जलीय पर्यटन के संभावनाएँ और चुनौतियाँ: दोनों पहलुओं को समझना क्यों है आवश्यक

नदियाँ और नहरें
03-02-2026 09:35 AM
जलीय पर्यटन के संभावनाएँ और चुनौतियाँ: दोनों पहलुओं को समझना क्यों है आवश्यक

भारतीय संस्कृति और नदियों के बीच प्राचीन काल से ही गहरा आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक संबंध रहा है। समय के साथ-साथ 21वीं सदी में नदियाँ केवल आस्था का केंद्र ही नहीं रहीं, बल्कि सिंचाई, मछलीपालन, परिवहन और पर्यटन के माध्यम से वाणिज्यिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन गई हैं। आज देश में लाखों परिवारों की आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नदियों पर निर्भर है। इसी संदर्भ में जल आधारित पर्यटन एक नए और आकर्षक आर्थिक क्षेत्र के रूप में उभर कर सामने आया है, जिसने विकास के नए अवसर तो पैदा किए हैं, लेकिन साथ ही कई पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं।

वर्तमान समय में जल आधारित पर्यटन, विशेषकर नदी पर्यटन, तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। नदी पर्यटन से नदियों के आसपास के क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विकास होता है, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं और क्षेत्र की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। पर्यटन गतिविधियों के विस्तार से समुदायों के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संकेतकों में व्यापक परिवर्तन देखने को मिलते हैं। नौकायान या रिवर क्रूज़िंग (River Cruising) अपनी सीमित क्षमता, आरामदायक वातावरण और विलासिता से भरपूर अनुभव के कारण पर्यटन उद्योग का एक लाभदायक स्वरूप बन चुका है। ये रिवर क्रूज़ (River Cruise) अंतर्देशीय जलमार्गों पर संचालित होते हैं और आमतौर पर एक सप्ताह या उससे अधिक समय तक चलने वाली यात्राओं का हिस्सा होते हैं। जहाज के आकार के अनुसार इनमें 100 से 250 पर्यटकों तक की क्षमता होती है।

इसी क्रम में हाल ही में शुरू हुआ दुनिया का सबसे लंबा रिवर क्रूज़ ‘गंगा विलास’ (Ganga Vilas) जल पर्यटन के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। इस विलासितापूर्ण क्रूज़ (Luxury Cruise) को 13 जनवरी, 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हरी झंडी दिखाई गई थी। यह क्रूज़ वाराणसी से बांग्लादेश की राजधानी ढाका होते हुए पुनः भारत में प्रवेश करेगा और असम के डिब्रूगढ़ (Dibrugarh) में अपनी यात्रा समाप्त करेगा। 51 दिनों की इस यात्रा में 15 दिन बांग्लादेश के जलमार्गों से गुजरते हुए, यह क्रूज़ कुल 3,200 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करेगा, जो अब तक किसी नदी क्रूज़ द्वारा की गई सबसे लंबी यात्रा मानी जा रही है।

गंगा विलास पोत 62 मीटर लंबा और 12 मीटर चौड़ा है। इसमें तीन डेक (Decks) और 18 सुइट्स (Suites) हैं, जिनमें लगभग 36 पर्यटकों के ठहरने की सुविधा है। जहाज में आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ आराम और सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा गया है। यह दावा किया गया है कि गंगा विलास क्रूज़ प्रदूषण-मुक्त प्रणाली और शोर नियंत्रण तकनीकों से युक्त है। अपनी यात्रा के दौरान यह 50 से अधिक पर्यटन स्थलों, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों से होकर गुजरेगा, जिनमें सुंदरवन डेल्टा—जो रॉयल बंगाल टाइगर्स (Royal Bengal Tigers) के लिए प्रसिद्ध है—और एक सींग वाले गैंडों के लिए विख्यात काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान भी शामिल हैं। यह क्रूज़ भारत के पाँच राज्यों और बांग्लादेश की कुल 27 नदी प्रणालियों से होकर गंगा, भागीरथी, हुगली, ब्रह्मपुत्र और वेस्ट कोस्ट नहर (West Coast Canal) में संचालित होगा।

हालाँकि जलीय पर्यटन आर्थिक दृष्टि से लाभकारी सिद्ध हो सकता है, लेकिन इसके नकारात्मक प्रभावों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, तटीय और नदी क्षेत्रों में पर्यटन गतिविधियों के बढ़ने से प्राकृतिक आवासों पर गंभीर दबाव पड़ता है। पर्यटकों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए तटीय विकास, होटल निर्माण और बुनियादी ढांचे के विस्तार के कारण जंगलों की कटाई और पारिस्थितिक तंत्र का क्षरण हो सकता है। इसके अतिरिक्त, पर्यटकों द्वारा उत्पन्न कचरा, प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट जल तथा जलीय जीवन के लिए हानिकारक साबित होते हैं।

File:Coral fiji moturiki.jpg

तटीय पर्यटन स्थलों के विकास की प्रक्रिया में मैंग्रोव वनों (Mangrove Forests) और प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) को भी भारी नुकसान पहुँचता है। प्रवाल भित्तियाँ अत्यंत नाज़ुक और जैव विविधता से भरपूर पारिस्थितिक तंत्र होती हैं, जो हजारों जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास हैं। इनके नष्ट होने से किसी क्षेत्र की जैव विविधता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा नदी परिभ्रमण से कटाव, बाढ़, सूखा, जलमार्गों में आवाजाही की बाधाएँ तथा बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं। गैर-जिम्मेदार पर्यटन, अति-पर्यटन और यात्रियों की लापरवाही जलीय पारिस्थितिकी को और अधिक नुकसान पहुँचा सकती है।

File:Mangrove Forest -Pichavaram - India (2387221908).jpg

इसलिए यह आवश्यक है कि जलीय पर्यटन के विकास के साथ-साथ उसके पर्यावरणीय प्रभावों पर भी गंभीरता से विचार किया जाए। आर्थिक विकास और रोजगार सृजन को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ-साथ सतत विकास के सिद्धांतों को अपनाना भी उतना ही ज़रूरी है। भविष्य की पीढ़ियों के लिए नदियों, जल संसाधनों और जलीय पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा तभी संभव है, जब पर्यटन की योजनाओं में पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए और इसके नकारात्मक प्रभावों को कम करने के ठोस प्रयास किए जाएँ।

संदर्भ
https://bit.ly/3Xx7Z93 
https://bit.ly/3Xu2ZSA  
https://bit.ly/3H1GPl6
https://tinyurl.com/uprmz63e 

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