीच एक आकर्षक अंतर का पता चलता है। गीता की प्राथमिक पद्धति निष्काम कर्म है; जो साधक को परिणामों को मानसिक रूप से समर्पित करते हुए, पूरी तीव्रता के साथ अपना कर्तव्य निभाना सिखाती है। इस पद्धति का लक्ष्य चेतना प्राप्त करना है, जहां उतार-चढ़ाव वाले मन के बजाय अपरिवर्तनीय आत्मा के रूप में शांति पाई जाती है। इसके विपरीत, सन त्ज़ु की विधि गणना अनुकूलन और धोखे में से एक है। उनका तर्क है कि, सभी युद्ध धोखे पर आधारित हैं। उनकी रणनीति कम से कम प्रयास के साथ जीत हासिल करने हेतु, पर्यावरण, स्थान और दुश्मन की धारणाओं में हेरफेर करने पर ध्यान केंद्रित करती है। जबकि दोनों पाठ आत्म-जागरूकता को महत्व देते हैं, वे इसका उपयोग अलग-अलग उद्देश्यों के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण के लिए, आत्म-जागरूकता वासना, क्रोध और लालच के आंतरिक शत्रुओं को खत्म करने की विधि है, जो समभाव की स्थिति की ओर ले जाती है। दूसरी तरफ, सन त्ज़ु के लिए, आत्म-जागरूकता वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन का एक उपकरण है। उनके मुताबिक, अपनी खुद की ताकत और दुश्मन की कमजोरियों को जानने से, कोई अपनी रणनीति को विशिष्ट क्षण के अनुसार अपना सकता है। अर्थात, गीता धार्मिकता (धर्म) के लिए एक विधि प्रदान करती है, जबकि द आर्ट ऑफ़ वॉर अस्तित्व और प्रभुत्व सुनिश्चित करने के लिए एक विधि प्रदान करती है।
इंग्लैंड में कैक्सटन की पुस्तक ट्रॉय व् भारत में डौट्रिना क्रिस्टा: जानिए मुद्रण का विकास
आज हम विलियम कैक्सटन (William Caxton) के बारे में जानेंगे, जिन्होंने अंग्रेजी में पहली किताब छापी थी। पहली अंग्रेजी मुद्रित पुस्तक का नाम ‘द रिक्यूयेल ऑफ द हिस्ट्रीज़ ऑफ ट्रॉय’ था। इसके अलावा, हम भारत में प्रारंभिक मुद्रण पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जिसकी शुरुआत बंगाल में सेरामपुर से हुई थी। फिर, हम गोवा में स्थापित हुई उस प्रिंटिंग प्रेस के बारे में जानेंगे, जहां भारत में पहली पुस्तक - 'डौट्रिना क्रिस्टा' छापी गई थी। अंत में, हम ट्रैंकेबार में स्थित एक और प्रिंटिंग प्रेस के बारे में पता लगाएंगे, जिसे डच मिशनरी बार्थोलोम्यू ज़िगेनबाल्ग द्वारा स्थापित किया गया था। विलियम कैक्सटन (William Caxton) अंग्रेजी साहित्य और मुद्रण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। इन्हें पंद्रहवीं शताब्दी के अंत में इंग्लैंड (England) में प्रिंटिंग प्रेस शुरू करने वाले पहले व्यक्ति के रूप में जाना जाता हैं। उन्होंने ब्रूझ (Bruges) जाने से पहले एक व्यापारी के प्रशिक्षु के रूप में अपना पेशा शुरू किया, जहां वे एक सफल व्यापारी और अनुवादक बन गए। उनका महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान 1469 के आसपास शुरू हुआ, जब उन्होंने 1475 में अंग्रेजी में छपी पहली पुस्तक ‘द रिक्यूयेल ऑफ द हिस्ट्रीज़ ऑफ ट्रॉय (The Recuyell of the Historyes of Troye)’ जैसी कृतियों का अनुवाद और मुद्रण किया। 1476 में वेस्टमिंस्टर (Westminster) में स्थानांतरित होने के बाद, उन्होंने इंग्लैंड का पहला प्रिंटिंग प्रेस स्थापित किया, जहां उन्होंने सौ से अधिक पुस्तकों का उत्पादन किया। इनमें 'ले मोर्टे डी'आर्थर (Le Morte d'Arthur)' और 'द कैंटरबरी टेल्स (The Canterbury Tales)' जैसे प्रसिद्ध ग्रंथ शामिल थे।
1471-72 के दौरान कोलोन (Cologne) में प्रिंट करना सीखने के बाद, कैक्सटन ने ब्रूझ (लगभग 1474) में अपनी प्रेस की स्थापना की, जहां वह लंबे समय से व्यवसाय में स्थापित थे। उनकी पहली पुस्तक, 'द रिक्यूयेल ऑफ द हिस्ट्रीज़ ऑफ ट्रॉय', फ्रांसीसी भाषा से उनका अपना अनुवाद था। इसका उत्पादन ही संभवतः वह मुख्य कारण था कि, उन्होंने 50 वर्ष की आयु में मुद्रण करना शुरू कर दिया। फिर वह एडवर्ड चतुर्थ (Edward IV) के प्रोत्साहन से इंग्लैंड लौट आए। इसके बाद भी उन्हें शाही संरक्षण मिलता रहा। प्रारंभिक अंग्रेजी साहित्य को संरक्षित करने और बढ़ावा देने में कैक्सटन का काम महत्वपूर्ण था, क्योंकि उन्होंने ग्रंथों का सावधानीपूर्वक संपादन किया और सुलभ पठन सामग्री प्रदान करने का लक्ष्य रखा। उन्होंने अंग्रेजी के मानकीकृत रूप का उपयोग करने के महत्व को पहचाना, जिससे क्षेत्रीय बोलियों को कम करने में मदद मिली और अंग्रेजी भाषा के विकास में योगदान मिला। उनके प्रिंटिंग प्रेस ने न केवल कुलीन वर्ग की जरूरतों को पूरा किया, बल्कि वे व्यापक दर्शकों तक भी पहुंचे। उन्होंने जो 90 किताबें छापीं, उनमें से 74 अंग्रेजी में थीं। उनमें से 22 कार्य उनके अपने अनुवाद थे।
