इंदौर का नाम सामने आते ही अक्सर लोगों की आँखों में छप्पन दुकान के लज़ीज़ व्यंजन, सराफ़ा बाज़ार की हलचल और देश के सबसे साफ़-सुथरे शहर का गौरवशाली तमग़ा तैरने लगता है। मगर क्या कभी किसी ने ठहरकर यह सोचा है कि इस शहर के आम बाशिंदों में यह अनुकरणीय नागरिक अनुशासन, अद्भुत व्यापारिक सूझबूझ और हर राष्ट्रीय पैमाने पर शीर्ष पर बने रहने की ज़िद कहाँ से आई? सच्चाई यह है कि इस सामाजिक चेतना की जड़ें सिर्फ़ खान-पान के शौक में नहीं, बल्कि यहाँ की डेढ़ सदी पुरानी ज्ञान-परंपरा और उच्च शिक्षण संस्थानों के प्रति गहरी निष्ठा में रची-बसी हैं। मालवा के इस प्रमुख महानगर ने महज़ व्यापार का पहिया नहीं घुमाया, बल्कि औपनिवेशिक दौर की बंदिशों को तोड़ते हुए विज्ञान, चिकित्सा और प्रबंधन को आम नागरिक की ज़िंदगी का हिस्सा बनाया। 2009 में जब इंदौर ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और भारतीय प्रबंधन संस्थान दोनों की मेज़बानी कर देश का पहला ऐसा शैक्षणिक केंद्र बनने का इतिहास रचा, तो यह अचानक हुआ कोई चमत्कार नहीं था। यह उस लंबी यात्रा का स्वाभाविक पड़ाव था जिसकी बुनियाद 19वीं सदी के दूरदर्शी राजाओं ने रखी थी। इस विस्तृत विवेचन में हम पड़ताल करेंगे कि कैसे होलकर राजवंश के शैक्षणिक संकल्पों ने एक व्यापारिक नगर को देश के सबसे जागरूक बौद्धिक समाज में तब्दील कर दिया।
होलकर शासकों ने मध्य भारत में आधुनिक शिक्षा और जन-कल्याण की नींव कैसे रखी?
18वीं सदी के पूर्वार्ध में जब मराठा परिसंघ के प्रमुख योद्धा सूबेदार मल्हार राव होलकर ने 1733 में मालवा विजय के बाद इंदौर को अपनी शक्ति का केंद्र बनाया, तब यह मुख्यतः एक रणनीतिक पड़ाव और वाणिज्यिक छावनी था। मुग़ल दौर की सनदों और पारंपरिक ज़मींदारी व्यवस्था से निकलकर जब होलकर राजवंश ने प्रशासनिक बागडोर संभाली, तो उनका ध्यान शक्ति विस्तार के साथ-साथ लोक-कल्याणकारी ढांचे पर भी गया। 1803 में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ संघर्ष और 1817-1818 के तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद रियासत का एक बड़ा इलाक़ा छिन गया, मगर विषम राजनीतिक दबावों के बीच भी राजदरबार ने जनहित के निर्माण कार्य कभी नहीं रोके। महाराजा शिवाजी राव होलकर ने 1886 से 1921 के बीच ख़ान नदी के तट पर लालबाग़ पैलेस जैसी भव्य इमारत का निर्माण कराया, जिसे बर्नार्ड ट्रिग्स (Bernard Triggs) की वास्तुशिल्पीय दृष्टि से सजाया गया और जहाँ यूरोपीय शैलियों का मेल दिखा। इसके साथ ही 1904 में किंग एडवर्ड हॉल (King Edward Hall) की स्थापना हुई, जिसे स्वतंत्रता के बाद 1948 में महात्मा गांधी हॉल का नाम दिया गया। सेओनी के पत्थरों से तराशी गई यह इंडो-गोथिक (Indo-Gothic) इमारत 2,000 लोगों के बैठने की क्षमता, घंटाघर और समृद्ध पुस्तकालय के साथ शहर के सार्वजनिक संवाद का जीवंत मंच बनी। 1878 में शुरू हुए किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल और बाद के मेडिकल प्रशिक्षण के प्रयासों से लेकर राजकुमारों के लिए बने प्रतिष्ठित डेली कॉलेज (Daly College) तक, रियासत ने यह साफ़ कर दिया था कि एक जागरूक समाज के निर्माण के लिए ज्ञान के केंद्र अनिवार्य हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या आम जनता तक आधुनिक विज्ञान और उच्च शोध की रोशनी पहुँच पाएगी?
होलकर साइंस कॉलेज ने वैज्ञानिक चेतना का लोकतंत्रीकरण कैसे किया?
