आंतरिक शांति व सामाजिक सद्भाव को लेकर, बुद्ध, गुरु नानक तथा गांधीजी के क्या हैं विचार

विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
10-04-2026 09:23 AM
आंतरिक शांति व सामाजिक सद्भाव को लेकर, बुद्ध, गुरु नानक तथा गांधीजी के क्या हैं विचार

जौनपुर, हम आज के लेख में गौतम बुद्ध की शिक्षाओं का पता लगाएंगे, और यह भी समझेंगे कि, उनके दर्शन के माध्यम से शांति कैसे प्राप्त की जा सकती है। फिर हम शांति के उस मार्ग के बारे में जानेंगे, जिसे महान अष्टांगिक पथ या मज्झिमा पतिपदा (Majjhima Patipada) के नाम से जाना जाता है। इसके पश्चात, हम गुरु नानक की शिक्षाओं की जांच करेंगे, और सिख धर्म के तीन स्तंभों - नाम जपना, किरत करनी, वंड चकना - को समझेंगे। ये स्तंभ, समानता, सेवा और भगवान की याद पर जोर देते हैं। अंततः हम गांधीजी के विचारों और उनके चार मुख्य उपदेशों पर नज़र डालेंगे, जो उन्होंने अच्छे मानवीय समाज के निर्माण के लिए दिए थे।
बौद्ध परंपरा के अनुसार, गौतम बुद्ध ने कामुक भोग और गंभीर तपस्या के बीच एक मध्य मार्ग सिखाया था, जिससे अज्ञानता, लालसा, पुनर्जन्म और पीड़ा से मुक्ति मिलती है। उनकी मुख्य शिक्षाओं को चार महान सत्यों और महान अष्टांगिक पथ में संक्षेपित किया गया है। यह हमारे मन का एक प्रशिक्षण है, जिसमें नैतिक मार्गदर्शन और दूसरों के प्रति दयालुता, इंद्रिय संयम, सचेतना, और ध्यान जैसे अभ्यास शामिल हैं। उनकी शिक्षाओं का एक अन्य प्रमुख तत्व, पांच स्कंधों और आश्रित उत्पत्ति की अवधारणाएं हैं। इसमें बताया गया है कि, कैसे कुछ धर्म अस्तित्व में आते हैं, और अन्य धर्मों पर निर्भर होकर, अपने स्वयं के अस्तित्व की कमी के कारण समाप्त हो जाते हैं।
उनकी शिक्षाओं को बौद्ध समुदाय द्वारा ‘विनय पिटक’ में संकलित किया गया था, जिसमें मठवासियों हेतु अनुशासन नियम शामिल थे। दूसरी तरफ, ‘सूत्र पिटक’ उनके लिए प्रवचनों का एक संग्रह था। इन्हें मौखिक परंपरा के माध्यम से, मध्य इंडो-आर्यन बोलियों में प्रसारित किया गया था। फिर, आने वाले काल में अतिरिक्त ग्रंथों की रचना की गई, जिन्हें अभिधर्म के नाम से जाना जाता है। जबकि, बुद्ध के जीवन के बारे में कहानियों को ‘जातक कथाएं’ और कुछ अतिरिक्त प्रवचनों को ‘महायान सूत्र’ कहा जाता है।
 

File:Buddha meditating.jpg

शांति के मामले में बौद्ध धर्म सिखाता है कि, शांति केवल प्रार्थनाओं या शब्दों के माध्यम से प्राप्त नहीं की जा सकती। ईश्वरवादी धर्मों के अनुयायियों द्वारा जाप या प्रार्थनाएं की जाती हैं, बल्कि, शांति उसी मार्ग पर चलने से प्राप्त की जाती है, जो शांति की ओर ले जाता है। शांति की ओर ले जाने वाले मार्ग को ‘महान अष्टांगिक मार्ग' या पालि भाषा में 'मज्झिम पतिपदा' (मध्यम मार्ग) कहा जाता है। संक्षिप्त रूप में इसे 'त्रिसिक्खा' (तीन शिक्षाओं) के रूप में जाना जाता है।
बौद्ध धर्म मानता है कि हमारी आंतरिक या मानसिक शांति, बाहरी शांति अर्थात युद्धों और सार्वजनिक विद्रोहों के अभाव से अधिक महत्वपूर्ण है। इसका कारण यह है कि, सभी बाह्य युद्धों का मूल कारण मनुष्य के मन में छिपी मानसिक विकृतियां हैं। यदि सभी अपवित्रताओं को आंशिक या पूर्ण रूप से समाप्त किया जा सके, तो दुनिया में शांति होगी। हमें इसलिए अष्टांगिक मार्ग को आचरण में लाना चाहिए। वास्तव में, बौद्ध धर्म व्यावहारिकता का धर्म है। यह अष्टांगिक मार्ग आठ घटकों से बना है। वे मार्ग निम्नलिखित हैं 