चलिए अब सेरामपुर मिशन प्रेस के बारे में बात करते हैं। सेरामपुर मिशन प्रेस एक पुस्तक और समाचार पत्र प्रकाशक था, जो 1800 से 1837 तक डेनिश (Danish) भारत के सेरामपुर में संचालित होता था। इस प्रेस की स्थापना ब्रिटिश बैपटिस्ट मिशनरियों विलियम कैरी (William Carey), विलियम वार्ड (William Ward) और जोशुआ मार्शमैन (Joshua Marshman) द्वारा की गई थी। इसका संचालन 10 जनवरी 1800 को शुरू हुआ था। मिशनरियों पर अत्यधिक संदेह करने वाली ब्रिटिश सरकार ने अपने भारतीय क्षेत्रों में मिशनरी कार्यों को हतोत्साहित किया था। हालाँकि, चूंकि सेरामपुर डेनिश शासन के अधीन था, इसलिए यहां मिशनरी और प्रेस स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम थे। इस प्रेस ने 1800 और 1832 के बीच 2,12,000 पुस्तकें तैयार की। अगस्त 1800 में, प्रेस ने सेंट मैथ्यू (St Matthew) के अनुसार गॉस्पेल का बंगाली अनुवाद प्रकाशित किया। हालाँकि, इसकी प्रमुख गतिविधि स्थानीय पाठ्यपुस्तकों का प्रकाशन थी; प्रेस ने धार्मिक ईसाई ट्रैक्ट, भारतीय साहित्यिक रचनाएँ, पच्चीस भारतीय स्थानीय भाषाओं और अन्य दक्षिण एशियाई भाषाओं में बाइबिल के अनुवाद भी प्रकाशित किए। प्रेस ने फोर्ट विलियम कॉलेज और कलकत्ता स्कूल-बुक सोसाइटी के लिए व्याकरण, शब्दकोश, इतिहास, किंवदंतियों और नैतिक कहानियों पर किताबें भी छापीं। 1818 में, प्रेस ने पहला बंगाली समाचार पत्र और पत्रिका प्रकाशित की। इसने लगभग पैंतालीस भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित कीं। परंतु, 1837 में जब मिशन भारी कर्ज में डूब गया तो प्रेस बंद हो गई।
वास्तव में, भारत में पहला चल-प्रकार का प्रिंटिंग प्रेस लगभग संयोग से आया था। जेसुइट्स (Jesuits) धर्मांतरण में सहायता के रूप में मुद्रण के महत्व को अच्छी तरह से जानते थे। उदाहरण के लिए, 1549 में सेंट फ्रांसिस ज़ेवियर (St Francis Xavier) द्वारा लिखे गए एक पत्र में ईसाई मिशनरी साहित्य को जापानी भाषा में मुद्रित करने के लिए कहा गया है। तभी गोवा में भी, स्थानीय भाषाओं में छपे मिशनरी साहित्य के संभावित मूल्य का एहसास बढ़ रहा था। हालाँकि, अधिकारी प्रिंटिंग प्रेस के लिए उत्सुक नहीं थे। लगभग 1510 में गोवा को पुर्तगालियों ने उपनिवेश बनाया था। इसके औपनिवेशिक शासकों द्वारा संचालित राजनीतिक शक्ति को ईसाई धर्म के प्रसार के लिए पर्याप्त माना जाता था। इस प्रकार, जो प्रिंटिंग प्रेस अंततः गोवा पहुंची थी, उसका उद्देश्य दरअसल भारत में नहीं, बल्कि इथियोपिया (Ethiopia) में मिशनरी कार्य करना था। गोवा में आगमन के कुछ ही समय बाद, इस प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की गई और इसने काम करना शुरू कर दिया गया। 19 अक्टूबर, 1556 को ‘तर्क और दर्शन’ पर इसमें एक थीसिस छपी थी। ये संभवतः पुस्तक के बजाय, चर्चों के दरवाजों पर चिपकाई जाने वाली ढीली चादरों के रूप में थे। 1557 को सेंट ज़ेवियर द्वारा ‘डौट्रिना क्रिस्टा (Doutrina Christa)’ मुद्रित किया गया था। यह भारत में मुद्रित होने वाली पहली ज्ञात पुस्तक बन गई। हालाँकि दुनिया में कहीं भी इस मुद्रित पुस्तक की कोई प्रति मौजूद नहीं है, लेकिन समकालीन खातों में इस बात के निर्णायक सबूत मिलते हैं कि, यह वास्तव में मुद्रित हुई थी। बाद में कुछ वर्षों पश्चात, एक डच मिशनरी - बार्थोलोम्यू ज़िगेनबाल्ग (Bartholomew Ziegenbalg), एशिया में पहला औपचारिक प्रोटेस्टेंट मिशन स्थापित करने के लिए 1706 में ट्रेंकेबार (तरंगमबाड़ी) आए थे। तब भारत में पुस्तक छपाई फिर से शुरू हो गई। 1712-13 में, एक प्रिंटिंग प्रेस यहां आई और ट्रेंकेबार प्रेस (Tranquebar press) से पहला प्रकाशन शुरू हुआ। ज़िगेनबाल्ग ने तमिल में भी छपाई करने पर जोर दिया, और इस प्रकार प्रेस से 1713 के अंत में पहला तमिल प्रकाशन सामने आया। इसके बाद 1715 में न्यू टेस्टामेंट (New Testament) की छपाई हुई।
डौट्रिना क्रिस्टा
