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जौनपुरवासियों आज हम सब स्वामी विवेकानंद जयंती मना रहे हैं और यह दिन हमें उनके जीवन, उनके विचारों और उनकी आध्यात्मिक विरासत को श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ याद करने का अवसर देता है। इसी भावना के साथ आज हम हिमालय की शांत वादियों में बसे लोहाघाट के अद्वैत आश्रम की ओर ध्यान दे रहे हैं। यह आश्रम वह स्थान है जहाँ स्वामी विवेकानंद की अद्वैत वेदांत पर आधारित शिक्षाओं को शांत वातावरण में ही महसूस किया जा सकता है। आश्रम के चारों ओर फैले हिमालय के मनोहारी दृश्य, देवदारों की खुशबू, और प्रकृति की निःशब्द उपस्थिति मन को ठहराव देती है। जौनपुर के जीवन की भागदौड़ से निकलकर यह स्थान हमें स्वयं से जुड़ने, प्रकृति को महसूस करने और जीवन की सरलता को फिर से समझने का अवसर देता है।
आज के इस लेख में हम सबसे पहले स्वामी विवेकानंद के जीवन की एक संक्षिप्त झलक देखेंगे, ताकि उनके विचारों और दृष्टि की मूल प्रेरणा को समझा जा सके। इसके बाद हम मायावती स्थित अद्वैत आश्रम के इतिहास और उद्देश्य पर प्रकाश डालेंगे। फिर वहाँ स्थापित प्रिंटिंग प्रेस के महत्व को जानेंगे, जिसने रामकृष्ण–विवेकानंद परंपरा के साहित्य को व्यापक रूप से फैलाया। अंत में, हम अल्मोड़ा स्थित श्री रामकृष्ण कुटीर के बारे में जानेंगे, जो ध्यान, साधना और प्राकृतिक शांति का एक विशेष केंद्र है।

रामकृष्ण मठ और मिशन
स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना उस विचार को जीवन में उतारने के लिए की, जिसे वे व्यावहारिक वेदांत कहते थे। उनका मानना था कि सच्ची आध्यात्मिकता केवल आत्मिक उन्नति तक सीमित नहीं होती, बल्कि निःस्वार्थ सेवा के माध्यम से समाज के कल्याण में प्रकट होती है। “आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च” का भाव इसी सोच को व्यक्त करता है, यानी अपनी मुक्ति के साथ संसार का हित। इसी मार्ग पर चलते हुए मिशन ने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में निरंतर और व्यापक कार्य किए। इसका मुख्यालय बेलूर मठ है, जो हुगली नदी के तट पर स्थित है और अपनी ऐसी स्थापत्य शैली के लिए प्रसिद्ध है जो विभिन्न धर्मों में एकता और समरसता का संदेश देती है। मिशन की एक महत्वपूर्ण शाखा हिमालय में मयावती स्थित अद्वैत आश्रम है, जिसकी स्थापना 1899 में स्वामी विवेकानंद ने की थी। यहाँ बिना किसी बाहरी आडंबर के शुद्ध अद्वैत दर्शन का अध्ययन और प्रचार किया जाता है और आज यह आश्रम मिशन के साहित्य का एक प्रमुख प्रकाशन केंद्र भी है।
स्वामी विवेकानंद की आध्यात्मिक यात्रा
स्वामी विवेकानंद भारतीय आध्यात्मिकता के उन प्रमुख व्यक्तित्वों में थे जिनकी विचारधारा ने पूरे समाज में नई चेतना जगाई। हिमालय उन्हें अत्यंत प्रिय थे और वे इसे त्याग, साधना और योग की भूमि मानते थे। उनके जीवन की अनेक यात्राएँ विशेषकर पश्चिमी देशों की यात्राएँ उनके विचारों को और स्थिर बनाती गईं और इन्हीं अनुभवों ने उन्हें यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि भारत में एक ऐसा स्थान होना चाहिए जहाँ साधक अद्वैत दर्शन का अभ्यास कर सकें और प्रकृति की शांति में आत्मिक साधना कर सकें। इसी प्रेरणा से मायावती का अद्वैत आश्रम अस्तित्व में आया। स्वयं स्वामी विवेकानंद सन् 1901 में वहाँ पधारे और लगभग पंद्रह दिन रहे।

