साल 2015 के दौर में मध्य भारत का प्रमुख व्यावसायिक केंद्र इंदौर खुले में पड़े कूड़े के ढेरों, बदबूदार सड़कों और राष्ट्रीय स्वच्छता तालिका में बेहद निचले पायदान पर खड़े होने की गंभीर चुनौती से जूझ रहा था। आम नागरिकों के लिए सार्वजनिक चौराहों पर ओवरफ्लो होते लोहे के बड़े कचरा पात्र रोज़मर्रा की लाचारी का हिस्सा बन चुके थे। लेकिन अगले कुछ वर्षों के भीतर इस शहर ने नगर निगम प्रशासन और जनभागीदारी के साझा संकल्प से अपनी तक़दीर और तस्वीर दोनों को पूरी तरह बदल दिया। केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के स्वच्छ सर्वेक्षण (Swachh Survekshan) में लगातार सात बार देश के सबसे साफ़ शहर का ख़िताब अपने नाम कर इंदौर ने यह साबित किया कि ठोस कचरा प्रबंधन केवल काग़ज़ी नीति नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक जन आंदोलन बन सकता है। इस विस्तृत पड़ताल में पाठक जानेंगे कि कैसे सड़कों से कचरा पेटियों को हटाकर, घर-घर छह स्तरीय पृथक्करण, डिजिटल निगरानी और कचरे से कमाई के चक्र ने इंदौर को आधुनिक भारत का रोल मॉडल बनाया।
साल 2015 में बदहाल कचरे के ढेरों से जूझने वाला शहर अचानक कैसे बदल गया?
आज़ादी के बाद से एक व्यस्त औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित हुए इंदौर में अनियोजित शहरीकरण के चलते कचरा प्रबंधन की व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी थी। वर्ष 2015 तक शहर की मुख्य सड़कों और गलियों में जगह-जगह कचरे के बड़े डंपर रखे रहते थे, जहाँ आवारा मवेशियों का जमावड़ा लगा रहता था और हवा में दुर्गंध फैली रहती थी। इस संकट को सुलझाने के लिए इंदौर नगर निगम (Indore Municipal Corporation) ने पुरानी ढर्रे वाली सफाई व्यवस्था को ख़त्म करने का कड़ा प्रशासनिक निर्णय लिया। प्रशासन ने महसूस किया कि केवल सड़कों पर झाड़ू लगाने या कचरे को एक जगह से उठाकर दूसरी जगह फेंकने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। इसके लिए कचरे के पैदा होने वाले प्राथमिक बिंदु से लेकर उसके अंतिम निस्तारण तक एक सुदृढ़ वैज्ञानिक श्रृंखला तैयार करने की नींव रखी गई, जिसने शहर के सामाजिक मानस को भी झकझोर कर रख दिया।
सड़कों से डस्टबिन हटाकर छह श्रेणियों में कचरा पृथक्करण कैसे संभव हुआ?
इंदौर नगर निगम ने सबसे पहले पूरे शहर से सार्वजनिक कचरा पेटियों को हटाने का जोखिम भरा लेकिन क्रांतिकारी क़दम उठाया, ताकि लोग सड़क पर कचरा फेंकने की आदत छोड़ सकें। इसके विकल्प के तौर पर जीपीएस (GPS) तकनीक से लैस विशेष टिपर वैन (Tipper Van) का एक विशाल बेड़ा ज़मीन पर उतारा गया, जिसने घर-घर जाकर 100 फ़ीसदी दरवाज़े से कचरा संग्रहण की ज़िम्मेदारी संभाली। इंदौर ने कचरे को केवल गीले और सूखे के सामान्य विभाजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के स्तर पर ही छह अलग-अलग श्रेणियों में बाँटने की अनिवार्य व्यवस्था लागू की। इसमें गीला कचरा, सूखा कचरा, प्लास्टिक अपशिष्ट, सैनिटरी पैड जैसा बायो-मेडिकल अपशिष्ट, घरेलू ख़तरनाक कचरा और ई-वेस्ट को अलग-अलग खांचों में एकत्र किया जाने लगा। नगर निगम के सफाई मित्रों ने नागरिकों को प्रशिक्षित किया और पृथक्करण न करने वाले परिसरों पर ज़ोनल स्तर पर निगरानी बढ़ाकर शत-प्रतिशत अनुपालन सुनिश्चित कराया।
सराफ़ा बाज़ार और छप्पन दुकान ने शून्य कचरा मॉडल को ज़मीनी हकीकत कैसे बनाया?