1715 के बाद पुर्तगालियों के समय के पश्चात, शेष भारत में मुद्रण और प्रकाशन फैलने का कारण, ज़िगेनबाल्ग और उनके साथी मिशनरियों द्वारा ऐसी नई प्रौद्योगिकियों को साझा करना था। इस प्रक्रिया में, उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि मुद्रित शब्द, बॉम्बे, बंगाल, और मद्रास जैसे भारत के अन्य हिस्सों तक फैल जाए।तमिल भाषा प्रिंट होने वाली न केवल पहली भारतीय भाषा है, बल्कि प्रिंट होने वाली पहली गैर-यूरोपीय भाषा भी है। पहली तमिल किताबें पुर्तगालियों द्वारा पश्चिमी तट पर मुद्रित की गई थीं। परंतु, भारत में महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव वाली मुद्रण की वास्तविक कहानी अठारहवीं शताब्दी के पहले दशक में लूथरन मिशनरियों (Lutheran missionaries) द्वारा ट्रैंकेबार (tranquebar) प्रेस की स्थापना के साथ शुरू होती है। ट्रैंकेबार में छपाई की पहली शताब्दी तक मुद्रित तमिल पुस्तकों की संख्या तीन सौ के करीब थी। यह आंकड़ा फारसी और बंगाली जैसी अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं से काफी आगे था। सामग्री और गुणवत्ता के संदर्भ में, ट्रैकेबार में डेनिश प्रेस से जारी किए गए पहले मुद्रित तमिल व्याकरण और शब्दकोश, पूर्वी संस्कृतियों की आधुनिक यूरोपीय समझ में मील का पत्थर हैं।
भक्ति, साधना और स्वर की गरिमा: एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी
मदुरै शन्मुखवदिवु सुब्बुलक्ष्मी (1916–2004), जिन्हें दुनिया एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी के नाम से जानती है, केवल कर्नाटक संगीत की महान गायिका नहीं थीं, बल्कि 20वीं शताब्दी के भारत की सांस्कृतिक चेतना की प्रमुख आवाज़ थीं। मदुरै के एक संगीत-परिवार में जन्मी सुब्बुलक्ष्मी ने बहुत कम आयु में ही मंच पर प्रस्तुति देनी शुरू कर दी थी। उस समय शास्त्रीय संगीत की दुनिया परंपरागत सामाजिक सीमाओं से घिरी हुई थी, फिर भी उन्होंने अपनी साधना, अनुशासन और असाधारण प्रतिभा से उस क्षेत्र में विशिष्ट स्थान बनाया। उनकी कला में केवल तकनीकी दक्षता नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिकता और भक्ति की आंतरिक अनुभूति थी। वे 1966 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्तुति देने वाली पहली भारतीय शास्त्रीय संगीतकार बनीं, और बाद में उन्हें भारत रत्न, पद्म विभूषण तथा पद्म भूषण जैसे उच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया गया।
उनकी गायकी में राग की शुद्धता, शब्दों की स्पष्टता और भाव की निर्मलता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। वे केवल गीत प्रस्तुत नहीं करती थीं, बल्कि उन्हें साधना के रूप में जीती थीं। उल्लेखित वीडियो में भी उनकी वही शांत, संयत और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति दिखाई देती है, जिसने भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक सम्मान दिलाया। जब वे भजन या कर्नाटक रचना गाती थीं, तो वह प्रस्तुति भारत की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत रूप बन जाती थी। एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी ने यह सिद्ध किया कि शास्त्रीय संगीत सीमित वर्ग की कला नहीं, बल्कि एक ऐसी सार्वभौमिक भाषा है जो विश्व के किसी भी कोने में समान भाव से सुनी और समझी जा सकती है।
होली से जुड़ी पौराणिक कथाएं और इस पर्व का आध्यात्मिक महत्व
होली का त्यौहार केवल रंगों तक सीमित नहीं है, इस त्यौहार की जड़े बुराई पर अच्छाई की जीत के जश्न पर आधारित है। साथ ही यह प्राचीन हिंदू धार्मिक विश्वास को दर्शाता है कि भगवान के प्रति अगाध आस्था और भक्ति सभी को मोक्ष दिला सकती है। वहीं अन्य सभी हिंदू त्यौहारों की तरह, होली का त्यौहार कई पौराणिक कथाओं से जुड़ा हुआ है। हालांकि होली की सटीक उत्पत्ति ज्ञात नहीं है, लेकिन कई इतिहासकारों का दावा है कि होली का त्यौहार आर्यों द्वारा ही शुरू किया गया है। वहीं होली से जुड़ी कुछ सामान्य किंवदंतियाँ निम्न हैं:
प्रहलाद और होलिका की कथा:
