जौनपुर वासियों, पढ़ते हैं शिव पुराण के आख्यान व आधुनिक भौतिकी में मौजूद संबंध के बारे में

धर्म का युग : 600 ई.पू. से 300 ई.
01-09-2026 10:00 AM
जौनपुर वासियों, पढ़ते हैं शिव पुराण के आख्यान व आधुनिक भौतिकी में मौजूद संबंध के बारे में

जौनपुर वासियों, क्या आप जानते हैं कि शिव पुराण, हिंदू धर्म के संस्कृत ग्रंथों की पुराण-श्रेणी के अठारह महापुराणों में से एक प्रमुख ग्रंथ है। यह शैव साहित्य-परंपरा का एक अभिन्न अंग है। यह मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की लीलाओं एवं महिमाओं को बताता है। साथ ही, इसमें समस्त देवी-देवताओं का आदरपूर्वक उल्लेख एवं वंदन किया गया है।

हिंदू साहित्य के अन्य पुराणों की भांति, शिव पुराण भी एक गतिशील ग्रंथ (जीवंत परंपरा) रहा है। इसे एक लंबी समयावधि में नियमित रूप से संपादित, पुनर्गठित एवं परिमार्जित किया गया है। शिव पुराण में यह उल्लेख मिलता है कि मूलतः इसमें बारह संहिताओं (खंडों) के अंतर्गत 1,00,000 श्लोक समाहित थे। हालांकि, इस ग्रंथ में यह भी बात कही गई है कि महर्षि वेदव्यास ने, अपने शिष्य सूत जी को इसका अध्ययन कराने से पूर्व इसे संक्षिप्त कर दिया था। इसकी वर्तमान समय में उपलब्ध पांडुलिपियां कई भिन्न-भिन्न संस्करणों और सामग्रियों में प्राप्त होती हैं। इनमें सात संहिताओं वाला एक प्रमुख संस्करण (जो मुख्यतः दक्षिण भारत में प्रचलित है) और छह संहिताओं वाला दूसरा संस्करण शामिल है। वहीं, मध्यकालीन बंगाल क्षेत्र से प्राप्त तीसरे संस्करण में संहिताएं नहीं हैं, बल्कि, यह दो वृहद खंडों में विभाजित है, जिन्हें 'पूर्व-खंड' (प्रथम भाग) और 'उत्तर-खंड' (उत्तर भाग) कहा जाता है।

शिव पुराण की सटीक रचना-तिथि और रचयिता के संबंध में कोई अंतिम ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। चूंकि पांडुलिपियों की रचना-तिथि पर रेडियोकार्बन डेटिंग (Radiocarbon Dating) जैसी तकनीकें पूर्णतः सटीक सिद्ध नहीं होतीं, अतः ग्रंथ काल-निर्धारण हेतु इसके आंतरिक साक्ष्यों और संदर्भों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। एक अनुमान के अनुसार, शिव पुराण के उपलब्ध हस्तलेखों के सबसे प्राचीन अंशों की रचना संभवतः नौवीं से ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में हुई थी। इसके अलावा, वर्तमान में प्राप्त शिव पुराण की पांडुलिपियों के कुछ अध्यायों को तेरहवीं शताब्दी के पश्चात् रचित माना जाता है।

