इंदौर में कोबरा के ज़हर से उजड़े बाड़े में कैसे लौटी सफ़ेद बाघ की दहाड़?

स्तनधारी
30-09-2026 09:50 AM
इंदौर में कोबरा के ज़हर से उजड़े बाड़े में कैसे लौटी सफ़ेद बाघ की दहाड़?

मध्य प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर के नवलखा क्षेत्र में फैला कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय महज़ एक मनोरंजन पार्क नहीं, बल्कि भारत में दुर्लभ वन्यजीवों के संवर्धन का एक जीवंत केंद्र बन चुका है। यहाँ का हरा-भरा परिसर वर्तमान में 175 प्रजातियों के 1,350 से अधिक वन्यजीवों, परिंदों और सरीसृपों का घर है। लेकिन इस पूरे कुनबे में सबसे ज़्यादा ध्यान खींचते हैं बर्फ़ जैसे सफ़ेद रंग और नीली आँखों वाले सफ़ेद बाघ। एक समय ऐसा भी था जब हादसों और बीमारियों के चलते इंदौर ज़ू में सफ़ेद बाघों का वजूद पूरी तरह ख़त्म हो गया था। फिर भी, योजनाबद्ध वैज्ञानिक प्रबंधन, आनुवंशिक समझ और कड़े सुरक्षा मानकों के दम पर इस प्राणी संग्रहालय ने न केवल सफ़ेद बाघों की वापसी कराई, बल्कि भारत के चिड़ियाघरों के बीच सफल वन्यजीव विनिमय का एक अनुकरणीय मॉडल भी स्थापित किया।

सफ़ेद बाघों की उत्पत्ति का असली वैज्ञानिक रहस्य क्या है? 
प्रकृति की इस अद्भुत रचना को समझने के लिए हमें इतिहास और जेनेटिक्स दोनों के पन्नों को पलटना होगा। साल 1951 में मध्य प्रदेश के रीवा के तत्कालीन महाराजा मार्तंड सिंह ने बांधवगढ़ के जंगलों से एक अनाथ सफ़ेद बाघ शावक को पकड़ा था, जिसका नाम मोहन रखा गया। दुनिया भर के चिड़ियाघरों में आज जितने भी सफ़ेद बाघ मौजूद हैं, वे सभी इसी मोहन की वंशावली के वंशज हैं। जीवविज्ञान के नज़रिए से सफ़ेद बाघ कोई अलग प्रजाति नहीं हैं, बल्कि यह बंगाल टाइगर का ही एक दुर्लभ आनुवंशिक रूप है जिसे ल्यूसिज़्म (Leucism) कहा जाता है। ज़ू प्रभारी डॉ. उत्तम यादव के अनुसार, जब दो सामान्य नारंगी बाघों में अप्रभावी जीन यानी एलील्स (Alleles) का दुर्लभ संयोग बनता है, तब यह सफ़ेद रंग उभरता है। इनकी त्वचा में मेलेनिन वर्णक कम होता है, जिसके कारण इनका शरीर सफ़ेद और आँखें नीली होती हैं। जंगलों में छलावरण न मिल पाने के कारण इनका शिकार करना कठिन होता है, इसलिए कैप्टिव ब्रीडिंग यानी चिड़ियाघरों में नियंत्रित प्रजनन ही इनके वंश को सुरक्षित रखने का एकमात्र व्यावहारिक मार्ग बचा है।

साल 2014 का वह कौन सा हादसा था जिसने इंदौर ज़ू की सुरक्षा व्यवस्था को हिला दिया था? 
सफ़ेद बाघों के संरक्षण का यह रास्ता इंदौर के लिए कभी आसान नहीं रहा। 27 दिसंबर 2014 की सुबह कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय के इतिहास के सबसे काले दिनों में दर्ज है। छत्तीसगढ़ के भिलाई स्थित चिड़ियाघर से कुछ ही दिन पहले लाए गए 3 वर्षीय युवा सफ़ेद बाघ राजन के बाड़े में एक ज़हरीला काला कोबरा घुस गया। बाड़े के भीतर बाघ और नाग के बीच भीषण संघर्ष हुआ। यद्यपि घायल कोबरा बाद में पिंजरे के पास मिला, लेकिन कोबरा के घातक डंक से राजन के शरीर में ज़हर फैल गया और उसकी दर्दनाक मौत हो गई। इस घटना ने चिड़ियाघर प्रशासन की नींद उड़ा दी। दुख का सिलसिला यहीं नहीं थमा; भिलाई से ही लाई गई अंतिम जीवित सफ़ेद बाघिन शिवानी की भी साल 2016 में सर्पदंश के उपरांत हृदय गति रुकने से मौत हो गई। इसके बाद इंदौर का यह प्रतिष्ठित चिड़ियाघर पूरे 5 वर्षों के लिए सफ़ेद बाघों की गूँज से पूरी तरह महरूम हो गया।