प्राचीन काल में अत्याचारी राक्षसराज हिरण्यकश्यप ने स्वर्ग, पृथ्वी और अधोलोक की तीनों दुनिया पर विजय प्राप्त कर ली थी और इस तरह वो काफी घमंडी हो गया था। गर्व में डूबे हुए हिरण्यकश्यप को यह लगने लगा कि वह भगवान विष्णु को भी पराजय कर सकता है और इस विचार में उसने अपने राज्य के लोगों को विष्णु भगवान की पूजा करने से मना कर दिया और अपनी (हिरण्यकश्यप) आराधना करने के लिए विवश कर दिया। लेकिन उनका छोटा बेटा प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था, इसलिए उसने इस आदेश का पालन करने से इंकार कर दिया। इससे हिरण्यकश्यप काफी क्रोधित हो गया और उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि प्रहलाद को पहाड़ से नीचे फेंक कर मार दिया जाएं। प्रहलाद द्वारा विष्णु भगवान् की प्रार्थना करना जारी रहा और उसने खुद को भगवान विष्णु के समक्ष छोड़ दिया, भगवान विष्णु अंतिम क्षण में प्रकट हुए और प्रहलाद को बचा लिया, उपरोक्त चित्र में प्रहलाद को भगवान् विष्णु की आराधना करते हुए दिखाया है जब प्रह्लाद अग्नि से घिर गये थे।
इसके बाद परेशान होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी राक्षसी बहन होलिका से मदद मांगी, होलिका को किसी भी प्रकार की अग्नि भस्म नहीं कर सकती थी, ऐसा वरदान प्राप्त था। हिरण्यकश्यप द्वारा प्रहलाद को होलिका के साथ आग में भेजा गया, परंतु उस वक्त ये दोनों भाई-बहन ये भूल गए थे कि होलिका अग्नि से बिना भस्म हुए तभी बहार आ सकती थी, यदि वो अग्नि में अकेले प्रवेश करें। इस प्रकार होलिका तो अग्नि में भस्म हो गई और प्रहलाद को भगवान विष्णु द्वारा फिर से बचा लिया गया। तब से आज भी लोग अग्नि जला कर होलिका दहन मनाते हैं।
राधा और कृष्ण की कथा:
इस कथा में राधा और कृष्ण के अमर प्रेम को दर्शाया गया है। एक बार बालपन में भगवान कृष्ण ने अपनी माँ यशोदा से अपने सांवले रंग के बारे में शिकायत की और राधा का गोरा रंग होने के पीछे का कारण पूछा। और इस पर माँ यशोदा ने भगवान कृष्ण को राधा के चेहरे पर अपना पसंदीदा रंग लगाने की सलाह दी और बोला कि इससे राधा का रंग भी बदल जाएगा। इसके बाद भगवान कृष्ण ने राधा और गोपियों पर रंग डाल दिया। इस प्रकार रंग के त्यौहार होली को उत्सव के रुप में मनाया जाने लगा।कामदेव की कथा:
होली के त्यौहार से भगवान शिव का गहन संबंध है, ये तब की बात है जब देवी सती के मृत्यु उपरांत भगवान शिव तपस्या में लीन हो गए थे, लेकिन इससे पृथ्वी पर असंतुलन पैदा हो गया था। इस बीच देवी सती का पुनर्जन्म हुआ और उन्होंने शिव को जगाने और उनका दिल जीतने के लिए अनेक प्रयास करें, पर सारे विफल रहें। अंतः उन्होंने कामदेव से मदद मांगी और कामदेव द्वारा शिव पर पुष्पबाण चलाया गया, जिससे उनकी तपस्या भंग हो गई। तपस्या भंग होने से भगवान शिव काफी क्रोधित हो गए और उनकी तीसरी आंख खूल गई, जिससे अग्नि बाहर आई और कामदेव उसमे जलकर भस्म हो गये। बाद में जब भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ तो उन्होंने अपनी भूल को समझा और कामदेव को दूसरा जीवन प्रदान किया और अदृश्य रूप में अमर रहने का वरदान दिया। इसलिए कई लोग होली का उत्सव कामदेव के बलिदान के लिए मनाते हैं।
कार्बन के एलोट्रोप और कोयला: संरचना, गुणधर्म एवं वर्गीकरण का वैज्ञानिक अध्ययन
कोयला हमारी पृथ्वी पर मौजूद कार्बन के प्रमुख रूपों में से एक है। कार्बन को “कोयले की रीढ़” माना जाता है, और इसके मजबूत बंधन (bond) ही कोयले को उच्च स्तर के दहन के लिए एक आदर्श विकल्प और एक कठोर तत्व बनाते हैं। कार्बन हमारी पृथ्वी में पाया जाने वाला सत्रहवाँ सबसे प्रचुर तत्व है। यह एक ऐसा तत्व है जो पौधों, जानवरों सहित सभी जीवित जीवों और कई निर्जीव चीजों के भीतर भी मौजूद होता है। यहाँ तक कि कार्बन हवा में भी Co2 के रूप में उपस्थित होता है। कार्बन के यौगिकों के अध्ययन को रसायन विज्ञान (Chemistry) की एक अलग शाखा, कार्बनिक रसायन विज्ञान (Organic Chemistry) के तहत किया जाता है। हीरा, ग्रेफाइट और कोयला कार्बन के प्रमुख मुक्त रूप हैं। कार्बन में एक अद्वितीय गुण होता है कि, जो अन्य कार्बन परमाणुओं के साथ जुड़कर कार्बन-कार्बन बंधन (Carbon-Carbon Bonds) बना सकता है। इसके परिणामस्वरूप लंबी श्रृंखला वाले यौगिकों का निर्माण हो सकता है।
कार्बन
