मेरठवासियों, जानिए किलों का हज़ारों साल का इतिहास और परीक्षितगढ़ की अनकही कहानी

प्रारंभिक मध्यकाल : 1000 ई. से 1450 ई.
31-01-2026 09:19 AM
मेरठवासियों, जानिए किलों का हज़ारों साल का इतिहास और परीक्षितगढ़ की अनकही कहानी

मेरठवासियों, किलों का इतिहास केवल पत्थर, दीवारों और युद्धों की कहानी नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता की सामरिक बुद्धिमत्ता, सांस्कृतिक विकास और सुरक्षा-चेतना का गहरा प्रतीक है। दुनिया भर में किले इस बात के प्रमाण हैं कि मनुष्य ने हर युग में अपने समाज और अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष किया। हमारे अपने मेरठ के पास स्थित परीक्षितगढ़ किला भी इसी लंबी वैश्विक परंपरा से जुड़ता है - यह किला न सिर्फ स्थानीय इतिहास का हिस्सा है, बल्कि विश्व में किलों के निर्माण और विकास की उस हजारों वर्षों पुरानी यात्रा का भी साक्षी है जिसका प्रभाव आज भी सैन्य संरचनाओं और नगर-योजनाओं में देखा जा सकता है। इस लेख में, हम विश्व के आरंभिक किलों से लेकर भारतीय, सल्तनती, राजपूती, मुगल व औपनिवेशिक किलों तक के विकास को समझेंगे और अंत में मेरठ के परीक्षितगढ़ किले से इस ऐतिहासिक धरोहर को जोड़ेंगे।
आज के लेख में हम किले वास्तुकला की इस विस्तृत यात्रा को सात महत्वपूर्ण उपविषयों में समझेंगे। सबसे पहले, हम जानेंगे कि विश्व में किले निर्माण की शुरुआती अवधारणा कैसे विकसित हुई और मानव सभ्यता ने सुरक्षा के लिए किस प्रकार दीवारों से गढ़ों तक का सफर तय किया। इसके बाद, हम भारत में किलों की प्राचीन परंपरा और सदियों में हुए उनके रूपांतरण को देखेंगे। फिर, हम दिल्ली सल्तनत और राजपूत काल के किलों की प्रमुख वास्तुकला, तकनीक और सामरिक विशेषताओं का अध्ययन करेंगे। इसके पश्चात्, मुगलकाल और औपनिवेशिक दौर में आए बदलते सैन्य नवाचारों को समझेंगे। और अंत में, हम मेरठ के ऐतिहासिक परीक्षितगढ़ किले पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जो स्थानीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
विश्व में किलों के निर्माण की शुरुआती अवधारणा और उसका विकास
किलों का इतिहास मानव सभ्यता के विकास जितना ही पुराना है। जब इंसान छोटे-छोटे समुदायों में रहना शुरू हुआ, तो उसे सबसे पहले जिन खतरों का सामना करना पड़ा, उनमें वन्य जीव, शत्रु जनजातियाँ और प्राकृतिक आपदाएँ शामिल थीं। इन्हीं खतरों से सुरक्षा पाने के लिए उसने मिट्टी, लकड़ी और बड़े पत्थरों से घिरे साधारण परकोटे बनाए। यह प्रागैतिहासिक प्रयास आगे चलकर उन्नत रक्षा संरचनाओं में विकसित हुआ। समय बीतते ही जनजीवन, युद्धनीति और राजनीतिक व्यवस्था जटिल होती गई, जिसके चलते किलों की आवश्यकता बढ़ती चली गई। दुनिया में किले निर्माण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ 1066 में इंग्लैंड पर हुए नॉर्मन (Norman) आक्रमण के बाद आया, जब मोट्टे-बेली शैली के किलों ने यूरोप में सैन्य वास्तुकला की दिशा ही बदल दी। मिट्टी के ऊँचे टीले पर बने टॉवर और चारों ओर सुरक्षात्मक खाई वाले यह किले अपनी सरलता और प्रभावशीलता के कारण तेजी से लोकप्रिय हुए। आगे इन्हीं संरचनाओं ने बड़े पत्थरों से बने स्थायी किलों का रूप धारण किया, जो मध्यकालीन यूरोप के शक्तिशाली प्रतीकों में से एक बन गए। यह समझना आवश्यक है कि किले राजसी दिखावे के लिए नहीं, बल्कि मानव समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बने थे - यही कारण है कि दुनिया के हर कोने में, हर सभ्यता में, अपना एक विशिष्ट किला विकास हुआ।

