276 वर्ग किलोमीटर में फैले इंदौर की काली मिट्टी कैसे उगलती है सोना?

भूमि और मिट्टी के प्रकार : कृषि योग्य, बंजर, मैदान
30-09-2026 09:51 AM
276 वर्ग किलोमीटर में फैले इंदौर की काली मिट्टी कैसे उगलती है सोना?

पश्चिमी मध्य प्रदेश के मालवा (Malwa) पठार पर बसा इंदौर केवल अपनी व्यावसायिक इमारतों, सर्राफ़ा बाज़ार या राजबाड़ा के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि इस अंचल की असली ताक़त ज़मीन के भीतर छिपी है। प्राकृतिक ज्वालामुखीय गतिविधियों से बनी गहरी काली कपास मिट्टी (Black cotton soil) ने पीढ़ियों से यहाँ के कृषक परिवारों को समृद्ध किया है। जहाँ एक तरफ़ शहर का 276 वर्ग किलोमीटर में फैला नगर निगम क्षेत्र कान्ह और सरस्वती नदी बेसिन में बसा है, वहीं इसके बाहरी इलाक़ों में फैली उपजाऊ ज़मीन देश के कृषि बाज़ार को दिशा देती है। यह वह ज़मीन है जहाँ गर्मी में मिट्टी दरक कर खुद अपनी जुताई कर लेती है और मानसून आते ही सोने जैसी सोयाबीन की फसल लहलहा उठती है। लेकिन आज यह जीवनदायिनी ज़मीन तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण, नए एक्सप्रेसवे और कंक्रीट के जंगलों के नीचे दब रही है।

इंदौर की भौगोलिक और मिट्टी की संरचना कितनी अनोखी है? 
स्मार्ट सिटी (Smart City) के आधिकारिक दस्तावेज़ों के अनुसार, यह शहर उत्तर की ओर एक सौम्य ढलान वाले समतल पठार पर स्थित है, जिसका सबसे ऊँचा कंटूर (Contour) 590 मीटर और सबसे निचला हिस्सा 540 मीटर पर है। इस बेसिन की मिट्टी की बनावट बेहद जटिल और स्तरित है। सतह से नीचे जाने पर पहले 5 फीट तक नरम मिट्टी मिलती है, उसके बाद 15 फीट तक कठोर मिट्टी, 30 फीट तक लाल मिट्टी (Red soil) और अंततः 100 फीट या उससे नीचे चट्टानी ज़मीन पाई जाती है। बेसाल्टिक (Basaltic) चट्टानों से बनी यह काली मिट्टी क्ले (Clay) से भरपूर होती है, जिसे वर्टिसोल्स (Vertisols) भी कहा जाता है। यह मिट्टी नमी सोखने में बेजोड़ है। भीषण गर्मी में जब यह सूखती है, तो इसमें गहरी दरारें पड़ जाती हैं, जिससे हवा अंदर तक पहुँचती है। इसे ही प्राकृतिक 'सेल्फ-प्लोइंग' (Self-ploughing) या स्वतः जुताई की प्रक्रिया कहा जाता है, जो अगली फसल के लिए ज़मीन को पूरी तरह से तैयार कर देती है।

खरीफ और रबी की फसलों ने कैसे बदली किसानों की किस्मत? 
इंदौर ज़िले के कृषि विभाग (Agriculture Department) के आंकड़ों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि यही वह चमत्कारी मिट्टी है जिसने इंदौर को नकदी फसलों का सिरमौर बनाया है। मॉनसून के आते ही यहाँ के बड़े हिस्से में खरीफ (Kharif) की प्रमुख फसल सोयाबीन बोई जाती है, जो इस पूरे अंचल की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। वहीं सर्दियों के मौसम में रबी (Rabi) की फसल के रूप में उच्च गुणवत्ता वाले गेहूं की पैदावार होती है। यहाँ मुख्य रूप से लोक-1 (Lok-1), चंदौसी (Chandosi) और 147 किस्म के गेहूं की खेती होती है, जिनकी पूरे देश में भारी माँग है। इसके अलावा कुछ हिस्सों में व्यावसायिक स्तर पर प्याज की खेती भी की जाती है। अनाज मिलिंग (Grain milling) के उद्योगों के लिए यह शहर एक बड़ा केंद्र है, जहाँ से तैयार माल पूरे पश्चिम मध्य प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में ट्रकों और मालगाड़ियों के ज़रिए भेजा जाता है।

