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लखनऊवासियों, हमारा शहर हमेशा से कला, संस्कृति और इतिहास का जीवंत संगम रहा है। ऐसे में जब हम भारत की प्राचीन भित्तिचित्र परंपराओं - अजंता, बाघ और चोल काल की अद्भुत चित्रकला - की बात करते हैं, तो यह विषय हमारे लिए केवल इतिहास नहीं रह जाता, बल्कि भारतीय रचनात्मकता की उस जड़ से जुड़ने का अवसर बन जाता है जिसने हमारे देश की पहचान गढ़ी। भारत की गुफा चित्रकला न केवल हजारों वर्षों पुरानी कला परंपरा है, बल्कि यह हमारे आध्यात्मिक चिंतन, सामाजिक जीवन, और अद्भुत शिल्प-विज्ञान का दस्तावेज़ भी है।
आज हम जानेंगे की भारत की गुफा चित्रकला की प्राचीन परंपरा और उसमें प्रयुक्त तकनीकों के बारे में। फिर हम महाराष्ट्र की अजंता गुफाओं की अद्भुत कला, उनके भित्तिचित्रों और ऐतिहासिक महत्व को समझेंगे। इसके बाद मध्य प्रदेश की बाघ गुफाओं की विशिष्ट शैली और संरचना पर नज़र डालेंगे। फिर हम अजंता और बाघ की पेंटिंग्स के बीच की समानताएँ व अंतर समझेंगे। इसके साथ ही, दक्षिण भारत के चोल काल की मंदिर चित्रकला का परिचय मिलेगा। अंत में, हम इन भित्तिचित्रों की विषय-वस्तु, तकनीकों और आज के संदर्भ में इनके महत्व को समझते हुए लेख को पूरा करेंगे।
भारत की प्राचीन गुफा चित्रकला की परंपरा और इसकी सांस्कृतिक विरासत
भारत की भित्तिचित्र परंपरा दुनिया की सबसे पुरानी कलाओं में से एक है। यह परंपरा केवल चित्रकला नहीं, बल्कि उस समय के समाज, धर्म, मिथकों और मानव-जीवन की गहरी अनुभूतियों को दर्शाने वाली जीवंत कला है। हजारों वर्षों से कलाकारों ने प्राकृतिक पिगमेंट (pigment), मिट्टी, गोबर, चूना, वनस्पतियों से प्राप्त रंग और जैविक चिपकन का उपयोग करके इन भित्तिचित्रों को बनाया। इन चित्रों में जीवन का हर पहलू दिखाई देता है - आध्यात्मिक कथाएँ, दैनिक जीवन, प्रकृति, प्रेम, आध्यात्मिक ध्यान, सामाजिक उत्सव, युद्ध, और यहां तक कि राजवंशों का इतिहास भी। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में चित्रकला की विशिष्ट शैलियाँ विकसित हुईं - उत्तर भारत की बौद्ध परंपरा, दक्षिण की दैवीय-पुराण कथाएँ, मध्य भारत की सांसारिक और सामूहिक जीवन चित्रण - ये सब मिलकर भारतीय कला की समृद्धता को दर्शाते हैं। इस परंपरा का सबसे सुंदर स्वरूप हमें अजंता, बाघ और चोल मंदिरों की चित्रकला में मिलता है।
अजंता गुफाओं की कला: इतिहास, तकनीक और प्रमुख भित्तिचित्र
महाराष्ट्र की अजंता गुफाएँ यूनेस्को विश्व धरोहर (UNESCO World Heritage) स्थल हैं और इनकी भित्तिचित्र कला दुनिया में अद्वितीय मानी जाती है। यहाँ बनाए गए चित्र लगभग 2,000 वर्ष पुराने हैं, और कलाकारों ने इन्हें गोबर, मिट्टी, भूसा, चूना और टेम्पेरा तकनीक (Tempera technology) का उपयोग करके बनाया। चित्रों में पीले, भूरे, लाल, नीले और काले जैसे प्राकृतिक रंगों का समृद्ध उपयोग किया गया। अजंता के चित्र मुख्यतः जातक कथाओं पर आधारित हैं - अर्थात बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ। इनके प्रमुख चित्र हैं -
इन सभी चित्रों की सूक्ष्म रेखांकन, भावनात्मक गहराई और रंगों की गर्माहट भारतीय कला विरासत का श्रेष्ठ उदाहरण हैं।

बाघ गुफाओं की चित्रकला: संरचना, शैली और प्रमुख चित्रांकन
मध्य प्रदेश की बाघ गुफाएँ भारतीय चित्रकला का एक अनोखा अध्याय प्रस्तुत करती हैं, जहाँ कला, संरचना और भावनाएँ एक साथ मिलती हैं। 6वीं शताब्दी में विंध्य पर्वत के दक्षिणी भाग में पत्थरों को काटकर तैयार की गई इन गुफाओं में नौ बड़े कक्ष शामिल हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशेष उद्देश्य और स्थापत्य रूप है। बाघ की चित्रकला की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है गहरे, ऊर्जा से भरे रंग और मोटी रेखाएँ, जिनसे यहाँ की कला अजंता से एकदम अलग दिखाई देती है। रंगमहल (गुफा 4) यहाँ का केंद्र है, जहाँ की भित्तिचित्र कला मानवीय अभिव्यक्तियों, नृत्य, संगीत, प्रेम और दैनिक जीवन के मोहक दृश्य प्रस्तुत करती है। अन्य गुफाओं में धार्मिक, सामाजिक और आवासीय गतिविधियों से जुड़े रूप दिखाई देते हैं - गृह गुफा में शिवलिंग और द्विचरण चिह्न, पांडव गुफा में बुद्ध की मूर्ति, और हाथीखाना में अभिजात्य वर्ग की विश्राम व्यवस्था। बाघ की पेंटिंग्स में भावनाएँ अधिक प्रत्यक्ष और जीवंत हैं - चेहरे के भाव स्पष्ट, रेखाएँ मजबूत, और पात्र अधिक मानवीय प्रतीत होते हैं। इन चित्रों का संरक्षण समय के साथ कठिन होता गया, इसलिए कई पेंटिंग्स अब ग्वालियर पुरातत्व संग्रहालय और स्थानीय संग्रहालयों में सुरक्षित रखी गई हैं। बाघ की कला भारत की सांसारिक और मानवीय दृष्टि को उजागर करने वाला महत्वपूर्ण स्रोत है।