भारत में किले निर्माण की प्राचीन परंपरा और मध्यकालीन काल तक उसका रूपांतरण
भारत में किलों का इतिहास अत्यंत विस्तृत और बहुस्तरीय है। यहाँ किलों का निर्माण केवल सैन्य रक्षा का कार्य नहीं था, बल्कि यह प्राकृतिक भूगोल, सांस्कृतिक विविधता और राजनीतिक परिस्थितियों का भी प्रतिबिंब था। प्राचीन भारत में किले अक्सर ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों, चट्टानों, घने जंगलों और नदी के किनारों पर बनाए जाते थे, ताकि प्राकृतिक सुरक्षा का लाभ मिल सके। प्रारंभिक किले मिट्टी, लकड़ी, ईंट और स्थानीय पत्थरों से निर्मित होते थे, लेकिन लगातार होने वाले आक्रमणों और बदलती सैन्य तकनीकों ने इन संरचनाओं को बार-बार परिवर्तित किया। 13वीं से 18वीं शताब्दी के दौरान भारत में राजनीतिक अस्थिरता, तुर्क-अफगान आक्रमणों, सल्तनत शासन, मुगल साम्राज्य, मराठों और क्षेत्रीय राजवंशों की बढ़ती शक्ति ने किले निर्माण की तकनीक और शैली को और परिष्कृत किया। किले ऊँची दीवारों, गुप्त सुरंगों, जल संरक्षण प्रणालियों, बहुस्तरीय सुरक्षा पद्धति और विशाल द्वारों के साथ अधिक प्रभावी रूप से डिजाइन किए जाने लगे। इस प्रकार भारतीय किले न सिर्फ युद्धशक्ति के केंद्र थे, बल्कि वे भारतीय सभ्यता की विविधता, सहनशीलता और रणनीतिक कौशल के सम्मिलित विकास का प्रतीक भी बन गए।

दिल्ली सल्तनत काल में किलों का विकास और वास्तुशिल्प नवाचार
भारत में किले निर्माण की कला को नई दिशा दिल्ली सल्तनत के दौरान मिली, जब तुर्क-अफगान शासकों के साथ मध्य एशियाई और फारसी वास्तुकला भी भारत आई। सल्तनत काल में किलों की संरचना सैन्य रणनीतियों के अनुरूप और अधिक मजबूत तथा टिकाऊ बनाई गई। इस समय मेहराब, गुंबद, चूने के मोर्टार (mortar), कंगूरेदार दीवारें और ज्यामितीय सजावट जैसे वास्तु तत्व तेजी से लोकप्रिय हुए। इससे पहले भारत में बीम-स्लैब (beam-slab) ढाँचा प्रचलित था, लेकिन सल्तनत वास्तुकला ने चौकोर संरचना पर गोल गुंबद बैठाने की अनूठी तकनीक विकसित की, जो बाद में हिन्द-इस्लामी वास्तुकला की पहचान बन गई। राजनीतिक परिस्थितियों ने भी किलों को अत्यधिक महत्व दिया - राजपूतों और सल्तनत के बीच लगातार संघर्ष ने शासकों को अधिक मजबूत, सुरक्षित और व्यापक किले परिसरों का निर्माण करने के लिए प्रेरित किया। मंगोल आक्रमणों से सुरक्षा के लिए अलाउद्दीन खिलजी द्वारा निर्मित सिरी किले ने ‘किलेबंद शहर’ की अवधारणा को जन्म दिया, जिसमें पूरा नगर एक संरक्षित परकोटे के भीतर होता था। यह मॉडल बाद में तुगलक शासकों और मुगलों द्वारा भी अपनाया गया। इन नवाचारों ने भारतीय किलेबंदी की दिशा बदल दी और आगे आने वाले सदियों की सैन्य वास्तुकला की नींव रखी।

राजपूत किलों की विशिष्ट शैली और उनकी सामरिक भूमिका
राजपूत किले भारत की सैन्य वास्तुकला का एक शानदार अध्याय हैं, जो शौर्य, कला, भूगोल और परंपरा का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हैं। चित्तौड़, रणथंभौर, कालिंजर और कुम्भलगढ़ जैसे किले न केवल अपनी भव्यता और विशालता के लिए प्रसिद्ध हैं, बल्कि उनकी सामरिक योजना और निर्माण तकनीक अपने आप में अनोखी है। इन किलों का स्थान चयन अत्यंत सोच-समझकर किया जाता था - अधिकांश किले ऊँचे पर्वतों, दुर्गम चट्टानों और प्राकृतिक खाइयों के बीच बनाए गए, ताकि दुश्मन सेना आसानी से उन तक न पहुँच सके। मजबूत पत्थर की ऊँची और मोटी दीवारें, कंगूरेदार बुर्ज, विशाल प्रवेश द्वार, उन्नत जल संरक्षण प्रणालियाँ, गुप्त सुरंगें और कई-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था राजपूत किलों की विशेषताओं में शामिल थीं। राणा कुंभा जैसे महाराणाओं ने किले निर्माण में असाधारण योगदान दिया, विशेषकर कुम्भलगढ़ किले की दीवारें विश्व की सबसे लंबी दीवारों में गिनी जाती हैं। राजपूत किलों की सुंदरता और मजबूती यह दर्शाती है कि वे केवल युद्ध के लिए नहीं, बल्कि कला, संस्कृति और गौरवपूर्ण जीवनशैली के लिए भी बनाए जाते थे - जहाँ दरबार, देवालय, महल, चौक और जलाशय समाज के सामूहिक जीवन का हिस्सा होते थे।

