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पश्चिमी मध्य प्रदेश के पठार पर सरस्वती और खान नदियों के संगम स्थल पर बसा इंदौर शहर आज अपनी स्वच्छता और औद्योगिक रफ़्तार के लिए जाना जाता है, लेकिन इस शहर की ऐतिहासिक धड़कन इसके पुराने केंद्र में बसती है। खजूरी बाज़ार के व्यस्ततम चौराहे पर आसमान छूती सात मंजिला इमारत महज़ एक पुराना राजमहल नहीं, बल्कि मराठा शौर्य और स्थापत्य का वह दुर्लभ प्रतीक है जिसे दुनिया राजवाड़ा के नाम से जानती है। वर्ष 1747 में होलकर राजवंश के संस्थापक सूबेदार मल्हार राव होलकर ने जब इस महल की नींव रखी, तब शायद किसी ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि यह इमारत युद्धों, राजनीतिक उथल-पुथल और तीन भीषण अग्निकांडों की लपटों को पार कर 21वीं सदी में भी अजेय खड़ी रहेगी। इस विस्तृत पड़ताल में हम उस स्थापत्य के रहस्यों को परत-दर-परत खोलेंगे, जिसने पत्थर और लकड़ी के मेल से हिंदुस्तान के दिल में एक अनूठा अजूबा रच दिया।
मालवा की ज़मीन पर होलकर सत्ता और इस भव्य महल की नींव कैसे पड़ी?
किसी भी विशाल स्मारक को समझने के लिए उस दौर के सियासी भूगोल को देखना ज़रूरी होता है। वर्ष 1715 में नर्मदा नदी घाटी के व्यापारिक मार्ग पर स्थानीय ज़मींदारों ने एक बाज़ार की स्थापना की थी। इसके बाद वर्ष 1741 में यहाँ इंद्रेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण हुआ, जिसके पवित्र नाम से आगे चलकर इस पूरे शहर को इंदौर नाम मिला। मराठा साम्राज्य के विस्तार के साथ ही यह क्षेत्र होलकरों की रियासत की राजधानी के रूप में उभरा और आगे चलकर यह ब्रिटिश सेंट्रल इंडिया एजेंसी (British Central India Agency) का प्रशासनिक मुख्यालय भी बना। मल्हार राव होलकर ने जब 1747 में राजवाड़ा का निर्माण शुरू कराया, तो उनका मक़सद महज़ विलासिता का महल खड़ा करना नहीं था। उस अस्थिर दौर में सुरक्षा और सैन्य सामर्थ्य पहली प्राथमिकता थी, जिसके चलते उन्होंने एक द्वि-सामग्री यानी बाई-मटीरियल (Bi-material) बाहरी रूपरेखा तैयार करवाई।

काले बेसाल्ट और नक्काशीदार सागौन की यह दोहरी संरचना क्यों बनाई गई थी?
राजवाड़ा की बाहरी बनावट को देखने पर पहली नज़र में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि नीचे की तीन मंज़िलें गहरे काले बेसाल्ट (Basalt) पत्थरों से तराशी गई हैं, जबकि ऊपर की चार मंज़िलें पूरी तरह भारी सागौन (Teak) की लकड़ी से गढ़ी गई हैं। इसके पीछे एक गहरा रक्षात्मक और व्यावहारिक विज्ञान काम कर रहा था। तोपखाने के दौर में ज़मीनी स्तर पर भारी पत्थरों की मज़बूती दुश्मन के गोलों और घेराबंदी का सामना करने के लिए ढाल बनती थी। वहीं ऊपर की मंज़िलों में लकड़ी का इस्तेमाल करके इमारत के कुल वज़न को संतुलित रखा गया, ताकि दलदली या दोमट मिट्टी वाली ज़मीन पर सात मंजिला ऊँचा ढाँचा बिना धँसे सदियों तक टिका रहे। आयताकार रूप में फैली इस इमारत के चारों कोनों पर बेलनाकार बुर्ज यानी बैस्टियन (Bastion) बनाए गए, जो दूर से आते आक्रमणकारियों पर सीधी नज़र रखने और सुरक्षा घेरा मज़बूत करने के काम आते थे।
मराठा, मुग़ल और फ्रांसीसी शैलियों का अद्भुत संगम कहाँ झलकता है?
राजवाड़ा की मुख्य चौखट पर पहुँचते ही आपका सामना लोहे की नुकीली कीलों से जड़े एक विशालकाय लकड़ी के दरवाज़े से होता है, जो ठेठ मराठा सैन्य दुर्गों की याद दिलाता है। भीतर कदम रखते ही मेहराबदार गणेश हॉल सामने आता है, जहाँ कभी मराठा दरबार सजते थे और धार्मिक अनुष्ठान पूरे किए जाते थे। लेकिन जैसे ही आप इसकी बालकनियों और झरोखों पर नज़र डालते हैं, तो मुग़ल वास्तुकला की बारीक जालीदार नक़्क़ाशी और सजावटी मेहराबें दिखने लगती हैं। इतना ही नहीं, महल के बाहरी अग्रभाग यानी फ़ासाड (Facade) पर खिड़कियों का सटीक संरेखण और आनुपातिक समरूपता दरअसल फ्रांसीसी नियोक्लासिकल (Neoclassical) शैली से प्रेरित है। पुणे के शनिवार वाडा या महेश्वर के अहिल्या वाडा से तुलना करें, तो राजवाड़ा अपने विशाल खुले झरोखों और इस त्रिकोणीय शैलीगत मेल के कारण पूरे मध्य भारत में अपनी तरह का इकलौता स्मारक बन जाता है। महल के ठीक सामने खुला हरा-भरा बगीचा है, जहाँ लोकमाता देवी अहिल्या बाई होलकर की भव्य प्रतिमा स्थापित है, जिसके साथ फ़व्वारे और एक कृत्रिम झरना इसकी आभा में चार चाँद लगाते हैं।