कार्बन एक बहुमुखी तत्व है, जो कई अलग-अलग रूप ले सकता है, जिन्हें एलोट्रोप (Allotrope) कहा जाता है। कार्बन के कुछ सबसे प्रसिद्ध, अपरूप हीरा और ग्रेफाइट हैं। अपरूप एक ही तत्त्व के विभिन्न संरचनात्मक रूप (conformation) होते हैं जो काफी अलग भौतिक गुण और रासायनिक व्यवहार प्रदर्शित कर सकते हैं। हालाँकि, वैज्ञानिकों ने हाल के वर्षों में कार्बन के कई और एलोट्रोपों की खोज की है, जिनमें बकमिनस्टरफुलरीन (Buckminsterfullerene) जिसमे अणुओं की सरंचना गेंद के अकार में होती है और ग्राफीन (Graphene) जिसमे अणुओं की सरंचना शीट के अकार में होती है । कार्बन नैनोट्यूब (Nanotubes), नैनोबड्स (Nanobuds) और नैनोरिबन्स (Nanoribbons) जैसी बड़ी संरचनाएं भी बना सकता है। बहुत उच्च तापमान या अत्यधिक दबाव पर, कार्बन और भी अधिक असामान्य रूप धारण कर सकता है। कार्बन के कई अलग-अलग रूपों यानी एलोट्रोप में रासायनिक गुण समान होते हैं, लेकिन इन सभी के भौतिक गुण अलग-अलग होते हैं। ये एलोट्रोप दो रूपों में मौजूद होते हैं:
क्रिस्टलीय (Crystalline)
अनाकार (Amorphous)
कोयला कार्बन का एक अनाकार अपरूप है। यह एक गैर-नवीकरणीय जीवाश्म ईंधन है, जो दहनशील होता है और इसमें हाइड्रोजन, सल्फर, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन और कार्बन की परिवर्तनीय मात्रा होती है। कोयला कार्बन के सबसे महत्वपूर्ण अपरूपों में से एक है। यह दहनशील है, जिसका अर्थ है कि इसे गर्मी और ऊर्जा पैदा करने के लिए जलाया जा सकता है। हालाँकि कोयला, कालिख और कार्बन ब्लैक (Carbon Black) को अक्सर अनाकार कार्बन (Amorphous Carbon) कहा जाता है, लेकिन वे वास्तविक अनाकार कार्बन नहीं हैं। वास्तव में इनका उत्पादन पायरोलिसिस (Pyrolysis) नामक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है, जिसके तहत किसी पदार्थ को तोड़ने के लिए उसे उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है। सामान्य परिस्थितियों में, पायरोलिसिस प्रक्रिया में अनाकार कार्बन का उत्पादन नहीं होता है। कोयले की संरचना को परिभाषित करना कठिन है, क्योंकि यह प्रोटीन जैसी दोहराई जाने वाली इकाइयों (monomers) से नहीं बनता है। वास्तव में कोयला कई अलग-अलग अणुओं का मिश्रण होता है, जिससे इसे एक विशिष्ट संरचना में निर्दिष्ट करना कठिन हो जाता है। हालाँकि, वैज्ञानिक कोयले का वर्णन उसके संरचनात्मक मापदंडों के आधार पर कर सकते हैं। वैन क्रेवेलन के कोयला (Van Crevelen's Coal (1961) नामक पुस्तक के अनुसार, कोयला उच्च आणविक भार और गैर-समान संरचना वाला पदार्थ है। समग्र रूप से कोयला अत्यधिक सुगंधित होता है, और इसकी सुगंध रैंक के साथ कम या ज्यादा लगातार बढ़ती है। कोयले की एक बहुलक संरचना होती है। कोयला मुख्य रूप से चार प्रकार का होता है।इनमें से प्रत्येक में अलग-अलग स्तर पर कार्बनिक पदार्थ मौजूद होता है। 1. एन्थ्रेसाइट (Anthracite): इसमें कार्बन की सांद्रता सबसे अधिक होती है और यह उच्चतम श्रेणी का कोयला होता है। यह कठोर, भंगुर और काला चमकदार होता है। इसमें 92-98% कार्बन और कम प्रतिशत वाष्पशील पदार्थ होता है। 2. बिटुमिनस कोयला (Bituminous Coal): इस कोयले में 70 - 90% कार्बन होता है और इसका उपयोग मुख्य रूप से भाप-विद्युत ऊर्जा उत्पादन में किया जाता है। इसका गलनांक (melting point) भी अधिक होता है, यह कोयला चमकदार और चिकना होता है। 3. उप बिटुमिनस कोयला (Sub Bituminous Coal): यह कोयला रंग में काला और दिखने में फीका होता है। इसमें 35-45% कार्बन होता है और इसका उपयोग मुख्य रूप से बिजली उत्पादन में किया जाता है। 4. लिग्नाइट (Lignite): इसमें 25-35% कार्बनिक पदार्थ होता है और इसे कोयले के सभी प्रकारों में सबसे निम्न श्रेणी माना जाता है। इस प्रकार हमे ये जानकारी मिलती है कि कोयले की गुणवत्ता उसकी कार्बनिक पदार्थ पर निर्भर करती है। उच्च कार्बनिक पदार्थ वाले कोयले में ऊर्जा की मात्रा अधिक होती है और यह अधिक कुशलता से जलता है।
महाशिवरात्रि: पूजा, उपवास, जागरण और आत्मिक चिंतन का पावन पर्व