घरेलू स्तर पर सफ़लता पाने के बाद इंदौर के सबसे व्यस्त खान-पान बाज़ारों की ओर रुख किया गया, जहाँ रोज़ाना हज़ारों सैलानी और स्थानीय लोग पहुँचते हैं। ऐतिहासिक सराफ़ा बाज़ार, जो दिन में आभूषणों का बाज़ार और रात में लज़ीज़ व्यंजनों की चौपाटी में तब्दील हो जाता है, और प्रसिद्ध छप्पन दुकान क्षेत्र को पूर्णतः ज़ीरो-वेस्ट फूड स्ट्रीट के रूप में विकसित किया गया। यहाँ के व्यापारियों, स्ट्रीट वेंडरों और ग्राहकों ने मिलकर सिंगल-यूज़ प्लास्टिक (Single-Use Plastic) पर पूर्ण प्रतिबंध को स्वीकार किया। डिस्पोज़ेबल प्लास्टिक कटलरी की जगह धोने योग्य बर्तनों और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा दिया गया। बाज़ार बंद होने के तुरंत बाद रात में ही मशीनीकृत सफ़ाई और धुलाई का काम शुरू हो जाता है, जिससे सुबह होते ही सड़कें पूरी तरह चमचमाती दिखाई देती हैं। इस व्यवस्था ने साबित कर दिया कि जहाँ व्यावसायिक गतिविधियाँ चरम पर हों, वहाँ भी नागरिक अनुशासन से स्वच्छता का उच्चतम स्तर क़ायम रखा जा सकता है।
इंदौर 311 मोबाइल ऐप और डिजिटल निगरानी ने नागरिक व्यवहार को कैसे रूपांतरित किया?
किसी भी व्यवस्था को दीर्घकालिक बनाने के लिए जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण पहलू होती है, और इंदौर ने इसे सूचना एवं संचार तकनीक के ज़रिये सिद्ध किया। साल 2016 में इंदौर नगर निगम ने स्वच्छता शिकायत निवारण मंच के तहत इंदौर 311 (Indore 311) मोबाइल ऐप्लिकेशन की शुरुआत की। इस डिजिटल ऐप के ज़रिये कोई भी नागरिक सड़क पर पड़े कचरे, निर्माण मलबे या गंदगी की जियो-टैग्ड तस्वीर खींचकर सीधे कंट्रोल रूम को भेज सकता है। शिकायत दर्ज होते ही संबंधित वार्ड के सेनेटरी इंस्पेक्टर और सफाई अमले को तय समय-सीमा के भीतर उस स्थान को साफ़ कर पुष्टि की तस्वीर अपलोड करनी पड़ती है। 5 लाख से अधिक पंजीकृत उपयोगकर्ताओं और लाखों शिकायतों के त्वरित समाधान ने निगम और जनता के बीच अविश्वास की खाई को पूरी तरह पाट दिया। सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने वालों पर ज़ोनल अधिकारियों द्वारा स्पॉट फाइन की पारदर्शी व्यवस्था ने व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बना दिया।
देवगुराड़िया के कचरे के पहाड़ का बायो-रेमेडिएशन और एशिया का सबसे बड़ा बायो-सीएनजी संयंत्र कैसे खड़ा हुआ?