तीन भयानक अग्निकांडों और 1984 की तबाही के बाद यह स्मारक कैसे दोबारा जी उठा?
इतिहास के पन्नों में राजवाड़ा की दास्तान जितनी गौरवशाली रही है, उतनी ही त्रासद भी रही है। इस ऐतिहासिक इमारत ने अपने जीवनकाल में तीन बार भीषण आग का दंश झेला है। सबसे भयानक मंज़र वर्ष 1984 में देखा गया, जब बेकाबू लपटों ने इसकी ऊपरी चारों लकड़ी की मंज़िलों को जलाकर राख के ढेर में बदल दिया। उस दौर में ऐसा लगने लगा था कि इंदौर ने अपनी सबसे अनमोल ऐतिहासिक धरोहर को हमेशा के लिए खो दिया है। मगर पारंपरिक बढ़ई यानी मास्टर कारपेंटर (master carpenter) और कुशल वास्तुकारों यानी हेरिटेज आर्किटेक्ट (heritage architect) की एक समर्पित टोली ने असंभव को संभव कर दिखाया। उन्होंने मालवा की पारंपरिक काष्ठकला का गहन अध्ययन किया, पुरानी तस्वीरों और अभिलेखों से नक़्शे तैयार किए और उसी गुणवत्ता की सागौन की लकड़ियों को जोड़कर मूल स्वरूप को दोबारा जीवित कर दिया। आज जो झरोखे और गैलरी (Gallery) हम देखते हैं, वे भारतीय कारीगरों की उसी निष्ठा और जिजीविषा का साक्षात प्रमाण हैं।

शहर के सांस्कृतिक ताने-बाने और पुराने बाज़ारों का केंद्र बिंदु यह कैसे बना?
राजवाड़ा केवल राजाओं का निवास मात्र नहीं था, बल्कि यह इंदौर के जनजीवन और बाज़ारों का नाभिकीय केंद्र रहा है। इसके ठीक पीछे मशहूर सराफा बाज़ार फैला हुआ है, जो दिन के समय शुद्ध चाँदी और आभूषणों के व्यापार के लिए प्रसिद्ध है, तो वहीं सूरज ढलते ही लज़ीज़ खान-पान के शौकीनों की जन्नत में तब्दील हो जाता है। रंगों का महापर्व रंगपंचमी हो, तो इसी राजवाड़ा चौक पर गेर महोत्सव (Ger Mahotsav) की लाखों की भीड़ उमड़ती है, जहाँ हवा में उड़ते गुलाल के बीच पूरा शहर एक रंग में रंग जाता है। गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर निकलने वाली ऐतिहासिक झाँकियाँ भी राजवाड़ा के सामने से गुज़रकर ही अपनी मंज़िल तय करती हैं। पास ही खान नदी के तट पर कृष्णपुरा छतरियाँ स्थित हैं, जो होलकर शासकों की स्मृति में बनाई गई नक्काशीदार समाधियाँ हैं। इसके अलावा वर्ष 1904 में बना इंडो-गॉथिक (Indo-Gothic) शैली का महात्मा गांधी हॉल (पूर्व नाम किंग एडवर्ड हॉल - King Edward Hall) और उसका क्लॉक टॉवर (Clock Tower), काँच की पच्चीकारी वाला काँच मंदिर और 1886 से 1921 के बीच बना भव्य लाल बाग पैलेस इस शहर की ऐतिहासिक श्रृंखला को पूरा करते हैं।
राजवाड़ा की दास्तान हमें सिखाती है कि सच्ची वास्तुकला महज़ पत्थरों की दीवार नहीं होती, बल्कि वह किसी समाज की अस्मिता और उसकी आत्मा होती है। तमाम आपदाओं और समय के थपेड़ों को सहकर आज भी सिर उठाए खड़ा यह महल इंदौर की अडिग पहचान का लंगर बना हुआ है। जब भी आप खजूरी बाज़ार की संकरी गलियों में जाएँ, तो ठहरकर राजवाड़ा के उस विशाल काष्ठ द्वार और झरोखों को ज़रूर निहारें, क्योंकि उनके हर रेशे में हिंदुस्तान का ढाई सौ साल पुराना इतिहास साँस ले रहा है। आप भी अपने शहर की इस ऐतिहासिक विरासत और इस बेमिसाल धरोहर के संरक्षण के प्रति सजग बनें !
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/22mka6fx
2. https://tinyurl.com/29or9xdp
3. https://tinyurl.com/22njcjdj
4. https://tinyurl.com/26ybxcmn
5. https://tinyurl.com/28hukoog
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