शिव पुराण में शिव-केंद्रित सृष्टि-विज्ञान (ब्रह्मांड उत्पत्ति), देवताओं का पारस्परिक संबंध, नीतिशास्त्र, योग, तीर्थ-माहात्म्य, भक्ति-तत्व, नदियों का वर्णन, भूगोल तथा अन्य विविध विषय समाहित हैं। प्रथम सहस्त्राब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध तथा द्वितीय सहस्त्राब्दी के प्रारंभ में, शैव संप्रदायों के विविध स्वरूपों और उनके दार्शनिक सिद्धांतों को समझने के लिए, यह ग्रंथ ऐतिहासिक जानकारी का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसके प्राचीनतम अध्यायों में भक्ति भाव के साथ-साथ, अद्वैत वेदांत दर्शन का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में, ‘वायु पुराण’ को कभी-कभी शिव पुराण का नाम दिया जाता था अथवा इसे शिव पुराण का ही एक भाग माना जाता था। किंतु अधिक पांडुलिपियों की खोज के उपरांत, आधुनिक विद्वान इन दोनों ग्रंथों को पृथक मानते हैं। वायु पुराण को अधिक प्राचीन, अर्थात द्वितीय शताब्दी ईस्वी से पूर्व रचित ग्रंथ स्वीकार किया गया है। कुछ विद्वान शिव पुराण को अठारह महापुराणों की सूची में गिनते हैं, जबकि अन्य विद्वान इसे उपपुराण की श्रेणी में रखते हैं।

शिव पुराण में, सृष्टि की कथा और भगवान शिव जी का उद्भव भी वर्णित है। इसके अनुसार, सृष्टि के आरंभ से पूर्व न पृथ्वी थी, न आकाश और न ही कोई देवता। तब केवल सर्वव्यापी अंधकार (तमस) और महाशून्यता विद्यमान थी। उस अनंत शून्य में केवल शाश्वत, निराकार 'ब्रह्म' का अस्तित्व था। परम चेतना और शक्ति से परिपूर्ण ब्रह्म, अपने निर्गुण रूप में स्वयं भगवान शिव ही थे।

उस महाशून्य के मध्य से 'ज्योतिर्लिंग' नामक अग्नि और परम प्रकाश का एक अत्यंत तीव्र एवं अनंत स्तंभ प्रकट हुआ। इस स्तंभ का न कोई आदि (प्रारंभ) था और न ही कोई अंत। यह ज्योतिर्लिंग, शिव जी का मूल स्वरूप था, जो शुद्ध, असीम और निराकार ऊर्जा थी। इसी दिव्य प्रकाश से संपूर्ण ब्रह्मांड का आविर्भाव हुआ। इसी ज्योतिर्लिंग से ब्रह्मा और श्री विष्णु का उद्भव हुआ। प्रारंभ में, वे दोनों अपनी उत्पत्ति के स्रोत को लेकर भ्रमित थे और स्वयं को एक-दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने के विवाद में उलझ गए। उनके इस संशय का निवारण करने के लिए, उस ज्योति-स्तंभ से एक दिव्य आकाशवाणी हुई, जिसने ब्रह्मा जी को उस अग्नि-स्तंभ का शीर्ष और विष्णु जी को उसका आधार बताया।

तब, विष्णु जी ने वराह रूप धारण किया और वे तल की ओर गहराई में स्तंभ का आधार खोजने लगे। इसके विपरीत, ब्रह्मा जी हंस रूप धारण कर आकाश की ओर ऊपर उड़े। सहस्रों वर्षों की निरंतर खोज के पश्चात् भी, दोनों में से कोई भी उस अनंत स्तंभ का अंत न ढूंढ सके। तब विष्णु जी ने अपनी सीमा स्वीकार की और वे विनम्रतापूर्वक नतमस्तक हो गए। दूसरी तरफ, ब्रह्मा जी ने असत्य का सहारा लेकर, केतकी के पुष्प को झूठी गवाही के लिए तैयार करके, यह दावा किया कि उन्होंने ज्योतिर्लिंग का शीर्ष देख लिया है।

तभी उस ज्योतिर्लिंग के मध्य से भगवान शिव साकार रूप में प्रकट हुए, जो रूप उग्र, दिव्य और रुद्र था। उन्होंने विष्णु जी की सत्यनिष्ठा और नम्रता की सराहना की, जबकि असत्य बोलने के दंडस्वरूप, ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि भूलोक में उनकी पूजा हेतु कोई भी मंदिर समर्पित नहीं होगा। केतकी के पुष्प को भी असत्य का भागी बनने के कारण शिव-पूजा से सर्वथा वर्जित कर दिया गया। यह घटना शिव के 'निराकार' (अव्यक्त) से 'साकार' (व्यक्त) रूप में उद्भव की प्रतीक है।