(1) सम्मा दिट्ठी- सही दृष्टिकोण, 
(2) सम्मा संकप्पा- सही संकल्पना, 
(3) सम्मा वाचा- सही वाणी, 
(4) सम्मा कम्मंता- सही कार्य, 
(5) सम्मा अजिव- सही आजीविका, 
(6) सम्मा व्यायाम- सही प्रयास, 
(7) सम्मा सती- सही मानसिकता और 
(8) सम्मा समाधि- सही ध्यान।

बौद्ध धर्म के अलावा, सिख धर्म में भी हमें कुछ सामान शिक्षाएं मिलती हैं। पहले सिख गुरु- गुरु नानक को दिव्य ज्ञान का अनुभव हुआ था। इसके लिए, वे तीन दिनों तक काली बेईं नदी के पानी (Kali Bein River) में बैठे थे। जब उन्हें ज्ञान का अनुभव हुआ, तब उनका पहला उच्चारण था कि, ‘कोई न तो हिंदू है, और ना ही मुस्लिम है।’ यह कथन एक ऐसे विचार को व्यक्त करता है, जो सभी मूल्यों की नींव बना। यही बाद में सिख धर्म के नाम से जाना गया। इस कथन में "एक ईश्वर" की अवधारणा निहित है। यह बयां करता है कि, हमें हिंदू या मुस्लिम जैसी पहचान की आवश्यकता नहीं है, जो एक समूह को दूसरे से अलग करती है। वास्तव में हम सभी एक ही दिव्य स्रोत से आए हैं और ब्रह्मांड में सभी चीजों की एकता, एक ही सार से जुड़ी हुई है। गुरु नानक जी की पवित्र रचना – ‘जपजी साहिब’ का पहला शब्द "इक" है, जिसका अर्थ "एक" है। इस प्रकार, सिख मूल्यों के भीतर "एकता" की अवधारणा का महत्व स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। जपजी साहिब, सिरी गुरु ग्रंथ साहिब की शुरुआत में दिखाई देता है, जो सिख गुरुओं और अन्य श्रद्धेय संतों के लेखन और शिक्षाओं का लिखित संग्रह है। सिरी गुरु ग्रंथ साहिब को सभी सिखों के लिए, एक जीवित गुरु माना जाता है। 
इसके अलावा, गुरु नानक जी ने सिखों के लिए तीन बुनियादी दिशानिर्देशों को औपचारिक रूप दिया हैं। इन तीन मूल्यों के साथ, गुरु नानक जानते थे कि, कोई व्यक्ति इस दुनिया में आध्यात्मिक उन्नति और भौतिक सुख प्राप्त करेगा। सिख धर्म के ये स्तंभ निम्नलिखित हैं -

1. नाम जपना: गुरुओं ने सिखों को सिमरन और नाम जपने का अभ्यास करने के लिए प्रेरित किया है। पाठ, मंत्रोच्चार, गायन और निरंतर स्मरण के माध्यम से भगवान का ध्यान करना और उसके बाद भगवान के नाम एवं गुणों का गहन अध्ययन करना महत्वपूर्ण है। इस प्रकार किसी सिख की आंतरिक आवाज, निर्माता और एक शाश्वत भगवान - वाहेगुरु तथा उनकी इच्छा की प्रशंसा में रहती है। सिख व्यक्ति को जीवन भर सहजता से अभ्यास करना, और हर सांस के माध्यम से सच्चे पथ पर ध्यान केंद्रित करना होता है। धार्मिकता के इस मार्ग को याद रखने और उस पर चलने हेतु, सिखों को विभिन्न तरीके बताए गए थे। 

