रालामंडल के 1905 के शिकारगाह से चंदन चुराने वाला गिरोह कौन था?

वृक्ष, झाड़ियाँ और बेलें
30-09-2026 09:49 AM
रालामंडल के 1905 के शिकारगाह से चंदन चुराने वाला गिरोह कौन था?

मालवा के पठार पर बसा इंदौर महानगर केवल अपनी व्यावसायिक प्रगति के लिए नहीं जाना जाता, बल्कि यहाँ की ऐतिहासिक और पारिस्थितिक विरासत भी बेहद समृद्ध है। इस विरासत का एक अनमोल हिस्सा चंदन का पेड़ है, जिसे वनस्पति विज्ञान में सैंटलम एल्बम (Santalum album) कहा जाता है। रालामंडल वन्यजीव अभयारण्य की पथरीली बेसाल्ट ढलानों से लेकर शहर के चिकित्सा परिसरों तक, इस सदाबहार अर्ध-परजीवी (Hemi-parasitic) वृक्ष ने सदियों से अपनी जड़ों को जमाए रखा है। अपनी विशिष्ट शीतलता, औषधीय गुणों और बहुमूल्य तेल से भरे हार्टवुड (Heartwood) के कारण यह पेड़ हमेशा से ही पूजनीय रहा है। आज यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रतीक अपने ही अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। यह विस्तृत पड़ताल इस बात पर प्रकाश डालेगी कि कैसे धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ा यह वृक्ष आज संगठित लकड़हारों के निशाने पर आ गया है, और प्रशासन इसके संरक्षण के लिए क्या ठोस कदम उठा रहा है।

चंदन का वानस्पतिक स्वरूप और इसके पारंपरिक उपयोग क्या हैं? 
सैंटलम एल्बम (Santalum album) मुख्य रूप से एक उष्णकटिबंधीय वृक्ष है जो अपनी जड़ों के माध्यम से आसपास के अन्य पौधों से आंशिक पोषण प्राप्त करता है। इस वृक्ष के भीतर का हिस्सा, जिसे हार्टवुड कहा जाता है, एक पीले-भूरे रंग की सुगंधित लकड़ी होती है जो विशेष प्रकार के तेल सैंटालोल (Santalol) से भरपूर होती है। सदियों से इंदौर की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में इसका गहरा महत्व रहा है। ऐतिहासिक खजराना गणेश मंदिर में भगवान को चढ़ाया जाने वाला चंदन का तिलक इसी पवित्र लकड़ी को घिसकर तैयार किया जाता है। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में इसे अत्यधिक शीतलता प्रदान करने वाली औषधि माना गया है। प्लैनेट आयुर्वेद (Planet Ayurveda) के शोध के अनुसार, चंदन का लेप त्वचा के संक्रमण, जलन, कमज़ोरी और गैस्ट्रिक अल्सर (Gastric ulcer) जैसी समस्याओं के इलाज में बेहद कारगर है।

होल्कर राजवंश ने रालामंडल में चंदन के वनों को कैसे संरक्षण दिया? 
1989 में रालामंडल के 5 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को आधिकारिक वन्यजीव अभयारण्य घोषित किए जाने से बहुत पहले ही इस क्षेत्र की हरियाली को शाही संरक्षण प्राप्त था। 1905 में होल्कर राजवंश ने इस ज्वालामुखी कटक के शीर्ष पर अपना शिकारगाह स्थापित किया था। तत्कालीन शासक यहाँ केवल शिकार के लिए नहीं आते थे, बल्कि उन्होंने इस वन की वनस्पति की रक्षा के भी नियम बनाए थे। सागौन, जिसे टैक्टोना ग्रैंडिस (Tectona grandis) कहा जाता है, और यूकेलिप्टस (Eucalyptus) व बाँस के झुरमुटों के बीच पनपने वाले चंदन (Sandalwood) के पेड़ों को रियासत ने संपदा मानकर सहेजा था। शाही सुरक्षा के कारण रालामंडल की ढलानों पर चंदन के सघन वन विकसित हुए। इसी ऐतिहासिक दूरदर्शिता का परिणाम है कि आज भी रालामंडल में तेंदुआ, ब्लैकबक (Blackbuck), सांबर और चीतल जैसे जीव आसानी से देखे जा सकते हैं।