19वीं सदी के अंतिम दौर तक भारत में उच्च वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा केवल कलकत्ता, बंबई और मद्रास जैसे औपनिवेशिक प्रेसीडेंसी नगरों तक ही सिमटी हुई थी। देश के मध्य भाग में आधुनिक प्रयोगशालाओं की बात सोचना भी नामुमकिन माना जाता था। इसी भौगोलिक और सामाजिक खाई को पाटने के लिए महाराजा शिवाजी राव होलकर ने 10 जून 1891 को गवर्नमेंट होलकर साइंस कॉलेज की स्थापना की। 34 एकड़ के विस्तृत और हरे-भरे परिसर में खुले इस कॉलेज का पहला प्राचार्य ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय (Oxford University) के स्नातक और बार-एट-लॉ (Bar-at-law) की उपाधि धारक ई. सी. चोलमोंडेली (E. C. Cholmondeley) को नियुक्त किया गया। शुरुआत में इस संस्थान ने अंग्रेज़ी साहित्य, संस्कृत, फ़ारसी, तर्कशास्त्र, इतिहास, राजनीति विज्ञान, गणित और प्राकृतिक विज्ञान जैसे विषयों की एक साथ पढ़ाई शुरू की ताकि छात्रों का सर्वांगीण मानसिक विकास हो सके। अपनी शुरुआती यात्रा में यह कॉलेज पहले कलकत्ता विश्वविद्यालय से और फिर 1904 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध रहा। 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' के ध्येयवाक्य पर चलते हुए इस संस्थान ने विज्ञान की शिक्षा को अभिजात्य वर्ग की जागीर बनने से रोका और आम छात्रों के लिए भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान की प्रयोगशालाओं के दरवाज़े खोल दिए। 1985-86 में इसे मध्य प्रदेश शासन द्वारा 'मॉडल' (Model) संस्थान का दर्जा मिला और 1989 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा इसे 'ऑटोनॉमस' (Autonomous) घोषित किया गया। 2001-2002 में इसे 'सेंटर फॉर एक्सीलेंस' की मान्यता मिली और राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद के चौथे चक्र में इसे 'ए++' ग्रेड हासिल हुआ। आज 12,000 से अधिक विद्यार्थियों, 46 विभागीय प्रयोगशालाओं और च्वाइस-बेस्ड क्रेडिट सिस्टम (Choice-Based Credit System) के साथ यह कॉलेज मध्य भारत में विज्ञान की सबसे भरोसेमंद आवाज़ बना हुआ है। यहाँ की कक्षाओं ने स्वतंत्रता सेनानियों से लेकर शीर्ष वैज्ञानिकों और विचारकों को गढ़ा, मगर शैक्षणिक विकास का यह कारवां यहीं रुकने वाला नहीं था।
विश्वविद्यालयी विस्तार और आधुनिक शोध ने इंदौर के शैक्षणिक क्षितिज को कैसे बदला?
आज़ादी के बाद जब देश औद्योगिकीकरण की ओर बढ़ा, तो इंदौर में बिखरे हुए कॉलेजों को एक साझा अकादमिक मंच देने की ज़रूरत महसूस हुई। 1964 में इंदौर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, जिसे बाद में लोकमाता अहिल्याबाई के सम्मान में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय का नाम दिया गया। विश्वकोश ब्रिटैनिका के अनुसार, इस विश्वविद्यालय के तहत होलकर साइंस कॉलेज और इंदौर क्रिश्चियन कॉलेज जैसे ऐतिहासिक संस्थानों को नया अकादमिक संबल मिला। समय के साथ विश्वविद्यालय ने केवल पारंपरिक विषयों तक सीमित न रहकर आधुनिक विज्ञान की अग्रिम पंक्तियों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। इसका सबसे बेहतरीन प्रमाण विश्वविद्यालय का जैव प्रौद्योगिकी अध्ययनशाला यानी स्कूल ऑफ बायोटेक्नोलॉजी (School of Biotechnology) है। 1991 में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की वित्तीय सहायता से इस विभाग की स्थापना हुई। 1991 से 1997 के दौरान तक्षशिला परिसर स्थित विज्ञान भवन की पहली मंज़िल पर एक कक्ष से संचालित होने के बाद, 1997 में यह अपने विशाल स्वतंत्र भवन में स्थानांतरित हुआ। यहाँ बायोटेक्नोलॉजी (Biotechnology), जेनेटिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) और बायोइन्फॉर्मेटिक्स (Bioinformatics) जैसे अत्याधुनिक अनुशासनों में उच्चस्तरीय स्नातकोत्तर और शोध कार्य शुरू हुए। शहर में स्थापित राजा रामanna प्रगत प्रौद्योगिकी केंद्र जैसे परमाणु ऊर्जा अनुसंधान केंद्रों, आयुर्वेदिक चिकित्सालयों और महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के समृद्ध इतिहास ने इंदौर को एक ऐसा वैज्ञानिक परिवेश दिया जहाँ शोध सीधे सामाजिक उपयोगिता से जुड़ा।

आईआईटी और आईआईएम का ऐतिहासिक संगम इंदौर के लिए क्या मायने रखता है?