मुगलकाल में किलों का विस्तार, नई तकनीकें और वास्तुशैली
मुगलों का आगमन भारतीय किलेबंदी में एक नया अध्याय लेकर आया। इस काल में किलों ने न सिर्फ मजबूत रक्षा संरचनाओं का रूप धारण किया, बल्कि सौंदर्य, कला और समृद्धि का भी उत्कृष्ट उदाहरण बन गए। मुगल किलों में लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर का संतुलित उपयोग उनकी पहचान बन गया। आंधी गुंबद, सपाट छतें, बड़ी मेहराबें, संगमरमर की नक्काशी, और हिंदुस्तानी भूगोल के अनुकूल तैयार किए गए अंगनुमा बाग़ (चारबाग) मुगल वास्तुकला के मुख्य तत्व थे। अकबर ने आगरा के किले में लाल पत्थर के विशाल प्रकोटे और महलों का निर्माण करवाया, जबकि शाहजहाँ ने इसे सफेद संगमरमर की भव्य संरचनाओं से सजाया। दिल्ली का लाल किला मुगल किलेबंदी और शाही जीवनशैली दोनों का प्रतीक है। मुगल किलों में आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था, दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास जैसे प्रशासनिक परिसर, ज़नाना महल, बाग़, हमाम और जल-संरचनाएँ इस तरह बनाई जाती थीं कि वे सैन्य और शाही दोनों आवश्यकताओं को पूरा करें। भारतीय किला वास्तुकला में मुगल काल को अक्सर सबसे परिष्कृत और संतुलित चरण माना जाता है।

तोपखाने और औपनिवेशिक समय में किलों की संरचना में परिवर्तन
16वीं शताब्दी के बाद जब बारूद और तोपें भारतीय युद्धभूमि का हिस्सा बनीं, तो किले निर्माण की पद्धति में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। पहले जहाँ ऊँची दीवारें और संकरी बुर्ज पर्याप्त मानी जाती थीं, वहीं तोपों के आने के बाद ऐसी संरचनाएँ असुरक्षित हो गईं। इसलिए नई शैली में किलों की दीवारें मोटी, नीची और चौड़ी बनाई जाने लगीं, ताकि वे तोपों के गोले सह सकें। बुर्जों को गोलाकार बनाया गया ताकि तोपें उन पर एक ही दिशा से प्रहार न कर सकें। गेटों पर लोहे की मोटी कीलें लगाई गईं ताकि हाथी उन्हें आसानी से तोड़ न सकें। गोलकुंडा, बरार और शनिवारवाड़ा जैसे किलों में इस शैली के प्रभाव स्पष्ट दिखाई देते हैं। औपनिवेशिक काल में किलों का उपयोग सैन्य केंद्रों से आगे बढ़कर व्यापारिक चौकियों, प्रशासनिक भवनों और सुरक्षित शरण स्थलों के रूप में भी होने लगा। इस प्रकार किलों की भूमिका बदलते समय के साथ सैन्य, आर्थिक और प्रशासनिक - तीनों रूपों में विस्तृत हुई।

मेरठ का परीक्षितगढ़ किला—स्थानीय इतिहास और पुरातात्विक साक्ष्य
मेरठ के पास स्थित परीक्षितगढ़ किला हमारे क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस किले का संबंध पांडवों के वंशज राजा परीक्षित से माना जाता है, जिनके नाम पर पूरे क्षेत्र का नामकरण हुआ। यद्यपि वर्तमान संरचना बाद के शासकों द्वारा निर्मित या पुनर्निर्मित की गई, किंवदंतियाँ इस स्थान को महाभारतकालीन स्मृतियों से जोड़ती हैं। 18वीं सदी में गुर्जर राजा नैन सिंह ने इस किले का पुनर्निर्माण और सुदृढ़ीकरण करवाया, जिससे यह स्थानीय शक्ति का केंद्र बना। परीक्षितगढ़ से समय-समय पर मिले पुरातात्विक अवशेष इसकी ऐतिहासिकता की पुष्टि करते हैं - विशेषकर 1916 में यहाँ से मिले शाह आलम द्वितीय काल के चाँदी के सिक्के बताते हैं कि यह स्थान मुगल शासन और उसके बाद के राजनीतिक परिवर्तनों में भी सक्रिय था। आज भले ही किला खंडहर रूप में है, लेकिन यह मेरठ की प्राचीन और मध्यकालीन विरासत का एक जीवंत चिन्ह है, जो हमें अपने इतिहास की गहराइयों से जोड़ता है।

संदर्भ
https://tinyurl.com/49murxx9 

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