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कई वर्षों तक कठोर तपस्या करने के पश्चात बिहार के बोध गया नामक स्थान में उन्हें आत्म ज्ञान अथवा परम ज्ञान की प्राप्ति हुई, जिसके बाद उन्हें सिद्धार्थ गौतम के बजाय भगवान बुद्ध के नाम से जाना जाने लगा। वह एक श्रमण (भिक्षु अथवा साधु ) बने, तथा उनके नियमो तथा शिक्षा-दीक्षाओं के आधार पर बौद्ध धर्म प्रचलित हुआ। सिद्धार्थ की शिक्षा-दीक्षा का कार्यभार उनके गुरु विश्वामित्र ने संभाला, उनसे ही नन्हे सिद्धार्थ ने वेदों और उपनिषदों की शीक्षा के साथ-साथ राजकाज तथा कुश्ती, घुड़दौड़, तीर-कमान, रथ हाँकने और युद्ध करने की कला भी सीखी। सभी कलाओं में वह बेहद कुशल थे परन्तु ह्रदय के बड़े ही कोमल थे। विवाह के उपरांत उनका मन पूर्ण रूप से बैरागी हो गया, और सर्वोच्च सत्य की खोज में उन्होंने अपने परिवार का महल और परिवार का त्याग कर दिया।
भारत में बुद्ध पूर्णिमा के दिन सार्वजनिक अवकाश अवकाश रहता है, जिसकी शुरुआत बी. आर. अम्बेडकर ने कानून और न्याय मंत्री के रूप में की थी। यह पर्व विशेष रूप से सिक्किम, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, बोधगया, लाहौल स्पीति, किन्नौर तथा उत्तरी बंगाल के विभिन्न हिस्सों जैसे कलिम्पोंग, दार्जिलिंग, और कुरसेओंग, और महाराष्ट्र (जहां कुल भारतीय बौद्धों का 77%) रहता है, में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। वेसाक पर्व पर बौद्ध धर्म के अनुयायी विभिन्न मंदिरों में सुबह होने से पूर्व बौद्ध ध्वज के साथ पवित्र तीन मणियों की स्तुति, भजन गायन हेतु एकत्र हो जाते हैं। भक्तों को जीव हत्या से बचने तथा शाकाहारी भोजन का अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इस दिन श्रीलंका जैसे कई अन्य देशों में सभी शराब की दुकानें और बूचड़खाने सरकारी आदेशानुसार बंद कर दिए जाते हैं। साथ ही कैद जीव-जंतुओं को आज़ाद किया जाता है जिसे 'मुक्ति के प्रतीकात्मक रूप में जाना जाता है। वेसाक पर्व को मनाने के लिए वृद्धों, विकलांगों और बीमारों की सेवा करने का भी प्रचलन है। साथ ही इस ख़ुशी के मोके पर उपहार भी वितरित किये जाते हैं। बुद्ध पूर्णिमा को गौतम बुद्ध से संबंधित अनेक धार्मिक स्थलों में बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है, भगवान बुद्ध के जीवन का अभिन्न अंग श्रावस्ती, लखनऊ से ज़्यादा दूर नहीं। श्रावस्ती बौद्ध व जैन दोनों धर्मों की प्रमुख तीर्थ स्थली है। यहाँ पर बौद्ध धर्मशाला, मठ और मन्दिर स्थित हैं। छठी शताब्दी ईसा पूर्व से छठी शताब्दी ईस्वी तक श्रावस्ती कोसल साम्राज्य की राजधानी रहा। श्रावस्ती को गौतम बुद्ध के जीवनकाल के दौरान प्राचीन भारत के छह सबसे बड़े शहरों में से एक माना जाता था। यह माना जाता है कि उस दौरान श्रावस्ती शहर में लगभग 18 करोड़ लोग निवास करते थे। भगवान बुद्ध लगभग 25 वर्षा ऋतुओं तक यहां रहे। पोस्ट को पूरा पढ़ें-
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