अद्वैत आश्रम की स्थापना
अद्वैत आश्रम का इतिहास स्वामी विवेकानंद की उस गहरी अनुभूति से जुड़ा है, जो उन्हें स्विट्ज़रलैंड यात्रा के दौरान अल्प्स पर्वतों की शांति में मिली थी। वहीं उन्हें यह विचार आया कि भारत में भी ऐसा ही एक शांत और एकांत स्थान होना चाहिए, जहाँ अद्वैत दर्शन का अध्ययन और साधना बिना किसी बाहरी आडंबर के की जा सके। भारत लौटने पर उन्होंने अल्मोड़ा में कैप्टन सीवियर, मिसेज़ सीवियर और स्वामी स्वरूपानंद को ऐसे स्थान की तलाश के लिए प्रेरित किया। इस खोज के परिणामस्वरूप उत्तराखंड में स्थित मयावती का चयन हुआ, जो समुद्र तल से लगभग छह हजार चार सौ फीट की ऊँचाई पर स्थित है और चारों ओर पहाड़ों से घिरा होने के साथ हिमालय का मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करता है। मार्च 1899 में अद्वैत आश्रम का उद्घाटन हुआ और बेलूर मठ ने इसे अपनी आधिकारिक शाखा के रूप में स्वीकार किया। यहाँ किसी मंदिर या बाहरी पूजा पद्धति को स्थान नहीं दिया गया, क्योंकि आश्रम का मूल उद्देश्य केवल शुद्ध अद्वैत दर्शन का अध्ययन और आत्मचिंतन था। समय के साथ यह आश्रम पूर्व और पश्चिम दोनों के विद्वानों के लिए विचारों के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया और यहाँ एक समृद्ध पुस्तकालय भी विकसित हुआ।
अद्वैत आश्रम की प्रिंटिंग प्रेस
अद्वैत आश्रम की प्रिंटिंग प्रेस उसकी बौद्धिक और वैचारिक परंपरा की एक अहम कड़ी रही है। आश्रम की स्थापना 19 मार्च 1899 को स्वामी विवेकानंद के शिष्यों कैप्टन जेम्स हेनरी सीवियर, उनकी पत्नी और स्वामी स्वरूपानंद द्वारा की गई थी। इससे पहले 1898 में कोलकाता से एक प्रिंटिंग प्रेस खरीदी गई, जिसे पहले अल्मोड़ा में स्थापित किया गया और बाद में मयावती लाया गया। इसी प्रेस से प्रबुद्ध भारत नामक मासिक पत्रिका का संपादन आरंभ हुआ। इस पत्रिका में अद्वैत वेदांत से जुड़े लेख, दर्शन पर आधारित विचार और संन्यासियों व विद्वानों द्वारा किए गए ग्रंथों के अनुवाद प्रकाशित होते थे, जिनके माध्यम से रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद के विचार व्यापक रूप से लोगों तक पहुँचे। आज भले ही यहाँ प्रत्यक्ष मुद्रण कार्य नहीं होता, लेकिन प्रबुद्ध भारत का संपादन अब भी मयावती से ही किया जाता है। इसके साथ ही, आश्रम से जुड़ा चैरिटी अस्पताल, जिसकी शुरुआत 1903 में हुई थी, आज भी सेवा की उसी भावना के साथ लोगों की सहायता कर रहा है।

श्री रामकृष्ण कुटीर, अल्मोड़ा
अल्मोड़ा के ब्राइट एंड कॉर्नर में स्थित श्री रामकृष्ण कुटीर, उत्तराखंड का एक शांत और प्रेरक आध्यात्मिक स्थल है। इसकी स्थापना 22 मई 1916 को स्वामी तुरियानंद ने की थी। यह कुटीर स्वामी विवेकानंद की उस भावना से जुड़ी मानी जाती है, जिसमें वे चाहते थे कि साधना के लिए ऐसा स्थान हो जहाँ प्रकृति स्वयं मन को स्थिर करने में सहायता करे। यही कारण है कि यह स्थल उसी क्षेत्र के पास स्थित है जहाँ स्वामी विवेकानंद ने कभी गहन ध्यान किया था।चारों ओर पहाड़ों की शांति, नीचे बहती कोसी नदी और स्वच्छ वातावरण इस कुटीर को विशेष बनाते हैं। यहाँ न तो किसी तरह का आडंबर है और न ही भीड़, बल्कि एक सरल और शांत माहौल है जहाँ व्यक्ति एकांत में रहकर आत्मचिंतन और मन की शांति का अनुभव कर सकता है। श्री रामकृष्ण कुटीर आज भी उन लोगों के लिए एक उपयुक्त स्थान है जो जीवन की भागदौड़ से दूर रहकर सच्ची शांति और आंतरिक संतुलन को महसूस करना चाहते हैं।
संदर्भ -
https://tinyurl.com/34zb6kr5
https://tinyurl.com/5n7u5tb6
https://tinyurl.com/3mt3h7vf
https://tinyurl.com/bddfe43b
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