उस दर्दनाक सबक़ ने बाड़ों के बुनियादी ढांचे को कैसे पूरी तरह बदल दिया? 
दो अनमोल सफ़ेद बाघों को खोने के बाद डॉ. उत्तम यादव और इंदौर नगर निगम ने पुराने ढाँचे को सिरे से बदलने का संकल्प लिया। चिड़ियाघर के पुराने संकीर्ण पिंजरों को हटाकर अंतरराष्ट्रीय मानकों वाले ओपन-एयर मोट (Open-air moat) बाड़ों की रूपरेखा तैयार की गई। ज़मीन की सतह से लेकर छतों तक महीन जालियों की ऐसी दोहरी सुरक्षा दीवार खड़ी की गई जिससे कोई भी ज़हरीला सरीसृप परिधि के भीतर दाख़िल न हो सके। जल निकासी नालियों पर कड़े फ़िल्टर लगाए गए, ताकि बरसात में भी साँप बाड़ों तक न पहुँच सकें। इसके साथ ही, वन्यजीवों के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर बाड़े के भीतर प्राकृतिक टीले, जलाशय, छायादार वनस्पतियाँ और लकड़ी के चबूतरे तैयार किए गए। इन सुरक्षा सुधारों ने साबित कर दिया कि सबक अगर ईमानदारी से लिया जाए, तो किसी भी संकट को एक सुरक्षित भविष्य की नींव में बदला जा सकता है।

पाँच साल के लंबे इंतज़ार के बाद सफ़ेद बाघों की वापसी कैसे मुमकिन हुई? 
सुरक्षा का पुख़्ता घेरा तैयार होने के बाद इंदौर ज़ू ने राष्ट्रीय स्तर पर सफ़ेद बाघों की पुनः प्राप्ति के प्रयास तेज़ किए। अप्रैल 2021 में एक ऐतिहासिक अंतर-चिड़ियाघर विनिमय समझौते के तहत ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क (Nandankanan Zoological Park) से एक 8 वर्षीय सफ़ेद बाघिन को इंदौर लाया गया। बदले में इंदौर ज़ू ने भुवनेश्वर को एक एशियाई बब्बर शेर सौंपा। इंदौर पहुँचने पर इस बाघिन को गहन चिकित्सा निगरानी और क्वारंटीन में रखा गया ताकि वह नए वातावरण और इंसानी आवाजाही की अभ्यस्त हो सके। जुलाई 2021 में, स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में इस बाघिन को 1 एकड़ से अधिक विशाल प्राकृतिक खुले बाड़े में सार्वजनिक दीदार के लिए छोड़ा गया। 5 साल बाद इंदौर के नवलखा में सफ़ेद बाघिन की दहाड़ लौटी, जिसे देखने के लिए हज़ारों दर्शकों का हुजूम उमड़ पड़ा।