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ! महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक पावन और आध्यात्मिक पर्व है, जिसे भगवान शिव की उपासना और आत्मसंयम के साथ मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं और पूजा, जप व ध्यान के माध्यम से शिव कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। उपवास के दौरान कुछ लोग निर्जल रहते हैं, जबकि कई भक्त फल, दूध और जल ग्रहण कर व्रत का पालन करते हैं। इसका उद्देश्य केवल शरीर का संयम नहीं, बल्कि मन को भी शुद्ध और स्थिर बनाना होता है। महाशिवरात्रि की रात्रि विशेष महत्व रखती है। भक्त पूरी रात जागरण करते हैं, “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हैं और शिव भजनों में लीन रहते हैं। इस दौरान शिवलिंग पर जल, दूध, शहद, घी और बेलपत्र अर्पित कर अभिषेक किया जाता है तथा दीप और धूप से वातावरण को पवित्र बनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस रात्रि की गई साधना अत्यंत फलदायी होती है।
इस अवसर पर देशभर के शिव मंदिरों में विशेष पूजा होती है। श्रद्धालु काशी विश्वनाथ मंदिर, केदारनाथ मंदिर, सोमनाथ मंदिर और महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग जैसे प्रमुख शिवधामों में दर्शन के लिए पहुँचते हैं। व्रत के दौरान सात्त्विक भोजन किया जाता है, जिसमें फल, साबूदाना, दूध से बनी मिठाइयाँ, नारियल पानी और सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजन शामिल होते हैं। साथ ही भजन-कीर्तन, ध्यान, योग और दान-पुण्य भी किए जाते हैं। इस प्रकार महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम और आध्यात्मिक जागरण का अवसर है, जो जीवन में शांति और संतुलन का संदेश देता है।
रामपुर की अर्थव्यवस्था में कागज़ी मुद्रा की भूमिका: इतिहास, विकास और वैश्विक शुरुआत
अपने समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध रामपुर ने समय के साथ अपनी अर्थव्यवस्था में कई परिवर्तन देखे हैं। एक समय था जब व्यापार कीमती धातुओं से बने सिक्कों के माध्यम से किया जाता था, लेकिन आज अन्य शहरों की तरह रामपुर में भी कागज़ी मुद्रा का व्यापक उपयोग होता है। कागज़ी मुद्रा, जिसकी शुरुआत सबसे पहले प्राचीन चीन में हुई थी, ने बाज़ारों और व्यवसायों के संचालन को सरल, तेज़ और अधिक संगठित बना दिया है। जैसे-जैसे कोई शहर विकसित होता है, व्यापारिक गतिविधियाँ बढ़ती हैं और इसमें कागज़ी मुद्रा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने के साथ-साथ कुछ चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करती है। इस लेख में हम भारत में कागज़ी मुद्रा के इतिहास, इसके लाभ और सीमाओं, वैश्विक शुरुआत तथा इसके मूल स्वरूप को समझने का प्रयास करेंगे।
भारत में कागज़ी मुद्रा का परिचय अठारहवीं शताब्दी के अंत में हुआ। इसके प्रारंभिक जारीकर्ताओं में जनरल बैंक ऑफ़ बंगाल एंड बिहार (1773–75) शामिल था, जो एक राज्य-प्रायोजित संस्था थी और स्थानीय विशेषज्ञों के सहयोग से स्थापित की गई थी। बैंक ऑफ़ हिंदोस्तान (1770–1832), जिसे एलेक्ज़ेंडर एंड कंपनी द्वारा स्थापित किया गया था, उस समय काफी सफल रहा। हालांकि 1832 के वाणिज्यिक संकट में इसकी मूल कंपनी के विफल होने के कारण यह बैंक भी बंद हो गया।
पहला प्रेसीडेंसी बैंक, बैंक ऑफ़ बंगाल, वर्ष 1806 में 50 लाख रुपये की पूंजी के साथ “बैंक ऑफ़ कलकत्ता” के रूप में स्थापित किया गया था। इसके नोटों पर नदी किनारे बैठी “वाणिज्य” का प्रतीक एक रूपक महिला आकृति अंकित होती थी। ये नोट दोनों ओर से मुद्रित होते थे और उनके अग्रभाग पर बैंक का नाम तथा मूल्यवर्ग उर्दू, बंगाली और नागरी—तीनों लिपियों में लिखा होता था। दूसरा प्रेसीडेंसी बैंक 1840 में बॉम्बे में स्थापित हुआ, जो एक प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र के रूप में उभरा। हालांकि सट्टा कपास के अचानक समाप्त होने से उत्पन्न आर्थिक संकट के कारण 1868 में बैंक ऑफ़ बॉम्बे का परिसमापन हो गया।
1843 में स्थापित बैंक ऑफ़ मद्रास तीसरा प्रेसीडेंसी बैंक था, जिसके नोटों पर मद्रास के गवर्नर (1817–1827) सर थॉमस मुनरो का चित्र अंकित था। इसके अतिरिक्त, ओरिएंट बैंक कॉरपोरेशन जैसे निजी बैंकों ने भी बैंक नोट जारी किए। लेकिन 1861 के कागज़ी मुद्रा अधिनियम ने इन बैंकों से नोट जारी करने का अधिकार वापस ले लिया और यह अधिकार सरकार के अधीन कर दिया गया। प्रेसीडेंसी बैंकों को सरकारी शेष राशि के उपयोग और सरकारी नोटों के प्रबंधन की अनुमति दी गई।