इंदौर की इस पूरी स्वच्छता क्रांति का सबसे गौरवशाली तकनीकी अध्याय देवगुराड़िया स्थित ट्रेंचिंग ग्राउंड में लिखा गया। कई दशकों से देवगुराड़िया में लाखों टन पुराना कचरा जमा था, जो एक बदबूदार पहाड़ का रूप ले चुका था और आसपास के पर्यावरण तथा भूजल को ज़हरीला बना रहा था। नगर निगम ने इस पूरे क्षेत्र का वैज्ञानिक बायो-रेमेडिएशन (Bioremediation) कर 100 फ़ीसदी लीगेसी कचरे का सुरक्षित निस्तारण किया और मूल्यवान ज़मीन को हरित क्षेत्र में बदल दिया। इसके उपरांत केंद्र सरकार के स्वच्छ भारत मिशन (अर्बन) 2.0 के तहत 'कचरे से कंचन' यानी वेस्ट टू वेल्थ (Waste to Wealth) और सर्कुलर इकोनॉमी (Circular Economy) के सिद्धांत को मूर्तरूप देते हुए यहाँ गोवर्धन (Gobar-Dhan) बायो-सीएनजी प्लांट स्थापित किया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 फरवरी 2022 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से देवगुराड़िया में स्थापित इस म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट आधारित संयंत्र का लोकार्पण किया। यह संयंत्र पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (Public Private Partnership) मॉडल के तहत स्थापित किया गया, जिसमें स्पेशल पर्पज व्हीकल (Special Purpose Vehicle) के तौर पर इंदौर क्लीन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड (Indore Clean Energy Pvt Ltd) का गठन इंदौर नगर निगम और इंडो एनवायरो इंटीग्रेटेड सॉल्यूशंस लिमिटेड (Indo Enviro Integrated Solutions Ltd.) द्वारा किया गया। इस परियोजना में निजी साझीदार द्वारा ₹150 करोड़ का 100 फ़ीसदी पूँजीगत निवेश किया गया। बायोऊर्जा (BioUrja) तकनीक और एनारोबिक डाइजेशन (Anaerobic Digestion) पर आधारित यह एशिया का सबसे बड़ा बायो-सीएनजी संयंत्र रोज़ाना 550 टन अलग किए गए गीले जैविक कचरे को प्रसंस्कृत करने की पूर्ण क्षमता रखता है।
यह अत्याधुनिक संयंत्र पूरी तरह ज़ीरो-लैंडफिल मॉडल पर काम करता है, जहाँ कचरे का कोई भी अवशिष्ट अनुपयोगी नहीं छूटता। परिचालन के दौरान यह प्रतिदिन लगभग 17,000 किलोग्राम उच्च गुणवत्ता वाली सीएनजी और 100 टन जैविक खाद का उत्पादन करता है। एक ऐतिहासिक पहल के तहत इंदौर नगर निगम इस संयंत्र से उत्पादित कुल सीएनजी का कम से कम 50 फ़ीसदी हिस्सा ख़रीदकर शहर की 400 सिटी बसों को इसी हरित ईंधन से संचालित करता है, जबकि शेष सीएनजी को खुले बाज़ार में बेचा जाता है। वहीं इससे तैयार जैविक खाद रासायनिक उर्वरकों के विकल्प के तौर पर किसानों और बाग़वानी कार्यों के लिए उपलब्ध कराई जाती है। इस पूरी प्रक्रिया ने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती कर स्वच्छ ऊर्जा का एक आत्मनिर्भर चक्र स्थापित किया है।
स्वच्छ सर्वेक्षण में लगातार सातवीं बार शीर्ष पायदान हासिल करने का राष्ट्रीय पैमाना क्या रहा?