तत्पश्चात, शिव जी ने ब्रह्मांडीय दायित्वों का विभाजन किया। उन्होंने विश्व की रचना हेतु ब्रह्मा जी को, उसके पालन-पोषण एवं संरक्षण हेतु विष्णु जी को, और कालचक्र के अंत में संहार हेतु स्वयं को उत्तरदायित्व दिया। इस प्रकार संपूर्ण सृष्टि-चक्र का शुभारंभ हुआ।

यदि हम शिव पुराण की कथाओं का सूक्ष्मता से अध्ययन करेंगे, तो पाएंगे कि सापेक्षता का सिद्धांत (Theory of Relativity) और क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) जैसे आधुनिक भौतिकी के गूढ़ सिद्धांत कुछ आख्यानों के माध्यम से, अत्यंत सुंदरता से अभिव्यक्त किए गए हैं। यह हमारी संस्कृति की एक अद्भुत द्वंद्वात्मक शैली रही है, जहां गूढ़ वैज्ञानिक सत्यों को कथाओं का रूप दिया गया और हर तत्व का मानवीकरण (Personification) किया गया।

किंतु समय के साथ, समाज ने इसके पीछे छिपे वैज्ञानिक मर्म को भुला दिया और केवल कथाओं को थामे रखा। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन आख्यानों को इतना अतिरंजित और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाने लगा कि वे अपनी मूल तार्किकता खोकर हास्यास्पद प्रतीत होने लगे। यदि हम इन पौराणिक कथाओं में निहित वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पुनः समझें, तो यह गूढ़ विज्ञान को जन-सामान्य तक पहुंचाने का एक अत्यंत सुंदर माध्यम सिद्ध होगा।

शिव पुराण मानव चेतना को उसके उच्चतम शिखर तक ले जाने का एक परम विज्ञान है। इसे अत्यंत मनोरम कथाओं के रूप में पिरोया गया है। योगशास्त्र को बिना किसी कथा के साथ, एक विशुद्ध विज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। परंतु यदि आप गहराई से विचार करें, तो योग और शिव पुराण एक ही सत्य के दो पहलू हैं। जिन्हें पृथक नहीं किया जा सकता। एक उन लोगों के लिए है, जो कथाओं के माध्यम से सत्य को समझते हैं, और दूसरा उन लोगों के लिए है, जो विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं। अर्थात, इन दोनों का मूल सिद्धांत एक ही है।

आजकल, शिक्षाविद् एवं वैज्ञानिक आधुनिक शिक्षण-पद्धतियों पर गहन शोध कर रहे हैं। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार, ज्ञान प्रदान करने का सरल तरीका यह है कि इसे कथाओं या खेल-खेल के माध्यम से सिखाया जाए। आधुनिक विश्व में इस दिशा में कुछ प्रयास आरंभ हुए हैं, किंतु अधिकांश शिक्षा प्रणाली आज भी अत्यधिक तनावपूर्ण एवं दमनकारी बनी हुई है। जब तक ज्ञान को एक सहज और रोचक माध्यम से न प्रदान किया जाए, तब तक सूचनाओं का भारी बोझ बुद्धिमत्ता को दबा देगा। ऐसी स्थिति में, कहानियों के माध्यम से सिखाना ही सबसे प्रभावी मार्ग है। हमारी भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से यही किया गया था, जैसा कि शिव पुराण के उदाहरण से समझा जा सकता है।


संदर्भ

1. https://tinyurl.com/yvtu6ppw 

2. https://tinyurl.com/522ca3vs 

3. https://tinyurl.com/3h686edj 

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