किसानों को जलवायु परिवर्तन से बचाने के लिए वैज्ञानिक क्या कर रहे हैं? 
बदलते मौसम और बीमारियों के खतरे को देखते हुए इंदौर स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) का भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान (Indian Institute of Soybean Research) लगातार नई खोजों में जुटा है। संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक और ब्रीडर (Breeder) डॉ. संजय गुप्ता के अनुसार, किसानों के लिए एनआरसी 157 (NRC 157) और एनआरसी 131 जैसी नई किस्में विकसित की गई हैं। एनआरसी 157 महज़ 94 दिनों में पककर तैयार हो जाती है और प्रति हेक्टेयर 16.5 क्विंटल (Quintal) का औसत उत्पादन देती है। सबसे ख़ास बात यह है कि संस्थान के ही डॉ. ज्ञानेश कुमार सत्पुते द्वारा विकसित एनआरसी 136 (NRC 136) नामक किस्म भारत की पहली सूखा सहिष्णु (Drought-tolerant) सोयाबीन वेरायटी है, जो 105 दिनों में पकती है और मूँगबीन येलो मोज़ेक वायरस (Moongbean Yellow Mosaic Virus) जैसी भयंकर बीमारियों का मुक़ाबला करने में सक्षम है। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा अनुमोदित ये बीज उन किसानों के लिए संजीवनी बन रहे हैं, जो कम बारिश या मानसून की बेरुखी की मार झेलते हैं।

कृषि भूमि पर शहरीकरण और औद्योगीकरण का क्या प्रभाव पड़ रहा है? 
कलेक्ट्रेट (Collectorate) के पीछे स्थित सैटेलाइट बिल्डिंग (Satellite Building) में बैठने वाले संयुक्त संचालक और उप संचालक कृषि के कार्यालय लगातार किसानों को उन्नत तकनीक सिखाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनके सामने एक अलग ही संकट मुँह बाए खड़ा है। इंदौर की व्यापारिक और औद्योगिक तेज़ी अब सीधे खेतों को निगल रही है। शहर के चारों ओर बिछ रहे नए औद्योगिक कॉरिडोर (Industrial corridor) और चौड़े एक्सप्रेसवे के कारण उपजाऊ काली मिट्टी कंक्रीट के नीचे दबती जा रही है। ज़मीन सिकुड़ रही है और भूजल स्तर तेज़ी से नीचे जा रहा है। भारी मशीनों के उपयोग से मिट्टी का संघनन (Soil compaction) हो रहा है, जिससे ज़मीन की प्राकृतिक नमी सोखने की क्षमता खत्म होती जा रही है। जो ज़मीन कभी लोक-1 और चंदौसी गेहूं से लहलहाती थी, वहाँ अब गगनचुंबी इमारतें आकार ले रही हैं।

शहर का कचरा कैसे वापस खेतों की उर्वरक क्षमता बढ़ा रहा है?
इन तमाम संकटों के बीच इंदौर ने चक्रीय अर्थव्यवस्था का बेहतरीन उदाहरण भी पेश किया है। नगर निगम द्वारा शहर से निकलने वाले कचरे को वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस करके उच्च गुणवत्ता वाला जैविक खाद या बायो-फर्टिलाइजर (Bio-fertilizer) बनाया जा रहा है। यह खाद शहर के सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों तक पहुँचाई जा रही है, ताकि रासायनिक खादों से बंजर होती ज़मीन को वापस ज़िंदा किया जा सके।

खेती और शहर का यह संघर्ष हमें बताता है कि कंक्रीट की कितनी भी दीवारें खड़ी कर ली जाएं, हमारी जड़ें उसी 5 फीट गहरी नरम काली मिट्टी में हैं। यह वक़्त है जब प्रशासन और किसानों को मिलकर उपजाऊ ज़मीन को बचाने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे, वरना वह दिन दूर नहीं जब चंदौसी गेहूं और सूखा-सहिष्णु सोयाबीन सिर्फ कृषि अनुसंधान केंद्रों के रिकॉर्ड रूम में ही सिमट कर रह जाएंगे। आइए, विकास की इस तेज़ दौड़ में अपनी उस उपजाऊ ज़मीन को बचाएं जो पीढ़ियों से हमारा पेट भरती आई है।

संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2bbk33bg
2. https://tinyurl.com/2dp29hzn
3. https://tinyurl.com/27k4p2ls
4. https://tinyurl.com/26ybxcmn
5. https://tinyurl.com/2c6ygz5h

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