स्वच्छता के क्षेत्र में देश का सबसे प्रतिष्ठित पैमाना माना जाने वाला स्वच्छ सर्वेक्षण जब साल 2016 में शुरू हुआ था, तब इसमें केवल 73 बड़े शहर शामिल थे। वर्ष 2023 के स्वच्छ सर्वेक्षण तक आते-आते इसका दायरा बढ़कर 4,477 शहरी स्थानीय निकायों, 61 छावनी बोर्डों और 88 गंगा शहरों तक विस्तृत हो गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा नई दिल्ली में आयोजित भव्य समारोह में प्रदान किए गए स्वच्छ सर्वेक्षण पुरस्कार 2023 में इंदौर ने लगातार सातवीं बार भारत के सबसे स्वच्छ शहर का राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम किया, जहाँ गुजरात के सूरत शहर को भी संयुक्त रूप से प्रथम स्थान मिला। केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के डैशबोर्ड के अनुसार, इंदौर ने 100 फ़ीसदी घर-घर कचरा संग्रहण, 98 फ़ीसदी प्राथमिक स्रोत पर पृथक्करण और लीगेसी कचरा डंपसाइट का 100 फ़ीसदी वैज्ञानिक उपचार का अद्वितीय रिकॉर्ड दर्ज किया।
इस ऐतिहासिक आयोजन के दौरान केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने रेखांकित किया कि वर्ष 2014 में देश में वैज्ञानिक कचरा प्रसंस्करण की दर महज़ 15 से 16 फ़ीसदी थी, जो अब बढ़कर लगभग 76 फ़ीसदी तक पहुँच चुकी है और आगामी वर्षों में इसे 100 फ़ीसदी तक ले जाने का लक्ष्य है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इंदौर नगर निगम के सफ़ाई मित्रों, अधिकारियों और नागरिकों की अटूट प्रतिबद्धता की सराहना करते हुए इस उपलब्धि को जनचेतना की विजय बताया। सर्वेक्षण 2023 की थीम 'कचरे से कंचन' थी, जिसके बाद 2024 के लिए 'रिड्यूस, रीयूज़ और रीसाइकिल' (Reduce, Reuse and Recycle) का संकल्प रखा गया, जिसके तहत इंदौर ने 29 से अधिक मटीरियल रिकवरी फैसिलिटी (Material Recovery Facility) और आरआरआर केंद्र पहले ही क्रियान्वित कर दिए हैं।
क्या इंदौर की आत्मनिर्भर चक्रीय अर्थव्यवस्था अन्य भारतीय शहरों के लिए व्यावहारिक मॉडल है?
इंदौर का यह सफर महज़ पुरस्कार जीतने की होड़ नहीं, बल्कि शहरी शासन में बुनियादी व्यवस्थागत सुधार की जीती-जागती मिसाल है। शहर ने यह सिद्ध कर दिखाया है कि गीले कचरे को प्रदूषण फैलाने वाले मलबे के बजाय एक मूल्यवान आर्थिक संसाधन में कैसे बदला जा सकता है। जब स्थानीय निकाय कचरे से बसें चलाने का ईंधन बनाते हैं और अनुपयोगी समझी जाने वाली चीज़ों से राजस्व अर्जित करते हैं, तो नगर निगमों की आर्थिक निर्भरता कम होती है और पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। इंदौर ने खुले में शौच से मुक्ति के साथ ओपन डेफकेशन फ्री (Open Defecation Free) और सीवेज के शुद्धिकरण के लिए वाटर प्लस (Water+) प्रमाणन प्राप्त कर यह भी दिखाया कि सीवेज और गंदे पानी का दोबारा ग़ैर-पेय कार्यों में उपयोग कैसे किया जाता है।
इंदौर की इस क्रांति का सबसे बड़ा संदेश यही है कि आधुनिक तकनीक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति तब तक अधूरी है, जब तक आम नागरिक अपनी प्राथमिक नागरिक ज़िम्मेदारी को स्वीकार न करें। आज देश के प्रत्येक नगर, कस्बे और महानगर को इंदौर के इस छह स्तरीय पृथक्करण, बायो-सीएनजी रूपांतरण और जनसहभागिता के ब्लूप्रिंट को अपने यहाँ लागू करने के लिए आगे आना चाहिए। अपने घर से निकलने वाले कचरे को अलग कीजिए, सिंगल-यूज़ प्लास्टिक को अलविदा कहिए और अपने शहर को स्वच्छ, आत्मनिर्भर और प्रदूषण-मुक्त बनाने के इस राष्ट्रीय महाभियान में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाइए।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/26hd2n2c
2. https://tinyurl.com/28d486u6
3. https://tinyurl.com/24sh8qea
4. https://tinyurl.com/2yhplx56
5. https://tinyurl.com/yqlup9t5
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