अजंता और बाघ चित्रों की तुलना: शैली, विषय और कलात्मक विशेषताएँ
अजंता और बाघ दोनों भारतीय चित्रकला की धरोहर हैं, लेकिन उनकी शैली, विषय-वस्तु और कलात्मक दृष्टि एक-दूसरे से काफी भिन्न है। अजंता की कला आध्यात्मिक, चिंतनशील और बौद्ध दर्शन के प्रभाव में विकसित हुई। यहाँ रंगों का उपयोग सूक्ष्म है, रेखाएँ कोमल हैं और चेहरों के भाव अत्यंत शांत प्रतीत होते हैं। अधिकांश चित्र जातक कथाओं, बुद्ध के जीवन, और आध्यात्मिक यात्राओं को दर्शाते हैं। इसके विपरीत, बाघ की कला जीवन की सांसारिक वास्तविकताओं के करीब है - यह ज़्यादा उग्र, गहरे रंगों वाली और स्पष्ट रेखाओं पर आधारित शैली है। यहाँ के पात्र आम लोगों से मेल खाते हैं - नर्तक, संगीतकार, महिलाएँ, व्यापारी और समाज का विभिन्न वर्गों से संबंधित लोग। अजंता धार्मिक-आध्यात्मिक दृष्टि का प्रतिनिधि है, जबकि बाघ सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि को दर्शाता है। यह विविधता भारतीय कला की व्यापकता को बताती है, जहाँ आध्यात्मिकता और वास्तविकता दोनों समान रूप से सम्मानित हैं।

दक्षिण भारतीय चोल काल की भित्तिचित्र परंपरा और मंदिर कला
दक्षिण भारत का चोल साम्राज्य कला और स्थापत्य का एक स्वर्णकाल माना जाता है, और इसकी भित्तिचित्र परंपरा भारतीय कला इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। चोल कलाकारों ने मंदिरों की दीवारों पर ऐसी अद्भुत पेंटिंग्स बनाई जो न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाती हैं, बल्कि मानव भावनाओं, प्रतीकवाद और आध्यात्मिकता की गहराई को भी प्रकट करती हैं। इन चित्रों का सबसे सुंदर स्वरूप हमें तंजौर के बृहदीश्वर मंदिर, दारासुरम, और गंगाईकोंडचोलापुरम मंदिरों में देखने को मिलता है। चोल पेंटिंग्स की सबसे बड़ी खासियत है - चेहरों के भाव, हाथों की मुद्राएँ, और देवताओं के रूपों का दिव्य चित्रण। इन पेंटिंग्स में शिव, विष्णु, देवी और अन्य देवताओं के रूप इतने जीवंत दिखते हैं कि वे दर्शक के मन को आध्यात्मिक अनुभव से भर देते हैं। राजराजाचोल और करुवुर देवर का प्रसिद्ध चित्र चोल कला की सूक्ष्मता और गहराई का श्रेष्ठ उदाहरण है। चोल चित्रकला पल्लव और विजयनगर काल की कला के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु की तरह कार्य करती है, जो दक्षिण भारत की कलात्मक विरासत को एक निरंतर प्रवाह में जोड़ती है।
भारतीय भित्तिचित्रों के प्रमुख विषय, तकनीकें और उनका समकालीन महत्व
भारतीय भित्तिचित्रों की विषय-वस्तु इतनी व्यापक है कि यह भारतीय समाज की आत्मा को संपूर्ण रूप में अभिव्यक्त करती है। इन चित्रों में - जातक कथाएँ, बौद्ध धर्म के सिद्धांत, हिंदू पौराणिक प्रसंग, राजदरबारों के उत्सव, वैवाहिक दृश्य, नृत्य-संगीत, समुदाय की गतिविधियाँ, और ध्यान-साधना जैसे विविध विषय मिलते हैं। इन चित्रों में प्रयुक्त तकनीकें भी अनोखी थीं - टेम्पेरा तकनीक, प्राकृतिक पिगमेंट, मिट्टी-चूना मिश्रण, जैविक चिपकन, और कई परतों में बनाए गए आधार। आज इन भित्तिचित्रों का महत्व केवल कला तक सीमित नहीं है - ये इतिहास, मानव संस्कृति, विज्ञान, धर्म और समाजशास्त्र के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। वे हमें बताते हैं कि भारत की कला केवल सजावट नहीं थी, बल्कि जीवन को समझने का एक माध्यम थी। ये चित्र यह संदेश देते हैं कि सभ्यता की वास्तविक शक्ति उसकी कला, संस्कृति और संवेदनाओं में छिपी होती है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/ynwfx6m3
https://tinyurl.com/k9kcpn62
https://tinyurl.com/3crnfp6p
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