कागज़ी मुद्रा के कई महत्वपूर्ण लाभ हैं: • इसे नियंत्रित करना अपेक्षाकृत आसान होता है। • यह आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में सहायक होती है। • इसे संभालना और गिनना सरल है। • लेन-देन तेज़ी से किए जा सकते हैं।
हालांकि इसके कुछ नुकसान भी हैं: • अधिक मात्रा में छपाई महंगाई को बढ़ा सकती है। • विनिमय दर में अस्थिरता आ सकती है। • यह फटने या क्षतिग्रस्त होने की आशंका रखती है।
विश्व स्तर पर कागज़ी मुद्रा की शुरुआत अलग-अलग परिस्थितियों में हुई, लेकिन इस दिशा में अग्रणी भूमिका प्राचीन चीन ने निभाई। प्रारंभ में वहाँ तांबे के सिक्कों का उपयोग होता था, जिनके बीच छेद होता था ताकि उन्हें रस्सी में पिरोकर रखा जा सके। लेकिन भारी वजन के कारण व्यापारियों को कठिनाई होती थी। परिणामस्वरूप 11वीं शताब्दी तक सोंग राजवंश के दौरान जियाओज़ी (Jiaozi)—जिसे दुनिया का पहला बैंकनोट माना जाता है—आधिकारिक रूप से जारी किया जाने लगा। तांबे की कमी और आर्थिक आवश्यकताओं ने बैंक नोटों को लोकप्रिय बना दिया, और शीघ्र ही इनके लिए विशेष मुद्रण केंद्र स्थापित किए गए। जालसाजी रोकने के लिए नोटों के डिज़ाइन जटिल बनाए गए।
यूरोप में भी कागज़ी मुद्रा का विकास हुआ। 17वीं शताब्दी तक लंदन के सुनार जमाकर्ताओं को रसीदें देने लगे, जो बाद में भुगतान के साधन के रूप में स्वीकार की जाने लगीं। 1661 में स्वीडन का स्टॉकहोम्स बैंको (Stockholms Banco) बैंक नोट जारी करने वाला पहला केंद्रीय बैंक बना, हालांकि यह जल्द ही दिवालिया हो गया। बाद में 1694 में स्थापित बैंक ऑफ़ इंग्लैंड ने स्थायी रूप से बैंक नोट जारी करने की परंपरा शुरू की।
कागज़ी मुद्रा किसी देश की आधिकारिक मुद्रा होती है, जिसका उपयोग वस्तुओं और सेवाओं के लेन-देन में किया जाता है। आमतौर पर इसकी छपाई देश के केंद्रीय बैंक या राजकोष द्वारा नियंत्रित की जाती है, ताकि अर्थव्यवस्था में धन का संतुलन बना रहे। समय-समय पर नए सुरक्षा फीचर्स के साथ नोटों को अपडेट किया जाता है, जिससे जालसाजी की संभावना कम हो सके। कागज़ी मुद्रा को फ़िएट मुद्रा (Fiat Money) भी कहा जाता है—अर्थात वह मुद्रा जिसे सरकार द्वारा वैध घोषित किया गया हो।
इस प्रकार, सिक्कों से लेकर आधुनिक कागज़ी मुद्रा तक की यह यात्रा न केवल आर्थिक विकास की कहानी है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि कैसे बदलती आवश्यकताओं के साथ वित्तीय प्रणालियाँ विकसित होती रही हैं। आज कागज़ी मुद्रा रामपुर सहित पूरे देश की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है, जो व्यापार को सुगम बनाते हुए विकास की गति को निरंतर आगे बढ़ा रही है।
जलीय पर्यटन के संभावनाएँ और चुनौतियाँ: दोनों पहलुओं को समझना क्यों है आवश्यक
भारतीय संस्कृति और नदियों के बीच प्राचीन काल से ही गहरा आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक संबंध रहा है। समय के साथ-साथ 21वीं सदी में नदियाँ केवल आस्था का केंद्र ही नहीं रहीं, बल्कि सिंचाई, मछलीपालन, परिवहन और पर्यटन के माध्यम से वाणिज्यिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन गई हैं। आज देश में लाखों परिवारों की आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नदियों पर निर्भर है। इसी संदर्भ में जल आधारित पर्यटन एक नए और आकर्षक आर्थिक क्षेत्र के रूप में उभर कर सामने आया है, जिसने विकास के नए अवसर तो पैदा किए हैं, लेकिन साथ ही कई पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं।
वर्तमान समय में जल आधारित पर्यटन, विशेषकर नदी पर्यटन, तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। नदी पर्यटन से नदियों के आसपास के क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विकास होता है, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं और क्षेत्र की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। पर्यटन गतिविधियों के विस्तार से समुदायों के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संकेतकों में व्यापक परिवर्तन देखने को मिलते हैं। नौकायान या रिवर क्रूज़िंग (River Cruising) अपनी सीमित क्षमता, आरामदायक वातावरण और विलासिता से भरपूर अनुभव के कारण पर्यटन उद्योग का एक लाभदायक स्वरूप बन चुका है। ये रिवर क्रूज़ (River Cruise) अंतर्देशीय जलमार्गों पर संचालित होते हैं और आमतौर पर एक सप्ताह या उससे अधिक समय तक चलने वाली यात्राओं का हिस्सा होते हैं। जहाज के आकार के अनुसार इनमें 100 से 250 पर्यटकों तक की क्षमता होती है।