बाघिन रागिनी और विक्की के मिलन ने 2022 में कौन सा दुर्लभ चमत्कार रचा? 
नंदनकानन से आई इस बाघिन को यहाँ रागिनी नाम दिया गया, जिसने इंदौर के वन्यजीव इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय लिखा। जुलाई 2022 में नौ साल की रागिनी पहली बार माँ बनी और उसने रविवार की सुबह तीन स्वस्थ शावकों को जन्म दिया। इन शावकों का पिता 4.5 वर्षीय काले रंग का मेलानिस्टिक (Melanistic) बाघ विक्की था। इस मिलन से जो नतीजा सामने आया, उसने देशभर के वन्यजीव विशेषज्ञों को हैरत में डाल दिया। तीन शावकों में से एक शावक अपने पिता की तरह काला-सफ़ेद था, जबकि दो शावक अत्यंत दुर्लभ त्रिरंगी यानी ट्राई-कलर्ड (Tricoloured) थे, जिनमें सफ़ेद, नारंगी और काले तीनों रंगों का हैरतअंगेज़ मिश्रण था। डॉ. उत्तम यादव ने स्पष्ट किया कि भारत के किसी भी अन्य चिड़ियाघर में इस प्रकार के बहुरंगी बाघ नहीं पाए जाते। इन तीन नन्हे मेहमानों के जन्म के साथ ही कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय में बाघों की कुल संख्या 15 तक पहुँच गई, जिसमें 8 वयस्क और 7 शावक शामिल थे। यह सफलता साबित करती है कि अनुकूल प्राकृतिक आवास मिलने पर दुर्लभ आनुवंशिक प्रजातियाँ भी बंदी वातावरण में बेहतर ढंग से फल-फूल सकती हैं।
 

इंदौर के कैप्टिव ब्रीडिंग मॉडल ने देशव्यापी जैव-विविधता को कैसे समृद्ध किया? 
शावकों के जन्म के बाद इंदौर ज़ू केवल जानवरों को प्रदर्शित करने वाला स्थान नहीं रहा, बल्कि वह देश के चिड़ियाघरों के लिए एक प्रमुख सप्लायर हब बन गया। जनवरी 2024 में इंदौर ज़ू ने गुजरात के जामनगर स्थित ग्रीन्स जूलॉजिकल पार्क के साथ एक बड़ा विनिमय समझौता किया। इसके तहत इंदौर ने अपने यहाँ जन्मी एक स्वस्थ युवा सफ़ेद बाघिन को जामनगर भेजा और बदले में 5 वर्ष की उम्र वाले अफ़्रीकी ज़ेबरा (Zebra) का एक जोड़ा प्राप्त किया। इस विनिमय के बाद भी इंदौर ज़ू में दो वयस्क सफ़ेद बाघिनें शान से मौजूद रहीं। यह सिलसिला यहीं नहीं थमा; इससे पहले भी इंदौर ने बेंगलुरु के बन्नेरघट्टा जैविक उद्यान को एक शेर, एक बाघ और घड़ियाल सौंपकर बदले में मारमोसेट बंदर और 25 फीट लंबे एनाकोंडा समेत 14 प्रजातियों के 42 दुर्लभ वन्यजीव प्राप्त किए थे। वहीं साल 2013 में यहाँ से भेजी गई सफ़ेद बाघिन रिद्धि ने भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान में 15 साल की आयु तक अपना लंबा जीवन बिताया। यह व्यवस्थित विनिमय मॉडल देश भर के प्राणी संग्रहालयों में इनब्रीडिंग की समस्या को रोकता है और नई आनुवंशिक विविधता को बढ़ावा देता है।

कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय का यह सफ़र हमें क्या सिखाता है? 
नवलखा के इस प्राणी संग्रहालय की कहानी महज़ सफ़ेद बाघों के संरक्षण की नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक दूरदर्शिता और वन्यजीवों के प्रति गहरी संवेदनशीलता की मिसाल है। 2014 के कोबरा दंश की त्रासदी से उठकर 2024 में अफ़्रीकी ज़ेबरा का स्वागत करने तक का सफ़र यह बताता है कि आधुनिक चिड़ियाघर अब जानवरों के कैदख़ाने नहीं, बल्कि उनके जीवन रक्षक साबित हो रहे हैं।

अगली बार जब आप इंदौर आएँ, तो नवलखा के इस हरे-भरे बाड़े में जाकर उस सफ़ेद बाघिन को ज़रूर देखें जो अपने अतीत के संघर्ष और वैज्ञानिक संरक्षण की जीवंत मिसाल बनकर खड़ी है। वन्यजीव संरक्षण के इस महफ़ूज़ प्रयास को अपनी आँखों से देखिए और हमारे साथ साझा कीजिए कि जैव-विविधता के इस शहरी महाकुंभ ने आपको कितना प्रेरित किया।

संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2a6fkekm
2. https://tinyurl.com/245zdmmn
3. https://tinyurl.com/23hwbs2e
4. https://tinyurl.com/256s5ong
5. https://tinyurl.com/2dh787tq

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