नवंबर 2021 में रालामंडल शिकारगाह के पास हुई चंदन चोरी ने क्या चेतावनी दी? 
शाही दौर के संरक्षण के विपरीत, आज का समय चंदन के पेड़ों के लिए अभूतपूर्व ख़तरे लेकर आया है। 21 नवंबर 2021 की एक रिपोर्ट के मुताबिक रालामंडल अभयारण्य की कड़ी सुरक्षा के बीच एक ऐसी घटना घटी जिसने वन विभाग की नींद उड़ा दी। शिकारगाह से महज़ कुछ मीटर की दूरी पर वनकर्मियों को एक परिपक्व चंदन का पेड़ कटा हुआ मिला। संगठित लकड़हारों के गिरोह ने पेड़ की ऊपरी छाल को मौके पर ही छोड़ दिया और उसका बहुमूल्य सुगंधित हिस्सा लेकर फरार हो गए। चोर कटर मशीन (Cutter machine) लेकर पर्यटकों की आवाजाही वाले क्षेत्र तक पहुँचने में सफल रहे, जिसके बाद डीएफओ नरेंद्र पंडवा (DFO Narendra Pandwa) ने सीसीटीवी फुटेज और टूटी हुई फेंसिंग (Fencing) की जांच के आदेश दिए। इस दुस्साहसिक चोरी ने स्पष्ट कर दिया कि अब माफिया 5 वर्ग किलोमीटर में फैले संरक्षित वन की घेराबंदी तोड़ने में सक्षम हो चुके हैं।

13 सितंबर 2024 को एमजीएम मेडिकल कॉलेज परिसर में हुए सशस्त्र हमले में क्या हुआ? 
रालामंडल की घटना के बाद यह माना जा रहा था कि शहर के भीतर मौजूद चंदन के पेड़ सुरक्षित होंगे, लेकिन 13 सितंबर 2024 की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी। इंदौर के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान, एमजीएम मेडिकल कॉलेज (MGM Medical College) के परिसर में तड़के 2 से 2:30 बजे के बीच एक भारी हथियारों से लैस गिरोह घुसा। लगभग 7-8 नकाबपोश बदमाशों ने सबसे पहले चाचा नेहरू अस्पताल (Chacha Nehru Hospital) की पार्किंग में धावा बोला। उन्होंने वहां तैनात सुरक्षा गार्ड के सिर पर पिस्तौल तान दी और विरोध करने पर उसके साथ मारपीट की। इलेक्ट्रिक कटर (Electric cutter) और लोडिंग वाहन (Loading vehicle) से लैस यह गिरोह आवासीय क्षेत्र की तरफ बढ़ा और महज़ एक घंटे के भीतर 5 परिपक्व चंदन के पेड़ों को काटकर ले गया। हथियारों के बल पर शहर के बीचों-बीच हुई इस लूट ने साबित कर दिया कि चंदन की तस्करी करने वाले गिरोह अब कितने खूंखार हो चुके हैं।

वन विभाग नई नर्सरी के ज़रिये इस विरासत को कैसे बचा रहा है? 
चंदन की लगातार हो रही चोरी और इस बेशकीमती प्रजाति के लुप्त होने के ख़तरे को देखते हुए, इंदौर वन विभाग ने अब संरक्षण की एक नई रणनीति अपनाई है। शहर में चंदन की संख्या बढ़ाने के लिए वन विभाग ने अपनी नर्सरी में व्यावसायिक रूप से लाभदायक लाल चंदन (Red sandalwood) के पौधे उगाने की शुरुआत की है। यह पहला मौका है जब मध्य प्रदेश के इस हिस्से में वन विभाग सीधे तौर पर लाल चंदन की खेती को बढ़ावा दे रहा है। इन पौधों को उपयुक्त मिट्टी में उगाकर स्थानीय स्तर पर रोपने की योजना है। इसके समानांतर, बचे हुए पुराने पेड़ों को बचाने के लिए संस्थागत परिसरों और अभयारण्य में इलेक्ट्रॉनिक निगरानी को और सघन करने की आवश्यकता आन पड़ी है।

इंदौर में चंदन का अस्तित्व केवल कुछ पेड़ों के बचे रहने का मसला नहीं है, बल्कि यह मालवा की पारिस्थितिक पहचान को अक्षुण्ण रखने की लड़ाई है। 1905 के शिकारगाह से शुरू हुआ यह सफ़र 2021 की वन क्षेत्र की चोरी और 13 सितंबर 2024 की सशस्त्र लूट के कारण आज एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ा है। अगर हम आयुर्वेद की शीतलता को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाना चाहते हैं, तो प्रशासन की पहलों के साथ-साथ संस्थागत परिसरों की चौकसी बढ़ाना नितांत आवश्यक है। आइए मिलकर सुनिश्चित करें कि सदियों से मालवा की हवाओं को महकाने वाला यह वृक्ष महज़ कटर मशीनों की भेंट न चढ़ जाए।

संदर्भ
1. https://tinyurl.com/265dhqau
2. https://tinyurl.com/2boy2vlq
3. https://tinyurl.com/2dmvy7p8
4. https://tinyurl.com/25l8lpah
5. https://tinyurl.com/258lg3sr

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