File:Guru Nanak wearing robe with Perso-Arabic inscriptions 02.jpg

2. किरत करनी: गुरुओं को सिखों से अपेक्षा थी कि, वे सम्माननीय गृहस्थ के रूप में रहें और किरत करनी का अभ्यास करें। दुख और सुख को भगवान के उपहार और आशीर्वाद के रूप में स्वीकार करते हुए, अपने शारीरिक और मानसिक प्रयासों से ईमानदारी से कमाई करना, किरत करनी है। साथ ही, किसी सिख को धर्म के मार्ग पर आध्यात्मिक, नैतिक और सामाजिक मूल्यों द्वारा नियंत्रित जीवन जीना चाहिए।

3. वंड चकना: सिखों को वंड चकना – ‘साझा करना और एक साथ उपभोग करना" का अभ्यास करके, समुदाय के भीतर अपनी संपत्ति साझा करने के लिए कहा गया था। ‘समुदाय’ या ‘साध संगत’ सिख धर्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी को ऐसे समुदाय का हिस्सा होना चाहिए, जो सिख गुरुओं द्वारा निर्धारित निर्दोष उद्देश्य मूल्यों का पालन कर रहा है। साझा करने और दान की यह भावना गुरु नानक का एक महत्वपूर्ण संदेश है।

आज हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं, जो वैश्वीकरण का युग है। वैश्वीकरण की नई आर्थिक नीति विश्व के देशों को एकजुट बनाने की ओर अग्रसर है। इस समय युवाओं के सामने नई चुनौतियाँ और समस्याएँ सामने आई हैं। हालांकि हमारा विश्वास पक्का है कि, सभी उभरती समस्याओं को नई खोजों और तकनीकी नवाचारों द्वारा हल किया जा सकता है। लेकिन आज जो कुछ हो रहा है, उसकी गांधीजी ने 1908 में ही भविष्यवाणी की थी। इसी कारण, उन्होंने मानवता के लिए युवाओं के सामने चार मुख्य लक्ष्य रखे थे। ये लक्ष्य - स्वराज, अहिंसा, स्वदेशी और सर्वोदय हैं। ये उपदेश उन्होंने ‘हिंद स्वराज’ में लिखे हैं।‘सत्य और अहिंसा’, गांधीवादी विचारों के जुड़वां स्तंभ हैं। महात्मा गांधी के लिए, सत्य को शब्दों और कार्यों में अनुवादित किया जाता है। उनके लिए अंतिम सत्य ईश्वर और नैतिकता थे। उनके लिए अहिंसा, हिंसा के विपरीत सक्रिय प्रेम थी। गांधीजी के लिए ‘सत्याग्रह’ का अर्थ, सभी प्रकार के अन्याय, उत्पीड़न और शोषण के विरुद्ध शुद्धतम आत्म-बल का प्रयोग करना था। यह पद्धति दूसरों को चोट पहुँचाने के बजाय, स्वयं कष्ट सहकर हमारे कार्यों या विचारों की रक्षा करती है।
इसके अलावा, ‘सर्वोदय’ अर्थात सार्वभौमिक उत्थान या सभी की प्रगति भी गांधीजी का महत्वपूर्ण मूल्य है। उन्होंने ‘स्वराज’ शब्द को भी एक अभिन्न क्रांति की उपमा दी, जो हमारे जीवन के सभी क्षेत्रों से संबंधित है। जबकि उनका अंतिम मूल्य – ‘स्वदेशी’ अपनाना, अपने देश के साधनों का सम्मान करना है। लेकिन अधिकांश संदर्भों में, इसे आत्मनिर्भरता के रूप में अनुवादित किया जाता है।

संदर्भ 
1.    https://tinyurl.com/376yxeur 
2.    https://tinyurl.com/ynyjhps5 
3.    https://tinyurl.com/y3skc9dt 
4.    https://tinyurl.com/4d3e8x2j 
5.    https://tinyurl.com/mwmvuk7h 
6.    https://tinyurl.com/9vntr5tf 
7.    https://tinyurl.com/v9uh8xbr 
8.    https://tinyurl.com/vteh7eh7 

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