इसी क्रम में हाल ही में शुरू हुआ दुनिया का सबसे लंबा रिवर क्रूज़ ‘गंगा विलास’ (Ganga Vilas) जल पर्यटन के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। इस विलासितापूर्ण क्रूज़ (Luxury Cruise) को 13 जनवरी, 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हरी झंडी दिखाई गई थी। यह क्रूज़ वाराणसी से बांग्लादेश की राजधानी ढाका होते हुए पुनः भारत में प्रवेश करेगा और असम के डिब्रूगढ़ (Dibrugarh) में अपनी यात्रा समाप्त करेगा। 51 दिनों की इस यात्रा में 15 दिन बांग्लादेश के जलमार्गों से गुजरते हुए, यह क्रूज़ कुल 3,200 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करेगा, जो अब तक किसी नदी क्रूज़ द्वारा की गई सबसे लंबी यात्रा मानी जा रही है।
गंगा विलास पोत 62 मीटर लंबा और 12 मीटर चौड़ा है। इसमें तीन डेक (Decks) और 18 सुइट्स (Suites) हैं, जिनमें लगभग 36 पर्यटकों के ठहरने की सुविधा है। जहाज में आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ आराम और सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा गया है। यह दावा किया गया है कि गंगा विलास क्रूज़ प्रदूषण-मुक्त प्रणाली और शोर नियंत्रण तकनीकों से युक्त है। अपनी यात्रा के दौरान यह 50 से अधिक पर्यटन स्थलों, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों से होकर गुजरेगा, जिनमें सुंदरवन डेल्टा—जो रॉयल बंगाल टाइगर्स (Royal Bengal Tigers) के लिए प्रसिद्ध है—और एक सींग वाले गैंडों के लिए विख्यात काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान भी शामिल हैं। यह क्रूज़ भारत के पाँच राज्यों और बांग्लादेश की कुल 27 नदी प्रणालियों से होकर गंगा, भागीरथी, हुगली, ब्रह्मपुत्र और वेस्ट कोस्ट नहर (West Coast Canal) में संचालित होगा।
हालाँकि जलीय पर्यटन आर्थिक दृष्टि से लाभकारी सिद्ध हो सकता है, लेकिन इसके नकारात्मक प्रभावों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, तटीय और नदी क्षेत्रों में पर्यटन गतिविधियों के बढ़ने से प्राकृतिक आवासों पर गंभीर दबाव पड़ता है। पर्यटकों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए तटीय विकास, होटल निर्माण और बुनियादी ढांचे के विस्तार के कारण जंगलों की कटाई और पारिस्थितिक तंत्र का क्षरण हो सकता है। इसके अतिरिक्त, पर्यटकों द्वारा उत्पन्न कचरा, प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट जल तथा जलीय जीवन के लिए हानिकारक साबित होते हैं।
तटीय पर्यटन स्थलों के विकास की प्रक्रिया में मैंग्रोव वनों (Mangrove Forests) और प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) को भी भारी नुकसान पहुँचता है। प्रवाल भित्तियाँ अत्यंत नाज़ुक और जैव विविधता से भरपूर पारिस्थितिक तंत्र होती हैं, जो हजारों जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास हैं। इनके नष्ट होने से किसी क्षेत्र की जैव विविधता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा नदी परिभ्रमण से कटाव, बाढ़, सूखा, जलमार्गों में आवाजाही की बाधाएँ तथा बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं। गैर-जिम्मेदार पर्यटन, अति-पर्यटन और यात्रियों की लापरवाही जलीय पारिस्थितिकी को और अधिक नुकसान पहुँचा सकती है।
इसलिए यह आवश्यक है कि जलीय पर्यटन के विकास के साथ-साथ उसके पर्यावरणीय प्रभावों पर भी गंभीरता से विचार किया जाए। आर्थिक विकास और रोजगार सृजन को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ-साथ सतत विकास के सिद्धांतों को अपनाना भी उतना ही ज़रूरी है। भविष्य की पीढ़ियों के लिए नदियों, जल संसाधनों और जलीय पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा तभी संभव है, जब पर्यटन की योजनाओं में पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए और इसके नकारात्मक प्रभावों को कम करने के ठोस प्रयास किए जाएँ।