21वीं सदी के दरवाज़े पर इंदौर ने वह उपलब्धि हासिल की जो आज़ादी के बाद से देश का कोई अन्य महानगर नहीं पा सका था। 1996 में यहाँ भारतीय प्रबंधन संस्थान की स्थापना हुई, जिसने मालवा को कॉर्पोरेट नीतियों और रणनीतिक नेतृत्व का राष्ट्रीय गढ़ बना दिया। इसके ठीक 13 वर्ष बाद, 2009 में जब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान इंदौर की नींव रखी गई, तो शहर ने एक अद्वितीय इतिहास रच दिया। इंदौर भारत का पहला ऐसा शहर बन गया जिसके पास आईआईटी और आईआईएम दोनों की संयुक्त बौद्धिक उपस्थिति थी। यह उपलब्धि किसी तुक्के का नतीजा नहीं थी, बल्कि 1891 से निरंतर बह रही उस ज्ञान-धारा का तार्किक परिणाम थी जिसने शहर में अकादमिक उत्कृष्टता को एक स्थायी संस्कृति बना दिया था। जहाँ आईआईटी इंदौर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत सामग्री और नैनोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर के पेटेंट तैयार कर रहा है, वहीं आईआईएम (IIM) इंदौर जननीति, वित्तीय नियोजन और सामाजिक उद्यमिता को नए आयाम दे रहा है। इन दोनों संस्थानों की उपस्थिति ने स्थानीय उद्योगों, दवा निर्माण इकाइयों और उभरते तकनीकी स्टार्टअप्स को विश्वस्तरीय प्रतिभाओं का एक अटूट स्रोत उपलब्ध कराया है।
अकादमिक माहौल ने इंदौरी नागरिकों के आचरण और सामाजिक चेतना को कैसे तराशा?
किसी भी शहर का वास्तविक चरित्र उसके फ्लाईओवरों या इमारतों से नहीं, बल्कि वहाँ के नागरिकों की सोच से तय होता है। जब किसी समाज की कई पीढ़ियाँ पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं और वैचारिक बहसों के बीच पलती हैं, तो उसका सीधा असर दैनिक जीवन के तौर-तरीक़ों पर पड़ता है। इंदौर का नागरिक सिर्फ़ एक व्यापारी या कर्मचारी नहीं है; उसके पास हर समस्या को तार्किक और व्यावहारिक नज़रिए से देखने की दृष्टि है। यही कारण है कि जब स्वच्छता का राष्ट्रीय अभियान शुरू हुआ, तो इंदौर के लोगों ने इसे महज़ नगर निगम का दायित्व नहीं माना, बल्कि इसे अपने व्यक्तिगत स्वाभिमान से जोड़ लिया। गीले और सूखे कचरे को अलग करने का अनुशासन यहाँ के हर नागरिक के स्वभाव में ठीक उसी तरह शामिल है जैसे किसी प्रयोगशाला में वैज्ञानिक नियमों का पालन किया जाता है। यहाँ के बाज़ारों में दिखने वाली व्यापारिक ईमानदारी और नवाचार दरअसल उसी वैज्ञानिक सोच का प्रतिबिंब है जो होलकर कॉलेज से लेकर आधुनिक प्रबंध संस्थानों तक सिखाई जाती रही है। ज्ञान के प्रति यह गहरा आदर ही इंदौर को एक ऐसा शहर बनाता है जहाँ परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे से टकराने के बजाय कंधे से कंधा मिलाकर चलती हैं।
इंदौर की यह गौरवशाली गाथा इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि टिकाऊ विकास केवल आर्थिक निवेश से नहीं, बल्कि संस्थागत शिक्षा की मज़बूत नींव से ही संभव है। 1891 में महाराज शिवाजी राव होलकर द्वारा जलाई गई ज्ञान की वह लौ आज आईआईटी, आईआईएम और प्रतिष्ठित शोध केंद्रों के रूप में पूरे देश को दिशा दिखा रही है। अगर आप भी अपने शहर को स्वच्छ, अनुशासित और आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं, तो अगली बार इंदौर आने पर सिर्फ़ यहाँ के बाज़ारों का चक्कर मत लगाइए; यहाँ के ऐतिहासिक शिक्षण संस्थानों की चौखट पर जाकर उस शैक्षिक दृष्टि को समझिए जिसने एक समूचे समाज को संस्कारित किया है। आइए, अपने आस-पास ज्ञान के दीप जलाएँ और इंदौर की इस अमर बौद्धिक विरासत से प्रेरणा लेकर देश के हर कोने में जागरूक नागरिकता की नई मिसाल क़ायम करें।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/22haqcjl
2. https://tinyurl.com/22njcjdj
3. https://tinyurl.com/26ybxcmn
4. https://tinyurl.com/28bclhas
5. https://tinyurl.com/25s2e5sp
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